दलित बस्ती में मनी रविदास जयंती

“हवन कौन कराता है? बाहर से किसी पण्डित को बुलाते हैं?”
“नहीं। बस्ती के ही जानकार पुराने लोग करा लेते हैं। पहले मेरे बब्बा जानकार थे। अब कोई बचा नहीं। अब तो लोग सिर्फ जैकारा भर लगाना जानते हैं।”


कल माघी पूर्णिमा थी। संत रविदास जयंती मनी दलित बस्ती में। सवेरे राजेश (अरुणा का आदमी) आया था चंदा लेने। पत्नीजी ने दो सौ रुपया दिया। और जगहों से शायद और भी ज्यादा मिला हो। प्रधानी चुनाव का समय है। जितने वोट नहीं, उससे ज्यादा प्रधानी के दावेदार उतरा रहे हैं। हर एक ज्यादा से ज्यादा चंदा देने की होड़ में है।

अरुणा का आदमी अच्छा कलाकार है। कार्पेट बुनता है। ढोल अच्छा बजा लेता है। शायद दुर्गापूजा की मूर्तियां भी कुछ कुछ बना लेता है। हाथ में हुनर है पर बहुत ज्यादा ट्रेनिंग नहीं मिल पाई, वर्ना किसी विधा में अच्छा कारीगर बन जाता।

Sant Ravidas
सन्त रविदास

मेरे घर के पीछे दलित बस्ती है। वहां शाम को लाउड स्पीकर लगा। संत रविदास की फोटो रखी गयी। मंच बना। मेरे घर काम करने वाली कुसुम के पति राजकुमार ने बताया कि पूजा हुई, हवन हुआ और आरती भी। संत रविदास के भजन भी हुये। भोजन भण्डारा नहीं था; पर प्रसाद बंटा। लड्डू, लाचीदाना, फल आदि बांटे गये। रात में आरकेस्ट्रा पर दो महिलायें नाचींं भी। पूरा सामाजिक सांस्कृतिक कार्यक्रम रहा। प्रधानी के उम्मीदवार भी आये वहांं – सुंदर नाऊ और मैडीकल की दुकान वाले पाल भी। दोनो कैण्डीडेट हैं प्रधानी के।

मैंने पूछा – हवन कौन कराता है? बाहर से किसी पण्डित को बुलाते हैं?

“नहीं। बस्ती के ही जानकार पुराने लोग करा लेते हैं। पहले मेरे बब्बा जानकार थे। रामायन पढ़ते थे। भजन भी बहुत आते थे उन्हें। और भी कई किताबें थींं उनके पास। जब वे नहीं रहे तब किताबें इधर उधर फिंका गयीं। और कोई भजन गाने वाला बचा नहीं। अब तो लोग सिर्फ जैकारा भर लगाना जानते हैं।”

“तीन सामुहिक फंक्शन होते हैं। रविदास जयंती, अम्बेडकर जन्मदिन और नवरात्र में दुर्गामाई की स्थापना। तब डीजे भी आता है। रात भर जाग कर गाना-नाचना होता है। डीजे वाला 2-3 हजार लेता है। शाम को लगाता है और सवेरे वापस ले जाता है।”

संत रविदास या रैदास यहीं बनारस के पास के थे। उनके गुरु रामानंद थे। उनका इतिहास बहुत कुछ निर्गुण पंथी कबीरदास जी जैसा है। मैंने पढ़ा कि वे गुरु नानक से भी मिले थे और उनके 41 छंद गुरु ग्रंथ साहब में सम्मिलित हैं। एक महान संत की स्मृति यहां जीवित है और जीवित रखने वाले दलित बस्ती के हैं।

रात में तेज डीजे बजने के कारण नींद तो टूटी पर तब कुछ अच्छा ही बज रहा था उसपर। आज सवेरे सात बजे जब घूमने निकला तब भी डीजे बज रहा था। पर रविदास जयंती का बिहान था। तब भोजपुरी के आम गाने का नम्बर लग चुका था। वे गाने जो भदेस होते हैं और जिनका संत रविदास की परम्परा से दूर का भी लेना देना नहीं होता।

अब जब यह लिखने बैठा हूं, तो लगता है कि वहां एक चक्कर मुझे लगा आना चाहिये था। अगले साल जाऊंगा।


#200शब्द – कैलाश दुबे

मुझे यह लगा कि यूंही, कैलश जी के पास जाया और बैठा जा सकता है। धर्म और अर्थ को सरलता के मधु में जिस कुशलता से उन्होने साधा है, वह अभूतपूर्व है।


वे इस गांव के सम्भवत: सज्जनतम व्यक्ति हैं। सवेरे उठ कर शौच-स्नान के बाद एक डेढ़ घण्टा ईश्वर पूजन में लगाते हैं। उनके पास धर्म ग्रंथ न केवल हैं, वरन उनका अध्ययन भी करते हैं। नियमित अध्ययन अनुशासन की स्निग्धता उनमें प्रचुर है। उनकी ही जमीन पर हनुमान जी का एक मंदिर है, जिसकी प्रतिमा जमीन में मिली थी। उन्होने प्रतिमा की पुनर्स्थापना की है और वार्षिक भण्डरा भी होता है वहां।

मैंने उन्हे गांव के पंच-प्रपंच में उलझते नहीं पाया। व्यवहार में सरल हैं। कभी किसी से अपशब्द बोलते नहीं देखा।

मेरी तरह उन्हे भी ऑस्टियोअर्थराइटिस है और वे भी पैदल की बजाय साइकिल से चलते हैं!

मैं यक्ष-प्रश्न के संदर्भ में महाभारत का अरण्यपर्व देखने उनके यहां गया था। पर जैसा सामान्यत: होता है; लोग महाभारत घर में रखते नहीं। उनके पास भागवत पुराण था, पर उसमें यक्ष संदर्भ नहीं मिला।

सवेरे सवेरे जितने प्रेम से उन्होने मुझे बिठाया और मनोयोग से भागवत के दोनो खण्ड खंगालने का कार्य किया, वह बहुत अच्छा लगा।

मुझे यह लगा कि यूंही, कैलश जी के पास जाया और बैठा जा सकता है। धर्म और अर्थ को सरलता के मधु में जिस कुशलता से उन्होने साधा है, वह अभूतपूर्व है।

kailash dubey
कैलाश दुबे जी, विक्रमपुर

पहले का ग्रामीण रहन सहन और प्रसन्नता

लोग सामान्यत: कहते हैं कि पहले गरीबी थी, पैसा कम था, मेहनत ज्यादा करनी पड़ती थी, पर लोग ज्यादा सुखी थे। आपस में मेलजोल ज्यादा था। हंसी-खुशी ज्यादा थी। ईर्ष्या द्वेष कम था।


गांवदेहात में घूमते हुये जब मुझे अपनी या उससे अधिक उम्र के लोग मिलते हैं तो उनसे बातचीत करने में मेरा एक प्रमुख विषय होता है कि उनके बचपन से अब में ग्रामीण रहन सहन में कितना और कैसा परिवर्तन हुआ है। अलग अलग लोग अलग अलग प्रतिक्रिया करते हैं। मुख्यत: दलित बस्ती के लोगों की प्रतिक्रिया होती है कि पहले से अब उनकी दशा में बहुत सुधार हुआ है।

अन्य वर्गों के लोग सामान्यत: कहते हैं कि पहले गरीबी थी, पैसा कम था, मेहनत ज्यादा करनी पड़ती थी, पर लोग ज्यादा सुखी थे। आपस में मेलजोल ज्यादा था। हंसी-खुशी ज्यादा थी। ईर्ष्या द्वेष कम था।

कल अगियाबीर में गुन्नीलाल पाण्डेय जी से मुलाकात हुई। उनके साथ रिटायर्ड प्रिंसिपल साहब – प्रेमनारायण पाण्डेय जी भी थे। दोनो सज्जन सत्तर के आरपार हैं। दोनो के पास पुराने और नये जमाने की तुलना करने के लिये पर्याप्त अनुभव-आयुध है।

प्रेम नारायण मिश्र (बायें) और गुन्नीलाल पाण्डेय

गुन्नी पांंड़े ने मेरे अनुरोध पर अपनी छत पर चढ़ी लौकी से तीन लौकियां मुझे दी थीं। जब बात पुराने नये रहन सहन की चली तो गुन्नी बोले – “हेया देखअ; पहिले अनाज मोट रहा। बेर्रा, जवा, बजरी, सांवा मुख्य अनाज थे। गेंहू तो किसी अतिथि के आने पर या किसी भोज में मिलता था। पर उस भोजन में ताकत थी। लोग पचा लेते थे और काम भी खूब करते थे।

“आजकल सब्जी भाजी रोज बनती है। तब यह यदा कदा मिलने वाली चीज थी। बाजार से सब्जी तो कभी आती नहीं थी। घर के आसपास जो मिल जाये, वही शाक मिलता था। और तब ही नहीं, युधिष्ठिर ने भी यक्ष-संवाद में कहा है कि पांचवे छठे दिन सब्जी बना करती थी।”

मेरे लिये यह एक नयी बात थी। मैंने पूछा – “अच्छा? युधिष्ठिर ने क्या कहा?”

यक्ष – युधिष्ठिर संवाद

गुन्नीलाल जी ने महाभारत का एक श्लोक सुनाया। उन्होने बताया कि अरण्य पर्व में यक्ष-युधिष्ठिर सम्वाद है। उसमें यक्ष का एक प्रश्न है –

यक्ष उवाच – को मोदते?

युधिष्ठिर उवाच – पंचमेSहनि षष्ठे वा, शाकम पचति स्वे गृहे। अनृणी चाप्रवासी च स वारिचर मोदते॥

इसका हिंदी अनुवाद मैंने अंतरजाल से उतारा –

यक्ष प्रश्न : कौन व्यक्ति आनंदित या सुखी है?

युधिष्ठिर उत्तरः हे जलचर (जलाशय में निवास करने वाले यक्ष), जो व्यक्ति पांचवें-छठे दिन ही सही, अपने घर में शाक (सब्जी) पकाकर खाता है, जिस पर किसी का ऋण नहीं है और जिसे परदेस में नहीं रहना पड़ता है, वही मुदित-सुखी है।

गुन्नीलाल जी ने अपने शब्दों में स्पष्ट किया कि शाक-सब्जी रोज बनने की चीज नहीं थी; महाभारत काल में भी नहीं। सम्पन्नता आज के अर्थों में नहीं थी। पैसा नहीं था। लोग अपनी आवश्यकतायें भी कम रखते थे। इसलिये उनपर कर्जा भी नहीं हुआ करता था। गांगेय क्षेत्र में लोग बहुत यात्रा भी नहीं करते थे। परदेस में जाने रहने की न प्रथा थी, न आवश्यकता। इस प्रकार लोग आज की अपेक्षा अधिक आनंदित और सुखी थे।

राजबली विश्वकर्मा

लगभग ऐसी ही बात मुझे राजबली विश्वकर्मा ने भी बताई थी। उन्होने तो बारह किलोमीटर दूर अपनी किराना की दुकान खोली थी, जिसे उनके बाबा बंद करा कर उन्हें गांव वापस ले आये थे। उनके अनुसार भी खाने को मोटा अन्न ही मिलता था, जिसमें आज की बजाय ज्यादा ताकत थी। “आज अनाज उगने में पहले से आधा समय लेता है। इस लिये उसमें स्वाद भी नहीं होता और ताकत भी आधा ही होती है उसमें।”

राजबली के अनुसार भी उस समय लोग ज्यादा प्रसन्न रहा करते थे। “अब तो मोबाइल में ही लगे रहते हैं। दो घर आगे वाले से महीनों बीत जाते हैं, बात ही नहीं होती।”

अपने बचपन की याद कर राजबली बताते हैं कि उन्हें कोई कपड़ा छ साल की उम्र तक नहीं सिलाया गया। पुरानी धोती आधी फाड़ कर उसी की भगई बनाई जाती थी उनके लिये। वही पहने रहते थे। ऊपर बदन उघार ही रहता था। सर्दी में पुआल और एक लोई-दुशाला में दुबके रह कर गुजार देते थे।

ये साठ की उम्र पार सज्जन जो बताते हैं; उसके अनुसार पहले पैसा नहीं था, चीजें नहीं थीं। अभाव बहुत ही ज्यादा था; पर प्रसन्नता बहुत थी।

पता नहीं आज लोग इससे सहमत होंगे या नहीं होंगे; पर इन सीनियर सिटिजन लोगों ने जो बताया, वह तो यही है।


कुछ बच्चों के पुराने चित्र

कुल मिला कर लड़कियों की जिंदगी ढर्रे पर चल निकली है। वे घर संभालने लगी हैं। खेतों में कटाई के काम में जाने लगी हैं। लड़के अभी बगड्डा घूम रहे हैं, पर कुछ ही साल बाद मजदूरी, बेलदारी, मिस्त्रियाना काम में लग जायेंगे।


साढ़े पांच साल हो गये। अचानक पुराने चित्र लैपटॉप की हार्ड डिस्क में नजर आ गये। धीरे चल रहा है तब का लिया लैपटॉप। उसे फेज आउट करने या री-फार्मेट कर एक बार फिर इस्तेमाल करने का उहापोह चल रहा है। उसी संदर्भ में टटोलते ये चित्र दिखे। आठ अगस्त 2015 की तारीख है जो उन चित्रों की ‘प्रॉपर्टीज’ खंगालने पर दिखी।

उस समय मैं अपने रिटायरमेण्ट की तैयारी कर रहा था। सात सप्ताह बाद रेल सेवा से निवृत्ति होनी थी। कटका रेलवे स्टेशन के पास घर बनवा रहा था। वहीं की ट्रिप पर था। रास्ते में कैथी (छोटी काशी; गोमती और गंगा के संगम के पास मारकण्डेय महादेव का स्थान) में यह भीख मांगता बालक दिखा था। देख कर लगता था मानो इथियोपिया या सोमालिया का दृश्य हो। बहुत उदास करने वाला सीन। मुझे याद नहीं आता कि मैंने उसे कुछ दिया था या नहीं।

कैथी (छोटी काशी; गोमती और गंगा के संगम के पास मारकण्डेय महादेव का स्थान) में यह भीख मांगता बालक

रिटायरमेण्ट के बाद में यहां गांवदेहात में रहते घूमते मैंने बहुत गरीबी देखी है और विपन्न बच्चे भी। पर इतना दारुण दृष्य नहीं देखा। यह बच्चा अपना चित्र खिंचवाने में झेंप रहा था। मैंने बहुत देर इंतजार किया कि वह अपना हाथ मुंह से हटाये। पर जब तक वहां रहा, वह मुंह ढ़ंके ही रहा।

उसी दिन गांव में, जहां मेरा घर बन रहा था; बहुत से बच्चे दिखे। खाकी रंग की स्कूल यूनीफार्म में। उस समय आधी छुट्टी हुई थी। उन्हें मिड डे मील मिला था। अपने अपने घर से लाये बर्तनों में भोजन ले कर मेरे साले साहब के परिसर में आ कर भोजन कर रहे थे। भोजन सादा ही था। चावल और दाल/सब्जी। मात्रा देख कर लगता था कि हर बच्चे का पेट तो भर ही जा रहा होगा।

एक चित्र में दो लड़कियां और एक लड़का है। यहींं गांव के बच्चे हैं। अब इस चित्र को खींचे छ साल होने को आये। ये बच्चे अगर पढ़ रहे होंगे तो अब प्राइमरी स्कूल में नहीं, मिडिल स्कूल में होंगे। चित्र नीचे है –

विकास, अंजलि और काजल – बांये से दायें।

इन बच्चों के बारे में पता किया। इनके नाम हैं – विकास, अंजलि और काजल।

विकास दलित बस्ती का बालक है। उसका पिता, देशराज महराजगंज से आसपास के गांवों में सगड़ी (ठेला) से सामान ढोता है। हाईवे के उस पार के स्कूल में एक दिन छोड़ एक दिन स्कूल लगता है। उसमें जाने लगा है। अन्यथा लॉकडाउन के दौरान, अन्य बच्चों की तरह वह भी यूं ही टहल ही रहा था।

अंजलि मेरे घर काम करने वाली कुसुम की बिटिया है। स्कूल में नाम लिखा है। पर स्कूल जाना उसे रुचता नहीं। घर का काम करती है। फसल कटाई में भी जाती है। इस मौसम में पचास किलो धान और पचास किलो गेंहू कमाया है उसने फसल कटाई में। पढ़ने में मन नहीं लगता पर अपना नाम ठीक से लिख लेती है। मेरी पत्नीजी ने उसे पढ़ाने की कोशिश की। डांट भी पड़ी तो रोने लगी और छोड़ छाड़ कर गयी तो उनके पास वापस नहीं आयी। उसने अपनी जिंदगी के स्वप्न और जीने का तौर तरीका तय कर लिया है। भविष्य में शादी होगी, घर बसायेगी और काम करेगी। जिंदगी चलती रहेगी!

तीसरी लड़की है काजल। उसने पढ़ाई छोड़ दी है। उसकी मां बाबूसराय जाती है कार्पेट सेण्टर में काती बनाने के काम के लिये। माँ काम करने जाती है तो काजल घर में रह कर अपने भाई बहनों की देखभाल करती है। घर का सारा काम करती है। उसकी जिंदगी भी तय हो गयी है।

कुल मिला कर लड़कियों की जिंदगी ढर्रे पर चल निकली है। वे घर संभालने लगी हैं। खेतों में कटाई के काम में जाने लगी हैं। कुछ टेम्पो में बैठ कर किरियात के कछार में आलू, मिर्च, मटर की सब्जी चुनने के काम में भी जाती हैं। उन्हें सौ रुपया रोज और कुछ सब्जी मिलती है। टेम्पो पर लदे गीत गाते जाते आते देखा है मैंने उनको।

लड़के अभी बगड्डा घूम रहे हैं, पर कुछ ही साल बाद मजदूरी, बेलदारी, मिस्त्रियाना काम में लग जायेंगे। उन सब के सपने सरल से हैं। जिंदगी सही सपाट है। कुल मिला कर उसमें गरीबी है, कष्ट है, पर सरलता और आनंद भी है। बड़े बड़े विद्वान ‘वर्तमान में जीना सीखो’ का फलसफा हमें सिखाने का भरसक प्रयास करते हैं। मोटे मोटे ग्रंथ लिखे हैं उसको ले कर। यहां ये बच्चे केवल और केवल वर्तमान में ही जीते हैं।

ये बच्चे केवल और केवल वर्तमान में ही जीते हैं।

गरीबी और अभाव वर्तमान में जीना सिखा ही देते हैं!

बांस के कारीगरों के समीप

करीब एक दर्जन घर हैं धईकारों के। वे सब बांस के सामान बुनते हैं। रीता पाण्डेय ने एक महिला, बदामा, से बातचीत की। एक उसौनी खरीदी।


मैंने पास के गांव – वह बड़ा गांव है, कस्बे जैसा – गिर्दबड़गांव की धईकार बस्ती के बारे में पहले भी लिखा है। अब, जब तय किया कि पत्नीजी के साथ भ्रमण किया जायेगा, तो गंगा तट के बाद दूसरा स्थान मैंने उस बस्ती को चुना। उस बस्ती के लोग बांस की ग्रामीण अंचल में प्रयोग होने वाली वस्तुयें बनाते हैं – उसौनी, चंगेरी, छिंटवा, झऊआ, बेना आदि।

धईकार बस्ती में रीता पाण्डेय, एक झऊआ देखती हुई।

धईकार बस्ती में मैं अपनी पत्नीजी को ले जाकर वह सब दिखाना चाहता था कि वे उनके काम की मेहनत और कलात्मकता का अनुभव करें और अपनी ओर से एक प्रयास करें।

गिर्दबड़गांव के छोर पर जो तालाब है, उसके किनारे पेड़ के नीचे एक व्यक्ति झऊआ बना रहा था। बड़ा झऊआ। उसी में वह बैठ कर बुन रहा था। पास में रेडियो रखे था जिसमें तेज आवाज में कोई भोजपुरी में महाभारत की कथा का लोकगायन चल रहा था। एक व्यक्ति पास में बैठा उसका बनाना देख रहा था। एक काली बकरी बालू को ढ़ंकने के लिये बने कर ईंट के स्तूप पर बैठी थी। रोचक लग रहा था दृष्य।

करीब एक दर्जन घर हैं धईकारों के। वे सब बांस के सामान बुनते हैं। रीता पाण्डेय ने एक महिला, बदामा, से बातचीत की। एक उसौनी खरीदी। बदामा के पास उसका बेटा सोनू भी था। वह बाबूसराय के पास सिंघापुर में पढ़ता है। वह बांस की कारीगरी के कम में नहीं लगा।

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बगल के एक घर से एक छोटा झऊआ खरीदा। उस घर के आदमी ने अपने यहां बुने जा रहे एक बड़े झऊआ का हिस्सा दिखाया। उसके घर के दरवाजे के पास ही उसकी पत्नी बांस की पतली तीलियां छील रही थी। फोटो लेता देख आदमी ने कहा ‘आपन मोंहवा कैमरा के सामने कई ले (अपना मुंह कैमरे के सामने कर ले)’ पर महिला ने अपना घूंघट और लम्बा कर लिया।

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हम करीब बीस मिनट रहे वहां। और भी घरों में जा कर देखा जा सकता था। पर रीता इतना ही अनुभव लेना चाहती थीं बस्ती का। घर जा कर बांस की बनी वस्तुओं पर चर्चा हुई। यह सोचा गया कि एक बार फिर वहां जा कर उन लोगों से विस्तार से बातचीत करेंगे। रीता पाण्डेय का उस बस्ती से परिचय होना ही ध्येय था इस बार जाने का।

यह रीता पाण्डेय का अपना गांवदेहात है। बचपन यहीं था। पर तब जो घर-समाज था, वह बेटियों को घर के बाहर नहीं निकलने देता था। पत्नीजी बताती हैं कि उनके बब्बा घर के दालान में बैठते थे और मजाल है कि कोई महिला-स्त्री घर के बाहर यूं ही निकल जाये। इस लिये तब उनका इन सब बस्तियों से कोई परिचय नहीं था। अब, छ दशक बाद वे यह सब देख रही हैं। उनकी बजाय मैं उनके गांवदेहात को कहीं ज्यादा देख और अनुभव कर चुका हूं।

आनन्द ले रही हैं पत्नीजी इस तरह घूम कर! 🙂


गांव के कारीगरों में प्रयोगधर्मिता के अभाव की समस्या –

मैंने पहले भी कोशिश की है कि वे शहरी मानुस की जरूरतों के अनुसार कुछ बनायें; पर वे कोई नया प्रयोग करने को तैयार नहीं दिखे। बड़ी मुश्किल से एक तैयार भी हुआ था, उसे दो सौ रुपये बयाना भी दिया, पर बार बार जाने पर कुछ बनाया नहीं। मुझे बयाना का पैसा भी नहीं मिला – वह वापस मांगने की मैंने कोशिश भी नहीं की थी। वे इतने गरीब लगते हैं कि कोई भी पैसा उनकी बचत में तो जाता नहीं, जिसे वह वापस करे।

गांव के कारीगर और गांव वाले व्यापक रूप में भी; प्रयोगधर्मी नहीं हैं। धईकार ही नहीं, कोई कुम्हार, कोई लुहार, खाती, कोई किसान कुछ भी नया करना नहींं चाहता। किसान तो गेंहू, धान, सरसों की फसल लेने में लगा है। बाकी सब का हाल भिन्न भिन्न पोस्टों में मैं पहले कार चुका हूं।

फल की टोकरी बांस की बन सकती है।

हम मचिया बनवा पाये; पर उसके लिये डेढ़ महीने तक बहुत मेहनत की मेरी पत्नीजी ने (और मैंने भी)।

हमने सोचा कि शहरी लोग क्या इस्तेमाल कर सकते हैं बांस के बने (बुने) सामान के रूप में? बहुत से विचार मन में आये। मसलन डाइनिंग टेबल पर रखी जाने वाली फ्रूट बास्केट जो आजकल प्लास्टिक की मिलती है, बांस की बन सकती है और शायद मंहगी भी न हो। पर हमें यह नहीं लगता कि ये धईकार बस्ती वाले कोई प्रयोग करेंगे। पहले मैं उनसे पूछ चुका हूं; पर उनका सपाट जवाब है कि बांस की छोटी रिंग बनाना मुश्किल काम है! 😦