मेरी रेलवे की यादों को कुरेदती फिल्म भुवन शोम

मैं अपने तनाव, शरीर और मन की उपेक्षा और रोज रोज की चिख चिख से अपने को असम्पृक्त नहीं कर सका। अगर वह सीख लेता – और उसके प्रति सचेत रहता – तो आज कहीं बेहतर शारीरिक/मानसिक दशा में होता।


मैंने दूसरी पारी की शुरुआत के विषय में लिखना प्रारम्भ किया तो एक सजग किंतु अनाम पाठक ने ट्विटर पर टिप्पणी की –

एग्रेरियन महोदय ने कहा कि मैं समय निकाल कर भुवन शोम देखूं

मैंने फिल्में बहुत ही कम देखी हैं। कई बार तो दशकों बीत गये बिना किसी फिल्म को देखे। जब नौकरी ज्वाइन की थी तो इस तरह के किस्से सुने थे कि फलाने साहब सिनेमा देखने गये और बीच में ही अनाउंसमेण्ट कर उन्हें रेलवे की एमरजेंसी से निपटने के लिये सीधे कण्ट्रोल रूम में पंहुचने को कहा गया।

वह छोटा शहर (रतलाम) था। आपको ट्रेन कण्ट्रोल को बता कर जाना होता था कि कहां जा रहे हैं और आपको कैसे सम्पर्क किया जा सकता है। मोबाइल का जमाना नहीं था। बहुधा आप अगर रेलवे के तंत्र के बाहर हैं तो रेलवे नियंत्रण कक्ष से किसी न किसी को रवाना किया जाता था किसी भी एमरजेंसी की दशा में।

और वह मण्डल (रतलाम) ऐसा था कि एमरजेंसियाँ होती ही रहती थीं। ट्रेनों का पटरी से उतरना, वैगनों का ऊंचाई पर अन-कपल होना, रेलखण्ड का घण्टे भर से ज्यादा बिना सूचना के किसी अनहोनी से बंद रहना या फिर सीधे सीधे सवारी गाड़ी की दुर्घटना आम थे। दिल्ली और बम्बई से ट्रेने‍ सपाट रेल पर चलती चली आती थीं पर रतलाम – गोधरा खण्ड, जो सत्तर प्रतिशत गोलाई, टनल और ग्रेडियेण्ट पर था, वहां असली दिक्कत होती थी परिचालन की। … सो मैंने सिनेमा देखना ही बंद कर दिया। वही आदत अभी तक कायम है।

भुवन शोम में उत्पल दत्त

खैर, एग्रेरियन महोदय की सलाह पर मैंने “भुवन शोम” खोजी। किसी ओटीटी प्लेटफार्म पर नहीं मिली। यू-ट्यूब पर थी पूरी डेढ़ घण्टे की फिल्म। डाउन लोड की और देर रात तक देखी मोबाइल पर। काली-सफेद, 35 एमएम का पर्दा वाली फिल्म। धीरे चलने वाली। मारधाड़ विहीन। पर क्या गजब फिल्म! मृणाल सेन और उत्पल दत्त तो कालजयी हैं! बनफूल (बलाई चंद मुखोपाध्याय) की कहानी पर बहुत जानदार फिल्म बनाई है उन्होने।

भुवन शोम में पक्षियों की तलाश में गंवई पोशाक में उत्पल दत्त और गौरी (सुहासिनी मुळे)

और फिल्म भी मेरे पुराने विभाग, रेलवे के इर्दगिर्द है। रेल की सम्भवत: यातायात सेवा का अफसर है भुवन शोम (उत्पल दत्त)। काम के बोझ से उकता कर एकबार पक्षियों के शिकार पर निकलता है। छोटे से स्टेशन पर टिकेट कलेक्टर है साधू मेहर। उसकी चार्जशीट लगभग तय कर चुका है भुवन शोम। भ्रष्टाचरण के सिद्ध चार्ज में वह नौकरी से हाथ धो बैठेगा।

पक्षियों की तलाश में उत्पल दत्त जिस गांव में जाता है वहां उसकी सहायता को मिलती है लड़की गौरी (सुहासिनी मुळे), जिसका गौना साधू मेहर से होने वाला है। सरल, निश्छल गौरी उत्पल को बहुत प्रभावित करती है और वापस जा कर वह अधिकारी साधू मेहर को बुला कर डांट लगाता है, पर उसकी चार्जशीट रद्द कर देता है।

भयभीत, पर भ्रष्ट साधू मेहर। उसको उत्पल दत्त डांटता है, पर चार्जशीट रद्द कर देता है।

फिल्म सरकारी अफसर की मोनोटोनी, ऊब, मानवीय सम्वेदना और अपनी कड़े अफसर की ओढ़ी इमेज के अनुसार स्वयम को प्रमाणित करने की चाह (या जिद) को बखूबी दर्शाती है। उत्पल दत्त की जगह लगभग पूरे फिल्म के दौरान मैं अपने को देखता रहा। और उसने बहुत सी यादें कुरेद दीं। (बाई द वे; कुरेदना, सुरसुरी या गुदगुदी का एक प्रसंग भी फिल्म में है जिसमें गाड़ीवान बैलोंंको उनके पृष्ठ भाग में सुरसुराता-खोदता है जिससे वे तेज दौड़ें।)

शिकार करने गया उत्पल दत्त। उनकी गोली से कोई चिड़िया नहीं मरती!

मुझे याद हो आयीं अपने द्वारा दी गयी या निपटाई चार्जशीटें। जब मैंने असिस्टेण्ट डिविजनल ऑपरेशंस सुपरिण्टेण्डेण्ट (एओएस) के रूप में ज्वाइन किया था तो मेरी टेबल पर सौ से ज्यादा चार्जशीटें थीं; जिन्हे मेरे पहले वाले अफसर जारी कर गये थे और वे पेण्डिंग थीं। वे सभी चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों की चार्जशीटें थीं। नौकरी से गायब रहना, हुक्म न मानना, दारू पी कर ड्यूटी करना, मारपीट, एक से ज्यादा पत्नी होना, यात्रियों से अभद्र व्यवहार आदि अनेक विषय उनमें दर्ज थे।

ट्रेन ऑपरेशंस का जो बोझ था, उसके सामने इन चार्जशीटों का निपटारा करना अंतिम वरीयता रखता था। विभाग में मेरे ऊपर के अफसर इस बात की फिक्र नहीं करते थे कि कितनी चार्जशीटें मैंने निपटाईं। उनकी वरीयता ट्रेन का परिचालन थी। केवल एस्टेब्लिशमेण्ट अधिकारी के रिपोर्ट पर, जिसमें हर अफसर के नाम के आगे उनके पास पैण्डिंग चार्जशीटों के आंकड़े होते थे, मण्डल रेल प्रबंधक जरूर कहा करते थे। एक दो डिस्प्लेजर नोट भी दिये उन्होने। पर चूंकि व्यक्तिगत रूप से वे मुझे बहुत पसंद करते थे; उनके डिस्प्लेजर नोटों की ज्यादा फिक्र नहीं करता था मैं।

और फिक्र करता भी तो क्या? मेरे पास यातायात परिचालन की चौबीसों घण्टे की ड्यूटी के आगे समय ही नहीं बचता था कि चार्जशीटों का निपटारा करूं। मैंने काम के बोझ में अपने परिवार की ओर भी बहुत कम ध्यान दिया। उसका उलाहना मेरा परिवार अब भी देता है और वह अब भी मुझे कचोटता है।

दारू पी कर ड्यूटी करना मेरी निगाह में बहुत बड़ा गुनाह था। शायद इस लिये भी कि मैंने कभी शराब छुई नहीं। मैंने दो तीन कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया इस चार्ज पर। और बहुत हल्ला मचा। यूनियन वाले भी चिल्लाये। मेरे सीनियर (जो बहुत कुशल अधिकारी थे पर बहुत ज्यादा शराब के शौकीन भी थे) ने मुझसे कहा – “यार, तुम तो गजब अफसर हो। दारू पीने पर नौकरी ले लेते हो।” जाहिर है, उन्होने सभी मामलों में अपील पर नौकरी से निकालने की सजा रद्द कर दी, पर थोड़ा बहुत प्रसाद तो देना ही पड़ा कर्मचारियों को!

लेकिन मेरे व्यक्तित्व की प्रारम्भिक सालों की कड़ाई ज्यादा टिकी नहीं। मैं यह समझ गया कि चार्जशीट देना दुधारू तलवार है। उससे अपना भी काम बहुत बढ़ता है। चार्जशीट देने की बजाय मौके पर डांटना, फटकारना, फजीहत कर भूल जाना कहीं बेहतर है। और, इसके उलट कर्मचारियों को उनकी गलती बता कर सुधारना और भी बेहतर।

डांटने फटकारने के लिये मुझे “थानेदारी” भाषा सीखनी पड़ी। भीषण अपशब्द तो मेरी भाषा में नहीं आये, पर व्यंग और आवाज की पिच बढ़ाने से वह प्रभाव डालने में अधिकांशत: सफल रहा।

समय के साथ व्यक्तित्व के खुरदरे पत्थर घिस कर पर्याप्त चिकने बन गये। समय ने और मेरे बेटे की दुर्घटना ने मुझे बहुत सिखाया।

मेरे जूते उतारने के पौने दो साल पहले जब मैं गोरखपुर में परिचालन विभाग का अध्यक्ष बना तो मेरे पूर्ववर्तियों द्वारा अनुशासनात्मक प्रक्रिया के लगभग तीस अपील के मामले पेण्डिंग थे। पहले के कई विभागाध्यक्ष उन्हे बिना निपटाये चले गये थे। अपने गोपनीय सचिव रमेश चन्द्र श्रीवास्तव जी की विशेष सहायता से (उन्होने नियमों, धाराओं और पूर्व में निपटाये मामलों को बड़ी दक्षता से नत्थी कर मुझे निर्णय लेने में सहायता की) एक एक कर उन अपीलों का निपटारा किया। येे अपील कर्मचारी के लिये विभागीय सुप्रीम कोर्ट के समान थीं। मुझसे ऊपर कहीं सुनवाई उनके लिये सम्भव नहीं होती।

मैंने लगभग हर एक मामले में सहृदयता खुले दिल से दिखाई। कुछ उसी तरह, जिस तरह उत्पल दत्त ने साधू मेहर की चार्जशीट फाड़ कर दिखाई थी। मेरा यह कृत्य मेरे रेल के प्रारम्भिक दिनों से 180 डिग्री उलट था। मैं अपने में काफी बदलाव ला चुका था।

मुझे सहृदय बनाने के लिये कोई रेल के इतर घूमने और वहां किसी गौरी (सुहासिनी मुळे) से मिलने का अवसर नहीं मिला; पर समय के थपेड़ों ने वह काम बखूबी किया। हां, वह सब इतना धीरे धीरे हुआ कि मुझे पता भी न चला। रिटायर होने के बाद जब मैंने अपने व्यवहार का विश्लेषण किया तो पाया कि दो ढाई दशकों में वह बदलाव आया। वह ऐसे आया कि मैं अपने तनाव, शरीर और मन की उपेक्षा और रोज रोज की चिख चिख से अपने को असम्पृक्त नहीं कर सका। अगर वह सीख लेता – और उसके प्रति सचेत रहता – तो आज कहीं बेहतर शारीरिक/मानसिक दशा में होता। नींद के लिये दवाई लेने की आदत छूट चुकी होती। हाइपर टेंशन, मधुमेह आदि न होते और एक दशक में चार बार अस्पताल में भरती होने की नौबत न आती।

पर जो होना था, वह हुआ! अपनी गलतियां सुधार कर नये सिरे से दूसरी पारी खेली जा सकती है, पर पहली पारी फिर खेलने को तो नहीं मिलती, किसी को भी।

“अगर वह सीख लेता – और उसके प्रति सचेत रहता – तो आज कहीं बेहतर शारीरिक/मानसिक दशा में होता। नींद के लिये दवाई लेने की आदत छूट चुकी होती। हाइपर टेंशन, मधुमेह आदि न होते और एक दशक में चार बार अस्पताल में भरती होने की नौबत न आती।”

एक शाम, न्यूरोलॉजिस्ट के साथ


डा. प्रकाश खेतान, न्यूरोसर्जन।
डा. प्रकाश खेतान, न्यूरोसर्जन।

तय हुआ था कि मैं न्यूरोसर्जन से छ बजे मिलूंगा और उन्हे ले कर अपने घर जाऊंगा अपनी अम्मा जी को दिखवाने। सवा छ बज रहे थे। मैं 15 मिनट से बाहर बैठा प्रतीक्षा कर रहा था कि डा. प्रकाश खेतान अपना कार्य खत्म कर उपलब्ध होंगे मेरे साथ चलने को। पर वहां बहुत से मरीजों की भीड़ लगी थी अपना नम्बर का इन्तजार करते हुये। बहुत से के हाथ में एम.आर.आई./सीटी स्कैन की रिपोर्ट थी। उनके हाथ में डाक्टर साहब की पर्चियां भी थीं – अर्थात कई पुराने मरीज से जो फिर से चेक-अप के लिये आये थे। मुझे लगा कि डाक्टर साहब जल्दी चल सकने की स्थिति में नहीं होंगे। मैने अपनी पॉकेट नोटबुक से एक पन्ना फाड़ कर अपना नाम लिखा और उनके पास भिजवाया। उसका परिणाम यह हुआ कि डाक्टर साहब ने अपने चेम्बर में बुला कर पास की कुर्सी पर बिठा लिया। मरीज एक एक कर उनके पास आते गये। सब को निपटाने में करीब सवा घण्टा लगा।

सवा घण्टे भर मैने न्यूरो सर्जन को अपने आउट-पेशेण्ट निपटाते देखा। यह भी अपने आप में एक अनुभव था, जो पहले कभी मुझे नहीं मिला।

एक मरीज के साथ तीन-चार लोग थे और सभी उत्तर देने को आतुर। सभी ग्रामीण लगते थे। बाहर से आये। डाक्टर साहब ने सीटी- स्कैन में दिखा कर कहा कि यह छोटी गांठ है दिमाग में। जो हो रहा है, उसी के कारण है। जो दवा वो लिख रहे हैं, वह सवा दो-ढ़ाई साल तक बिना नागा लेनी पड़ेगी। एक भी दिन छूटनी नहीं चाहिये। — पीठ की बीमारी जो वह बता रहे हैं, उसका इस गांठ से कोई लेना देना नहीं है। सिर की बीमारी 95% पूरी तरह ठीक हो जायेगी। अपना वजन कण्ट्रोल में रखें। आग, नदी तालाब, कुंये से दूर रहें। खाने में कुछ भी खायें पर हाथ धो कर। साइकल न चलायें। दवाई शुरू करें और दस दिन बाद दिखायें। — इसी प्रकार की नसीहत अधिकांश मरीजों को मिली।

एक महिला ने बताया खोपड़ी में झांय झांय होती है। कान में किर्र किर्र की आवाज आती है। हाथ पूरी तरह नहीं उठता। नींद ठीक से नहीं आती। डाक्टर साहब ने पूछा कि पेट साफ़ रहता है तो महिला के साथ आये आदमी ने कहा नहीं। डाक्टर साहब ने नियमानुसार दवाई लेने और भोजन के लिये कहा। हाथ की एक्सरसाइज के लिये कहा – चारा मशीन चलाने को कहा। यह भी कहा कि एक्सरसाइज और दवा से हाथ 70-80% ठीक हो जायेगा।

एक लड़के से इण्टरेक्शन – “कै क्लास पढ़े हो? — साइकल, गाड़ी, नदी, तालाब से दूर। कोई और सवाल हो तो पूछो। कोई भी सवाल”।


न्यूरोसर्जन के साथ बैठे मैने तरह तरह के मरीज देखे। स्ट्रोक के मरीज। मिरगी/एपिलेप्सी के मरीज। संक्रमण के मरीज। दुर्घटना के मरीज। शरीर में आवश्यक तत्वों की कमी के मरीज। भूलने की बीमारी वाले थे – यद्यपि उम्र के साथ होने वाली डिमेंशिया/एल्झाइमर के वृद्ध मरीज नहीं देखे वहां। लगभग हर मरीज न्यूरो-परीक्षण की रिपोर्ट ले कर आया था। समय के साथ लोगों में न्यूरो समस्याओं के प्रति जागरूकता बढ़ी है। अन्यथा पहले न्यूरोफीजीशियन के बड़े कम्पीटीटर ओझाई करने वाले/प्रेतबाधा दूर करने वाले हुआ करते थे। सीटी/एम.आर.आई. की सुविधायें अब मेट्रो के अलावा छोटे शहरों में भी उपलब्ध होने से न्यूरोफीजीशियन बेहतर लैस हैं समस्याओं को समझने और निदान करने में। 

फिर भी न्यूरोचिकित्सकों की उपलब्धता आवश्यकता से कहीं कम है! 😦

अगले जन्म की मेरी विश-लिस्ट में न्यूरोलॉजिस्ट होना भी जुड़ गया है अब! 😆


अधिकांश मरीज ग्रामीण थे तो उन्हे उन्ही के परिवेश से को-रिलेट करती भाषा में बीमारी बताना और उन्ही के परिवेश की बातों से जोड़ती दवा-परहेज की बात करना; यह मैने दांत, त्वचा, जनरल फीजीशियन आदि को करते देखा था। पर एक कुशल न्यूरोसर्जन को भी सम्प्रेषण की बेहतर क्वालिटी के लिये उसी प्रकार से बोलना होता होगा; यह जानना मेरे लिये नया अनुभव था। और गंवई/सामान्य जन से पूर्ण संप्रेषणीयता के लिये मैं डाक्टर खेतान को पूरे नम्बर दूंगा। मरीज को उसके स्तर पर उतर कर समझाना, उसके सभी प्रश्नों को धैर्य से समझना, जवाब देना और उसके परिवेश से इलाज को जोड़ना – यह मुझे बहुत इम्प्रेस कर गया।

डाक्टर साहब ने एक ही बार “सिण्ड्रॉम” जैसे तकनीकी शब्द का प्रयोग किया। अन्यथा, अन्य सब मरीजों की बोलचाल की भाषा में ही समझाया था।

मरीजों के कई चेहरे मुझे याद हैं। ग्रामीण किशोर, मोटी, हिज़ाब पहने मुस्लिम लड़की और उसकी मां, शहरी परिवार जो अपनी स्कूल जाती लड़की को दिखाने आया था और जिसकी मां बार बार यह पूछे जा रही थी कि वह प्लेन में यात्रा कर सकती है या नहीं, नशे की आदत छोड़ता वह नौजवान — यह डाक्टर का चेम्बर था, पब्लिक प्लेस नहीं, अन्यथा मैं उनके चित्र ले लेता। आदतन।

अन्त में मैने डाक्टर साहब से कहा कि उनका एक चित्र ले लूं? और फिर एक नहीं, दो बार मोबाइल का कैमरा क्लिक कर दिया। 😀

डा. प्रकाश खेतान, न्यूरोसर्जन। दूसरा चित्र।
डा. प्रकाश खेतान, न्यूरोसर्जन। दूसरा चित्र।

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उसके बाद डाक्टर साहब के साथ उनके घर गया और वहां से अपने घर। अम्माजी को जब डाक्टर खेतान ने देख कर दवा का प्रिस्क्रिप्शन लिख दिया तो मानो दिन का मेरा मिशन पूरा हुआ। मेरे सहकर्मी श्री साहू डाक्टर साहब को उनके क्लीनिक छोड़ कर आये, जहां वे साढ़े नौ बजे के बाद दो ऑपरेशन करने वाले थे। इसके पहले कल वे इग्यारह घण्टा तक चले एक ऑपरेशन को कर चुके थे।

(मुझे यह अहसास हो गया कि डाक्टर खेतान मुझसे कहीं अधिक व्यस्त और कहीं अधिक दक्ष व्यक्ति हैं अपने कार्य में।)

डाक्टर खेतान के साथ तीन घण्टा व्यतीत करने के बाद मेरा मन बन रहा है कि किसी न्यूरोसर्जन की बायोग्राफी/ऑटोबायोग्राफी पढ़ी जाये। goodreads.com पर वह सर्च भी करने लगा हूं मैं!

डा. प्रकाश खेतान, न्यूरोसर्जन


मेरी अम्माजी अस्पताल में हैं। उनकी कूल्हे की हड्डी टूटने के कारण उनका ऑपरेशन हुआ है। चुंकि वे दशकों से खून पतला करने के लिये नियमित दवाई लेती रही हैं; ऑपरेशन के पहले उनकी यह दवा रोक कर उनके रक्त का प्रोथ्रोम्बाइन टाइम ऑपरेशन के लिये वांछित स्तर पर लाया गया। इसके लिये दवा लगभग एक सप्ताह रुकीं। फलस्वरूप, या ऑपरेशन के कारण हुये तनाव के कारण, अम्मा को न्यूरोलॉजिकल समस्या हो गयी और यह आवश्यक हो गया कि किसी न्यूरोसर्जन-न्यूरोफीजिशियन की सलाह ली जाये।

डा. प्रकाश खेतान। चित्र उनके ब्लॉग से लिया गया।
डा. प्रकाश खेतान। चित्र उनके ब्लॉग से लिया गया।

मेरे सहकर्मी प्रदीप ओझा और उनकी पत्नी श्रीमती लता ओझा इस मौके पर काम आये। प्रदीप इस समय भोपाल में पदस्थ हैं, पर हैं इलाहाबाद के। उनके पारिवारिक मित्र हैं इलाहाबाद के प्रसिद्ध न्यूरोसर्जन डा. प्रकाश खेतान। प्रदीप के अनुरोध पर वे बहुत सरलता से मेरी अम्मा जी को देखने को तैयार हो गये। मुझे लगा कि मैं ऑपरेशन के कारण आई.सी.यू. के बिस्तर पर भर्ती अम्माजी को कैसे ले कर उनके पास जा सकूंगा, पर डा. खेतान ने कहा कि वे स्वयम् फाफामऊ के उस अस्पताल में आ कर देख लेंगे, जहां वे भर्ती हैं।

डा. खेतान का जब मुझे फोन मिला, तो मानो नैराश्य के गहन अन्धकार से मैं उबर गया।

डा. प्रकाश खेतान के नाम से मैने इण्टरनेट पर सर्च किया तो बहुत रोचक जानकारी मिली। एक आठ घण्टे की दुरुह न्यूरोसर्जरी कर 296 hydatid cyst (हाईडेटिड सिस्ट – ब्रेन में पेरासिटिक थक्के) निकालने के लिये गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में उनका नाम दर्ज है। यह है गिनीज रिकार्ड का पन्ना

डा. खेतान के इस ऑपरेशन की विस्तृत जानकारी यहां उपलब्ध है।

कल शाम साढ़े चार बजे डा. खेतान अस्पताल पंहुचे। उनकी विजिट से अस्पताल के डाक्टर और कर्मी गौरवान्वित महसूस कर रहे थे; ऐसा मुझे लगा। मेरी अम्माजी को उन्होने बहुत ध्यान से देखा। एक दक्ष डाक्टर की तरह उन्होने उनके परीक्षण किये। हाथ पैर का मूवमेण्ट करा कर देखा। आंखों और चेहरे का गहन परीक्षण किया। उस दौरान उपलब्ध डाक्टर और मैं उन्हें आवश्यक इनपुट्स देते रहे।

अस्पताल में मेरी अम्माजी। चित्र आई.सी.यू. में ले जाने के पहले का है।
अस्पताल में मेरी अम्माजी। चित्र आई.सी.यू. में ले जाने के पहले का है।

परीक्षण के बाद उन्होने उनके ऑपरेशन और अन्य टेस्ट की जानकारी ली। मैने अम्माजी की जो मैडीकल हिस्ट्री ज्ञात थी, वह तरतीबवार लिख रखी थी। उसे और पुराने परीक्षणों के बारे में उन्हे बताया। इस दौरान वे बड़ी दक्षता से डाक्टर का पन्ना लिखते जा रहे थे। दवायें, परीक्षण की जरूरत और उपलब्ध आई.सी.यू. के डाक्टर महोदय को हिदायत वे देते गये। उसके बाद मुझे मामले के बारे में उन्होने बिना तकनीकी जार्गन के समझाया।

अपने लड़के की ब्रेन इंजरी के सन्दर्भ में अनेक न्यूरोडाक्टरों और न्यूरोसाइकॉलॉजिस्टों से मेरा सामना हो चुका है। मैं यह कहूंगा कि डा खेतान के साथ यह अनुभव बहुत री-एश्यूरिंग लगा। वे पन्द्रह किलोमीटर से अपने से आये, बहुत सरलता से इण्टरेक्ट किया और आधे-पौने घण्टे का गहन समय दिया मेरी अम्माजी के लिये। … मैं उनकी सज्जनता/सरलता/दक्षता का मुरीद हो गया।

डा. खेतान को विदा करते समय मैने उनसे हाथ मिलाते हुये कहा कि मैं पहली बार किसी गिनीज़ वर्ल्ड रिकार्ड होल्डर से मिला हूं।  बहुत सरलता-सहजता से उन्होने मेरा यह कॉम्प्लीमेण्ट स्वीकार किया!

आप किसी विश्व रिकॉर्ड होल्डर से मिले हैं?

एपिलेप्सी-रोधी दवाओं के साथ वापसी


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काफी समय पहले मैने वैतरणी नाले के पानी से कछार में खेती करते श्री अर्जुन प्रसाद पटेल की मड़ई और उनके क्रियाकलाप पर लिखा था। मैं उनकी मेहनत से काफी प्रभावित था। कल पुन: उनकी मड़ई का दूर से अवलोकन किया। उस नाले में पर्याप्त सूअर घूमते हैं। अत: उनकी क्यारियों की सब्जी में न्यूरोसिस्टिसर्कोसिस (NEUROCYSTICERCOSIS) के मामले बनाने की क्षमता होगी!
खैर, मेरी पत्नी और मैने, बावजूद इस बीमारी के, हरी सब्जियां खाना बन्द न करने का फैसला किया है!

चौबीस मई को शाम नौ बजे मुझे बायें हाथ में अनियंत्रित दौरे जैसा कुछ हुआ। तेजी से बिना नियंत्रण के हिलते हाथ को दायां हाथ पूरे प्रयास से भी नहीं रोक पा रहा था। लगभग चार मिनट तक यह चला। उसके बाद कलाई के आगे का हाथ मानसिक नियंत्रण में नहीं रहा।

मैने दो फोन किये। एक अपने बॉस को आपात अवस्था बताते हुये और दूसरा अपने रिश्ते में आनेवाले आजमगढ़ के सी.एम.ओ. ड़ा. एस.के. उपाध्याय को। बॉस श्री उपेन्द्र कुमार सिंह ने अस्पताल ले जाने की तुरन्त व्यवस्था की। ड़ा. उपाध्याय ने यह स्पष्ट किया कि मामला किसी अंग विशेष/तंत्रिकातन्त्र में स्पॉडिलाइटिस का भी नहीं, वरन मस्तिष्क से सम्बन्धित है। मस्तिष्क की समस्या जानकर मैं और व्यग्र हो गया।

अस्पताल जाने के बाद की बात आप सत्यार्थमित्र की पोस्टों के माध्यम से जान चुके हैं। वहां और अन्य प्रकार से जिन-जिन मित्र गणों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से मेरे लिये प्रार्थना की और मेरा सम्बल बढ़ाया, उनका मैं समग्र रूप से कृतज्ञ हूं।

Gyan638-001 इस विषय में पच्चीस मई को सवेरे आई.सी.यू. में लेटे लेटे एक पोस्ट (Hand bringing to I.C.U.) दायें हाथ का प्रयोग कर उपलब्ध संसाधन (मोबाइल फोन) से लिखी, बनाई (बायें हाथ का मोबाइल से लिया चित्र संलग्न करते) और पोस्ट की (ई-मेल से); उसे ब्लॉगिंग की विशेष उपलब्धि मानता हूं। ऐसी दशा में कितने लोगों ने ब्लॉग-पोस्ट लिखी होगी? कह नहीं सकता।

अभी लगभग पच्चासी प्रतिशत उबर गया हूं मैं। अस्पताल से छुट्टी मिल गई है। अब घर पर हूं – २४ जून तक।

Arjun111 मुझे न्यूरोसिस्टिसर्कोसिस (NEUROCYSTICERCOSIS) का मरीज मान कर उपचारित किया जा रहा है। मस्तिष्क के दायें सामने के हिस्से में हल्की सूजन से ग्रस्त पाया गया। यह सूजन पोर्क (सूअर के मांस)/प्रदूषित जल/जल युक्त खाद्य (पत्ता गोभी, पालक आदि) से सम्भव है। मेरे मामले में मांस तो नहीं है, दूसरे कारण ही लगते हैं।

न्यूरोसिस्टिसर्कोसिस की दवायें तो लगभग एक-दो महीना चलेंगी पर एपिलेप्सी-रोधी दवायें मुझे कुछ साल तक लेनी होंगी। अर्थात लगभग दो-तीन साल की ब्लॉगिंग इस घटना की छाया में होगी!

धन्यवाद, मेरे वैर्चुअल और क्वासी-वर्चुअल जगत के मित्रों!


श्रीमती रीता पाण्डेय की एक पोस्ट



कुछ दिनों पहले मैने एक पोस्ट लिखी थी – स्वार्थ लोक के नागरिक। उस पर श्री समीर लाल की टिप्पणी थी:

…याद है मुझे नैनी की भीषण रेल दुर्घटना. हमारे पड़ोसू परिवार के सज्जन भी उसी से आ रहे थे. सैकड़ों लोग मर गये मगर उनके बचने की खुशी में मोहल्ले में मिठाई बांटी गई…क्या कहें इसे स्वार्थ और उनके परिवार को समाज का नासूर??

इस पर मेरी पत्नीजी ने एक पोस्ट लिखी है। मैं उसे यथावत प्रस्तुत कर देता हूं:

 रीता विवाह  के पूर्व। अपने स्वार्थ पर मैं रोई

उस समय मेरा बेटा ट्रेन से दुर्घटना ग्रस्त हो कर जळ्गांव में नर्सिंग होम में मौत से जूझ रहा था। वह कोमा में था। तरह तरह के ट्यूब और वेण्टीलेटर के कनेक्शन उससे लगे थे। हम लोग हमेशा आशंका में रहते थे।

उसी नर्सिंग होम में तीसरे दिन एक मरणासन्न व्यक्ति भर्ती किया गया। वह बोहरा समाज का तीस वर्षीय युवक था और नर्सिंग होम के डाक्टर साहब का पारिवारिक मित्र भी। तीसरी मंजिल से वह गिर गया था और उसकी पसलियां टूट गयी थीं। शाम के समय वह भर्ती किया गया था। उसके परिवार और मित्रों का जमघट लगा था। परिवार की स्त्रियां बहुत रो रही थीं। इतनी भीड़ देख मैं हड़बड़ा कर नर्सिंग होम से रेस्ट हाउस चली गयी। रेस्ट हाउस जळगांव रेलवे स्टेशन पर था – नर्सिंग होम से ड़ेढ़ किलोमीटर दूर।

रात में मैने दुस्वप्न देखा। एक भयानक आकृति का आदमी मेरे लड़के के बेड़ के नीचे दुबका है। मैं पूरी ताकत से एक देव तुल्य व्यक्ति पर चीख रही हूं – "यही आपकी सुरक्षा व्यवस्था है? आपके रहते यह जीव अंदर कैसे आया??"

शायद मेरी चीख वास्तव में निकल गयी होगी। मेरी नींद टूट गयी थी। ज्ञान मेरे पास बैठे मेरा कंधा सहला रहे थे। बोले – "सो जाओ; परेशान होने से कुछ नहीं होगा।" 

मैं लेट गयी। पर नींद कोसों दूर थी। सुबह इधर उधर के कार्यों में अपने को व्यस्त रख रही थी। नर्सिंग होम नहीं गयी। मेरी सास मेरे साथ नर्सिंग होम जाने वाली थीं। जब बहुत देर तक मैं तैयार न हुई तो वे मुझ पर झल्ला पड़ीं। उन्होंने कुछ कहा और मेरी इन्द्रियां संज्ञा शून्य हो गयीं। मुझे लगा कि इन्हें नर्सिंग होम पंहुचा ही देना चाहिये। रेस्ट हाउस में ताला लगा कर बाहर निकले। कोई ट्रेन आ कर गयी थी। यात्रियों के बीच हम रास्ता बनाते निकल रहे थे कि परिचित आवाज आयी। देखा; दशरथ (हमारा चपरासी) दौड़ता हुआ आ रहा था। बोला – "मेम साहब अभी मत जायें; अभी नर्सिंग होम में बहुत भीड़ है।"

उस समय; हर आशंका से ग्रस्त; मेरी धड़कन जैसे रुक गयी। रक्त प्रवाह जैसे थम गया। लड़खड़ाते हुये मैं एक दुकान के बाहर बेंच पर बैठ गयी। मुझे लगा कि मेरा बेटा नहीं रहा। मेरी दशा भांप कर दशरथ जल्दी से बोला – "मेम साहब वह बोहरा जो था न…" मेरे कानों ने बोहरा शब्द को ग्रहण किया। मेरा रक्त संचार पुन: लौटा। मुझे सुकून मिला कि मेरा बेटा जिन्दा है।

अपनी सासजी का हाथ पकड़ कर मैं वापस रेस्ट हाउस में लौटी। सोचने लगी कि मेरा बेटा बच गया, हालांकि वह मरणासन्न है। पर जो गया, वह भी तो किसी का बेटा था। उसकी तो पत्नी और एक छोटा बच्चा भी था। यह कैसा स्वार्थ है?अपने स्वार्थ पर अकेले कमरे में मैं खूब रोई।

समीर भाई की टिप्पणी में नैनी दुर्घटना में बचने पर लोगों के स्वार्थ प्रदर्शन की बात है। पर मैं जब भी अपने स्वार्थ और अपनी बेबसी की याद करती हूं तो आंखें भर आती हैं। शायद यही हमारी सीमायें हैं।  


फोटो रीता पाण्डेय की तब की है जब वे सुश्री रीता दुबे थीं।