मिट्टी बेचना


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आज देखा खेत खोद कर मिट्टी बेची जा रही है। पहले सोचा की शायद ग्राम सभा की जमीन के साथ यह खेल हो रहा है, पर पता चला कि किसान अपनी जमीन के साथ कर रहा है।
पड़ोस के एक व्यक्ति ने बताया की एक बीघा जमीन की खुदाई से लगभग 60-70 हजार कमाता है किसान। मिट्टी भट्ठा में जाती है – ईंट बनाने के लिए।
लोग अपना खून बेचते हैं। कुछ लोग गरीबी में अपनी किडनी बेचते हैं। किसान अपने खेत की मिट्टी बेच रहा है। उपमा शायद सटीक न हो। या कुछ ज्यादा ही अलंकारयुक्त हो। पर मुझे एकबारगी लगा वैसा ही।

रमेश कुमार जी के रिटायरमेण्ट अनुभव


श्री रमेश कुमार, मेरे अभिन्न मित्र। जिन्होने अपना चित्र भेजने के लिये पहली बार अपना सेल्फी लिया!
श्री रमेश कुमार, मेरे अभिन्न मित्र। जिन्होने अपना चित्र भेजने के लिये पहली बार अपना सेल्फी लिया!

रमेश कुमार जी मेरे अभिन्न मित्रों में से हैं। हम दोनों ने लगभग एक साथ नौकरी ज्वाइन की थी। दोनो केन्द्रीय विद्युत प्राधिकरण में असिस्टेण्ट डायरेक्टर थे। कुंवारे। दिल्ली के दूर दराज में एक एक कमरा ले कर रहते थे। घर में नूतन स्टोव पर कुछ बना लिया करते थे। दफ़्तर आने के लिये लम्बी डीटीसी की यात्रा करनी पड़ती थी – जो अधिकांशत: खड़े खड़े होती थी।

क्लास वन गजटेड नौकरी लगने पर जो अभिजात्य भाव होता, वह नौकरी लगने के पहले सप्ताह में ही खत्म हो चुका था। याद है कि जब एक मित्र ने बताया था कि वह अपने लिये मकान खोजने निकला तो मकान मालिक ने गजटेड नौकरी की सुन कर कहा था – “नो, यू पेटी गवर्नमेण्ट सरवेण्ट काण्ट अफ़ोर्ड दिस अकॉमोडेशन” ( नहीं, तुम छुद्र सरकारी कर्मचारी इस मकान का किराया भर नहीं पाओगे)।

खैर हम दोनों में कोई बहुत एयर्स नहीं थी सरकारी अफसरी की – न उस समय और न आज।
कालान्तर में मैं रेलवे की यातायात सेवा ज्वाइन कर दिल्ली से चला आया पश्चिम रेलवे में, पर रमेश जी केन्द्रीय विद्युत प्राधिकरण में ही रहे। उसी सेवा में उन्होने कुछ वर्ष पावर ग्रिड कार्पोरेशन की डेप्यूटेशन पर इलाहाबाद में काटे। उस समय मैं भी वहां पदस्थ था उत्तर-मध्य रेलवे में। एक जगह पर होने के कारण पुरानी मैत्री पुन: प्रगाढ़ हो गयी। वह प्रगाढ़ता आज भी बनी है।

रमेश जी रिटायर हुये इसी साल जून के महीने में। मैं सितम्बर में होने जा रहा हूं। वे इलाहाबाद और दिल्ली के बीच रहते हैं। अधिकांशत: इलाहाबाद। मैं इलाहाबाद और वाराणसी के बीच रहूंगा – अधिकांशत: कटका में। ज्यादा दूरी नहीं रहेगी। वैसे भी; मैं इलाहाबाद-वाराणसी के बीच एक मन्थली सीजन टिकट का पास बनवाने की सोच रहा हूं – जिससे इलाहाबाद आना जाना होता रहेगा। उनसे सम्पर्क भी बना रहेगा।

उस रोज रमेश जी से बात हो रही थी। अपने रिटायरमेंण्ट के बाद के लगभग ढाई महीने से वे काफ़ी प्रसन्न नजर आ रहे थे। मैने उनसे कहा कि ऐसे नहीं बन्धु, जरा अपना अनुभव ह्वाट्सएप्प पर लिख कर दे दो। उसे मैं भविष्य के लिये ब्लॉग पर टांग दूं और हां, एक चित्र – सेल्फी भी जरूर नत्थी कर देना।

इस तरह के काम में रमेश कुमार मुझसे उलट काफी सुस्त हैं। खैर, मैत्री का लिहाज रखते हुये एक दो मनुहार के बाद उनका लिखा मुझे मिल गया और थोड़ी और मनुहार के बाद सेल्फी भी।

अपनी कहता रहूं तो रमेश जी के साथ जो जीवन गुजारा है – उसपर एक अच्छी खासी पुस्तक बन सकती है। सुख और दुख – दोनों में बहुत अन्तरंग रहे हैं वे। पर यहां उनका ह्वाट्सएप्प पर लिखा प्रस्तुत कर दे रहा हूं।अन्ग्ररेजी से हिदी अनुवाद के साथ।

रमेश लिखते हैं –

आज आपसे बात कर बहुत प्रसन्नता हुई। मेरे ख्याल से आप 30 सितम्बर की काफ़ी उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे होंगे। पिछले दो महीने से अधिक से मैं अपनी रिटायर्ड जिन्दगी पूरी तरह एन्ज्वॉय कर रहा हूं। मैं किसी अनुशासित दिनचर्या पर नहीं चल रहा (सिवाय नित्य सवेरे की सैर और यदा-कदा शाम की सैर के)। मैं पढ़ता हूं – करीब तीन-चार समाचारपत्र और जो हाथ लग जा रहा है (इस समय एक से अधिक पुस्तकें पढ़ रहा हूं) तथा बागवानी करता हूं। मुझे पक्का यकीन है कि आपके पास ढेरों अपठित पुस्तकें होंगी। अब समय आ रहा है कि उनके साथ न्याय किया जाये। और आपको तो लिखने में रुचि है – आपके पास तो अवसर ही अवसर हैं अब।

मैं संगीत सुनता हूं और अब सीखने का भी प्रयास करने लगा हूं। मैं किसी न किसी प्रकार से समाज सेवा भी करना चाहता हूं – यद्यपि उसके बारे में विचार पक्के नहीं किये हैं।

मेरा डाईबिटीज़ कण्ट्रोल में है। मेरी HbA1C रीडिंग 7.3 से घट कर 6.5 हो गयी है। मुझे पक्के तौर पर नहीं पता कि यह चमत्कार कैसे हुआ, पर निश्चय ही रिलेक्स जिन्दगी, समय की किसी डेडलाइन को मीट करने की अनिवार्यता न होना, आफिस का तनाव घर पर न लाने की बात ने सहायता की है। कुल मिला कर मुझे जो करने का मन है, वह कर रहा हूं। मेरे ख्याल से हर आदमी यही चाहता है।

अगर पैसा कमाने की कोई बाध्यता नहीं है ( सरकार सामान्य और सन्तुष्ट जीवन जीने के लिये पर्याप्त दे देती है) और अगर स्वास्थ्य के कोई बड़े मुद्दे नहीं हैं तो अनेकानेक सम्भावनायें है जीवन को आनन्द से व्यतीत करने की, रिटायरमेण्ट के बाद। आप अपनी सुनें और तय करें।

मुझे बहुत उत्सुकता है आपके नये ’आशियाने’ को देखने की कटका में। ज्यादा आनन्द के लिये हंस-योग का प्रयास करें।

सस्नेह,
रमेश कुमार।


रमेश कुमार जी ने हंस-योग का नाम लिया अन्त में। इसके विषय में उनसे पूछना रह गया। सम्भवत: वे स्वामी परमहंस योगानन्द या उनसे सम्बद्ध किसी योग (क्रिया योग?) की बात कर रहे हैं। शायद उनका आशय यह है कि मैं किसी योग-प्राणायाम आदि की ओर अपना झुकाव बनाऊं।

देखता हूं, आगे क्या होता है। अभी तो मन सूर्योदय को गंगा की बहती धारा में झिलमिलाते देखने को ही ललचा रहा है! बस!


 

कटका (गांव) के लिये ब्रॉडबैण्ड की तलाश


मेरा विचार कटका/विक्रमपुर (जिला भदोही) को साल-छ महीने में सोशल मीडिया में कुछ वैसा ही प्रोजेक्ट करने का है, जैसा मैने शिवकुटी के गंगा कछार को किया था। ग्रामीण जीवन में बहुत कुछ तेजी से बदल रहा है। उस बदलाव/विकास को दर्ज करना और जो कुछ विलुप्त होता जा रहा है, उसका आर्काइव बनाना एक महत्वपूर्ण कार्य है। बहुत से लोग बहुत प्रकार से यह करने में लगे हैं। मैं इसे अपने तरीके से करना चाहता हूं।

दूसरे, यद्यपि मैं राजनैतिक जीव नहीं हूं; मेरी विचारधारा केन्द्र और दक्षिण-पंथ के बीच की है। यदा कदा प्रियंकर जी जैसों के प्रभाव में वामपंथी टाइप सोच लेता हूं – पर वह एबरेशन है। मुझे यकीन है कि साम्य-समाजवाद की पंजीरी जनता में बांटने से जनता का न भला होगा, न पेट भरेगा। न रोजगार मिलेंगे और न गांव देहात से लोगों का महानगरों को पलायन रुकेगा। … जहां मैं रहने जा रहा हूं वहां पर्याप्त गरीबी/अशिक्षा/चण्टई/चिरकुटई है। भारत की सरकार अनेकानेक प्रकार से विकास की योजनायें – विशेषत: डिजिटली गांवों को एम्पावर करने की योजनायें बता रही है। उस सब के बारे में देखना, तथा अपनी सोच को गांव में टेस्ट करना और उस विषय में लिखना – यह मेरे मन में है।

यह लेखन एक अच्छी इण्टरनेट कनेक्टिविटी मांगता है। अभी वह गांव में मुझे मिलती नजर नहीं आती।

श्री करुणेश प्रताप सिंह, महाप्रबन्धक, टेलीकॉम, वाराणसी जिला।
श्री करुणेश प्रताप सिंह, महाप्रबन्धक, टेलीकॉम, वाराणसी जिला।

बेहतर नेट कनेक्टिविटी के लिये मैने एक बीएसएनएल का लैण्डलाइन फोन और ब्रॉडबैण्ड कनेक्शन लेने का निश्चय किया। तब पता चला कि गांव के उस क्षेत्र में – जहां मेरा घर बन रहा है, कोई संचार केबल नहीं गयी है। अत: मुझे महाप्रबन्धक, टेलीकॉम महोदय से मिल कर अनुरोध करना एक सही रास्ता लगा। पिछले दिनों मैं वाराणसी जिले के महाप्रबन्धक, टेलीकॉम; श्री करुणेश प्रताप सिंह जी से मिला।

करुणेश जी ने मेरी बात ध्यान से सुनी और पूरी सहायता का आश्वासन दिया। उन्होने अपने सहकर्मियों को मेरा आवेदन स्वीकार करने और उसके क्रियान्वयन के लिये त्वरित कार्रवाई करने के लिये भी कहा। इससे बेहतर की मैं अपेक्षा नहीं करता था।

बातचीत में पता चला कि करुणेश जी पास के प्रतापगढ़ के रहने वाले हैं और पूर्वांचल के शहरी-ग्रामीण जीवन के बारे में उनकी पर्याप्त जानकारी भी है और अपनी सोच भी। जहां मैं ग्राम्य जीवन के बारे में नोश्टाल्जिया और स्वप्न के आधार पर चल रहा हूं, उनके पास ठोस धरातल का अनुभव दिख रहा था।

मेरे गांव में जाने के बारे में उन्होने बताया – “आप फिक्र न करें; वहां आपको अपना परिचय नहीं देना होगा। वे अब तक आपके बारे में इतना खोद-निकाल चुके होंगे, जितना आप खुद अपने बारे में नहीं जानते!।” 😆

“गांव में राजनीति करने वाले आपके बारे में व्यस्त हो जायेंगे और आशंकित भी होंगे कि कहीं आप राजनीति में तो पैठ नहीं करने जा रहे। दूसरे; कई लोग सोचेंगे कि सरकारी उच्च पद से रिटायर होने के कारण आपके पास ‘खूब’ पैसा होगा।” 

“सुरक्षा और स्वास्थ्य – ये ही मुद्दे हैं जिनपर आपको ध्यान देना है। अन्यथा बहुत से लोग हैं जो शहर से उकता कर शहर के आस-पास के गांवों में रहने की सोच रहे हैं – विशेषत: वे जिनके बच्चे सेटल हो कर अलग अलग रहते हैं।” 

करुणेश जी ने मेरी एक बड़ी समस्या – संचार और नेट कनेक्टिविटी – का समाधान का आश्वासन दे दिया था। एक इण्टरनेटीय कीड़े के लिये इससे ज्यादा प्रसन्नता की क्या बात हो सकती थी! उनसे मिल कर जब मैं लौट रहा था तो गांव में रहने के बारे में मेरे स्वप्न और पुख्ता होने लगे थे। पहले वे कुछ धुन्धले थे, अब उनके रंग चटक होने लगे थे।

सही व्यक्ति से और वे भी जो आपको बड़ी एकाग्रता से समय दे कर मिलें; इण्टरेक्शन कितनी प्रसन्नता दे सकता है। सरकारी क्षेत्र के अफसर भी ऐसे हो सकते हैं – यह अनुभूति बहुत सुखद लगी।


पिताजी और आजकल


पिछले अप्रेल महीने में मेरी पोती  पद्मजा को गोद ले कर खड़े पिताजी।
पिछले अप्रेल महीने में मेरी पोती पद्मजा को गोद ले कर खड़े पिताजी।

मेरे पिताजी (श्री चिन्तामणि पाण्डेय) 81 के हुये 4 जुलाई को। चार जुलाई उनका असली जन्म दिन है भी या नहीं – कहा नहीं जा सकता। मेरी आजी उनके जन्म और उम्र के बारे में कहती थीं – अषाढ़ में भ रहें। (दिन और साल का याद नहीं उन्हें)। अब अषाढ़ई अषाढ़ होई गयेन्। ( अषाढ़ में जन्मे थे। अब अषाढ जाने कितने बीत गये)।

खैर, उनका सार्टीफ़िकेट के अनुसार जन्म दिन है 4 जुलाई 1934। उनके अनुसार उनका जन्म तो 1934 में हुआ था। चार जुलाई शायद दाखिले के समय लिखा दिया गया हो।

पिछले कई वर्षों से वे गिरती याददाश्त के शिकार हैं। याददाश्त के अलावा कई साल पहले उनकी सामान्य सेहत भी तेजी से गिरने लगी थी। एलोपैथिक दवाओं से जब लाभ नहीं हुआ था तो किसी के सुझाने पर रामदेव के आउटलेट पर बैठने वाले आयुर्वेदिक आचार्य जी को दिखाया था। उनकी दवाओं – घृतकुमारी रस और अश्वगन्धा के कैप्स्यूल जिनमें थे – से बहुत लाभ हुआ। उनके हाथों में कम्पन होने लगा था। वह रुक गया। उनकी तेजी से गिरती याददाश्त की गिरावट की दर बहुत कम हो गयी थी। उनका चलना-फिरना भी पहले की अपेक्षा बेहतर हो गया।

अम्मा जी के सतत देखभाल से वे तो ठीक हो गये पर सन् 2013 मे उत्तरार्ध में घर में ही फिसलने के कारण अम्मा जी की कूल्हे की हड्ड़ी टूट गयी। उनके ऑपरेशन के लिये, उनको दी जाने वाली ब्लड-थिनर दवायें सप्ताह भर के लिये रोक दी गयी थीं। वही घातक साबित हुआ। उनका ऑपरेशन तो ठीक से हो गया और वे स्वास्थ लाभ भी कर रही थीं; पर मस्तिष्क में कहीं थक्का जम गया और दो बार उन्हे पक्षाघात हुआ। पहले आघात से उबर रही थीं। पर दूसरा घातक साबित हुआ। पिताजी ने उन्हे मुखाग्नि तो दी, पर उनके फेरे लगा कर शरीर को अग्नि को अर्पित करने और कपाल-क्रिया का कृत्य मैने पूरा किया। मेरे लड़के ने दस दिन के कर्मकाण्ड निबाहे और अन्त में पिण्ड-दान, महाब्राह्मण की बिदाई का कृत्य मैने सम्पन्न किया। परिवार की तीन पीढ़ियों के सामुहिक योग से कर्मकाण्ड सम्पन्न हुये उनके। मुझे याद नहीं कि किसी और घर में इस प्रकार हुआ होगा।

अम्मा जी के जाने के बाद मैं पिताजी को अपने साथ गोरखपुर ले आया। पिताजी के एकाकीपन के झटके और उसमें कैद हो जाने की आशंका हम सब को थी; पर गोरखपुर में एक-डेढ़ बीघे में फैला खुला बंगला, और आउट हाउस के कई चरित्र उन्हे बोलने बतियाने को मिल गये। वे अगर अम्मा के चले जाने के बाद इलाहाबाद में ही रहते तो शायद एकाकीपन और अम्मा की याद से भरा वातावरण उन्हे तोड़ता। गोरखपुर में आउट हाउस के चन्द्रिका और ध्रुव, रोज नमस्ते करने वाली महिला, बगीचे में काम करने वाला माली नारद, सफ़ाई के लिये यदा कदा आने वाला सफ़ाई जमादार, मेरे वाहन के डाइवर… ये सब उनके चौपाल के मित्र बन गये। वे कभी थक जाने पर कमरे में आ कर बिस्तर पर लेटते हैं तो कुछ सुस्ता लेने के बाद फिर उठ कर बाहर निकल लेते हैं। वहां चौपाल जमती है या फिर किसी के न रहने पर वे परिसर में चक्कर लगा कर फूल-पत्तियां-सब्जियां निहारते हैं। काम भर की सब्जियां – नेनुआ, लौकी, भिण्डी तोड कर लाते हैं। चन्द्रिका को कष्ट होता है कि समय से पहले ही तोड़ लेते हैं नेनुआ और लौकी।

अभी महीना भर पहले आधी रात मे उनकी आवाज आयी। वे मेरी पत्नीजी को बुला रहे थे। हम गहरी नींद से जगे और देखा कि उनके माथे पर चोट लगी है। खून बह रहा है। एकबारगी तो मुझे समझ नहीं आया कि क्या करूं। भाव के अतिरेक में उन्हे मैने बांहों में भर लिया – मानो वे छोटे शिशु हों। हमने उनका घाव धोया, घर में उपलब्ध दवाई लगा कर पट्टी की और उपलब्ध पेनकिलर दिया। उनके बिस्तर को ऐसे किया कि गिरने की सम्भावना न रहे।

उनसे पूछा कि चोट कैसे लगी तो वे कुछ बता न सके। बाद में भी याद नहीं आया।

अगले दिन सवेरे उन्हे हम ड्रेसिंग कराने अस्पताल ले गये। डाक्टर साहब ने बताया कि रात भर में घाव भरा है और ड्रेसिंग-दवाई से ठीक हो जायेगा। अन्यथा अगर रात में लाये होते उन्हें तो कम से कम चार-पांच टांके लगते। डाक्टर साहब ने एहतियादन सीटी-स्कैन और खून की जांच कराने के लिये कहा। वह सामान्य निकला।

बाद में अनुमान लगा कि उन्हें पोश्चरल हाइपो-टेंशन की समस्या हुई। गर्मी के मौसम में पसीने से नमक की कमी हुई शरीर में और रात में  बाथरूम की ओर जाने के लिये वे झटके से उठे होंगे तो कम रक्तचाप के कारण चक्कर आ गया होगा। जमीन पर गिरते हुये कोई कोना टकराया होगा जिससे माथे पर चोट लगी।

कई दिन तक उन्हे कमजोरी की शिकायत रही। अब वे ठीक हैं। तख्ते पर लगा उनका बिस्तर हटा कर उनचन वाली मूंज की खाट पर कर दिया गया है जिससे रात में बिस्तर से उठते समय गिरने की आशंका कम से कम हो जाये।

कटका में बनते घर को देखते पिताजी। साथ में मनीष औरदूर नीली कमीज में धर्मेन्द्र।
कटका में बनते घर को देखते पिताजी। साथ में मनीष औरदूर नीली कमीज में धर्मेन्द्र।

पिछले शुक्रवार को उन्हे हम कटका साथ ले कर गये। मैं रिटायरमेण्ट के बाद वहां सेटल होने के लिये एक छोटा घर बनवा रहा हूं। वह उन्हे दिखाना चाहता था। उसे देख कर वे सन्तुष्ट तो थे, पर उन्होने मुआयाना अपने सिविल इन्जीनियर की निगाह से ही किया। उन्हे हम खेतों में लगाये यूकलिप्टिस के प्लाण्टेशन दिखाने भी ले गये। काफी रुचि ली उनमें भी पिताजी ने।

उनकी वर्तमान की याददाश्त गड्ड-मड्ड हो जाती है। वाणी भी कई बार लटपटा जाती है। पुराना अच्छे से याद है। अपने बचपन की घटनायें और व्यक्ति वे बता ले जाते हैं। पर उन घटनाओं के क्रम में कभी कभी घालमेल हो जाता है।

कुल मिला कर वे ठीक हैं और हमें अपेक्षा है कि अगले दशक और उससे आगे भी उनकी उपस्थिति का आशीर्वाद हमें प्राप्त रहेगा।

पिताजी के साथ मेरा बेटा, पद्मजा और मैं।
पिताजी के साथ मेरा बेटा, पद्मजा और मैं।

गांव में शैलेन्द्र दुबे के साथ


शैलेन्द्र का परिवार बनारस में रहता है और वह गांव में।  चार भाइयों में दूसरे नम्बर पर है वह। चार भाई और एक बहन। बहन – रीता पाण्डेय, सबसे बड़ी है और मेरी पत्नी है।

मैं रेल सेवा से रिटायर होने के बाद गांव में रहने जा रहा हूं – शैलेन्द्र के डेरा के बगल में।

जैसे परिस्थिति वश नहीं, अपने चुनाव से शैलेन्द्र गांव में रहता है, वैसे मैं भी अपने चुनाव से गांव में ठिकाना बना रहा हूं। पूर्णकालिक रूप से। दोनों के अपने अपने प्रकार के जुनून और दोनों की अपनी अपनी तरीके की उलट खोपड़ी।

मैं गांव जाकर अपना बनता मकान देखता हूं। साथ में पिताजी को भी ले कर गया हूं कि वे भी देख लें वह जगह जहां उन्हें भविष्य में रहना है। शैलेन्द्र साथ में है मकान-निर्माण का कामकाज देखने के दौरान। उसके वेश को देख कर मेरी पत्नीजी झींकती हैं – “ये ऐसे ही घर में बनियान लटकाये रहता है”।

बनते मकान को देखने पंहुचे। बायें से - मैं, शैलेन्द्र, पिताजी, अरुण (मेरे वाराणसी मण्डल के सहकर्मी)  और रीता।
बनते मकान को देखने पंहुचे। बायें से – मैं, शैलेन्द्र, पिताजी, अरुण (मेरे वाराणसी मण्डल के सहकर्मी) और रीता।

शैलेन्द्र पायजामा-बनियान में है। गले में सफेद गमछा; जो उमस के मौसम में पसीना पोंछने के लिये बहुत जरूरी है। उसके वेश में मैं अपना भविष्य देखता हूं। मेरी भी यूनीफार्म यही होने जा रही है। अभी भी घर में पायजामा-बण्डी रहती है आमतौर पर। गमछा उसमें जुड़ने जा रहा है।

शैलेन्द्र को शहरी लोग हल्के से न लें। भदोही-वाराणसी के समाज-राजनीति में अच्छी खासी पैठ है उसकी। अगर वह घर-परिवार में मुझसे छोटा न होता तो उसके लिये ‘तुम’ वाला सम्बोधन मैं कदापि न करता। अगले विधान सभा चुनाव में मैं उसे चुनाव लड़ने और उसके बाद अगर उसके दल – भाजपा – की सरकार बनी तो मंत्रीपद पाने की स्थिति की मैं स्पष्ट कल्पना करता हूं।

सोशल मीडिया पर भी शैलेन्द्र की सशक्त उपस्थिति है। फेसबुक में उसके अधिकतम सीमा के करीब (लगभग 4900) मित्र हैं।

मेरे श्वसुर जी (दिवंगत पंण्डित शिवानन्द दुबे) की किसानी की धरोहर को बखूबी सम्भाले रखा है शैलेन्द्र ने और उनकी राजनैतिक-सामाजिक पैठ को तो नयी ऊंचाइयों पर पंहुचाया है। श्वसुर जी के देहांत के बाद एकबारगी तो यह लगा था कि उनके परिवार का गांव से डेरा-डण्डा अब उखड़ा, तब उखड़ा। पर शैलेन्द्र की जीवटता और विपरीत परिस्थितियों से जूझ कर अपने लिये राह बनाने की दक्षता का ही यह परिणाम है कि मैं भी उसके बगल में बसने और अपनी जीवन की दूसरी पारी को सार्थक तरीके से खेलने के मधुर स्वप्न देखने लगा हूं।

आगे आने वाले समय में इस ब्लॉग पर बहुत कुछ शैलेन्द्र के विषय में, शैलेन्द्र के सानिध्य में, पास के रेलवे स्टेशन (कटका) और गांव – विक्रमपुर, भगवानपुर, मेदिनीपुर, कोलाहल पुर आदि के बारे में हुआ करेगा। गंगाजी इस जगह से करीब ढाई-तीन किलोमीटर की दूरी पर हैं। सो वहां – कोलाहलपुर-तारी या इंटवाँ के घाट पर घूमना तो रहेगा ही।

बहुत कुछ शैलेन्द्र-कटका-विक्रमपुर के इर्द-गिर्द हो जायेगा यह ब्लॉग। उस सबकी मैं प्रतीक्षा कर रहा हूं। आप भी करें! 🙂

Katka