पीपल की डालें और इस्लाम बकरीवाला


इस्लाम सवेरे टहनियां कांट कर लाता है और बकरियां पालता है। बकरियों को चराने नहीं ले जाता। पूर्णत: घुमंतू (नट) जाति अपने रेवड़ एक जगह पर रख कर पालती है और अब एक ही स्थान पर रहती भी है – यह जानकारी अलग सी थी।

विक्षिप्त पप्पू से बातचीत का (असफल) प्रयास


उसके कपड़े आज साफ थे पर शरीर बिना नहाया। शरीर पर कुछ तरल पदार्थ बहने के निशान भी थे। इकहरा शरीर, बिना किसी इच्छा के, बिना भाव के निहारती आंखें – मुझे उसके बारे में दुख और निराशा दोनो हुये।

उपेंद्र कुमार सिंह, समोसे और लाइफ L.I.F.E.


उपेंद्र जी की वाकपटुता/प्रगल्भता का एकनॉलेजमेण्ट उनकी पत्नी – श्रीमती सीमा सिंह भी हल्की मुस्कान के साथ करती हैं। प्रोफेसर (और अब वाइस चांसलर) सीमा जी हैं। पर बोलने का काम उपेंद्र कुमार सिंह जी करते हैं।

मुराहू पण्डित के साथ साइकिल से गंगा घाट


मंदिर छोटा है, पर पुराना है और अच्छा लगता है। उस मंदिर की चारदीवारी बनाने की कथा भी पण्डित जी ने बतायी। ईंटवाँ के ही फलाने जी का छ क्विण्टल गांजा पकड़ा गया था। उस मामले में बरी होने पर उन फलाने जी ने यह जीर्णोद्धार कराया।

ईंटवाँ गंगा घाट पर नित्य स्नान करने वाला लालचंद


वह एक तौलिया पहने है। हाथ में कचारा हुआ कपड़ा और कांधे पर लुंगी। घर से एक लाठी और तौलिया भर ले कर आता होगा गंगा स्नान के लिये। बाकी, नहाने-सुखाने और कपड़ा कचारने का काम तो गंगा किनारे होता है। उसके पैरों में चप्पल भी नहीं है।

टेला में तिलक


बांयी ओर ओसारे में महिलायें तैनात थींं कि मंत्रोच्चार शुरू हो तो उनकी गारी का गायन प्रारम्भ हो।
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जिंदगी तिलकही अटेण्ड करने, भोजन पर लगाम रखने और “आदतें” सुधारने में ही लगानी है। वही कर रहा हूं। आपको भी देर सबेर वही करना होगा!