छोटी मछली से बड़ी पकड़ने की तकनीक

गहरी नदी यानी करारी। इन लोगों ने बताया कि उथली नदी को पटपट कहते हैं। करारी नदी में मछलियां होती हैं, पटपट में नहीं। मछली पकड़ने की सम्भावना बढ़ाने के लिये उनके लिये यह जानना जरूरी था कि नदी करारी है या पटपट।


रास्ता ट्रेक्टर के गंगा तट पर बालू की (अवैध) ढुलाई लिये बना था। नयी सरकार के आने के बाद यह सुनिश्चित करने के लिये कि बालू की ढुलाई न हो सके, रास्ते को काट दिया गया था उस पर आड़ी खाई बना कर। उस खाई के साइड से अपनी मोटर साइकिल लाते हुये वे तीन नौजवान गंगा तट की ओर बढ़े। जितनी तेजी दिखा रहे थे, उससे हमें (राजन भाई और मुझे) यह लगा कि वे कहीं कोई अवैध काम न करने जा रहे हों गंगा तट पर।

गंगा हैं ही ऐसी नदी – जिसके किनारे हर कर्म-कुकर्म-अकर्म-विकर्म करने वाला पंहुचता है। जन्म लेता है, तब पंहुचता है। मरता है, तब तो पंहुचता ही है।

हम दोनो उनके पीछे पीछे गये। सतर्क मुद्रा में। पर वे मात्र मछली पकड़ने वाले निकले। मछली पकड़ना तो ठीक, पर उसके लिये जो तकनीक प्रयोग में ला रहे थे, वह मैने पहले नहीं देखी थी। अपने 65 साल के जीवन में राजन भाई ने भी नहीं देखी थी।

प्लास्टिक की बोतल में पानी में रखी सऊरी मछलियां दिखाता व्यक्ति।
गंगा हैं ही ऐसी नदी – जिसके किनारे हर कर्म-कुकर्म-अकर्म-विकर्म करने वाला पंहुचता है। जन्म लेता है, तब पंहुचता है। मरता है, तब तो पंहुचता ही है।

एक बोतल में चारे के रूप में पानी भर कर उसमें जिन्दा मछलियां ले कर आये थे। छोटी मछलियां जो उन्होने अपने गांव के तालाब से पकड़ी थीं। उन मछलियों का नाम बताया – सऊरी। सऊरी को कांटे में फंसाया। कांटा एक लम्बी नायलोन के तार से बंधा था। तार उन्होने बांस की दो खप्पच्चियों से बांध दिया था और खपच्चियां गंगा किनारे गाड़ दी थीं। किनारे पंहुच बड़ी फुर्ती से किया था यह काम उन्होने।

16 नवम्बर 2017 की फेसबुक नोट्स पर पोस्ट। फेसबुक की नोट्स को फेज आउट करने की पॉलिसी के कारण ब्लॉग पर सहेजी गयी है।

Fishing
मेरे सामने सऊरी को बड़ी जोर लगा कर नदी में फेंका। लगभग 15 फुट दूर वह तार मछली पानी में गिरी और पानी में तैरने लगी।

मेरे सामने कांटे में फंसाई सऊरी को उनमें से एक ने बड़ी जोर लगा कर नदी में फेंका। लगभग 15 फुट दूर वह तार मछली पानी में गिरी और पानी में तैरने लगी। उसके नदी में तैरने के अनुसार तार हिलने लगा। बस अब इन लोगों का काम तार में असाधारण गति का इन्तजार करना था जो यह बताती कि बड़ी मछली सऊरी को खाने के चक्कर में कांटे में फंस गयी है।

बांस की गाड़ी खपच्चियों से बंधा तार। दायें कोने में खड़े हैं राजन भाई।

सिंपल तकनीक।

उन लोगों से मैने बात प्रारम्भ की। वे महराजगंज (5किमी) के पास कल्लू की पाही गांव से आ रहे थे। सवेरे छ बजे घर से निकले। अब सात बजने को था। दो घंटा मछली पकड़ेंगे। बहुधा आते हैं। कभी मछली नहीं भी मिलती।

कौन मछली पकड़ेंगे?

जो मिल जाये! जैसे पहिना।

दूर गंगा में विष्णु अपनी नाव पर था। इनमें से एक ने जोर से पूछा – मछली है?

दूर गंगा में विष्णू अपनी नाव पर था। इनमें से एक ने जोर से पूछा – मछली है?

अर्थात ये लोग न केवल मछली पकड़ने निकले थे, अगर मल्लाह से मछली मिल जाये तो खरीदने का इरादा भी रखते थे। विष्णु ने जवाब दिया – “नहीं, आज मछली मिली ही नहीं।”

वह, मछली न मिलने के कारण एक बार और जाल बिछाने के उद्यम में लगा था। मुझे भी उस पार घुमा कर लाने से मना कर दिया उसने – जाल बिछाना ज्यादा महत्वपूर्ण था इस समय उसके लिये।

गंगा यहां गहरी हैं कि नहीं? कितना पानी है? इन लोगों ने विष्णु से पूछा।

“गहरी हैं करीब एक लग्गी” (8-10फुट)।

गहरी नदी यानी करारी। इन लोगों ने बताया कि उथली नदी को पटपट कहते हैं। करारी नदी में मछलियां होती हैं, पटपट में नहीं। मछली पकड़ने की सम्भावना बढ़ाने के लिये उनके लिये यह जानना जरूरी था कि नदी करारी है या पटपट।

कोई उम्र ऐसी नहीं होती जब आपको नयी जानकारी न मिले। अपने परिवेश में इतना बहुत कुछ है जो हम नहीं जानते। मैं तो क्या, राजन भाई भी नहीं जानते थे कि सऊरी मछली से पहिना पकड़ी जाती है, करारी नदी के किनारे से!

आपको मालुम था?


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विष्णु मल्लाह – गंगा-नाव-मछली ही उसका जीवन है!

वह नाव के एक सिरे पर बैठा डांड/पतवार के साथ। दूसरी ओर उसका जाल पड़ा था। मैं नाव के फ़र्श पर बीच में बैठा। वह नाव चलाने लगा और मैं उससे उसके बारे में पूछने लगा।


विष्णु से मैने कहा था कि बाद में कभी गंगा उस पार ले जाने और वापस आने की नाव-सैर करा दे। पर वह तुरत ले जाने को तैयार हो गया।

“चलिये अभी। आधा घण्टे में वापस आ जायेंगे।”

विष्णु मछली बेच नाव ले कर निकल लिया था। वापास आ कर मुझे ले गंगा उस पार चला उसके बाद।

अब मैं बैकफुट पर था। मैंने सोचा था कि अभी तो चार बजे से मछली पकड़ने में लगे विष्णु को घर जाने की जल्दी होगी पर वह मेरे साथ गंगा जी की एक ट्रिप को तैयार हो गया। उल्टे, मुझे घर लौटने की कुछ जल्दी थी (एक कप चाय की तलब)। पर विष्णु के साथ समय भी गुजारना चाहता था। मैने पूछा – कितना लोगे?

“आप जो दे दें।”

मैने कम कहा तो? … मैने कहा, …  50-60 रुपये ठीक रहेंगे?

“ठीक है; साठ दे दीजियेगा। चलिये।”

वह नाव के एक सिरे पर बैठा डांड/पतवार के साथ। दूसरी ओर उसका जाल पड़ा था। मैं नाव के फ़र्श पर बीच में बैठा।

वह नाव के एक सिरे पर बैठा डांड/पतवार के साथ। दूसरी ओर उसका जाल पड़ा था। मैं नाव के फ़र्श पर बीच में बैठा। वह नाव चलाने लगा और मैं उससे उसके बारे में पूछने लगा।

चार भाई और तीन बहने हैं वे। कुछ की शादी हो गयी है और कुछ अभी कुंवारे हैं। वह अभी छोटा है।

कितनी उम्र होगी तुम्हारी?

“आपको कितनी लगती है?”

मैने कहा – 18/19 या उससे कम। उसने हामी भरी – “इतनी ही है।”

पढ़ाई नहीं की विष्णु ने। जब मछली ही पकड़नी है तो पढ़ाई का क्या फायदा? बचपन से ही मछली पकड़ी है। जब नींद खुलती है, चला आता है नदी में मछली पकड़ने। उस पार सामने गांव है उसका – सिनहर। मल्लाहों के कई घर हैं सिनहर में। पर पूरा गांव मल्लाहों का नहीं है। जैसे केवटाबीर में तो मल्लाह ही हैं। वहां तो करीब 50 नावें होंगी। सिनहर गांव में करीब 4-5 नावें हैं।

मछली खूब मिल जाती हैं। खरीददार भी तैयार मिलते हैं। तुरन्त बेच कर पैसा मिल जाता है।

मछली खरीददारों के साथ विष्णु

तुम अकेले थे। खरीददार बहुत सारे। कभी उनसे लड़ाई नहीं होती?

लड़ाई काहे होगी। हां, उनकी आपस में कभी कभी मार हो जाती है कि कौन कितनी मछली लेगा। दाम जरूर वे पूरा नहीं देते। दस बीस रुपया रोक लेते हैं। बाद में वह मिल नहीं पाता।

अपना काम तुम्हें पसन्द है?

“पसन्द का क्या; यही काम है। कोई बेलदारी (राज-मिस्त्री) का काम तो आता नहीं मुझे। यही ठीक है।”

मैने पूछा – अगर तुम्हारा पुनर्जन्म हो, तो तुम मल्लाह बनना चाहोगे?

वह सवाल नहीं समझता। मैं उससे दूसरी तरह से पूछता हूं – कभी ऊब नहीं होती अपने काम से? रोज नाव, रोज मछली… वह ऊब को भी समझ नहीं पाता – काम ही यही है। जाल बिछाना, मछली पकड़ना और बेचना। यही करना है।

पढ़ाई नहीं की विष्णु ने। जब मछली ही पकड़नी है तो पढ़ाई का क्या फायदा? बचपन से ही मछली पकड़ी है। जब नींद खुलती है, चला आता है नदी में मछली पकड़ने। गंगा उस पार सामने गांव है उसका – सिनहर। मल्लाहों के कई घर हैं सिनहर में।

अपने सवाल को और तरह से प्रस्तुत करता हूं मैं – जैसे तुम्हारी बिरादरी में लोग यह नहीं कहते कि क्या यही काम किये जा रहे हैं। बदलने के लिये यहां से दिल्ली-बम्बई क्यों नहीं चले जाते?

“हां, कुछ लोग ऐसा करते हैं। कई करते हैं। पर मैं तो यहीं रहूंगा। मछली पकड़ना ही ठीक है।”

मैं समझ गया कि विष्णु सही में हार्डकोर मछेरा है। गंगा-नाव -मछली ही उसका जीवन है और उसी में वह आत्मन्येवात्मनातुष्ट है। आज मुझे एक ऐसा व्यक्ति मिला है जो अपने काम में पूरी तरह लगा है। अन्यथा लोग किसी न किसी मुद्दे पर असंतुष्ट या अनमने ही दिखते हैं।

मैं समझ गया कि विष्णु सही में हार्डकोर मछेरा है। गंगा-नाव -मछली ही उसका जीवन है और उसी में वह आत्मन्येवात्मनातुष्ट है। आज मुझे एक ऐसा व्यक्ति मिला है जो अपने काम में पूरी तरह लगा है।

मुझे यह भी अहसास हुआ कि मल्लाह/नाविक/किशोर के स्तर पर बातचीत करने के लिये मुझे भाषा और भाव – दोनों में ही अपने आप को सुधारना होगा। किताबी वाक्य बहुत साथ नहीं देते। सम्प्रेषण के अपने अलग अलग स्तर हैं, अलग अलग आयाम…

नदी की बीच धारा में कुछ बह रहा था – वह क्या है?

“पंड़िया (भैंस का बच्चा) है। मर जाने पर किसी ने बहा दी है।”

गंगा मोक्षदायिनी हैं। पंड़िया को भी शायद मोक्ष के किसी कोने-अंतरे में जगह मिल जाये।

बात करते करते नदी का दूसरा किनारा आ गया। मैने पूछा – उतरा जाये यहां?

बात करते करते नदी का दूसरा किनारा आ गया। मैने पूछा – उतरा जाये यहां?

विष्णु का विचार था कि वह ठीक नहीं रहेगा। किनारे पर रेत में मिट्टी भी है। इसलिये फ़िसलन है यहां। फिर कभी आने पर किसी और जगह नाव लगायेगा उतरने के लिये। हम वापस चले। इस समय उसका मोबाइल बजा। उसके घर से फोन आया कि लौटते हुये एक पाव मछली लेता आये खाने के लिये। उसने कहा कि उसे नींद तो आ रही है, पर मुझे उतार कर एक पाव मछली का जुगाड़ करेगा। लेकर ही घर जायेगा।

अब वह कुछ खुल गया था मुझसे – “मुझे फ़िकर हो रही है कि उंगली में मछली का कांटा गड़ गया है और यह महीना भर परेशान करेगा। पक जाये तो ठीक है। खोदने पर निकल आयेगा। वर्ना कांटा ऐसा होता है कि निकालने की कोशिश करो तो और अन्दर धंसता जाता है। हांथ में दर्द बढ़ा तो नाव चलाना मुश्किल हो जायेगा।”

वापस मेरी तरफ के तट की ओर मैने वह स्थान बताया जहां अपनी साइकिल खड़ी कर रखी थी। उसी के पास वापसी में नाव ले आया वह। उसके नाव चलाने में दक्षता नजर आ रही थी। उतरने पर मैने उसे सौ रुपये दिये। कहा कि साठ के बदले सौ रख लो। सामान्य सा खुशी का भाव उसके चेहरे पर दिखा।

मैने उसका मोबाइल नम्बर मांगा। उसने अपना मोबाइल मेरी ओर बढ़ा दिया – नम्बर मुझे याद नहीं। आप इससे अपने नम्बर पर कॉल कर लें। उससे नम्बर आपके पास आ जायेगा।

घर देर से पंहुचा। बताने पर कि मल्लाह के साथ गंगा की सैर कर आ रहा हूं तो पत्नीजी ने भी भविष्य में ऐसी सैर की इच्छा जताई। शाम के समय विष्णु को मोबाइल पर फोन किया तो उसने बताया कि शाम पांच बजे वह फिर नाव पर आ गया है। दो तीन घण्टा मछली पकड़ेगा।

गंगा-नाव -मछली ही उसका जीवन है!

मुझे उतार कर अपनी नाव में लौटता विष्णु।


विष्णु मल्लाह – बैकर मछरी पकड़े बा!

किसान की तरह मल्लाह भी मार्केट की चाल से मात खाता है। यहां यह जरूर था कि तुरत-फुरत उसे रोकड़ा मिल जा रहा था। किसानी में वह भी नहीं होता।


द्वारिकापुर टीले पर बटोही (साइकिल) खड़ी कर ताला लगाया तो दूर लोग दिखे – एक डोंगी और कुछ लोग। कयास लगाया – जरूर मछली खरीदने वाले होंगे। मैं अपने गठियाग्रस्त पैरों से धीरे धीरे चलता वहां पंहुचा। एक व्यक्ति, जाल से मछलियां निकाल रहा था। मुझे देख बोला – आवअ साहेब। आज एकर फोटो खींचअ। बैकर मछरी पकड़े बा। (आओ साहेब, इसकी फोटो खींचो। आज बैकर मछलियां पकड़ी हैं इसने।)।

दृष्य समझ आया। एक किशोर वय मल्लाह ने जाल बिछा कर मछलियां पकड़ी हैं। खरीदने वाले तीन थे। दो उसकी सहायता कर रहे थे जाल से मछलियां निकालने में। एक किनारे बैठा इन्तजार कर रहा था। उसे मात्र एक किलो मछली चाहिये थी घर में खाने के लिये। बाकी दोनो दुकानदार थे। जितनी मिल जाये, उतनी खरीदने वाले।

मल्लाह किशोर, दायें और मछली के दो खरीददार जाल से मछलियां निकालते हुये।

लड़का रात चार बजे उठा था मछली मारने। पांच बजे जाल लगाया था। ठीक ठाक मात्रा में मछलियां मिली आज। अब बेच कर घर जा सोने की जल्दी थी उसे। इस लिये उसकी सहायता के लिये दोनो खरीददार जल्दी जल्दी मछलियां निकलवा रहे थे।

सफ़ेद कमीज वाला कह रहा था – तोहरे बदे त ट्रेन गाड़ी रुकी रहअ थ। (तुम्हारे लिये तो ट्रेन गाड़ी रुकी रहती है।)

जिस व्यक्ति ने मुझे फोटो खींचने का निमन्त्रण दिया था, वह मुझे जानता था – तोहरे बदे त ट्रेन गाड़ी रुकी रहअ थ। (तुम्हारे लिये तो ट्रेन गाड़ी रुकी रहती है।)। मैने उसे करेक्ट किया कि अब मैं रिटायर हो गया हूं। अब ऐसी कोई सम्भावना नहीं है। पर उसने स्वीकार नहीं किया – तबऊ जलवा होये! (तब भी जलवा होगा)।

मैने उसका प्रतिवाद नहीं किया। लड़के से मछली मारने के बारे में पूछने लगा। जेब से छोटी नोटबुक और कलम निकाल ली थी। इस बीच एक चौथा ग्राहक भी आकर लड़के की मदद करने लगा।

चौथा ग्राहक सीन में अवतरित हुआ। सब देख कर बोला – आप इतना पूछ रहे हैं। लिख भी रहे हैं। इस सब से तो इसकी ** फट रही है साहब। क्या पता किसी कानून में धर लिया जाये कि क्यों मछली मार रहा है।

लड़का मेरे प्रश्नों के जवाब देने से कतरा रहा था। चौथा ग्राहक बोला – आप इतना पूछ रहे हैं। लिख भी रहे हैं। इस सब से तो इसकी ** फट रही है साहब। क्या पता किसी कानून में धर लिया जाये कि क्यों मछली मार रहा है।

कुछ देर मुझसे बात करने के बाद लड़का कुछ आश्वस्त दिखा। आपस में उन सब की चुहुल बाजी चल रही थी। लड़के ने बताया कि उसका नाम विष्णु है। गंगा उस पार सिंनहर गांव में रहता है। मछली मारने में मेहनत तो बहुत है। इस पर पहले ग्राहक ने जोड़ा – हां साहेब, मेहनत इसकी है, बेचने में पसीना हमारा है। हम दोनों मिल कर यह काम करते हैं। इसको फिक्र ज्यादा से ज्यादा मछली पकड़ने की है। हमें खरीदने और दुकान में बेचने की जुगत करनी होती है।

चौथे ग्राहक ने कहा – इसकी बात पर मत जाइये साहब। यह गिद्धराज है। पसीना वसीना नहीं बहाता यह। 🙂

लड़का मेरे प्रश्नों के जवाब देने से कतरा रहा था। चौथा ग्राहक बोला – आप इतना पूछ रहे हैं। लिख भी रहे हैं। इस सब से तो इसकी ** फट रही है साहब। क्या पता किसी कानून में धर लिया जाये कि क्यों मछली मार रहा है।

लड़का अपने जाल के बारे में बता रहा था – “यह नया जाल है। जाल तो साढ़े तीन सौ का भी आता है और हजार का भी। कोई जाल महीना भर चलता है, कोई साल भर भी चल जाता है। कोई गलत मछली आ जाये तो एक ही दिन में चीर देती है।… अलग अलग मछली के लिये अलग अलग जाल लगाना होता है। दोपहर में वह टेंगर मछली पकड़ेगा। उसके लिये अलग जाल ले कर आयेगा। जाल भी सीधे खरीद कर इस्तेमाल नहीं किया जाता। उसे अपनी जरूरत के मुताबिक तैयार करना होता है। जाल तैयार करना, मछली पकड़ना भर ही काम है उसका। बाकी, जितनी पकड़लेगा; वह सब बिक जायेगी। खरीदने वाले ये सब हैं ही।”

मछलियां जाल से लगभग निकोली जा चुकीं।

मैने देखा कि यद्यपि वह खुश है अपनी सभी मछलियां बेच कर; पर उसे वाजिब दाम तो नहीं ही मिलता। सभी मछलियां निकालने के बाद खरीददार खरीद रहे थे पर जितना रेट के हिसाब से कीमत बनती थी, उससे दस पांच कम ही दे रहे थे और एक आध मछली ज्यादा ही ले जा रहे थे। फिश-मार्केट की बार्गेनिंग का दृष्य था और लड़का इसमें बुरी तरह मात खा रहा था। पर उसे बहुत दुख नहीं हो रहा था इस बात का।

किसान की तरह मल्लाह भी मार्केट की चाल से मात खाता है। यहां यह जरूर था कि तुरत-फुरत उसे रोकड़ा मिल जा रहा था। किसानी में वह भी नहीं होता।

सभी मछलियां तुल गयीं। झिक झिक के बाद जो पैसे मिलने थे, मिल गये लड़के को। आज मछलियां काफ़ी थीं, इसलिये ग्राहकों में भी बटंवारा आसानी से हो गया।

लड़के के हाथ में एक मछली का कांटा चुभ गया है। उसे ले कर वह कुछ व्यग्र है, पर अधिक नहीं। ग्राहक मछली खरीद कर चले गये। वह खुश है आज का काम खतम कर। अब गंगा उसपार घर जा कर सोयेगा।

जब वह अपनी पतवार संभालने लगा तो मैने कहा – आज तो नहीं, गंगा उस पार तक कभी घुमा लाओगे मुझे?

पर वह तुरंत उस पार घुमाने को तैयार था। मैं नाव से उस पार गया। … उसका विवरण एक और पोस्ट में।


यह फेसबुक नोट्स से ब्लॉग पर सहेजी पोस्ट है। फेसबुक ने अपने नोट्स को फेज आउट कर दिया, इसलिये पोस्ट्स वहां से हटा कर यहांं रखनी पड़ीं। नोट्स में यह पोस्ट नवम्बर 2017 की है।


बिखारी समझते हैं मोदी सब समाधान निकालेंगे

“वैसे मोदी बनारस के हैं। उन्हे वोट दिया है। तेज दिमाग नेता हैं। सब समझते हैं। बिखारी को यकीन है कि मोदी जरूर कोई न कोई काम उस जैसे के भले के लिये करेंगे।”



चार कांटे फंसा कर सवेरे सात बजे से बैठे थे बिखारी द्वारिकापुर में गंगा नदी के किनारे। मैं उनसे मिला तो साढ़े दस बज चुके थे। एक बड़ी मछली उनकी पोटली में आ चुकी थी। अभी दोपहर दो बजे तक यहीं रहेंगे। बताया कि परिवार के खाने के लिये पकड़ रहे हैं। बड़ा परिवार है। करीब दो-ढाई किलो मछली चाहिये। यहां से ले कर जायेंगे तो शाम को बनेगी।

बिखारी

कसवारू गोंण की तरह ये भी बहुत दूर से आये हैं। बताया गांव है बरनी – सेवापुरी और चौखण्डी के बीच। गूगल नक्शे में देखा तो वह 30-34 किलोमीटर दूर दिखा। बिखारी ने भी बताया कि 15 कोस से आ रहे हैं वे। साठ किलोमीटर आना-जाना साइकिल से, वह भी मछली पकड़ने के लिये! गंगा किनारे यह मछलीमारों की प्रजाति मुझे आश्चर्यचकित करती है।

बिखारी सवेरे चार बजे निकले हैं अपने घर से। शाम पांच बजे वापस घर पंहुचेंगे। दिन भर केवल शाम की मछली के इन्तजाम में लगेगा। ऐसा वे महीने में तीन चार बार करते हैं – तब, जब कोई काम नहीं मिलता और समय रहता है। कल और आज उनके पास काम नहीं था। कल चारे (मछली के लिये केंचुये) का इन्तजाम किया और आज गंगा किनारे आ गये हैं। बिखारी ने बताया कि मेहनत-मजूरी का जो काम मिल जाये करते हैं। अधिकतर इमारत बनने की जगहों पर काम करते हैं।


नवंबर 10, 2017 के दिन फेसबुक नोट्स पर लिखी पोस्ट।



मैने पूछा – यहां बालू खनन का काम चला करता था, उसमें काम किया है या नहीं? बिखारी ने बताया कि बालू खनन का काम तो नहीं किया, पर मिलने पर वह भी कर सकते हैं।

कंटिया लगाये बिखारी

कुछ देर मैं गंगा किनारे उनके पास घास पर ही बैठ गया। दूब यहां हल्की गीली थी। आज कोहरा बहुत था, इस लिये देर से निकला था मैं और अब वातावरण में ठंडक नहीं थी। धूप थी, पर मरी मरी सी। वहां बैठने में कष्ट नहीं था।

कुछ देर मैं गंगा किनारे उनके पास घास पर ही बैठ गया।

बिखारी ने बताया कि घर में सभी मेहनत मजूरी करते हैं। सभी काम करते हैं, इसलिये खर्चा ठीक ठाक चल जाता है। बाकी, ब्याह शादी, मरनी करनी में खर्च तो हो ही जाता है। उम्र पचास के लगभग है बिखारी की। बुढ़ापे के लिये बचत कर एक बीमा की पालिसी में पैसा जमा किया था। जब पालिसी पूरी होने और पैसा मिलने का नम्बर आया तो पता चला कि कम्पनी गायब हो गयी है। जिस एजेण्ट ने भरवाया था पालिसी का कागज, वह कहता है पैसा मिलेगा, पर बिखारी को ज्यादा उम्मीद नहीं है। वह पैसा मिलता तो बैंक में जमा कर देते, पर अब समझ नहीं आता।

मैने पूछा – कोई सरकारी पेंशन योजना नहीं है, जिसमें हर महीना जमा कराओ और बुढापे में पेंशन मिले। जैसे मेरा काम पेंशन से चल रहा है, वैसा ही कुछ इन्तजाम तुम्हारा भी हो जाये।

बिखारी ने बताया कि वैसा तो कुछ नहीं है। पिछली समाजवादी सरकार ने एक पेंशन निकाली थी। पर उसमें बहुत कम पैसा मिलता था। अब तो वह बन्द हो गयी है। वैसे मोदी बनारस के हैं। उन्हे वोट दिया है। तेज दिमाग नेता हैं। सब समझते हैं। बिखारी को यकीन है कि मोदी जरूर कोई न कोई काम उस जैसे के भले के लिये करेंगे।

बिखारी से मैने जाति नहीं पूछी और राजनीति में उनके जातिगत अलाइनमेण्ट का अन्दाज भी नहीं लगाया। पर मोदी पर इस तरह का विश्वास मुझे आश्चर्यचकित करने वाला लगा। यह भी लगा कि मोदी अगर इस तरह के लोगों के विश्वास और आशा पर खरे न उतरे तो क्या दशा होगी?

बिखारी ने फिर कहा – मोदी-जोगी कुछ न कुछ करेंगे। उन्होने मोदी-जोगी का नाम लिया, भारतीय जनता पार्टी का नहीं। यह लगता है जनता जनार्दन में मोदी-जोगी को डेमी-गॉडत्व प्राप्त है, पार्टी को नहीं।

बिखारी ने फिर कहा – मोदी-जोगी कुछ न कुछ करेंगे। उन्होने मोदी-जोगी का नाम लिया, भारतीय जनता पार्टी का नहीं। यह लगता है जनता जनार्दन में मोदी-जोगी को डेमी-गॉडत्व प्राप्त है, पार्टी को नहीं।

बिखारी के चारों कांटे चुप चाप पड़े थे। मैने बिखारी से सवाल किया कि पता कैसे चलता है मछली फंस गयी है। बिखारी ने बताया कि हर कांटे के साथ एक लकड़ी का टुकड़ा तैर रहा है। उसमें हलचल होते ही पता चल जाता है। इन चारों कांटों के चारों टुकड़ों पर ध्यान रखना होता है।

आज जो मछली मिली है, उसको ले कर बिखारी खुश हैं। एक हाथ भर की है। पोटली में मछली यदाकदा फड़फड़ा रही थी और उसकी हलचल से लगता था कि बड़ी मछली है।

बिखारी अपने कांटों की दशा पर एक आंख गड़ाये मुझसे बात करते चले जा रहे हैं – अभी दो बजे दोपहर तक घर से फोन आ जायेगा यह पता करने के लिये कि कितनी मछली मिली। घर में सब इसका इन्तजार कर रहे होंगे।

यह बताइये कि यहां सोंइस देखी? – मैने पूछा। (सोंइस – गांगेय डॉल्फिन)

बिखारी – हाँ, वहां उछली थी सोइंस।

बिखारी ने जवाब दिया – हां, अभी पांच मिनट पहले ही वहां उछली थी। यहीं (उंगली से दिखा कर) आसपास है। वह देखो, फिर उछली। गंगा के दूसरे किनारे की ओर ज्यादा हैं।

बारिश के मौसम में भी आते हो, मछली पकड़ने? उस समय तो नहीं मिलती होंगी?

बिखारी ने मेरी अल्पज्ञता पर हल्की हंसी से जवाब दिया – इसके उलट उस मौसम में ज्यादा और बढ़िया मिलती हैं। आजकल तो पानी साफ़ है। इसमें कम होती हैं। बरसात में पानी मटमैला होता है। उसमें मछलियां ज्यादा होती हैं।

बिखारी से आगे मिलना तो शायद ही हो। पर उनका मोदी पर भरोसा याद रहेगा। मन में यह सवाल चलता ही रहेगा कि क्या है मोदी में, जिससे इस तरह का भरोसा इस ग्रामीण मछली पकड़ने वाले में आ गया है।

शायद पहले की सरकारों का भयंकर मिसमैनेजमेण्ट और भ्रष्टाचार जिम्मेदार है इसके लिये। शायद।


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धन्यवाद।


कसवारू गोंण का मछली मारने का जुनून

75+ साल (देखने में 55-65 के बीच), 35 किमी मॉपेड चला कर बंसीं से मछली पकड़ने के लिये गंगा किनारे आना! और एक दिन नहीं; नित्यप्रति! अत्यन्त विस्मयादिबोधक! केवल तुम ही नहीं हो उलट खोपड़ी के जीव पण्डित ज्ञानदत्त!


नदी किनारे मिले कसवारू गोंण। किसी नाव पर नहीं थे। मॉपेड से आये थे। मुझे लगा कि सवेरे सवेरे मल्लाहों से मछली खरीदने वाले होंगे, जो यहां से मछली खरीद कर चौरी/महराजगंज बाजार में बेचते हैं।

पर कसवारू ने जो बताया वह आश्चर्य में डालने वाला था। वे धौकलगंज (यहां से करीब 35 किलोमीटर दूर) से आये हैं। मछली पकड़ने। सवेरे का समय था। साढ़े पांच बजे।


(जून 10. 2017 को फेसबुक-नोट्स पर पब्लिश की गयी पोस्ट)



दूर से कसवारू गोंण और उनकी मॉपेड का चित्र

इस जगह पर नदी (गंगा माई) के समीप मैं आता हूं। पांच बजे भोर में घर से निकल लेता हूं। नदी की बहती धारा देखने और कुछ चित्र लेने का मोह सवेरे उठाता है और बटोही/राजन भाई के साथ इस जगह के लिये रवाना कर देता है। मैं 3.5 किलोमीटर दूर से आ रहा हूं पर यह बन्दा 35 किलोमीटर दूर से आ रहा है। कुछ मछलियां पकड़ने।

मुझसे दस गुना जुनूनी निकले कसवारू गोंण।

राजन भाई ने पूछा – “कितनी उम्र होगी? पचपन?”

देखने में वह व्यक्ति 60 के आसपास लगते थे।

कसवारू का उत्तर फिर आश्चर्य में डालने वाला था – छिहत्तर चलत बा हमार। सन बयालीस क पैदाईस बा। (छिहत्तर। सन 1942 की पैदाइश है मेरी।)।

मछली पकड़ते कसवारू गोंण

75+ साल (देखने में 55-65 के बीच), 35 किमी मॉपेड चला कर बंसीं से मछली पकड़ने के लिये गंगा किनारे आना! और एक दिन नहीं; नित्यप्रति! अत्यन्त विस्मयादिबोधक! जुनूनी होने के लिये किसी बड़ी यूनिवर्सिटी की पढ़ाई या 6 अंकों की सेलरी वाली नौकरी करना जरूरी नहीं जीडी! केवल तुम ही नहीं हो उलट खोपड़ी के जीव पण्डित ज्ञानदत्त!

कसवारू गोंण ने बताया कि सवेरे जब पहली अजान होती है मस्जिद में, तब वे निकल लेते हैं। किसी दिन 2 किलो, किसी-किसी दिन 15-20 किलो तक मिल जाती है मछली। आजकल ठीक ठाक मिल जा रही है। अभी दो दिन पहले सात किलो की पहिना पकड़ी थी।

“पहिना क्या?”

मछरी। कतउं बरारी कहत हयें ओके। (मछली। कहीं कहीं बरारी भी कहते हैं उसे। )

कसवारू जिस तरह से बात कर रहे थे, वह प्रभावित करने वाला था। शरीर में भी कहीं बुढ़ापे की लाचारी नहीं थी। छरहरा कसा शरीर। वैसी ही आवाज और वैसा ही आत्मविश्वास। साफ कपड़े और सिर पर सुगढ़ता से बांधी पगड़ी। क्लीन शेव और अपने गंवई वेश में भी टिप-टॉप!

बिना समय गंवाये कसवारू अपनी जगह तलाशने और कांटा लगाने में जुट गये। अपनी धोती भगई की तरह बांध ली थी उन्होने। काम के लिये तैयार।

हमारे पास आज समय कम था। सो लौट चले। वर्ना उनसे और बातचीत करने का मन था। वापसी में कसवारू की तंदुरुस्ती के राज पर कयास लगाया – रोज मछली खाता है, शायद इस कारण से!

देखें, फिर कभी मिलते हैं कसवारू या नहीं!

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गोंण जाति के बारे में राजन भाई ने बताया कि कंहार होते हैं वे। खानदानी पेशा कुंये से पानी भरने और पालकी ले कर चलने का था। जमींदारों के भृत्य। अब तो अनेकानेक काम करते हैं।