भाग ७ – कैलीफोर्निया में श्री विश्वनाथ


यह श्री गोपालकृष्ण विश्वनाथ की कैलीफोर्निया प्रवास पर सातवीं अतिथि पोस्ट है।


इस बार भी तसवीरों के माध्यम से आप को अपनी बात बताना चाहता हूँ।

यहाँ तसवीरें छोटी आकार में दिखेंगी। यहां तसवीरों को resize करके यहाँ पेश रहे हैं ताकि पन्ना जल्द ही लोड हो जाए। साथ ही पिकासा स्लाइड-शो का प्रयोग किया जा रहा है, जिससे पन्ना भी ज्यादा स्क्रॉल न करना पड़े।

आपकी यदि मूल तसवीर में रुचि है तो पोस्ट के अंत में दी हुई कडी पर जाकर पूरी तसवीर देख लीजिए। पिछले पोस्ट पर कुछ मित्रों ने टिप्प्णी की थी के चित्र बहुत छोटे हैं, इस लिये इस बार हमने यह तरीका अपनाया।

योसेमाइट योसमिटी नैशनल पार्क (Yosemite National Park)


जिन्हें प्रकृति का सौन्दर्य से लगाव हैं उनको यह पार्क बहुत अच्छा लगेगा। पहाड, चट्टान, जंगल, नदी. झरने, जल प्रपात वगैरह मिलेंगे यहाँ। लोग यहाँ ट्रेक्किंग और  कैंपिन्ग करने आते हैं।

हम भी एक रात यहीं ठहरे थे पर किसी होटल में। इस उम्र में हमसे कैंपिन्ग नहीं होगा।

पानी का प्रवाह बहुत तेज था। पानी भी एकदम ठंण्डा और शुद्ध।
रंग से लगता था कि पानी नहीं बल्कि  बर्फ़ है पर यह तो केवल पानी के ऊपर का झाग का रंग है। बहुत देर तक हम यहीं बैठे रहे।

पार्क इतना बडा है की सब कुछ देखने के लिए कई दिन लग सकते हैं
हम जैसे पर्यटकों की सुविधा के लिए एक open air trolley bus का प्रबन्ध था। इसमे एक guide भी था जो सब कुछ समझाता था।

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सान्ताक्रुज बीच (Santa Cruz Beach)  


भारत में रहते हम Arabian Sea और Bay of Bengal दोनों देखे हैं। कन्या कुमारी भी गया हूँ जहाँ दोनो का संगम होता है।

भारत के अन्य स्थलों पर आप सागर में या तो सूर्योदय या सूर्यस्त देख सकते हैं।

कन्या कुमारी ही ऐसी जगह है जहाँ आप सूर्योदय और सूर्यस्त दोनों सागर में होते देख सकते हैं। पहली बार प्रशान्त महासागर का अनुभव किया हमने कैलीफोर्निया के सान्ताक्रुज बीच (Santa Cruz Beach) पर। यहां भारत की सी भीड़ भाड़ बिल्कुल नहीं थी। पानी और रेत एकदम साफ़ थे।

पानी बहुत ठंण्डा था और मैं सोचता रहा पानी के अन्दर जाऊं या नहीं।
हिम्मत जुटाकर थोडा आगे निकला। चित्र में देखिए पानी की ठंण्डक के कारण मेरी प्रतिक्रिया। मेरे कन्धे आप को बता देंगे कि पानी कितना ठंण्डा था।

मैने पत्नी को भी आमंत्रित किया था, पानी का अनुभव करने के लिए पर उसने पहले तो मना कर दिया। उसे ठंण्ड से डर था। हमने प्रोत्साहित किया और किसी तरह वह भी पानी में अपने पैर गीले करने के लिए राजी हो गई। पर प्रोत्साहन के शब्द काफ़ी नहीं थे। पूरी जोर लगाकर हमें उसे उठाना पडा। 

इन चित्रों को देखकर एक दोस्त ने मुझसे कहा था , "अरे यह तो अमरीकी beach नहीं लग रहा है"।

हमने पूछा "ऐसा क्यों सोचते हो?" उत्तर मिला " यहाँ सभी कपडे पहने हुए हैं। बिकिनी पहनी महिलाएं कहाँ है?" हमें समझाना पडा के यह ठंड का मौसम था और यह गरमी के दिनों,  Florida के Miami beach का दृश्य नहीं है।

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गोल्डन गेट ब्रिज (Golden Gate Bridge)


पेशेवर एक structural engineer हूँ मैं। ३६ साल से बस इसी पेशे से जुडा हुआ हूँ। सो कैलिफ़ोर्निया जाकर गोल्डन गेट पुल न देखूं, यह हो ही नहीं सकता! कमाल का ब्रिज है यह!

करीब १९३० के आसपास बना था और दुनिया में अपने जमाने में सर्वश्रेष्ठ पुल माना जाता था।

आज भी हम ऐसी संरचनाएं देखकर प्रेरित होते हैं।

सागर से हम इसका चित्र खींच नहीं सकते थे। पुल के एक छोर से ली हुई तसवीर देखिए। पुल  पर चलते चलते हमने काफ़ी समय बिताया।

उस जमाने में welding की प्रथा नहीं थी। स्टील को जोडने के लिए rivets का प्रयोग होता था।

Steel structures का design तो मेरा speclialization का विषय है। सोचा इस पर अपने परिवार को एक lecture दूँ। पर पत्नी को कहाँ इसमे रुचि होगी। वह तो खाडी की सुन्दरता को निहार रही है। क्षितिज पर सैन फ़्रैन्सिस्को शहर दिख रहा है।

बेटी को देखिए। मानो यह कह रही है मेरे दामाद से "कैसी लग रही हूँ। मेरी अच्छी तसवीर लेना। मारो गोली पापा के इन rivets को"!

बेचारा दामाद ही था जिसने मेरा rivetted connections पर व्याख्यान सुना। 

पुल से शहर कैसे दिखता है इसका अन्दाजा चित्र से आप को मालूम हो जाएगा| http://picasaweb.google.com/s/c/bin/slideshow.swf

सैन फ़्रैन्सिस्को एक पुराना शहर है। आज भी वहाँ ट्राम (trams) चलते हैं। हमने इसका भी आनंद उठाया।
SanFrancisco Tram Picture 

आज बस इतना ही।

आगे अगली कडी में।

इन तसवीरों को पूरी साइज़ में देखने के लिए इस कडी को आजमाइए

तसवीरों को आप zoom करके देख सकते हैं।

शुभकामनाएं
जी विश्वनाथ


भाग ६ – कैलीफिर्निया में श्री विश्वनाथ


यह श्री गोपालकृष्ण विश्वनाथ की अमरीकी/कैलीफोर्निया प्रवास पर छठी अतिथि पोस्ट है।


इस बार बातें कम करेंगे और केवल चित्रों के माध्यम से आप से संप्रेषण करेंगे।

शॉपिंग:
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एक जमाना था, जब हम विदेश से चीजें खरीदकर लाने में गर्व महसूस करते थे। अब भूल जाइए इस बात को। कुछ चीज़ों को छोडकर, हम भारतीयों के लिए वहाँ से कुछ खरीदना मूर्खता ही लगता है।

सब कुछ यहाँ भारत में उपलब्ध है और बहुत ही कम दामों में।
कई सारी चीज़ें तो भारत, चीन, बंगला देश से वहाँ भेजी जाती हैं जहाँ तीन या चार गुना दामों पर बिकती हैं।

वैसे मॉल्स तो बहुत अच्छे हैं और हमारे मॉल्स से बडे हैं। चित्र देखिए।
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हमने कई सारे मॉल्स देखे पर वहां कुछ खरीदने से हिचकते थे। पत्नी चीज़ें देखती थीं,  अच्छी लगती थीं फ़िर दाम देखती थीं और झट मन में डॉलर को रुपयों में बदलती थीं  और फ़िर चौंक जाती थी।

हम दूर से तमाशा देखते रहते थे।

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बस किसी तरह कुछ तो वहाँ से खरीदकर ले ले जाना  ही था।

लोग क्या कहेंगे? अरे! अमरीका से कुछ नहीं लाया? पत्नि ने अपनी लालसा पूरी की। यह देखिए, पत्नी और बेटी किन चीज़ों से आकर्षित हुए हैं। यहाँ की सभी वस्तुएं  एशियाई देशों से वहाँ पहुंची हैं।

हमें चुप और खुश करने के लिए हम से पूछे बगैर मेरे लिए कुछ कपडे और एक घडी  खरीदकर दी ।
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जैसा मैंने पहली किश्त में बताया था, अमरीकी लोग ज्यादा दिखाई नहीं देंगे आपको।
चेहरे देखिए इस चित्र में। ग्राहक चीनी या कोरियाई लगते हैं।
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एक बात हमें पसन्द आई। जब मॉल वाले कोई नई खाने लायक चीज़ बेचना चाहते हैं तो फ़्री सैंपल (free sample) का प्रबन्ध है। इस महिला को देखिए जो फ़्री सैंपल तैयार कर रही है। हमने अवसर पाकर खूब इन चीज़ों को चखा।

यह भी अच्छी चाल है। हम तो भोले भाले हैं। फ़्री सैंपल चखने के बाद वहाँ से छुपके से खिसक जाना हमें अच्छा नहीं लगा।
क्या सोचेंगे यह अमरीकी लोग भारतवासियों के बारे में? मन की शान्ति के लिए कुछ खरीदना पड़ा। 😦
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बर्फ़ का अनुभव
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आजीवन हम पश्चिम या दक्षिण भारत में ही रहे हैं। हमने ज़िन्दगी में बर्फ़ का अनुभव कभी नहीं किया था। कभी कशमीर या सिमला गए ही नहीं।

यह मेरा पहला मौका था बर्फ़ को देखने, छूने और उसका अनुभव करने का। हम Squaw  Valley  गये थे, जो Lake Tahoe  टैहो के पास है। आप बर्फ़ की तसवीरें देखिए। उसपर चलने में थोडी कठिनाई हुई| चलने में पैर फ़िसलने का डर रहता था। पर कुछ देर बाद आसानी से चल सके।
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पहली बार स्नोमैन (snowman) बनाने की कोशिश की। फ़्लॉप हुआ मेरा प्रोजेक्ट।
गणेशजी की मूर्ति बनाने निकला था और देखिए क्या बना पाया।
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फ़िर भी गर्व से उस की एक तसवीर लेने में मुझे झिझक नहीं हुई।
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Lake Tahoe भी गया था। अति सुन्दर झील है यह। एक किनारे पर रेत और दूसरे किनारे पर चिकने और गोल गोल कंकड।
पानी इतना ठंडा और शुद्ध कि हम तो बिना किसी हिचक उसे अपने हथिलियों में लेकर पीने लगे। भारत में हिम्मत नहीं होती ऐसी झीलों से पीने की, सिवाय हरिद्वार / हृषिकेश में गंगा के पानी के।
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सैन फ़्रैन्सिस्को
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दो बार सैन फ़्रैन्सिस्को गया था। पत्नी के लाख मना करने के बावजूद, हम Apple I Store के अन्दर झांकने से अपने आप को रोक नहीं सके| उसे चिढ है इन गैड्जेटों से। कहती है "तुम्हारा इन चीज़ों से लगाव अस्थायी होता है। बाद में मुझे ही इन चीज़ों पर जमे धूल को साफ़ करना पडता है।"

करीब बीस मिनट Apple का  नया Ipad को आजमाया। कमाल की चीज़ है यह। काश यहाँ भारत में उपलब्ध होता।

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छोटी मोटी दुकानें तो कई सारे देखीं| दो नमूने पेश हैं:

  1. इस दुकान में केवल चॉकलेट बिकते हैं और कोई चीज़ नहीं।
    बच्चे  तो यहाँ से बाहर निकलना ही नहीं चाहेंगे। वैसे हम भी किसी बच्चे से कम नहीं, इस विषय में।
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  2. इस बेकरी को देखिए| डबल रोटी नाना प्रकार की अकृतियों में बना रहे हैं। बच्चों को यह बहुत भाता है
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सैन फ़्रैन्सिस्को चिडियाघर भी गया था| कुछ खास नहीं पर एक मोर को देखने पर भारत (जयपुर और पिलानी) की याद आ गई| मोर पिंजरे में बन्द नहीं था और इधर उधर घूमता रहता था|
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और देखिए इस गोलमटोल और रोयेंदार भेड़ को। वह भी स्वतंत्रता से घूम रहा था और हमे इसे छूने ओर सहलाने कि अनुमति थी। केवल कुछ खिलाना भर वर्जित था।
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जिन्दगी में पहली बार एक ध्रुवीय भालू( polar bear) देखा।
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आगे अगली किस्त में ।
शुभकामनाएं
जी विश्वनाथ


भाग ४ – कैलीफोर्निया में श्री विश्वनाथ


यदि आपको गाडियों का शौक है तो अवश्य एक बार वहाँ (कैलीफोर्निया) हो आइए।

कारों की विविधता, गति, शक्ति और अन्दर की जगह और सुविधाएं देखकर मैं तो दंग रह गया।
शायद ही कोई है जिसके पास अपनी खुद की कार न हो।

औसत मध्यवर्गीय परिवार के तो एक नहीं बल्कि दो कारें थी। एक मियाँ के लिए, एक बीवी के लिए।


यह श्री गोपालकृष्ण विश्वनाथ की उनकी कैलीफोर्निया यात्रा के दौरान हुये ऑब्जर्वेशन्स पर आर्धारित चौथी अतिथि पोस्ट है।


गैराज तो इतने बडे कि कम से काम दो कारें अगल बगल इसमें आसानी से खड़ी की जा सकती हैं।

गैराज के अन्दर जगह इतनी कि भारत में तो इतनी जगह में एक पूरा घर बन सकता था।
हवाई अड्डे से पहली बार जब घर पहुँचे थे, बेटी ने कहा कि गैराज का दरवाजा, पास आते ही अपने आप खुल जाएगा। हमें याद है हमने उस समय क्या कहा था – “हद है आलस्य की भी। गाडी के बाहर निकलकर झुककर दरवाजा उठा भी नहीं सकते क्या, जैसा हम भारत में करते हैं?”

फ़िर जब गैराज का दरवाजा देखा तो समझ गया। इतना बडा था कि इसे खोलने के लिए बिजली की जरूरत पडती थी। हम उठा नहीं सकते थे।

चित्र देखिए। एक में बन्द गैराज के सामने हम खडे हैं, दूसरे में खुली हुई खाली गैराज और तीसरे में गैराज में गाडीयाँ खडी हैं।

garage outside view
garage inside view

कारों में GPS का अनुभव पहली बार किया। कहीं भी निकलते थे तो इसे साथ ले जाते थे। अपरिचित स्थानों पर बडे काम की चीज है। सारे इलाके का मैपिंग इतना अच्छा है कि पता टाइप करने पर, यह गैजेट आपको रास्ता बता देता है स्क्रीन पर और कहाँ किस दिशा में मुड़ना है यह भी आवाज करके बताता है।

टी वी देखने के लिए तो अपने पास बहुत समय था पर वहाँ के प्रोग्राम को हमें देखने में कोई रुचि नहीं थी। वहाँ भी बहुत ज्यादा समय विज्ञापन (ads) खा जाते हैं। भारत के समाचार तो बिलकुल नहीं के बराबर थे वहां। सारा समय या तो Mexico gulf Oil spill  या ओबामा पर केन्द्रित था।

टी वी सीरयल देखने की कोशिश की पर अच्छे सीरयल भी हम देखकर आनन्द नहीं उठा सके क्योंकि सिचयुयेशन और पात्रों के साथ हम अपने को आइडेण्टीफाई नहीं कर पाए।

बस एक विशेष सीरियल नें हमारा दिल जीत लिया और वह है “Everybody Loves Raymond”| केवल इस सीरियल में सिचयुयेशन्स हमारे भारतीय परिवारों  जैसी ही थीं और हमने इस सीरियल के ४० से भी ज्यादा एपीसोड्स देखे।

इसके अलावा सार्वजनिक लाईब्ररी से DVD मंगाकर देखते थे। समय बहुत था यह सब देखने के लिए।
ईंटर्नेट के माध्यम से भी हम फ़िल्में सीधे स्ट्रीमिंग (Direct Streaming)  करके, टी वी पर देखते थे।

एक और बात हमने नोट की; इतने घर देखे पर कहीं भी कपडे घर के बाहर रसी (clothesline)  पर टंगे नहीं देखे। धूप होते हुए भी लोग वाशिंग मशीन के बाद ड्रायर (dryer) का प्रयोग करते थे। मुझे लगा कि व्यर्थ में उर्जा बरबाद हो रही है। क्यों घर के पीछे खुली हवा और धूप में  कपडों को सूखने नहीं देते?

कपडे भी हफ़्ते में एक बार ही धोते थे। हर दिन मैले कपडे इकट्ठा करके एक साथ धोते थे।

हमें तो यह अच्छा नहीं लगा। भारत में हम तो रोज कपडे धोते हैं।

वहां घर/मकान  मजबूत नहीं बनाते हैं। लकड़ी और काँच का प्रयोग कुछ ज्यादा होता है। ईंट, कंक्रीट वगैरह बहुत कम प्रयोग करते हैं। घर का चिरस्थायितत्व/ टिकाऊपन की किसी को परवाह नहीं। घर केवल अपने लिए बनाते हैं, अगली पीढी के लिए नहीं। किसी को अपने मकन/घर से लगाव नहीं होता। कोई यह नहीं सोचता कि अगली पीढी के लिए विरासत में घर छोडें।

जैसा हम कार/स्कूटर खरीदकर कुछ साल बाद बेच देते हैं वैसे ही यह लोग घर बदलते हैं। कारें तो अवश्य बार बार बदलते हैं।

बच्चे १८ साल की आयु में घर से बाहर रहने लगते हैं। माँ बाप के साथ रहना उन्हें अच्छा नहीं लगता। एक उम्र के बाद परिवार में आपसी रिश्ते कच्चे होने लगते हैं।

बिना शादी किए लोग माँ बाप भी बन जाते हैं और समाज में उन्हें किसी से मुँह छुपाने की आवश्यकता नहीं होती।

आज बस इतना ही। हम तो लगातार लिखते रह सकते हैं पर अब सोचता हूँ बहुत लिख लिया। अगली कडी अन्तिम कडी होगी।

शुभकामनाएं
G Vishwanath Small
जी विश्वनाथ


भाग तीन – कैलीफोर्निया में श्री विश्वनाथ


यह श्री गोपालकृष्ण विश्वनाथ की उनकी कैलीफोर्निया यात्रा के दौरान हुये ऑब्जर्वेशन्स पर आर्धारित तीसरी अतिथि पोस्ट है:


सफ़ाई और कचरे का निस्तारण (garbage disposal)
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एक और बात आप वहाँ (कैलीफोर्निया) पहुँचते ही नोटिस करेंगे और वह है वहाँ का साफ़ वातावरण।
रास्ते में कहीं भी कूड़ा-कचरा देखने को नहीं मिलेगा।

garbage bins awaiting the clenaing truck

जरा देखिए इस तसवीर को। यह है घर से बाहर निकलकर रास्ते और कोलोनी का एक दृश्य।
इतना साफ़ कैसे रखते हैं ? मैने कोई सफ़ाई कर्मचारी सड़क को साफ़ करते हुए देखा नहीं।
इसका राज है वहाँ के नागरिकों का सहयोग। हर परिवार को म्युनिसिपैलिटी से तीन किस्म के डिब्बे दिये जाते हैं।

यह डिब्बे अलग रंग के होते हैं। एक में रसोई से निकला कूड़ा (organic waste);  दूसरे में प्लास्टिक का कूड़ा जो recyle हो सकता है और तीसरा बाग/बगीचे से पैदा हुआ कूड़ा (जैसे सूखे पत्ते, टूटी हुई टहनियाँ वगैरह)। (चित्र देखिए)

truck lifting the bin with a motorised attachment 

हर बृहस्पतिवार को ये डिब्बे सुबह सुबह घर के सामने रास्ते के एक छोर पर रखे जाते हैं और सफ़ाई कर्मचारी (बस एक ही आदमी) अपने ट्रक में आता है और उन्हे खाली करके डिब्बों को वहीं छोड जाता है। चित्र में  देखिए ट्रक कैसे उन डिब्बों को उठाता है। ट्रक का ड्राईवर ट्रक के बाहर निकलता ही नहीं। बस केवल आधे घंटे में कोलोनी के सभी घरों को निपटा लेता है। डिब्बे का साईज़ देखिए। एक आदमी उसमें घुस सकता है। पूरे हफ़्ते का मैल उसमें जमा हो जाता था।

सड़कें और ट्रैफ़िक
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मुख्य सड़कें इतनी चौड़ी थीं, कि पूछो मत। शायद २०० फ़ुट से भी ज्यादा । हमने ऐसी सडकें भारत में कहीं नहीं देखी। न कोई गड्डे, न कोई स्पीडब्रेकर।

Locality

कहीं कोई आबादी दिखती ही नहीं। लगता था सभी लोग या तो अपने घर के अन्दर, या कार्यालय के अन्दर या अपनी कार के अन्दर हैं। सारा शहर एक भूतों की बस्ती (Ghost Town) लगता था। भारत के शहरों का भीड़ भाड़, शोरगुल, मैल, धूल, रास्ते में चलती गाएं, दुकानें, भिखमंगे, कुत्ते, कुछ भी वहाँ देखने को नहीं मिले। यदि लोगों को देखना हो  तो किसी मॉल जाना पडता था। रास्ते में चलते वक्त हम अपनी मर्जी से कहीं भी रास्ता पार नहीं कर सकते थे। केवल नियुक्त स्थानों पर ही पार कर सकते थे। भारत में तो हम बडी मुस्तैदी से, यहाँ वहाँ उछल कूद करके  ट्रैफ़िक के बीच वाहनों से बचते बचते सडक पार करते हैं। वहाँ ऐसा करना jay walking कहलाता है जो जुर्म है और पुलिस हमें अन्दर कर देगी! नियुक्त स्थानों पर पैदल चलने वाले ट्रैफ़िक लाईट स्वयं चला सकते हैं। एक खंबे में स्विच दबाने से कुछ देर बाद गाडियों के लिए लाल बत्ती जलने लगती है और सभी गाडी प्यादे के लिए रुकती है।

पानी, बिजली, गैस 
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आप नल का पानी बेहिचक पी सकते हैं। इतना शुद्ध होता था वहाँ का पानी।
कहीं कोई ओवरहेड (overhead tank) देखने को नहीं मिला। पानी सीधे पंप होता था घर के सभी नलों तक।

पूरे महीने में एक भी दिन, एक क्षण के लिए भी बिजली चली नहीं गई। २४ घंटे पानी और बिजली का इन्तजाम था।

घर में कोई वोल्टेज स्टेबलाइज़र (voltage stabilizer) भी नहीं दिखे।

गैस का सिलिन्डर भी देखने को नहीं मिला। गैस सीधे नलियों से रसोई घर तक पहुँचता थी। गैराज में मीटर था जिसके  हिसाब से गैस का बिल चुकाना पडता था।

refrigerator bigger than steel almirahs in India

फ़्रिज (refrigerator) तो इतना बडा था की हमें लगा कि कोई अलमारी है। (चित्र देखिए) । दस पन्द्रह दिन का दूध, तरकारी, वगैरह उसमें भर कर रखते थे। ताजा खाना तो इन बेचारों को नसीब ही नहीं। दोनों (मियाँ बीबी) काम पर जाते थे । किसके पास समय है? हफ़्ते भर के लिए पका कर फ़्रीज़र में रख देते थे। हमें तो यह अच्छा नहीं लगा और जब तक हम थे, पत्नी रोज पकाती थी। बेचारे दामाद को तो यह ताजा पकाया खाना बैठ कर खाने की फ़ुरसत भी नहीं मिलती थी। सुबह सुबह खड़े खड़े या घर के अन्दर चलते फ़िरते ही अपना नाश्ता करता था और वह भी रोज वही मेनु (cornflakes, cereal,   दूध के साथ)। शनिवार/रविवार को ही उसे हमारे साथ प्यार से बनाया गया ईड्ली/डोसा वगैरह आराम से और बडे चाव से खाने का अवसर मिलता। यह सोफ़्टवेयर वाले कमाते खूब हैं पर कभी सोचता हूँ आखिर किस के लिए। अपने कैरियर की भाग दौड में, जिन्दगी जीने का अवसर ही नहीं मिलता।

इण्टर्नेट (Internet)
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इंटर्नेट की गति तो मेरे यहाँ बेंगळूरु से चार गुणा अधिक थी। पहली बार You Tube के विडियो हम बिना buffering देख कर आनन्द उठा सकते थे।  वेब साइट पर जाकर अपनी पसन्दीदा फ़िल्में चुन सकते थे और यह फ़िल्में अपने टी वी पर इंटर्नेट से direct streaming करके देख सकते थे। मात्र १० डॉलर प्रति महीने  का शुल्क था इस सुविधा  के लिए।

सुरक्षा (Security)
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No grills in the glass window and back door from kitchen leading to back yard

घर में सभी खिडकियों में केवल काँच का शटर था। लोहे के ग्रिल कहीं नहीं देखे। रसोई घर का चित्र देखिए। बेटी से पूछा क्या डर नहीं लगता? कोई भी अन्दर घुस सकता है? security का क्या इन्तजाम है? उसने जवाब दिया " कोई इन्तजाम नहीं. यहाँ अब तक कोई घटना नहीं घटी। सभी घर ऐसे ही हैं। यहाँ घर आराम से रहने और जीने के लिए बनते हैं, सुरक्षा के लिए नहीं। लोग घर बदलते रहते हैं और घर से उनका कोई स्थाई लगाव (attachment) नहीं होता। उन्हें अगली पीढी के लिए विरासत छोडने का खयाल ही नहीं आता।

आगे अगली किस्त में।

शुभकामनाएं

G Vishwanath Small 
जी विश्वनाथ


श्री विश्वनाथ जी की मेल से प्राप्त प्रति-टिप्पणिया:
@Mrs Asha Joglekar और वाणी गीतजी,

यहाँ भारत में हम मजबूर होकर बचा हुआ खाना फ़्रिज में रखते हैं क्योंकि हम यह नहीं चाहते कि खाना खराब होकर बर्बाद हो जाए। अगले दिन उसे गर्म करके या कुछ जुगाड करके उसे खाते हैं। पर अमरीका में अधिक मात्रा में पकाना और फ़्रिज में रखना पूर्वनियोजित हो गया हैं। Canned Food बहुत ही ज्यादा खाते हैं ये अमरीकी लोग।

@प्रवीण पाण्डेजी,
“कम्पोस्ट” पर आप विस्तृत “पोस्ट” “compose” करने जा रहे हैं। इन्तजार रहेगा। इस बहाने आपकी श्रीमतिजी से भी सभी मित्र परिचित हो जाएंगे। इन्तजार रहेगा

@अजीत गुप्ताजी,

flexitime की सुविधा हर एक को नसीब नहीं होता। उनके काम की विशेषता पर निर्भर होता है। जिनका काम अन्तरजाल से संबन्धित है उन्हें कभी कभी देर रात को भी तैयार रहना पडता है। Networking Web Site maintenance या networking web site programming का काम तो २४ घंटे चलता रहता है क्योंकि किसी भी समय, दुनिया के किसी भी कोने से लोग वहाँ पहुँचते हैं। “Networking” कभी भी “not working” नहीं बनना चाहिए।

@धीरु सिंह्जी, शोभाजी, अन्तर सोहिलजी, ghost buster जी, और विष्णु बैरागीजी

मामला रोचक है। क्या चीन की आबादी हमसे भी ज्यादा नहीं? बेजिंग और शैंघाई के चित्र हमने देखी थी और बहुत प्रभावित हुआ था। यहाँ भारत में भी कई ऐसी जगह मिल जाएंगे जहाँ आबादी कम है पर मैल/गन्दगी की कोई कमी नहीं। स्वच्छता और आबादी के आपसी सम्बंध पर शायद कोई अच्छा पोस्ट लिखा जा सकता है।

@पंकज उपाध्यायजी,
आपका quotation अच्छा लगा। आप सही कह रहे हैं। कई लोग इस सोफ़्टवेयर लाईन को समझ नहीं पा रहे हैं।
मेरे ससुरजी भी बार बार हमसे पूछते हैं कि यह सोफ़्टवेयर बला क्या होता है। कंप्यूटर तो समझ में आ गई। हमने समझाने की कोशिश की, टीवी और रेडियो का उदाहरण देकर। हमने कहा टीवी/रेडियो hardware होता है और टी वी प्रोग्राम software होता है। सुना है श्री लालू प्रसाद यादवजी ने भी एक बार किसी से पूछा था “यह IT/Wyti क्या होती है?”

@रश्मि रवीजाजी,
आप ठीक कह रही हैं। Weekends का पूरा मजा लेते हैं यह अमरीकी लोग। आपने कहा “जबकि यहाँ सातों दिन काम करने में ही लोग तारीफ़ समझते हैं.” पर हमारे यहाँ कुछ लोग तो सातों दिन आराम चाहते हैं।

@रंजनाजी, e pandit जी, मनोज कुमार जी, प्रवीण त्रिवेदीजी, विनोद शुक्लाजी
टिप्प्णी के लिए धन्यवाद

cmpershad jee,

आखिर कितना segregation कर सकते हैं? कोई सीमा तो होनी चाहिए। नहीं तो घर के सामने केवल डिब्बे ही डिब्बे नज़र आएंगे। शायद जो recycle हो सकते हैं या जिसे dry waste कहा जा सकता हैं ,उसके लिए एक ही डिब्बा नियुक्त होता है।
कभी कभी तो हम भी सोच में पडते थे कि फ़लाँ कूडा किस डिब्बे में डाला जाए।

@राज भाटिया जी,
आप की बात से सहमत हूँ। ज्ञानजी भी यही कह रहे हैं। आबादी को हमें एक बहाना नहीं बनाना चाहिए।

@डॉक्टर महेश सिन्हाजी,

“यहाँ तो लोग कचरे का डब्बा भी गायब कर दें”
यह आपने मज़ेदार बात कही। हाँ आपका यह भी बात सही है कि भारत में लोहे का ग्रिल से भी हमें सुरक्षा की कोई गारन्टी नहीं। आजकल अमरीकी लोगों को चोरों से डर नहीं लगता। आतंकवाद का डर है। कभी कभी कुछ लोग paranoid behaviour का प्रदर्शन करते हैं।

@अनिताजी,
मैं तो वापस आ गया हूँ। केवल एक महीने के लिए वहाँ गया था। आप बेंगळूरु आई थीं।
इस बार आप हमसे बच निकले। अब आगे कोई बहाना नहीं चलेगा। अगली बार जब आप बेंगळूरु आएंगे, आशा है आप से मुलाकात होती।

@भारतीय नागरिक जी,
आप से सहमत हूँ। उन लोगों की अच्छाईयोंको हमें अपनाना चाहिए। उनका work culture प्रशंसनीय है। किसी भी काम में गुणवत्ता पर जोर देते हैं। समय का भी पूरा खयाल रखते हैं। Schedules उनके लिए sacred होते हैं जिसे वे बहुत seriously लेते हैं।

@अभिषेक ओझा जी,
न्यू यॉर्क तो बिलकुल अलग है। उससे कोई comparison व्यर्थ है। इस बार हम वहाँ जा नहीं सके। अगली बार जाएंगे।

@स्मार्ट इन्डियन्जी,

अगली बार हम international licence लेकर जाएंगे। पर बेटी और दामाद कहते हैं की मुझे वहाँ कार नहीं चलानी चाहिए। वे तो यह मानते हैं की भारत का chaotic Traffic का हम इतने आदि हो चुके हैं कि हम orderly traffic से adjust नहीं कर पाएंगे!

सभी मित्रों को धन्यवाद। बस कुछ ही दिनों में ज्ञानजी को चौथी किस्त भेजूँगा। ज्ञानजीने मुझे यहाँ जगह दी उसके लिए आभारी हूँ।
शुभकामनएं
जी विश्वनाथ


भाग दो – कैलीफोर्निया में श्री विश्वनाथ


यह श्री गोपालकृष्ण विश्वनाथ की अतिथि पोस्ट है:

एक और बात मैंने नोट की और वह है ये अमरीकी लोग अपनी प्राइवेसी (privacy) पर कुछ ज्यादा ही जोर देते हैं।  अमरीकी नागरिक खुलकर  बातें नहीं करते थे हम लोगों से। हम जैसे कम्यूनिकेटिव (communicative) नहीं होते। शायद मेरा यह अनुमान गलत है और सिर्फ़ मेरे साथ ऐसा हुआ। या फ़िर मैं ही कुछ ज्यादा बोलता हूँ!

रास्ते में टहलते समय, अजनबी लोग भी भले  "Hi" या "Hello there" या "Good morning" कहते, पर उसके बाद झट से निकल जाते थे।

यह तब होता था जब हमसे "eye contact" होता था। मेरी बेटी ने चेतावनी दी थी कि इसे गपशप का निमंत्रण न समझूँ।

मुझसे बस इतनी ही अपेक्षा की जाती है कि मैं भी मुस्कुराकर "हेल्लो" कहूँ और निकल जाऊँ। भारत में जब कोई इस तरह बात करना आरंभ करता है अवश्य और बातें भी होती हैं और आगे चलकर दोस्ती में बदल सकती है। पर यहाँ रिवाज अलग है.

यह हेल्लो या गुड मॉर्निंग कहना केवल एक खोखली औपचारिकता है या common courtesy है। इस ग्रीटिंग के पीछे कोई दोस्ती का इरादा बिल्कुल नहीं। भारत में यदि हम किसी से आगे बात नहीं चलाना चाहते हैं तो पहले नमस्ते ही नही करते। हमें यह अजीब लगा। कुछ दिन बाद इस बर्ताव से ऊबकर, हम तो अजनबी से नज़र बचाकर ही निकल जाते थे। मुझे हैरत तब हुई जब ऐसा बर्ताव हम जैसे भारतीय लोगों ने भी किया।

सोचा था शॉपिंग मॉल (shopping mall) में मिले हम उम्र भारतीय लोगों से कम से कम संपर्क कर सकूँगा और कुछ इधर उधर की बातें कर सकूँगा पर आगे चलकर पता चला कि इन लोगों को भी यह बीमारी लग गई है! बस आगे चलकर जब तक किसी से formal introduction नहीं हुआ था, हम अपनी तरफ़ से, न उनको हेल्लो कहते और न उनसे बात करने की कोशिश करते। अमरीकी लोगों को छोडिए, पूरे महीने में एक भी भारतीय निवासी, shopping malls में या पर्यटक स्थलों पर  मुझसे बात करने की कोशिश नहीं की। इतने साल में भारत में जगह जगह घूमा हूँ पर ऐसा मैने कभी अनुभव नहीं किया।

Cycles तरह तरह के साइकल देखे। गियर युक्त और बहुत ही तेज चलने वाली। यहाँ साइकल व्यायाम के लिए या खेल कूद के संबंध में काम आते हैं। टहलते समय सावधान रहना पढ़ता था। दूर से इशारा करके  या बोलकर अपने आने का संकेत या घोषणा करते थे ताकि टक्कर न हो। चालीस Km/hr की गति या उससे भी ज्यादा चलती थी ये साइकलें। एक और अजीब बात मैंने नोट की। बेंगलूरु में मोटर साइकल और स्कूटर चालक भी कानून तोडकर बिना हेल्मेट पहने वाहन चलाते हैं पर यहाँ साइकल चलाने वाले भी हेल्मेट पहनकर ही साइकल चलाते है। कई कारें देखी जहाँ पीछे डिक्की के साथ साइकल अट्टैच हो सकती थी। लोग अपनी साइकल अपनी कार के साथ ले जाते थे। यह मेरे लिए एक अनोखी बात थी।

Sofa बिस्तरों पर गद्दे इतने soft थे कि पहले दो दिन तक मुझसे उनपर सोया ही नहीं गया। सारी रात करवट बदलता रहा। फ़िर जाकर मेरी बेटी हमारे लिए अलग hard mattress खरीद ले आई। उनके सोफ़े पर हम बैठ ही नहीं सके। सोफ़ा इतना दब जाता था कि हमें उठने में परेशानी होती थी। बेटी ने कहा यहाँ सभी सोफ़े ऐसे ही मिलेंगे। बात सही थी। कुछ दोस्तों और रिश्तेदारों के यहाँ भी सोफ़े ऐसे ही निकले। हमसे बैठा ही न गया। परेशान होकर हमने सोफ़े पर बैठना छोड दिया। टी वी देखते वक्त हम आराम से सोफ़े के नीचे जमीन पर बैठ जाते थे। जब मेहमान आते थे हम डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बैठकर बात करते थे।

आगे तीसरी किस्त में

शुभकामनाएं

जे विश्वनाथ


इलाहाबाद में साइकलें:

Gyan874-001 आपने कैलीफोर्निया की साइकलें विश्वनाथ जी की पोस्ट में देखीं। चमकदार, गियरयुक्त। यहां इलाहाबाद में काम पर आने जाने के लिये साइकलें इस्तेमाल होती हैं। दफ्तर जाते हुये मैने गिनीं – हर पच्चीस मीटर पर एक साइकल। औसत पांच-सात किलोमीटर चलाता होगा व्यक्ति अपने काम पर जाने के लिये।

मेरा चपरासी बत्तीस किलोमीटर गांव से आता जाता है साइकल पर। दूरी ज्यादा होने के कारण रोज आने जाने से बचता है और किसी के घर रुक जाता है। Gyan846

कई सब्जी बेचने के फेरीवाले साइकल पर फेरी लगाते हैं। एक से मैने पूछा – ठेला क्यों नहीं ले चलते? उसने कहा कि वह पास के गांव में रहता है। सब्जी बेच कर लौटते हुये साइकल ट्रांसपोर्ट का भी काम देती है। लिहाजा साइकल बेहतर है।

साइकल हमारे यहां व्यायाम नहीं; लाइफलाइन है।   


DSC02555 कैलीफोर्निया से कलुआ (अपडेट सवेरे पौने छ बजे) :  सवेरे  जल्दी उठ गया – पौने चार बजे। एक घण्टे बाद गंगा तट पर गया तो भोर फूट रही थी। मैं अकेला था, सो गली का कुकुर कलुआ साथ हो लिया। मुझे पानी/नदी/तालाब पर अकेले जाने की डाक्टरी मनाही है। कलुआ ने पूरी तरह मेरा शैडो काम किया। बिना आज्ञा दिये।

टिटिहरी भोर में टायं-टांय कर रही थी। कुछ पक्षी पंक्तिबद्ध गंगा के पानी पर मंडरा रहे थे। लगता है उन्हे भी अनिद्रा का रोग है! इक्का-दुक्का स्नानार्थी थे। एक दो गाय गोरू। बस।

विश्वनाथ जी का कैलीफोर्निया, हमारा कलुआ। “क” की आवृति का अलंकार भर है साम्य में! अन्यथा एक चमकदार; दूसरा काला कलुआ!

कलुआ    


श्री जी विश्वनाथ की प्रतिटिप्पणियां (सितम्बर २०’२०१० को दोपहर में पोस्ट की गयीं):
@रानीविशालजी.
आशा करता हूँ कि आपकी कैलिफ़ोर्निया यात्रा सुखद रही।
हम तो यही सुनते हैं कि भारतीयों के लिए अमेरीका में यही सबसे अच्छी जगह है।
पर यह भी सुना कि यहाँ cost of living सबसे अधिक है।

@महेन्द्र मिश्राजी,
आप ठीक कहते हैं। हम लोग तो कुछ ज्यादा ही बोलते हैं
मेरी भी यही कमज़ोरी है।

@मनोज कुमारजी, स्मार्ट इन्डियनजी, पी एन सुब्रमणियनजी, रंजनाजी, काजल कुमारजी,
टिप्पणी के लिए धन्यवाद

@अभिषेक ओझाजी,
Yes, I agree. Perhaps the right behaviour is in between these two extremes.

@अजीत गुप्ताजी,
अवश्य अवसर मिलने पर आपकी किताब हम पढना चाहेंगे!
Amway वाली बात सुनकर हमें मुस्कुराना पढा।
बात सच हैं। यहाँ बेंगळूरु में भी, एक मित्र नें मुझे भी इसमें फ़ंसाने की कोशिश की।
हम किसी तरह बच निकले थे।

@अन्तर सोहिलजी,
ठीक कहा आपने। यहाँ नमस्ते वगैरह केवल मर्द और मर्द, या औरत और आरत के बीच की जाती है।
पर वहाँ महिलाएं भी कभी कभी हमें देखकर मुस्क्राकर “हेल्लो” कहते थे।
लेकिन यह सभी महिलाएं मेरी उम्र के आसपास ही थीं।
सुन्दर युवतियाँ तो हमारी तरफ़ देखती भी नहीं थीं।
चलो अच्छा हुआ। मेरी श्रीमतीजी इससे नाखुश नहीं है।

@प्रवीण पाण्डेजी,
ठीक कहा आपने।
हम भी साइकल के बारे में यही सोचते हैं।
गरीब और मध्यवर्गीय लोग भले ही साइकल यातायात के लिए उपयोग करते हैं पर यहाँ अमीर लोग तो व्यायाम या क्रीडा समझकर चलाते हैं। काश एक ऐसा यंत्र होता जो घर बैठे साइकल की तरह चलाया जा सकता और जिससे घर के जमीन के नीचे की टंकी से छत के ऊपर रखी टंकी तक पानी को चढा सके। या किसी बैट्टरी का चार्जिन्ग कर सके जो कम से कम लाईटिंग के लिए काम आए।

@cmpershad jee,
बिल्कुल ठीक कहा आपने। टहलते समय और शॉप्पिंग करते समय हमने इतने सारे प्यारे प्यारे बच्चे/शिशु देखे।
दिल तो बहुत करता था उन्हें पुचकारूँ। पर अपने आपको रोकना पढा। मुझे दस साल का एक पुराना किस्सा याद आ रहा है। एक बार यहीं अपने देश में ही, मैं किसी बहुमंज़िली इमारत में लिफ़्ट में ऊपर जा रहा था। एक विदेशी परिवार लिफ़्ट में मेरे साथ थे। उनका एक छ: साल का बहुत ही सुन्दर और प्यारा लडका था। उसने मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराया। हम से रहा नहीं गया। हम ने प्यार सी उसके सर के बाल को सहलाया। लडके के बाप को यह अच्छा नहीं लगा और उसने मुझे भला बुरा कहा। हमने उससे माफ़ी माँगी और, अपनी मंजिल पर पहुँचने पर, भारी दिल से लिफ़्ट के बाहर निकले। बस, जाते जाते एक आखरी बार उस प्यारे बच्चे की तरह मेरा ध्यान चला गया।
बच्चा मेरी तरफ़ देख रहा था और एक भोली सी और शरारती मुस्कुराहट थी उसके होंठो पर। मैं अपनी मानसिक चोट को उसी क्षण भूल गया। मन को भी शांती मिल गई । बाप को मारो गोली! बच्चे को तो अच्छा लगा था। मैं ने शायद केवल गलती की थी, कोई अपराध नहीं। उस दिन से हम औरों के बच्चों को फ़ूल की तरह मानते हैं। दूर से देखो, और आनन्द उठाओ। बात करो उनसे पर जब तक वे हमारे परिवार या सगे संबन्धी के नहीं होते उन्हें पुचकारना तो दूर, उन्हें छूना भी मत।

@रंजन,
Yes, I too observed this. There is a metro service in the Bay area of California which connects some places.
There is a provision to carry your cycle inside the compartment. I once saw a huge family trailer on the highway and they were carrying a small boat in it!

@अनिता जी.

इतने दिनों बाद आपसे ब्लॉग जगत में फ़िर मुलाकात हो रही है। हमें खेद है की आप बैंगळूरु आई थीं पर हम से सम्पर्क नहीं कर सके। कोई बात नहीं। इस बार नहीं तो अगली बार ही सही। खबरदार, हम भी कम नहीं बोलते। प्रवीण पाण्डेजी से पूछिए। बस दो दिन पहले ही उनके यहाँ गया था। He is still rubbing his tired ears after that long and continuous बक बक from me.

@सतीश पंचमजी.
जो सबक आप सीखे , यहीं बैठे बैठे, हमें इतनी दूर जानी पडी! बस अब कभी भूलूँगा नहीं।

@हेमन्त कुमार जी,
सहमत। यहाँ अपने देश में प्यार और भाइचारा जो दिखता है वह कैलिफ़ोर्निया में कहाँ ।
रेल के डिब्बे में सफ़र करते समय, हम तो सह यात्रियों से जितनी खुलकर बातें करते हैं वह तो वहाँ संभव ही नही।

@मो सम कौन जी,
हम भी इस मामले मे हमेंशा देशी ही रहेंगे।
पहली रात के बाद जब तक नये गद्दे का इंतजाम नहीं हुआ था, हम तो खटिये के बगल में फ़र्श पर ही सोते थे।

@अनूप शुक्लाजी
बस केवल पैसे के लिए, कैरियर के लिए।
हमने अब तक किसी भारतीय से नहीं मिला जिसने कहा कि हम अमेरीका इस लिए चले आए क्योंकि हमें अपने देश से प्रेम नहीं।

@rashmi ravija,

“If U see a friend without a smile, give him one of urs.”
अच्छा लगा यह quotation. But be prepared for a snub and learn to take it in your stride.
Some people will not smile because they dont want to.

“A smile is like a light in the window of the face that shows that the heart is at home.”

I am reminded of this quotation also.

@विष्णु बैरागीजी,

टिप्पणी के लिए ध्न्यवाद। बस कुछ ही दिनों में तीसरी किस्त ज्ञानजी को भेज दूँगा।
आपकी टिप्प्णी का इन्तज़ार रहेगा।

@भारतीय नागरिकजी,
कुछ लोग कहते हैं कि २६/११ के बाद अमरीकी लोग paranoid हो गये हैं।
पर मैं नहीं मानता के उनका यह व्यवहार २६/११ से किसी तरह जुडा हुआ हैं।
उनका यह व्यवहार केवल हमसे नहीं था, आपस में भी वे यही व्यवहार करते थे।
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सभी मित्रों को मेरी शुभकामनाएं
जी विश्वनाथ