मनरेगा @ लॉकडाउन #गांवकाचिठ्ठा

जब आप गरीबी देखें; उसकी परतें खोलने की कोशिश करें, तो जी घबराने लगता है। दशा इतनी ह्यूमंगस लगती है, इतनी विकराल कि आप को लगता है आप कुछ कर ही नहीं सकते।



मेरे किराने की सप्लाई करने वाले रविशंकर कहते हैं – सर जी, आप लोगों को मदद बांट नहीं पायेंगे। भीड़ लग जायेगी। गरीबी बहुत है इस इलाके में सर जी। थक जायेंगे आप।

रविशंकर ने जो कहा, वह महसूस हो रहा है।

आप साइकिल ले कर सवेरे फोटो क्लिक करते घूम आइये। गंगा किनारे जल की निर्मलता निहार लीजिये। घर आ कर लैपटॉप पर चित्र संजो लीजिये। कुछ ट्विटर पर, कुछ फेसबुक पर, कुछ वर्डप्रेस ब्लॉग पर डाल कर छुट्टी पाइये और पत्नीजी से पूछिये – आज ब्रेकफास्ट में क्या बना है? उसमें सब बढ़िया लगता है। रिटायरमेण्ट का आनंद आता है।

पर जब आप गरीबी देखें; उसकी परतें खोलने की कोशिश करें, तो जी घबराने लगता है। दशा इतनी ह्यूमंगस लगती है, इतनी विकराल कि आप को लगता है आप कुछ कर ही नहीं सकते। या जो कुछ करेंगे वह ऊंट के मुंंह में जीरा भी नहीं होगा।

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लम्बी जटाओं वाला साधू #गांवकाचिठ्ठा

खड़ा होने पर उसकी जटाओं के घनत्व और लम्बाई, दोनो का पता चला। लम्बे कद का कृषकाय साधू तो था ही वह। लम्बे हाथ पैर। आजानुभुज! बाल उसकी लम्बाई से ज्यादा लम्बे थे। तरह तरह के साधू हैं भारतवर्ष में।


मई 31, 2020, विक्रमपुर, भदोही।

द्वारिकापुर के गंगा तट पर वह पहले नहीं दिखा था। लेकिन पास खड़े एक व्यक्ति ने जिस प्रकार से बातचीत की उससे, लगा कि इस इलाके का जाना पहचाना है।

वह था अलग प्रकार का साधू। एक लंगोटी पहने। मैंने दूर से देखा तो वह स्नान करते हुये गंगा जी में डुबकी ले रहा था। जब उसके पास पंंहुचा तो अपना गमछा कचार (रगड़-पटक कर साफ कर) रहा था किनारे पर पड़ी पत्थर की पटिया पर। कोई साबुन का प्रयोग नहीं कर रहा था। पास में कमण्डल था। चमचमाता हुआ। लगता है साधू जी उसे चमकाने में बहुत मेहनत करते हैं।

साधू की जटायें लट पड़ी हुयी और बहुत लम्बी थीं। दाढ़ी भी बहुत लम्बी। दाढ़ी तो एक गुच्छे में कई बार लपेट कर बांध रखी थी। बाल खुले थे। मुझे फोटो लेते देख पास खड़े नित्य के स्नानार्थी ने कहा – तन्नी, मोंहवा ऊपर कई लअ। (जरा मुंह ऊपर कर लीजिये)।

गमछा कचार रहा था वह साधू
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सीताराम #गांवकेचरित्र #गांवकाचिठ्ठा

नदी में इफरात है मछली की और वह उनका भोज्य नहीं है। सीताराम मुझे अलग प्रकार के प्राणी लगे। बहुत कुछ मेरे अपने जैसे।


मई 29, 2020, विक्रमपुर, भदोही।

सवेरे पांच बजे घर से निकल लेता हूं और सवा पांच – साढ़े पांच बजे के बीच द्वारिकापुर के गंगा तट पर होता हूं। वहां जाने के दो तीन कारण हैं। एक तो यह कि रास्ते में लोग कम मिलते हैं। कोरोनावायरस के संक्रमण काल में जितने कम लोगों से टकराना हो, उतना ही अच्छा। दूसरे, गंगा तट पर पंद्रह-बीस मिनट गुजारना, वह भी जब सूर्योदय का समय हो, जो आनंद देता है, उसकी तुलना किसी और स्थान के अनुभव से नहीं की जा सकती। वहां के चित्र, अनाड़ी तरीके से लिये गये चित्र भी जानदार होते हैं।

सीताराम की नाव और गंगा तट का दृष्य

करीब आधा दर्जन बड़ी नावें होती हैं वहां। सभी में डीजल इंजन फिट होता है। सब में स्टीयरिंग हैण्डल है। सब में बालू ढोने के लिये चौड़ा प्लेटफार्म है। पर उनमें से एक ही नाव है, जिसमें रहने के लिये एक ओर एक कमरा सा बना है। उस नाव पर दो लोग दिखते हैं। उनमें से एक, शायद जूनियर हो, भोजन बनाता नजर आता है। उस नाव, उसपर कण्डे की आग में चढ़ी डेगची, सब्जी काटता वह व्यक्ति – बहुत अलग सा दृष्य होता है। मेरे मोबाइल कैमरे को बहुत पसंद आता है वह दृष्य।

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यूं ही गुजरे दिन #गांवकाचिठ्ठा

आसपास देखें तो जो दुख, जो समस्यायें, जो जिंदगियां दिखती हैं, उनके सामने कोरोना विषाणु की भयावहता तो पिद्दी सी है। पर जैसा हल्ला है, जैसा माहौल है; उसके अनुसार तो कोरोना से विकराल और कुछ भी नहीं।



मई 27-28, 2020, विक्रमपुर, भदोही।

गांव, गांव ही रहेगा। मैं सोचता था कि गांव हाईवे के किनारे है, गांव के बीच में एक रेलवे स्टेशन है। रेल का दोहरीकरण हो रहा है। रेलवे लाइन का विद्युतीकरण भी हो चुका है। शायद निकट भविष्य में मेन लाइन इलेक्ट्रिकल मल्टीपल यूनिट (मेमू) वाली गाड़ियां भी चलने लगें। सड़क और रेल, दोनो पर त्वरित यातायात इसे शहर की तरह की आने जाने की सुविधा भी देगा और गांव के खुले पन का आनंद भी। पर गांव की अपनी एक गहन संकीर्णता होती है और दूसरे की जिंदगी में ताकझांक की प्रवृत्ति भी तीव्र होती है। समय बहुत होता है, स्वाध्याय की आदत विकसित नहीं होती तो परनिंदा में लोगों को रस मिलता है। इस नेगेटिविज्म का अनुभव लगभग रोज होता है। अपने को उससे अलग रख कर निस्पृह बने रहना कठिन है। कुछ सीमा तक मैं कर पाता हूं, पर कभी कभी उसमें बह भी जाता हूं। आज दिन परनिंदा वाला था। लगता है गांव की वृत्ति हावी रही मन पर।   

यह आदमी परेशान सा था, गंगा तट पर।

कोरोना काल में खीझ, एकाकीपन, औरों की दोषदर्शिता आदि मन को उद्विग्न करते हैं कभी कभी। और जब प्रसन्न होने के कारक नहीं दीख पड़ते, जब कोरोना संक्रमण के आंकड़े अपेक्षा से अधिक बढ़ते नजर आते हैं, जब देसी विदेशी समाचारपत्र भी नैराश्य परोस रहे होते हैं, जब बाजार का दुकनदार भी सलाह देता है “आपकी उम्र में बच कर रहना चाहिये”, तब लगता है कि घर के किसी कोने में दुबके रहें। कोई किताब भी पढ़ने का मन नहीं होता। पूरा दिन बीत जाता है।

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बहुत आशायें नहीं हैं किसी आमूलचूल परिवर्तन की #गांवकाचिठ्ठा

बहुत कुछ सम्भावनायें नहीं लगतीं कि कोरोना काल में वापस आये हुनरमंद लोगों का प्रयोग कर उत्तर प्रदेश चमक जायेगा। और अगर कोई चमत्कार हुआ तो वह इस प्रांत का सौभाग्य होगा। वैसे; इस प्रांत का सौभाग्य देखने की आशा में छ दशक गुजार दिये हैं मैंने।


मई 26, 2020, विक्रमपुर, भदोही।

गांव में काम धाम बहुत कुछ वैसा ही है, जैसा सामान्य दिनों में होता है। सवेरे मेरे साले साहब ने लकड़हारे बुलाये थे। आंधी में टूटे किसी पेड़ का हिस्सा छांटने के लिये वे आरी और कुल्हाड़ी ले कर आये थे। तीन चार लोग रहे होंगे। जाति के मुसहर। हम से उन्होने पीने का पानी मांगा। पत्नीजी ने पानी के साथ गुड़ भेज दिया। दूर से ही मैंने देखा तो उनके पास अंगोछा या मास्क जैसा कुछ नहीं था। पता नहीं उन्होने कोरोना वायरस या कोविड19 का नाम भी सुना होगा या नहीं। वे निम्नतम स्तर पर आते हैं गांव देहात की अर्थव्यवस्था में भी और जाति-वर्ण व्यवस्था में भी। नाम के आगे जाति सूचक संज्ञा “वनवासी” लगाते हैं। आते भी अनुसूचित जन जाति में हैं। पेड़ों की लकड़ियां, महुआ और छिउल की पत्तियां, खाली पड़े खेतों से अनाज के दाने और चूहों के बिल खोद कर उनमें से अनाज और चूहे निकाल कर भोजन का इंतजाम करते हैं। सभ्यता और असभ्यता की सीमारेखा पर खड़े मुसहर, उन्हें क्या मालूम होगा कोरोना। और मालूम भी होगा तो उनके जीवन में क्या प्रभाव डालती होगी यह जानकारी?

तीन किलोमीटर दूर यह है मुसहरों की बस्ती। पेड़ों के नीचे बना रखी हैं झोंपड़ियां। अत्यल्प सामान असबाब है उनके पास।
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