चिठेरों को टिप्पणी-निपटान की जल्दी क्यों रहती है?

हिन्दी ब्लॉगर्स दनादन कमेंट करते है? कई बार आपको लगता है कि आप (चिठेरा) कह कुछ रहे हैं, पर टिपेरे (टिप्पणीकार) एक लाइन, एक बहुप्रचलित शब्द को चुनकर दन्न से टिप्पणी कर आगे बढ़ जाते हैं. आप का मन होता है कि आप फिर से एक स्पष्टीकरण लिखें. टिपेरों का पुन: आह्वान करें हे टिपेराधिपति, कृपया मेरा आशय समझें और फलानी बात पर अपना आशीर्वाद दें. यह आशीर्वाद जम कर आपकी मजम्मत का भी हो सकता है. पर आशीर्वाद टू-द-प्वाइण्ट हो.

देखिये यहां जो जमात है; वह दोनो रोल अदा करती है. एक ही आदमी चिठेरा है और वही टिपेरा भी है. टिपेरे के रोल में 2 मूल तत्व हैं पहला (तत्व-क) स्वांत: सुखाय पढ़ने का और दूसरा (तत्व-ख) टिप्पणी दे कर कटिया फंसाने का. कटिया का मतलब कि ब्लॉगर आपका प्रोफाइल देखे, आपके ब्लॉग पर जा, टिपेरियाकर ऋण उतारे. तत्व-क जो टिप्पणी प्रोड्यूस करता है, वह आनन्दित करने वाली होती है. स्टेटेस्टिकली, यह तत्व हिन्दी चिठेरों में ज्यादा है करीब 50% तक. (अन्यथा जैसा रिसर्च पेपर्स में होता है केवल लिखने वाला ही पढ़ता है!). तत्व-ख (कटिया फंसाने वाला तत्व) जब ज्यादा होता है तो टिप्पणी सूखी-बासी-बेस्वाद सब्जी जैसी होती है.

(टिप्पणी : अहो रूपम, अहो ध्वनि!)

ऐसा नहीं है कि दो अलग-अलग प्रकार के टिपेरे हैं. एक ही टिपेरे में दोनो तत्व होते हैं. जिसमें तत्व-क 70% व तत्व-ख 30% है, वह बड़ा मस्त टिपेरा होगा. चिठेरे के रूप में भी भावी इतिहास उसका है. पर जिसमें इसका उल्टा; तत्व-क 30% या कम और तत्व-ख 70% या ज्यादा है, उसका तो नारद ही भला कर सकते हैं; कि उसे येन-केन-प्रकरेण पन्ना एक पर ज्यादा समय समय मिल सके, उसकी फीड में 200-250 शब्द एडीशनल आते हों, उसकी फोटो भी आती हो पोस्ट की चिप्पी के साथ, या जिसके ऑथर आर्काइव में एरर 404 नॉट फाउण्ड न आता हो।

खैर, यह तो विषयान्तर हो गया. पर दूसरे प्रकार के टिपेरे-चिठेरे को काफी सीखना होगा.

हिन्दी ब्लॉगरी में बड़ा रोचक राग दरबारी बज रहा है. कहीं मुहल्ला है, लोक मंच है, पंगेबाज है, सल्क कर रहे सृजनशिल्पी हैं, निषेध को निमंत्रण मानने वाले धुरविरोधी हैं, हमारे जैसा हिन्दी ब्लॉगरी में चौंधियाया नया एलीमेण्ट भी है … (बस-बस, नहीं तो छूटने वाले कहीं मेरे ब्लॉग पर आना ही बन्द न कर दें!). जरूरत है कि आत्ममुग्धता छोड़ राग दरबारी के आर्केस्टा वाले ब्लॉगर बढ़िया टिपेरा बनने में भी जोर लगायें.

है कोई ई-पण्डित जो बढ़िया टिपेरा कैसे बनें पर फड़कती हुई पोस्ट लिखदे.

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पोस्ट स्क्रिप्ट:

मुझे डिल्यूज़न हो रहा है कि हिन्दी ब्लॉगर सिद्धांत कौमुदी बनाई जा रही है, और उस संहिता के लिये मैने धर्म संसद के समक्ष प्रस्ताव रखा है:

“यह चिठेरा-धर्म है कि चिठेरा अपने चिठ्ठे पर जितनी टिप्पणियों की इच्छा रखता है; पोस्ट लिखने के साथ-साथ कम से कम उतने ब्लॉग्स पर जा कर तत्व-क अनुप्रेरित टिप्पणियां अवश्य करे. और अगर वह किसी घेट्टो (समूह) से जुड़ा है तो घेट्टो के बाहर जा कर कम से कम 25% टिप्पणियां वहां करे. यह न हो कि पत्रकार/मुहल्ला/लोकमंच बिरादरी वाले अपने पट्टीदारों में ही टिपेरते रहें।”
(वरना हमारे जैसे गरीब निर्दलीयों का क्या होगा?)

पोस्ट स्क्रिप्ट 2:

जिस तरह से टिपेरा जा रह है, लगता है जूते खाने कि नौबत जल्दी आने वाली है. भैया क्षमा करें अगर आपकी भावनायें आहत हो रही हैं. किसी व्यक्ति विशेष को लपेटने के लिये यह नहीं लिखा है. आपमें से कोई भी कह दें तो मैं यह पोस्ट हटा दूंगा

Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring village life. Past - managed train operations of IRlys in various senior posts. Spent idle time at River Ganges. Now reverse migrated to a village Vikrampur (Katka), Bhadohi, UP. Blog: https://gyandutt.com/ Facebook, Instagram and Twitter IDs: gyandutt Facebook Page: gyanfb

9 thoughts on “चिठेरों को टिप्पणी-निपटान की जल्दी क्यों रहती है?

  1. भाई आपका यह शोधप्रबंध कार्य अत्यंत रोचक है और चलिए समीर भाई को कुछ नया विषय मिला…। :):):)

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  2. एक कवि सम्मेलन में बड़ी भीड़ दिखी थी स्रोताओं की, किन्तु अन्तिम कवि की कविता सुननेवाला एक भी स्रोता नहीं बचा… इसका राज: कोई स्रोता नहीं, सभी कवि थे… एक-एक कर मंच पर आए, अपनी कविता पढ़ी और चलते बने…गनीमत है कि यहाँ ऐसा तो नहीं…

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  3. शोध कार्य अच्‍छा रहा।अच्‍छा टिपेरा बनने के गुण बताने का जो दायित्‍व समीर जी ने लिया है वे इस काम के लिए सर्वोपयुक्‍त व्‍यक्ति हैं। आभार आपका।

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  4. Aapne 70% aur 30% ka formula bataaya.Lekin ye unke liye hai jo double role mein milte hain.Mera matlab jo ‘Tipere’ aur ‘Chithere’ dono hain.Lekin mere jaison ka kya, jo kewal single role mein milte hain.Jo ‘tipere’ hain.Mere jaise log roj sabere ghoom ghoom kar, badi mehnat karke apna dharm nibhaate hain.Lekin aapne apne lekh mein aise logon ka jikra hi nahin kiya….Sochiye jara.Kitni mehnat karte hain ‘hum log’…Kabhie-kabhie apne comment se jhagda mol lete hain..Aap apne agle post, yaane ki Bhaag-2 mein 100% waalon ka jikra karna mat bhooliyega.Aap apne post mein kewal tipere ke roop mein milne waalon ke liye bahut kuchh likhein.Phir aapko koi chinta karne ki zaroorat nahin.’Double Role’ waale aapke blog par comment nahin karenge, to bhi chalega.Aur ek baat.Ab is desh mein ‘Nirdleey’ gareeb nahin raha.Isliye aap nirdaleey bankar khush rahiye.Dekh nahin rahe Madhu Koda jee ko?Nirdaleey hokar bhi mukhyamantri hain.

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  5. श्री श्री चिट्ठा शास्त्र में कहा गया है कि जिस प्रकार एक सामान्य व्यक्ति को दैनिक कर्मों से निवृत्त होने की जल्दी रहती है ठीक उसी प्रकार एक चिठेरे को टिप्पणी-निपटान की जल्दी रहती है। सुबह सुबह बढ़िया पोस्ट पढ़वाने के लिए धन्यवाद ज्ञानदत्त जी।साथ में धन्यवाद इसलिए भी कि आपकी यह पोस्ट पढ़कर अपने गुरुवर फ़िर से जोश में आ गए और पोस्ट लिखने का बीड़ा उठा लिए है, बोले तो फ़िर एक मस्त रचना पढ़ने को मिलेगी उनके चिट्ठे पर जल्द ही।आपका दिन शुभ हो

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  6. स्पष्ट किया जाये कि यह किस से प्रेरित हो रचा गया है…वैसे आपके निवेदित आलेख का बीड़ा हम ऊठाते हैं.. 🙂 “बढ़िया टिपेरा कैसे बनें”….लिखा जयेगा इस पर..बहेगी ज्ञान गंगा इस पर…जिम्मेदार आप होंगे, मान्यवर…हा हा!!!

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  7. अरे, अरुण जी, आप तो लगता है खुन्दक खा गये. भैया, अगर ऐसा है तो बतायें – जल्दी से. मैं अपनी पोस्ट ही हटा दूंगा.पंगेबाज से पंगा ले कैसे कोई जी सकता है?मुहल्ले से पंगे में आप खड़े थे, इसलिये आपका नाम लिया पोस्ट में. और फोटो – वह तो टिपेरने के धर्म का अंग है. अगर परस्पर गुणगान न होगा तो हिन्दी ब्लॉगरी चलेगी कैसे! वह फोटो हम सब की है.

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  8. आपका टिपेरा शोध बहुत अच्छा है . हम ने 70% क तत्व और 30 % ख तत्व से अपना धर्म निभा दिया . अब आप भी आईये और इस धर्म के सहभागी बनिये.

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  9. ज्ञान दत्त जी अब आपने सुबह सुबह हमे पुकारा हम हाजिर है टिपिया भी रहे है आपकी आज्ञा पर पर ये जो फ़ोटो छापा है वो किस किस का है कृप्या साफ़ साफ़ बताये और तुरन्त हमारे यहा भी टिपियाये ताकी हम भी तिपियाने के तत्व ज्ञान की मिंमासा कर सके

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