स्मार्टफोन जाओ, साइकिल आओ

उसने मुझे दिखाया था कि साठ रुपये की पुड़िया में दो तीन दिन तक वे तीन चार लोग चिलमानंद मग्न रह सकते थे। वह ‘सात्विक’ आनंद जिसे धर्म की भी स्वीकृति प्राप्त थी। यह सब मैं, अपनी नौकरी के दौरान नहीं देख सकता था।


कार्ल न्यूपोर्ट की पुस्तक पढ़ी है ‘डिजिटल मिनिमलिज्म’। पढ़ कर समझ आ गया है कि सोशल मीडिया कम्पनियाँ मूर्ख बना रही हैं। उनकी कोई रुचि हमारी सोशल कनेक्टिविटी में नहीं है। उनका सारा जोर हमें डिजिटल प्लेटफार्म पर बारम्बार बुलाना और आने पर बांधे रहना है। आप “दारुजोषित की नाईंं” एक बार आते हैं स्मार्टफोन पर केवल आज का मौसम या अभी का समय देखने के लिये और वेब सर्फ करने में या सोशल मीडिया में लाइक – कमेण्ट देखने में लग जाते हैं। उस सर्फिंग से आप कोई विद्वान बनते हों, ऐसा कत्तई नहीं है।

उसमें आप अपना समय खर्च करते हैं और उससे पैसा कमाते हैं फेसबुक या गूगल जी।

अफीम के बाद और अफीम से कई गुना ज्यादा घातक है यह स्मार्टफोन का लती बनना। आप वह किताब खुद पढ़ें और निर्णय लें।

साथी, मेरी साइकिल

फिलहाल, मैंने तो स्मार्टफोन को डीएनडी (डू नॉट डिस्टर्ब) मोड में धर कर अपना दो मेगापिल्सल का नोकिया 3111 और साथी (अपनी साइकिल) का साथ पकड़ा। स्मार्टफोन साथ में इसलिये रखा कि उसके नम्बर पर कोई जरूरी फोन आये तो अटेण्ड कर सकूं। वैसे दूसरी पारी में चल रहे व्यक्ति के पास ऐसे फोन कम ही आते हैं।

मैं देख पाया कि महुआ झर रहा है। भगवानपुर की महुआरी में लोगों ने चादर बिछा दी है। पर चादर पर कम, जमीन पर ज्यादा गिर रहा है महुआ। उसे बीनने के लिये बच्चे पन्नियाँ हाथ में लिये इधर उधर दौड़ रहे हैं।

भगवानपुर की महुआरी

एक व्यक्ति को कहते सुना – आज ठण्डक है मौसम में, इसलिये आज कम झरा है। मौसम की ठण्डक का दृष्य भी दिखा। दिन में ताप 40 डिग्री के आसपास हो रहा है पर सवेरे हवा में सर्दी थी। कुछ जगह लोग कऊड़ा जलाये तापते भी दिखे।

कुछ जगह लोग कऊड़ा जलाये तापते भी दिखे।

गडौली में एक जगह पर महुये का एक पेड़ है जो बहुत फलता है। पिछले तीन साल से वह मैं देख रहा हूं। उसके चित्र लेना नहीं भूलता। साइकिल रोक कर चित्र लेने लगा तो एक लड़की टोकरे में बीने हुये महुआ रखने खड़ी थी। मैं चाहता था वह हट जाये तब चित्र लूं, पर वह मुझे देख कर ठिठक गयी। हम दोनो के पेशोपेश में मोबाइल का बटन दबा और चित्र खिंच गया। फोटोस्केचर एप्प (लैपटॉप पर) से उसको पैण्टिंग का रूप देने से लड़की की पहचान पर्याप्त मिट गयी है, पर चित्र तो है ही।

महुआ बीनने वाली लड़की।

एक घणरोज (नीलगाय) मेरे रास्ते से गुजरा। दो कुत्ते उसके पीछे झपटे और उसे खदेड़ दिया। कुत्तों को नीलगाय लखेदना देखते हुये मेरे मन में विचार आया कि नीलगाय से बचने के लिये गांव वालों को कुत्ते प्रशिक्षित करने चाहियें। जैसे गड़रिया एक दो कुत्ते पालता है अपनी भेड़ों की रक्षा के लिये, वैसे किसान को भी कुत्ते पालने चाहियें। वे भले ही देसी ब्रीड के हों, पर स्वस्थ होने चाहियें। उनकी नियमित डीवॉर्मिंग और टीकाकरण होना चाहिये।

मैं तीन सीनियर सिटिजंस को जानता हूं जो अपने खेतों की घणरोज से रक्षा के लिये रात भर टार्च जला जला कर रखवाली करते हैं। उनके लड़के आराम से खटिया तोड़ते सोते हैं। अगर वे तीन चार कुत्ते इस काम के लिये तैयार कर लें तो शायद उन्हे रात में नींद नसीब हो सके।

दो आदमी सड़क के किनारे घणरोजों पर बातचीत करते दिखे। उनके अनुसार इस साल ज्यादा नुक्सान नहीं हुआ नीलगायों से। मेरे ख्याल से यह उनका अपना पर्सेप्शन था, जो शायद सही न हो।

दो आदमी सड़क के किनारे घणरोजों पर बातचीत करते दिखे।

लोहार के पुरवा के पास रेलवे क्रॉसिंग है। वह कुछ ज्यादा ही देर तक बंद रहा। ट्रेन गुजर रही थी – खाली कवर्ड वैगनों की मालगाड़ी। गुजरने के बाद नियमानुसार दो मिनट तक गेट नहीं खोला जाता। तब मैंने देखा – आठ मोटर साइकिलेंं और मेरे अलावा एक साइकिल वाले खड़े थे। किसी जमाने में साइकिल होना भी स्टेटस सिम्बल था। पहली साइकिल विवाह होने पर मिलती थी। अब विवाह के समय चार चक्का की डिमाण्ड होने लगी है। साइकिल की बजाय आम से भी आम आदमी मोटर साइकिल वाला हो गया है। मेरे जैसे ही बचे हैं साइकिल वाले।

लेवल क्रॉसिंग पर आठ मोटर साइकिल वाले और दो साइकिल वाले थे।

एक महिला सवेरे सवेरे सड़क किनारे घास छील रही थी। बताया कि उसके यहां एक गाय और एक भैंस है। घास ले कर जायेगी। घर में कल है (यानी मशीन) उसपर घास कुट्टी काट कर गाय-भैंस को खाने को दी जायेगी। गाय भले ही भैंस से कम दूध देती हो, भले ही उसका दूध सस्ता बिकता हो; गाय का नाम भैंस से पहले लिया जाता है। यह हिंदू परम्परा है। सीताराम!

गाय-भैंस के लिये सवेरे घास छीलती महिला

अव्वल तो गांवदेहात में पढ़ने वाले कम हैं, पर स्कूली बच्चे सवेरे ट्यूशन पढ़ने जाते-आते दिख जाते हैं। माता पिता ट्यूशन पर पैसे खर्च करते हैं कि बच्चा कलेक्टर-दारोगा बन जाये। पढ़ाई का और कोई ध्येय नहीं है। ट्यूशन के लिये, कहीं कहीं मास्टर जी सड़क के किनारे क्लास चलाते भी नजर आते हैं। एक जगह तो बच्चे यूं पढ़ रहे थे – और यह कोई शांतिनिकेतनी ट्यूशन जैसी लगती थी। पूरी तरह अनौपचारिक। पढ़ाई तो ऐसी ही होनी चाहिये! 😆

एक जगह तो बच्चे यूं पढ़ रहे थे

कटका रेलवे स्टेशन के पास, रेलवे की ही जमीन पर यह मंदिर है। इसमें बनाने वालों का उत्साह (या पैसा) कगूरा बनने के पहले ही खत्म हो गया। आगे जुड़ाई करने के लिये सरिये अभी भी निकले हुये हैं। बड़ी मुश्किल से मंदिर के कमरों और ओसारे की छत डाली जा सकी है। बड़ा ही एकांत है इस मंदिर के पास। और एकांत का लाभ गंजेड़ी लोग ही उठाते हैं। पहले मंगल गिरि (मेरा निर्मोही अखाड़े का साधू मित्र) यहीं डेरा डाले रहता था। उसने मुझे चिलम (गांजे वाली) का बेसिक डिमॉन्स्ट्रेशन दिखाया था। पांच साल पहले। वे चित्र किसी पुराने मोबाइल में शायद दफन हो गये।

रेलवे की ही जमीन पर यह मंदिर है।

उसने मुझे दिखाया था कि साठ रुपये की पुड़िया में दो तीन दिन तक वे तीन चार लोग चिलमानंद मग्न रह सकते थे। वह ‘सात्विक’ आनंद जिसे धर्म की भी स्वीकृति प्राप्त थी। यह सब मैं, अपनी नौकरी के दौरान नहीं देख सकता था। तब कभी कटका से गुजरा भी था तो रेलवे का अमला आगे पीछे हुआ करता था और आरपीएफ वाला निरीक्षण के पहले ही गंजेड़ियों को भगा देता रहा होगा! अब मैं बड़े इत्मीनान से मंदिर की परिक्रमा कर रहा था।

सारी प्रतिमायें प्लास्टर ऑफ पेरिस की हैं। श्रद्धा ग्रेनाइट से बलुआ पत्थर की प्रतिमाओं में निवास करते करते उकता कर अब इस सीमेण्ट/प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियों में आ बसी है। और भगवान क्या? वे तो कंकर पत्थर, धूल, गोबर और रेत में भी बसते हैं। रामेश्वरम और ऋषिकेश में भगवान राम ने शिवलिंग स्थापना तो रेत से ही की थी। हनुमान जी तो कैलाश से शंकर जी को लाने में लेट ही हो गये थे। आजकल लोग लेट तो नहीं हैं; उनके पास लक्ष्मी नहीं हैं। या हैं भी तो वे धन परधानी के चुनाव में दारू-मुरगा बांटने में रिलीज कर रही हैं। लिहाजा मूर्तियां भदेस, प्लास्टर ऑफ पेरिस की ही है!

लिहाजा मूर्तियां भदेस, प्लास्टर ऑफ पेरिस की ही है!

सवा घण्टा इस तरह घूमते हुये व्यतीत हो गया। मैं चप्पल उतार मंदिर के दर्शन करने चबूतरे पर चढ़ जाता हूं। हनूमान जी के मंदिर की दीवार चटक गयी है। ज्यादा चलेगा नहीं मंदिर। बीच में शंकर जी हैं और दूसरी तरफ मां जगदम्बा। शैव मंदिर है। उसमें हनूमान जी शायद शैव-वैष्णव समरसता के लिये स्थापित किये गये हैं। हिंदुत्व का यह समरसता वाला पक्ष मुझे रुचता है। तुलसी बाबा की मानस की पूरी थीम ही इसी आधार पर है!

हनूमान जी के मंदिर की दीवार चटक गयी है।
मंदिर के दूसरे छोर पार माता पार्वती हैं। सिंह वाहिनी

मैं मंगल गिरि को मिस करता हूं। लगता है कि अभी कहीं पीछे से आ कर सामने खड़ा हो जायेगा और मैं पूछूंगा – क्या (हरिद्वार) कुम्भ चले गये थे? पर कोई नहीं मिला मंदिर पर – कोई ऑर्डीनरी गंजेड़ी भी। बस एक लड़की साइकिल कैंची से सीखती जरूर गुजरी पास से।

एक लड़की साइकिल कैंची से सीखती जरूर गुजरी पास से।

मंदिर में हाथ जोड़ कर वापस लौटता हूं। एक दिन में सवेरे का भ्रमण इतना होता है। स्मार्टफोन विहीनभ्रमण। नोकिया वाले फोन से चित्र फटे फटे से आते हैं तो उन्हे मैं घर पर पैण्टिंग का सा रूप दे देता हूं फोटोस्केचर एप्प से। स्मार्टफोन विहीन जीवन, साइकिल, पुस्तकों, किण्डल और यदाकदा लैपटॉप के साथ ज्यादा रोचक लगता है। आज चार दिन हो गये हैं उस तरह से। और निरर्थक मोबाइल सर्फिंग से बचे समय में दो ठीक ठाक पुस्तकें और कई पत्रिकायें खत्म करी हैं।

स्मार्टफोन छोड़ो जीडी, साथी (साइकिल) का साथ थामो और एक्टिव लीजर लाइफ (active leisure life) गुजारो। यही मंत्र पढ़ा है किताब में। स्मार्टफोन वजन बढ़ाता है और वजन के साथ जुड़ती हैं अनेकानेक समस्यायें। फीचर फोन+साइकिल आपके स्वास्थ्य के लिये भी उत्तमोत्तम है। स्मॉर्ट टेक्नॉलॉजी के मुरीद बनने की बजाय टेक्नॉलॉजी का स्मार्ट उपयोग ज्यादा फायदेमंद है। 😆


प्रसन्नता की तलाश – गंगा, गांव की सैर

सवेरे अपने वाहन चालक को सात बजे बुला, उसके साथ एक कप चाय पीने के बाद हम दोनों ने घर से निकल कर गांव की छोटी सड़कों पर यूंही घूमने की सोची। करीब एक घण्टा इस प्रकार व्यतीत करने का कार्यक्रम रखा।


बेटा-बहू-पोती का गांव से प्रयागराज शिफ्ट हो जाना घरेलू दशा में बड़ा बदलाव है हमारे लिये। वैवाहिक जीवन में, शुरुआती दिनों को छोड़ दें तो हम परिवार बनाने में या परिवार के साथ रहने में ही लगे रहे। चालीस साल उस तरह बीते। पहले बेटा-बिटिया को पालने में रहे। बिटिया की शादी होने के बाद कुछ ही समय बीता; और उसमें भी बेटा साथ रहा; हम अपने माता पिता के साथ रहने प्रयागराज आ गये। वहां माता के देहावसान के बाद मेरे पिताजी मेरे साथ रहे। करीब चार साल तो वे और मैं एक ही कमरे को शेयर करते रहे।

नौकरी की समाप्ति पर हम गांव में शिफ्ट हो गये। गांव में मेरा पूरा परिवार – पिता, बेटा-बहू-पोती साथ रहे। कभी कभी मेरी सास जी भी आकर हमारे साथ रहती रहीं। मेरे पिताजी और मेरी सास जी ने देह त्याग भी हमारे इसी गांव के घर में किया।

अब, चालीस साल बाद, यह समीकरण बना है कि गांव में घर है, और केवल हम दो व्यक्ति – पत्नीजी और मैं भर घर में रह रहे हैं। चालीस साल बाद यह स्थिति आयी है कि स्नानघर में जाते समय दरवाजा बंद करेंं या न करें – कोई फर्क नहीं पड़ता। और यह स्थिति एक या दो दिन की नहीं है। आगे केवल एक दूसरे के साथ जीना है।

अटपटा लग रहा है। कोरोना संक्रमण काल से यह कहीं बड़ा डिसरप्शन (disruption) है।

पर हर बदलाव को परखना और उसमें से रास्ता निकालना ही जीवन है। हमने भी, जो परिस्थिति है, उसमें ‘अच्छा’ तलाशने का काम किया। अपनी दिनचर्या बदलने की शुरुआत की। सवेरे उठ कर एक घण्टा घर में ही एक्सर्साइजर पर कानों में हेडफोन लगा पॉडकास्ट सुनते व्यायाम करने को नियमित किया है। पत्नीजी भी म्यूजिक लगा कर घर के बड़े और लम्बे ड्राइंग रूम में घूमने का व्यायाम करती हैं। उनके लिये पौधों की देखभाल, पानी देना और खरपतवार निराई करने के भी काम हैं। उससे भी उनका व्यायाम हो जाता है।

गंगा तट पर रीता पाण्डेय और मैं। चित्र अशोक ने लिया।

हा दोनों ने अपना वजन कम करने की दिशा में प्रयत्न किये हैं। भोजन सीमित करना, दूध वाली चाय की बजाय पानी, जीरा और ग्रीन-चाय का प्रयोग करना प्रारम्भ कर दिया है। अब दूध लेने जाने की जिम्मेदारी मैंने ले ली है। उसमें भी कुछ व्यायाम होता ही है।

घर के बाहर देखने के लिये मेरे पास गांवदेहात का भ्रमण पहले से था – साइकिल ले कर 10 किलोमीटर के दायरे में घूम आता था। अब उसमें मैंने पत्नीजी को भी जोड़ा। सवेरे अपने वाहन चालक को सात बजे बुला, उसके साथ एक कप चाय पीने के बाद हम दोनों ने घर से निकल कर गांव की छोटी सड़कों पर यूंही घूमने की सोची। करीब एक घण्टा इस प्रकार व्यतीत करने का कार्यक्रम रखा।

उस सिलसिले में कल द्वारिकापुर के गंगा तट पर गये।

सूर्योदय होने पर भी कोहरा था। कहीं कहीं तो बहुत घना भी हो जाता था। उसे चीरते हुये धीमी चाल से कार से निकलना और खिड़की से गांव देहात को निहारना बहुत अच्छा लग रहा था। साइकिल पर होता तो कई जगह रुकता – सरसों के खेत, घूरे पर सवेरे की बटोरन ले कर जाती महिला, बासी भात थाली में उंडेलती महिला, स्कूल जाते बच्चे – यह सब ठहर कर देखता। पर वाहन पर बैठ गुजरते हुये देखना भी खराब नहीं था। कार की एक खिड़की मैंने और दूसरी पत्नीजी ने सम्भाल ली थी। देखते हुये इतना अच्छा लग रहा था कि बात करना बंद हो गया।

गंगा तट के करार से नीचे उतरती पत्नीजी।

वाहन पार्क कर हम गंगा तट की ओर चले। घाट पर कोहरा इतना था कि जल या कोई गतिविधि दिख नहीं रही थी। अगर हमें पहले से गंगा तट की जानकारी न होती तो दिखाई न देने के कारण हम नीचे उतरते ही नहीं। बहुत पास जाने पर एक खाट पड़ी दिखी। शायद पिछले दिन मौनी अमावस्या स्नान के लिये घाट पर किसी पण्डा ने बिछाई होगी और रात में उसे वापस नहीं ले गया होगा। तीन चार महिलायें स्नान कर रही थीं। उसके आगे तीन बालू ढोने वाली बड़ी नावें किनारे लगीं थीं। एक नाव में रहने का कमरा था, उसमें से निकल कर नाविक चाय पी रहा था। एक आदमी अण्डरवियर पहने साबुन लगा कर गंगा में डुबकी लगाने वाला था। पत्नीजी ने कहा – उसपर तो कैमरा मत साधो!

घाट के किनारे बबूल के वृक्ष भी शांत थे। कोहरे का कम्बल ओढ़े।

सब कुछ शांत, सब कुछ सुंदर, सब कुछ पहले का देखा होने पर भी नया। हम दोनो के हाथ में मोबाइल थे और उसमें फोटो कैद करने के लिये खूब यत्न कर रहे थे हम। दस पंद्रह मिनट थे वहां हम। आनंद ही आनंद था वहा!

महिलायें स्नान कर लौटने लगीं तो मेरी पत्नीजी ने उनसे बात की। एक महिला करहर (तीन किलोमीटर दूर गांव) की थी। पैर सूजे थे। फाईलेरिया था। पर वह सालों से नियमित गंगास्नान को आती है। बाकी महिलायें इसी गांव – द्वारिकापुर की थीं। उनके पास नित्य गंगा स्नान एक धर्म, व्यवहार, आनंद और प्रसन्नता की आदत है। वैसी ही आदतें हमें अपने में विकसित करनी हैं। और उसके लिये पूरी तरह से प्रयासरत हैं हम दोनो।

घर वापस आने पर प्रसन्नता का प्रभाव दिन भर बना रहा। वही ध्येय भी था!

हमारा वाहन चालक अशोक। उसे मोबाइल से चित्र लेना भी सिखाना होगा, अगर कार भ्रमण नियमित होता है, तो!