आत्मनिर्भरता का सिकुड़ता दायरा

अब हताशा ऐसी है कि लगता है आत्मनिर्भरता भारत के स्तर पर नहीं, राज्य या समाज के स्तर पर भी नहीं; विशुद्ध व्यक्तिगत स्तर पर होनी चाहिये। “सम्मानजनक रूप से जीना (या मरना)” के लिये अब व्यक्तिगत स्तर पर ही प्रयास करने चाहियें।


देश के आत्मनिर्भर होने की बात हो रही थी। फिर कोरोना की दूसरी लहर आ गयी। प्रचंड लहर – जिसमें समाज, राजनीति और अर्थतंत्र के कई किले हिल गये। देश सब देशों से सहायता स्वीकार करने लगा। मैंने पढ़ा कि देश ने दक्षिण भारत में आयी सुनामी की भयंकर आपदा में भी विदेशी सहायता को विनम्रता से मना कर दिया था; पर अब किसी भी देश की, भले ही केवल प्रतीकात्मक मदद हो, स्वीकार करने लगा।

हमारा गोलपोस्ट भारत की आत्मनिर्भरता से हट सा गया। अब हताशा ऐसी है कि लगता है आत्मनिर्भरता भारत के स्तर पर नहीं, राज्य या समाज के स्तर पर भी नहीं; विशुद्ध व्यक्तिगत स्तर पर होनी चाहिये। “सम्मानजनक रूप से जीना (या मरना)” के लिये अब व्यक्तिगत स्तर पर ही प्रयास करने चाहियें।

हमारी स्वस्थ्य, शिक्षा, संचार, बिजली, पेयजल आदि अनेकानेक क्षेत्र की सुविधायें उस स्तर की नहीं हैं, जिस स्तर की होनी चाहियें। इण्डिया (शहरी) में तो कुछ हद तक दशा ठीक हो भी सकती है, भारत (ग्रामीण) में तो यह सब तनिक भी संतोषप्रद नहीं है।

इसलिये व्यक्तिगत आत्मनिर्भरता की कवायद तो मेरे लिये तब से प्रारम्भ हो गयी थी, जब मैंने इण्डिया से रीवर्स माइग्रेशन कर भारत (गांव) में बसने का इरादा बनाया था।

यह 800 मीटर ट्रेंच खोदी गयी थी 2015 में बीएसएनएल द्वारा मेरे घर में ब्रॉडबैण्ड केबल डालने के लिये। पर यह जंतर चला नहीं!

मैं जब अपनी रेल सेवा की समाप्ति पर गांव में रहने की सोचने लगा था, तो इसका मुझे पूरा अहसास था। मेरे लिये यह कोई अप्रत्याशित दुस्वप्न सा नहीं था। रिटायर होने के कुछ महीने पहले ही मैंने वाराणसी के बीएसएनएल के महाप्रबंधक महोदय से मुलाकात कर अपने लिये लैण्डलाइन फोन और उसपर डाटा कनेक्शन का इंतजाम किया था। पर वह प्रयत्न बहुत कारगर रहा नहीं एक दो साल में ही स्पष्ट हो गया कि बीएसएनएल अपनी सेवाओं का रखरखाव कर ही नहीं पाता। वह उद्यम लगभग बेकार गया।

अंतत: अब घर में 40 फिट ऊंचे एक पोल पर छोटा एण्टीना लगवाया है जो 8 किमी दूर एयरटेल के टावर से लाइन‌-ऑफ‌-साइट सम्पर्क में रहता है और उससे 3एमबीपीएस का डाटा लिंंक 1100रुपये महीने के खर्चे पर मिलता है। दस हजार का एकमुश्त खर्च और महीने का किराया डाटा के बारे में आत्मनिर्भरता दे रहा है। व्यक्तिगत आत्मनिर्भरता।

अपने व्यक्तिगत प्रयासों से ही संचार, जल और विद्युत के सिस्टम बने हैं। घर के ऊपर लगे सोलर पैनल, पानी की टंकियां और डाटा के लिये लोहे के पोल पर लगी है छतरी।

इसी प्रकार बिजली के इंतजाम के लिये घर का लोड कम होने पर भी मैंने 5केवीए का कनेक्शन लिया जिससे तीन फेज मिलते रहेंं। यहां जब बिजली आती भी है तो एक फेज में ही आती है। कौन से फेज में आयेगी वह तय नहीं होता। तीनों फेज होने पर हम बदल बदल कर देखते हैं और सबसे उपयुक्त फेज का चयन करते हैं। पर कई बार तो एक हफ्ता भर बिजली गुल रही। जेनरेटर के द्वारा ही काम चलाया। वह बहुत मंहगा लगा तो हार कर दो केवीए का सोलर पैनल/इंवर्टर सिस्टम लगवाया। उस सिस्टम में डेढ़ पौने दो लाख का खर्चा आया। अब बिजली के बारे में संतोषजनक व्यक्तिगत आत्मनिर्भरता मिल सकी है। अब बिजली विभाग का निहोरा उतना नहीं रहा।

पानी के बारे में तो शुरू से ही पता था कि गांव में कोई सिस्टम है ही नहींं। सो शुरू से ही एक बोर कर 2000लीटर के पानी स्टोरेज की टंकी रख कर घर की पानी की सप्लाई सुनिश्चित की। घर के सभी हिस्सों में पाइप्ड जल व्यवस्था किसी सरकारी प्रणाली पर नहीं; व्यक्तिगत आत्मनिर्भरता के आधार पर है।

स्वास्थ्य के बारे में तो पहले से मालुम था कि सरकारी तंत्र डिफंक्ट है। गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र है। वहां कभी डाक्टर आते हों, ऐसा सुना नहीं। ऑग्जिलरी नर्स मिडवाइफ (ए.एन.एम.) प्रसव सम्बंधी मामलों में कुछ करती हैं। बच्चों का प्रारम्भिक टीकाकरण करती हैं और जच्चा-बच्चा को जो शुरुआती इनपुट्स मिलने चाहियें; उनका कुछ प्रबंधन करती है। इससे प्रसव और उसके आसपास की चाइल्ड मोर्टालिटी जरूर कम हुई है। पर उसके बाद बच्चे कुपोषित रहते हैं – उसका कोई इंतजाम नहीं। मैंने पता करने का प्रयास किया कि स्वास्थ्य केंद्र आयरन और क्लोरीनेशन की दवाइयाँ गांव में देता है या नहीं। पता चला कि ब्लॉक अस्पताल से इस प्राथमिक केंद्र तक वह कुछ पंहुचता ही नहीं।

बाकी किसी भी बीमारी में लोग आसपास के झोलाछाप डाक्टरों का ही सहारा लेते हैं। आधे मर्ज तो दवा की दुकान वाला ही दवायें बता और बेंच कर ठीक करता है। भला हो कि पास में एक सूर्या ट्रॉमा सेण्टर और हॉस्पीटल खुल गया, जहां मेरे पिताजी और मेरे परिवार का समय से इलाज हो पाया। अन्यथा मेरी रीवर्स माइग्रेशन की पूरी की पूरी अवधारणा ही ध्वस्त हो जाती। उसमें जितना खर्चा मेरा हुआ, वह सामान्य ग्रामीण अफोर्ड नहीं कर पायेगा। वह इन्तजाम भी प्राइवेट या व्यक्तिगत प्रयत्न के आधार पर ही हुआ। सरकार का उसमें कोई योगदान नहीं, या है भी तो न्यूनतम। अब कुछ लोगों को वहां आयुष्मान-भारत के तहद इलाज मिलता है। पर उससे झोलाछाप स्वास्थ्य उद्योग पर खास फर्क नहीं पड़ा है।

गांव में मेरे घर की छत पर आत्मनिर्भरता के प्रतीक

यही हाल शिक्षा का रहा। कोरोना काल में मैंने अपनी पोती को पढ़ाने के व्यक्तिगत प्रयोग किये। देखें ये ब्लॉग पोस्ट लिंक – एक, दो। बायजू के पैकेज पर 56हजार रुपया खर्च किया। पर अंतत: अपने लड़के के परिवार को प्रयागराज शिफ्ट करना पड़ा। यहां घर से निकलते ही दस कदम पर सरकारी स्कूल है। जहां सरकार ने खूब पैसा झोंका है। पर वहां मास्टर-मास्टरानियों में बच्चों को पढ़ाने का कोई जज्बा ही नहीं है। साल भर तक गांव के बच्चे यूं ही मटरगश्ती करते रहे हैं। यूं, जब स्कूल चलता भी था, तब भी वे मुख्यत: बंटने वाले भोजन, स्कूली यूनीफार्म, जूते, किताबें, स्टेशनरी आदि के लिये ही जाते थे। बाकी, जो मांं-बाप कुछ खर्च कर सकते हैं, वे ट्यूशन का सहारा लेते हैं। कुल मिला कर सरकारी इनपुट, शिक्षा के क्षेत्र में निरर्थक ही हैं।

सरकार फिर क्या है?

सरकार का रोल इतना है कि घर से निकलने पर मुझसे कोई छिनैती नहीं करता। अस्सी-नब्बे पार्सेण्ट लोग सड़क पर बांये चलते हैं। पुलीस को डायल करने पर वह आ जाती है। उसके बाद भले दोनो पार्टियों से पैसा खाती हो, पर उसके भय से कुछ नियम पालन होता है। राशन वाला लोगों को; थोड़ा बहुत काट कर ( कोटेदार बड़ी बेशर्मी से कहता है – आखिर हमारा भी तो पेट है!); राशन दे देता है। सरकारी मदद का पैसा लोगों के खाते में आ जा रहा है। … इसी तरह के आठ दस और लाभ हैं सरकार होने के। बाकी, फलाना एमएलए दबंग है, ढिमाका एमपी दागी है। फलाने राज्यसरकार के मंत्री के (कोरोनाकाल में) लड़के की शादी झकाझक हुई। उनका मकान जैसा बन रहा है कि पूछो मत … ऐसा ही सब सुनने में आता है। इन सब को हम इसलिये झेलते हैं कि हम ही लोगों ने इनको जिताया है। मोदी जी के नाम पर लैम्प-पोस्ट को भी वोट दिये थे। सोचते थे की मोदी-योगी की सरकार आने पर फर्क पड़ेगा, पर उत्तरोत्तर एक मायूसीयुक्त उदासीनता मन में घर करती जा रही है।

मैं उत्तरोत्तर और सोचता हूं। आयुष बनाम आईएमए के डाक्टर्स और आयुर्वेद बनाम एलोपैथी का टण्टा मात्र बौद्धिक क्लास का मानसिक मनोविनोद है। बाबा रामदेव का एलोपैथी और उसके डाक्टरों को लुलुहाना और डाक्टरों का उनकी अप्रमाणिक दवा पद्धति को गरियाना गांव के स्तर पर कोई मायने नहीं रखता जहां कोई पैथी नहीं है। न लोगों के पास पैसा है, न दवाई, न ऑक्सीजन कंसंट्रेटर, न अस्पताल के बिस्तर और न डाक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ। आदमी अपने हाल पर है। और तो और आम ग्रामीण के पास वैज्ञानिक सोच और जानकारी का भी घोर अभाव है।

क्या किया जा सकता है कोरोना की अगली वेव के लिये? यह तो लगता है कि सरकार चाहे जितना कहे, उसके बस की है नहीं। स्वास्थ्य और प्रशासनिक मशीनरी इतनी जर्जर है कि उसमें किसी आमूलचूल परिवर्तन की अपेक्षा की नहीं जा सकती। जो कुछ करना होगा, अपने स्तर पर करना होगा। वैसे ही, जैसे अपने घर के लिये ट्यूब वेल का पानी, सोलर बिजली, छतरी वाला डाटा-संचार सिस्टम का इंतजाम मैंने किया था।

अपने स्तर पर ही स्वास्थ्य जानकारी इकठ्ठा करनी होगी। दवाओं का इंतजाम करना होगा। किसी अच्छे डाक्टर/संस्था से टेलीमेडिसन सलाह का सिस्टम सेट करना होगा, अपने पूरे परिवार का समय रहते प्राइवेट तौर पर टीकाकरण कराना होगा और अगर उपयुक्त लगे तो समय रहते एक ऑक्सीजन कंसंट्रेटर तथा एक पृथकवास कमरे का इंतजाम घर में ही करना होगा। गांव में दवा की दुकान वाला इंजेक्शन लगा सकता है। अन्यथा खुद ही सीखना होगा इण्ट्रावेनस इंजेक्शन लगाना। यह पूरा सिस्टम एक लाख का खर्चा मांगता है। वह करने पर शायद कुछ कहने भर को स्वास्थ्य आत्मनिर्भरता आ पाये। वर्ना, उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाओं के भरोसे बैठना बहुत त्रासद है।

अब कुछ न कुछ सोचना होगा इस दिशा में। अभी तक घर में फर्स्ट-एड किट होते थे। उसमें ऑक्सीमीटर तो जुड़ ही गया है। कई अन्य उपकरण और जानकारी भी जोड़ने की जरूरत अब महसूस हो रही है। यह सांसत का दौर पता नहीं कितने साल और चले।

आत्मनिर्भरता का ‘सर्किल ऑफ कंसर्न’ और ‘सर्किल ऑफ इंफ्लुयेंस’ दोनो कम कर अपना और अपने परिवार का इंतजाम करना एक प्राथमिकता लगती है। वह करने से आसपड़ोस का भी कुछ भला हो जाये तो सोने में सुहागा।

आखिर जीडी, तुम झोलाछाप डाक्टरों से बेहतर काम अपने खुद के लिये तो कर ही सकते हो। वही करो!


सूर्यमणि तिवारी – अकेलेपन पर विचार

फोन पर ही सूर्यमणि जी ने कहा था कि बहुत अकेलापन महसूस होता है। यह भी मुझे समझ नहीं आता था। अरबपति व्यक्ति, जो अपने एम्पायर के शीर्ष पर हो, जिसे कर्मचारी, व्यवसाय, समाज और कुटुम्ब के लोग घेरे रहते हों, वह अकेलापन कैसे महसूस कर सकता है?


मैं सूर्या ट्रॉमा सेण्टर गया था कोविड-19 का टीका लगवाने। वहां उनका स्मरण हो आया तो उन्हें फोन किया। सूर्यमणि जी ने बताया कि महीना से ज्यादा हुआ, वे कमर के दर्द से बेड-रेस्ट पर हैं। परेशानी ज्यादा ही है। मैं सोचता ही रह गया कि उनसे मिल कर उनका हाल चाल पूछा जाये। इसमें एक सप्ताह गुजर गया।

सूर्यमणि तिवारी

एक सप्ताह बाद उनसे मिलने गया तो उन्होने बताया कि अब तबियत कुछ बेहतर है। वे कमर में बेल्ट बांध कर अपने दफ्तर में बैठे थे। क्लीन शेव, एक जाकिट पहने, कमरे का तापक्रम 29 डिग्री सेट रखे वे काम में लगे हुये थे। मुझे अपेक्षा थी कि वे बिस्तर पर लेटे होंगे। उनका शयन कक्ष उनके ऑफिस से जुड़ा हुआ है। मन में सोचा था कि उसी रीयर-चेम्बर में उनसे मिलना होगा, पर दफ्तर में मिलना सुखद आश्चर्य था। स्मार्ट लग रहे थे वे! बीमार की तरह झूल नहीं रहे थे।

पर शायद उन्होने डाक्टर की सलाह पूरी तरह नहीं मानी। सम्भवत: उनको उनका काम दफ्तर तक खींच लाया। वैसे भी, उनके अस्पताल में अशोक तिवारी जी ने मुझे कहा था – “हां, उनके कमर में तकलीफ है। डाक्टर ने उन्हे बेड रेस्ट करने को कहा है। पर, आप उनसे पूछिये तो कि डाक्टर की बात मानते हैं क्या? जब हर आधे घण्टे में उठ कर काम देखने में लग जायेंगे तो क्या ठीक होगा दर्द? जो महीना लगता, वह दो महीना लगेगा ठीक होने में।”

फोन पर ही सूर्यमणि जी ने कहा था कि बहुत अकेलापन महसूस होता है। यह भी मुझे समझ नहीं आता था। अरबपति व्यक्ति, जो अपने एम्पायर के शीर्ष पर हो, जिसे कर्मचारी, व्यवसाय, समाज और कुटुम्ब के लोग घेरे रहते हों, जिसके स्वास्थ्य के लिये पूरा अस्पताल हो; वह अकेलापन कैसे महसूस कर सकता है?

मैं जब अपने कार्य के शीर्ष पर था तो मुझे अकेलापन नहीं, काम का बोझ और अपनी पद-प्रतिष्ठा की निरंतरता बनाये रहने का भय महसूस होते थे। चूंकि मेरे समकक्ष अन्य विभागाध्यक्ष गण इसी प्रकार की दशा में थे, उनसे शेयर भी होता था। हम में से कुछ उस पद प्रतिष्ठा, उस काम के बोझ से वैराज्ञ की बात जरूर करते थे, पर किसी ने अपनी प्रभुता छोड़ी नहीं – जब तक कि रेल सेवा से रिटायर नहीं हुये। 🙂

इसलिये मैं सूर्यमणि जी की कथन की गम्भीरता का आकलन नहीं कर पा रहा था। शीर्ष का अपना एकांत होता है। शिखर अकेला होता है। यह पढ़ा था, पर अनुभूति नहीं की थी उसकी। उसका कुछ अहसास उनसे मिलने पर हुआ।

अपने विषय में बताने लगे सूर्यमणि जी। किस प्रकार से पिताजी के निधन के बाद स्कूल की मास्टरी की, फिर व्यवसाय सीखा। इस सब के बारे में उनके विषय में पुरानी पोस्ट में जिक्र है।

उनकेे व्यवसाय में मामा लोग साथ लगे। व्यवसाय में सफलता के साथ साथ उन्होने अपने तीन मामा और उनके बारह लड़कों के भरे पूरे कुटुम्ब की देखभाल की। उस दौर में उन्होने मामा लोगों को कम्पनी में हिस्सेदारी दी। अपने भाई की समृद्धि और उनके रुग्ण होने पर इलाज में सामान्य से आगे जा कर यत्न किये। उनका निधन त्रासद था। फिर, एक मुकाम पर यह महसूस हुआ कि लोगों को भले ही साथ ले कर चले हों, वे सम्बंधी-साथी होने की बजाय परजीवी (जोंक) ज्यादा होने लगे थे। उन्हे अलग करने की प्रक्रिया कष्टदायक रही। पैसा लगा ही, मन भी टूटा।

मन टूटने के विषय में सूर्यमणि जी के मुंह से निकल गया – “यह सब देख लगता है कहीं का नहीं रहा मैं।” फिर कहा – “पर यह काम छोड़ा भी नहीं जा सकता। इतने सारे कर्मचारी निर्भर हैं। उनकी महीने की सैलरी ही बड़ी रकम होती है। काम तो करना ही होगा। इसलिये यह बेल्ट बांध कर काम कर रहा हूं।”

“मैंने काम के फेर में अपनी पत्नी जी को उतना ध्यान से नहीं सुना, जितना सुनना चाहिये था। पत्नी ‘मेहना (ताना) भी मारे’ तब भी सुनना चाहिये। और मेरी पत्नीजी तो घर परिवार के लिये बहुत समर्पित रही हैं। उनकी सुनता तो शायद इस दारुण प्रक्रिया से न गुजरना पड़ता…समय पर सुनना चाहिये था।”

“ज्ञानवैराग्यप्रकाश (भाषा वेदांत)” का मुखपृष्ठ

“आज देर तक नींद नहीं आयी रात में। सवेरे चार बजे रजनीश बाबा को फोन मिलाया। पूछा – क्या जीवन बेकार चला गया। ईश्वर कितनी परीक्षा लेते हैं?! पर मेरी परीक्षा तो राजा हरिश्चंद्र की परीक्षा की तुलना में तो कुछ भी नहीं है।”

रजनीश जी धारकुण्डी (जिला सतना, मध्यप्रदेश) आश्रम में हैं। उनका फोन नम्बर मुझे दिया कि उनसे बात कर मुझे भी अच्छा लगेगा। स्वामी जी से अभी बात नहीं की है। वे अड़गड़ानंद के गुरु स्वामी परमानंद परमहंस जी की सौ साल पहले लिखी पुस्तक “ज्ञानवैराग्यप्रकाश (भाषा वेदांत)” का पुन: प्रकाशन करने में लगे हैं। यह पुस्तक पढ़ने की प्रक्रिया में जो जिज्ञासायें होंगी, उनके विषय में रजनीश बाबा से बात करने का उपक्रम करूंगा। सूर्यमणि जी ने उस पुस्तक की फोटोकॉपी मुझे पढ़ने को दी है। पुस्तक की हिंदी भारतेंदु युगीन है। पर कण्टेण्ट तो वेदांत की किसी पुस्तक की तरह सदा-सर्वदा नवीन है।

मैंने सूर्यमणि जी से कहा – “आप यह अकेलेपन की बात करते हैं। आपके पास लोगों का मजमा लगा रहता है। दिन भर लोग आपसे मिलने के इच्छुक रहते हैं।… इन सब में पांच सात मित्र तो होंगे, जिनसे शेयर किया जा सकता हो?” उन्होने कुछ उत्तर दिया, पर मैं जो समझा, उसके अनुसार शायद पत्नी ही वह व्यक्ति हैं जिनसे शेयर किया जा सकता है, पर पत्नीजी यह तो कहेंगी ही कि “उस समय तो आप अपनी वाहावाही में रहे!”

सूर्यमणि जी अपनी बात कहते हुये आध्यात्म की ओर मुड़े। “कोई मित्र नहीं, असली मित्र तो ईश्वर हैं। पर लोगों में अध्ययन, मनन की प्रवृत्ति कम होती गयी है। लोग मन निग्रह पर ध्यान नहीं देते। ईश्वर का स्कूल खाली हो गया है। माया के फेर में हैं लोग। मायारूपी सर्प ने डंस लिया है।”

वे मन के निग्रह, ध्यान, श्वांस-प्रतिश्वांस को ऑब्जर्व करने की बात कहने लगे। उन्हे सम्भवत: अपने उमड़ते घुमड़ते विचारों – जिनमें निराशा, कर्म करने की प्रबल इच्छाशक्ति, परिस्थितियों से जूझने का संकल्प, और अपने खुद के मन निग्रह की जद्दोजहद का केलिडोस्कोप था; को व्यक्त करना था और मैं शायद (उनके हिसाब से) उसके लिये उपयुक्त श्रोता था। बड़ी साफगोई से अपनी व्यथा, अपना एकाकीपन, अपनी आध्यात्मिक जद्दोजहद मुझसे व्यक्त की। वे बोलते गये। प्रवाह से यह स्पष्ट हुआ कि वे कुछ होल्ड-बैक नहीं कर रहे। I felt honored. आजकल मुझे ऑनर्ड की फीलिंग मिलना भी लगभग नहीं के बराबर हो गया है। 😀

मैं अभी भी स्पष्ट नहीं हूं कि वे अकेलापन (Loneliness) व्यक्त कर रहे थे या अपना एकांत (Solitude)। आध्यात्म, ध्यान और जीवन के उच्च मूल्यों की बात व्यक्ति तब सोच पाता है जब मन स्थिर हो और व्यक्ति एकांत अनुभव कर रहा हो। वह एकांत (सॉलीट्यूड) – अगर आपका अभ्यास हो – भीड़ में भी महसूस किया जा सकता है। रमानाथ अवस्थी की कविता है – भीड़ में भी रहता हूं, वीराने के सहारे, जैसे कोई मंदिर किसी गांव के किनारे! … यह भी सम्भव है कि एकाकीपन अंतत: व्यक्ति को सॉलीट्यूड की ओर ले जाता हो। और उसमें धारकुण्डी के बाबाजी, स्वामी अड़गड़ानंद आदि निमित्त बनते हों। पर यह सब लिखने के लिये मेरा कोई विशद अध्ययन या अनुभव नहीं है। शायद सूर्यमणि जी के पर्सोना को और गहराई से जानना होगा। स्कूल की मास्टरी से आज तक वे घोर कर्म (या बकौल उनके कुकुर छिनौती) के साथ साथ आत्मविश्लेषण और स्वाध्याय में कितना जुटे रहे, उससे ही सूत्र मिलेंगे।

वे न केवल सफल व्यक्ति हैं, वरन सरलता और विनम्रता में सीढ़ी की बहुत ऊंची पायदान पर हैं। बहुत कुछ सीख सकता हूं मैं उनसे।

राजेश पाण्डेय, सूर्यमणि जी के भृत्य

लगभग एक घण्टा मैं और मेरी पत्नीजी उनके साथ रहे उनके दफ्तर में। इस बीच उनके भृत्य राजेश पाण्डे और उनके भतीजे प्रशांत उनके पास आये। राजेश एक बनियान नुमा टीशर्ट में थे। चाय-नाश्ता कराने पर मैं उनका चित्र लेने लगा तो राजेश को डपट कर सूर्यमणि जी ने साफ कमीज पहन कर आने को कहा। पतले दुबले राजेश का चित्र तो मैंने कमीज में ही खींचा। प्रशांत जी को तो मैं पहले से जानता हूं। उनके बारे में सूर्यमणि जी की परिचयात्मक टिप्पणी थी – “ये मेरे अर्जुन हैं!”

प्रशांत तिवारी जी के बारे में सूर्यमणि जी की परिचयात्मक टिप्पणी थी – ये मेरे अर्जुन हैं!

उनके चेम्बर में मेरी पत्नीजी और मैं उनसे डेढ़ साल बाद मिले थे। घण्टे भर उनके साथ बैठने के बाद उनसे विदा ली तो वे खड़े हो कर बोले – “आगे अब डेढ़ साल नहीं, दो तीन महीने के अंतराल में मुलाकात होनी चाहिये।” अपने कमर में बैल्ट बंधे होने के कारण उनके चलने फिरने में दिक्कत होगी, इसलिए उन्होने प्रशांत जी को कहा कि वे हमें सी-ऑफ कर आयें।

पुराने कारखाने के उनके दफ्तर के बाहर कार्पेट लाने, उतारने, बिछाने, निरीक्षण करने और समेटने की गतिविधि में 10-15 लोग लगे थे। पूरे कारखाने में बहुत से लोग होंगे। उनके अस्पताल (जो डेढ़ किलोमीटर पर है) में भी बहुत से लोग हैं और विविध गतिविधियां। इस सब के बीच इनका मालिक कहता है कि बहुत अकेलापन लगता है। और फिर वह काम में तल्लीन हो जाता है। कौन मोटिव पावर है जिसके आधार पर यह हो रहा है?!

यक्ष प्रश्न है यह। उत्तर तलाशो जीडी इसका। न मिले तो दो-तीन महीने बाद अगली मुलाकात का इंतजार करो!