सूर्य मणि तिवारी जी का सूर्या ट्रॉमा सेंटर और अस्पताल – एक अवलोकन

अस्पताल से कमाना तो सूर्य मणि जी का मोटिव हो ही नहीं सकता. पूर्वांचल के इस इलाके में लोगों की वैसी पे करने की केपेसिटी ही नहीं है.


मेरे पिताजी औराई के इस अस्पताल – सूर्या ट्रॉमा सेंटर और अस्पताल – में भर्ती हैं. उन्हे रक्त में संक्रमण था, जो सेप्टिसीमिया निकाला. संक्रमण की घोर वेरायटी. इसके अलावा उनकी बढ़ी उम्र के कारण डिमेंशिया की भी समस्या है. एक ओर का मस्तिष्क, वृद्धावस्था के कारण काफी क्षतिग्रस्त हो गया है.

सूर्य मणि त्रिपाठी (इन सेट में) और औराई में नया बना सूर्या ट्रामा सेंटर तथा अस्पताल

अस्पताल मेरे घर (गांव विक्रमपुर, भदोही जिला) के सबसे नजदीक (दस किलोमीटर दूर) नया खुला है. जब पिताजी को लेकर पंहुचा तो अस्पताल में किसी को जानता नहीं था. पर बिना किसी भटकाव के काउंटर पर संपर्क करते ही कर्मचारी पिताजी को ह्वील चेयर पर उतार कर आपात चेक अप के लिए ले आए और उपचार प्रारंभ हो गया.

पिताजी आई सी यू में

पूर्वांचल में जहां पहचान और सोर्स सिफारिश के बिना कुछ होता ही नहीं, हम सीधे पंहुचे और इलाज का काम शुरू हो गया. मुझे केवल उचित पेमेंट करने पड़े और दवा ला कर देनी पड़ी.

शाम तक मैं थक गया. हमने कुछ राशि एडवान्स जमा की जिससे रात में हमें आकस्मिक दवाओं के लिए न जगाया जाए. लेकिन फार्मेसी के एक कर्मी ने आधी रात जगा ही दिया – यह जानने के लिए कि दवा की दरकार है, वह दे दे तो सवेरे मैं पेमेंट कर दूँगा या नहीं.

रिटायर्मेंट के बाद किसी ने पिछले चार साल रात में फोन कर नहीं जगाया था. एक बार तो निद्रा में अपने को पुराने फ्रेम ऑफ माइंड में रख कर सोचने लगा कि शायद कोई ट्रेन एक्सिडेंट का मामला है. पर फोन की बात से समझ आ गया कि मामला अस्पताल की दुनियाँ का है, रेल की दुनियाँ का नहीं. रेल की दुनियाँ तो चार साल पहले छूट चुकी है. 😆

अगले दिन हर छोटे बड़े बिल का अलग अलग पेमेंट करते, वह भी कैश में, मैं उकता गया. मुझे समझ नहीं आया कि इतना बड़ा अस्पताल कैश की बजाय POS मशीन, UPI या Paytm से पेमेंट क्यों नहीं लेता; जब हर जगह स्टिकर लगे हैं कि “कृपया बिना रसीद के कोई पेमेंट न करें”?

श्री सूर्य मणि तिवारी

एक स्टिकर पर अस्पताल के मुखिया श्री सूर्य मणि तिवारी का फोन नंबर लिखा था. मैंने उन्हें फोन लगाया. पब्लिक को डिस्प्ले किए नंबर के बारे में सोचा कि वह कोई कर्मचारी मैनेज करता होगा. पर फोन तिवारी जी ने स्वयं उठाया और पूरी विनम्रता से बातचीत की.

मेरा पूरा नजरिया बदल गया उस बातचीत के बाद. तिवारी जी ने खेद व्यक्त किया कि अस्पताल नया होने के कारण POS मशीनें अभी नहीं आई हैं. कुछ ही दिन में आ जाएंगी. तब तक के लिए उन्होंने आस पास उपलब्ध एटीएम की जानकारी दी. उन्होने अपने चार्टर्ड एकाउंटेंट साहब, प्रशांत जी को भी मेरे पास भेजा. प्रशांत जी ने सूर्या ट्रामा सेंटर के बैंक खाते का विवरण दिया जिसमें मैं एडवान्स ट्रांसफर कर सकूं.

सूर्य मणि जी के पॉजिटिव एक्शन से मेरी समस्या का निदान हो गया. यह भी स्पष्ट हुआ कि यह अस्पताल खोलने का उनका ध्येय पैसा कमाना नहीं, अपने इलाके में परोपकार करने का है.

मैने तिवारी जी को हृदय से धन्यवाद दिया.

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इसके दो दिन बाद सूर्यमणि जी से फोन पर और आमने सामने एक लंबी परिचयात्मक बात हुई. उन्होने मेरे बारे में पूछा और अपना भी बताया. पता चला कि वे सेल्फ मेड व्यक्ति हैं. वे जब इंटर कॉलेज में थे, तभी उनके पिताजी का निधन हो गया था. पढ़ने मेें अच्छे थे तो पढ़ाई के बाद अध्यापक बन गये पास में जंगीगंज के एक स्कूल में. उन्हें जब यह समझ आया कि 3 भाई और दो बहनों का परिवार स्कूल मास्टरी की सेलरी में नहीं संभाला जा सकता तो घोसियां के अपने एक मित्र के पिताजी से कार्पेट व्यवसाय की बारीकियां समझी. 1971 में वह काम प्रारंभ किया और कालांतर में (1979 में) कार्पेट के बाजार, अमेरिका गए. वहां 1986 में अपने बेटे को ले जा कर पढ़ाया. इंजीनियर और एम बी ए बनाया.

सन 2004 में उनका अमरीका स्थित व्यवसाय 25 मिलियन (डालर) टर्नओवर का बना उनके अथक परिश्रम से.

उनकी वेब साइट surya.com से पता चलता है कि उनका लड़का सत्य उनकी कम्पनी का प्रेसीडेंट है. अब कंपनी टर्नओवर में 2004 की अपेक्षा छ गुना प्रगति कर चुकी है.

मुलाकात में मेरे पिताजी के ट्रीटमेंट के बारे में उन्होंने अपना जेनुईन कन्सर्न दिखाया. उन्होंने और यहां के प्रमुख प्रबंधक डा. रमण सिंह जी ने पिताजी के MRI जांच के बारे में व्यवस्था की.

मेरे जैसे रिटायर्ड व्यक्ति, जिसका विभागीय आभामंडल अब बिला चुका हो, के लिए इस तरह का कन्सर्न अगर सूर्य मणि जी और डा. रमण सिंह जैसे लोग दिखाएं – जिनके लिए मैं दो दिन पहले तक अजनबी था; तो निश्चय ही मेरे कुछ पूर्व संचित पुण्य होंगे. वर्ना कौन पूछता है?!

सूर्य मणि जी का कहना है कि फिलेन्थ्रॉपी के कोण से अगर मैं आनेररी आधार पर अस्पताल के लिए कुछ समय दे सकूं तो अच्छा होगा. मेरी पत्नी जी ने मुझे यह सुन कर कहा – “छुट्टा घूमने की तुम्हारी आदत हो गयी है. इसलिए मना करने की कोशिश करोगे ही. पर ऐसा करना मत. संपर्क बनाना और लोगों से जुड़ना कोई गलत बात नहीं. अंतर्मुखी बने रहे हो, पर वही सदा उचित नहीं होता.”

मुझे अपनी पत्नीजी और सूर्य मणि जी के कहने में सार दिखता है. पर अभी तय नहीं कर पा रहा हूँ कि मैं कर क्या सकता हूँ. अस्पताल की दुनियाँ मेरी आसक्ति की पटरी की नहीं है…

पर पटरी क्या है? गंगा किनारे छुट्टा घूमना और दस पांच पंक्ति लिख कर, एक दो फोटो सटा कर दिन पर दिन गुजरते देखना – वही पटरी है? शायद नहीं. पर सही क्या है?

शायद सूर्य मणि तिवारी जी के प्रस्ताव पर अपने जीवन के जड़त्व में कुछ बहाव लाऊँ. शायद.

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क्यूं बनाया है सूर्य मणि जी ने यह अस्पताल?

सूर्य मणि जी ने अस्पताल के एक कर्मी, भरत लाल मिश्र जी को मुझे पूरा अस्पताल दिखाने के लिए कहा. विभिन्न प्रकार के परीक्षण कक्ष, CT Scan तक की रेडियोलॉजिकल परीक्षण सुविधा से संपन्न, अत्याधुनिक ऑपरेशन थियेटर, फिजियोथेरेपी का विस्तृत कमरा, अनेक प्रकार के वार्ड, सेमी और पूरे प्राइवेट कमरे, केण्टीन, चार मंजिला विस्तृत रैम्प, एम्बुलेंस… सब कुछ इतना प्रचुर और आधुनिक कि किसी मेट्रो शहर के लिए भी उसे ट्रेंडी मान सकते हैं…. ऐसा अस्पताल विकसित हो रहा है यह. बस यहां के लिए डाक्टरों और प्रोफेशनल स्टाफ की और बड़ी फौज चाहिए. उसके लिए, लगता है सूर्य मणि जी सघन हेड हंटिंग में जुटे हैं.

यह है आने वाले समय का ऑपरेशन थियेटर. औराई एक कस्बा या गांव भर है, जहां यह उपलब्ध होगा सूर्या ट्रॉमा सेंटर में.

इतनी पूंजी और श्रम लगे अस्पताल से कमाना तो मोटिव हो ही नहीं सकता. पूर्वांचल के इस इलाके में लोगों की वैसी पे करने की केपेसिटी ही नहीं है. और बड़े शहरों से कोई मैडिकल टूरिज्म के लिए यहां आने से रहा.

केवल कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉसिबिलिटी का निर्वहन भी ध्येय नहीं हो सकता. उस मुद्दे पर अधिकांश कंपनियों को लिप सर्विस करते और उस मद के खर्चे में डंडी मारते मैंने देखा है.

यहां तो सूर्य मणि जी मानो पूरी साध और तन्मयता से अस्पताल बनाए हैं और विकसित कर रहे हैं….हर आधुनिक सुविधा, सहूलियत से संतृप्त अस्पताल की साकार होती परिकल्पना!

मुझे लगता है अगर कोई मोटिव है तो वह अपने इलाके की सेवा और अपनी सात्विक साख की पुष्टि ही हो सकता है. अन्यथा सारे आउट पेशेंट्स को बिना फीस लिए सुविधा देना जब कि पूरे इलाके में झोला छाप डाक्टर भी 100 रूपया झाड़ लेते हैं फटे हाल मरीज से… कोई (आसपास दिखता व्यापक और लूट खसोट का मैडिकल) व्यवसाय करने की वृत्ति तो कदापि नहीं है.

Man, at some point of time in life, breaks from mundane and starts living for his LEGACY. That’s the most pious moment. That can not come, unless the man has some substantial inner stuff in the core. सूर्य मणि जी के साथ वही हो रहा है.

इसी लिए शायद सूर्य मणि जी के इस यज्ञ में अपना योगदान, अपनी आहुति अर्पण करनी चाहिए.

तुम क्या करोगे, जी डी?


दिलीप चौरसिया का महराजगंज कस्बे का मेडीकल स्टोर

दिलीप मेडिकल स्टोर पर एलोपैथिक, आयुर्वेदिक और पशुओं की दवायें मिलती हैं। … पशुओं की दवायें, गांव देहात में उतनी ही महत्वपूर्ण हैं, जितनी मानव की दवायें।
यह कस्बे का सबसे बड़ा मेडीकल स्टोर है।


दिलीप का मैडीकल स्टोर महराजगंज कस्बे में सम्भवत: सबसे बड़ा स्टोर होगा। उन्होने बताया कि सन 1964 से है यह दुकान। गंज की सबसे पहली मेडिसिन की दुकान। महराजगंज कस्बे में नेशनल हाईवे 19 के नुक्कड़ पर दो तीन दुकान छोड़ कर। काम की लगभग सभी दवायें वहां मिल जाती हैं।

दुकान पर दिलीप को, उनके छोटे भाई को और यदा कदा उनके पिताजी को बैठा देखता हूं।

अपनी मेडिकल दुकान पर दिलीप चौरसिया
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हेमेन्द्र सक्सेना जी के संस्मरण – पुराने इलाहाबाद की यादें (भाग 4)

भारत के उज्वल भविष्य की हमारी आशायें किसी अनिश्चय या भय से कुन्द नहीं हुई थीं। हम यकीन करते थे कि आम आदमी की जिन्दगी आने वाले समय में बेहतर होने वाली है।


यह हेमेंद्र सक्सेना जी की इलाहाबाद के संस्मरण विषयक अतिथि ब्लॉग पोस्टों का चौथा और अंतिम भाग हैैै।

भाग 3 से आगे –

कॉफी हाउस नियमित जाने वाले लोग वेटरों को उनके नाम से जानते और सम्बोधित करते थे। वेटर बड़ी स्मार्ट वर्दी – झक साफ सफ़ेद पतलून, लम्बे कोट और माड़ी लगी पगड़ी – में रहते थे। हेड वेटर के कमर में लाल और सुनहरी पट्टी हुआ करती थी जबकि अन्य वेटर हरी पट्टी वाले होते थे।

वे अधिकतर केरळ और तमिलनाडु के होते थे और इसके कारण इलाहाबाद का कॉस्मोपॉलिटन चरित्र और पुख्ता होता था। अधिकांश व्यवसायी पारसी या गुजराती थे -जैसे पटेल, गुज्डर (Guzder) या गांधी।

दो चाइनीज स्टोर और एक बंगाली मिठाई की दुकान भी हुआ करती थी। देश विभाजन के बाद कुछ पंजाबी भी आये। मुझे अच्छी तरह याद है मिस्टर खन्ना की लॉ की पुस्तकों की दुकान। खन्ना जी अपने छात्र दिनों के गवर्नमेण्ट कॉलेज लाहौर की यादों की बातें किया करते थे।

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हेमेन्द्र सक्सेना, रिटायर्ड अंग्रेजी प्रोफेसर, उम्र 91, फेसबुक पर सक्रिय माइक्रोब्लॉगर : मुलाकात

हेमेन्द्र जी ने अपने संस्मरण टुकड़ा टुकड़ा लिखे हैं. उनके लगभग 14 पन्ने के हस्त लिखित दस्तावेज की फोटो कॉपी मेरे पास भी है. कभी बैठ कर उसका हिन्दी अनुवाद कर ब्लॉग पर प्रस्तुत करूंगा.


वे इलाहाबाद (प्रयागराज) विश्विद्यालय के अंग्रेजी के प्रोफेसर रह चुके हैं. फेसबुक में उनकी प्रोफाइल पर उनका जन्मदिन दर्ज है – 29 मार्च 1928. मैं गौरवान्वित होता हूँ कि वे मेरे फेसबुक मित्र हैं. पिछले दिनों में उनसे मिलने गया था मैं.

हेमेन्द्र सक्सेना जी, रमेश कुमार और गौरी सक्सेना. हेमेन्द्र जी के बैठक कक्ष में

हेमेन्द्र सक्सेना जी 91 वर्ष के होने के बावजूद भी शारीरिक और मानसिक रूप से बहुत चुस्त दुरुस्त हैं. उनके घर हम लगभग दो घंटे रहे और बातचीत का सिलसिला हमने नहीं, उन्होने ही तय किया. पूरे दौरान वे ही वक्ता थे. हम श्रोता और वह भी मंत्र मुग्ध श्रोता.

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रेस्तराँ किसको आमन्त्रित करता है?!

नया खुला रेस्तरॉं है श्री विजया फैमिली ढाबा और रेस्तरॉं। … फैमिली के साथ सुकून से बैठ कर जलपान करने के स्थान यहां नहीं हैं। उस जरूरत को पूरा करना चाहते हैं तिवारी पिता-पुत्र।


कस्बे के बाजार मेँ एक रेस्तराँ खुलना कुछ उतना ही बड़ा है जैसे बम्बई, लंदन या पेरिस में कोई नया म्यूजियम या थियेटर खुलना। तिवारी जी को उसका विज्ञापन करना चाहिये। शायद सोच भी रहे हों। मैं तो आस-पास की रिपोर्ट देने वाले एक ब्लॉगर की नजर से ही देखता हूं। मैं चाहूंगा कि यह रेस्तराँ सफल हो। मुझे एक परमानेण्ट कॉफी पीने का अड्डा मिल सके! 😆


नितिन तिवारी ने अपने रेस्तराँ के कुछ चित्र ह्वाट्सेप्प पर भेजे हैं। दो सज्जन पैदल चल रहे हैं कलकत्ता (हावड़ा) से और जायेंगे राजस्थान। शायद सीकर में खाटू श्याम जी के स्थान पर। रास्ते में नितिन के रेस्तरॉं में विश्राम करते हैं। जगह का चयन करने और उनकी सुविधाओं का ध्यान देने के लिये कुछ लोग पहले से आ कर व्यवस्था देखते हैं। चलते समय एक एसयूवी वाहन उनके पीछे चलता है।

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विजया रेस्तरॉं की री-विजिट

[…] तिवारी जी उगापुर के रहने वाले हैं। उनका कुटुम्ब कार्पेट के व्यवसाय में अग्रणी है भदोही जिले में। उगापुर के कार्पेट फैक्टरी में उनकी भी हिस्सेदारी है। पच्चीस बीघा की बटाई पर दी गयी खेती है। वाराणसी में लंका में मकान है। पर कारपेट और खेती से इतर कुछ करने का मन बना तो यह रेस्तरॉं खोला है उन्होने। […]


सवेरे दस बजे निकलना होता है बटोही (साइकिल) के साथ। एक डेढ़ घण्टे भ्रमण के लिये। साथ में घर से सहेजे फुटकर काम निपटाने होते हैं। आज महराजगंज से अपनी जरूरी दवायें खरीदीं और लौटते समय विजय तिवारी जी के रेस्तरॉं के पास रुका। तिवारी जी वहीं थे। सामान्यत: वे वाराणसी या अपने गांव पर होते हैं। पर आज मिल ही गये।

तिवारी जी उगापुर (दस किमी दूर) के रहने वाले हैं। उनका कुटुम्ब कार्पेट के व्यवसाय में अग्रणी है भदोही जिले में। उगापुर के कार्पेट फैक्टरी में उनकी भी हिस्सेदारी है। पच्चीस बीघा की बटाई पर दी गयी खेती है। वाराणसी में लंका में मकान है। पर कारपेट और खेती से इतर कुछ करने का मन बना तो यह रेस्तरॉं खोला उन्होने। उनके लड़के (नितिन तिवारी) ने मुझे बताया था कि वे यह एक सोची समझी व्यवसायी तकनीक के अनुसार चलाना चाहते हैं जिससे पूंजी पर वांछित रिटर्न्स भी मिलें और वर्किंग केपिटल की कभी किल्लत भी न महसूस हो।

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