भय और अज्ञान की उत्पादकता


पिछली पोस्ट पर कई टिप्पणियां भय के पक्ष में थीं। बालक को भय दिखा कर साधा जाता है। यह भी विचार व्यक्त किया गया कि विफलता का भय सफलता की ओर अग्रसर करता है – अर्थात वह पॉजिटिव मोटीवेटर है।

पता नहीं। लगता तो है कि टिप्पणियों में दम है। भय से जड़ता दूर होती है। भय कर्म में प्रवृत्त करता है लोगों को। पर भय चिंता भी उपजाता है। चिंता व्यक्ति को किंकर्तव्यविमूढ़ करती है।

scared भय के कुछ शॉर्टटर्म फायदे होंगे। पर वह डी-जनरेट करता है व्यक्तित्व को। भय कम्पाउण्ड (compound – संवर्धित) होता जाता है। यह बहुत कम होता है कि भय आपको काम में प्रवृत्त करे और उससे उत्पन्न सफलता से आप भय को सरमाउण्ट (surmount – पार पाना) कर जायें। अंतत वह मानव को संज्ञाशून्य करता है। भय की लम्बे समय में उत्पादकता ऋणात्मक है।

हम एक प्रबुद्ध आदमी का उदाहरण लें। भगवान महावीर की बात नहीं करूंगा – उन्हे तो ईश्वरत्व मिल गया था। बापू की बात करें। वह हाफ नेकेड फकीर (भले ही हम उनसे सहमत न भी हों कई बातों में) कभी भय में तो निवास नहीं किया। और बापू की प्रोडक्टिविटी की अल्प मात्रा भी हम पा सकें तो महान बन जायें। हम अपने परिवेश में कुछ उपलब्ध करने वालों को देखें तो अधिकांश अपने भय पर विजय पा कर ही आगे बढ़े हैं।

अज्ञानी को, कर्म में प्रवृत्त करने को भय काम आता है। पर वह बच्चे से काम कराने या रेवड़ हांकने जैसी चीज है। अंतत: अज्ञान मिटाने और भय को नष्ट करने से ही सफलता मिलनी है।

ऐसा नहीं है कि अभय और संतोष से आदमी अकर्मण्य़ता को प्राप्त होता है। राजसिक वीरत्व अभय से ही आता है और सात्विक "हाइपर एक्टिविटी" अभय का ही परिणाम है।

मेरे कार्यकुशल कर्मचारी वे हैं, जिनके लिये मुझे दण्ड या भय का सहारा नहीं लेना पड़ता। और मेरे सर्वोत्तम उपलब्धता के क्षण वे रहे हैं, जब मैने सेल्फमोटीवेटेड और निर्भय दशा में कार्य किया।

खैर; पिछली पोस्ट पर आलोक पुराणिक जी की बड़ी अच्छी टिप्पणी है –

alok-puranik डरना जरुरी है
क्योंकि कसब है
डरना जरुरी है क्योंकि मौत का एक से बढ़कर एक सबब है
डरना जरुरी है कि बमों की फुल तैयारी है
डरिये इसलिए कि पडोस में जरदारी है
डरिये कि उम्मीद अगर है तो दिखाई नहीं देती
डरिये कि अब तो झूठे को भी सच की आवाज सुनाई नहीं देती
डर जाइये इतना इतना कि फिर डर की सीमा के पार हो जायें
फिर उठें और कहें अब डर तुझसे आंखें चार हो जायें
पर वहां तक पहुंचने के लिए कई पहाडों से गुजरना है
कई बमों की गीदड़ों की दहाड़ों से गुजरना है
डर के मुकाम से पार जाने की तैयारी शुरु करता हूं
2009 की शुरुआत में इसलिए सिर्फ डरता हूं सिर्फ डरता हूं

scared_cat


नये साल पर भय की बात मैने शुरू नहीं की। आभा जी ने दुष्यंत कुमार की गजल न ठेली होती तो मैं भी फूल-पत्ती-मोमबत्ती की फोटो लगा नया साल मुबारक कह रहा होता।

इस भय छाप पोस्ट से मैं आपको छूंछा "नव वर्ष की शुभकामनायेँ" कह सटक लेने का मौका तो नहीं दे रहा। बाकी आपकी मर्जी! smile_regular


Author: Gyan Dutt Pandey

Exploring village life. Past - managed train operations of IRlys in various senior posts. Spent idle time at River Ganges. Now reverse migrated to a village Vikrampur (Katka), Bhadohi, UP. Blog: https://gyandutt.com/ Facebook, Instagram and Twitter IDs: gyandutt Facebook Page: gyanfb

33 thoughts on “भय और अज्ञान की उत्पादकता”

  1. तमाम भारी भरकम शब्दों का इस्तेमाल कर आपने भयभीत कर दिया। अभी तक तो केवल मंदी का भय था कि कब नौकरी चली जाए। हालांकि अब वह भी नहीं रही। वैसे लगता है कि अब लोग हिंदी समझने लगे हैं, तभी तो इतनी टिप्पणियां आई हैं।नए साल की ढेरों शुभकामनाएं।

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  2. गांधी का ‘अभय’ तो ‘निर्भय’ का आसवन है । ‘निर्भय’ अर्थात् किसी से भयभीत न होना । ‘अभय’ अर्थात् न तो किसी से भयभीत होना और न ही किसी को भयभीत करना ।भय तो मनुष्‍य को अकर्मण्‍य और निष्क्रिय बनाता है ।

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  3. २५ दिसम्बर को आपसे व भाभी से भेंट कर अत्यन्त प्रसन्नता हुई, अविस्मरणीय है। आप दोनों वहाँ आए और जिस आत्मीयता से हम लोग सब मिले, वह इतनी रोमांचकारी है कि चित्रलिखित-सी हो गई है। आगमन के लिए आभारी हूँ.रीता भाभी को भी नमस्ते व मंगलकामनाएँ।

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  4. वैसे तो तुलसी दास जे ने भी कहा है कि भय बिना प्रीत नहीं होती.लेकिन सचाई यही है कि निर्भय बन कर ही जीवन सुख पूर्वक जिया जा सकता है.

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  5. भय की मात्रा, देश(स्थान), काल और वातावरण के हिसाब से इसका प्रभाव बदलता रहता है। व्यक्तित्व का अन्तर तो है ही।कोई फेल होने के डर से पढ़ाई छोड़ देता है तो कोई इसी डर के कारण अधिक मेहनत से पढ़ाई करता है। वर्ष २००९ में कोई ट्रेन अपनी पटरी से न उतरे, सभी यात्री व सामान अपने गन्तव्य तक सकुशल व समय से पहुँचते रहें, इसकी शुभकामनाएं।

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  6. Let me also join the bandwagon.नव वर्ष की आप और आपके परिवार को हार्दिक शुभकामनाएं कुछ समय पहले आपको चुक जाने का डर था, याद है?डरिए मत, लिखते रहिए|

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  7. ज्ञान जी मै तो दिनेश जी की बात ही दोहराऊगां, जब छोटे थे, स्कुल कालेज गये उस समय डर, मिथ्या,भगवान का डर बिठा रखा था मन मै सो डरते थे, ओर फ़िर जेसे जेसे बडे होते गये, यह सब डर दुर होते गये, ओर पता चला कि भगवान से तभी डरो जब कोई गलत काम करो, अगर कोई गलत काम नही किया तो डर केसा, वो ही बात ओफ़िस मै भी है इस लिये, अब यह डर नाम की वस्तु हम से दुर भाग गई.लेकिन डर जरुर होना चाहिये, नव वर्ष की आप और आपके परिवार को हार्दिक शुभकामनाएं !!!नया साल आप सब के जीवन मै खुब खुशियां ले कर आये,ओर पुरे विश्चव मै शातिं ले कर आये.धन्यवाद

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