पांच दिन का कोरोना संक्रमण का मेरा उहापोह

फिलहाल मैं प्रसन्न हूं कि कोरोना संक्रमण में जाते जाते बच गया हूं। जी हाँ, बच ही गया हूं! यह एहसास मरीज के अस्पताल से ठीक हो कर घर लौटने जैसा ही है!


पिछले पांच दिन इस दुविधा में निकले कि शरीर में जो कुछ हो रहा है वह कोविड-19 संक्रमण तो नहीं है। मुख्य लक्षण जुकाम के थे। उसके साथ खांसी भी जुड़ गयी। सूखी खांसी थी। सुनने वाले कहते थे कि उसकी आवाज खतरनाक सी लग रही है। बुखार नहीं था। फिर भी बार बार नापा। केवल एक ही बार 98.4 डिग्री फारेनहाइट से ज्यादा निकला। वह भी 98.7 डिग्री। सांस लेने में कोई तकलीफ नहीं थी। पर खांसी (वह भी सूखी खांसी) उत्तरोत्तर बढ़ती गयी। कुछ शारीरिक और कुछ मानसिक कारणों से लगने लगा कि शरीर अस्वस्थ है और यह दशा पहले के जुकाम-अनुभव की अपेक्षा अलग हो सकती है। यह आशंका सताने लगी कि कोरोना ने जाने अनजाने मुझे पकड़ ही लिया है।

आर्थिक तैयारी थी। मैंने एक कोरोना पॉलिसी ले रखी है। अगर कोविड पॉजिटिव का मामला बनता है और अस्पताल में भरती होने की नौबत आती है, तो इंश्योरेंस वाला ढाई लाख तो तुरंत दे ही देगा। पर आर्थिक तैयारी तो एक छोटा हिस्सा होती है कोविड प्रबंधन का। असली समस्या तो यह होगी कि कोविड संक्रमण का मामला होते ही घर का सारा सपोर्ट सिस्टम गड़बड़ा जायेगा। कोई काम पर आने वाला नहीं रहेगा। परिवार के अन्य सदस्य अगर संक्रमित हुये तो उनका भी ध्यान कौन रखेगा? घर में ही अगर आईसोलेशन की आवश्यकता पड़ी तो उसके लिये कमरे का चयन और सेवा के लिये घर के किसी व्यक्ति का सम्पर्क में रहना – भले ही दूरी बना कर हो, जरूरी होगा। वह कौन करेगा? बहुत से प्रश्न थे और जितना सोचते जायें, प्रश्न उतने ही बढ़ते जाते थे।

काढ़ा (गिलोय, दालचीनी, कालीमिर्च, लौंग आदि से बनाया) हम नित्य सवेरे चाय से पहले लेते हैं। उसकी मात्रा बढ़ा दी गयी। शाम के समय भी मुझे काढ़ा दिया जाने लगा। रक्तचाप और रक्त शर्करा नापने की आवृति बढ़ा दी, जिससे यह रहे कि दोनों निर्धारित परिमाप के अंदर रहें। पैंसठ की उम्र में किसी को-मॉर्बिडिटी का जोखिम तो घातक ही होगा!

दूसरे दिन तक खांसी बढ़ गयी और आवाज में भी (सुनने वालों के अनुसार) खरखराहट स्पष्ट लगने लगी। कोविड संक्रमण का भय और बढ़ा। मैंने आरोग्य सेतु एप्प पर देखा – आसपास की 500 मीटर की परिधि में एक व्यक्ति संक्रमित और चार अन्य “रिस्क” में थे। यह संख्या एक किलोमीटर की परिधि में बढ़ रही थी – दूरी के वर्ग के अनुपात में। कुल मिला कर यह तो लगता था कि संक्रमण फैल रहा है और वह इस गांवदेहात में भी समीप तक आ चुका है। पर अब भी – अढ़तालीस घण्टे बाद भी मुझे बुखार नहीं था और सांस लेने में कोई समस्या/अवरोध नहीं था।

यह देखने के लिये कि मेरा स्टेमिना कैसा है; डेढ़ किलोमीटर पैदल चहल कदमी कर आया और मेरी सांस सामान्य रही। उस पैदल चलने के बारे में फेसबुक पर पोस्ट भी किया था –

फिर भी, यह तो भय बना था कि आगे कहीं सांस लेने में तकलीफ न होने लगे और शरीर में ऑक्सीजन का स्तर गिरने न लगे। ऑक्सीजन और नाड़ी गति नापने के लिये आत्मनिर्भरता हेतु एक ऑक्सीमीटर खरीदने का निर्णय किया और अमेजन पर ताबड़तोड़ उसका ऑर्डर भी दे दिया।   

मैंने डाक्टर साहब को सम्पर्क करने का निश्चय किया। सूर्या ट्रॉमा सेण्टर में श्री रितम बोस ने मुझे सलाह दी कि मैं एजिथ्रोमाइसिन 500 एम जी की गोली, दिन में दो बार तीन दिन तक लूं। मेरे रिश्तेदार और प्रांतीय चिकित्सा सेवा में सीएमओ डा. उपाध्याय ने यह दवा दिन में एक बार और सिट्रीजाइन की एक गोली भी लेने को कहा।

याद आया कि पतंजलि के रामदेव जी ने भी दवा मार्केट में उतार रखी है। मास्क लगा कर दुकान से वह दवा – कोरोनिल और अणु तेल भी ले आया। उसका भी सेवन प्रारम्भ कर दिया।

कुल मिला कर, मात्र आशंका में, करीब दो हजार रुपये का खर्च कोविड-प्रबंधन की प्रारम्भिक तैयारी में हो गया। … भय ऐसा था कि कोई कुछ और भी बताता तो उसपर बिना इकनॉमिक प्रूडेंस की कसौटी पर कसे, मैं मुक्त हस्त खर्च करने की मानसिकता में जी रहा था।  

घर में अन्य लोगों को बिना बताये मैं घर की ऊपर वाली मंजिल का चक्कर भी लगा आया। वहां एक कमरा अटैच्ड बाथ के साथ है जिसे किसी अतिथि के आने पर ही इस्तेमाल किया जाता है। घर में आईसोलेशन की व्यवस्था – बड़े, खुले, हवादार परिसर और बिजली-पानी की सुविधा युक्त उपलब्ध है। वहां वातानुकूलन नहीं है, पर कोविड के मरीज को एयर कण्डीशंड कमरे की क्या आवश्यकता? मैं अपने आप को मानसिक रूप से पृथकवास के लिये तैयार करने लगा।

रितम बोस जी और डाक्टर उपाध्याय की सुझाई दवाओं और बाबा रामदेव की कोरोनिल/अणु तेल के सेवन से सुधार दिखने लगा। चौथे दिन मेरी खांसी कम हो गयी। मेरी आवाज में खरखराहट और स्वर का फटना भी लगभग खत्म हो गया। पाँचवें दिन स्वास्थ्य (सिवाय कमजोरी के) सामान्य था। कोरोना संक्रमण का भय समाप्त हो चुका था। पर पांच दिन इस अज्ञात और निदान रहित रोग की आशंका में डूबते उतराते बीते। ये मानसिक रूप से डूबते उतारते पांच दिन याद रहेंगे।

अब, आज पांचवें दिन की रात में, जब यह लिखने बैठा हूं तो शरीर पूरी तरह सामान्य हो गया है। किसी प्रकार की कोई व्यग्रता नहीं है। यह जरूर मन में है कि आगे से मास्क के प्रयोग, सेनीटाइजर, हैण्डवाश और अन्य लोगों से सम्पर्क आदि के विषय में पहले से ज्यादा सतर्कता बरतूंगा। जो आशंका की पीड़ा झेली है, वह पुन: नहीं झेलना चाहूंगा।

हुआ क्या रहा होगा?

वह छह सितम्बर की सुबह थी। सवेरे जल्दी उठ गया था तो साइकिल ले कर निकल गया था अगियाबीर के गंगातट लूटाबीर की तरफ। कुआर का महीना है। साफ आसमान रहता है और नमी-गर्मी के कारण उमस रहती है। सवेरा जरूर ठण्डा होता है। गंगा किनारे बबूल के झुरमुट में और भी शीतल था वातावरण। उस विषय में यह थी शिड्यूल की गयी ट्वीट –

लूटाबीर से लौटते समय अपने मित्र गुन्नीलाल पाण्डेय के यहां चाय के पहले दो गिलास पानी भी पी लिया – साइकिल चलाने के कारण पसीना निकला था और प्यास लगी थी।

रास्ते में एक सज्जन, प्रेम शंकर मिश्र जी ने मेरी साइकिल रोक कर अपनी व्यथा सुनाने का उपक्रम किया था। उस समय मैंने मास्क नहीं पहना था पर खुली सड़क पर उनसे दो गज से ज्यादा की ही दूरी थी।

प्रेम शंकर मिश्र जी

रास्ते में करहर की बनिया की दुकान से किराने का सामान भी लिया था पर मास्क लगा कर। उसके बाद सेनिटाइजर से हस्त प्रक्षालन भी किया था –

घर आने पर पसीने से तरबतर टी-शर्ट उतार कर उघार बदन वातानुकूलित कमरे में पंखे की हवा ने शायद अपना करतब दिखा दिया। जुकाम सा महसूस हुआ जो तेजी से बढ़ता गया। कुछ घण्टों में हल्की खांसी भी आने लगी। लगा कि यही सब कोरोना संक्रमण में भी होता है। खांसी आने पर घर में हर व्यक्ति शक की निगाह से देखने लगा और भय लीनियर की बजाय एक्स्पोनेंशियल बढ़ने लगा।

सांझ होते होते यह लगने लगा कि कोविड संक्रमण की प्रबल सम्भावना हो गयी है। … मेरे ख्याल से यही हुआ होगा।

अपने घर से बाहर जाने और लोगों से मिलने जुलने का मैंने पिछले पांच सात दिन का सूक्ष्म स्मरण किया। मुझे कोई ऐसा दृष्टांत नहीं मिला, जिसमें अनवश्यक जोखिम मैंने उठाया हो। अगर कार्डबोर्ड, पॉलीथीन या धातु की सतहों के स्पर्श से संक्रमण फैलता हो, तो एक दो प्रकरण अवश्य मिल सकते हैं जब उन सतहों को छूने के बाद, बिना हाथ सेनिटाइज किये अपने मुँह या आंखों को खुजलाया हो या मास्क को सेट किया हो। आगे उस तरह की सम्भावनायें भी मिटानी होंगी।

सीरॉलॉजिकल सर्वे और एक नया कोण

आज जब यह लिख रहा हूं तो आईसीएमआर की मई महीने की एक सीरॉलॉजिकल सर्वे के बारे में एक खबर अखबारों में है। इस खबर के अनुसार यह माना जा सकता है कि कोविड-19 संक्रमण के जितने मामले सामने आये हैं, उससे करीब सौ गुणा लोग संक्रमित हो कर ठीक भी हो चुके हैं। चुपचाप। उनमें कोरोनावायरस के प्रति रोग प्रतिरोधक एण्टीबॉडीज पायी गयी हैं। क्या पता यह भी हो कि मुझे भी इन पांच दिनों में कोविड संक्रमण हुआ हो और उसके बाद शरीर में उपयुक्त एण्टीबॉडीज जनित हो गयी हों। उस दशा में मेरे परिवार के अन्य सदस्य भी शायद इसी तरह संक्रमित और उबर जाने वाले हों, या उबर चुके हों।

आखिर, कोविड-19 संक्रमण इतना चंचल, इतना अनप्रेडिक्टेबल और इतना अनिश्चित प्रकार का पल पल म्यूटेट हो जाने वाला विषाणु है कि पूरे निश्चय से इसमें जुटे संक्रमण वैज्ञानिक (वाइरोलॉजिस्ट), इम्यूनोलॉजिस्ट या एपीडिमियोंलॉजिस्ट एक दिन जो कहते हैं, दूसरे दिन उसके उलट कहने पर बाध्य हो जाते हैं। और तीनों प्रकार के विशेषज्ञ अपने कहे से पल्टी मार चुके हैं – एक नहीं कई बार।

हम जन-सामान्य तो केवल उनके लेखों का आपने अल्प बुद्धि से पारायण करने और उनके अनुसार अपना कोर्स ऑफ एक्शन तय करने में ही सारी ऊर्जा लगा रहे हैं।

फिलहाल मैं प्रसन्न हूं कि कोरोना संक्रमण में जाते जाते बच गया हूं। जी हाँ, बच ही गया हूं! यह एहसास मरीज के अस्पताल से ठीक हो कर घर लौटने जैसा ही है! 😁


कैंची सीखना #गांवकाचिठ्ठा

भारत बहुत बदला है, पर अभी भी किसी न किसी मायने में जस का तस है। भारत और इण्डिया के बीच की खाई बहुत बढ़ी है। वह कैंची सीखती साइकिल से नहीं नापी जा सकती।


बच्चों के लिये नयी नयी तरह की साइकिलें आ गयी हैं। इक्कीसवीं सदी में बचपन गुजारने वाली शहराती नयी पीढ़ी ने गैजेट्स में उपभोक्ता की महत्ता का विस्फोट देखा है। तीन साल के बच्चे को दो पहिये वाली साइकिल ले कर दी जाती है। छोटे पहिये की उस साइकिल में पीछे दोनो ओर अतिरिक्त दो छोटे पहिये जुड़े होते हैं जिससे बच्चा चलाना भी सीख सके और उसे गिरने से बचाने को टेका भी मिलता रहे।

मेरी पोती चिन्ना पांड़े ने वैसी ही साइकिल से शुरुआत की है। अब उसे कुछ बड़ी साइकिल ले कर देनी है।शायद उसके अगले जम्नदिन पर। बच्चा जब तक बड़ा होता है, तीन चार साइकिल बदल चुका होता है। यह भी हो सकता है कि वह साइकिल चलाना सीखने के पहले स्कूटर या मॉपेड/मोटर साइकिल चलाना सीख जाये।

नये जमाने की साइकिलें। मेरी पोती की अगली साइकिल कुछ ऐसी होगी।
Continue reading “कैंची सीखना #गांवकाचिठ्ठा”

लॉकडाउन काल में मुरब्बा पण्डित काशीनाथ का व्यवसाय #गांवकाचिठ्ठा

उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री जिस तरह प्रदेश में ही व्यवसाय निर्मित करने की बात करते हैं; उसके लिये काशीनाथ पाठक (मुरब्बा पण्डित) एक सशक्त आईकॉन जैसा है।


काशीनाथ पाठक बहुत दिनो बाद कल आये। उन्हें मेरी पत्नीजी ने फोन किया था कि कुछ अचार और आंवले के लड्डू चाहियें।

ऑर्डर मिलने पर अपनी सहूलियत देख वे अपने कपसेटी के पास गांव से मोटर साइकिल पर सामान ले कर आते हैं। सामान ज्यादा होता है तो पीछे उनका बच्चा भी बैठता है ठीक से पकड़ कर रखने के लिये। कल सामान ज्यादा नहीं था, सो अकेले ही आये थे। बताया कि हमारे यहां जल्दी ही घर से निकल लिये थे। सवेरे थोड़ा दही खाया था। अब घर जा कर स्नान करने के बाद एक ऑर्डर का सामान ले कर गाजीपुर की ओर निकलेंगे। किसी बाबू साहब ने 2-3 हजार रुपये का अचार और आंवले का लड्डू मंगाया है।

लॉकडाउन में आपके बिजनेस पर कोई असर पड़ा?

Continue reading “लॉकडाउन काल में मुरब्बा पण्डित काशीनाथ का व्यवसाय #गांवकाचिठ्ठा”

काशीनाथ पाठक का मुरब्बा व्यवसाय – पुरानी पोस्ट

मेरे सामने ठोस और सफ़ल ग्रामीण उद्यमिता का उदाहरण उपस्थित था! इण्डिया अन-इन्कार्पोरेटेड! भारत की हजारों साल की रस्टिक उद्यमिता का प्रमाण। एक बेरोजगार व्यक्ति न केवल स्वयं की आजीविका कमा रहा है, वरन गांव की कई महिलाओं को रोजगार भी दे रहा है।



यह एक तीन साल पुरानी पोस्ट है। 27 मई 2017 को फेसबुक नोट्स के रूप में लिखी ।

आज काशीनाथ पाठक पुन: आये थे। आते ही रहते हैं; पर लॉकडाउन के समय नहीं आये या नहीं बुलाये गये।

काशीनाथ पूर्वांचल के ग्रामीण जीवन की सफल उद्यमिता के प्रमाण हैं। पूर्वांचल उत्तरप्रदेश का वह हिस्सा मान सकते हैं जहां शहर में कोई व्यवसाय करना कठिन है; गांव की कौन बिसात। पर काशीनाथ ने वह कर दिखाया है जो सबसे अनूठा है।

आज आने पर लॉकडाउन के दौरान चले अपने व्यवसाय के बारे में उन्होने बताया। उसका विवरण लिखने के लिये जरूरी है कि काशीनाथ का पुराना जुड़ाव आपको पता चले। इस लिये फेसबुक नोट्स से निकाल कर पुरानी पोस्ट पुन: प्रस्तुत है –


मई 27, 2017, विक्रमपुर, भदोही।

गुन्नीलाल पांडेय पानी पिलाने के साथ ऑफर करते हैं आंवले का लड्डू। या आंवले का मुरब्बा। बताते हैं कि एक सज्जन हैं कपसेटी के आगे के एक गांव से। वे अपनी मोटर साइकिल पर ले कर आते हैं ये उत्पाद।

काशीनाथ पाठक

उस दिन मैं अपनी पत्नीजी के साथ गुन्नीलाल जी के घर गया था शाम को तब ये सज्जन आये। नाम बताया – काशीनाथ पाठक। बताया कि एक शादी में जाना था पास के गांव में तो उस निमित्त आना था और साथ में अपने उत्पाद भी लेते आये। आंवले का लड्डू, मुरब्बा, करौंदे का मुरब्बा। इसके अलावा कई अन्य उत्पाद वे लाते हैं – आंवले का अचार, कैण्डी, बेल और आम के कई आईटम।

कहां से लाते हैं? प्रतापगढ़ से?

“नहीं। मेरे अपने घर में बनते हैं। घर और गांव की कई स्त्रियां इस काम में लगती हैं। … असल में पढ़ाई करने के बाद जब कोई आजीविका नहीं मिली तो मैने फूड प्रॉसेसिंग की ट्रेनिंग ली। उसके बाद अपने घर पर उत्पादन शुरू किया। दुकानदारों तक जब इस उत्पाद को पंहुचाया तो पता चला कि दुकानदार अपना बड़ा कमीशन मांगते हैं। मैने दुकानदारों का लिंक ही खत्म कर दिया। अपने ग्राहकों तक खुद ही उत्पाद पंहुचाता हूं। ग्राहकों को सस्ता मिलता है और मुझे उनसे सीधा संपर्क करने का मौका भी। मेहनत है, पर इस सब काम से मैं उतना कमा लेता हूं, जितना नौकरी कर कमाता।”

मेरे सामने ठोस और सफ़ल ग्रामीण उद्यमिता का उदाहरण उपस्थित था! इण्डिया अन-इन्कार्पोरेटेड! भारत की हजारों साल की रस्टिक उद्यमिता का प्रमाण। एक बेरोजगार व्यक्ति न केवल स्वयं की आजीविका कमा रहा है, वरन गांव की कई महिलाओं को रोजगार भी दे रहा है। कोई कार्पोरेट बैकिंग, कोई बैंक फिनांसिंग, कोई ब्राण्डिंग, कोई ऑर्गेनाइज्ड मार्केट सर्वे, कोई सम्पन्न कस्टमर बेस नहीं। पूर्वी उत्तर प्रदेश (बीमारू प्रान्त के बीमारुतम हिस्से) की उद्यमिता! जय हो!

आंवला कहां से लेते हैं?

“आंवला तो एक ठाकुर साहब के बगीचे से लेता हूं। कुल 35 पेड़ हैं उनके पास आंवला के। करौंदा, बेल आदि तो आसपास की जगहों से तलाशता-लेता हूं।”

“मुझे असली सफलता की खुशी किसी को अपना उत्पाद बेच कर नहीं होती। असली सफ़लता तब महसूस होती है, जब वे दूसरी बार मुझे बुलाते हैं मेरे उत्पादों को खरीदने के लिये।”

काशी नाथ पाठक का मोबाइल नम्बर मैने लिया। लगभग 500 रुपये का उनका उत्पाद खरीदा। खा कर देखा – वास्तव में उत्तम क्वालिटी का।

यह तय है कि काशीनाथ पाठक को मैं दूसरी बार आने के लिये कहने जा रहा हूं। और बहुत जल्दी। उनका आंवले का लड्डू और करौंदे का मुरब्बा लाजवाब है। पैकेजिंग बहुत साधारण है – कोई ब्राण्ड नहीं। पर उत्पाद की गुणवत्ता आपको बांधती है।


काशीनाथ पाठक 2017 साल से अब तक बराबर आते रहे हैं हमारे घर। उनके उत्पाद हमारे घर में और जान पहचान वालों में बहुत से लोगों द्वारा पसंद किये जाते हैं। लॉकडाउन के दौरान कैसे चला उनका व्यवसाय और क्या रहे उनके अनुभव, उसपर आज शाम को ब्लॉग पर लिखूंगा।


स्वैच्छिक लॉकडाउन या अपने पर ओढ़ा एकांतवास #गांवकाचिठ्ठा

पछुआ हवा है। लू बह रही है। वे भविष्यवक्ता जो कह रहे थे कि तापक्रम बढ़ते ही कोरोनावायरस अपने आप खतम हो जायेगा, अपनी खीस निपोर रहे हैं। ज्योतिषी लोग अपने अपने गोलपोस्ट बदल रहे हैं।


मई 25, 2020, विक्रमपुर, भदोही।

मेरी प्रवृत्ति के विपरीत है यह।

चलते चलते अचानक रुक जाना और सड़क के किनारे चाक चलाते कुम्हार का चित्र लेना, या अचानक साइकिल का हैण्डल पतली सी पगडण्डी से गंगा किनारे जाने की ओर मोड़ देना, कभी साइकिल सड़क पर खड़ी कर पतली सी मेड़ पर अपने को बैलेन्स करते चलना और दूर किसी धोख का विभिन्न कोणों से चित्र लेना – ये सब मेरे वे कृत्य हैं, जो मुझे मेरी नजर में “अपने को विशिष्ट” बनाते हैं। किसी भी दुकान पर आवश्यक/अनावश्यक चीज की तहकीकात करना और मन होने पर खरीद लेना, उसी औरों से अलग होने की अनुभूति को पुष्ट करना ही है। कभी कभी लगता है कि मैं शहर के अपने कम्फर्ट-जोन को तिलांजलि दे कर गांव में इसलिये हूं कि उस वैशिष्ट्य को निरंतर भोगना चाहता हूं। मैं अगर धनी होता, सम्पन्न होता तो उस वैशिष्ट्य की प्राप्ति के अलग औजार होते। अब जो हैं, सो हैं।

मेरी प्रवृत्ति के विपरीत है दिन में तेईस घण्टे स्वैच्छिक लॉकडाउन या एकांतवास में रहना। ऐसा नहीं है, कि मुझे भीड़ में होना प्रिय है। एकांतवास मैं चाहता हूं। पर वह जनअरण्य से दूर, अलग घूमने, देखने और सोचने का एकांतवास है। जब मैं कोविड19 संक्रमण के कारण, 23 घण्टे घर के चारदीवारी में बंद रहने का निर्णय करता हूं, तो उसमें (बावजूद इसके कि स्वयम को अंतर्मुखी घोषित करता हूं)  बहुत कुछ त्यागने का भाव है।

आज सवेरे 5 से 6 के काल की बहुत प्रतीक्षा थी। कल शाम को ही साइकिल की हवा चेक कर ली थी, कि कहीं सवेरे ऐन मौके पर हवा भरने के पम्प को खोजना-चलाना न पड़े। अपनी दाढ़ी का भी शाम को ही मुआयना कर लिया था कि कहीं सवेरे इतनी बढ़ी हुई न हो कि बाहर निकलने के पहले दाढ़ी बनाने की जरूरत महसूस हो, और वह बनाने में दस मिनट लग जायें।

भोर का समय, निपटान के लिये खेत जाने का समय।
औरतें निपटान के लिये जाती, या निपटान कर आती हुईं।

पांच बजे निकलना था, पर मैं चार पचास पर ही निकल लिया। अन्धेरा छंटा नहीं था, पर इतना भी नहीं था कि सड़क न दिखे। इक्का दुक्का लोग थे। आसपास के खेतों में धब्बे की तरह लोग दिखे निपटान करते। फसल नहीं थी, खेत खाली हैं, तो निपटान करते लोग दिखते हैं। स्त्रियाँ भी थीं। स्पष्ट है कि हर घर में शौचालय बन गये हैं, सरकारी खर्चे पर; पर लोग उनका प्रयोग उतना नहीं कर रहे, जितना होना चाहिये। उनके प्रयोग के लिये पर्याप्त पानी की आवश्यकता है। उनको साफ रखने के लिये कुछ न कुछ खर्चा जरूरी है। पर जब पानी हैण्डपम्प या ट्यूब वेल से 20-25 मीटर ढोया जाता है, तो शौचालय साफ करने के लिये पानी श्रम लगा कर ढोना जरूरी नहीं लगता। लिहाजा, शौचालय मॉन्यूमेण्ट हैं और लोग-लुगाई खेत या सड़क/रेल की पटरी की शरण में जाते हैं।

गांवकाचिठ्ठा में यह सब लिखना इसे एक सटायर का सा रूप देता है। सटायर लिखना ध्येय नहीं अत: विषय परिवर्तन करता हूं।

Continue reading “स्वैच्छिक लॉकडाउन या अपने पर ओढ़ा एकांतवास #गांवकाचिठ्ठा”

लौटे प्रवसियों की प्राथमिकता कोरोना से बचाव नहीं, रोजगार है #गांवकाचिठ्ठा

यह जो बड़ी संख्या में आबादी आ कर गांव में टिकी है, वह यह नहीं पता कर रही कि यहां अस्पताल कितने हैं; कितने बिस्तर उनमें कोविड19 के लिये हैं; … वे यह जानना चाहते हैं कि रोजगार कब, कहां और कैसे मिलेगा।


मई 23, 2020, विक्रमपुर, भदोही

अखबार में कहीं पढ़ा कि आरएसएस ने कोई आंतरिक सर्वे कराया है जिसमें प्रवासी पलायन कर वापस आये साठ फीसदी मजदूर कहते हैं कि मौका लगने पर वे वापस लौटेंगे, अपने काम पर। मैंने जिससे भी बात की है – वापस लौटने वाले से, वह कोविड समस्या से बड़ी समस्या अपने रोजगार की मानता है। पर, फिलहाल, वापस जाने के लिये अभी लोग दुविधा में हैं।

हरिशंकर से मिला था तो उनका कहना था कि सूरत से आते समय उनके मन में यह पक्की धारणा थी कि वापस नहीं जाना है; यद्यपि उनका 10 हजार का घरेलू सामान वहां रखा हुआ है। ठाकुर साहब, जिनके कमरे में हरिशंकर किराये पर रहते थे, उन्होने अगले दो-चार महीने किराया न लेने की बात कही है। इस दौरान वैसे भी कोई और किरायेदार मिलता भी नहीं।

हरिशंकर, सूरत से वापस लौटे हैं
Continue reading “लौटे प्रवसियों की प्राथमिकता कोरोना से बचाव नहीं, रोजगार है #गांवकाचिठ्ठा”