नदी, मछली, साधक और भगव्द्गीता

अचिरेण – very soon – में कोई टाइम-फ्रेम नहीं है। वह ज्ञान प्राप्ति एक क्षण में भी हो सकती है और उसमें जन्म जन्मांतर भी लग सकते हैं!


मछली पकड़ने वाले और साधक में बहुत कुछ साम्य है। मैं जब भी गंगा किनारे किसी को कंटिया लगा कर शांत बैठे देखता हूं, मुझे तत्वज्ञान की तलाश में साधनालीन व्यक्ति की याद हो आती है। इस प्रकार के कई लोगों से मैं मिला हूं और उनके बारे में ब्लॉग पर भी लिखा है। सामान्यत: वह लिखने में एक प्रकार का व्यंग, सटायर या हास्य होता है। आज वैसी अनुभूति नहीं थी!

वह व्यक्ति अभी बैठा ही था कंटिया लगा कर। एक डोरी – करीब तीस फुट लम्बी – कांटा और चारा (कीड़ा/केचुआ) लगा कर नदी में फैंक रखी थी। एक दूसरी डोरी, लगभग उतनी ही लम्बी, एक डण्डी से सहारे फैंक रखी थी पानी में? अर्थात मछली पकड़ने के लिये दो कांटे लगा रखे थे।

नदी किनारे बैठा कंटिया लगाये मछेरा

अगर मछली कांटे में फंसी तो डोरी में झटका लगेगा और मछेरा उसे खींचने का उपक्रम करेगा।

“डण्डी वाली दूसरी कंटिया-डोरी में अगर मछली फंसी तो कैसे पता चलेगा?”

“किनारे पर गाड़ी डण्डी जोर से हिलने लगेगी। तब मैं अपनी डोरी छोड़ कर डण्डी वाली डोरी साधने लगूंगा।”

“किनारे पर गाड़ी डण्डी जोर से हिलने लगेगी। तब मैं अपनी डोरी छोड़ कर डण्डी वाली डोरी साधने लगूंगा।”

मेरे समझ में आ गया। दो डोरी से उस मछेरे ने अपनी मछली पकड़ने की प्रॉबेबिलिटी (सम्भावना) दुगनी कर ली है।

“तब दो ही डोरी क्यूं? चार पांच डोरियां-कंटिये क्यों नहीं लगा लिये?” – मेरी अगली जिज्ञासा थी।

“जितना सम्भाल सकता हूं, उतनी ही तो लगाऊंगा। ज्यादा लगाने पर एक साथ दो-तीन में मछली फंस गयी तो उन्हें समेटना अकेले के बूते का नहीं है?”

बहुत सही! साधक अगर संतोष का भाव अपने में नहीं ला सकता तो संसार, मोह, लालच की उधेड़बुन और मकड़जाल में; वह न तीन में रहेगा, न तेरह में! … माया मिली न राम की दशा होगी। मुझे अब समझ आया; यह मछेरा पहले ही जानता है।

“कितना समय लगता है मछली मिलने में?”

“अब क्या कहा जा सकता है। अभी दस मिनट पहले ही बैठा हूं।” वह मुंह से खैनी थूंकते हुये बोला। फिर सोच कर जोड़ा – “ज्यादा समय नहीं लगेगा। नदी और उसमें मछलियां देखते हुये जल्दी ही मिल जानी चाहियें।”

ग्रेट! अगर मैं उसके कथन को “सत्य और ज्ञान की खोज” से जोड़ूं और मछली को ज्ञान प्राप्ति के स्थान पर रख कर सोचूं तो “जल्दी ही मिल जाने” की बात तो भग्वद्गीता भी करती है! अचानक मुझे स्वामी चिन्मयानंद जी के हमको पिलानी में दिये लेक्चर याद हो आये। वे चौथे अध्याय पर बोल रहे थे और “अचिरेण” (बिना देरी के) शब्द पर रुके थे। गीता श्रद्धावान और साधनारत व्यक्ति को आश्वासन देती है कि शीघ्र ही उसे भग्वत्प्राप्ति होगी –

श्रद्धावांल्लभते ज्ञानं
तत्परं: संयतेन्द्रिय: ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्ति-
मचिरेणाधिगच्छति (मा अचिरेण अधिगच्छति) ।।गीता, 4.39।।

कहते हैं, ज्ञान आपको कहां, किस हालात में मिलेगा, कहा नहीं जा सकता। आपको अपने रिसेप्टर्स (अपनी ज्ञानेंद्रियाँ) खुले रखने हैं। आज से पैंतालीस साल पहले स्वामी जी के लेक्चर मेरी विस्मृति में तह लगे रखे थे। यह मछेरा निमित्त बन गया उन्हें पुन: स्मृति में लाने और उसपर मनन करने में। यह अपने आप में अभूतपूर्व बात है।

अचिरेण – very soon – में कोई टाइम-फ्रेम नहीं है। वह ज्ञान प्राप्ति एक क्षण में भी हो सकती है और उसमें जन्म जन्मांतर भी लग सकते हैं!

मुझे एक क्षेपक कथा स्मरण हो आयी। दो साधकों को यह प्रकटन हुआ कि जिस पीपल के पेड़ के नीचे वे तपस्या कर रहे हैं, उसमें जितने पत्ते हैं, उतने वर्षों में उन्हें भग्वत्प्राति हो जायेगी। यह जान कर एक साधक तो सिर पकड़ कर बैठ गया – मैंने इतना कुछ किया है। इतनी सिद्धियाँ प्राप्त की हैं। पर अभी भी इतने साल लगेंगे। इसमें तो कई जन्म जन्मांतर गुजर जायेंगे! 😦

दूसरा साधक यह जान कर कि उसको ज्ञान प्राप्ति हो जायेगी; प्रसन्नता में नाचने लगा – मुझे इतनी जल्दी (अचिरेण) भग्वद्प्राप्ति हो जायेगी! क्या खूब!‍ कुछ ही जन्मों की तो बात है। समय तो बस गुजरते क्या देर लगती है! 😆

गंगा तट से लौटते समय मन में “प्रसन्नता से नाचने का भाव” तो नहीं था; पर यह ढाढस मन में जरूर था कि लौकिक-पारलौकिक सफलताओं की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त है। गीता नें तो वह एश्योरेंस दे ही रखा है; आज इस मछेरे ने भी वह स्मरण करा दिया!


मेरे समधी, रवींद्र कुमार पाण्डेय का कोरोना संक्रमण और उबरना

“यह तो कोरोना है, जिसकी न कोई दवा है न कोई पुख्ता इलाज। बस देख सँभल कर चलना रहना ही हो सकता है। जिस तरह के कामधाम मैं हम हैं वहां अकेले एकांत में तो रहा नहीं जा सकता। लोगों से सम्पर्क तो होगा ही। गतिविधि तो रहेगी ही। बस, बच बचा कर वह कर रहे हैं।”


वे कुछ अस्वस्थ थे। ऑक्सीमीटर 90 की रीडिंग दे रहा था। थोड़ी खांसी और थकान। उनके दोनो बेटों ने उनके गांव (फुसरो, बोकारो, झारखण्ड) में किसी तरह का जोखिम लेने की बजाय उन्हें दिल्ली ले जाने का निर्णय लिया। यद्यपि उन्हें और कोई समस्या नहीं थी। कोई बुखार नहीं आया, कोई कंपकंपी नहीं हुई। पर फिर भी, इस कोरोना काल में कोई भी जोखिम लेने की बजाय उन्हें दिल्ली ले जाना बेहतर लगा विकास और विवेक को।

विकास रवींद्र पांड़े के बड़े बेटे हैंं। विवेक, मेरे दामाद, मंझले। रवींद्र कुमार पाण्डेय इस समय भूतपूर्व सांसद हैं। पिछले पांच बार वे गिरिडीह संसदीय क्षेत्र का लोक सभा में प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। अपने क्षेत्र के भाजपा के सबसे सशक्त नेता हैं और अत्यंत सक्रिय भी!

सतरह अगस्त की शाम को मेरी बिटिया ने पाण्डेय जी की तबियत के बारे में बताया और उसके कुछ ही समय बाद उन्हें सड़क मार्ग से ले कर दिल्ली के लिये रवाना होने की खबर भी दी। यह भी बताया कि रास्ते में सवेरे पांच बजे के आसपास वे लोग हमारे गांव के समीप से गुजरेंगे।

मेरे घर पर श्री रवींद्र पाण्डेय

अठारह अगस्त की सुबह वे लोग एक डेढ़ घण्टे के लिये यहां हमारे घर आये। यद्यपि रवींद्र पाण्डेय जी की बीमारी के बारे में निश्चित तौर पर कुछ ज्ञात नहीं था, हम ने कोरोना संक्रमण की आशंका मानते हुये पूरी सावधानी बरती। वे लोग स्वयम भी सावधान थे। पाण्डेय जी थके हुये लग रहे थे, पर मरीज की तरह बिल्कुल झूल गये हों, वैसा भी नहीं था। अपनी कार से हमारे बराम्दे तक करीब पचास कदम खुद चल कर आये और कुर्सी पर बैठ कर बड़े सामान्य तरीके से बातचीत भी की – “भईया, आप तो बोकारो आये नहीं, हम ही चले आये हैं!” हर साल उनका नवरात्र में विंध्याचल आना होता है माँ विंध्यवासिनी के दर्शन के लिये। जब भी आते हैं तो हमारे यहां मिलते हुये ही वापस लौटते हैं। इस साल लॉकडाउन के कारण आना नहीं हो पाया था। अब अकस्मात आना हो गया।

मैंने देखा कि संक्रमण की पूरी आशंका के बावजूद उनकी पत्नीजी – श्रीमती लक्ष्मी पाण्डेय – उनका पूरा ध्यान रख रही थीं। स्नानघर में उनको तैयार करना, उनके कपड़े पानी से धो कर सूखने को डालना, उनके दवा-भोजन की फिक्र करना बड़ी बारीकी से उन्होने खुद किया। एक पूर्व-सांसद की पत्नी (और वह व्यक्ति, जो भविष्य में भी झारखण्ड की राजनीति में असीमित दमखम रखता हो) इतनी समर्पण भाव से सेवा करती हो – भारतीय नारी की श्रद्धा-मूर्ति लगीं लक्ष्मी पाण्डेय जी।

रवींद्र पाण्डेय और विवेक (दांये) हमारे यहां ब्रंच करते हुये।

पाण्डेय जी का काफिला (दो कारों में थे वे लोग) करीब डेढ़-दो घण्टे में नहा-धो कर और नाश्ता/भोजन कर मेरे यहां से रवाना हो गया। उनके जाने के बाद पूरी सतर्कता बरतते हुये हमने उनके इस्तेमाल किये परिसर को पर्याप्त सेनिटाइज कर लिया।

उनके जाने के बाद, मन में यह संतोष भाव तो था, कि हमने, आशंका के बावजूद अपने अतिथि धर्म को, अपनी क्षमता अनुसार निर्वहन करने का प्रयास किया। फिर भी, मन में यह भी था कि दूरी बना कर मिलने और पूरे समय मास्क लगाये रखने को वे कहीं अन्यथा न ले रहे हों।

वे लोग दिल्ली/गुड़गांव मध्य रात्रि के बाद ही पंहुचे। अगले दिन सवेरे रवींद्र कुमार पाण्डेय और उनकी पत्नीजी ने मेदांता अस्पताल में अपना कोविड-19 टेस्ट कराया। पाण्डेय जी कमजोरी और अन्य लक्षणों के कारण अस्पताल में भर्ती भी हो गये। देर रात में टेस्ट रिपोर्ट में पता चला कि रवींद्र जी कोरोना पॉजिटिव हैं पर उनकी पत्नीजी संक्रमित नहीं हैं।

रवींद्र पाण्डेय जी की फेसबुक पोस्ट

पाण्डेय जी ने अपनी फेसबुक पोस्ट के माध्यम से अपने कोरोना संक्रमित होने की बात सभी को बता भी दी। पर यह भी मुझे लगा कि रवींद्र पाण्डेय खुद कोरोना पॉजिटिव होने के बावजूद, कोरोना स्प्रेडर या सुपर स्प्रेडर नहीं थे; अन्यथा उनकी पत्नीजी, जो बराबर उनके साथ उनकी सहायता को बनी रहीं, जरूर कोरोना पॉजिटिव होतीं।

वे एक सप्ताह तक अस्पताल में रहे। सत्ताईस अगस्त को वे अस्पताल से डिस्चार्ज हुये।

अस्पताल से डिस्चार्ज होने पर श्री रवीन्द्र पाण्डेय। साथ में उनकी पत्नी श्रीमती लक्ष्मी और बेटा विकास

अस्पताल से छुट्टी पाने के बाद करीब एक पखवाड़ा वे दिल्ली में अपने फ्लैट में रहे। कुछ दिनों पहले वे अपने झारखण्ड आवास (फुसरो, बोकारो) आ गये हैं।

आज एक महीना हो रहा है अस्वस्थता के कारण दिल्ली यात्रा किये हुये। हमारे अपने करीबी में एक वही व्यक्ति हैं, जिन्हे कोरोना की आशंका के साथ मैंने पास से देखा और जो उसके बाद कोरोना पॉजिटिव पाये गये और संक्रमण से विधिवत उबर भी गये।

मैंने रवींद्र कुमार पाण्डेय जी से महीना भर गुजरने पर फोन पर बात की। उनका कहना था – “भईया, एक आदमी तीन दिन साधारण बुखार में रहता है तो एक पखवाड़ा तक कहता रहता है कि बहुत कष्ट है। यह तो कोरोना है, जिसकी न कोई दवा है न कोई पुख्ता इलाज। बस देख सँभल कर चलना रहना ही हो सकता है। जिस तरह के कामधाम मैं हम हैं वहां अकेले एकांत में तो रहा नहीं जा सकता। लोगों से सम्पर्क तो होगा ही। गतिविधि तो रहेगी ही। बस, बच बचा कर वह कर रहे हैं।”

उन्होने तो नहीं कहा, पर बातचीत से लगता था कि उनका स्वास्थ्य पूर्ववत तो नहीं है। अपने मूवमेण्ट्स में कुछ तो कमी उन्हे करनी पड़ी है। राजनैतिक सक्रियता उनकी प्रकृति में है और आसन्न विधान सभा उपचुनाव के कारण अनिवार्यता भी है। अतः वे एकांतवास तो कर ही नहीं पाएंगे।

कोरोना महामारी से निपटने का हर वर्ग का तरीका और रिस्पॉन्स कुछ कुछ अलग है। आईटी वाले घर में बैठ कर काम कर रहे हैं। दुकानदार और डिजिटल बन रहे हैं। बिल्कुल देसी गांव की दुकान वाला भी फोन पे का स्कैन कोड लगा लिया है। शिक्षा अधिकाधिक ऑन लाइन हो रही है। पर रवीन्द्र पाण्डेय जी की राजनैतिक पीढ़ी (मेरे अंदाज में) अनुकूलन की तकनीकें स्वीकारने में फिसड्डी है। उन्हें अपने जन संपर्क को ज्यादा से ज्यादा डिजिटल बनाना चाहिए। यह संक्रमण से पहले भी जरूरी था और अब तो बहुत ही जरूरी हो गया है। पाण्डेय जी के पास डिजिटल दक्ष नौजवान होने चाहिएं और उनको भाव भी मिलना चाहिए।… पर मैं जानता हूँ कि वे करेंगे अपने हिसाब से ही। परिवर्तन हर एक के लिए कठिन है और राजनेता के लिए; जिसकी ईगो को पुष्ट करने के लिए कई लोग आगे पीछे घूमते हैं; तो और भी कठिन है।

एक बात और – पोस्ट कोविड समस्यायें – विशेषकर सीनियर सिटिजन के लिये; भले ही उनकी देखभाल बड़ी अच्छी तरह होती हो; एक गम्भीर वास्तविकता हैं। इसके बारे में ज्यादा कुछ पढ़ने को नहीं मिलता। वह भी कोविड-19 जानकारी का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिये।

कोरोना संक्रमण अब दूर की खबर नहीं रही। अपने आसपास, अपने सम्बंधियों में भी सुनने को आ रहा है। इस विषाणु के साथ लगभग साल भर और गुजारना है। यह समय सकुशल गुजर जाये, इसकी तैयारी रहे और सावधानी भी – इसी की कामना की जाती है।


नहुष -स्वर्ग से पतित नायक

नहुष में स्वर्ग से पतित होने पर भी मानवीय दर्प बना है। यही दर्प आज भी सफलता से डंसे पर अन्यथा कर्मठ मानवों में दिखता है। यही शायद मानव इतिहास की सफलताओं की पृष्ठभूमि बनाता है।


नहुष महाभारत का एक महत्वपूर्ण और एक अत्यंत रोचक चरित्र है। इसलिये कि हम सब में नहुष है। हम सब, जो कालखण्ड के किसी न किसी अंश में सफल रहे हैं। सत्ता, यश, शौर्य और आत्ममुग्धता को हासिल कर चुके हैं। और उसे, “ज्यों की त्यौं धर दीनी चदरिया” जैसे त्याग नहीं पाये हैं। शिखर से हटने पर भी मन में नहुष-भाव बना ही रहता है, मैथिलीशरण गुप्त जी के शब्दों में –

फिर भी उठूंगा और बढ़ के रहूंगा मैं। नर हूं, पुरुष हूं मैं, चढ़ के रहूंगा मैं।

नहुष गुप्त जी का महत्वपूर्ण खंड काव्य है। वह महाभारत का एक उपाख्यान है। इंद्र शापित होने के बाद नहुष को इंद्र का आसन दिया जाता है और वह शची पर मुग्ध हो जाता है। सुर सरिता से सद्यः स्नात शची पर।

खण्ड काव्य का अंश देखें –

स्वर्ग से पतित होता नहुष

शची उपाय ढूँढती है नहुष से बचाव का। वह प्रस्ताव भेजती है कि नहुष को वरण करने को तैयार है अगर नहुष सप्त ऋषियों की ढोई पालकी में उसे लेने आयें। उतावली में नहुष एक ऋषि को लात मारता है और क्रोधित ऋषि उसे स्वर्ग से पतित कर देते हैं।

मैथिली शरण गुप्त जी के नायक नहुष में स्वर्ग से पतित होने पर भी मानवीय दर्प बना है। यही दर्प आज भी सफलता से डंसे पर अन्यथा कर्मठ मानवों में दिखता है। यही शायद मानव इतिहास की सफलताओं की पृष्ठभूमि बनाता है।

आप तिहत्तर पेज के नहुष खंड काव्य को इन्टरनेट आर्काइव से डाउनलोड कर सकते हैं ;पीडीएफ फार्मेट में।


मुझे गंगा किनारे लूटा बीर घाट पर यह गिरा बबूल का पेड़ दिखा। और उसे देख गंगा नदी के पवित्र तट पर पतित नहुष की याद हो आई। इसके धरती पर पड़े तने से अनेक अनेक टहनियां ऊर्ध्व उठ रही थीं। उनमे उठने और स्वर्ग की ओर जाने की अदम्य इच्छा स्पष्ट नजर आ रही थी। नहुष ही तो था वह पेड़। पतन और मृत्यु से दो चार होता वह वृक्ष हार नहीं मान रहा था।

टूटा बबूल का पेड़, गंगा तट पर। उसकी डालियाँ ऊपर उठ रही हैं. मृत्य स्वीकार नहीं कर रहीं। हार नहीं मान रही हैं। नहुष की तरह!

मुझे खंड काव्य का अंश याद हो आया। उसका स्केन किया अंश प्रस्तुत हैं –


वह बबूल का पतित पेड़, सुरसरि गंगा का किनारा और सवेरे का समय – सब मुझे नहुष की याद दिलाते रहे। वैसे भी; जीवन की दूसरी पारी में नहुष जैसे नायक चरित्र आकर्षित करते हैं। महाभारत के उप-आख्यान से पता नहीं चलता कि नहुष ने स्वर्ग से पतित होने पर क्या किया, पर कोई आधुनिक कालिदास (अभिज्ञान शाकुंतल के रचनाकार), या वी.एस. खाण्डेकर (ययाति नामक उपन्यास के लेखक) जैसा रचनाकार नहुष के साथ एक नयी कथा का ताना-बाना बुन सकता है। री सरेक्शन ऑफ अ फेल्ड बिजनेस एम्पायर के कई किस्से तो होंगे ही। हम तलाश करें तो आधुनिक काल में दूसरी पारी के सफल नहुष मिलेंगे और अनेक मिलेंंगे।

नहुष – बबूल और गंगा तट

सीएसआर और गांव में लगी बेंचें

छोटे बदलाव, उनके Nudge Effects बहुत महत्वपूर्ण हैं सामाजिक और आर्थिक बदलाव के लिए। आज छह बेंचें लगी हैं। इनकी संख्या बढ़ कर 30 – 40 हो जानी चाहिए।


गांवों में घूमते हुये आजकल सीमेण्ट-कॉक्रीट की ढाली हुयी बेंचें दिख जाती हैं।

सोलर लाइट की बंटाई का फेज खतम हुआ। नब्बे परसेण्ट सोलर लाइटें दो तीन साल में बेकार हो गयी हैं। वे सांसद/विधायक/प्रधान के माध्यम से बंटी थीं। उनपर “फलाने सांसद की ओर से” जैसा कुछ लिखा भी था। कम्पनियों ने अपनी कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) फण्ड में प्रावधान कर जन प्रतिनिधियों के माध्यम से बटवाई थीं। उनकी बैटरीज को पांच सात साल चलना था, पर उसकी आधी भी नहीं रही उनकी जिंदगी। यह भारत की सामान्य कथा है। उसपर सिनिकल हो कर क्या लिखना।

कई चीजें हुयी या बांटी गई हैं गांवों में। चापाकल (हैण्डपम्प) लगे। वे सार्वजानिक होने थे, पर आम तौर पर जिसके दरवाजे पर लगे, उसकी प्राइवेट प्रॉपर्टी जैसे हो गए। आवास मिले। उसमें भी धांधली की खबरें लोग सुना जाते हैं। पर लोगों के चमकते घर और शौचालय दिखते हैं तो अच्छा लगता है। यह अलग बात है कि लोग अब भी सड़क या रेल लाइन के किनारे बैठते हैं निपटान के लिए।

सड़कें और मनरेगा के काम की गुणवत्ता की कमियां तो नजर आती हैं। अन्न वितरण, पूरी कसावट के बावजूद, बांटने वाले विभाग और कोटे दार की गड़बड़ का पूरा स्कोप रखता है। हर गतिविधि में छीन झपट है। पर फिर भी, कुछ न कुछ सार्थक होता है। वही संतोष का विषय है।

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स्वामी अड़गड़ानंद जी के आश्रम में

धीरे धीरे चल रही थी उनकी कार। रास्ते में आश्रम वासी हाथ जोड़ खड़े हो जाते थे और वाहन सामने से गुजरते समय दण्डवत प्रणाम करते थे।


अपने से शायद मैं वहां नहीं पंहुचा होता। परसों दोपहर में जब वहां गये तो हम चार लोग थे। महराजगंज के पास भक्तापुर में “इंद्रप्रस्थ” वाले श्री राजेंद्र पाण्डेय, ज्ञानपुर के एक नामी वकील श्री रविशंकर दुबे, सूर्या कारपेट के एमडी श्री सूर्यमणि तिवारी और मैं। ग्रुप के प्राइम मूवर तिवारी जी थे। मैं तो तिवारी जी के कहने पर साथ इस ध्येय से हो लिया कि स्वामी अड़गड़ानंद जी को प्रत्यक्ष देख कर आकलन कर सकूं कि उनमें कुछ विलक्षणता है अथवा जन सामान्य ने उन्हें मात्र किंवदंतियां जोड़ जोड़ कर पूजनीय बना दिया है।

अन्य तीनों लोग स्वामी जी के यहां कई बार जा चुके थे और निश्चय ही उनसे (अत्यंत) प्रभावित थे। ये तीनों महानुभाव अपने क्षेत्र में सफलता के शिखर छू चुके लोग हैं और इन्हें अच्छे-बुरे, मेधावी-मूर्ख, सिद्ध-फ्रॉड की गहन पहचान है। अत: स्वामी जी के प्रति एक आकर्षण तो बन ही गया था मेरे मन में। यह तो यकीन हो गया था कि वे विलक्षण तो होंगे ही!

मेरे दो रेल विभाग के सहकर्मियों ने पहले मुझे स्वामी अड़गड़ानंद जी की “यथार्थ गीता” की प्रतियाँ भेंट की थीं। पहली डेढ़ दशक पहले और दूसरी चार साल पहले। मैं यह नहीं कहूंगा कि वह पुस्तक मैंने कवर-टू-कवर पढ़ी है। भग्वद्गीता पर दो-तीन टीकायें पूरी गम्भीरता से पढ़ चुकने के बाद स्वामी अड़गड़ानंद जी की पुस्तक एक प्रॉजेक्ट के रूप में पढ़ने का संंयोग नहीं बना। पर पुस्तक मुझे सरल और सुपठनीय अवश्य लगी थी।

शक्तेषगढ़ स्थित उनके आश्रम में जाते समय मैंने अड़गड़ानंद जी पर इण्टर्नेट पर सामग्री सर्च की। मुझे यह देख आश्चर्य हुआ कि किसी ने उनपर विकीपेडिया पेज नहीं बनाया है। कोई अति सामान्य जानकारी वाल पेज भी नहीं। एक वाराणसी डॉट ऑर्ग डॉट इन साइट पर जानकारी मिली कि सन 1955 में 23 वर्ष की अवस्था में युवा अड़गड़ानंद मध्यप्रदेश में अनुसुईया आश्रम, चित्रकूट में अपने गुरु स्वामी परमहंस से मिले थे। उसके हिसाब से इस समय स्वामी जी की अवस्था 88-89 की होनी चाहिये।

स्वामीजी विगत माह कोरोना संक्रमण ग्रस्त हुये थे और अब उससे मुक्त हुये हैं। उसी के संदर्भ में तिवारी जी ने उनके दर्शन का कार्यक्रम बनाया था। मुझे तो शायद उन्होने इस लिये जोड़ लिया कि वहां जाना मुझे बाहर देखने की बजाय अंदर की यात्रा की प्रेरणा देगा।

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चुनार के पास गंगा पुल से गुजरते हुये। सामने चुनार का ऐतिहासिक किला है।

चुनार के किले के नीचे से बहती गंगा एक तीखा मोड़ लेती हैं – ऐसा मैंने पढ़ रखा था। गंगा के चुनार पुल से गुजरते हुये पहली बार वह दृष्य देखा। मौसम भारी था और दृष्यता अच्छी नहीं थी। ऐसे में चलते वाहन से कुछ अच्छा चित्र नहीं खींच सका मेरा मोबाइल। पर वह किला देखना बहुत अच्छा लगा। चुनार के आगे करीब अठारह किलोमीटर बाद था अड़गड़ानंद जी का आश्रम।

आश्रम पंहुच कर हम स्वामीजी के काफिले का हिस्सा बन गये। स्वामी जी आश्रम परिसर में एक स्थान से दूसरे स्थान पर अपने वाहन से जा रहे थे। धीरे धीरे चल रही थी उनकी कार। रास्ते में जो भी आश्रम वासी या अन्य नागरिक होते थे वे हाथ जोड़ खड़े हो जाते थे और लगभग सभी, उनका वाहन सामने से गुजरते समय दण्डवत प्रणाम करते थे। दृष्य ऐसा था, मानो कोई जनरल अपने फील्ड इंस्पेक्शन पर गार्ड ऑफ ऑनर ले रहा हो।

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स्वामी अड़गड़ानंद जी का काफिला। हमारा वाहन चौथा या पांचवां रहा होगा।

स्वामीजी आश्रम के उस अंश में पंहुच कर आसन पर बैठे। हम भक्तगण उनके समक्ष दरी पर। स्वामीजी, 88-89 की उम्र में भी आकर्षक पर्सनालिटी रखते हैं। कोरोना संक्रमण ने उनके स्वास्थ्य पर असर जरूर डाला है, पर अभी भी उनका व्यक्तित्व किसी अन्य (स्वस्थ) व्यक्ति की तुलना में ज्यादा प्रभाव डालने वाला है। …

वे बीमारी के आफ्टर इफेक्ट्स से असहज जरूर दिखे। उनकी आवाज बुलंद थी, पर शब्द बीच बीच में रुक जा रहे थे। शायद याददाश्त पर जोर पड़ रहा था। शरीर में बेचैनी थी। एक मुद्रा में बैठ पाना भारी पड़ रहा था। अन्यथा योगीजन (और नव साधक भी) तो एक ही मुद्रा में घण्टों स्थिर बने रहने के अभ्यासी होते हैं। निश्चय ही कोविड-19 का दुष्प्रभाव पड़ा था उनके शरीर पर। यह लग रहा था कि उन्हे पोस्ट-कोविड-केयर की बहुत आवश्यकता है। उन्होने अपने हियरिंग एड की भी मांग की। उसको लाने में चार पांच मिनट लगे।

करीब आधा घण्टा स्वामी अड़गड़ानंद जी ने हम लोगों से वार्तालाप किया होगा। उन्होने सूर्यमणि जी से उनके अमेरिका में बनवाये मंदिर के विषय में पूछा। कहा “यह बहुत अच्छा हुआ है। जो किया उचित किया।”। अपने स्वास्थ्य के विषय में टिप्पणी की – “कोरोना बराबर पीछा कर रहा है”। कोरोना अनुभव को उन्होने मृत्यु से साक्षात्कार जैसे अनुभव से जोड़ा। फिर लगभग ट्रांस सी अवस्था में किसी दिव्य सत्ता का कथन कहा – तू मर न पईहै। परमात्मा से संवाद जैसा कुछ रहा होगा बीमारी के दौरान।

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आसन पर स्वामी अड़गड़ानंद

कोरोना और उनके स्वास्थ्य के बारे में उपस्थित लोगों की चिंता के प्रत्युत्तर में वे बोल उठे – “तेरी याद में जल कर देख लिया। अब आग में जल कर देखेंगे।” स्वामी जी, सन 1954 की फिल्म “नागिन” के गीत का दार्शनिक प्रयोग कर रहे थे। बहुत कुछ भक्त और भगवान की बातचीत जैसा। पता नहीं अड़गड़ानंद जी उस परम सत्ता और अपनी देह/जीव/आत्मा के सम्बंध किस प्रकार परिभाषित करते हैं। पर इतना तो लगा कि कोरोना संक्रमण ने कहीं न कहीं देह के बहुत अधिक न चलने की मनस्थिति से दो-चार जरूर कराया है। उसका कितना असर प्राण और आत्मा पर पड़ा है, वह समझने के लिए समय काफी नहीं मिला मुझे।

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स्वामीजी कोरोना संक्रमण से उबर अवश्य गये हैं, पर शारीरिक कष्ट अभी भी दिख रहा था।

आशा यही की जानी चाहिये कि यह केवल क्षणिक भाव हो उनकी देह पीड़ा का। पर यह भी है कि जीवन मरण के ईश्यू हम सामान्य लोग और योगी-तपस्वी जन अलग अलग प्रकार से देखते हैं। फिलहाल, उनके साथ बिताये कुछ समय से दो तीन बातें मेरे मन में आयीं – कोरोना संक्रमण उम्र के साथ साथ भयानक तरीके से स्वास्थ्य पर प्रभाव डालता है और स्थितप्रज्ञ व्यक्ति को भी बेचैन कर सकता है। स्वामी जी की ईश्वर से किस तरह की समीकरण चल रही है इस समय, वह महत्वपूर्ण है। वह शायद उनके अब के आत्मानुशासन का दर्शन कराने वाली होगी। यह उनके साथ रहने वाले लोग ज्यादा सूक्ष्मता और स्पष्टता से अनुभव कर सकते हैं। मुझे तो कंफ्यूजिंग सिगनल मिले। … काश उनके साथ ज्यादा समय व्यतीत कर पाता। या काश मेरी आध्यात्म विषयक जानकारी सतही न होती!

स्वामी अड़गड़ानंद के समक्ष बैठे सूर्य मणि तिवारी

संक्षिप्त बातचीत में उन्होने सूर्यमणि तिवारी जी से चर्चा की, उनके आते जाते रहने की बात कही और नारद बाबा (?) का उल्लेख किया। बाद में तिवारी जी से मैंने नारद जी के बारे में पूछा तो पता चला कि वे यहीं बरैनी के पास के गांव के हैं उनके पिताजी उनके बीमार रहने के कारण परमहंस महराज (अनुसुईया बाबा) को सौंप दिये थे। नारद स्वामी अड़गड़ानंद जी के प्रति और आश्रम के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं।

मुझे यह भी जिज्ञासा बार बार लगती रही कि स्वामीजी अपने जीवन काल में अपने तत्वज्ञान अनुभव दर्शन के बाद जिस वृहत आश्रम व्यवस्था को खड़ा किये हैं, उसको ले कर और भविष्य में उसकी आवश्यकता/स्वरूप को ले कर क्या सोचते हैं। आशा करता हूं कि वे शतायु होंगे और अपना मंतव्य और स्पष्ट करेंगे। यह मेरी अपनी सोच भर हो सकती है। शायद तत्वज्ञानी इस तरह के अगर मगर और भूत भविष्य की गणना में नहीं पड़ते। … मैं श्री अरविंद आश्रम के दो-तीन महान साधकों को व्यक्तिगत रूप से जानता हूं। वे इस तरह की सोच के पचड़े में नहीं पड़े और अचानक संसार से चल भी दिये। मेरे सामने आदिशंकराचार्य का भी उदाहरण है, जो आजकल की भाषा के अनुसार अभूतपूर्व 20-20 की तेज पारियां खेल कर इस देश के कोने कोने में हिंदुत्व के नये प्रतिमान, नये अर्थ, नयी व्याख्यायें दे कर छोटी सी उम्र में चल दिये और उन्होने जो कुछ कहा, बताया, बनाया, वह आज भी मनीषी समझने जानने का प्रयास ही कर रहे हैं।

फिर भी; सम्भवत: आश्रम के भविष्य के स्वरूप और इस क्षेत्र में उसके योगदान की उनकी योजनायें तो होंगी ही। अड़गड़ानंद जी की इस क्षेत्र में बहुत व्यापक फॉलोइंग है। लोगों के जीवन को वे और आश्रम गहरे से प्रभावित करते हैं और उनके भविष्य को दिशा देने में आश्रम की सशक्त भूमिका हो सकती है।

खैर, स्वामीजी और उनकी कोटि के संतों के लिये तो इस जीवन की परिणिति में मोक्ष धाम होगा। फिक्र तो मुझ जैसों को है – जिनके लिये “पुनरपि जननम, पुनरपि मरणम, पुनरपि जननी जठरे शयनम” अनेकानेक बार होनी है। …

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रात हो गयी थी। विश्राम की मुद्रा में मेरे साथ के तीन अन्य भद्रजन। बायें से – रविशंकर दुबे, सूर्यमणि तिवारी और राजेंद्र पाण्डेय

स्वामीजी के मंदिर में काफी समय बैठे हम लोग। कुछ नाश्ता भी हुआ। प्रसाद और भभूति की पुड़ियाँ भी मिलीँ। वापसी में आश्रम की और स्वामीजी से मुलाकात की सोचता रहा मैं। मेरे साथ के तीन अन्य लोग तो बार बार आते जाते रहते हैं शक्तेषगढ़। मेरा वहां कभी जाना होगा या नहीं कह नहीं सकता।

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आरती के बाद नत मस्तक भक्त/साधक गण।

बहरहाल स्वामीजी की यथार्थ-गीता अपने किण्डल में भर ली है और उसे आगामी महीनों में पढ़ने के लिये मार्क भी कर लिया है – वह स्वामी अड़गड़ानंद जी को समझने मे सहायक होगी!

“तेरी याद में जल कर देख लिया। अब आग में जल कर देखेंगे।” – यह बार बार गुनगुनाता रहा मैं। अगले दिन सूर्यमणि जी ने बताया कि स्वामीजी रात में ही दिल्ली चले गये। शायद वहां पोस्ट-कोविड-केयर (अगर जरूरत पड़े, तो) बेहतर मिले। वहां स्वामीजी का आश्रम मेदांता अस्पताल से चार पांच कोस की दूरी पर है। किसी भी आपात स्थिति के लिये उसका प्रयोग सम्भव होगा। अगर हम उस दिन उनसे मिलने नहीं गये होते तो शायद शीघ्र मिलना न हो सकता था।

उनके यहां जाना और उनके आमने सामने के दर्शन, यह महत्वपूर्ण अनुभव रहा मेरा। उनसे परिचय की डीटेल्स तो जुड़ती रहेंगी।


पांच दिन का कोरोना संक्रमण का मेरा उहापोह

फिलहाल मैं प्रसन्न हूं कि कोरोना संक्रमण में जाते जाते बच गया हूं। जी हाँ, बच ही गया हूं! यह एहसास मरीज के अस्पताल से ठीक हो कर घर लौटने जैसा ही है!


पिछले पांच दिन इस दुविधा में निकले कि शरीर में जो कुछ हो रहा है वह कोविड-19 संक्रमण तो नहीं है। मुख्य लक्षण जुकाम के थे। उसके साथ खांसी भी जुड़ गयी। सूखी खांसी थी। सुनने वाले कहते थे कि उसकी आवाज खतरनाक सी लग रही है। बुखार नहीं था। फिर भी बार बार नापा। केवल एक ही बार 98.4 डिग्री फारेनहाइट से ज्यादा निकला। वह भी 98.7 डिग्री। सांस लेने में कोई तकलीफ नहीं थी। पर खांसी (वह भी सूखी खांसी) उत्तरोत्तर बढ़ती गयी। कुछ शारीरिक और कुछ मानसिक कारणों से लगने लगा कि शरीर अस्वस्थ है और यह दशा पहले के जुकाम-अनुभव की अपेक्षा अलग हो सकती है। यह आशंका सताने लगी कि कोरोना ने जाने अनजाने मुझे पकड़ ही लिया है।

आर्थिक तैयारी थी। मैंने एक कोरोना पॉलिसी ले रखी है। अगर कोविड पॉजिटिव का मामला बनता है और अस्पताल में भरती होने की नौबत आती है, तो इंश्योरेंस वाला ढाई लाख तो तुरंत दे ही देगा। पर आर्थिक तैयारी तो एक छोटा हिस्सा होती है कोविड प्रबंधन का। असली समस्या तो यह होगी कि कोविड संक्रमण का मामला होते ही घर का सारा सपोर्ट सिस्टम गड़बड़ा जायेगा। कोई काम पर आने वाला नहीं रहेगा। परिवार के अन्य सदस्य अगर संक्रमित हुये तो उनका भी ध्यान कौन रखेगा? घर में ही अगर आईसोलेशन की आवश्यकता पड़ी तो उसके लिये कमरे का चयन और सेवा के लिये घर के किसी व्यक्ति का सम्पर्क में रहना – भले ही दूरी बना कर हो, जरूरी होगा। वह कौन करेगा? बहुत से प्रश्न थे और जितना सोचते जायें, प्रश्न उतने ही बढ़ते जाते थे।

काढ़ा (गिलोय, दालचीनी, कालीमिर्च, लौंग आदि से बनाया) हम नित्य सवेरे चाय से पहले लेते हैं। उसकी मात्रा बढ़ा दी गयी। शाम के समय भी मुझे काढ़ा दिया जाने लगा। रक्तचाप और रक्त शर्करा नापने की आवृति बढ़ा दी, जिससे यह रहे कि दोनों निर्धारित परिमाप के अंदर रहें। पैंसठ की उम्र में किसी को-मॉर्बिडिटी का जोखिम तो घातक ही होगा!

दूसरे दिन तक खांसी बढ़ गयी और आवाज में भी (सुनने वालों के अनुसार) खरखराहट स्पष्ट लगने लगी। कोविड संक्रमण का भय और बढ़ा। मैंने आरोग्य सेतु एप्प पर देखा – आसपास की 500 मीटर की परिधि में एक व्यक्ति संक्रमित और चार अन्य “रिस्क” में थे। यह संख्या एक किलोमीटर की परिधि में बढ़ रही थी – दूरी के वर्ग के अनुपात में। कुल मिला कर यह तो लगता था कि संक्रमण फैल रहा है और वह इस गांवदेहात में भी समीप तक आ चुका है। पर अब भी – अढ़तालीस घण्टे बाद भी मुझे बुखार नहीं था और सांस लेने में कोई समस्या/अवरोध नहीं था।

यह देखने के लिये कि मेरा स्टेमिना कैसा है; डेढ़ किलोमीटर पैदल चहल कदमी कर आया और मेरी सांस सामान्य रही। उस पैदल चलने के बारे में फेसबुक पर पोस्ट भी किया था –

फिर भी, यह तो भय बना था कि आगे कहीं सांस लेने में तकलीफ न होने लगे और शरीर में ऑक्सीजन का स्तर गिरने न लगे। ऑक्सीजन और नाड़ी गति नापने के लिये आत्मनिर्भरता हेतु एक ऑक्सीमीटर खरीदने का निर्णय किया और अमेजन पर ताबड़तोड़ उसका ऑर्डर भी दे दिया।   

मैंने डाक्टर साहब को सम्पर्क करने का निश्चय किया। सूर्या ट्रॉमा सेण्टर में श्री रितम बोस ने मुझे सलाह दी कि मैं एजिथ्रोमाइसिन 500 एम जी की गोली, दिन में दो बार तीन दिन तक लूं। मेरे रिश्तेदार और प्रांतीय चिकित्सा सेवा में सीएमओ डा. उपाध्याय ने यह दवा दिन में एक बार और सिट्रीजाइन की एक गोली भी लेने को कहा।

याद आया कि पतंजलि के रामदेव जी ने भी दवा मार्केट में उतार रखी है। मास्क लगा कर दुकान से वह दवा – कोरोनिल और अणु तेल भी ले आया। उसका भी सेवन प्रारम्भ कर दिया।

कुल मिला कर, मात्र आशंका में, करीब दो हजार रुपये का खर्च कोविड-प्रबंधन की प्रारम्भिक तैयारी में हो गया। … भय ऐसा था कि कोई कुछ और भी बताता तो उसपर बिना इकनॉमिक प्रूडेंस की कसौटी पर कसे, मैं मुक्त हस्त खर्च करने की मानसिकता में जी रहा था।  

घर में अन्य लोगों को बिना बताये मैं घर की ऊपर वाली मंजिल का चक्कर भी लगा आया। वहां एक कमरा अटैच्ड बाथ के साथ है जिसे किसी अतिथि के आने पर ही इस्तेमाल किया जाता है। घर में आईसोलेशन की व्यवस्था – बड़े, खुले, हवादार परिसर और बिजली-पानी की सुविधा युक्त उपलब्ध है। वहां वातानुकूलन नहीं है, पर कोविड के मरीज को एयर कण्डीशंड कमरे की क्या आवश्यकता? मैं अपने आप को मानसिक रूप से पृथकवास के लिये तैयार करने लगा।

रितम बोस जी और डाक्टर उपाध्याय की सुझाई दवाओं और बाबा रामदेव की कोरोनिल/अणु तेल के सेवन से सुधार दिखने लगा। चौथे दिन मेरी खांसी कम हो गयी। मेरी आवाज में खरखराहट और स्वर का फटना भी लगभग खत्म हो गया। पाँचवें दिन स्वास्थ्य (सिवाय कमजोरी के) सामान्य था। कोरोना संक्रमण का भय समाप्त हो चुका था। पर पांच दिन इस अज्ञात और निदान रहित रोग की आशंका में डूबते उतराते बीते। ये मानसिक रूप से डूबते उतारते पांच दिन याद रहेंगे।

अब, आज पांचवें दिन की रात में, जब यह लिखने बैठा हूं तो शरीर पूरी तरह सामान्य हो गया है। किसी प्रकार की कोई व्यग्रता नहीं है। यह जरूर मन में है कि आगे से मास्क के प्रयोग, सेनीटाइजर, हैण्डवाश और अन्य लोगों से सम्पर्क आदि के विषय में पहले से ज्यादा सतर्कता बरतूंगा। जो आशंका की पीड़ा झेली है, वह पुन: नहीं झेलना चाहूंगा।

हुआ क्या रहा होगा?

वह छह सितम्बर की सुबह थी। सवेरे जल्दी उठ गया था तो साइकिल ले कर निकल गया था अगियाबीर के गंगातट लूटाबीर की तरफ। कुआर का महीना है। साफ आसमान रहता है और नमी-गर्मी के कारण उमस रहती है। सवेरा जरूर ठण्डा होता है। गंगा किनारे बबूल के झुरमुट में और भी शीतल था वातावरण। उस विषय में यह थी शिड्यूल की गयी ट्वीट –

लूटाबीर से लौटते समय अपने मित्र गुन्नीलाल पाण्डेय के यहां चाय के पहले दो गिलास पानी भी पी लिया – साइकिल चलाने के कारण पसीना निकला था और प्यास लगी थी।

रास्ते में एक सज्जन, प्रेम शंकर मिश्र जी ने मेरी साइकिल रोक कर अपनी व्यथा सुनाने का उपक्रम किया था। उस समय मैंने मास्क नहीं पहना था पर खुली सड़क पर उनसे दो गज से ज्यादा की ही दूरी थी।

प्रेम शंकर मिश्र जी

रास्ते में करहर की बनिया की दुकान से किराने का सामान भी लिया था पर मास्क लगा कर। उसके बाद सेनिटाइजर से हस्त प्रक्षालन भी किया था –

घर आने पर पसीने से तरबतर टी-शर्ट उतार कर उघार बदन वातानुकूलित कमरे में पंखे की हवा ने शायद अपना करतब दिखा दिया। जुकाम सा महसूस हुआ जो तेजी से बढ़ता गया। कुछ घण्टों में हल्की खांसी भी आने लगी। लगा कि यही सब कोरोना संक्रमण में भी होता है। खांसी आने पर घर में हर व्यक्ति शक की निगाह से देखने लगा और भय लीनियर की बजाय एक्स्पोनेंशियल बढ़ने लगा।

सांझ होते होते यह लगने लगा कि कोविड संक्रमण की प्रबल सम्भावना हो गयी है। … मेरे ख्याल से यही हुआ होगा।

अपने घर से बाहर जाने और लोगों से मिलने जुलने का मैंने पिछले पांच सात दिन का सूक्ष्म स्मरण किया। मुझे कोई ऐसा दृष्टांत नहीं मिला, जिसमें अनवश्यक जोखिम मैंने उठाया हो। अगर कार्डबोर्ड, पॉलीथीन या धातु की सतहों के स्पर्श से संक्रमण फैलता हो, तो एक दो प्रकरण अवश्य मिल सकते हैं जब उन सतहों को छूने के बाद, बिना हाथ सेनिटाइज किये अपने मुँह या आंखों को खुजलाया हो या मास्क को सेट किया हो। आगे उस तरह की सम्भावनायें भी मिटानी होंगी।

सीरॉलॉजिकल सर्वे और एक नया कोण

आज जब यह लिख रहा हूं तो आईसीएमआर की मई महीने की एक सीरॉलॉजिकल सर्वे के बारे में एक खबर अखबारों में है। इस खबर के अनुसार यह माना जा सकता है कि कोविड-19 संक्रमण के जितने मामले सामने आये हैं, उससे करीब सौ गुणा लोग संक्रमित हो कर ठीक भी हो चुके हैं। चुपचाप। उनमें कोरोनावायरस के प्रति रोग प्रतिरोधक एण्टीबॉडीज पायी गयी हैं। क्या पता यह भी हो कि मुझे भी इन पांच दिनों में कोविड संक्रमण हुआ हो और उसके बाद शरीर में उपयुक्त एण्टीबॉडीज जनित हो गयी हों। उस दशा में मेरे परिवार के अन्य सदस्य भी शायद इसी तरह संक्रमित और उबर जाने वाले हों, या उबर चुके हों।

आखिर, कोविड-19 संक्रमण इतना चंचल, इतना अनप्रेडिक्टेबल और इतना अनिश्चित प्रकार का पल पल म्यूटेट हो जाने वाला विषाणु है कि पूरे निश्चय से इसमें जुटे संक्रमण वैज्ञानिक (वाइरोलॉजिस्ट), इम्यूनोलॉजिस्ट या एपीडिमियोंलॉजिस्ट एक दिन जो कहते हैं, दूसरे दिन उसके उलट कहने पर बाध्य हो जाते हैं। और तीनों प्रकार के विशेषज्ञ अपने कहे से पल्टी मार चुके हैं – एक नहीं कई बार।

हम जन-सामान्य तो केवल उनके लेखों का आपने अल्प बुद्धि से पारायण करने और उनके अनुसार अपना कोर्स ऑफ एक्शन तय करने में ही सारी ऊर्जा लगा रहे हैं।

फिलहाल मैं प्रसन्न हूं कि कोरोना संक्रमण में जाते जाते बच गया हूं। जी हाँ, बच ही गया हूं! यह एहसास मरीज के अस्पताल से ठीक हो कर घर लौटने जैसा ही है! 😁