लॉकडाउन काल में मुरब्बा पण्डित काशीनाथ का व्यवसाय #गांवकाचिठ्ठा

उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री जिस तरह प्रदेश में ही व्यवसाय निर्मित करने की बात करते हैं; उसके लिये काशीनाथ पाठक (मुरब्बा पण्डित) एक सशक्त आईकॉन जैसा है।


काशीनाथ पाठक बहुत दिनो बाद कल आये। उन्हें मेरी पत्नीजी ने फोन किया था कि कुछ अचार और आंवले के लड्डू चाहियें।

ऑर्डर मिलने पर अपनी सहूलियत देख वे अपने कपसेटी के पास गांव से मोटर साइकिल पर सामान ले कर आते हैं। सामान ज्यादा होता है तो पीछे उनका बच्चा भी बैठता है ठीक से पकड़ कर रखने के लिये। कल सामान ज्यादा नहीं था, सो अकेले ही आये थे। बताया कि हमारे यहां जल्दी ही घर से निकल लिये थे। सवेरे थोड़ा दही खाया था। अब घर जा कर स्नान करने के बाद एक ऑर्डर का सामान ले कर गाजीपुर की ओर निकलेंगे। किसी बाबू साहब ने 2-3 हजार रुपये का अचार और आंवले का लड्डू मंगाया है।

लॉकडाउन में आपके बिजनेस पर कोई असर पड़ा?

Continue reading “लॉकडाउन काल में मुरब्बा पण्डित काशीनाथ का व्यवसाय #गांवकाचिठ्ठा”

काशीनाथ पाठक का मुरब्बा व्यवसाय – पुरानी पोस्ट

मेरे सामने ठोस और सफ़ल ग्रामीण उद्यमिता का उदाहरण उपस्थित था! इण्डिया अन-इन्कार्पोरेटेड! भारत की हजारों साल की रस्टिक उद्यमिता का प्रमाण। एक बेरोजगार व्यक्ति न केवल स्वयं की आजीविका कमा रहा है, वरन गांव की कई महिलाओं को रोजगार भी दे रहा है।



यह एक तीन साल पुरानी पोस्ट है। 27 मई 2017 को फेसबुक नोट्स के रूप में लिखी ।

आज काशीनाथ पाठक पुन: आये थे। आते ही रहते हैं; पर लॉकडाउन के समय नहीं आये या नहीं बुलाये गये।

काशीनाथ पूर्वांचल के ग्रामीण जीवन की सफल उद्यमिता के प्रमाण हैं। पूर्वांचल उत्तरप्रदेश का वह हिस्सा मान सकते हैं जहां शहर में कोई व्यवसाय करना कठिन है; गांव की कौन बिसात। पर काशीनाथ ने वह कर दिखाया है जो सबसे अनूठा है।

आज आने पर लॉकडाउन के दौरान चले अपने व्यवसाय के बारे में उन्होने बताया। उसका विवरण लिखने के लिये जरूरी है कि काशीनाथ का पुराना जुड़ाव आपको पता चले। इस लिये फेसबुक नोट्स से निकाल कर पुरानी पोस्ट पुन: प्रस्तुत है –


मई 27, 2017, विक्रमपुर, भदोही।

गुन्नीलाल पांडेय पानी पिलाने के साथ ऑफर करते हैं आंवले का लड्डू। या आंवले का मुरब्बा। बताते हैं कि एक सज्जन हैं कपसेटी के आगे के एक गांव से। वे अपनी मोटर साइकिल पर ले कर आते हैं ये उत्पाद।

काशीनाथ पाठक

उस दिन मैं अपनी पत्नीजी के साथ गुन्नीलाल जी के घर गया था शाम को तब ये सज्जन आये। नाम बताया – काशीनाथ पाठक। बताया कि एक शादी में जाना था पास के गांव में तो उस निमित्त आना था और साथ में अपने उत्पाद भी लेते आये। आंवले का लड्डू, मुरब्बा, करौंदे का मुरब्बा। इसके अलावा कई अन्य उत्पाद वे लाते हैं – आंवले का अचार, कैण्डी, बेल और आम के कई आईटम।

कहां से लाते हैं? प्रतापगढ़ से?

“नहीं। मेरे अपने घर में बनते हैं। घर और गांव की कई स्त्रियां इस काम में लगती हैं। … असल में पढ़ाई करने के बाद जब कोई आजीविका नहीं मिली तो मैने फूड प्रॉसेसिंग की ट्रेनिंग ली। उसके बाद अपने घर पर उत्पादन शुरू किया। दुकानदारों तक जब इस उत्पाद को पंहुचाया तो पता चला कि दुकानदार अपना बड़ा कमीशन मांगते हैं। मैने दुकानदारों का लिंक ही खत्म कर दिया। अपने ग्राहकों तक खुद ही उत्पाद पंहुचाता हूं। ग्राहकों को सस्ता मिलता है और मुझे उनसे सीधा संपर्क करने का मौका भी। मेहनत है, पर इस सब काम से मैं उतना कमा लेता हूं, जितना नौकरी कर कमाता।”

मेरे सामने ठोस और सफ़ल ग्रामीण उद्यमिता का उदाहरण उपस्थित था! इण्डिया अन-इन्कार्पोरेटेड! भारत की हजारों साल की रस्टिक उद्यमिता का प्रमाण। एक बेरोजगार व्यक्ति न केवल स्वयं की आजीविका कमा रहा है, वरन गांव की कई महिलाओं को रोजगार भी दे रहा है। कोई कार्पोरेट बैकिंग, कोई बैंक फिनांसिंग, कोई ब्राण्डिंग, कोई ऑर्गेनाइज्ड मार्केट सर्वे, कोई सम्पन्न कस्टमर बेस नहीं। पूर्वी उत्तर प्रदेश (बीमारू प्रान्त के बीमारुतम हिस्से) की उद्यमिता! जय हो!

आंवला कहां से लेते हैं?

“आंवला तो एक ठाकुर साहब के बगीचे से लेता हूं। कुल 35 पेड़ हैं उनके पास आंवला के। करौंदा, बेल आदि तो आसपास की जगहों से तलाशता-लेता हूं।”

“मुझे असली सफलता की खुशी किसी को अपना उत्पाद बेच कर नहीं होती। असली सफ़लता तब महसूस होती है, जब वे दूसरी बार मुझे बुलाते हैं मेरे उत्पादों को खरीदने के लिये।”

काशी नाथ पाठक का मोबाइल नम्बर मैने लिया। लगभग 500 रुपये का उनका उत्पाद खरीदा। खा कर देखा – वास्तव में उत्तम क्वालिटी का।

यह तय है कि काशीनाथ पाठक को मैं दूसरी बार आने के लिये कहने जा रहा हूं। और बहुत जल्दी। उनका आंवले का लड्डू और करौंदे का मुरब्बा लाजवाब है। पैकेजिंग बहुत साधारण है – कोई ब्राण्ड नहीं। पर उत्पाद की गुणवत्ता आपको बांधती है।


काशीनाथ पाठक 2017 साल से अब तक बराबर आते रहे हैं हमारे घर। उनके उत्पाद हमारे घर में और जान पहचान वालों में बहुत से लोगों द्वारा पसंद किये जाते हैं। लॉकडाउन के दौरान कैसे चला उनका व्यवसाय और क्या रहे उनके अनुभव, उसपर आज शाम को ब्लॉग पर लिखूंगा।


प्राकृतिक संसाधनों की नोच खसोट गांव का चरित्र बनता जा रहा है #गांवकाचिठ्ठा

शहरों का जो स्वरूप है, सो है। गांवदेहात में पैसा कम है, प्रकृति प्रचुर है। तो प्रकृति को ही बेच कर पैसा बनाने की कवायद (जोरशोर से) हो रही है।



गांव में रहते हुये मेरे भ्रमण का दायरा उतना ही है, जितनी दूर मेरी साइकिल मुझे ले जाये। लगभग 30वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र। नेशनल हाईवे के उत्तर की ओर तो घनी आबादी है। दक्षिण में गंगा के आसपास की दो किलोमीटर की पट्टी में जमीन समतल नहीं है। कहीं सेवार है – जो पहले गंगा की डूब में आ जाता रहा होगा। कहीं करार। मिट्टी भी कहीं उपजाऊ है, कहीं कंकरीली। ज्यादातर लोगों को मोटा अनाज और अरहर बोते देखा है। जहां समतल है और जमीन अच्छी है, वहां धान और गेंहू भी बोते हैं।

गंगा किनारे ज्यादातर बबूल के वृक्ष हैं। वनस्पति के नाम पर झाड़ियां, सरपत और कुशा, भटकैय्या, वन तुलसी आदि हैं।

गंगा उस पार बालू है। समतल इलाका और बालू से भरा क्षेत्र – नदी से दो-तीन किलोमीटर तक फैला।

आबादी का घनत्व इस गांगेय क्षेत्र में अपेक्षाकृत कम है। आबादी का घनत्व कम है तो प्रकृति ज्यादा है।

बबूल का काटा हुआ पेड़। सैकड़ों कटे पेड़ दिखते हैं।
Continue reading “प्राकृतिक संसाधनों की नोच खसोट गांव का चरित्र बनता जा रहा है #गांवकाचिठ्ठा”

गोविंद पटेल ने लॉकडाउन में सीखा मछली पकड़ना #गांवकाचिठ्ठा

लॉकडाउन काल में, जब लोग आजीविका के व्यवधान के कारण दाल और तरकारी के मद में जबरदस्त कटौती कर रहे हैं; तब रोज चार घण्टा गंगा किनारे 2-4 किलो मछली पकड़ लेना बहुत सही स्ट्रेटेजी है लॉकडाउन की कठिनाई से पार पाने की।


कोलाहलपुर तारी और द्वारिकापुर – दोनो गांवों में गंगा घाट हैं। दोनो घाटों के बीच सवा-डेढ़ किलोमीटर की दूरी होगी। गंगा कोलाहलपुर से द्वारिकापुर की ओर बहती हैं। इन दोनो घाटों के बीच दिखते हैं मछली मारने के लिये कंटिया फंसाये साधनारत लोग।

गोविंद पटेल

मुझे गोविंद पटेल मिले। उन्हें पहले से नहीं जानता था। बातचीत में उन्होने बताया कि बाबूसराय (चार किलोमीटर दूर) के हैं वे और मुझे आसपास घूमते देखा है। उनसे जब मैं मिला तो पौने छ बजे थे। गंगा करार पर मेरी साइकिल ने चलने से इंकार कर दिया था और लगभग आधा किलोमीटर बटोही (साइकिल का नाम) को धकेलता, पसीने से तर, मैं वहां पंहुचा था। गोविंद पटेल अपनी मोटर साइकिल पर अपने साथी के साथ पांच बजे आ कर डटे थे मछली साधना में। एक लाल रंग के लम्बे झोले में कुछ मछलियां थीं, जो उन्होने पकड़ी थीं। झोले का मुंह एक पत्थर से दबाया हुआ था और सारा हिस्सा पानी में था। पकड़ी मछलियों को पानी मिल रहा था। वे कैद में थीं पर जिंदा थीं।

Continue reading “गोविंद पटेल ने लॉकडाउन में सीखा मछली पकड़ना #गांवकाचिठ्ठा”

मनरेगा @ लॉकडाउन #गांवकाचिठ्ठा

जब आप गरीबी देखें; उसकी परतें खोलने की कोशिश करें, तो जी घबराने लगता है। दशा इतनी ह्यूमंगस लगती है, इतनी विकराल कि आप को लगता है आप कुछ कर ही नहीं सकते।



मेरे किराने की सप्लाई करने वाले रविशंकर कहते हैं – सर जी, आप लोगों को मदद बांट नहीं पायेंगे। भीड़ लग जायेगी। गरीबी बहुत है इस इलाके में सर जी। थक जायेंगे आप।

रविशंकर ने जो कहा, वह महसूस हो रहा है।

आप साइकिल ले कर सवेरे फोटो क्लिक करते घूम आइये। गंगा किनारे जल की निर्मलता निहार लीजिये। घर आ कर लैपटॉप पर चित्र संजो लीजिये। कुछ ट्विटर पर, कुछ फेसबुक पर, कुछ वर्डप्रेस ब्लॉग पर डाल कर छुट्टी पाइये और पत्नीजी से पूछिये – आज ब्रेकफास्ट में क्या बना है? उसमें सब बढ़िया लगता है। रिटायरमेण्ट का आनंद आता है।

पर जब आप गरीबी देखें; उसकी परतें खोलने की कोशिश करें, तो जी घबराने लगता है। दशा इतनी ह्यूमंगस लगती है, इतनी विकराल कि आप को लगता है आप कुछ कर ही नहीं सकते। या जो कुछ करेंगे वह ऊंट के मुंंह में जीरा भी नहीं होगा।

Continue reading “मनरेगा @ लॉकडाउन #गांवकाचिठ्ठा”

स्वैच्छिक लॉकडाउन या अपने पर ओढ़ा एकांतवास #गांवकाचिठ्ठा

पछुआ हवा है। लू बह रही है। वे भविष्यवक्ता जो कह रहे थे कि तापक्रम बढ़ते ही कोरोनावायरस अपने आप खतम हो जायेगा, अपनी खीस निपोर रहे हैं। ज्योतिषी लोग अपने अपने गोलपोस्ट बदल रहे हैं।


मई 25, 2020, विक्रमपुर, भदोही।

मेरी प्रवृत्ति के विपरीत है यह।

चलते चलते अचानक रुक जाना और सड़क के किनारे चाक चलाते कुम्हार का चित्र लेना, या अचानक साइकिल का हैण्डल पतली सी पगडण्डी से गंगा किनारे जाने की ओर मोड़ देना, कभी साइकिल सड़क पर खड़ी कर पतली सी मेड़ पर अपने को बैलेन्स करते चलना और दूर किसी धोख का विभिन्न कोणों से चित्र लेना – ये सब मेरे वे कृत्य हैं, जो मुझे मेरी नजर में “अपने को विशिष्ट” बनाते हैं। किसी भी दुकान पर आवश्यक/अनावश्यक चीज की तहकीकात करना और मन होने पर खरीद लेना, उसी औरों से अलग होने की अनुभूति को पुष्ट करना ही है। कभी कभी लगता है कि मैं शहर के अपने कम्फर्ट-जोन को तिलांजलि दे कर गांव में इसलिये हूं कि उस वैशिष्ट्य को निरंतर भोगना चाहता हूं। मैं अगर धनी होता, सम्पन्न होता तो उस वैशिष्ट्य की प्राप्ति के अलग औजार होते। अब जो हैं, सो हैं।

मेरी प्रवृत्ति के विपरीत है दिन में तेईस घण्टे स्वैच्छिक लॉकडाउन या एकांतवास में रहना। ऐसा नहीं है, कि मुझे भीड़ में होना प्रिय है। एकांतवास मैं चाहता हूं। पर वह जनअरण्य से दूर, अलग घूमने, देखने और सोचने का एकांतवास है। जब मैं कोविड19 संक्रमण के कारण, 23 घण्टे घर के चारदीवारी में बंद रहने का निर्णय करता हूं, तो उसमें (बावजूद इसके कि स्वयम को अंतर्मुखी घोषित करता हूं)  बहुत कुछ त्यागने का भाव है।

आज सवेरे 5 से 6 के काल की बहुत प्रतीक्षा थी। कल शाम को ही साइकिल की हवा चेक कर ली थी, कि कहीं सवेरे ऐन मौके पर हवा भरने के पम्प को खोजना-चलाना न पड़े। अपनी दाढ़ी का भी शाम को ही मुआयना कर लिया था कि कहीं सवेरे इतनी बढ़ी हुई न हो कि बाहर निकलने के पहले दाढ़ी बनाने की जरूरत महसूस हो, और वह बनाने में दस मिनट लग जायें।

भोर का समय, निपटान के लिये खेत जाने का समय।
औरतें निपटान के लिये जाती, या निपटान कर आती हुईं।

पांच बजे निकलना था, पर मैं चार पचास पर ही निकल लिया। अन्धेरा छंटा नहीं था, पर इतना भी नहीं था कि सड़क न दिखे। इक्का दुक्का लोग थे। आसपास के खेतों में धब्बे की तरह लोग दिखे निपटान करते। फसल नहीं थी, खेत खाली हैं, तो निपटान करते लोग दिखते हैं। स्त्रियाँ भी थीं। स्पष्ट है कि हर घर में शौचालय बन गये हैं, सरकारी खर्चे पर; पर लोग उनका प्रयोग उतना नहीं कर रहे, जितना होना चाहिये। उनके प्रयोग के लिये पर्याप्त पानी की आवश्यकता है। उनको साफ रखने के लिये कुछ न कुछ खर्चा जरूरी है। पर जब पानी हैण्डपम्प या ट्यूब वेल से 20-25 मीटर ढोया जाता है, तो शौचालय साफ करने के लिये पानी श्रम लगा कर ढोना जरूरी नहीं लगता। लिहाजा, शौचालय मॉन्यूमेण्ट हैं और लोग-लुगाई खेत या सड़क/रेल की पटरी की शरण में जाते हैं।

गांवकाचिठ्ठा में यह सब लिखना इसे एक सटायर का सा रूप देता है। सटायर लिखना ध्येय नहीं अत: विषय परिवर्तन करता हूं।

Continue reading “स्वैच्छिक लॉकडाउन या अपने पर ओढ़ा एकांतवास #गांवकाचिठ्ठा”