इस गांव में भारत की अर्थव्यवस्था में ब्रेक लगे दिखते हैं

कुल मिला कर एक सवारी गाड़ी का रेक और चार बसें यहां मेरे घर के बगल में स्टेबल हैं। … यानी अर्थव्यवस्था को ब्रेक लग चुके हैं और उसे देखने के लिये मुझे अपने आसपास से ज्यादा दूर नहीं जाना पड़ रहा।


यह अनूठा गांव है। मेरे घर से तीन सौ कदम दूर पूर्वोत्तर रेलवे की प्रयागराज-वाराणसी रेल लाइन का कटका स्टेशन है। और उससे करीब 700 कदम आगे ग्राण्ड ट्रंक हाईवे है – शेरशाह सूरी मार्ग। दूसरी ओर घर से दो किलोमीटर – या उससे कम – दूर गंगा नदी हैं। गंगा के किनारे जो पगडण्डी नुमा सड़क है, वह कभी भारत का उत्तरापथ हुआ करता रहा होगा। मगध – काशी से सुदूर पश्चिम के अफगानिस्तान की भारत की सीमा को जाता हुआ।

और यहां मुझे अपने साथी – अपनी साइकिल – से केवल 10-15 मिनट घूमना होता है; देश की अर्थव्यवस्था की नब्ज जानने के लिये।

कटका रेलवे स्टेशन पर पहले एक मालगाड़ी खड़ी दिखा करती थी। प्रयागराज में ट्रेने लेने का एक जबरदस्त बॉटलनेक हुआ करता था। कालांतर में वह खत्म हो गया। उसके बाद यहां रेल के दोहरीकरण का काम भी हुआ। खण्ड का विद्युतीकरण भी। ट्रेनों का खड़ी दिखना कम हो गया। रफ्तार भी बढ़ गयी। पर पिछली साल गजब हुआ जब अप्रेल-मई के दो महीने में एक भी गाड़ी इस खण्ड पर चलती नहीं दिखी। वैसी दशा इस साल अप्रेल-मई में नहीं है। पर बहुत बेहतर भी नहीं है।

काशीविश्वनाथ एक्सप्रेस का स्टेबल किया रेक, कटका रेलवे स्टेशन की लूप लाइन में।
अर्थव्यवस्था को दूसरी बार ब्रेक लगे हैं। तीसरी बार भी लगेंगे ही। इस दौरान चुनाव भी होंगे। उसमें जनता क्या गुल खिलायेगी, वह भी देखने का विषय है। अर्थव्यवस्था, राजनीति और समाज – इनपर अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बो होता रहेगा। खेला इतनी जल्दी निपटने वाला नहीं लगता।

इस साल यहां काशी विश्वनाथ एक्स्प्रेस का एक रेक लम्बे समय से स्टेबल पड़ा रखा है। यह बनारस के मण्डुआडीह बेस का है। लगता है ट्रेनें निरस्त होने के कारण उन के रेकों को छोटे स्टेशनों पर सहेज कर रख दिया गया है। उसी कारण से कटका स्टेशन आबाद हो गया है।

मेरी पत्नीजी का कहना है कि व्यर्थ में कोविड बेड्स की हाय तोबा है। काशी विश्वनाथ के इस रेक के वातानुकूलित डिब्बों में ऑक्सीजन सप्लाई कर मरीज रख देने चाहियें और पास के डाक्टरों को पीपीई किट दे कर उनके इलाज में लगा देना चाहिये। आखिर वैसे भी कोरोना की कोई रामबाण दवा तो है नहीं। पचानवे परसेण्ट मरीज यूंही और बाकी दस परसेण्ट ऑक्सीजन लगा कर ही ठीक हो रहे हैं। उन दस परसेण्ट का इंतजाम इस रेक में हो सकता है।

कटका स्टेशन के दूसरी ओर चार बसें खड़ी हैं। उनको उनके मालिक बनारस से नागपूर, अमरावती, इंदौर आदि के लिये चलाते थे। सारा यातायात ठप है तो बसों को शहर में खड़ा करने की जगह नहीं होने से यहां उन्हें स्टेबल कर दिया है।

कटका स्टेशन के दूसरी ओर चार बसें खड़ी हैं।

बसों को स्टेबल करने के लिये यह बहुत सही जगह है। एक घण्टे के नोटिस पर पास के हाईवे से बसें बनारस पंहुचाई जा सकती हैं। मुसई (आरवीएनएल – रेल विकास निगम – के गोदाम का चौकीदार, असली नाम भगवानदास) लगभग फ्री में उनकी चकीदारी भी कर देता है।

मुसई बहुत विनोदी जीव है। मैं जब वहां चित्र लेने जाता हूं तो वह हंसता हुआ हाथ जोड़ कर मिलता है – “फोटो ले लीजिये। ये बसें मैंने खरीद ली हैं! सस्ते में मिल गयीं थी।”

“ये चार बसें खरीदी हैं!” – मुसई उर्फ भगवानदास

कुल मिला कर एक सवारी गाड़ी का रेक और चार वातानुकूलित बसें यहां मेरे घर के बगल में स्टेबल की हुई पड़ी हैं। जिनका काम औसत 55-60 किमीप्रघ की रफ्तार से चलना था और देश के लिये अर्जन करना था, वे पखवाड़े से ज्यादा समय से यूंही खड़ी हैं। यानी अर्थव्यवस्था को ब्रेक लग चुके हैं और उसे देखने के लिये मुझे अपने आसपास से ज्यादा दूर नहीं जाना पड़ रहा।

अभी दूसरी वेव है। साइण्टिफिक एडवाइजर साहब धमका गये हैं कि तीसरी वेव भी आयेगी। दूसरी वेव के पहले भी उसके आने को ले कर धमका गये होते तो सीन शायद कुछ और होता। खैर, अब तीसरी वेव तक पता नहीं टीके लग भी पायेंगे कि नहीं पूरी जनता को, पता नहीं ऑक्सीजन का मुकम्मल इंतजाम होगा भी या नहीं। या ऑक्सीजन का इंतजाम हो भी जाये तो कुछ और कारण से जानें चली जायें। व्यवस्था की जहालत को तो अपना जलवा दिखाने के कई बहाने हो सकते हैं।

अर्थव्यवस्था को दूसरी बार ब्रेक लगे हैं। तीसरी बार भी लगेंगे ही। इस दौरान चुनाव भी होंगे। उसमें जनता क्या गुल खिलायेगी, वह भी देखने का विषय है। अर्थव्यवस्था, राजनीति और समाज – इनपर अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बो होता रहेगा। खेला इतनी जल्दी निपटने वाला नहीं लगता।


वह टीका नहीं लगवाना चाहते

उनके जैसे बहुत से लोग जैसा चल रहा है चलने देना चाहते हैं। भले ही लस्टम पस्टम चले, पर लॉकडाउन न होने से नून-रोटी तो चल रही है। उनके जैसे बहुत से लोगों को कोरोना टीके को ले कर भ्रांतियां और पूर्वाग्रह हैं।


सवेरे दूध लेने जाना होता है। पूरी एहतियाद बरतते। आज आगे बढ़ कर किराने की दुकान तक चला गया। सवेरे साढ़े छ बजे कोई चहल पहल नहीं थी। किराना वाले अपनी दुकान के बाहर बैठे थे। सामान उनकी दुकान में कुछ मिला, कुछ नहीं मिला। नवरात्रि में बिक गया तो इनवेण्टरी भरने के लिये बनारस जाना नहीं हो पाया। बोले – “चार पैसा कम कमायेंगे, पर जान सांसत में कौन डाले बनारस जा कर”।

यहां भी कोरोना के केस सुनाई पड़े हैं?

“नहीं। बाजार में तो नहीं, आसपास के गांवों में तो हैं। कल ही फलाने गांव का एक पैंतीस साल का लड़का सांस की तकलीफ में तड़फ तड़फ कर मर गया। बाहर से आया था। घर वाले कहीं ले भी नहीं जा पाये इलाज के लिये। कोई इलाज नहीं हुआ। पर कोरोना ही रहा होगा।”

आप तो सकुशल हैं न?

“हां, हम तो बच कर रह रहे हैं। दुकान भी चल रही है। लस्टम पस्टम। लॉकडाउन नहीं है तो नून-रोटी का इंतजाम हो जा रहा है। परिवार में पांच लोग हैं। तीन बच्चे और दो हम लोग। काम चल रहा है।”

कोरोना का टीका लगवाया?

“नहीं। और लगवाने का विचार नहीं है। लगवाने पर लोग बीमार हो जा रहे हैं। और लगवाने पर भी तो कोरोना हो रहा है!”

ऐसा नहीं है। मुझे ही देख लें। मैंने और मेरी पत्नी ने दोनो टीके लगवाये हैं। हमें तो कोई तकलीफ नहीं हुई। कोई बीमार नहीं हुआ। – मैंने कहा।

“आपकी तो इम्यूनिटी अच्छी है। आप साइकिल चलाते हैं। व्यायाम करते हैं। हम लोगों का क्या, दिन भर दुकान पर रहना होता है।”

इम्यूनिटी? डाइबिटीज, हाइपर टेंशन, थायराऑइड… अनेक चीजों की सवेरे छ और शाम को तीन गोली रोज लेता हूं। फिर नींद की उचट जाने की समस्या अलग। आपको भी इतना है?

वे दुकान वाले लजा गये। बोले – “नहीं वैसा तो नहीं है। ईश्वर की कृपा से कोई दवाई नहीं लेनी पड़ती। नींद तो सात घण्टा कस कर आती है। जगाने पर भी जागता नहीं हूं।”

तब तो आप टीका लगवा लीजिये। टीका न लगवाने पर 1000 में से एक को कोरोना हो रहा है और लगवाने वाले को दस हजार में दो या तीन का औसत आ रहा है। … फिर मान लीजिये कि टीका कुछ नहीं डिस्टिल वाटर ही है। लगवाने में घाटा क्या है। मुफ्त में ही तो लग रहा है! मैंने तो ढ़ाई सौ रुपया देकर लगवाया है। – मैंने दुकानदार वाले सज्जन को जोश दिलाया।

उन्हें समझ आया कुछ कुछ शायद। बोले – “देखिये, दो चार दिन में मौका देख कर लगवाता हूं। वैसे इस दौरान आपने इतनी बात की। हालचाल पूछा। यह बहुत अच्छा लगा। वर्ना आजकल का टाइम तो बड़ा ही मुश्किल है।”

दुकान वाले सज्जन

उनका चित्र खींचा तो बोले – “अरे, फोटो का इस्तेमाल मत करियेगा।” मैंने उन्हे भरोसा दिलाया कि उनकी आईडेण्टिटी जाहिर नहीं करूंगा। यद्यपि पूरी मुलाकात में मुझे ऐसा कुछ भी लगता जो अनुचित या विवादास्पद हो। उनकी तरह बहुत से सामान्य आदमी, अपनी आशंकायें, समस्यायें लिये हैं। उनके जैसे बहुत से लोग जैसा चल रहा है चलने देना चाहते हैं। भले ही लस्टम पस्टम चले, पर लॉकडाउन न होने से नून-रोटी तो चल रही है। उनके जैसे बहुत से लोगों को कोरोना टीके को ले कर भ्रांतियां और पूर्वाग्रह हैं।

आशा है, वे टीका लगवा लेंगे!