कैंची सीखना #गांवकाचिठ्ठा

भारत बहुत बदला है, पर अभी भी किसी न किसी मायने में जस का तस है। भारत और इण्डिया के बीच की खाई बहुत बढ़ी है। वह कैंची सीखती साइकिल से नहीं नापी जा सकती।


बच्चों के लिये नयी नयी तरह की साइकिलें आ गयी हैं। इक्कीसवीं सदी में बचपन गुजारने वाली शहराती नयी पीढ़ी ने गैजेट्स में उपभोक्ता की महत्ता का विस्फोट देखा है। तीन साल के बच्चे को दो पहिये वाली साइकिल ले कर दी जाती है। छोटे पहिये की उस साइकिल में पीछे दोनो ओर अतिरिक्त दो छोटे पहिये जुड़े होते हैं जिससे बच्चा चलाना भी सीख सके और उसे गिरने से बचाने को टेका भी मिलता रहे।

मेरी पोती चिन्ना पांड़े ने वैसी ही साइकिल से शुरुआत की है। अब उसे कुछ बड़ी साइकिल ले कर देनी है।शायद उसके अगले जम्नदिन पर। बच्चा जब तक बड़ा होता है, तीन चार साइकिल बदल चुका होता है। यह भी हो सकता है कि वह साइकिल चलाना सीखने के पहले स्कूटर या मॉपेड/मोटर साइकिल चलाना सीख जाये।

नये जमाने की साइकिलें। मेरी पोती की अगली साइकिल कुछ ऐसी होगी।
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राजन भाई की पोती के स्वास्थ्य के लिये नानी के नुस्खे

नानी ने वह सब एक तरफ पटक दिया। पूरे दिन भुनभुनाती रहीं कि किताब पढ़ कर बच्चे पाले जायेंगे? बदाम के तेल से हड्डी मजबूत होगी? अरे ये सब चोंचले हैं।


सवेरे की चाय पर लगभग रोज रहते हैं राजन भाई। मेरे चचेरे भाई हैं। उम्र में मुझसे करीब छ साल बड़े। उनका घर रेलवे लाइन के उस पार अहाता में है। हमारे घर से करीब आधा किलोमीटर दूर। लॉकडाउन पीरियड में एक वही हैं, जो लगभग नियमित मिलते हैं। उनसे गांव की कई सूचनायें मिलती हैं। अन्यथा हम लोग शायद उतने सामाजिक नहीं हैं। 😆

सवेरे की चाय पर राजन भाई। राजेंद्र दुबे।

उनसे कई तरह की चर्चा होती है। आज वे थोड़ा परेशान थे। उनकी सात महीने की पोती की कुछ स्वास्थ्य सम्बंधी समस्या है। उनसे बात करते समय मुझे बरबस अपनी नानी की याद हो आयी। जब मैं अपने तीन महीने के बेटे के साथ दिल्ली से बनारस उनके पास आयी थी। आने के पहले बेटा बीमार था और मेरे साथ उसके सामान की बड़ी सी गठरी थी। उसमें थे बदाम का तेल, जान्सन के उत्पादों का पूरा किट और अनेक दवाइयां।

नानी ने वह सब एक तरफ पटक दिया। पूरे दिन भुनभुनाती रहीं कि किताब पढ़ कर बच्चे पाले जायेंगे? बदाम के तेल से हड्डी मजबूत होगी? अरे ये सब चोंचले हैं।

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यात्रायें, यादें और कोविड19 – रीता पाण्डेय

भरतपुर में मालगाड़ी को सिगनल मिल गया था। वह हिलने लगी तब स्टेशन मास्टर साहब दौडते हुये आये और अपने घर से बनी चाय और पेपर कप हमें थमा दिये। हिलते ब्रेकवान में खड़े खड़े हमने गार्ड साहब से शेयर करते चाय पी। … मेरे और मेरे बच्चों के लिये यह यादगार अनुभव था।


रीता पाण्डेय लिखती चली जा रही हैं। लिखने बैठती हैं तो मालुम नहीं होता कि किस विषय पर लिखेंगी। अनेक विषय कुलबुलाते हैं। शायद कागज कलम उठाने तक तय नहीं होता और कुछ मिनट व्यतीत होने पर ही लिखने की प्रक्रिया प्रारम्भ होती है।

मेरे विचार से जो लिखा जाता है, उसकी एक दो बार एडिटिंग होनी चाहिये। हल्की फुल्की, वाक्य विन्यास और हिज्जों की एडिटिंग तो मैं कर दे रहा हूं, पर विचारों के प्रवाह में जो तरलता या गड्डमड्ड होना है, उसे जस का तस रख रहा हूं।

आखिर, ब्लॉग है ही खुरदरा लेखन। बहुत तराशने पर उसका मूल तत्व (प्रकार, या सौंदर्य) समाप्त होने का खतरा होता है।

आप रीता पाण्डेय का लिखा पढ़ें –


स्कूल में निबंध लिखने को कहा जाता था। गाय पर, त्यौहार पर या फिर यादगार यात्रा पर। यूं तो मैंने अपने जीवन में बहुत यात्रायें की हैं पर कुछ यात्रायें यादगार हैं।

उस समय बच्चे छोटे थे। दिल्ली में अपने भाई के घर छुट्टियां बिता कर रतलाम (जहां मेरे पति रेल सेवा में पदस्थ थे) आ रही थी बच्चों के साथ। ट्रेन सफर के पहले भाई ने कुछ पूरी-सब्जी साथ में दी थी। मन में था कि शाम तक रतलाम पंहुच जायेंगे। इस लिये ज्यादा भोजन रखने के लिये मैंए बहुत आनाकानी की। यह सोचा कि लंच केटरिंग से कोटा में मिल ही जायेगा। पर ट्रेन लेट होती गयी और होती गयी। रास्ते में कुछ नहीं मिला। कोटा पंहुचते पंहुचते शाम के सात बज गये। और वहां दूध, चाय और कुछ नाश्ता मिलने पर बड़ी राहत मिली।

एक बार दीपावली के अवसर पर हमें रतलाम से अपने पैतृक घर इलाहाबाद (अब प्रयागराज) जाना था। रेलवे में छुट्टी मिलना अंत समय तक निश्चित नहीं होता। एन मौके पर छुट्टी मिली और हम ताबड़तोड़ किसी खटारा रेलगाड़ी से रवाना हुये। ट्रेन को भरतपुर में छोड़ कर किसी अन्य ट्रेन से दिल्ली पंहुचना था। वहां से प्रयागराज एक्सप्रेस से इलाहाबाद। खटारा गाड़ी लेट होती गयी। भरतपुर में उतर कर लगा कि दिल्ली समय से पंहुच ही नहीं सकते।

ऐसे में ट्रेन कण्ट्रोलर ने जुगाड़ बिठाया। एक मालगाड़ी के ब्रेकवान में हमको बिठा कर मथुरा भेजने का इंतजाम किया। … भरतपुर में मालगाड़ी को सिगनल मिल गया था। वह हिलने लगी तब स्टेशन मास्टर साहब दौडते हुये आये और अपने घर से बनी चाय और पेपर कप हमें थमा दिये। हिलते ब्रेकवान में खड़े खड़े हमने गार्ड साहब से शेयर करते चाय पी। मेरे पति के पास तो इस तरह ब्रेकवान में चलने के बहुत अनुभव होंगे, पर मेरे और मेरे बच्चों के लिये यह यादगार अनुभव था। हम गार्ड साहब के डिब्बे की रेलिंग पकड़ कर पीछे जाती पटरी को ध्यान से देख रहे थे। ऐसा दृष्य पहले नहीं देखा था।

मथुरा में एक रोड वैहीकल का इंतजाम कर दिया था ट्रेन कण्ट्रोल ने। सो मथुरा से दिल्ली तक की यात्रा सड़क मार्ग से पूरी की। रेल सेवा के अमले का इंतजाम न होता तो हम किसी भी प्रकार नई दिल्ली पंहुच कर प्रयागराज एक्सप्रेस नहीं पकड़ सकते थे।

बहुत सी यादें रेल की पटरी के इर्द-गिर्द हैं।

रेलसेवा की बदौलत एक और यात्रा, जो वैसे न हो पाती, सम्भव हो सकी। रतलाम में दोपहर खबर मिली कि मेरी माताजी (सास) पीजीआई, लखनऊ में अकस्मात भर्ती की गयी हैं। उनके पैर में रक्त जम गया था और अगर ठीक नहीं हो पाया तो पैर की सर्जरी तक की सम्भावना थी। ट्रेन कण्ट्रोल ने आननफानन में यात्रा का इंतजाम किया। रतलाम से उज्जैन एक खटारा मेटाडोर वैन में यात्रा कर हम उज्जैन पंहुचे। वहां से मालवा एक्सप्रेस में आरक्षण करा दिया था मण्डल के नियंत्रण कक्ष ने, और उस ट्रेन से हमें आगरा पंहुचना था। आगरा सेण्ट्रल स्टेशन से लखनऊ किसी अन्य ट्रेन में यात्रा का इंतजाम किया गया।

उज्जैन पंहुचने में देर हुई। शायद बारिश के कारण या खटारा वाहन के कारण। लगा कि मालवा एक्सप्रेस मिस हो जायेगी। स्टेशन पर पंहुचे तो स्टेशन मास्टर साहब स्टेशन के बाहर इंतजार करते मिले। मालवा एक्सप्रेस प्लेटफार्म पर खड़ी थी। तेज चाल से चलते जब मालवा एक्सप्रेस में बैठे तो स्टेशन मास्टर साहब ने हल्के से बताया कि वह ट्रेन करीब आधा घण्टा हमारे लिये रोक रखी थी ट्रेन कण्ट्रोल ने। मास्टर साहब ने कहा कि आप फिक्र न करें – रतलाम मण्डल की सीमा के अंदर ही ट्रेन रनिंग पर ध्यान दे कर उसे भोपाल सही समय पर पंहुचा दिया जायेगा। वैसा ही हुआ। पर जब तक हम भोपाल नहीं पंहुचे, तब तक हमारे लिये मालवा एक्सप्रेस जैसी महत्वपूर्ण ट्रेन को आधा घण्टा रोकने का अपराध बोध होता रहा…

अभी तेरह मार्च को मेरी बेटी अपने पुत्र के साथ बोकारो से वाराणसी आयी थी। मैं भी उसके साथ एक सप्ताह वाराणसी में रही। उस दौरान कोरोनावायरस का हल्ला गम्भीर से गम्भीरतर होता गया। मेरे दामाद ने अपना वाहन भेज दिया था मेरी बेटी को वापस बोकारो ले जाने के लिये। पर जाना एक दो दिन यहां लोगों की मनुहार पर टला। इस बीच बाईस मार्च को मोदी जी द्वारा जनता कर्फ्यू की घोषणा हुई। अफरातफरी मच गयी। बिहार सरकार अपनी सीमायें सील करने का निर्णय कर चुकी थी।

रीता पाण्डेय और गंगा किनारे का सूर्योदय

बिटिया अपने वाहन में बैठ कर चलने ही वाली थी कि टेलीवीजन की खबरों से पता चला रास्ता बंद कर दिया गया है। वह वापस वाराणसी में अपने मामा के घर लौटी। … पर भला हो मेरे दामाद का। उन्होने पता किया कि बिहार सरकार ने अभी-अभी तो निर्णय ही लिया है। उसके कार्यान्वयन में इतनी तत्परता बिहार प्रशासन-पुलीस नहीं दिखा सकते। विवेक (दामाद) ने विवेक से काम लिया और वाणी-विवस्वान (बेटी-नाती) को तुरंत निकल चलने के लिये कहा। वाणी फिर यात्रा पर रवाना हुई और वास्तव में रास्ते में किसी ने कुछ नहीं पूंछा। सड़के वीरान थीं। जिस यात्रा में वाराणसी से बोकारो तक नौ-दस घण्टे लगते, वह उन्होने छ घण्टे में ही सम्पन्न कर ली। … पर जब तक रात दो बजे तक वह बोकारो पंहुच नहीं गयी, हमारी जान अटकी रही।

उसके और मेरे लिये यह यात्रा भय देने वाली और रोमांचक थी। कोविड19 के कालखण्ड का यह रोमांचक अनुभव था।


यात्रा – ये साधू थे जो मुझे बह्मावर्त (बिठूर) में गंगा किनारे मिले थे। यात्राओं की खुदरा यादें बहुत हैं। मेरे पास भी और रीता पाण्डेय के पास भी।

रीता पाण्डेय ने तो ऊपर कुछ यात्राओं के बारे में लिखा है। मुझे लगता है कि गरीब लोगों का कोरोनावायरस लॉकडाउन संदर्भ में जो पलायन हुआ है; जिस प्रकार पैदल, कण्टेनर में ठुंस कर या अन्य प्रकार से लोगों ने अकेले या सपरिवार यात्रायें की हैं; जिस प्रकार प्रशासन-पुलीस की क्षमता/अक्षमता देखी है; उसका विवरण अभूतपूर्व होगा। उस महापलायन पर अगर कोई मेमॉयर लिखे और पब्लिश हो तो चाहे जितनी कीमत हो, मैं खरीदूं और पढूंगा जरूर।


दस दिवसीय दाह संस्कार क्वारेण्टाइन – शोक, परंपरा और रूढ़ियां

पिताजी की याद में कई बार मन खिन्न होता है. पर उनकी बीमारी में भी जो मेरा परिवार और मैं लगे रहे, उसका सार्थक पक्ष यह है कि मन पर कोई अपराध बोध नहीं हावी हो रहा.



पिताजी का देहांत 11 अक्टूबर को हुआ था. अगले दिन रसूलाबाद, प्रयाग में दाह संस्कार. उसी दिन से यहां शिव कुटी में घण्ट स्थापना की. सुबह शाम वहां जल देने और दीपक जलाने का कर्म कर रहा हूं मैं.

शिव कुटी में गंगा किनारे इस पीपल पर बंधे घण्ट में जल देने और दीपक जलाने का नित्य कर्म कर रहा हूं मैं.

शोक है. रीति पालन की भावना भी है; पर कर्म कांड का रूढ़ निर्वहन नहीं हो रहा.

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नंदू नाऊ का मोनोलॉग

नंदू के पास देश काल समाज की बहुत जानकारी है जो वह मुझ जैसे “उपयुक्त” श्रोता को सुनाने की इच्छा का दमन नहीं करता.



नंदू नाऊ मुझे तरह तरह की सूचना और जानकारी देता है सवेरे और शाम की घण्ट यात्रा के दौरान. बताता है कि ज्ञान बालू वाले के पास उसका घर है. पंद्रह साल से घाट और घण्ट के दाह/श्राद्ध का नाऊ का काम कर रहा है. इतने समय में करीब 1500 दाह और घण्ट के अनुष्ठान करवा चुका है. अभी तो मरने का सीजन नहीं है. बरसात और उसके आसपास के मौसम में मौतें कम ही होती हैं. तेज सर्दी और गर्मी में उम्रदराज लोग ज्यादा जाते हैं. उस समय नंदू को कभी कभी दम मारने को फुर्सत नहीं होती.

रसूलाबाद श्मशान घाट. नंदू यहां दाह कर्म में सहायता करता है.

जब उम्र गुजार कर कोई जाता है तो परिवार को भले ही कष्ट होता है, पर वह इतना अखरता नहीं. पर जब बच्चा या जवान खत्म होता है तो मन छटपटाता है. कभी कभी एक सप्ताह शादी को हुआ और नौजवान चला गया. और कभी तो छोटे बच्चे जिसका जनेऊ हो जाने के कारण श्राद्ध कर्म करना होता है, का क्रिया कर्म भी कराया नंदू ने. वह तकलीफ देह था.

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