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दलित बस्ती में मनी रविदास जयंती


“हवन कौन कराता है? बाहर से किसी पण्डित को बुलाते हैं?”
“नहीं। बस्ती के ही जानकार पुराने लोग करा लेते हैं। पहले मेरे बब्बा जानकार थे। अब कोई बचा नहीं। अब तो लोग सिर्फ जैकारा भर लगाना जानते हैं।”

#200शब्द – कैलाश दुबे


मुझे यह लगा कि यूंही, कैलश जी के पास जाया और बैठा जा सकता है। धर्म और अर्थ को सरलता के मधु में जिस कुशलता से उन्होने साधा है, वह अभूतपूर्व है।

पहले का ग्रामीण रहन सहन और प्रसन्नता


लोग सामान्यत: कहते हैं कि पहले गरीबी थी, पैसा कम था, मेहनत ज्यादा करनी पड़ती थी, पर लोग ज्यादा सुखी थे। आपस में मेलजोल ज्यादा था। हंसी-खुशी ज्यादा थी। ईर्ष्या द्वेष कम था।

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ज्ञान दत्त पाण्डेय

मेरे बारे में

नमस्कार, मैं ज्ञान दत्त पाण्डेय, एक भारतीय रेल सेवा से रिटायर्ड रेल अफसर हूं। मैं रेलवे के विभागध्यक्ष पद से रिटायर हुआ। अब मैं पूर्वी उत्तर प्रदेश (भारत) के एक गांव में रह कर अपनी साइकिल से आसपास के ग्रामीण जीवन को देखता हूं।

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