टीटीई की नौकरी के विरोधाभास


ट्रेन के समय पर कोच के टीटीई को निहारें. आप कितने भी लोक प्रिय व्यक्ति हों तो भी आपको ईर्ष्या होने लगेगी. टीटीई साहब कोई बर्थ खाली नहीं है कहते हुये चलते चले जा रहे हैं; और पीछे-पीछे 7-8 व्यक्ति पछियाये चल रहे हैं. टीटीई साहब मुड़ कर उल्टी दिशा में चलने लगें तो वे सभी लोग भी पलट कर फिर पछिया लेंगे.बिल्कुल अम्मा बतख और उसके पीछे लाइन से चलते बच्चे बतखों वाला दृष्य!

टीटीई साहब को गोगिया पाशा से कम नहीं माना जाता. वे आपके सामने पूरा चार्ट फैलादें, पूरी गाड़ी चेक कर दिखादें कि कोई बर्थ खाली नहीं है. पर हर आदमी सोचता है कि वे अगर इच्छा शक्ति दिखायें तो आसमां में सुराख भी कर सकते हैं और एक बर्थ का जुगाड़ भी. उनके पीछे चलने वाली “बच्चा बतख वाली” जनता यही समझती है. इसी समझ के आधार पर अर्थशास्त्र की एक शाखा कार्य करती है. कई उपभोक्ता लोग हैं जिन्हे इस अर्थशास्त्र में पीएचडी है. और वे इस अर्थशास्त्र को गाहे-बगाहे टेस्ट करते रहते हैं.

मेरे पिताजी किस्सा सुनाते है कि उनके छात्र होने के दिनों में फलाना टीटीई था, जिसका आतंक इलाहाबाद से मेजा-माण्डा तक चलने वाले स्टूडेण्टों पर बहुत था. टीटीई-पावर और स्टूडेण्ट-पावर में अंतत: स्टूडेण्ट-पावर जीती. स्टूडेण्टों ने एक दिन मौका पा कर टौंस नदी में उस फलाने टीटीई को झोक कर उसका रामनाम सत्त कर दिया. यह आज से 50 साल पहले की बात होगी.वैसे मैं अपने पिताजी की पुराने समय की बातों को चुटकी भर नमक (पिंच ऑफ सॉल्ट) के साथ ही लेता हूं. इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अपने दिनों के जितने वे किस्से सुनाते हैं; उन्हें वैलिडेट करने का मेरा न कोई मन है और न संसाधन. पर फलाने टीटीई के टौंस नदी में झोंकने की जो कथा वे सुनाते हैं, उससे छात्र वर्ग में टीटीई के प्रति गहन अरुचि स्पष्ट होती है.

रेलवे की दुनिया

(रामदेव सिंह के सन 1999 में जनसत्ता में छपे एक लेख के अंश):

रेलवे जनसेवा का एक ऐसा उपक्रम है, जिसकी संरचना वाणिज्यिक है, जिसके रास्ते में हजार किस्म की परेशानियां भी हैं. राष्ट्रिय नैतिकता में निरंतर हो रहे ह्रास से इस राष्ट्रीय उद्योग की चिंता भला किसे है? रेलवे में टिकट चेकिंग स्टाफ की आवश्यकता ही इसलिये हुई होगी कि वह रेलवे का दुरुपयोग रोके और डूब रहे रेलवे राजस्व की वसूली करे. अंग्रेज रेल कम्पनियों के दिनों में ही टीटीई को ढेर सारे कानूनी अधिकार दे दिये गये थे. लेकिन उससे यह उम्मीद भी की गयी थी कि वह “विनम्र व्यवहारी” भी हो. रेल में बिना टिकट यात्रा ही नहीं, बिना कारण जंजीर खींचने से लेकर रेल परिसर में शराब पीना और गन्दगी फैलाना तक कानूनन अपराध है. एक टीटीई की ड्यूटी इन अपराधों को रोकने एवम अपराधियों को सजा दिलाने की है लेकिन शर्त यह है कि होठों पर मुस्कुराहट हो. कितना बड़ा विरोधाभास है यह. अब खीसें निपोर कर तो ऐसे अपराधियों को पकड़ा नहीं जा सकता है. जाहिर है इसके लिये सख्त होना पड़ेगा. सख्त हो कर भी 20-25 के झुण्ड में जंजीर खींच कर उतर रहे “लोकल” पैसेंजर का क्या बिगाड़ लेगा एक टीटीई?@

ब्लॉग पढ़ने वाले 8-10 परसेण्ट लोग परदेस में भी हैं – वहां टीटीई जैसी जमात के क्या जलवे हैं? कोई सज्जन बताने का कष्ट करेंगे?

जलवे तो तभी होते हैं जब डिमाण्ड-सप्लाई का अंतर बहुत हो. यह अंतर टीटीई की “जरूरत” और ग्राहक की “तत्परता” में हो या ट्रेनों में उपलब्ध बर्थ और यात्रा करने वालों की संख्या में हो. आप समझ सकते हैं कि जलवे ग्रीष्मकाल या दशहरा-दिवाली के समय बढ़ जाते हैं. ऐसा कोई अध्ययन तो नहीं किया गया है कि इस जलवे के समय में टीटीई वर्ग छुट्टी ज्यादा लेता है या वर्षा ऋतु के चौमासे में. पर यह अध्ययन किसी रिसर्च स्कॉलर को एच.आर.डी. में पीएचडी की डिग्री दिलवा सकता है.

मैं यहां टीटीई पर केवल व्यंग नहीं करना चाहता. उनकी नौकरी में जोखिम बहुत हैं. बहुत से वीवीआईपी सही-गलत तरीके से यात्रा करते हैं. कभी किसी सही को गलत तरीके से या गलत को सही तरीके से उन्होनें चार्ज कर लिया तो बड़ा हाई-प्रोफाइल मामला बन जाता है – जो बड़ों-बड़ों के सलटाये नहीं सलटता. बेचारे टीटीई की क्या बिसात! उसकी नौकरी तलवार की धार पर है. इसके अलावा उस जीव से दो विरोधी आवश्यकतायें हैं – व्यवहार विनम्र हो और बिना टिकट की वसूली कस के हो. भारत में शराफत से सीधी उंगली कुछ नहीं निकलता. अत: जब टीटीई यात्रियों से जायज पैसे वसूलता है तो उसपर अभद्र व्यवहार, नशे में होने और (अनुसूचित जाति-जनजाति के मामले में) जाति सूचक अपशब्द प्रयोग करने के आरोप तो फट से लगा दिये जाते हैं. हर तीसरा-चौथा टीटीई इस प्रकार की शिकायत का जवाब देता पाया जाता है. और अगर वह जड़भरत की तरह निरीह भाव से काम करता है – तो उसे प्रशासन की लताड़ मिलती है कि वह कसावट के साथ टिकट चैकिंग नहीं कर रहा.

जब टीटीई की बात हो रही है तो मैं एक टीटीई की भलमनसाहत की चर्चा के बिना नहीं रह सकता. हम लोग, एक दशक से भी अधिक हुआ, रेलवे स्टाफ कॉलेज बडौदा में कोई कोर्स कर रहे थे. हमें दो-दो के ग्रुप में बडौदा स्टेशन पर कर्मचारियों की कार्य के प्रति निष्ठा जांचने भेजा गया. चूकि हम लोग लोकल नहीं थे, हमें बतौर यात्री स्वांग रच कर यह जांचने को कहा गया था. मेरे साथ मेरे मित्र थे. हेड टिकेट कलेक्टर के दफ्तर के बाहर मैं अचानक लंगड़ाने लगा. मेरे मित्र मुझे सहारा देकर हेड टीसी के दफ्तर में ले कर गये. मैने पूरी पीड़ा से बयान किया कि फुट ओवर ब्रिज से उतरते हुये सीढ़ियों की चिकनाहट से मेरा पैर स्लिप कर मोच खा गया है. तेज दर्द है. हेड टीसी ने तुरंत मुझे बैठने को कुर्सी दी. मोजा उतार कर मेरा पैर चेक किया और बोला कि फ्रेक्चर नहीं लगता. वह दौड़ कर दवा की दूकान से मूव/आयोडेक्स ले आया. मेरे पैर पर धीरे-धीरे लगाया और कुछ देर आराम करा कर ही मुझे जाने दिया. धन्यवाद देने पर वह हल्का सा मुस्कुराया भर. मुझे हेमंत नाम के उस नौजवान हेड टीसी की याद कभी नहीं भूलेगी.

तो मित्रों टीटीई की नौकरी अलग अलग प्रकार की अपेक्षाओं से युक्त है. टीटीई करे तो क्या करे!


@ रामदेव सिंह जी का यह लेख मेरी ब्लॉग पोस्ट से कहीं बेहतर लिखा गया लेख है. लालच तो मन में ऐसा हो रहा है कि पूरा का पूरा लेख प्रस्तुत कर दिया जाय, पर वह लेखक के साथ अन्याय होगा और शायद चोरी भी.


Author: Gyan Dutt Pandey

Exploring village life. Past - managed train operations of IRlys in various senior posts. Spent idle time at River Ganges. Now reverse migrated to a village Vikrampur (Katka), Bhadohi, UP. Blog: https://gyandutt.com/ Facebook, Instagram and Twitter IDs: gyandutt Facebook Page: gyanfb

12 thoughts on “टीटीई की नौकरी के विरोधाभास”

  1. मैं यहां टीटीई पर केवल व्यंग नहीं करना चाहता. उनकी नौकरी में जोखिम बहुत हैं. बहुत से वीवीआईपी सही-गलत तरीके से यात्रा करते हैं. कभी किसी सही को गलत तरीके से या गलत को सही तरीके से उन्होनें चार्ज कर लिया तो बड़ा हाई-प्रोफाइल मामला बन जाता है – जो बड़ों-बड़ों के सलटाये नहीं सलटता. बेचारे टीटीई की क्या बिसात! उसकी नौकरी तलवार की धार पर है.बिलकुल, और कदाचित्‌ इसलिए टीटीई सीट दिलाने के लिए जो रूपए लेते हैं वो hazard pay ही होती है, नहीं? 😉 अब किसी और की क्या कहें, यह तो मैंने अपनी आँखों से देखा है, “सीट नहीं है, बर्थ नहीं है” भजने वाले टीटीई महोदय की जेब में जहाँ सौ का नोट गया वहीं स्लीपर में एक खाली बर्थ अपने आप ही जैसे जादू के ज़ोर पर उग आती है!! 😉 उस मौके पर हमने तो पड़ोस की सीट पर बैठे महाशय से दो बर्थ पूरा भाड़ा चुका ले ली थी क्योंकि उनके पास वो दो फालतू थी, जिन दो को उनके साथ आना था वे नहीं आ पाए थे!! 🙂

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  2. आपने बेहद अच्‍छा लिखा लोग बतख बच्‍चे की तरह टीटीई के पीछे घूमते रहते हैं और वह भी अपना भाव खाता रहता है। वैसे भारतीय रेल में भले टीटीई काफी है। मैं रोजाना विरार लोकल ट्रेन से आता जाता हूं, उसमें दो टीटीई मीरा रोड स्‍टेशन के बाद आते हैं। एक है शर्मा जी और दूसरे मिश्रा जी। आपके पास टिकट न हो, पास न हो या सेकंड क्‍लास के पास पर प्रथम श्रेणी में चढ़ गए और बाद में इनके हत्‍थे तो आपसे सैटलमेंट कर लेंगे बजाय रेलवे रसीद बनाने के। इससे एक तो लोगों की जेब पर ज्‍यादा बोझ नहीं पड़ता दूसरा इनकी जेब भारी हो जाती है। इन लोगों के यहां काफी फ्लैट है और भारी भरकम निवेश। मेरे ख्‍याल से टीटीई जैसा जीव सोचकर आयकर और रेल विभाग का तंत्र चुप है, जबकि हैं बड़े मालदार।

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