चीनी पाण्डेय ने बनाई चिड़िया की कहानी

“उस बाग में ढेरों चिड़ियाँ रहती थीं। वहीं एक पेड़ पर बुलबुल भी रहती थी। वह सुनहरे रंग की थी। दिन में वह अकेली रहती थी। उसके माता पिता दूर कहीं काम पर जाते थे …”


आज मैं कॉपी कलम ले कर लिखने की कोशिश कर रही थी कि मेरी पोती चीनी ने आ कर कहा – दादी, आप एक चिड़िया की कहानी लिखिये।

चीनी (पद्मजा पाण्डेय), सवेरे बगीचे में घूमते हुये।

मैंने कहा – आप बताओ, तो लिख देती हूं। तो चीनी ने एक कहानी सुनाई।

एक बहुत सुंदर बाग था। उसमें बहुत सुंदर सुंदर फूल लगे थे। कई फलों के पेड़ भी थे। आम, अनार, अमरूद और सेव। और भी बहुत सारे। उस बाग में ढेरों चिड़ियाँ रहती थीं। वहीं एक पेड़ पर बुलबुल भी रहती थी। वह सुनहरे रंग की थी। दिन में वह अकेली रहती थी। उसके माता पिता दूर कहीं काम पर जाते थे और शाम के समय उसके लिये ढेर सारा खाना ले कर आते थे।

एक शाम उसके माता पिता नहीं लौटे। सुनहरी बुलबुल बहुत परेशान थी। उसे बहुत दुख हो रहा था। अंधेरा होने पर भी उसके माता पिता नहीं लौटे। सारे पक्षी सुनहरी बुलबुल के पास बैठे थे। सारे पेड़ भी सुनहरी बुलबुल को समझा रहे थे कि शायद किसी काम में फंस गये होंगे माता पिता।

सुनहरी बुलबुल रोने लगी और रोते रोते सो गयी।

सुबह उसने देखा कि उसके मम्मी-पापा जल्दी जल्दी आ रहे हैं। उन्होने बताया कि बेटा हम तो शाम के समय घर आ रहे थे तो हम पर एक लड़के ने पत्थर मार दिया। तुम्हारी मम्मी के पंख में चोट लग गयी। इस लिये हम रात एक जामुन के पेड़ पर बैठ गये। सुबह तक चोट थोड़ी थोड़ी ठीक होने पर जल्दी जल्दी तुम्हारे पास लौटे हैं।

घर में घोंसला बनाये ग्रेट इण्डियन रॉबिन। अपने चूजों के लिये भोजन ले कर आती हुई।

कहानी सुनाने के बाद चीनी ने कहा – दादी, पक्षियों को नहीं मारना चाहिये, न?

यह कह कर वह अपने खेल मेंं लग गयी। मैने उसकी कही कहानी को कागज पर हूबहू उतार दिया। चीनी (पद्मजा पाण्डेय) छ साल की है। आजकल कोरोना काल में छुट्टियां हैं। वह घर में और पेड़-पौधों के बीच अकेली घूमती है। घूमते चिड़ियों को देखती है। कई जोड़ा बुलबुल भी हैं घर की चिड़ियों में। घर में एक इण्डियन रॉबिन दम्पति ने घोंसला बनाया है चीनी के लटकाये चिड़िया “घर” में।

चिड़िया का घोंसला, जिसे चीनी बार बार निहारती है।

यह सब देखती-घूमती वह कहानी भी बुन लेती है। कहानी कुछ कल्पना और कुछ परिवेश को देखने परखने से उपजती है।


सूर्यमणि तिवारी, हर्ष मिश्र और नचिकेता

हर्ष को देख कर मुझे लगा कि कठोप्निषद मात्र काव्य कल्पना नहीं। ऐसा पात्र, ऐसा नायक, हो सकता है।


सूर्यमणि तिवारी

सूर्यमणि तिवारी मेरे शुभचिंतक हैं। अपने परिवेश से ऊपर उठ कर उन्होने मात्र धन ही अर्जन नहीं किया है, सज्जनता और लोककल्याण की प्रवृत्ति भी उनमें संतृप्त है। वे मुझसे कहते रहते हैं कि मैं तुलसीदास को पढ़ूं। शायद उन्हें लगता है कि मैं जो पढ़ता हूं, उसमें आत्मविकास का तत्व सीधा नहीं होता। वह सेकुलर पठन सरीखा होता है। “तुलसी के पढ़अ, ओहमें कुलि बा” (तुलसी को पढ़ो, उसमें सब कुछ है)।

एक दिन उन्होने मुझे कठोप्निषद पर एक संत के वीडियो संदेशों का लिंक दिया। स्वामी अभयानंद के लगभग एक घण्टे के करीब पचास वीडियो हैं कठ-उपनिषद पर।

कठ उपनिषद हमारे प्रमुख उपनिषदों में प्रमुख है। मुझे उससे परिचय स्वामी चिन्मयानद ने कराया था। स्वामी जी बिट्स पिलानी में विजटिंग फेकल्टी थे। साल में एक दो बार आते थे। मैं अपने इंजीनियरिंग विषयों के अलावा एक ह्यूमैनिटीज विषय का भी छात्र था – Cultural Heritage of India. उस विषय में उन्होने कई कक्षायें ली थीं, और उपनिषदों से परिचय कराया था। अत: मुझे गर्व है कि मैं स्वामी चिन्मयानंद जैसे महान संत का शिष्य रह चुका हूं।

सूर्यमणि तिवारी जी ने जब कठोप्निषद की बात कही, तो मुझे अपने पुराने दिन याद हो आये। इस उपनिषद का मुख्य पात्र है नचिकेता। दस-इग्यारह साल का बालक। सत्व, सरलता और जीवन के उच्चतर मूल्यों से ओतप्रोत। यम से वह जो तीन वर मांगता है, वह विलक्षण है। उससे उसकी बुद्धि की तीक्ष्णता भी स्पष्ट होती है, और सरलता भी।

हर्ष मिश्र बांये और नारायण प्रसाद सिंह दांये
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संदीप कुमार को एक व्यवसाय और, उससे ज्यादा, आत्मविश्वास चाहिये #गांवकाचिठ्ठा

नौकरी में दिक्कत है, व्यवसाय के लिए पूँजी की किल्लत है। संदीप के यह बताने में निराशा झलकती है। पर मेरा आकलन है कि उसमें आत्मविश्वास की कमी है। उसको प्रोत्साहित करने वाले नहीं मिलते उसके परिवेश में।


कोरोना संक्रमण भदोही मेंं प्रतिदिन 6 प्रतिशत से अधिक की दर से बढ़ रहा है। संदीप कुमार का काम रोज तीस किलोमीटर साइकिल चला कर डेढ़ सौ ग्रामीण घरों में अखबार बांटना है। जिन गांवों में उसका जाना होता है वे कोरोना वायरस की पकड़ में आते जा रहे हैं। संदीप के काम के खतरे हैं और उसको इनका एहसास भी है। वह मुंह पर एक गमछा लपेटे रहता है। कहीं बहुत ज्यादा रुकता नहीं। सवेरे साढ़े तीन बजे उठता है। पांच बजे महराजगंज कस्बे की अखबार एजेंसी से अखबार ले कर दस बजे तक अखबार बांटने का काम खत्म कर पाता है।

संदीप कुमार, अखबार वाला नौजवान ।
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Parasnath, regular in Ganga Snan for 25 years

There are many characters like Parasnath. Cool, composed, without much expectations and living Dharmic life in their own way.


I often see him either going or returning form Kolahalpur Ganga Ghat in the morning hours. He must be reaching at the ghat before sunrise.

A few days back, I had placed a tweet about him –

Yesterday I saw him again returning from the Ganges and thought of talking to him.

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महाभारत, द्रौपदी का चीरहरण और धर्म

और धृतराष्ट्र आंख से ही नहीं, मन और बुद्धि से भी अंधे थे। लेकिन उस सभा में आंख, कान, मुंह वाले भी कायर और नपुंसक थे। द्रौपदी के प्रश्नों का उत्तर किसी के पास नहीं था।


दशकों पहले कुप्पु. सी. सुदर्शन जी को कहते सुना था कि धर्म शंकु की तरह नहीं होता जो उठता है और फिर गर्त में चला जाता है। धर्म चक्र की तरह होता है जो ऊपर उठता है, नीचे जाता है, फिर ऊपर उठता है। हर समाज के उत्थान-पतन-उत्थान की तरह धर्म का चक्र भी बदलता रहता है।

उसी भाषण में सुदर्शन जी ने कहा था कि महाभारत काल से ही ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनो अपने स्थान से नीचे गिरते चले गये। वे पुनः उत्थान के दौर में कब आयेंगे यह आगे आने वाले समय की बात होगी।

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कोविड19 और आत्मनिर्भरता – रीता पाण्डेय की अतिथि पोस्ट

धन्यवाद प्रधानमंत्री जी को दिया जाये या कोविड19 के भय को; हर व्यक्ति घर में कुछ न कुछ काम करना सीख गया है। मेरे घर में सब काम में लगे हैं।


आजकल घर का काम निपटा कर मेरी पत्नीजी कागज कलम उठा कुछ न कुछ रोज लिख रही हैं। जितना काम – घर की साफ सफाई, पौधों की देखभाल, कपड़े धोना, प्रेस करना आदि – पहले करती थीं, उससे दुगना कर रही हैं। पर उसके बावजूद भी आधा घण्टा समय निकाल कर एक – डेढ़ पेज लिख रही हैं। मेरा काम उसे टाइप कर ब्लॉग पर अतिथि पोस्ट के रूप में प्रस्तुत करना हो गया है!

उनकी पोस्ट प्रस्तुत है –


“अपना हाथ, जगन्नाथ” कहावत है। अपने हाथ, अपने परिवार पर भरोसा भारतीय समाज का मुख्य अंग हुआ करता था। घर के काम घर के लोग आपस में मिलबांट कर किया करते थे। गांव में तो यह अब भी दिखता है।

चिन्ना पांड़े बर्तन पोंछ कर रखती हुई

समय के साथ लोग नौकरियों पर निर्भर होते गये। तमाम काम मशीनों ने ले लिया। रसोई का बहुत सा काम मशीनों से होने लगा।

बचपन में देखा था पड़ोस के परिवार को। गांव में एक बूढ़ी नानी हुआ करती थीं। उनकी बहू कभी पेट दर्द की शिकायत करती तो बूढ़ी नानी कहतीं – पांच सेर गेंहू जांत (हाथ चक्की) से पीस लो; पेट दर्द अपने आप खतम हो जायेगा।

मेरी नानी कहा करती थीं कि सूर्योदय से पहले अपना आंगन बुहार देना चाहिये। इससे लक्ष्मी मईया प्रसन्न होती हैँ। आज की पीढ़ी के लिये शायद ये मजाक की बात लगती होगी।

सामान्यत: अपने हाथ से घर का काम करने की प्रवृत्ति खतम होती गयी। उससे मोटापा बढ़ा और मोटापे के साथ आयीं सौ बीमारियाँ।

ज्ञान दत्त पाण्डेय चाय बनाते हुए। वैसे रसोई का काम मुख्यत: बहू (बबिता) सम्भालती है।

धन्यवाद प्रधानमंत्री जी को दिया जाये या कोविड19 के भय को; हर व्यक्ति घर में कुछ न कुछ काम करना सीख गया है। मेरे घर में सब काम में लगे हैं। लड़का मटर छीलता है, सामान रखता-रखाता है। पति चाय बना लेते हैं। बिस्तर भी समेटते-सहेज लेते हैं। बहू पोती को पढ़ाती है और रसोईं का अधिकतर काम सम्भालती है। यहां तक की छ साल की पोती – चीनी भी बर्तन रखने में मेरी सहायता करती है।

कई तरह के वीडियो वायरल हो रहे हैं। बाईयाँ आ नहीं रही हैं तो फिल्मी हीरोइनेँ भी अपने घर में झाड़ू लगा रही हैं। बीस-इक्कीस दिन का लॉकडाउन बहुत सी आदतें बदल देगा; बहुत कुछ सिखा जायेगा।

ज्ञानेन्द्र पाण्डेय मटर छीलते हुए