गोरखपुर में बंगाली – श्री प्रतुल कुमार लाहिड़ी से मुलाकात


श्री प्रतुल कुमार लाहिड़ी
श्री प्रतुल कुमार लाहिड़ी

अचिन्त्य लाहिड़ी ने मुझे बताया था बंगाली लोगों के विगत शताब्दियों में गोरखपुर आने के बारे में। उन्होने यह भी कहा था कि इस विषय में बेहतर जानकारी उनके पिताजी श्री प्रतुल कुमार लाहिड़ी दे सकते हैं। श्री लाहिड़ी से मुलाकात मेरे आलस्य के कारण टलती रही। पर अन्तत: मैने तय किया कि सन् 2014 में यह सम्पन्न कर ही ली जाये। सो मैं उनसे मिलने गया 29 दिसम्बर की शाम उनके आवास पर।

श्री लाहिड़ी को ज्यादा प्रश्नों से कुरेदना नहीं पड़ा मुझे। डेढ़ घण्टे के समय में मुझे बहुत त्वरित गति से – गति, जो बातचीत करने का अन्दाज भी अनुसरण कर रही थी और कम से कम समय में अधिकाधिक जानकारी देने का प्रयास भी कर रही थी – उन्होने  मुझे (1) गोरखपुर में बंगालियों के योगदान, (2) इस सरयूपार के क्षेत्र का पुरातत्व महत्व और (3) उनके अनेक प्रकार के सामाजिक कार्यों के बारे में अवगत कराया।

एक ब्लॉगर एक कुशल पत्रकार नहीं होता। अपनी छोटी पोस्टों के लिये वह श्रवण के आधार पर नोट्स लेने पर कम देखने पर अधिक निर्भर रहता है। यहां उसके उलट रहा। अपनी पतली कॉपी में नोट्स लेने की मेरी प्रवृत्ति बहुत अटपटी/खुरदरी है। लिहाजा जो नोट कर पाया, कर पाया। बहुत कुछ छूट गया। बहुत कुछ इतना उथला नोट किया कि उसके आधार पर आधा-अधूरा लिखना विषय के साथ अन्याय होगा। अत: अगली बार श्री लाहिड़ी जैसे अध्ययन-जानकारी और व्यक्तित्व में ठोस विभूतियों से मिलने में पर्याप्त सावधानी और तैयारी रखूंगा। अन्यथा ब्लॉगरी में भी रैगपिकर कहलाऊंगा! 🙂

श्री लाहिरी का दफ्तर (या अध्ययन कक्ष) मंझोले आकार का और सुरुचिपूर्ण था। मेज, कुर्सी, फाइलें, कागज, दीवार पर पुरात्त्व विषयक सामग्री के चित्र और अलमारियों में सरयूपार क्षेत्र के इकठ्ठे किये हुये कुछ टेरा-कोटा के नमूने थे। शाम के साढ़े छ बजे थे। कमरे में उनके चित्र लेने के लिये मेरे पास मोबाइल भर था, जो ट्यूबलाइट की रोशनी में बहुत अच्छे परिणाम नहीं देता। मुझे उनसे मिलने के बाद अहसास हुआ कि समय का ध्यान कर कैमरा भी उपयुक्त होना चाहिये।

खैर, मुलाकात पर आयें।

मुलाकात मुख्यत: ऊपर लिखे  तीन विषयों पर थी। इस पहली पोस्ट में मैं गोरखपुर में बंगाली लोगों के आने और उनके बसने के बारे में उनसे मिली जानकारी रखूंगा।

श्री लाहिड़ी ने बताया कि बंगाली लोग सबसे पहले 1802 में गोरखपुर आये। वे लोग मुस्लिम थे। चन्दसी दवाखाना वाली वैदकी करते थे। चान्दसी दवाखाने के बारे में इण्टरनेट पर मैने जो टटोला, उसमें निकला – शीघ्रपतन, फिश्तुला (भगन्दर), बवासीर, क्षार-सूत्र चिकित्सा आदि। सम्भवत: ये मुस्लिम वैद्य उन रोगों के इलाज में दक्ष थे, जिनके बारे में सामान्यत: व्यक्ति खुल कर नहीं बात करता। वैसे आज भी अनेक शहरों में अनेक चान्दसी दवाखाने हैं और गोरखपुर में भी है; अत: उनकी वैद्यकी विधा पर बिना जाने अधिक नहीं कहूंगा मैं। … पर भारत के विभिन्न भागों से लोगों का एक स्थान से दूसरे में गमन और वहां बसना बहुत रोचक विषय है जानने के लिये। संचार और यातायात (मुख्यत: रेल) के अच्छा न होने के समय भी यह गमन होता रहा है। कुछ समय पहले मैने महाराष्ट्र के पंत ब्राह्मणों के उत्तराखण्ड में बसने पर लिखा था। ऐसे अनेक गमन-विस्थापन जिज्ञासा जगाते हैं।


श्री प्रतुल कुमार लाहिड़ी

श्री लाहिड़ी की लिखी सरयूपार के पुरातत्व पर एक पुस्तक।
श्री लाहिड़ी की लिखी सरयूपार के पुरातत्व पर एक पुस्तक।

श्री प्रतुल कुमार लाहिड़ी जीव विज्ञान की सनद रखते हैं। पहले ये दवा व्यवसायी थे। सन 1976 में इन्होने होटल व्यवसाय में पदार्पण किया।

इनकी रुचि पुरातत्व अध्ययन में है। सन 1997 से ये सरयूपार के क्षेत्र में विस्तृत भ्रमण कर पुरातत्व सामग्री पर शोध करते रहे है।

श्री लाहिड़ी ने कचरा प्रबन्धन, जेल के कैदियों और चिन्दियाँ बीनने वाले बच्चों की शिक्षा आदि के विविध कार्यों में लगन और प्रतिबद्धता से अद्वितीय कार्य किये हैं।


श्री लाहिड़ी ने बताया कि 1886 में डा. जोगेश्वर रॉय गोरखपुर आये। अन्य भी अनेक बंगाली परिवार आये। डा. रॉय मिलिटरी में डाक्टर थे। उसके बाद 1880 के दशक में ही अनेक बंगाली आये जो रेलवे लाइन बिछाने में काम कर रहे थे। उस समय की (सम्भवत:) बी.एन.डब्ल्यू.आर. (बंगाल एण्ड नॉर्थ वेस्टर्न रेलवे); जो अवध-तिरहुत रेलवे की पूर्ववर्ती थी; के इंजीनियर और बाबू लोग। पहले जो डाक्टर लोग आये, उनका, उनके पेशे के अनुसार,स्थानीय जनता से पर्याप्त मेलजोल रहा और उनके लिये स्वास्थ्य, सांस्कृतिक, सामाजिक और शैक्षणिक क्षेत्रों में उनका योगदान भी रहा। रेलवे के इंजीनियर और बाबू लोग अपेक्षतया (शुरू में) अलग थलग रहे, पर रेलवे के माध्यम से उनका योगदान कमतर नहीं कहा जा सकता। सन 1947 के बाद तो बहुत बंगाली परिवार रेलवे की नौकरी के कारण गोरखपुर आ कर बसे।

डा. जोगेश्वर रॉय ने सन 1896 में सिविल सोसाइटी के माध्यम से दुर्गापूजा गोरखपुर में प्ररम्भ की। यह प्रतिवर्ष होती रही, पर 1903 में प्लेग की महामारी के कारण इसमें व्यवधान आ गया। सन 1907 में विनोद बिहारी रॉय, रमानाथ लाहिड़ी और अघोर नाथ चटर्जी के सामुहिक प्रयासों से यह क्रम पुन: प्रारम्भ हुआ। यह सुहृद समिति और आर्य नाट्य मंच के विलय से बंगाली एसोशियेशन की स्थापना के साथ हुआ। [ उल्लेखनीय है कि सांस्कृतिक समारोह के रूप में शारदीय दुर्गापूजा का प्रारम्भ बंगाल में सन 1868 में  श्री व्योमेश चन्द्र बैनर्जी ने किया था – ‘श्री श्री दुर्गापूजा एवम शारदीय महोत्सव’ के रूप में। इसका ढ़ाई दशकों में बंगाल से गोरखपुर जैसे स्थान पर फैल जाना बंगाली सांस्कृतिक उत्कर्ष का प्रमाण है। ]

श्री प्रतुल कुमार लाहिड़ी के दादा जी ( श्री रमानाथ लाहिड़ी) दुर्गापूजा के सांस्कृतिक समारोहों के प्रमुखों में से रहे। वे बहुत प्रतिष्ठित व्यक्ति थे गोरखपुर के सांस्कृतिक परिदृष्य में।

कालांतर में सन 1947 से रेलवे की दुर्गा पूजा भी प्रारम्भ हुई गोरखपुर में। उसके बाद दुर्गापूजा और रामलीला का समागम राघो-शक्ति मिलन के रूप में होने लगा। उस कार्यक्रम में रामलीला के राघव (राम) माँ दुर्गा की शक्ति (जिसके बल पर उन्होने रावण वध किया) माँ को विजय के बाद लौटाते हैं।

बातचीत में श्री लाहिड़ी।
बातचीत में श्री लाहिड़ी।

लाहिड़ी जी ने दुर्गापूजा के माध्यम से गोरखपुर में बंगाली प्रभाव को विस्तार से बताया मुझे। मैने सांस्कृतिक क्षेत्र से इतर भी बंगाली प्रभाव की बात पूछी तो उन्होने बताया कि शिक्षा के क्षेत्र में भी बंगाली लोगों का बहुत योगदान रहा गोरखपुर में। गोरखपुर हाई स्कूल, महाराणाप्रताप कॉलेज आदि के बहुत से अध्यापक और प्राचार्य बंगाली रहे। एक समय तो रेलवे और सिविल प्रशासन के अनेकानेक अधिकारी – महाप्रबन्धक, कमिश्नर और मुख्य चिकित्साधिकारी आदि बंगाली थे। श्री लाहिड़ी को विभिन्न कालों के, विभिन्न पदों पर स्थापित अनेक सज्जनों के नाम याद थे। उन्होने बताये और मैने लिखे भी अपनी स्कैप-बुक में। पर उनका ब्लॉग पोस्ट में जिक्र इस लिये नहीं कर रहा हूं कि नोट करने में शायद त्रुटियां हुई हों।

विगत के बंगाली समाज के कार्य और रुचियों में उत्कृष्टता की बात करते हुये वे आजकल आये गिराव की भी बात करने लगे श्री लाहिड़ी। संगीत की जानकारी और रुचि दोनो का ह्रास होता जा रहा है। अपने समारोहों में कानफोड़ू डीजे बजाने का प्रचलन धीरे धीरे करते जा रहे हैं लोग। वाद्य यंत्रों की बजाय सीडी और पेन ड्राइव का प्रयोग करने लगे हैं संगीत के लिये। ….

प्रतुल लाहिड़ी जी से मैं मूलत: बंगाली लोगों के गोरखपुर में बसने के विषय में जिज्ञासा ले कर गया था। पर जैसा लगा कि उनका रुंझान (या जुनून या पैशन) उनके पुरातात्विक और सामाजिक क्षेत्र के कार्यों में है। उनके बारे में जिस बारीकी और विस्तार से उन्होने बताया, उससे इस 72 वर्षीय भद्र पुरुष का न केवल मैं प्रशंसक बन गया वरन एक सार्थक जीवन जीने के लिये मुझे रोल मॉडल भी नजर आया। उस बातचीत का विवरण अगली ब्लॉग पोस्ट/पोस्टों में करूंगा।

कोहरा और भय


घने कोहरे में घर का पीछे का हिस्सा।
घने कोहरे में एक घर का सामने का हिस्सा।

सौन्दर्य और भय एक साथ हों तो दीर्घ काल तक याद रहते हैँ। सामने एक चीता आ जाये – आपकी आंखों में देखता, या एक चमकदार काली त्वचा वाला फन उठाये नाग; तो सौन्दर्य तथा मृत्यु को स्मरण कराने वाला भय; एक साथ आते हैं। वह क्षण आप जीवन पर्यन्त नहीं भूल सकते।

घने कोहरे के तिलस्म में दस प्रन्द्रह मिनट फंसना भी वैसी ही अनुभूति ला देता है। एक बार हम गंगा किनारे घने कोहरे में फंस गये थे। कोहरा अचानक आया और हमें जकड़ गया। आठ दस कदम के आगे दिखता नहीं था। एक दो बार गलत ओर बढ़ने के बाद दिशा भ्रम हो गया। कुछ दूर बाद गंगाजी का जल दिखा तो एक लैण्ड (या वाटर) मार्क मिला। यह लगा कि धारा के लम्बवत उससे दूर चलते रहे तो घाट पर पंहुच जायेंगे। अन्यथा कछार की रेत और कोहरा तो दबोचे ले रहे थे। उस दशा में भी सौन्दर्य था और भयानक भय भी। गजब का सौन्दर्य और भय। भटक कर जब वापस घाट की सीढ़ियों पर लौटे थे तो पण्डाजी ने बताया कि वे भी कोहरे में एक बार फंस चुके हैं। सवेरे साढ़े चार बजे गंगाजल लेने गये थे और कोहरे में भटकते रहे। सात बजे जब कछार से उबरे तो शिवकुटी से करीब एक-डेढ़ किलो मीटर दूर पाया था अपने को।

लगभग वैसी ही अनुभूति फिर हमें हुयी कल। एक दिसम्बर से पड़ रहा कोहरा कल दोपहर में कुछ हल्का हुआ था। धूप चटक निकली थी कुछ घण्टे। रात भोजन कर मैने सोचा कि ऑफ्टर डिनर टहल लिया जाये 20-25 मिनट। मन में विचार था कि आज कोहरा छंटा होगा। पर दरवाजे के बाहर पैर रखते ही भूल का गहरा आभास हो गया। दिन की खुली धूप, खुला आसमान (बादलों से रहित) और हवा का अभाव – डेडली कॉबिनेशन हैं संझा/रात में कोहरा घना आने के। वही हुआ था। बस गनीमत यह थी कि हम घर के पास रेलवे गोल्फ-कालोनी के गोल्फार (कछार की तर्ज पर स्थान का नामकरण) में थे। जहां रेत के विस्तार जैसी भूलभुलैया नहीं थी। पर भय उत्पादन करने के लिये शाल के बड़े विशालकाय वृक्ष थे। एक दो नहीं, अनगिनित और घने। कोहरे और स्ट्रीट-लाइट में वे बड़े बड़े दैत्य सरीखे लग रहे थे। हर घर बन्द था और हर दरवाजा निस्पृह सा अनामन्त्रित करता। कुछ दूर चलने के बाद लगा कि पैर यन्त्रवत उठ रहे हैं। कब दांया उठा और कब बांया, यह अहसास ही नहीं हो रहा। एक मन कहता था कि वापस हो लिया जाये। पर कोहरे का सौन्दर्य आगे चलने को उकसा रहा था।

मुझे सुनसान जगह का भय भी लगा। पत्नीजी साथ थीं और हमारी रक्षा के लिये बेटन भी न था, जो सामान्यत: मैं घूमते समय साथ ले कर निकलता था। यद्यपि हम रेलवे कालोनी में थे, पर गोरखपुर को निरापद नहीं कहा जाता। कोई खल इस घने कोहरे का लाभ ले कर अगर हम पर झपटता है तो आत्मरक्षा के लिए अपने हाथ पैर के अलावा कुछ नहीं है…. हम लोग हमेशा कनेक्टेड रहने के आदी हो चुके हैं और अचानक वह खत्म हो जाये – जैसा इस कोहरे में हुआ – तो ऐसा भय आता ही है।

दृष्यता लगभग 12-15 कदम भर थी। करीब 200 कदम चलने के बाद स्थान का भ्रम होने लगा। आगे वाला घर बेचू राय का है या कंचन का? यह नहीं चींन्हा जा रहा था। सड़क और कोहरे में मद्धिम पड़ी स्ट्रीट लाइट के सहारे ही चलना हो रहा था। हम लोग लगभग 1000-1500 कदम चल कर वापस हो लिये।

कोहरे में चीड़ के पेड़ का तना।
कोहरे में चीड़ के पेड़ का तना।

वापसी में एक व्यक्ति साइकल पर सामने से गुजरा। मैने कहा कि वह औरत थी। पत्नीजी ने कहा कि आदमी था। कोहरे में पहचानना कठिन था आदमी औरत को। उसके कुछ ही देर बाद एक औरत पैदल गुजरी। माहौल और मन – दोनो से प्रेरित मैने उस औरत के पैर की ओर भी देख लिया। … बचपन से बताया गया है कि बियाबान में घूमती हैं डाकिनी और चुडैल। और उनके पांव उल्टे होते हैं। …

एक जगह रुक कर मैने चित्र लेने चाहे तो पत्नीजी ने डपटा – इस समय फोटो लेने की सूझ रही है? चुपचाप घर चलो। वहीं ले लेना कोहरे की फोटो, जितनी लेनी हो!  

फिर भी दो तीन चित्र तो लिये ही। यह जरूर हुआ कि अगर रुक कर इत्मीनान से लेता तो मेरा मोबाइल का कैमरा भी कुछ वाकई अच्छे चित्र दर्ज कर लेता कोहरे के।

मेरे घर के पास अपनी बाइक खड़ी कर दो रेलवे टेलीफोन विभाग के कर्मी एक सीढ़ी लगा टेलीफोन के तार ठीक करते दिखे। अच्छा लगा कि घने कोहरे में भी लोग मुस्तैद हैं। रेल कर्मी काम कर रहे हैं।

मेरे अपने घर में भी मेन गेट पर ताला लगा कर आउट-हाउस वाले अपने अपने कमरों में बन्द हो चुके थे। हम पीछे के संकरे गेट से उछल कर अन्दर आये। कोहरे की नमी युक्त हवा को फेफड़ों मे पूरी तरह भर कर मैने घर के भीतर प्रवेश किया।

अथ कोहरा एडवेंचर कथा!

घर के पिछवाड़े की ओर से दाखिल हुये कोहरे में हम।
घर के पिछवाड़े की ओर से दाखिल हुये कोहरे में हम।

"पश्मिन् शॉल वाले”–फेरीवाले


IMG_20141123_112434सही मौसम है शॉल की फेरीवालों का। गोरखपुर में तिब्बत बाजार और कलकत्ता बाजार में सामान मिलता है सर्दियों के लिये। स्वेटर, जैकेट, गाउन, शॉल आदि। नेपाली या तिब्बती अपने मोन्गोलॉइड चेहरों का ट्रेडमार्क लिये फ़ेरी लगा कर भी बेचते हैं गर्म कपड़े। आज मैने रिक्शा पर कश्मीरी जवान लोगों को भी शॉल बेचते देखा।

रविवार के दिन एक पुस्तक ले कर बैठा था बाहर धूप में। बीच बीच में साइकल भी चला ले रहा था। सड़क पर ये दो दिखे। एक रिक्शा चला रहा था और ’पश्मिन् शॉल वाले’ की आवाज भी लगा रहा था। रिक्शे में शॉल के गठ्ठर लदे थे। दूसरा रिक्शे के पीछे चल रहा था। फ़ेरी लगाने का एक उत्कृष्ट मॉडल। रिक्शा उन्होने किराये पर लिया था। खुद चला रहे थे। पीछे चलता फ़ेरीवाला यह निगाह भी रख रहा था कि कोई गठ्ठर खिसका न ले। उनमें से एक रेलवे के बंगलों में गेट खोल कर जा कर लोगों को आकर्षित कर रहा था और दूसरा बाहर रिक्शे पर लदे सामान के साथ रहता था।

Herb Cohenसामान दिखाने और दाम बताने में आपसी छद्म लड़ाई का प्रहसन भी वे बखूबी कर रहे थे। उन्होने आर्ट आफ नेगोशियेशन्स की किताब नहीं पढ़ी होगी हर्ब कोहन की। पर उन्हें पढ़ने की जरूरत भी नहीं लगती थी।

साइकल चलाते हुये मैने कहा कि हमें खरीदना नहीं है। पर ’मेम सा’ब को पांच मिनट दिखाने के नाम पर उनमे से एक अन्दर आया और मेरी पत्नीजी ने अनमने पन से कहा कि चलो, दिखाओ। वे गेट खोल कर रिक्शा अन्दर ले आये। रिक्शे पर गठ्ठर देख मुझे लगा कि मोल भाव तो मैं नहीं कर सकता, पर चित्र अवश्य खींच सकता हूं। मैने साइकल चलाना छोड़ मोबाइल फोन का कैमरा संभाल लिया।

बहुत से शॉल दिखाये। देखनें में बहुत मंहगे नहीं थे। पर दाम बताये 3-4 हजार। पश्मीना बताया। मेरी पत्नीजी ने कहा कि ये सब लुधियाना के हैं। उन्होने बताया कि लद्दाखी उन लोगों को ऊन बेचते हैं और वे (अपना निवास बताया अनन्तनाग) ये शॉल बुनते थे। … उसी तर्ज पर बात जैसे भदोहिया फेरी वाले हमें रतलाम में सुनाया करते थे। … फलां ऊन, फलां डाई, फलाना टपटेल…IMG_20141123_120319

अनन्तनाग के नाम पर मैने कहा कि तुमारे यहां चुनाव चल रहे हैं और तुम यहां घूम रहे हो। उनको यह जानकारी थी कि वहां चुनाव हो रहे हैं। पर उस बारें में बहुत ज्यादा बात करनेकी बजाय शॉल बेचना उन्हे ज्यादा रुचिकर लग रहा था। वे कुछ ही दिन पहले गोरखपुर आये हैं। उनमें से बड़े वाले ने बताया कि वह यहीं आ रहा है सर्दियों में। पिछले छ साल से। तीन साढ़े तीन महीने यहां रह कर अपना सामान बेचते हैं वे लोग।

सौदा पटा नहीं। उन्होने भी प्रहसन किया और मेरी पत्नीजी-घर में काम करने वाली बुढ़िया की युगल टीम ने भी। एक सस्ता शॉल जो वे आठ सौ का कह रहे थे, तीन सौ में दे कर गये। पर दोनो पक्ष असंतुष्ट दिखे। पार्टिंग शॉट्स थे –

“बहुत टाइम खोटी हुआ।”

“मैने तो तुम लोगों को बुलाया नहीं था।”

“हम तो कस्टमर बनाना चाहते थे। इस साल आपने एक लिया तो अगले साल हमसे दस खरीदेंगे। यहीं, इसी जगह पर।”

“आप समझते हो, हम परदेसी हैं तो जो भाव बोलोगे उसी पर दे कर जायेंगे। पर इससे कम में तो कीमत ही नहीं निकलेगी।”

खैर, चुंकि फेरीवाले खुश नहीं थे; मैं उनके बारे में उनसे बहुत नहीं पूछ पाया। अगली बार इसी जगह वे हमें दस शॉल बेचने की बात कह कर गये। पर उन्हे क्या मालुम कि साल भर बाद हम कहीं और होंगे! शायद गंगा किनारे एक “कुटिया” बना कर वहां रहते होंगे।

अनन्तनाग के ये कश्मीरी शॉलवाले याद रहेंगे।

शॉल के गठ्ठर लदा रिक्शा।
शॉल के गठ्ठर लदा रिक्शा।

 

डोमिनगढ़


डोमिनगढ़ के पास ककरा नदी पर पॉण्टून पुल। दांयी ओर रेल पुल है।
डोमिनगढ़ के पास ककरा नदी पर पॉण्टून पुल। दांयी ओर रेल पुल है।

किसी स्थान के बारे में मैं अगर सोचूं कि अनूठे कोण से लिख सकता हूं, तो वह गंगा के कछार के अलावा सम्भव नहीं। वहां मेरे साथ कोई सरकारी अमला नहीं होता था। ज्यादातर मैं कुरता पायजामा में होता था। या फ़िर जींस का पैण्ट। वहां के केवट, सब्जी उगाने वाले, मछेरे, ऊंट वाले या नित्य के स्नानार्थी मुझे निरीह जीव मानते थे। कुछ सिरफिरा जो अटपटे सवाल करता या कुछ फोटो खींचता था। कुछ को मैने यह बताया भी था कि उनसे बातचीत कर मैं क्या और कैसे उसे नेट पर प्रस्तुत करता हूं। कुल मिला कर गंगाजी के कछार में मैं घुल मिल सा गया था। अवैध शराब बनाने वालों की गतिविधियों पर ताक झांक करने का अपना एक खतरा था। पर उन लोगों से कोई सीधा टकराव नहीं हुआ। शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व!

लेकिन वैसा यहां गोरखपुर में नहीं है। यहां ऑस्टियो अर्थराइटिस पता चलने के कारण बहुत लम्बा पैदल नहीं चल पाता। वाहन से जाने पर कम से कम सरकारी एम्बेसडर कार और उसका सरकाई ड्राइवर मुझे रेलवे के लोगों से अलग थलग तो करता ही है, आम जनता में भी घुलने मिलने में सहायक नहीं है। यह मुख्य कारण है कि मेरी ब्लॉग पर गतिविधि कम हो गयी है। निकलना हो नहीं रहा है और निकलना जो हो भी रहा है वह रेलवे का प्रोटेक्टिव आवरण साथ होने के कारण इन्स्युलर है।

फिर भी जब कल डोमिनगढ़ (गोरखपुर से पश्चिम की ओर पहला स्टेशन) गया तो यह भाव ले कर गया कि पटरियों और सिगनल/स्टेशन के अलावा भी कुछ देखने का यत्न करूंगा। उस भाव की रक्षा हुयी – कुछ सीमा तक।

रेलवे स्टेशन पर यह वेटिंग हॉल जाने कब से बन रहा है।
रेलवे स्टेशन पर यह वेटिंग हॉल जाने कब से बन रहा है।

मेरे साथ मेरे यातायात  नियोजन के सहकर्मी मनीश, लखनऊ मण्डल के गोरखपुर में पदस्थ यातायात निरीक्षक श्री डीके श्रीवास्तव और मेरे वाहन चालक देवीप्रसाद साथ थे। गोरखपुर की संकरी सड़कों के बाजार से गुजरते हुये हम डोमिनगढ़ स्टेशन के लेवल क्रॉसिंग पर पंहुचे। यह लेवल क्रॉसिंग उत्तर की ओर संकरा हो गया है। इस समपार फ़ाटक के स्थान पर रोड ओवर ब्रिज बनाने का काम कई साल पहले प्रारम्भ हुआ होगा। उसके लिये सड़क के बीचोबीच खम्भे बन गये। फिर काम रुक गया। अब न रोड ओवर ब्रिज बन रहा है, न लेवल क्रॉसिंग गेट ठीक से काम कर पा रहा है।  काम न करने की कीमत लोग नित्य असुविधा के रूप में भुगत रहे हैं। स्टेशन से पहले सूर्यकुण्ड पड़ा। मिथक है कि राम अयोध्या वापस लौटते समय यहां रुके थे। यह तो जनकपुर के रास्ते में पड़ता होगा; लंका के रास्ते में नहीं। अत: शायद राम ससुराल से लौटते यहां आये हों। कोई बहुत आकर्षक नहीं था कि मैं वहां रुकता। किसी बड़े गांव के पोखरा जैसा था।

स्टेशन से नदी के रास्ते यह कचरा-अम्बार। वाहन का शीशा नहीं खोला वहां से गुजरते।
स्टेशन से नदी के रास्ते यह कचरा-अम्बार। वाहन का शीशा नहीं खोला वहां से गुजरते।

स्टेशन देखने के बाद मैने नदी देखने की इच्छा जताई। श्रीवास्तव जी ने मुझे बताया कि पास में ही है नदी। पर बहुत गन्दगी है। रास्ता भी संकरा है। मैने फिर भी वहां जाना चाहा। गया भी।

तीन नदियां हैं – ककरा, रोहिणी और राप्ती – ऐसा श्रीवास्तव जी ने बताया। यह पास वाली नदी ककरा है। दोनो नदियां आगे जा कर राप्ती में मिल जाती है।

डोमिनगढ़ स्टेशन ऊंचाई पर बना है पर उसके साथ की जमीन कछारी है। रिहायशी इलाकों को बचाने के लिये बन्ध बना है। अन्यथा नीचे के इलाकों में हर साल बाढ़ आ जाये। निचले इलाकों में अभी भी हर साल पानी भर जाता है।


इस क्षेत्र में प्रॉजेक्ट निर्माण की दशा –

टिपिकल यूपोरियन कंस्ट्रक्शन सिण्ड्रॉम। आधा तीहा काम होता है। तब तक पैसा चरित्रहीनता का असुर लील जाता है। उसके बाद वर्षॉं इंतजार होता है प्रॉजेक्ट के पूरा होने का। तब तक जो बना है, वह भी उपेक्षा में क्षरित होने लगता है।

योजनायें पूरा होने में अधिक समय। खर्चों की अधिकता। व्यापक इंफ्रास्ट्रक्चर की अभावग्रस्तता। अराजक दशा का भाव। छुटभैयों-माफिया की रंगदारी का माहौल… यह सब दीखता है।


ककरा नदी तक जाने वाली सड़क पर गिट्टी बिछी थी। डामरीकरण नहीं था। सो बहुत धूल थी। आते जाते ट्रक कूड़े से लदे थे। वे सड़क के किनारे कछारी इलाके में कूड़ा डम्प कर रहे थे। यह क्षेत्र गोरखपुर के कूड़े का लैण्डफिल था। आते जाते 5-6 ट्रक/ट्रॉली देखे मैने। कचरा/लैण्डफिल और गन्दगी – बीमारियों का उत्तमोत्तम स्थान। पास में जो घर थे, वे भी बहुत सम्पन्न लोगों के नहीं थे। कौन धनी ऐसी जगह रहेगा भला?!

नदी किनारे धोबीघाट। कई धोबी घाट हैं यहां।
नदी किनारे धोबीघाट। कई धोबी घाट हैं यहां।
धोबीघाट पर सूखने को टंगे कपड़े।
धोबीघाट पर सूखने को टंगे कपड़े।

नदी से पहले कई उथले जगहों में पानी के तालाब थे। ऐसे ही एक तालाब के किनारे, सड़क से सटा धोबी घाट था। पक्की इमारत। करीब पन्द्रह बीस रजक वहां कपड़े धोते दिखे। कपड़ों में वस्त्र तो नहीं थे – ज्यादा तर होटलों, टेण्ट हाउस वालों के कपड़े दिखे। रुका हुआ, लैण्डफिल के पास का दूषित जल। उसमें धुलते यह कपड़े। भगवान ही बता सकते हैं कि उनका प्रयोग करने वाले कितना रिस्क लेते होंगे चर्म और अन्य रोगों का। घरों में अब वाशिंग मशीने हैं सो इस प्रकार के सार्वजनिक वस्त्र-प्रक्षालन से मुक्ति मिल गयी है।

नदी में जल अधिक नहीं था (मैं मन ही मन गंगा नदी से तुलना कर रहा हूं); पर जल में बहाव अच्छा था। सड़क एक पाण्टून पुल से गुजरती है उस पार जाने के लिये। उस पार एकाध मन्दिर, उनकी ध्वजायें और झोंपड़ियां/ पक्के मकान थे करार पर। बायीं ओर रेल पुल था – दोहरी लाइन का। उनकी बगल में एक संकरा पुल था – शायद पैदल के लिये।

एक बड़ा पुल दायीं ओर निर्माणग्रस्त था – वैसे ही जैसे स्टेशन पर रोड-ओवर-ब्रिज था। पुल के पिलर बन चुके थे पर पुल बनने का काम वर्षों से रुका पड़ा था।

कंकरा नदी पर निर्माणग्रस्त सड़क पुल।
कंकरा नदी पर निर्माणग्रस्त सड़क पुल।

अधबना रुका पुल। टिपिकल यूपोरियन कंस्ट्रक्शन सिण्ड्रॉम। आधा तीहा काम होता है। तब तक पैसा चरित्रहीनता का असुर लील जाता है। उसके बाद वर्षॉं इंतजार होता है प्रॉजेक्ट के पूरा होने का। तब तक जो बना है, वह भी उपेक्षा में क्षरित होने लगता है। ऐसा ही मुझे डोमिनगढ़ रेलवे स्टेशन पर भी दिखा था। वहां एक वेटिंग हाल जाने कब से बन रहा था और नीव पूरी होने पर काम छोड़ दिया गया था। पिलर के सरिया भर दिख रहे थे – स्टील का एकाबेना बनाते। … मुझे मायूसी होने लगी।

बाबू। 'एकाध किलो मछली पकड़ लेते हैं रोज'
बाबू। ‘एकाध किलो मछली पकड़ लेते हैं रोज’

दूर चिता जल रही थी। श्मशान भी है यहां। तभी तो शायद नाम है – डोमिनगढ़।

मैं अपना ध्यान बंटा रेल पुल के नीचे मछली पकड़ने वालों को निहारने लगा। एक लम्बी कंटिया/लग्गी लिये जवान आता दिखा। पूछा तो नाम बताया बाबू। यहीं घण्टाघर में काम करते हैं। काम से छूट कर ककरा नदी में मछली पकड़ते हैं। “काम भर को मिल जाती है – एकाध किलो। भाग्य अच्छा हुआ तो किसी दिन बड़ी मछली भी हाथ लग जाती है।” बाबू के पास समय की कमी हो, ऐसा नहीं लगता था। पर वह अपने को बहुत व्यस्त दिखा रहा था। खैर फोटो तो खिंचा ही लिया!

हम ककरा नदी किनारे से वापस हो लिये। कभी मौका मिला तो रोहिणी और राप्ती किनारे भी चक्कर लगेगा। … ये सभी नदियाँ अंतत: मिलती तो गंगा में ही हैं।

नदियाँ चरित्र का प्रवाह हैं। नदियां स्वस्थ हैं तो चरित्र स्वस्थ है।

सिनेमा संगीत का विस्तृत शास्त्रीय अध्ययन – श्री कन्हैयालाल पाण्डेय


श्री कन्हैयालाल पाण्डेय
श्री कन्हैयालाल पाण्डेय

श्री कन्हैयालाल पाण्डेय।

वे कुछ समय पहले तक रेलवे मेँ अतिरिक्त सदस्य (वाणिज्य) थे। अब रेलवे से सेवा निवृति ले कर यहां गोरखपुर में रेल दावा ट्रिब्यूनल में सदस्य (तकनीकी) बने हैं।

कल वे मेरे चेम्बर में पधारे।

उनकी ख्याति जितनी रेलवे में है, उससे कहीं ज्यादा फिल्म संगीत के अध्ययन के क्षेत्र में है। इसके अलावा उन्होने हिन्दी साहित्य में भी प्रयोग किये हैं। उनकी कई पुस्तकें कविता, सटायर और लघु कथा के विषय में हैं।

हिन्दी फिल्में, फिल्म संगीत, हिन्दी साहित्य – कविता, सटायर और लघु कथायें – ये सभी ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें मेरी जानकारी न के बराबर है। अत: उनसे मैं अपनी ओर से बहुत कुछ नहीं पूछ पाया। श्री पाण्डेय ने जो बताया, वह ब्लॉगर-धर्मिता के साथ प्रस्तुत कर रहा हूं।

श्री कन्हैयालाल पाण्डेय के पास डेढ़ लाख से अधिक गीतों के ऑडियो/वीडियो और 2-2 हजार हिन्दी-अंग्रेजी फिल्मों का संकलन है। “यह रखने के लिये बड़ा घर चाहिये। तभी मैं बड़े घर की इच्छा करता हूं। अन्यथा व्यक्तिगत आवश्यकता अधिक नहीं है।” – श्री पाण्डेय ने बताया।

स्कूली शिक्षा में संगीत उनका एक विषय था। अत: बीज तो वहीं से पड़ा था संगीत के बारे में। शास्त्रीय संगीत का गहन ज्ञान कालान्तर में उन्होने स्व. ठाकुर सुकदेव बहादुर सिंह जी से अर्जित किया। गीतों के संकलन का चस्का लगा तो उनके पीछे रागों की मैलोडी (माधुर्य?) जानने की भी जिज्ञासा बनी। बड़ोदा में बतौर मण्डल-रेल-प्रबन्धक और उसके बाद जबलपुर में पशिम-मध्य रेलवे के मुख्य परिचालन प्रबन्धक होने के समय फिल्मी गीतों के अध्ययन की उनकी इच्छा बलवती हो गयी।

अपने पास लाख से अधिक गीतों के कलेक्शन में उन्होने हिन्दी फिल्मों के 65 हजार गाने पाये जो सबसे पहले की फिल्म आलम आरा (सन1931)  से ले कर आधुनिक समय की हैदर (सन 2014) फिल्म तक में हैं। इन 65 हजार गीतों में से वैविध्य के आधार पर उन्होने 4600 फिल्मों के 15 हजार चुने। जबलपुर में उन्होने संगीत में पारंगत लोगों की एक टीम बनाई। वह रोज शाम दो घण्टे पहले इन चुने गीतों को बजाती थी, उनके बीच चर्चा करती थी कि उसमें कौन राग का प्रारम्भ है और गाने के दौरान वही राग रहता है या अन्य राग भी उसमें आते हैं। इस चर्चा के आधार पर विस्तृत नोट्स बनाये गये।

स्क्रीन में प्रकाशित श्री पाण्डेय की गतिविधियों पर एक लेख।
स्क्रीन में प्रकाशित श्री पाण्डेय की गतिविधियों पर एक लेख।

लगभग 5000 रागों (तथ्यानुसार 4840) में से मैलोडी के आधार पर लगभग 500 राग उन्होने चुने थे, जिनके अवयव उन्होने फिल्मी गीतों में तलाशे। लगभग 170 रागों की उपस्थिति उन्होने गीतों में दर्ज की। यह पाया कि आरम्भिक दौर (30 से 60 के दशकों की फिल्मों में) उन्हे एक राग पर आर्धारित गीत बहुतायत में मिले। कालान्तर में रागों का मिश्रण होने लगा। गीत एक राग से प्रारम्भ होता और उसके प्रवाह में अन्य राग मिलते। आजकल के गीतों में तो राग बड़े जिग-जैग चलते हैं। उनके अध्ययन में यह बात पूरी तथ्यात्मकता से सामने आयी है।

यह अध्ययन उन्होने लगभग 3600 पृष्ठों में द्विभाषी रूप में (अंग्रेजी और हिन्दी में ) समेटा है। इसको सात खण्डों में  “हिन्दी सिने-संगीत रागोपीडिया” के रूप में स्टार पब्लिकेशंस, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित किया जा रहा है।01


अध्ययन से – 

पन्द्रह हजार गीतों के अध्ययन के अनुसार हिन्दी फिल्मों में सबसे लोकप्रिय राग हैं – पहाड़ी ( 3710 गीतों में पाया गया), खमाज (2970), नट भैरवी (2210), काफी (2100), भैरवी (1670), पीलू (900), मांझ खमाज (818), यमन+यमन कल्याण (174 + 305),किरवानी (783), बिलावल (672), झिंझोटी(606), चारुकेशी (402), 9 विभिन्न प्रकार के मल्हार (236), 5 विभिन्न प्रकार के सारंग (337), भैरव, असावरी, गावती, कलावती, बागीश्री,  मालगुंजी, गारा, धानी, भीमपलासी, बिहाग, मारू बिहाग, दरबारी, मालकौंस, शिवरंजिनी इत्यादि। 


श्री कन्हैयालाल पाण्डेय को उनके इस अध्ययन के आधार पर विभिन्न शास्त्रीय संगीत से सम्बद्ध विश्वविद्यालयों में प्रेजेण्टेशन के लिये बुलाया जा रहा है। अब तक वे 28-29 प्रेजेण्टेशन कर चुके हैं। सात शोधार्थी इस सामग्री के आधार पर पी.एच.डी. करने के लिये विभिन्न विश्वविद्यालयों में एनरोल भी हो चुके हैं।  श्री पाण्डेय को पुणे में (नाना पाटेकर द्वारा) और बेलगाम में सम्मानित भी किया जा चुका है। इस शोध के माध्यम से उनकी फिल्मी संगीत की हस्तियों – रवि, आनन्द जी और खय्याम आदि से निकटता भी बनी है उनकी और इन फिल्मी संगीत की हस्तियों से गहन चचायें भी हुई हैं संगीत के अध्ययन पर।

श्री कन्हैयालाल पाण्डेय को मिला एक सम्मान-पत्र
श्री कन्हैयालाल पाण्डेय को मिला एक सम्मान-पत्र

जैसा मैने कहा – न मैं विस्तृत कुछ पूछ पाया और न उसे विधिवत नोट कर पाया। पर जितना श्री पाण्डेय  को सुना, उससे यह विचार घर कर गया कि अपने में रेलवे के कार्य के इतर हुनर अवश्य निखारना चाहिये। उससे यश प्राप्ति तो होती ही है; रेलवे के काम के अतिरिक्त पहचान भी बनती है और नौकरी के बाद समय काटने का वैक्यूम नहीं झेलना पडता।

लगभग पौना घण्टे की उनसे मुलाकात में बहुत प्रभावित हुआ मै। वे गोरखपुर में रहेंगे – अत: श्री कन्हैयालाल पाण्डेय जी से आगे मिलना तो होता ही रहेगा। उनके सानिध्य में शायद कभी मुझमें भी संगीत के प्रति रुचि बने।

शायद!

कृष्ण कुमार अटल


पूर्वोत्तर रेलवे की अपनी अंतिम विभागीय बैठक को चेयर करते श्री कृष्ण कुमार अटल।
पूर्वोत्तर रेलवे की अपनी अंतिम विभागीय बैठक को चेयर करते श्री कृष्ण कुमार अटल।

उनतीस अगस्त। शाम चार बजे। श्री कृष्ण कुमार अटल, महाप्रबन्धक, पूर्वोत्तर रेलवे की रिटायरमेण्ट के पहले अपने विभागाध्यक्षों के साथ अंतिम बैठक। एक प्रकार से वाइण्डिंग-अप।

मैं उस बैठक में विभागाध्यक्ष होने के नाते उपस्थित था। चूंकि उस बैठक में हमें श्री अटल से जाते जाते उनकी 37 वर्ष की रेल सेवा पर उनके विचार और रेलवे के भविष्य पर उनकी सोच सुननी थी; मैं अस्वस्थता के बावजूद दफ्तर गया और सुनिश्चित समय पर बैठक में मौजूद रहा।

श्री अटल के विभिन्न विषयों पर विचार यूं रहे (यह मेरे सुने के अनुसार है। अस्वस्थ होने के कारण मैं पूरी तन्मयता से नहीं सुन/नोट कर पाया, अत: ब्लॉगिंग में जो चूक हो, वह मेरी है) –

पूर्वोत्तर रेलवे पर:

कंजरवेटिव रेलवे (यथा पश्चिम रेलवे) की बजाय यहां किसी नये विचार को लागू कराना कहीं आसान रहा। बढ़ोतरी के लिये रेलवे में नयेपन के प्रति एक्सेप्टेबिलिटी होना बहुत जरूरी है और उस आधार पर पूर्वोत्तर रेलवे में बहुत सम्भावनायें हैं।

काम करने के तरीके पर: 

अपने से दो स्टेप आगे के पद पर बैठे लोगों को कभी खौफ से नहीं देखा। उनके कहे को काफी तर्क संगत तरीके से विश्लेषित किया और उनसे सहमत न होने पर अपने विचार पूरी शिद्दत से सामने रखे। अपने आप को रेलवे सम्बन्धी ज्ञान से जितना अपडेट हो सकता था, करने की हमेशा कोशिश की। “ज्ञान का कोई विकल्प है ही नहीं”। लोग सरकार में और रेलवे में भी अपने कम्फर्ट जोन में जीने के आदी हो जाते हैं। किसी ने कहा है कि जो सरकारी नौकरी में तीन साल काम कर ले, वह बेकार हो जाता है। मैं कहूंगा कि रेलवे में जो दस साल काम कर ले, वह बेकार हो जाता है। उसका अपवाद बनने के लिये अपने ज्ञान को सतत परिमार्जित करते रहना चाहिये।

लेडी मेकबेथ को याद किया – प्रबन्धन खून का दरिया है। आगे जाना भी कठिन है और पीछे लौटना भी! 🙂

रेलवे के विभागीय बंटवारे पर: 

जूनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड तक विभागीय प्रबन्धन बहुत जरूरी है। अंतर-विभागीय प्रतिस्पर्धा के बहुत लाभ हैं। पर रेलवे बोर्ड के स्तर पर यह कहा जा सकता है कि रेल तभी प्रगति कर सकती है जब चेयरमैन रेलवे बोर्ड एक बिनोवेलेण्ट डिक्टेटर हो – विभिन्न विभागों के सदस्यों की खींचातानी के परे। रेलवे की समस्या विभागीय आधार पर कम्पार्टमेण्टलाइजेशन है।

अधिकारी जब जनरल मैनेजमेण्ट की पोस्ट पर आयें तो उन्हे अपने विभागीय आधार को पूरी तरह दरकिनार कर देना चाहिये। अधिकारियों को अपनी पोस्ट में आत्म-विकास करना चाहिये और पोस्ट की जिम्मेदारियों के अतिरिक्त आउट-ग्रो करना चाहिये। अन्य सभी विभागों की जरूरतों को समझते हुये।

रेलवे बोर्ड पर:

रेलवे बोर्ड बहुत बड़ा संस्थान बन गया है। वहां बहुत से लोगों के पास बहुत कम काम है और बहुत कम हैं जो काम के बोझ से बहुत लदे हैं। जो बोर्ड में एक बार पोस्टिंग ले लेता है वो येन-केन-प्रकरेण वहीं बने रहना चाहता है। अत: बहुत से अच्छे अधिकारी वहां बरबाद हो रहे हैं और रेलवे को उनकी तकनीकी और प्रबन्धन क्षमता का पूरा लाभ नहीं मिल रहा।

अपने सबसे चलेंजिंग असाइनमेंण्ट पर: 

सबसे चैलेंजिंग असाइनमेण्ट रहा ईडी.एमई. (ट्रेक्शन) का।


श्री अटल ने बहुत बेबाकी से बहुत कहा। उनसे यह भी अनुरोध किया गया कि अपने अनुभवों के आधार पर वे पुस्तक लिखें। पर उन्होने कहा कि वे ऐसा नहीं करेंगे। उन्होने पूरी निष्ठा से रेलवे की सेवा की है। रेलवे का नमक खाया है। उसकी कमजोरियों और व्यक्तियों की विवादास्पद निजता को जग जाहिर कर उस नमक के साथ विश्वासघात नहीं करेंगे। (यद्यपि मेरा सोचना है कि इसमें विश्वासघात जैसा कुछ भी नहीं। वे बहुत बढ़िया कह रहे थे और उनले लिखे मेमॉयर्स बहुमूल्य होंगे। अगर उनमें एक साथ पुस्तक लिखने का धैर्य/पेशेंस न हो तो उन्हे ब्लॉग बना कर वह लिखना चाहिये।)

यातायात विभाग द्वारा दिये जा रहे फेयरवेल में श्री अटल।
यातायात विभाग द्वारा दिये जा रहे फेयरवेल में श्री अटल।

लगभग एक-सवा घण्टे की बैठक के बाद हम लोग सभा कक्ष के बाहर निकले। महाप्रबन्धक कार्यालय के पोर्टिको में श्री अटल की कार पर फूल सजाये जा रहे थे। भाव भीनी विदाई!

श्री अटल के साथ मैने तीन दशक पहले रतलाम में कार्य किया था। वे वहां सीनियर डिविजनल मैकेनिकल इंजीनियर थे और मैं डिविजनल ऑपरेशंस सुपरिण्टेण्डेण्ट। अब इस समय वे पूर्वोत्तर रेलवे के महाप्रबन्धक हैं और मैं मुख्य ऑपरेशंस मैनेजर।

श्री अटल एक कुशल गोल्फर भी हैं। गोरखपुर रेलवे गोल्फ क्लब ने आज उनके सम्मान में गोल्फिंग-आउट मैच और समारोह रखा।
श्री अटल एक कुशल गोल्फर भी हैं। गोरखपुर रेलवे गोल्फ क्लब ने आज उनके सम्मान में गोल्फिंग-आउट मैच और समारोह रखा।

विगत कल उनका दफ्तर में अंतिम कार्य दिवस था। आगामी कल शाम वे गोरखपुर से विदा लेंगे अपना कार्यकाल और रेल सेवा के सैंतीस वर्ष सकुशल पूरा कर।

शुभकामनायें!