विकास में भी वृक्षों को जीने का मौका मिलना चाहिये



मैने हैं कहीं बोधिसत्त्व में बात की थी वन के पशु-पक्षियों पर करुणा के विषय में। श्री पंकज अवधिया अपनी बुधवासरीय पोस्ट में आज बात कर रहे हैं लगभग उसी प्रकार की सोच वृक्षों के विषय में रखने के लिये। इसमें एक तर्क और भी है – वृक्ष कितने कीमती हैं। उन्हे बचाने के लिये निश्चय ही कुछ सार्थक किया जाना चाहिये। आप पोस्ट पढ़ें:



पारम्परिक चिकित्सा मे विभिन्न पेड़ों की छालों का उपयोग किया जाता है। छालों का एकत्रण पेड़ों के लिये अभिशाप बन जाता है। धीरे-धीरे पेड़ सूखने लगते हैं और अंतत: उनकी मृत्यु हो जाती है। देश के पारम्परिक चिकित्सक इस बात को जानते हैं। उन्हे पता है कि पुराने पेड़ दिव्य औषधीय गुणो से युक्त होते है और उन्हे खोना बहुत बडी क्षति है। इसलिये जब छाल का एकत्रण करना होता है तो वे अलग-अलग पेड़ों से थोडी-थोडी मात्रा मे छाल का एकत्रण करते हैं। इसे आज की वैज्ञानिक भाषा मे रोटेशनल हार्वेस्टिंग कहते है।

पर जब पेड़ विशेष की छाल एकत्र करनी होती है और वे पेड़ कम संख्या मे होते हैं तो वे एक विशेष प्रक्रिया अपनाते हैं। वे इन्हे उपचारित करते हैं। उपचार पन्द्रह दिन पहले से शुरु होता है। दसों वनस्पतियो को एकत्रकर घोल बनाया जाता है और फिर इससे पेड़ों को सींचा जाता है। इस सिंचाई का उद्देश्य पेड़ों को चोट सहने के लिये तैयार करना है। रोज उनकी पूजा की जाती है और कहा जाता है कि अमुक दिन हम एकत्रण के लिये आयेंगे, छाल को दिव्य गुणों से परिपूर्ण कर देना।

साथ ही हमे इस कार्य के लिये क्षमा करना। फिर एकत्रण वाले दिन अलग घोल से सिंचाई की जाती है। एकत्रण के बाद भी एक सप्ताह तक चोटग्रस्त भागों पर तीसरे प्रकार के घोल को डाला जाता है ताकि चोट ठीक हो जाये। यह प्रक्रिया अलग-अलग पेड़ों के लिये अलग-अलग है और हमारे देश मे इस विषय मे वृहत ज्ञान उपलब्ध है। क्या इस अनोखे पारम्परिक ज्ञान का आधुनिक मनुष्य के लिये कोई उपयोग है? इसका जवाब है- हाँ।


आधुनिक विकास पुराने वृक्षो के लिये अभिशाप बना हुआ है। हमारे योजनाकार पेड़ों की कीमत कुछ सौ रुपये लगाते हैं। जबकि एक पेड़ की असली कीमत लाखों में है।


सडकों या नये भवनो के निर्माण में बाधक बनने वाले पेड़ों को बेहरमी से काट दिया जाता है। चिपको आन्दोलन का पाठ पढने के बाद भी कोई सामने नही आता। कुछ अखबार इस पर लिखते भी हैं पर फिर भी ज्यादा फर्क नही पड़ता। पुराने वृक्ष सघन बस्तियों के लिये फेफड़ो का काम करते हैं और इनका बचा रहना जरुरी है। पर यदि इन्हे हटाना ही है तो फिर इन्हे जीने का एक और मौका दिया जाना चाहिये। यह असम्भव लगता है पर वर्षो पुराने वृक्षों को एक स्थान से उखाडकर दूसरे सुरक्षित स्थान तक पहुँचाया जा सकता है। यह दूरी कुछ मीटर से लेकर दसों

किलोमीटर तक की हो सकती है।


जिस पारम्परिक ज्ञान की बात हमने ऊपर की है उसके उपयोग से पुराने वृक्षो को जीवित रखा जा सकता है। उन्हे चोट से उबरने मे मदद की जा सकती है। विदर्भ मे कुछ प्रयोग हम लोगो ने किये पर चूँकि पारम्परिक चिकित्सक हमारे साथ नहीं थे इसलिये सफलता का प्रतिशत बहुत कम रहा। आमतौर पर पीपल और बरगद के पेड़ों को ही हटाना होता है। इस विषय मे पारम्परिक चिकित्सक गहरा ज्ञान रखते है और अपनी सेवाएं देने को तैयार है। उनके साथ मिलकर प्रयोग किये जा सकते हैं और मानक विधि विकसित की जा सकती है। इससे देश भर मे उन पुराने पेड़ो को बचाया जा सकेगा जो आधुनिक विकास के लिये तथाकथित बाधा बन रहे हैं।


मैने इस पारम्परिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण किया है। तीन सौ से अधिक वृक्ष प्रजातियो के विषय मे जानकारी एकत्र की जा चुकी है। पर जमीनी स्तर पर सफलता के लिये सभी को मिलकर काम करने की जरुरत है।


पंकज अवधिया

© इस पोस्ट पर सर्वाधिकार श्री पंकज अवधिया का है।


पिछले गुरुवार को अवधिया जी पर जंगल में फोटो खींचते समय मधुमक्खियों ने हमला कर दिया। बावजूद इसके, उन्होने समय पर अपना लेख भेज दिया। उनकी हिम्मत और लगन की दाद देनी चाहिये।


गुबरैला एक समर्पित सफाई कर्मी है



अपने ब्लॉग पर जिस विविधता की मैं आशा रखता हूं, वह बुधवासरीय अतिथि पोस्ट में श्री पंकज अवधिया पूरी कर रहे हैं। पिछली पोस्ट में जल-सुराही-प्याऊ-पानी के पाउच को लेकर उन्होने एक रोचक सामाजिक/आर्थिक परिवर्तन पर वर्तनी चलाई थी। आज वे अपशिष्ट पदार्थ के बायो डीग्रेडेशन और उसमें गुबरैले की महत्वपूर्ण भूमिका का विषय हमें स्पष्ट कर रहे हैं। उनके पुराने लेख आप पंकज अवधिया के लेबल सर्च से देख सकते हैं। आप लेख पढ़ें:


पिछले दिनों मै मुम्बई के सितारा होटल मे ठहरा। रात तीन बजे तेज बदबू से मेरी नींद खुल गयी। कारण जानना चाहा तो मुझे बताया गया कि ड्रेनेज की समस्या है। आपके कमरे मे रूम फ्रेशनर डलवा देता हूँ मैनेजर ने कहा। रुम फ्रेशनर से कुछ ही समय मे गंध दब गयी। पर दिन भर इसका उपयोग करना पड़ा। यह दुर्गन्ध नयी नहीं है। पूरे भारतवर्ष मे इसे सूंघा जा सकता है। चाहे वो साधारण बस्ती हो या बडी हवेली के पिछवाडे हों। रायपुर में तो रात को नाक पर रुमाल रखे बिना कई आधुनिक कालोनियों से गुजरना मुश्किल है। बरसात मे जब नालियाँ भर जाती है तो यही पानी सड़को में आ जाता है और आम लोगों को मजबूरीवश उससे होकर गुजरना पड़ता है। बच्चे भी उसमे खेलते रहते हैं। मानव आबादी जैसे जैसे बढ़ती जा रही है, यह समस्या भी बढ़ती जा रही है। मानव अपशिष्टों की दुर्गन्ध सहने की आदत अब लोग डालते जा रहे हैं। अब वे नाक पर रुमाल भी नही रखते। हल्ला भी नही मचाते और रुम फ्रेशनर डालकर सो जाते हैं। ये समस्या बहुत तेजी से बढ़ने वाली है। पर क्या इससे निपटने का कोई उपाय है ? देखिये अब सरकारों और योजनाकारों से उम्मीद करना बेकार है। उनके भरोसे तो अब तक हम हैं ही।

आपने गोबर की खाद का नाम तो सुना ही होगा। गोबर अपने आप सड़ता है धीरे धीरे और अंत मे पूरी तरह सड़कर गन्ध विहीन उपयोगी खाद मे परिवर्तित हो जाता है। यदि इस प्रक्रिया को तेज करना है तो इसमे कुछ ऐसे द्रव डाले जाते है जिनसे सड़ाने वाले सूक्षमजीवो की हलचल बढ जाती है। इससे कुछ ही समय मे सड़न की प्रक्रिया पूरी हो जाती है। कुछ वर्षों पहले जापान के वैज्ञानिको ने ई . एम . ( इफेक्टीव माइक्रोआरगेनिज्म ) नामक तकनीक निकाली थी। उनका दावा था कि आप सूक्ष्मजीवो के घोल को किसी अपशिष्ट में डाल दें तो वह उसे कुछ ही दिनो मे पूरी तरह सड़ा देगा। मानव जनित अपशिष्टों के लिये यह वरदान लगा। पर जापानी सूक्ष्मजीव भारतीय परिस्थितियों मे ज्यादा कारगर नहीं साबित हुये। फिर इस पर भारत मे शोध नहीं हुये और यह तकनीक हाशिये में चली गयी। इस पर आधारित मैने कई प्रयोग किये।


हमारी बदबूदार नालियों मे सूक्ष्मजीव पहले से हैं पर उनकी संख्या इतनी नही है कि वे लगातार आ रहे अपशिष्ट को पूरी तरह सड़ा सकें। मैने बतौर प्रयोग छाछ से लेकर बहुत सी वनस्पतियाँ डालीं जो कि सूक्ष्मजीवों की हलचल को बढाने मे सक्षम थी। इससे उत्साहवर्धक परिणाम मिले। पहले दिन बदबू बहुत बढ गयी पर कुछ ही समय मे इससे निजात मिल गयी। वनस्पतियाँ आस पास ही उगती हैं अत : उन्हे एकत्र करने मे दिक्कत नही होती है। प्रयोग तो अब भी जारी हैं पर इस लेख के माध्यम से इसे सामने रखकर मैं आप लोगो की राय जानना चाहता हूँ। यह प्रयोग बहुत सस्ता है और प्रभावी तो है ही। चोक हो चुकी नालियों मे यह अधिक उपयोगी है।

गुबरैले के चित्र, जानकारी, वीडियो और ई-कार्ड नेशनल ज्योग्राफिक पर यहां पायें।

मुझे पता नही आपमे से कितने लोगो ने गुबरैले का नाम सुना है या इन्हे देखा है। ये प्रकृति के सफाई कर्मचारी हैं। इनके बारे मे कहा जाता है कि यदि ये न होते तो अफ्रीका के जंगल अब तक जानवरों मे मल की कई परतों मे दब चुके होते। हमने अपने शहर से इन सफाई कर्मचारियों को भगा दिया है। हम इन्हे देखते ही चप्पल उठा लेते हैं और मारने मे देर नही करते हैं। ये गुबरैले ( डंग बीटल ) मल को गेंद की शक्ल देकर लुढ़काते हुये ले जाते हैं और अपनी प्रेमिका को दिखाते हैं। बडी गेंद लाने वाले प्रेमी को पसन्द किया जाता है। मादायें गेंद रुपी उपहार लेकर मिट्टी में दबा देती हैं, फिर उसी मे अंडे देती हैं ताकि बच्चो के बाहर निकलने पर भोजन की कमी न रहे। विश्व के बहुत से देशों मे मानव की गन्दगी से निपटने अब इन मुफ्त के सफाई कर्मचारियो को वापस बुलाया जा रहा है। भारत में भी इनकी जरुरत है। ये मनुष्यों को नुकसान नही पहुँचाते हैं और अपने आप बढ़ते रहते हैं। ये चौबीसों घंटे काम करते हैं – बिना अवकाश के। वेतन बढ़ाने की माँग भी नही करते हैं और किसी तरह की हडताल भी नहीं।

देश को इस बदबू से मुफ्त मे सेवा देने वाले सूक्ष्मजीव और गुबरैले ही मुक्त करा सकते है, ऐसा प्रतीत होता है।


आप गुबरैले का एक स्पष्ट चित्र ईकोपोर्ट पर यहां देख सकते हैं। गुबरैले का जीवन चक्र आपको चित्र के आधार पर ईकोपोर्ट में यहां समझाया गया मिलेगा।


पंकज अवधिया

© इस लेख पर सर्वाधिकार श्री पंकज अवधिया का है।


यू-ट्यूब पर उपलब्ध गुबरैले पर वीडियो:
इसे आप पूरा देखें तो पता चलता है कि कितना मेहनती है गुबरैला। और तब आप इस जीव को सम्मान से देखेंगे।


और प्रकृति में गुबरैले की महत्वपूर्ण भूमिका के विषय में क्वाजुलू, नटाल, दक्षिण अफ्रीका के हाथी अभयारण्य के सन 2002 में खींचे इस चित्र से बेहतर मुझे कोई प्रस्तुति नहीं लगती। यह चित्र एण्डी नामक सज्जन ने खींचा। मैने उन्हे ई-मेल किया चित्र को ब्लॉग पर दिखाने को, पर उत्तर नहीं मिला। सन 2002 के बाद शायद एण्डी मूव कर गये हों। चित्र अपने आप में पूरी बात कहता है। आप चित्र देखें: Dung Beetle
(चेतावनी – गुबरैलों को रास्ते पर पहला अधिकार है! )