नारद का कलेवर अखबार जैसा करें जनाब!

मैं अखबार के स्पोर्ट्स और फिल्म के पन्ने पर शायद ही जाता होऊं. भरतलाल (मेरा भृत्य) केवल फिल्म के पन्ने निहारता है. नगर/महानगर/अंचल की खबरें मेरे पिताजी पढ़ते हैं. यानि हर एक की पसन्द का अपना पन्ना. अखबार को ले कर घर में कोई चौंचियाहट नहीं है.

वही हाल नारद का होना चाहिये. हिन्दू का पन्ना; मुसलमान का पन्ना, सेकुलर का पन्ना; बच्चों का पन्ना, बाड़मेर पुलीस का पन्ना, खेल का पन्ना, रेल का पन्ना, बैन का पन्ना, कविता का पन्ना, सभ्य का पन्ना, गाली देने वाले का पन्ना…. सब अपने ब्लॉग को मन माफिक पन्ने के ऊपर पंजी करा लें. या फिर सहूलियत हो कि लिख्खाड़ ब्लॉगर लोग जो दिन में 5 पोस्ट लिखें और वे पांच अलग अलग पन्नों पे टंग जायें – उनके टैग के मुताबिक. उनकी सहूलियत के लिये दो चार और पन्ने क्रियेट कर दिये जायें – भुतहे पन्ने जहां कभी कोई भूले भटके ही जाता हो.

मेरा कर्तव्य नारद के वर्तमान झाम का सॉल्यूशन सोचना था. तकनीकी सिर फोड़ी जीतेन्द्र जैसे करें. वैसे भी लोग उनको तलाश रहे हैं! कुछ बाड़मेर पुलीस वाले ब्लॉग पर एफ.आई.आर. न कर आये हों!

कैसी लगी ये मुन्नी (मिनी) पोस्ट? जब प्रिय लोगों ने टार्गेट दिया है 1000 पोस्ट का तो ऐसी मुन्नी पोस्ट ही बन पायेंगी!
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Joke apart, I feel, some kind of segregation will help. Once you have proliferation and variety in the content and do not want to police the Blog content (which otherwise you cannot do), the better option is sorting the Blogs and letting people decide where they want to go or what they want to read.
At present energy is wasted in clicking and finding that you have come to a post which is not in synchronism with your thought. But once you come to a post, like an obsessive blogger,you read and you fume and you comment and then suck your thumb because your comment will not make the chap change his views!
Sarcasm in comments, if avoided, can serve the purpose to a large extent. A post on Effective Commenting by Mr Sameer Lal is long over-due!
लगता है ब्लॉग में अंग्रेजी ठूंसने पर अमित और श्रीश अपनी कृपाणें ले कर आने वाले होंगे!

Author: Gyan Dutt Pandey

Exploring village life. Past - managed train operations of IRlys in various senior posts. Spent idle time at River Ganges. Now reverse migrated to a village Vikrampur (Katka), Bhadohi, UP. Blog: https://gyandutt.com/ Facebook, Instagram and Twitter IDs: gyandutt Facebook Page: gyanfb

18 thoughts on “नारद का कलेवर अखबार जैसा करें जनाब!”

  1. वर्गीकरण करिएगा तो मुश्किलें अगर बढ़ेंगी नहीं तो कम भी नहीं होंगी. किसी संगीतकार के निधन पर लिखे ब्लॉग को कहाँ रखिएगा, समचार, विचार, संगीत,कला,मनोरंजन या मातमपुर्सी में…ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं…मैच फिक्सिंग के आरोप में क्रिकेटर जेल जाएगा तो खेल की कैटेगरी में रखेंगे, कि जेल की कैटेगरी में…मुश्किल अब भी है, तब भी रहेगी, मेहनत करिएगा तो ध्यान रखिएगा कि उसकी क्या सार्थकता है. कुछ कैटेगरी ज़रूर अलग की जा सकती है जैसे कविता, तकनीकी, इधर-उधर की यूट्यूब की क्लिप वगैरह, स्वलिखित सामग्री और किसी किताब से उठाकर बाक़ियों के ज्ञानवर्धन के लिए दी गई सामग्री आदि…वैसे आलोक जी का सुझाव सही है कि पहले जनरल रहने दें फिर जिसे सिर्फ़ कविता पढ़नी हो, वह कविता के लिंक पर क्लिक करे या व्यंग्य पर…ईस्वामी जी ने काफ़ी गहरी बात कही है, सोचने की ज़रूरत है.धन्यवाद

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  2. सुझाव तो बेहतरीन हैं मगर यह अंग्रेजी का क्या शुरु किया गया है आजकल. जरा बतायें तो. कोई फायदा होता होगा तो हम भी कोशिश करें. एक ठो डिक्शनरी जुगाड़ लाये हैं. 🙂

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  3. कम शब्‍दों में काफी कुछ कह गये। पर एक बात ध्‍यान देने योग्‍य हे जो स्‍वामी जी ने कहा है कि ्ञानदत्त जी, इधर देसी जनता एक ही ब्लाग पर, एक पोस्ट में दफ़्तर में बैठ कू अपनी मम्मी की याद में कविता करती और दूसरी में नये जॉब पर जावा की वेब-सर्विस बनाने में आई समस्या का हल पूछती है!कई बार तो एक ही पोस्ट में अलग अलग पैरा में चार अलग अलग विषय पर बात होती है, कौन सी पिच्चर देखी, वेजिटेरियन होने के फ़ायदे, दारू पीने के नुकसान, यू.एन. में भारत की पक्की सीट काहे नही है आदी और पोस्ट होती है “ऐसे ही”/”यूं ही” श्रेणी में लिखी गई.हम लोग एक ही ब्‍लाग में कई श्रेणी में रचना करते है। हमारे लिये निर्धारण में दिक्‍कत आयेगी।

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  4. आदरणीय, आपकी व्‍यथा हम समझ रहे हैं कम से कम मैं प्रयास करूगा बेबजह ब्‍लगिया के पाठक के समय को व्‍यर्थ न करने का । श्रीमननारायण नारायण का गुरू मंत्र दिया है उसका पालन होगा ।

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  5. आपसे विनम्र अनुरोध है कि मुझ जैसे सिर्फ हिन्दी के जानकारों पर रहम करें। आपने अंग्रेजी में क्या लिखा है हम तो पढ़ ही नहीं पाये और आपके अमूल्य लेखन को पढ़ने से वंचित रह गये।

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  6. हमें बहुत खुशी होती है जब हमसे अपेक्षाएं लगाई जाती हैं – अपेक्षाएं अपनों से ही होती हैं.ज्ञानदत्त जी, इधर देसी जनता एक ही ब्लाग पर, एक पोस्ट में दफ़्तर में बैठ कू अपनी मम्मी की याद में कविता करती और दूसरी में नये जॉब पर जावा की वेब-सर्विस बनाने में आई समस्या का हल पूछती है! कई बार तो एक ही पोस्ट में अलग अलग पैरा में चार अलग अलग विषय पर बात होती है, कौन सी पिच्चर देखी, वेजिटेरियन होने के फ़ायदे, दारू पीने के नुकसान, यू.एन. में भारत की पक्की सीट काहे नही है आदी और पोस्ट होती है “ऐसे ही”/”यूं ही” श्रेणी में लिखी गई. हमें ब्लागर्स को पूरी स्वतंत्रता देते हुए कोई गरिमापूर्ण हल निकालना होता है. चलिये आन द फ़्लाई डाईनामिक वर्गिकरण की बात करें – टैग आधारित वर्गिकरण की बात करें, सीधे टैग या कीवर्ड आधारित वर्गिकरण भी नही किया जा सकता मसलन “जावा” माने कॉफ़ी या प्रोग्रामिंग लेंग्वेज़? लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं की ये वर्गिकरण कोई असंभव कर्म हो. सच बोलूं तो मैने अभी इस पर उथला-उथला ही सोचा है और वैसे अपनी सोच ज्यादा गहरी नही है.. ज्यादा गहराई से डर लगता है! आपकी पोस्ट अच्छी लगी – समझ में आ गई ना इसलिये. 😉

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  7. थोड़ा मुश्किल काम होगा कैटेगराईज़ करना!!अब आपकी अंग्रजी से तो तकलीफ़ उन्हें होगी ना जिन्हें अंग्रेजी आती होगी। अपन के टाईप लोगों को जिन्हें अंग्रेजी नही आती वो तो अंग्रेजी वाला पैराग्राफ़ देखेंगे ही नहीं ऐसे ही सटक लेंगे!!

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