अफसरी के ठाठ और आचरण नियमों की फांस

कल मैने अपनी मजबूरी व्यक्त की थी कि मै‍ ब्लॉग पर एक सीमा तक लिख सकता हूं, उसके आगे बोलने के लिये मुझे अपने रिटायरमेण्ट तक रुकना पड़ेगा. बहुत से लोगों ने टिप्पणियों में कहा कि वे मेरे डिस्क्लोजर के लिये मेरे रिटायरमेण्ट का इंतजार नहीं कर सकते. वैसे मुझे कोई मुगालता नहीं है – मेरी पोस्ट की शेल्फ-लाइफ लोगों की याददाश्त में कुछ दिन भर है – एक सप्ताह भी नहीं होगी!

प्रारम्भ आलोक पुराणिक जी ने किया. मेरे लटकाने को टीटीई का लटकाने के समतुल्य माना. टीटीई तो शायद कुछ और कंसीडरेशन से (जिस कंसीडरेशन की शिकायतें मैं नौकरी के प्रारम्भ से डील करता आया हूं और जो कन्सीडरेशन जनता सहर्ष करने को तत्पर होती है!) लटकाना समाप्त कर आपको यह अनुभूति करा देता हो :

सकल पदारथ हैं जग माहीं; बिन हेर-फेर नर पावत नाहीं.

पर मेरे पास वह कंसीडरेशन नहीं है. मैं सरकारी नौकरी के आचरण नियमों और व्यक्तिगत नैतिकता से बंधा हूं. पुराणिक जी ने मेरी पोस्ट पर एक जगह टिपेरा था कि उनकी लम्बी टिप्पणी बराबर लेख के उन्हे 2000 रुपये मिलते हैं. मेरे थोड़े से घटिया लेखन के अगर 1000 रुपये प्रति लेख भी मिलें तो मै इस नौकरी को बेहिचक छोड़ कर लेखन प्रारम्भ कर सकता हूं. और तब कई लोगों की कई बखिया उधेड़ कर कई चिन्दियां सिल सकूंगा. वर्ना अभी तो यह दशा है कि लिखे का 30% तो मन मार कर रोक लेना पड़ता है; कहीं सरकारी आचरण नियम का उल्लंघन न हो जाये!

The Conduct Rules which exist, need to undergo change as more and more accessibility to Internet as form of expression is available to people in general and Government Officials in particular. The personal diaries which we maintain are going to be increasingly on the net in which people can peep into. And there shall be progressive tendency in the Officials to speak out.
I think, in the years to come; some changes will do take place. Right To Information Act has started playing some role in opening up. Though initial Officials’ reaction is to cover-up.
With society opening up, salaries improving, corruption going down and privatisation/globalisation making headway; we are going to be in new set of working equations.

मसिजीवी जी ने बेनाम लेखन का ऑप्शन सुझाया है. बड़ा सीधा सा है. पर पेंच यही है कि भारत ने एक बुढ़ऊ पैदा किये थे, जिनका पोता अभी गुजरा है. उनका कहना था कि आप कम्पार्टमेंटलाइज्ड जीवन नहीं जी सकते. छ्द्म और बेबाक एक साथ नहीं हो सकते. उन बुढ़ऊ से ड़र लगता है क्योकि उस बुढ़ऊ की आवाज अपने अन्दर की आवाज है जिसे फ़ेस करना एक चैलेन्ज होता है. इसीलिये मैने अपने ब्लॉग को सेल्फ-एडवर्टाइजमेण्ट की सीमा तक खुला रखा है. उसमें अगर विरोधाभास हैं तो वे मेरे व्यक्तित्व के छेद हैं. जो मेरे सोच की गरीबी और फटेहाली बयान करते हैं. बेनाम लेखन से वह फटेहाली आसानी से छिप सकती है. और इंटेलेक्चुअल पाइरेसी कर तो बड़े मजे से अपने को बुद्धिजीवियों की कतार में लाया जा सकता है. मगर अंतत: क्या होगा सब ठाठ पड़ा रह जायेगा जब लाद चलेगा बंजारा.

मुझे हिन्दी लिखने का तात्कालिक जुनून अवश्य है पर रामकृष्ण परमहंस की दशा नहीं है कि कैवल्य प्राप्ति हो गयी हो और हांक लगा रहा होऊं कि आओ सुपात्रों मेरा रहस्य शेयर करो!

जो कुछ सरकारी नौकरी के कारण नहीं बोल सकता वह मानवों के छुद्र स्वभाव, साम्प्रदायिकता से निपटने का नीतिशास्त्र, राजनैतिक दखलन्दाजी और सरकारी नीतिगत मामलों से सम्बन्धित हैं. उनका क्या किया जाये? वे रहेंगे ही. अन्यथा मेरे लेखन से जीवनयापन भर को मिले तो नौकरी (नौकरी का सरकारी ताम-झाम छोड़ना बहुतों को रुलाई ला देता है!) छोड़ आलोक पुराणिक से जुगलबन्दी सहर्ष की जा सकती है!
(दोनो महानुभावों की फोटो उन्ही के ब्लॉग से उखाड़ी हैं. वहां फिर जम आयी होंगी. फिरभी, अगर उन्हे आपत्ति हो तो मैं वापस कर दूंगा.)

Author: Gyan Dutt Pandey

Exploring village life. Past - managed train operations of IRlys in various senior posts. Spent idle time at River Ganges. Now reverse migrated to a village Vikrampur (Katka), Bhadohi, UP. Blog: https://gyandutt.com/ Facebook, Instagram and Twitter IDs: gyandutt Facebook Page: gyanfb

5 thoughts on “अफसरी के ठाठ और आचरण नियमों की फांस”

  1. आप और काकेश जी आए और आते ही छा गए, आप हमारे पसंदीदा चिट्ठाकारों में शामिल हो चुके हैं। आप लिखते रहें हम दस साल इंतजार कर लेंगे, इतना तो पक्का है कि हम दस साल बाद भी आपको यहीं मिलेगें।फिलहाल एक पोस्ट लिखें “दस साल बाद” 🙂

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  2. आलोक पुराणिक उवाच > आपके लेखन के धांसूत्व में और बढ़ोत्तरी हो, शुभकामनाएं, अफसरी तो बहुत लोग कर रहे हैं। हम इंतजार करेंगे दस सालों तक आपकी सुनने का।ये लो. उतार दिया न चने के झाड़ पर! मैं सोचता था कि आप कोई जुगत बता देंगे फटक गिरधारी ब्राण्ड लेखन पर जीने की. पर आपने तो अपना 2000 रुपये वाला टिपेरकर पल्ला झाड़ लिया. खैर अपने भाग्य में सरकारी कोल्हू में पिरना बदा है!

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  3. पांडेजी, हम तो रेलवे में टीटीई से बड़ा अफसर किसी को नहीं जानते। क्या टीटीई से बड़ा अफसर भी रेलवे में कोई होता है क्या। और जी आलोक पुराणिक के बहकावे में आकर नौकरी-वौकरी न छोड़ियेगा। कई बच्चों को हमने बिगाड़ा है, ऐसा इल्जाम हमारे टीचिंग कैरियर में हम पर लगता रहा है। पर आप जैसे किसी बड़े को बिगाड़ने का श्रेय हम नहीं लेना चाहेंगे। वैसे आपकी क्षमता के लेखक को एक हजार नहीं, बहुत ज्यादा मिलेगा। पर वह अलग मसला है। वैसे,सरकारी अफसरी छोड़ने के कष्टों से मैं वाकिफ हूं। दिल्ली की लाइब्रेरियों में कई पुराने टाइप के आईएएस मिलते हैं, जिन्हे देखकर लोग भागने लगते हैं। लोग बताते हैं कि आईएएस गण बार-बार यही बताते हैं कि कैसे प्रधानमंत्री ने इन्हे आधी रात बुलाकर उस फाइल पर नोटिंग लिखवाई थी और ब्रह्मांड को नष्ट होने से बचाया था। पुराना अफसर नौकरी खत्म होने से लेकर मरण तक सिर्फ एक स्टेज में रहता है-संस्मरण स्टेज में। पर आप की पहचान तो बतौर लेखक है। आप इस कष्ट से न गुजरेंगे। अफसर बहूत आते हैं, चले जाते हैं। पर लेखक आता ही है, जाता नहीं है। मरकर भी नहीं। कहीं न कहीं उसका नाम नहीं तो निशान बचा ही रह जाता है। आपके लेखन के धांसूत्व में और बढ़ोत्तरी हो, शुभकामनाएं, अफसरी तो बहुत लोग कर रहे हैं। हम इंतजार करेंगे दस सालों तक आपकी सुनने का। आलोक पुराणिक

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