ट्यूशन पढ़ने वाले बच्चे

मास्साब सवेरे सात से आठ बजे तक एक घण्टा दे कर तीन हजार रुपया महीना कमाते होंगे। अभिभावक भी डेढ़ सौ महीना दे कर बच्चे को शेक्सपीयर/रामानुजम बनाने की नहीं स्कूल की भरपायी की आशा रखते होंगे।


वे आधा दर्जन बच्चे थे। सवेरे ट्यूशन पढ़ने आते हैं पास के प्राइमरी स्कूल में। सातवीं में पढ़ते हैं। लगता है ग्राम प्रधान ने सवेरे एक घण्टे के लिये स्कूल का परिसर मास्साब को ट्यूशन लेने के लिये स्वीकृत कर दिया है।

आज मासाब शायद लेट हो गये थे। बच्चे बाहर खड़े इंतजार कर रहे थे। उनमें से कुछ मेरी बगिया के फूल निहारने चले आये। लड़कियों में सौंदर्य बोध शायद ज्यादा था। वे पहले गेट खोल कर घुसीं। मेरी पत्नीजी को लगा कि कोई फूल तोड़ने वाली न हों। रामसेवक जी बगीचे की देखभाल सप्ताह में एक दिन करते हैं, बाकी सारी देखभाल वे ही करती हैं। वे अपनी फूल, पत्तियों, पौधों के बारे में बहुत पजेसिव हैं। इसलिये वे बाहर निकल कर उनसे पूछने लगीं कि उनके गेट के अंदर आने का ध्येय क्या है?

ट्यूशन वाले बच्चे

बच्चों ने सुंदर लगने वाली वाटिका की अपने शब्दों में प्रशंसा की और यह बताया कि स्कूल न खुला होने के कारण सड़क पर इंतजार न कर वे यह देखने चले आये। रोज बाहर से देखते थे, आज पास आ कर देखने लगे।

उन्होने ही बताया कि उन्नीस बच्चे आते हैं ट्यूशन के लिये। सभी आसपास के गांवों के हैं। मास्साब हर एक से डेढ़ सौ रुपया महीना लेते हैं। सातवीं कक्षा में पढ़ते हैं। मास्साब अंग्रेजी और गणित पढ़ाते हैं।

मैंने उनकी अंग्रेजी की किताब देखी। किताब क्या, कुंजी जैसी किताब थी। हिंदी अनुवाद के माध्यम से उसमें अंग्रेजी का व्याकरण और वाक्य निर्माण सिखाया गया था। अंग्रेजी उच्चारण को भी हिंदी में लिख कर बताया गया था। भाषा सीखने का यह तरीका शायद बहुत अच्छा न हो, पर यही तरीका पूरी हिंदी पट्टी में चलता है। पहले भी स्पैलिंग याद करने के लिये बालक ‘Knowledge’ के हिज्जे ‘कनऊ लद गये’ के नेमॉनिक्स (mnemonic) से रटते थे, आज भी अंग्रेजी उसी प्रकार से सीखते होंगे।

वे मेरी बगिया देख रहे थे और मैं सोच रहा था कि इनमें से पांच साथ मेधावी बच्चों को एक घण्टा दे कर मैं अंग्रेजी-गणित-विज्ञान के इनपुट्स दे सकता हूं। बिना पैसा लिये और बीच में पत्नीजी शायद उन्हें एक कप चाय-बिस्कुट भी दे सकें।

मास्साब सवेरे सात से आठ बजे तक एक घण्टा दे कर तीन हजार रुपया महीना कमाते होंगे। अभिभावक भी डेढ़ सौ महीना दे कर बच्चे को शेक्सपीयर या रामानुजम तो बनाने के सपने तो देखते नहीं होंगे; उन्हे अपेक्षा होगी कि स्कूल में जो पढ़ाई के नाम पर नौटंकी होती है, उसकी कुछ भरपायी यहां हो सके।

लेकिन, शायद तुम कुछ बेहतर तरीके से पढ़ा सको जीडी। और कुछ नहीं, तो बच्चों में ‘उत्कृष्टता’ के सपने तो अंकुरित कर ही सकते हो। … मैंने ऐसा सोचा, पर कोई निर्णय न ले पाया! अपने को किसी बंधन में बांधने का मन नहीं होता।


दलित बस्ती में मनी रविदास जयंती

“हवन कौन कराता है? बाहर से किसी पण्डित को बुलाते हैं?”
“नहीं। बस्ती के ही जानकार पुराने लोग करा लेते हैं। पहले मेरे बब्बा जानकार थे। अब कोई बचा नहीं। अब तो लोग सिर्फ जैकारा भर लगाना जानते हैं।”


कल माघी पूर्णिमा थी। संत रविदास जयंती मनी दलित बस्ती में। सवेरे राजेश (अरुणा का आदमी) आया था चंदा लेने। पत्नीजी ने दो सौ रुपया दिया। और जगहों से शायद और भी ज्यादा मिला हो। प्रधानी चुनाव का समय है। जितने वोट नहीं, उससे ज्यादा प्रधानी के दावेदार उतरा रहे हैं। हर एक ज्यादा से ज्यादा चंदा देने की होड़ में है।

अरुणा का आदमी अच्छा कलाकार है। कार्पेट बुनता है। ढोल अच्छा बजा लेता है। शायद दुर्गापूजा की मूर्तियां भी कुछ कुछ बना लेता है। हाथ में हुनर है पर बहुत ज्यादा ट्रेनिंग नहीं मिल पाई, वर्ना किसी विधा में अच्छा कारीगर बन जाता।

Sant Ravidas
सन्त रविदास

मेरे घर के पीछे दलित बस्ती है। वहां शाम को लाउड स्पीकर लगा। संत रविदास की फोटो रखी गयी। मंच बना। मेरे घर काम करने वाली कुसुम के पति राजकुमार ने बताया कि पूजा हुई, हवन हुआ और आरती भी। संत रविदास के भजन भी हुये। भोजन भण्डारा नहीं था; पर प्रसाद बंटा। लड्डू, लाचीदाना, फल आदि बांटे गये। रात में आरकेस्ट्रा पर दो महिलायें नाचींं भी। पूरा सामाजिक सांस्कृतिक कार्यक्रम रहा। प्रधानी के उम्मीदवार भी आये वहांं – सुंदर नाऊ और मैडीकल की दुकान वाले पाल भी। दोनो कैण्डीडेट हैं प्रधानी के।

मैंने पूछा – हवन कौन कराता है? बाहर से किसी पण्डित को बुलाते हैं?

“नहीं। बस्ती के ही जानकार पुराने लोग करा लेते हैं। पहले मेरे बब्बा जानकार थे। रामायन पढ़ते थे। भजन भी बहुत आते थे उन्हें। और भी कई किताबें थींं उनके पास। जब वे नहीं रहे तब किताबें इधर उधर फिंका गयीं। और कोई भजन गाने वाला बचा नहीं। अब तो लोग सिर्फ जैकारा भर लगाना जानते हैं।”

“तीन सामुहिक फंक्शन होते हैं। रविदास जयंती, अम्बेडकर जन्मदिन और नवरात्र में दुर्गामाई की स्थापना। तब डीजे भी आता है। रात भर जाग कर गाना-नाचना होता है। डीजे वाला 2-3 हजार लेता है। शाम को लगाता है और सवेरे वापस ले जाता है।”

संत रविदास या रैदास यहीं बनारस के पास के थे। उनके गुरु रामानंद थे। उनका इतिहास बहुत कुछ निर्गुण पंथी कबीरदास जी जैसा है। मैंने पढ़ा कि वे गुरु नानक से भी मिले थे और उनके 41 छंद गुरु ग्रंथ साहब में सम्मिलित हैं। एक महान संत की स्मृति यहां जीवित है और जीवित रखने वाले दलित बस्ती के हैं।

रात में तेज डीजे बजने के कारण नींद तो टूटी पर तब कुछ अच्छा ही बज रहा था उसपर। आज सवेरे सात बजे जब घूमने निकला तब भी डीजे बज रहा था। पर रविदास जयंती का बिहान था। तब भोजपुरी के आम गाने का नम्बर लग चुका था। वे गाने जो भदेस होते हैं और जिनका संत रविदास की परम्परा से दूर का भी लेना देना नहीं होता।

अब जब यह लिखने बैठा हूं, तो लगता है कि वहां एक चक्कर मुझे लगा आना चाहिये था। अगले साल जाऊंगा।