टेंगर


[टेंगर, और यह कि सोंइस (मीठे जल की डॉल्फिन) रोज दिखती है यहां।]
लल्लन, बायें और राकेश खड़ा हुआ, दायें।
लल्लन, बायें और राकेश खड़ा हुआ, दायें।

एक नाव पर वे दो थे – बाद में पता चला नाम था लल्लन और राकेश। लल्लन के हाथ में पतवार थी और राकेश जाल डाल रहा था गंगा नदी में।

हम – मैं और मेरी पत्नीजी – गंगा किनारे खड़े देख रहे थे उनकी गतिविधियां। उनकी नाव कभी बीच धारा में चली जाती और कभी किनारे आने लगती। इस पार पानी काफी उथला था, सो पूरी तरह किनारे पर नहीं आती थी। नाव के कुछ चित्र भी लिये मैने। एक बार जब किनारे से लगभग बीत पच्चीस गज की दूरी पर होगी, मैने उनसे बात करने की गर्ज से चिल्ला कर कहा – कितनी मिल रही हैं मछलियां?

उनमें से जवान, जो मछलियां पकड़ रहा था, ने कहा – मिल रही हैं। फिर बातचीत होने लगी। वे सवेरे आठ बजे से यह काम कर रहे थे और दोपहर दो बजे तक करेंगे। लगभग तीन किलो भर मिल जायेंगी मछलियां उन्हे।

मैने पूछा हमे उस पार तक नाव में ले चलोगे? सहर्ष वे तैयार हो गये। लगभग आधा पौना घण्टा हम नाव पर रहेंगे। सौ रुपये में। वे नाव किनारे ले आये। हम दोनों नाव में सवार हो गये। कुछ ही पल में नाव धारा में थी।

पतवार चलाता लल्लन।
पतवार चलाता लल्लन।

लल्लन अधेड़ था। नाव की पतवार चला रहा था। आस पास उपलब्ध सामग्री से लगता था खैनी भी खा रहा था। बहुत कम बोलने वाला। बड़ी मुश्किल से नाम बताया अपना। उसको यह भी अच्छा नहीं लग रहा था कि नाव में हम अपनी चप्पलें पहने बैठ गये थे और उससे कुछ कीचड़ लग गयी थी। हमने अपनी चप्पलें उतार दीं। मैने चप्पल उल्टी कर रख दी, जिससे उसका कीचड़ वाला पेंदा सूख जाये। … लल्लन का पतवार चलाना बहुत सहज और प्रयास हीन था। चूंकि वह बहुत बोल नहीं रहा था, इस लिये मैने प्रशंसा नहीं की। अन्यथा बात चलाने के लिये कहता – आप नाव बहुत दक्षता से खे रहे हैं।

हमारे प्रश्नों के उत्तर राकेश ने दिये। पच्चीस-तीस की उम्र का सांवला नौजवान। वह समझ गया कि हममें नदी, मछली पकड़ने और उन लोगों की जिन्दगी के बारे में कौतूहल है। अत: उसके उत्तर विस्तृत थे और अपनी ओर से भी जानकारी हमें देने का प्रयास किया राकेश ने।

डांड हाथ में लिये राकेश।
डांड हाथ में लिये राकेश।

वे साल में हर मौसम में, हर दिन मछली पकड़ने का काम करते हैं। गंगा नदी उन्हे हर दिन मछलियां देती हैं। मैने जोर दे कर पूछा कि वर्षा के महीनों में भी पकड़ते हैं? राकेश ने बताया – हां।

मेरे मन में था कि मछलियों के प्रजनन का कोई समय होता होगा और उन महीनों में शायद मछेरे छोड़ देते हों मछलियां पकड़ना। पर राकेश की बात से लगा कि ऐसा कुछ भी न था। उसने बताया कि रोज तीन चार किलो मछली पकड़ लेते हैं वे और अस्सी से सौ रुपये किलो तक बिक जाती है। मछली पकड़ने के अलावा वे सब्जियां बोने का भी काम करते हैं कछार में। पर मुझे लगा कि शायद राकेश के परिवार के अन्य लोग सब्जियां बोते हों, वह मछली पकड़ने के काम में ही रहता है।

यहीं घर है? पूछने पर राकेश ने बताया कि वह रसूलाबाद का है और इसी क्षेत्र में मछली पकड़ता है। मैने जानना चाहा कि कभी नाव पर चलना हो तो उससे सम्पर्क करने के लिये कोई फोन है? इस पर राकेश ने कहा कि उसके पास तो नहीं है। घर में है जिसे उसकी बहन लोग इस्तेमाल करते हैं। नम्बर उसे नहीं मालुम था, सो बता नहीं पाया। यही कहा कि हम यहीं रहते हैं, जब चाहेंगे मिल जायेंगे!

उसने मुझे जाल नदी में डाल कर दिखाया – लगभग पचास मीटर लम्बा। वह डाल रहा था कि एक मछली फंस कर पानी के बाहर उछली। आप फोटो लीजिये – राकेश बोला। एक बार उछलने को कैमरे में नहीं समेटा जा सकता था। एक मछली और फंसी। लगभग आठ दस मिनट में जब वापस जाल उसने समेटा तो दो मछलियां जाल में थीं। एक लगभग एक फुट की थी और दूसरी उससे थोड़ी बड़ी।

यह टेंगर है। और पहले जो मैने पकड़ रखी है, वो चेल्हा हैं। दोनो टेंगर नाव पर पड़ी तड़फ रहीं थीं। इस समय हमें नदी की मछेरा-गाथा जानने का कौतूहल जकड़े था, सो मछलियों के प्रति करुणा का भाव हम पर हावी न हो पाया। मैं निस्पृह भाव से टेंगर का मुंह खोलना, बन्द करना और उसके शरीर का ऐंठना देखता रहा।

टेंगर
टेंगर

इस तरफ कभी सोंइस दिखीं?

हां बहुत दिखती हैं। राकेश का यह बताना हमारे लिये बड़ी जानकारी थी। मैने पूछा, कितनी बार दिखी? महीने में दिख जाती है? कहां दिखी?

यहीं आसपास दिखती है। पैंतीस चालीस किलो की। लगभग रोज ही दिख जाती है।

मुझे लगा कि कहीं गलत न समझ रहा हो, पर जो भी विवरण उसने दिया, वह सोंइस (मीठे पानी की डॉल्फिन) का ही था। सोंइस विलुप्तप्राय जीव है। उसका शिकार नहीं होना चाहिये। राकेश के कहने से लगा भी नहीं कि वह कभी सोंइस पकड़ता हो। पर मैने साफ साफ तहकीकात भी नहीं की। अगली बार मिला तो पूछूंगा कि कोई सोंइस पकड़ता तो नहीं है।

खैर, सौ रुपये में गंगा जी का नौका भ्रमण और यह जानकारी की सोंइस है, और प्राय रोज दिखती है, बड़ी उपलब्धि थी।

किनारे से लगता था कि गंगाजी का पानी कम हो रहा है। पर जब उनकी चौड़ाई पार की तो अहसास हुआ कि गंगाजी पानी के मटमैला होने और बीच बीच में कहीं कहीं उथली हो जाने के बावजूद एक बड़ी नदी हैं। इतनी बड़ीं कि सुन्दर भी हो, गहराई का भय भी हो और श्रद्धा भी। राकेश जब जाल नहीं डाल रहा था, तब डांड चला रहा था। उसकी डांड़ के डूबने से अन्दाज लगता था गंगाजी की गहराई का। एक दो जगह वे पर्याप्त गहरी थीं। एक जगह इतनी उथली थीं कि एक मछेरा पैदल चलते जाल डाल रहा था।

कई अन्य मछेरे भी जाल डाल रहे थे। राकेश से पूछने पर कि आपस में कोई झगड़ा नहीं होता जाल डालने को ले कर; वह हंसा। हंसी से लगा कि यहां नदी सब को पर्याप्त दे रही हैं – हर मछेरे को पर्याप्त मछली है और हर मछली को पर्याप्त भोजन।

गंगा नदी को आदमी अपने कुकर्मों से भले ही मार रहा हो, वे अभी भी सब को मुक्त भाव से जीविका लुटा रही हैं।

एक छोटी सी नाव, जो इस समय लगभग पंद्रह हजार में बन जाती है (राकेश नें बताया कि साखू की लकड़ी की तो मंहगी होगी – तीस हजार की; पर सफेदा या आम की लकड़ी की पंद्रह हजार में बन जाती है और पांच साल अच्छे से चलती है) और एक जाल की बदौलत साल के बारहों महीने की आजीविका बेरोक टोक! और कहां मिलेगी?!

हमें किनारे उतारा राकेश ने। मैने उससे हाथ मिलाया और एक बार फिर उसकी नाव का चित्र लिया कैमरे में। एक बार फिर नाव पर पड़ी टेंगर तड़फी-उछली!

कुछ ही समय की मेहमान टेंगर। तुम्हारी आत्मा को शान्ति मिले टेंगर। भगवान अगला जन्म किसी बेहतर योनि में दें तुम्हें और गंगाजी का सानिध्य किसी और प्रकार से मिले तुम्हे।

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बिठूर


बिठूर (ब्रह्मावर्त) का गंगा घाट।

बिठूर के घाट के दूसरी तरफ गंगा जी के किनारे महर्षि वाल्मीकि रहते थे। जहां राम ने सीता जी को वनवास दिया था और जहां लव-कुश का जन्म हुआ। यहीं पर ब्रह्मा जी का घाट है, जहां मिथक है कि ब्रह्माजी की खड़ाऊं रखी है। तीर्थ यात्री गंगाजी में स्नान कर ब्रह्मा जी का पूजन करते हैं।

रात गुजारने के ध्येय से आये ग्रामीण हमें बिठूर के घाटों पर भी मिले। उनमें से एक जो कुछ पढ़ा लिखा था, मुझे बताने लगा कि सर यहीं उस पार के पांच कोस दूर के गांव से आये हैं हम। रात यहीं रुकेंगे। कल कार्तिक पूर्णिमा का मेला है; उसे देख कर वापस चले जायेंगे। उसको शायद यह लगा हो कि हम सरकारी आदमी हैं और सरकार की तरह उनकी जमात के यहां रुकने पर फच्चर फंसा सकते हैं। खैर, जैसा आप भी जानते हैं, हम उस छाप के सरकारी आदमी नहीं हैं।

बिठूर के घाट पर गंगाजी में पर्याप्त पानी था। लोगों को घुमाने के लिये नावें थीं वहां और केवट हमें आवाज भी लगा रहे थे कि अगर हम चाहें तो वे घुमा कर्र ला सकते हैं। सांझ का समय था। कुछ पहले वहां पंहुचे होते तो नाव में घूमने का मन भी बनाते। पर हम धुंधलके से पहले जितना सम्भव हो, देखना चाहते थे।

चपटी कम चौड़ी ईट की इमारतें बता रही थीं कि इस जगह का इतिहास है। इमारतों के जीर्णोद्धार के नाम पर पैबन्द के रूप में नयी मोटी वाली ईटें लगा दी गयी थीं, जो बताती हैं कि आर्कियालाजिकल विभाग अपने काम में कितनी गम्भीरता रखता है।

पुरानी, कम चौड़ी ईंटों पर नई, चौड़ी ईंटों का पैबन्द।

बिठूर में आर्कियालाजिकल सर्वे आफ इण्डिया के बैंचें लगी थीं, जिनपर कोई बैठा नहीं था। लोग फर्श पर अपनी दरियां बिछा रहे थे, पर आप ध्यान से देखें तो उन बैंचों पर इतिहास पसरा कराह रहा था। बिठूर की अपनी विरासत भारत सहेज क्यों नहीं सकता?! वहां घाट, मन्दिर और पुरानी इमारतों के बीचों बीच अव्यवस्था भी पर्याप्त थी। दो मंदिरों के बीच की जगह में कहीं कहीं पेशाब की दुर्गन्ध भी परेशान करने वाली थी।

फिर भी अनेक कस्बों में जो पुराने स्मारकों की विकट दशा-दुर्दशा देखी-पायी है मैने, उससे कम थी बिठूर में। कई जगह सफाई पूरी बेशर्मी से विद्यमान थी। कुछ चीजें – सफेद-गेरुआ-पीले जनेऊ बेचते दुकानदार जो जमीन पर या तख्तों पर बैठे थे; पर्यटकों के लिये उपलब्ध नावों की सुविधा, जजमानी करता घाट का पण्डा और नदी में दीप बहाता श्रद्धालु; उस पार का प्री-पूर्णिमा का चांद और बारदरी में अड्डा जमाने की जुगत में कल होने वाले मेले के मेलहरू – एक पावरफुल एथेनिक अनुभव था।

इसलिये, फिर भी, अच्छा लगा बीस-पच्चीस हजार लोगों की जन संख्या वाले इस कस्बे को देख कर। इसके घाट, मन्दिर, गलियां, दुकानें और इमारतें, सभी मानो समय की रेत को मुठ्ठियों में भींच कर पकड़े थे और समय उनसे बहुत धीरे धीरे छन रहा था। आपाधापी के युग में जहां समय धीरे धीरे छनता हो, वे जगहें बहुत कीमती होती हैं। बिठूर भी वैसी ही एक जगह है।

यहां एक मीटर गेज का स्टेशन है – ब्रह्मावर्त। जहां छ सात साल पहले तक ट्रेन चला करती थी – जब कानपुर – फर्रुखाबाद – कासगंज – मथुरा लाइन मीटर गेज की थी और आमान परिवर्तन नहीं हुआ था। तब सम्भवत: रेल-कार चला करती थी मन्धाना से बह्मावर्त के बीच। मन्धाना लानपुर – फर्रुखाबाद लाइन के बड़ी लाइन परिवर्तन के बाद बड़ी लाइन के नक्शे पर आ गया और ब्रह्मावर्त नक्शे से गायब हो गया। मैं अपने साथी श्री एखलाक अहमद के साथ पैदल इस परित्यक्त स्टेशन तक गया और उसके सांझ के धुंधलके में चित्र लिये। कुछ लोग वहां यूं ही बैठे थे और कुछ अन्य वहां रात गुजारने के ध्येय से अपनी दरियां बिछा रहे थे।

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फुटप्लेट


लॉंग हुड में डीज़ल रेल इंजन से दिखता आगे का सीन।

रेलवे इंजन पर चढ़ कर चलते हुये निरीक्षण का नाम है फुट प्लेट निरीक्षण। शब्द शायद स्टीम इंजन के जमाने का है, जिसमें फुटप्लेट पर खड़े हो कर निरीक्षण किया जाता था। अब तो डीजल और इलेक्ट्रिक इंजनों में बैठने के लिये सुविधाजनक सीटें होती हैं और खड़े हो कर भी निरीक्षण करना हो तो धूल-धुआं-कोयला परेशान नहीं करता।

इंजन की लगभग लगातार बजने वाली सीटी और तेज गति से स्टेशनों को पार करते समय कांटों पर से गुजरते हुये खटर खटर की आवाज जरूर किसी भी बात करने की कोशिश को चिल्लाहट बनाये बिना सम्पन्न नहीं की जा सकती। इसके अलावा अगर पास की पटरी पर ट्रेन खड़ी हो, या विपरीत दिशा में गुजर रही हो तो तेज सांय सांय की आवाज अप्रिय लग सकती है। फुटप्लेट करते समय अधिकांशत: मौन रह कर देखना ज्यादा कामगर करता है। वही मैने किया।

खलिहान में पुआल इकठ्ठा हो गया था।

मैने ट्रेन इंजन में इलाहाबाद से खागा तक की यात्रा की।

रेलवे के निरीक्षण के अलावा देखा –  धान खेतों से जा चुका था। कुछ में सरसों के पीले फूल भी आ गये थे। कई खेतों में गन्ना दिखा। कुछ में मक्का और जोन्हरी के भुट्टे लगे थे। पुआल के गठ्ठर जरूर खलिहान में पड़े दिखे। कहीं कहीं गाय गोरू और धूप में सूखते उपले थे। एक दो जगह ट्रैक के किनारे सूअर चराते पासी दिखे। सूअर पालना/चराना एक व्यवसाय की तरह पनप रहा है। पासी आधुनिक युग के गड़रिये हैं। कानपुर से पार्सल वान लद कर गुवाहाटी के लिये जाते हैं सूअरों के। पूर्वोत्तर में काफी मांग है सूअरों की। लगता है वहां सूअरों को पालने के लिये पर्याप्त गंदगी नहीं है। या जो भी कारण हो।

सरसों में फूल आ गये हैं।

सवेरे छोटे स्टेशनों पर बहुत से यात्री दिखे जो आस पास के कस्बे-शहरों में काम करने के लिये आने जाने वाले थे। इसके अलावा साधू-सन्यासी-बहुरूपिये जो जाने क्यों इतनी यात्रा करते हैं रेल से – भी थे। वे शायद स्टेशनों पर रहते हैं और फ्री-फण्ड में यात्रा करते हैं। पूरा रेलवे उनके लिये एक विहार की तरह है जो किसी मठ की बन्दिशें भी नहीं लगाता। बस, शायद भोजन के लिये उन्हे कुछ उपक्रम करना होता होगा। अन्यथा सब सुविधायें स्टेशनों पर निशुल्क हैं।

खागा स्टेशन पर घुमन्तू साधू लोग।

लगभग डेढ़ घण्टा मैने इंजन पर यात्रा की। असिस्टेण्ट पाइलट साहब की कुर्सी पर बैठ कर। बेचारे असिस्टेण्ट साहब मेरे पीछे खड़े हो कर अपना काम कर रहे थे। जब भी किसी स्टेशन पर उतर कर उन्हे इंजन चेक करना होता था तो मैं खड़ा हो कर उन्हे निकलने का रास्ता देता था। एक स्टेशन पर जब यह प्रस्ताव हुआ कि मैसेज दे कर आने वाले बड़े स्टेशन पर चाय मंगवा ली जाये तो मैने अपना निरीक्षण समाप्त करने का निर्णय किया। सार्वजनिक रूप से खड़े चम्मच की चाय (वह चाय जिसमें भरपूर चीनी पड़ी होती है, बिसाइड्स अदरक के) पीने का मन नहीं था।

इंजन से उतरते समय लोको पाइलट साहब ने एक अनूठा अनुरोध किया – वे मालगाड़ी के चालक हैं जो लम्बे अर्से से पैसेंजर गाड़ी पर ऑफीशियेट कर रहे हैं। इस खण्ड पर ले दे कर एक ही सवारी गाड़ी चलती है। अत: प्रोमोशन होने पर उनका ट्रांसफर हो जायेगा। तब बच्चों की पढ़ाई-लिखाई को ध्यान में रख कर उन्हे प्रोमोशन रिफ्यूज करना पड़ेगा। अगर मैं एक अतिरिक्त सवारी गाड़ी इस खण्ड में चलवा दूं तो उनका और उनके जैसे अनेक लोको पाइलट का भला हो जायेगा।

सवारी गाड़ियां चलाने के लिये जनता, एमपी, एमएलए, बिजनेस एसोशियेशन्स आदि से अनुरोध आते रहते हैं। कभी कभी रेलवे स्टाफ भी छोटे स्टेशनों पर आने जाने के लिये मांग करता है। पर प्रोमोशन एक ही जगह पर मिल जाये – इस ध्येय के लिये मांग पहली बार सुनी मैने। यह लगा कि नयी जेनरेशन के कर्मियों के आने पर इस तरह की मांग शायद भविष्य में उठा करेगी।

अच्छा लगा फुटप्लेट निरीक्षण? शायद हां। शायद एक रुटीन था। जो पूरा कर लिया।

खागा स्टेशन पर भजिया बेचता एक हॉकर।

झुलाओ मेरी सजनी, श्याम पड़े पलना


झुलाओ मेरी सजनी, श्याम पड़े पलना। गंगाजी के तट पर स्त्रियों का कृष्ण जी को जगाने का अनुष्ठान।

अक्तूबर ३०’२०१२: 

दो स्त्रियां यह गीत गाते हुये एक अंगोछे में कुछ (बाल कृष्ण का प्रतीक) झुला रही थीं गंगा किनारे। कोहरा बहुत था। इक्का दुक्का लोग थे स्नान करने वाले गंगा जी के शिवकुटी घाट पर। उनका यह झुलाना और गायन बहुत अच्छा लगा मुझे। पर यह समझ नहीं आया कि ऐसा कर क्यों रही थीं वे।

सवेरे की सैर से वापस लौट रहा था तो वही स्त्रियां पण्डाजी के पास संकल्प करती मिल गयीं। उन्होने जब अपना अनुष्ठान पूरा कर लिया तब मैने अपने कैमरे में उनका वीडियो दिखाते हुये उनसे पूछा – आप लोग यह क्या कर रही थीं?

अच्छा, आपको इतना पसन्द आया कि आपने फोटो ले लिया!! हम कातिक (कार्तिक) माह में कृष्ण जी को जगा रही थीं।

स्नान और कृष्ण जी को “झुलाने” के बाद संकल्प कर दान करती स्त्रियां।

पण्डाजी ने इण्टरजेक्ट किया – आपने बलुआ घाट (जमुनाजी का इलाहाबाद में घाट) नहीं देखा? वहां जा कर देखिये। पूरे कार्तिक मास में कृष्ण जी के अनुष्ठान होते हैं। बहुत टेण्ट-तम्बू लगते हैं वहां। एकादशी के दिन कृष्ण जागते हैं। उसके बाद उनका तुलसी विवाह होता है इसी महीने में। इस साल आप चौबीस नवम्बर को वहां जाईये। देवोत्थानी एकादशी के दिन वहां मेला लगेगा। तुलसी विवाह होगा।

कार्तिक के महीने में देवता जगाये जाते हैं। देवप्रबोधिनी एकादशी (शुक्लपक्ष की एकादशी) के दिन भगवान विष्णु अपनी शेष शय्या से जागते हैं, चार मास की निद्रा के पश्चात। उनका विष्णु (या शालिग्राम या कृष्ण) के रूप में तुलसी (विष्णुप्रिया या वृन्दा) से उसी दिन एक या दो दिन बाद (अलग अलग स्थानों की अलग परम्परा है) विवाह होता है। तुलसी विवाह के साथ शुभ कर्म (विवाह आदि) प्रारम्भ हो जाते हैं। … वे महिलायें शालिग्राम या कृष्ण को जगा रही थीं! 

मेरे टैंक-वैगन नियंत्रक श्री पंकज मालवीय ने बताया कि स्त्रियां जिन्हें बच्चे की चाह होती है, यमुना जी की मिट्टी से बाल कृष्ण की प्रतिमा बना कर उसे झुलाती-सुलाती-जगाती हैं। अन्तत: यमुना में विसर्जित करती हैं। यह भी एक प्रकार की भक्ति-साधना है! 

मैने देखा – प्रसन्नमन थीं वे स्त्रियां। बाद में मालिन के पास बैठ कर कोई दूसरा गीत गा रही थीं।

कार्तिक आ गया है। जागिये कृष्ण। जागिये देवतागण!

[आप देखिये नीचे वीडियो में उन महिलाओं के गंगा किनारे गायन का एक अंश]

उसमें जिन्दा है मछली अभी भी


नवम्बर २’२०१२

वे तीन थे। एक अधेड़। तहमद पहने और उसे पानी से बचाने के लिये आधा उलटे हुये। ऊपर पूरी बांह का स्वेटर पहने। एक जवान – कमीज-पतलून में। एक किशोर होता बच्चा – वह भी कमीज पतलून पहने था। दोनो ने पतलून पानी से बचने ऊपर चढ़ा रखी थी। उनके पास एक नाव थी; जिसमें नदी से पकड़ी चेल्हुआ मछलियां रख चुके थे। जब मैं वहां पंहुचा तो वे मछलियां पकड़ने के लिये बांधी गयी चारखाने वाले कपड़े की चादर समेटने का काम कर रहे थे। मैने देखा – चारखाने का कपड़ा नया था। शायद इसी सीजन में खरीदा होगा उन्होने और मछली पकड़ने के ही काम आ रहा होगा अभी। बाद में उसकी अच्छी लुंगिंया बन सकेंगी।

उनमें से जो जवान था, वह कुछ मुखर लग रहा था। बच्चे से बोला – देख हम लोगों की फोटो खिंच रही है। पर बच्चा और अधेड़ अपने काम को खत्म करने में ज्यादा रुचि ले रहे थे। काम तो फुर्ती से यह जवान भी कर रहा था। पर मुझसे बात भी करता जा रहा था।

वे बांस या लकड़ी को गंगा की रेती से उखाड़ कर उसके सहारे ताने हुये चारखाने के कपड़े को समेट रहे थे। लड़का लकड़ियां समेट कर नाव में रखने आ-जा रहा था। बची खुची मछलियां लुचकने को आस पास कौव्वे कांव कांव करते इधर उधर फुदक रहे थे। नाव में लदे ढेर को देख कर अन्दाज लग रहा था कि अच्छी खासी संख्या में मछलियां मिली होंगी इन लोगों को।

जवान ने मुझे बताया कि कल रात आठ बजे उन लोगों ने पानी रोकने का काम किया था। रात में पानी बढ़ने के साथ साथ मछलियां भी काफी आ गयी थीं। तड़के उन्होने अपना काम समेट लिया और अब रवाना हो जायेंगे। करीब “दो करेट” मछली है नाव में। अभी जिन्दा हैं। वह इस अन्दाज में बोला कि मैं शायद उन्हे देखने की उत्सुकता जताऊं। पर नाव तक पानी में हिल कर जाना और तड़फती मछलियां देखना मुझे अप्रिय कृत्य लगा। उसकी बजाय बात करना और फोटो खींचना बेहतर काम था।

दो करेट माने कितना किलो होगी मछली? मेरे पूछने का कोई संतोषजनक जवाब न दे पाया वह। उसने अधेड़ से पूछा, पर अधेड़ के पास भी कोई अनुमान न था। उसने बस यही कहा कि मछलियां काफी हैं (अन्दाज से बताया कि बित्ता भर से ज्यादा बडी भी हैं) और यहां स्थानीय बाजार में नहीं जाने वाली – बाहर जायेंगी।

मैं अपनी जिज्ञासा को और आयाम नहीं दे सका। जिन्दा तड़फती मछली के बारे में सोचना प्रिय नहीं लगता मुझे! जाने कितनी दूर अप-स्ट्रीम में उनका बीज पड़ा होगा। कितनी लम्बी यात्रा उन्होने की होगी गंगा नदी में। आज के बाद उनका शरीर जाने कितनी यात्रा कर कहां तक पंहुचेगा और कहां वे उदरस्थ होंगी? यह सब मेरे इस ब्लॉग पोस्ट का विषय नहीं है। मुझे तो इतना ही बताया है जवान ने कि नाव पर मछलियां जिंदा हैं अभी भी!

रायगड़ा


दिनांक २८ अक्तूबर, २०१२

रायगड़ा में अळप्पुझा-धनबाद एक्स्प्रेस पंद्रह मिनट रुकती है। मैने अपना पजामा-बण्डी बदल कर साहब का भेस धरा और अपने डिब्बे से उतरा। शाम के पौने सात बजे थे। अंधेरा हो गया था। कैमरे को क्लोज़-अप मोड में रखा, जिससे चित्र फ्लैश के साथ आ सकें।

उड़िया, हिन्दी, अंग्रेजी और तेळुगू में रायगड़ा का स्टेशन बोर्ड।

आज त्रयोदशी थी। अगले दिन पूर्णमासी। इस लिये कुछ रोशनी थी चांद की प्लेटफार्म पर। अन्यथा लगता है बिजली नहीं आ रही थी और इमरजेंसी लाइट ६०% कटौती पर चल रही थी। फिर भी स्टेशन पर जितना दिखना चाहिये था, उतना दिख रहा था।

रायगड़ा स्टेशन का नामपट्ट चार भाषाओं में था – हिन्दी, अंग्रेजी, उड़िया और तेळुगू। मैने ट्रेन की गार्ड साहब (श्री के. आनन्दराव) से पूछा हम उड़ीसा में हैं या आंध्र में। उन्होने बताया कि ओडिशा कब का शुरू हो गया। वैसे वे जरूर आंध्र (विशाखापतनम) से आ रहे हैं। वहीं के निवासी हैं (पास के गांव के)। उनकी ड्यूटी टीटलागढ़ तक है।

(अगर मैं पाजामा-बण्डी में ही रहता और गार्ड साहब से बात करता तो मुझे या तो उनकी उपेक्षा मिलती या अपने सहकर्मी निरीक्षक महोदय का सहारा लेना पड़ता अपना परिचय देने में! :lol:)

इसके पहले बोबिल्ली जंक्शन का नामपट्ट हिन्दी, अंग्रेजी और तेळुगू में था। आगे थरबानी (?) का नामपट्ट हिन्दी, अंग्रेजी और उड़िया में पाया मैने। रायगड़ा चार भाषाओं का नामपट्ट वाला था। चार भाषाओं के पट्ट वाले स्टेशन कम ही होंगे।

इडली दोसा बेचता हॉकर।

प्लेटफार्म पर इडली-वड़ा-पूरी-सब्जी-छोले मिल रहे थे। दक्षिण का उत्तर से घालमेल प्रारम्भ हो गया था। स्वाद जानने को हमने वड़ा खरीदा। कॉफी छोटेलाल ने बनाई। वड़ा था तो वड़ा, पर कुछ कुछ स्वाद नमकीन अनरसा का दे रहा था। साइज भी छोटा था  और सामान्य से अधिक चपटा। यानी वड़ा उत्तरभारतीय छोटा बन गया था। अब आगे रेलवे स्टेशन पर दक्षिणभारतीय व्यंजन लेने का आनन्द नहीं रहेगा!

रायगड़ा प्लेटफार्म पर भोजन बनाते यात्री।

रायगड़ा में चालक बदलने के लिये एक बड़ी क्र्यू-बुकिंग लॉबी है। एक ओर मुझे पे एण्ड यूज शौचालय भी नजर आया। साफ सुथरा लग रहा था। प्लेटफार्म के एक अंत पर कुछ लोग आग जला कर भोजन बना रहे थे। सामान भी था उनके साथ – यात्री होंगे; कोई बाद की गाड़ी पकड़ने वाले। अगर इस तरह भोजन बनाना आ जाये और यात्रा के खर्च इस स्तर पर आ जायें तो भारत को बहुत भले से समझा जा सकता है। उसके लिये किसी युवराज को किसी दलित के घर सयास  रुकने की जरूरत न पड़े!

एक जगह एक स्त्री ताड़ के पत्तों की झाड़ू लिये बैठी थी। शायद कोई गाड़ी पकड़ कर जायेगी झाड़ू बेचने। उसे मेरा चित्र लेना शायद जमा नहीं, मुंह फेर लिया उसने।

झाड़ू लिये प्लेटफार्म पर बैठी महिला।

एक जगह प्लेटफार्म पर एक महिला बैठी थी। उसका पति उसकी गोद में सिर रख कर सो रहा था। एक अन्य व्यक्ति तेळुगू में उससे जोर जोर से हाथ हिलाते हुये डांट रहा था और वह उड़िया में बराबर का जवाब दे रही थी। मुझे ये भाषायें समझ आतीं तो माजरा भी समझ आता। पर कुछ पड़ा नहीं पल्ले!

मैं, ज्ञानदत्त पांड़े, एक मंझले दर्जे का कौतूहलक और घटिया दर्जे का यात्री (जो यात्रा में किसी भी आकस्मिक परिवर्तन का स्वागत करना नहीं चाहता!); पंद्रह मिनट में एक स्टेशन/एक जगह के बारे में इससे ज्यादा नहीं जान सकता।

बाई रायगड़ा!