दुखहरन लकड़हारा


दुखहरन ने अपनी रेती दिखाई। बताया कि रोज कुल्हाड़ी तेज करनी पड़ती है। वह कुल्हाड़ी साथ रखता है और रेती भी। स्टीफन कोवी की सेवन हैबिट्स पुस्तक का अध्याय मेरे दिमाग में जीवन्त हो गया – Sharpen the Saw.

गांव में अजिज्ञासु (?) प्रवृत्ति


गांव में बहुत से लोग बहुत प्रकार की नेम ड्रॉपिंग करते हैं। अमूमन सुनने में आता है – “तीन देई तेरह गोहरावई, तब कलजुग में लेखा पावई” (तीन का तेरह न बताये तो कलयुग में उस व्यक्ति की अहमियत ही नहीं)। हांकने की आदत बहुत दिखी। लोगों की आर्थिक दशा का सही अनुमान ही नहींContinue reading “गांव में अजिज्ञासु (?) प्रवृत्ति”

लिखूं, या न लिखूं किताब उर्फ़ पुनर्ब्लागरो भव:


मेरे साथ के ब्लॉगर लोग किताब या किताबें लिख चुके। कुछ की किताबें तो बहुत अच्छी भी हैं। कुछ ने अपने ब्लॉग से बीन बटोर कर किताब बनाई। मुझसे भी लोगों ने आग्रह किया लिखने के लिये। अनूप शुक्ल ने मुझे ब्लॉग से बीन-बटोर के लिये कहा (यह जानते हुये कि किताब लिखने के बारेContinue reading “लिखूं, या न लिखूं किताब उर्फ़ पुनर्ब्लागरो भव:”

मदन मोहन पाण्डेय, उम्र 93 वर्ष


पिछली बार मदन मोहन जी से मिला था एक महीना पहले। आज फिर मिलना हुआ। वे और उनकी पत्नीजी खटिया पर बैठे थे। दोनो ही नब्बे के पार होंगे (या पत्नीजी नब्बे के आस पास होंगी)। वे स्वयम तो 93+ हैं। नब्बे के पार की उम्र और चैतन्य! कुछ कृशकाय हो गये हैं पर कद काठीContinue reading “मदन मोहन पाण्डेय, उम्र 93 वर्ष”

रमेश कुमार जी के रिटायरमेण्ट अनुभव


रमेश कुमार जी मेरे अभिन्न मित्रों में से हैं। हम दोनों ने लगभग एक साथ नौकरी ज्वाइन की थी। दोनो केन्द्रीय विद्युत प्राधिकरण में असिस्टेण्ट डायरेक्टर थे। कुंवारे। दिल्ली के दूर दराज में एक एक कमरा ले कर रहते थे। घर में नूतन स्टोव पर कुछ बना लिया करते थे। दफ़्तर आने के लिये लम्बीContinue reading “रमेश कुमार जी के रिटायरमेण्ट अनुभव”

पिताजी और यादें


शाम को घर के बरामदे में कुर्सी डाल हम बैठे थे – पिताजी, पत्नीजी और मैं। बात होने लगी पिताजी के अतीत की। डिमेंशिया है पिता जी को। हाल ही की चीजें भूल जाते हैं। पुराना याद है। आवाज धीमी हो गयी है। कभी कभी शब्द नहीं तलाश पाते विचार के लिये। जब समझ नहींContinue reading “पिताजी और यादें”