राजबली से मुलाकात

राजबली दसवीं आगे नहीं पढ़े। उसके बाद ममहर बाजार में किराने की दुकान खोली। पर उनके बब्बा को यह पसंद नहीं था कि घर से दूर राजबली पुश्तैनी धंधे से अलग काम करें।


राजबली विश्वकर्मा

राजबली ने कई दिनों से मचिया बना कर नहीं दिया। बता रहे हैं कि लकड़ी खत्म हो गयी है। लकड़ी सप्लाई करने वाले को बोला है। जैसे ही मिलेगी, एक एक कर बना कर देते रहेंगे। अभी जितने लोगों को बातचीत में आश्वासन दिया है, मचिया का; उनको देने के लिये पांच सात और जरूर चाहियें। उसके अलावा हमें भी घर में तीन चार और की आवश्यकता होगी।

दस मचिया तो राजबली जी से बनवानी ही हैं। उसके बाद की देखी जायेगी। वैसे जैसा रघुनाथ जी ने किया है; मचिया ड्राइंगरूम में अथवा पूजा घर में प्रयोग लायक फर्नीचर है। हम तो उसपर बैठ कर रामचरित मानस पाठ करते हैं, रोज रात में। वह पूजा क्षेत्र की पवित्र वस्तु हो गयी है।

हम तो मचिया पर बैठ कर रामचरित मानस पाठ करते हैं, रोज रात में। वह पूजा क्षेत्र की पवित्र वस्तु हो गयी है।

उस दिन शाम साढ़े चार बजे राजबली से मिलने अपनी साइकिल से गया। राजबली घर के बाहर बेंच पर शाम की चाय की ग्लास लिये बैठे थे। उनकी पतोहू मेरे लिये भी चाय ले कर आयी। मैंने शिष्टता से मना किया – चीनी वाली चाय नहीं पीता। उनके साथ वहीं बेंच पर बैठ कर बात हुई।

राजबली ने कहा कि लकड़ी देने वाले के पास फिर जायेंगे तकाजा करने। अब मौसम सुधर गया है। अब वे सवेरे चार बजे गंगा किनारे जाना शुरू कर चुके हैं। लूटाबीर (अगियाबीर का घाट) जाते हैं गंगा स्नान को। वहां लोगों से मिले थे, जो मेरे बारे में जानते हैं। … राजबली उन लोगों को जानते हैं, जिन्हे मैं जानता हूं। अर्थात मेरा नेटवर्क बढ़ रहा है।

राजबली घर के बाहर बेंच पर शाम की चाय की ग्लास लिये बैठे थे।

उनके बारे में पूछना शुरू किया। वे सन 1952 में जन्मे। पढ़ाई दसवीं तक की। मिडिल स्कूल तक महराजगंज कस्बे के स्कूल में और दसवीं तक औराई के इण्टरकॉलेज में। उसके आगे नहीं पढ़े। उसके बाद ममहर बाजार में किराने की दुकान खोली। दुकान चल रही थी, पर उनके बब्बा को यह पसंद नहीं था कि घर से दूर राजबली पुश्तैनी धंधे से अलग किराने का काम करें।

उनके बब्बा एक बार उनके यहां ममहर आये। पर उन्होने राजबली के यहां पानी तक नहीं पिया – “काहे कि, मेरी दुकान जहां थी, वहां बहुत सी मुसलमानों की बस्ती थी आस पास। उनके अनुसार मैं अपवित्र हो गया था। मैंने बब्बा से कहा कि वे औजार बनाते हैं। भले ही बधिक द्वारा प्रयोग किये जाने वाले छुरे या तलवार नहीं बनाते; पर जो फरसा या रसोईं का सब्जी काटने वाला चाकू बनाते हैं, उससे भी तो कोई बलि दे सकता है। और लोग देते भी हैं। पर हमारे पुश्तैनी काम करने वाले उससे अपवित्र या पाप के भागी तो नहीं हो जाते?!”

बहरहाल, पारिवारिक विरोध के कारण उन्होने वह किराना की दुकान बंद कर दी। दुकान सन अठहत्तर तक चली। अठहत्तर की बाढ़ में ममहर का इलाका इस ओर से कट गया था। लोग गुड़ बनाने वाले कड़ाहे को नाव बना कर पानी में आवागमन कर रहे थे। उसी समय उन्होने दुकान बंद की। फिर घर आ कर पुश्तैनी काम – लुहार-खाती के काम में लगे।

मैंने राजबली जी को फिर कहा कि उनके साथ नियमित बैठ कर उनके अतीत के बारे में नोट्स लिया करूंगा और ब्लॉग पर प्रस्तुत करूंगा। राजबली सवेरे पूजापाठ के बाद अपनी धौकनी वाली भट्ठी और कारपेण्टरी के काम में लग जाते हैं। इस बीच जो कुछ खाने को मिलता है, वह उन्हें वहीं परोस दिया जाता है। कोई मिलने वाला आया तो उसके साथ भी शेयर होता है वह नाश्ता। बारह बजे वे भोजन करते हैं। उसके बाद उनके पास खाली समय रहता है।

राजबली सवेरे पूजापाठ के बाद अपनी धौकनी वाली भट्ठी और कारपेण्टरी के काम में लग जाते हैं।

मैं राजबली के पास दोपहर-शाम के समय ही जाऊंगा अपनी नोटबुक ले कर। राजबली आकर्षक और रोचक व्यक्तित्व हैं। उनके बारे में लिखना मेरे ब्लॉग को एन-रिच करेगा। निश्चय ही!


प्रसन्नता की तलाश – गंगा, गांव की सैर

सवेरे अपने वाहन चालक को सात बजे बुला, उसके साथ एक कप चाय पीने के बाद हम दोनों ने घर से निकल कर गांव की छोटी सड़कों पर यूंही घूमने की सोची। करीब एक घण्टा इस प्रकार व्यतीत करने का कार्यक्रम रखा।


बेटा-बहू-पोती का गांव से प्रयागराज शिफ्ट हो जाना घरेलू दशा में बड़ा बदलाव है हमारे लिये। वैवाहिक जीवन में, शुरुआती दिनों को छोड़ दें तो हम परिवार बनाने में या परिवार के साथ रहने में ही लगे रहे। चालीस साल उस तरह बीते। पहले बेटा-बिटिया को पालने में रहे। बिटिया की शादी होने के बाद कुछ ही समय बीता; और उसमें भी बेटा साथ रहा; हम अपने माता पिता के साथ रहने प्रयागराज आ गये। वहां माता के देहावसान के बाद मेरे पिताजी मेरे साथ रहे। करीब चार साल तो वे और मैं एक ही कमरे को शेयर करते रहे।

नौकरी की समाप्ति पर हम गांव में शिफ्ट हो गये। गांव में मेरा पूरा परिवार – पिता, बेटा-बहू-पोती साथ रहे। कभी कभी मेरी सास जी भी आकर हमारे साथ रहती रहीं। मेरे पिताजी और मेरी सास जी ने देह त्याग भी हमारे इसी गांव के घर में किया।

अब, चालीस साल बाद, यह समीकरण बना है कि गांव में घर है, और केवल हम दो व्यक्ति – पत्नीजी और मैं भर घर में रह रहे हैं। चालीस साल बाद यह स्थिति आयी है कि स्नानघर में जाते समय दरवाजा बंद करेंं या न करें – कोई फर्क नहीं पड़ता। और यह स्थिति एक या दो दिन की नहीं है। आगे केवल एक दूसरे के साथ जीना है।

अटपटा लग रहा है। कोरोना संक्रमण काल से यह कहीं बड़ा डिसरप्शन (disruption) है।

पर हर बदलाव को परखना और उसमें से रास्ता निकालना ही जीवन है। हमने भी, जो परिस्थिति है, उसमें ‘अच्छा’ तलाशने का काम किया। अपनी दिनचर्या बदलने की शुरुआत की। सवेरे उठ कर एक घण्टा घर में ही एक्सर्साइजर पर कानों में हेडफोन लगा पॉडकास्ट सुनते व्यायाम करने को नियमित किया है। पत्नीजी भी म्यूजिक लगा कर घर के बड़े और लम्बे ड्राइंग रूम में घूमने का व्यायाम करती हैं। उनके लिये पौधों की देखभाल, पानी देना और खरपतवार निराई करने के भी काम हैं। उससे भी उनका व्यायाम हो जाता है।

गंगा तट पर रीता पाण्डेय और मैं। चित्र अशोक ने लिया।

हा दोनों ने अपना वजन कम करने की दिशा में प्रयत्न किये हैं। भोजन सीमित करना, दूध वाली चाय की बजाय पानी, जीरा और ग्रीन-चाय का प्रयोग करना प्रारम्भ कर दिया है। अब दूध लेने जाने की जिम्मेदारी मैंने ले ली है। उसमें भी कुछ व्यायाम होता ही है।

घर के बाहर देखने के लिये मेरे पास गांवदेहात का भ्रमण पहले से था – साइकिल ले कर 10 किलोमीटर के दायरे में घूम आता था। अब उसमें मैंने पत्नीजी को भी जोड़ा। सवेरे अपने वाहन चालक को सात बजे बुला, उसके साथ एक कप चाय पीने के बाद हम दोनों ने घर से निकल कर गांव की छोटी सड़कों पर यूंही घूमने की सोची। करीब एक घण्टा इस प्रकार व्यतीत करने का कार्यक्रम रखा।

उस सिलसिले में कल द्वारिकापुर के गंगा तट पर गये।

सूर्योदय होने पर भी कोहरा था। कहीं कहीं तो बहुत घना भी हो जाता था। उसे चीरते हुये धीमी चाल से कार से निकलना और खिड़की से गांव देहात को निहारना बहुत अच्छा लग रहा था। साइकिल पर होता तो कई जगह रुकता – सरसों के खेत, घूरे पर सवेरे की बटोरन ले कर जाती महिला, बासी भात थाली में उंडेलती महिला, स्कूल जाते बच्चे – यह सब ठहर कर देखता। पर वाहन पर बैठ गुजरते हुये देखना भी खराब नहीं था। कार की एक खिड़की मैंने और दूसरी पत्नीजी ने सम्भाल ली थी। देखते हुये इतना अच्छा लग रहा था कि बात करना बंद हो गया।

गंगा तट के करार से नीचे उतरती पत्नीजी।

वाहन पार्क कर हम गंगा तट की ओर चले। घाट पर कोहरा इतना था कि जल या कोई गतिविधि दिख नहीं रही थी। अगर हमें पहले से गंगा तट की जानकारी न होती तो दिखाई न देने के कारण हम नीचे उतरते ही नहीं। बहुत पास जाने पर एक खाट पड़ी दिखी। शायद पिछले दिन मौनी अमावस्या स्नान के लिये घाट पर किसी पण्डा ने बिछाई होगी और रात में उसे वापस नहीं ले गया होगा। तीन चार महिलायें स्नान कर रही थीं। उसके आगे तीन बालू ढोने वाली बड़ी नावें किनारे लगीं थीं। एक नाव में रहने का कमरा था, उसमें से निकल कर नाविक चाय पी रहा था। एक आदमी अण्डरवियर पहने साबुन लगा कर गंगा में डुबकी लगाने वाला था। पत्नीजी ने कहा – उसपर तो कैमरा मत साधो!

घाट के किनारे बबूल के वृक्ष भी शांत थे। कोहरे का कम्बल ओढ़े।

सब कुछ शांत, सब कुछ सुंदर, सब कुछ पहले का देखा होने पर भी नया। हम दोनो के हाथ में मोबाइल थे और उसमें फोटो कैद करने के लिये खूब यत्न कर रहे थे हम। दस पंद्रह मिनट थे वहां हम। आनंद ही आनंद था वहा!

महिलायें स्नान कर लौटने लगीं तो मेरी पत्नीजी ने उनसे बात की। एक महिला करहर (तीन किलोमीटर दूर गांव) की थी। पैर सूजे थे। फाईलेरिया था। पर वह सालों से नियमित गंगास्नान को आती है। बाकी महिलायें इसी गांव – द्वारिकापुर की थीं। उनके पास नित्य गंगा स्नान एक धर्म, व्यवहार, आनंद और प्रसन्नता की आदत है। वैसी ही आदतें हमें अपने में विकसित करनी हैं। और उसके लिये पूरी तरह से प्रयासरत हैं हम दोनो।

घर वापस आने पर प्रसन्नता का प्रभाव दिन भर बना रहा। वही ध्येय भी था!

हमारा वाहन चालक अशोक। उसे मोबाइल से चित्र लेना भी सिखाना होगा, अगर कार भ्रमण नियमित होता है, तो!

बेल पके से चिरई के का लाभ?

चिन्ना और उसके माता पिता चिड़िया हैं। बेल गांव है। बेल में बहुत गुण हैं। मीठा है, शीतलता है। स्वास्थ्य के लिये आयुर्वेद बहुत कुछ बताता है बेल में। पर चिड़िया को बेल से क्या लाभ?


गांव में होने का यह लाभ तो है कि दूध अच्छा मिल जाता है। पांच साल से ज्यादा हो गया मन्ना से दूध लेते लेते।

मन्ना के यहां से रोज दूध लेने मेरा बेटा जाता था। कल उसका परिवार शिवकुटी, प्रयागराज शिफ्ट कर दिया।


चिन्ना पांड़े (मेरी पोती) अब साढ़े सात साल की हो गयी है। उसकी पढ़ाई का विचार मन में था। कोरोना संक्रमण काल में मैंने उसे पढ़ाने के प्रयोग किये। पर लोगों ने कहा कि एक अच्छे स्कूल का कोई विकल्प नहीं। उसे मिलने वाले वातावरण की भरपाई बाबा-पोती का इण्टरेक्शन नहीं कर सकता। काफी चर्चा हुई घर में। अंतत: मैंने अपने प्रयोग करने की बजाय लड़के-बहू और चिन्ना (पद्मजा) को शिवकुटी (प्रयागराज) शिफ्ट कर दिया। स्कूल का अगला सत्र वहां ज्वाइन होगा।

चिड़ियाँ गांव से उड़ गयीं। हम लोग – मेरी पत्नी और मैं, अब अपने को गांव में अपने हिसाब से व्यवस्थित करेंगे। गांव से प्रयागराज जाते आते रहेंगे। महीने में एक दो चक्कर लगेंगे ही।

Wood Apple Fruit
बेल फल। Wood Apple. By Seisfeldt at English Wikipedia https://commons.wikimedia.org/w/index.php?curid=8711348

ज्ञानेंद्र (मेरा बेटा) अपने परिवार के साथ अब प्रयागराज चला गया है तो आज दूध लेने मैं गया। जब तक भुजाली (डेयरी में काम करने वाला भृत्य) दूध दे रहा था; देवेंद्र भाई (मन्ना दुबे के सबसे बड़े भाई साहब) से इधर उधर की बात हुई। उन्होने एक कहावत कही – “अब यह तो है कि बेल पके से चिरई को क्या लाभ?”

बेल (wood apple) का फल अंदर से तो मीठा होता है पर उसका खोल बहुत कड़ा होता है। चिड़िया के ठोर मारने से उसमें सुराख नहीं हो सकता। कठफोड़वा शायद सुराख कर सके; पर कठफोड़वा तो कीड़े खाता है, फल नहीं।

चिन्ना और उसके माता पिता चिड़िया हैं। बेल गांव है। बेल में बहुत गुण हैं। मीठा है, शीतलता है। स्वास्थ्य के लिये आयुर्वेद बहुत कुछ बताता है बेल में। पर चिड़िया को बेल से क्या लाभ?

पांच साल से परिवार गांव में एक जगह था। बहुत अच्छा समय था। पर समय सदा स्थिर तो नहीं रहता। बदला समय और अच्छा होगा; यह सोचा जाना चाहिये। अनेकानेक फल हैं इस सुंदर दुनियाँ में। चिड़ियों को वे फल मिलने चाहियें। केवल बेल का लालच दिखा कर उन्हें रोके रहना उचित नहीं।

आज पहला डेल्हिया खिला है। पद्मजा यहां होती तो देख बहुत खुश होती।

आज घर में पहला डेल्हिया खिला है। पद्मजा यहां होती तो देख बहुत खुश होती। अभी तो वह फोन पर कह रही है – दादी-बाबा, अपना ख्याल रखना!

सच है, बेल पक भी जाये तो चिड़िया के किस काम का?!


महेंद्र दुबे जी और मल्टी लेवल मार्केटिंग

महेंद्र जी द्वारा पूरी गम्भीरता से एक नये फील्ड से जुड़ना और उसके विषय में प्रभावी सम्प्रेषण करना, एक अच्छा अनुभव था मेरे लिये। मैं एमएलएल व्यवसाय की उपयुक्तता से सहमत हूं या नहीं, वह अलग मुद्दा है। पर महेंद्र जी की कुछ नया करने की जीवंतता बहुत प्रभावित कर गयी।


महेंद्र दुबे जी महराजगंज कस्बे के पास के गांव के निवासी हैं। वे प्रांतीय सेवा के अधिकारी थे। पिछली एक-दो साल पहले सेवा निवृत्त हुये हैं – डिप्यूटी डायरेक्टर, पंचायती राज, के पद से। पढ़ाई शुरू करते समय उम्र कुछ ज्यादा लिखा दी गयी थी, अन्यथा उनके साथ के अभी भी प्रांतीय सेवा में सेवारत हैं और एक दो कमिश्नर भी हैं।

महेंद्र दुबे (दायें) और दिलीप चौरसिया

महेंद्र जी कल मिलने आये। बीच में सम्पर्क सूत्र बने दिलीप चौरसिया जी। उनके साथ उनका बेटा भी था, अंकुर यशराज। अंकुर का घर का नाम सर्वेश कुमार दुबे है। पिता उसे आई.ए.एस. बनाना चाहते थे और वह फिल्म में जाना चाहता था। जैसा महेंद्र जी ने बताया; बेटा-पिता में कशमकश चली। अंतत: महेंद्र जी की पत्नी ने कहा कि बेटे की इच्छा का सम्मान किया जाये। फिर अंकुर ने फिल्म टेक्नॉलॉजी का ग्रेजुयेशन किया। आजकल वह फिल्मों का प्रोडक्शन कर रहा है। नौजवान है, अपने अनुसार चल रहा है। फिल्म के संसार की गहराई में डूब, उतरा रहा होगा; पर वह प्रसन्न है। पिता भी उससे खुश ही नजर आ रहे थे। शायद अभी भी मानते हों कि सिविल सर्विस का जलवा कुछ और ही है; पर अपनी जिद को मुलायम कर ही लिया है उन्होने।

महेंद्र दुबे (बायें) और अंकुर यशराज

महेंद्र जी साहित्यकार हैं। उन्होने अपना फेसबुक प्रोफाइल बताया। यह भी बताया कि कविता/गजल की कई विधाओं में वे दखल रखते हैं। छोटी बड़ी अनेक कवितायें उन्होने लिखी हैं। संस्कृत में भी लिखने का यत्न किया है।

महेंद्र जी का कविता लिखने का ही ‘व्यसन’ है। पर शायद रिटायरमेण्ट के बाद लेखन की मोनोटोनी से वे ऊब कर कुछ नया आजमाना चाहते थे। किसी ने उन्हे मोदीकेयर की मल्टी-लेवल-मार्केटिंग के बारे में बताया। बताने वाले सज्जन साल भर से उन्हें बताते-समझाते रहे, पर डेढ़ दो महीना ही हुआ जब महेंद्र जी इस ‘व्यवसाय’ में उतरे।

महेंद्र जी ने मोदीकेयर उत्पादों की गुणवत्ता हमें प्रयोगों के माध्यम से समझाई

वे मोदीकेयर के एमएलएम किट के साथ आये थे। उन्होने मेरी पत्नीजी और मुझे मोदीकेयर कई उत्पादों के बारे में अन्य ब्राण्डों के उत्पादों की तुलना में प्रयोगों द्वारा समझाने का (लगभग) सफल प्रयास किया कि मोदीकेयर के उत्पाद उत्तमोत्तम हैं।

मेरे ह्वाट्सएप्प सम्पर्क में करीब दो-तीन सौ सीनियर सिटिजंस हैं जो मुख्यत: रेल सेवा से निवृत्त हुये हैं। उन्हें निरंतर अपने रेल सेवा में अपने योगदान या आजकल की राजनीति पर ठेलते पाया है। बहुत कम ही हैं जो उससे अलग कुछ कर या लिख रहे हैं। ऐसे में महेंद्र जी द्वारा पूरी गम्भीरता से एक नये फील्ड से जुड़ना और उसके विषय में प्रभावी सम्प्रेषण करना, एक अच्छा अनुभव था मेरे लिये। मैं एमएलएल व्यवसाय की उपयुक्तता से सहमत हूं या नहीं, वह अलग मुद्दा है। पर महेंद्र जी की कुछ नया करने की जीवंतता बहुत प्रभावित कर गयी।

सेवानिवृत्त होने के बाद मुझे अपनी साइकिल, अपना घूमना, ब्लॉग और पुस्तक पठन बहुत रुच रहा है। किसी व्यवसाय में जुतने का कत्तई मन नहीं है। पर मेरी पत्नीजी ने महेंद्र जी को ध्यान से सुना (ध्यान से तो मैंने भी सुना)। वे शायद आगे मन बनायें। हो सकता है एमएलएम का अंग बनने की बजाय मोदीकेयर के उत्पाद ही प्रयोग करने लगें।

इण्टरनेट पर सर्च करने पर मोदीकेयर के बारे में कोई खास जानकारी नहीं मिलती। कम्पनी लिस्टेड नहीं है। एक साइट उसकी बैलेंस-शीट बताने के लिये सबस्क्रिप्शन की मांग कर रही है। पता नहीं वह भी सही सूचना देगी या नहीं। एक जगह यह है कि कम्पनी का 500 करोड़ का वार्षिक रिवेन्यू टर्नओवर है। इस हिसाब से तो औसत कंसल्टेण्ट मात्र उपभोक्ता है और वह भी बहुत धुंआधार उपभोक्ता नहीं। पर नेट पर बिखरे ये आंकड़े बहुत सही हैं; नहीं कहा जा सकता।

मोदीकेयर उत्पादों के महेंद्र दुबे जी द्वारा किये प्रयोग

खैर, महेंद्र जी और उनके लड़के से मुलाकात अच्छी रही। उनका बेटा शायद मुझे भविष्य में वीडियो बनाने या पॉडकास्ट कर सकने के गुर सिखाये। अंकुर अगर वह सहायता करते हैं तो मैं ब्लॉगर से पॉडकास्टर या व्लॉगर में रूपांतरित हो सकूं।

सुना है, लोग यू-ट्यूब पर अच्छे पैसे बना लेते हैं। आज तक ब्लॉगिंग से एक चवन्नी नहीं बनी; किताब लिखने का मूड ही नहीं बना पर शायद यूट्यूब मुझे करोड़पति बना दे। सपने देखने का युग है। वानप्रस्थ का आदमी भी सपने क्यों न देखे! 😆


अरे वह क्रियेटिव – फन ही नहीं, देने की प्रसन्नता की आदत विकसित करना भी था।

आनंद को केंद्र में रख कर अपनी आदतें ढालने की एक सयास कोशिश की जा रही है। विचार यह है कि हम उसे पैसा खर्च कर, सामान खरीद कर, मार्केटिंग कर या इधर उधर की बतकही/परनिंदा कर नहीं, विशुद्ध प्रसन्नता की आदतें विकसित करने से करेंगे।


जीवन की मोनोटोनी दूर करने का दौर है। मेरी पत्नी जी सवेरे एक स्पीकर पर म्यूजिक लगा कर घर के ड्राइंग कक्ष में ही घूमने का काम कर रही हैं। करीब पौना घण्टा का हल्का व्यायाम। सर्दियों में घर के बाहर निकलना नहीं हो पा रहा साइकिल ले कर। मेरी पत्नीजी भी मॉर्निंग वॉक पर नहीं निकल रहीं। इस लिये यही किया जा रहा है। वे संगीत सुनते हुये घर में घूमती हैं और मैं कान पर हेड-फोन लगा कर स्टेशनरी साइकिल चलाता हूं। काम भर का व्यायाम हो ही जाता है।

पॉडकास्ट सुनते स्टेशनरी साइकिल चलाना। इनसेट में सस्ती वाली साइकिल।

उसके बाद घर में प्लास्टिक के जितने खाली, बिना इस्तेमाल के पड़े डिब्बे हैं; उन्हें कबाड़ी को देने की बजाय, काट कर पेण्ट कर आकर्षक छोटे गमले बना रही हैं। दिन में जब समय मिलता है, बाहर पोर्टिको में बैठ कर गमले रंगने का काम कर रही हैं।

मेरी पत्नीजी का पेण्ट करने का सामान। घर में छोटे बड़े डिब्बे काट काट कर उनके गमले बन रहे हैं।

बनारस में फुटपाथ वाली दुकान से सीमेण्ट के गमले खरीदे थे, उनपर भी पेण्ट हुआ है।

मचिया बनाना – उसमें लगे सामान को जुटाना, पेण्ट करना/कराना और राजबली, रामसेवक, अशोक से तालमेल बिठाना – इस सब में अपना समय लगाया है।

Rita Pandey painting machiya
मचिया पेण्ट करते हुये रीता पाण्डेय

तीन साल से ‘मनी’ नामक बिजनेस गेम खरीदा है। वह यह पढ़ कर खरीदा था कि नियमित खेलने से डिमेंशिया/पार्किंसन रोग से बचाव होता है। पर आज तक उसका प्रयोग नहीं किया। अब सोचा जा रहा है कि उसे नियमित खेला जाये।

रामचरित मानस पढ़ने का नियमित कार्य प्रारम्भ किया है हम दोनो ने। जुगलबंदी में एक चौपाई/दोहा वे पढ़ती हैं; एक मैं। बीच में तुलसी का लिखा कोई गूढ़ प्रसंग आता है तो हम लोग बीच में रुक कर उसका अर्थ भी देखते हैं। पोद्दार जी का मानस अनुवाद भी अपने पास रखते हैं। ज्यादा नहीं, शाम के समय बीस दोहे का पठन/वाचन करते हैं। उसके बाद दो दो किशमिश के दानों का प्रसाद भी लेते हैं। मन में है कि इस कार्य के लिये एक डिब्बे में लाचीदाना और कच्ची मूंगफली दाने रखेंगे – प्रसाद के लिये।

ब्लॉगिंग और/या विविध विषयक वीडियो और पॉडकास्ट – यह सब लिखने, पढ़ने, देखने आदि को अपनी आदत में लाने के प्रयास किये जा रहे हैं।

आनंद को केंद्र में रख कर अपनी आदतें ढालने की एक सयास कोशिश की जा रही है। विचार यह है कि हम उसे पैसा खर्च कर, सामान खरीद कर, मार्केटिंग कर या इधर उधर की बतकही/परनिंदा कर नहीं, विशुद्ध प्रसन्नतादतें (प्रसन्नता-आदतें) विकसित करने से करेंगे।

Kottu Vellaku Deepam
रघुनाथ जी का उपहार – कोट्टु वेल्लकू दीपम

रघुनाथ जी के लिये मचिया बनाने-बनवाने का उद्यम उसी प्रकार की एक प्रसन्नतादत है! इसमें दूसरी प्रसन्नतादत अपने में ‘देने का भाव’ लाना है। हमने उसकी भी गहन अनुभूति की! हमने रघुनाथ दम्पति से मचिया देने के बदले कुछ पाने की बात सोची ही नहीं थी। पर हमें कई चीजें बहुमूल्य मिलीं –

  1. श्रीमती गीतांजलि और श्री रघुनाथ जी से आत्मीय सम्पर्क
  2. रघुनाथ जी द्वारा मेरी बिटिया और दामाद को उनके घर आने का निमंत्रण
  3. रघुनाथ दम्पति द्वारा भेजा जाने वाला रिटर्न-गिफ्ट। उन्होने जो भेजने की सोची, वह इतना सुरुचिपूर्ण है कि हम उसे किसी भी दशा में मना नहीं कर सकते।
  4. यह समझ में आना कि गांव में रहते हुये भी अनेकानेक लोगों से – और बहुत उत्कृष्ट लोग हैं दुनियाँ में – जुड़ाव अपने में सघन प्रसन्नता का भाव विकसित करते हुये भी सम्भव है। उसमें किसी भी प्रकार की कोई उकताहट या ड्रजरी नहीं है!

यह देने का भाव या प्रसन्नता की आदत हमें कायम रखनी है। हमने तय किया है कि आगे कुछ महीने तक हम मचिया बनाने/देने का प्रयास जारी रखेंगे। ज्यादा नहीं, हर महीने एक मचिया देने की आदत। जिससे हमारे ऊपर आर्थिक बोझ भी न पड़े और प्रसन्नता-आदत भी संतृप्त होती रहे।

इस प्रसन्नतादतों के विकास की प्रक्रिया में जो कुछ होगा, उसे ब्लॉग पर साझा करने का प्रयास भविष्य में होता रहेगा! 🙂

रीता पांड़े के पेंट किए गमले