मचिये के लिये मिला राजबली विश्वकर्मा से

राजबली का परिवार अलाव जला कर कोहरे में गर्माहट तलाशता बैठा था। आकर्षक मूछों वाले राजबली एक मोटे लकड़ी के टुकड़े को बसुले से छील भट्ठा पर काम करने वालों के लिये खड़ाऊँ बना रहे थे।


मेरे खींचे एक चित्र में गुड़ बनाने वाले किसान के पास ताजा बनते गुड़ के लालच में एक छोटा बच्चा मचिया पर बैठा था। जब मैंने वह चित्र खींचा या सोशल मीडिया पर डाला, तो मेरे मन में मचिया था ही नहीं। किसान एक परात में गर्म श्यान गुड़ की भेलियां बना रहा था, ध्यान उसी पर था। पर ट्विटर पर गये उस चित्र में ए.एस. रघुनाथ जी को मचिया ही नजर आयी। 🙂

मचिया पर बैठा छोटा बच्चा

उस चित्र को देख कर रघुनाथ जी ने अपनी ट्वीट में मचिया की इच्छा व्यक्त की थी –

वह ट्वीट लगता है मन के किसी कोने में बनी रही। मेरे ड्राइवर ने सुझाव दिया कि वैसे तो लोग मचिया का प्रयोग आजकल करते नहीं हैं; पर भोला विश्वकर्मा सम्भवत: मचिया बना सकता है।

उसके सुझाव पर आठ जनवरी को मैं श्री ए.एस. रघुनाथ जी के लिये मचिया तलाशते, सपत्नीक द्वारिकापुर के खाती भोला विश्वकर्मा के यहां गया था। द्वारिकापुर का रास्ता चार पहिया वाहन के लिये सरल नहीं है। फिर भी हम रेलवे लाइन के बगल से कच्चे, गिट्टी भरे रास्ते पर वाहन किसी तरह साधते वहां पंहुचे।

भोला ने चार पांच दिन में मचिया का लकड़ी का ढांचा बना कर देने का वायदा किया था। उसके बाद उस ढांचे पर हमें किसी जानकार को पकड़ कर सुतली से बिनवाना होता।

भोला विश्वकर्मा। उन्होने बहुत टालमटोल की और मचिया बनाया नहीं।

मैं भोला से बात करने के बाद बहुत आशान्वित हुआ कि सप्ताह भर में मचिया बन कर तैयार हो जायेगी।

पर उसके बाद मैंने भोला की लकड़ी की टाल-दुकान पर तीन चक्कर लगाये। अपने ड्राइवर को भी चार बार अलग से भेजा। कई बार उसे फोन भी किया। पर उसने आज नहीं कल की टरकाऊ बात ही की। कभी कहा कि वह दुकान पर नहीं है, नाई के यहां हजामत बनवा रहा है। कभी उसके लड़के ने फोन उठाया और पिता से बात कराने का वायदा किया, जो पूरा नहीं हुआ।

अंतत: दो सप्ताह बाद मुझे यकीन हो गया कि भोला बनाने वाला नहीं। शायद वह लकड़ी के फट्टे जोड़ कर तख्त या गांव के किसानों के लिये खुरपी-फावड़ा के बेंट भर बनाता है। उसके पास साधारण काम की भरमार है और उसको उसी से फुर्सत नहीं है। फुटकर कामों के लिये गांव वाले उसका तकाजा करते रहते हैं या उसके पास बैठ अपना काम निकालते हैं। उसका बिजनेस मॉडल मेरे जैसे ग्राहकों के लिये ‘ऑफ-द-लाइन’ सामान बनाने का है ही नहीं।

गांवदेहात के अलग अलग प्रकार के कारीगर इसी सिण्ड्रॉम ग्रस्त हैं। भऊकी, दऊरी या छिटवा/खांची बनाने वाले भी शहरी जरूरत के हिसाब से अपने उत्पाद के डिजाइन में परिवर्तन नहीं करते। उन्हे मैंने नये प्रकार की भऊंंकी बनाने का बयाना भी दिया पर बार बार कहने पर भी बनाया नहीं। बयाना का पैसा भी वापस नहीं मिला। वे अपने सामान्य कामों में व्यस्त रहते हैं और वही उन्हे सूझता है।

इसी तरह कुम्हार भी सामान्य दियली, कुल्हड़ के इतर कुछ भी बनाने में रुचि नहीं दिखाते। मैंने उनके साथ भी माथापच्ची की कि वे कोई वेस, कोई नायाब तरीके का गमला बनायें; पर वे नहीं कर पाये।

खाती-कारपेण्टर का हाल तो भोला विश्वकर्मा ने स्पष्ट कर दिया। जो काम वे कर रहे हैं, उन्हें बहुत ज्यादा पैसे नहीं मिलते और उनका व्यवसाय बढ़ने की सम्भावनायें भी नहीं हैं। व्यवसाय बढ़े तो उसके लिये उनके पास रिसोर्सेज या डिमाण्ड को पूरा करने की सोच भी नहीं है। वे एक दिन से दूसरे दिन तक का जीवन जीना ही अपना ध्येय मानते हैं। 😦

पर उसके बाद मैंने भोला की लकड़ी की टाल-दुकान पर तीन चक्कर लगाये। अपने ड्राइवर को भी चार बार भेजा। कई बार उसे फोन भी किया। पर उसने आज नहीं कल की टरकाऊ बात ही की। अंतत: दो सप्ताह बाद मुझे यकीन हो गया कि भोला बनाने वाला नहीं।

यही क्या, आप किसान को भी ले लीजिये। वह अपने कम्फर्ट जोन में गेंहू-धान की मोनो कल्चर में ही लिप्त है। कोई नया प्रयोग करना ही नहीं चाहता। हमने बार बार कहा अपने अधियरा को कि वह हल्दी, अदरक या सूरन, सब्जी उगाने की पहल करे। हम उसका घाटा भी हेज करने को तैयार थे; पर वह आजतक हुआ नहीं। 😦

खैर; अब मेरे पास विकल्प था बनारस की दुकानों में मचिया तलाशने का। विशुद्ध गंवई चीज शहर में तलाशने का!

कल हम बनारस जा कर यह तलाश करने वाले थे, ‘नयी सड़क’ की गलियों में। इसी बीच मैंने ग्रामीण विकल्प टटोलने के लिये अपने यहां जेनरेटर ठीक करने वाले शिवकुमार विश्वकर्मा से फोन पर बात की। शिवकुमार के घर में बाकी लोग बनारस में खाती-लुहार का काम भी करते हैं। रोज आते जाते हैं।

शिवकुमार ने कहा कि बेहतर है मैं सवेरे उनके यहां आ कर उनके पिताजी से बात कर लूं। वे यह सब काम करते हैं।

मैं सवेरे गया उनके पिता जी से मिलने। कोहरा घना था, पर फिर भी घर से निकल कर गया। और वहां शिवकुमार के पिताजी से मिल कर लगा कि सही जगह पंहुच गया मैं। पूरा परिवार अलाव जला कर कोहरे में गर्माहट तलाशता बैठा था। आकर्षक मूछों वाले शिवकुमार के पिताजी एक मोटे लकड़ी के टुकड़े को बसुले से छील रहे थे। उनके रोबदार व्यक्तित्व, काम करने के सिद्धहस्त अंदाज और बोलने के तरीके से प्रभावित हुआ मैं। शिवकुमार ने बताया कि भट्ठा पर धधकते कोयले की गर्मी से बचने के लिये वहां काम करने वाले मोटी खड़ाऊं पहनते हैं। उसके पिताजी वही बना रहे हैं।

शिवकुमार के पिता राजबली विश्वकर्मा बसुले से खड़ाऊँ का बेस बनाते हुये।

शिवकुमार के पिताजी ने अपना नाम बताया राजबली विश्वकर्मा। मुझे बैठने के लिये एक कुर्सी मंगाई। सादर बिठा कर मुझसे उन्होने आने का प्रयोजन पूछा।

“आपके पास आने के पहले मैं द्वारिकापुर के भोला विश्वकर्मा के पास गया था। उन्होने मचिया बनाने के लिये चार दिन का समय मांगा और टालमटोल करते दो हफ्ते गुजार दिये। तब मुझे लगा कि शिवकुमार से बात की जाये। उन्होने सुझाया कि आपसे मिल लूं।”

राजबली जी ने मेरी बात सुन कर अपने पोते से मचिया के गोड़े (पाये) घर के अंदर से मंगवाये। पूछा कि क्या ऐसे ही चाहियें? उनपायों की बनावट और लकड़ी – दोनो ही अच्छे लगे।

राजबली जी के यहां के मचिया के गोड़े (पाये)।

उन्होने पाटी के लिये लकड़ी और बांस, दोनो का विकल्प बताया। यह भी कहा कि लकड़ी की पाटी मंहगी पड़ेगी और बांस की पाटी सस्ता होने के बावजूद ज्यादा मजबूत होगी। मैंने उन्हे दोनो प्रकार के एक एक नमूने बनाने को कहा। मचिया के गोड़े वे सामान्य के हिसाब से 12 इंच के रखना चाहते थे। मैंने कहा कि दो इंच बढ़ा कर रखें। शहरी आदमी बहुधा घुटने के दर्द के मरीज होते हैं। उनके लिये मचिया थोड़ी ऊची हो तो बेहतर होगी। और अगर बाद में लगे कि पाये बड़े हैं तो काट कर छोटे तो किये जा सकते हैं। राजबली मेरी बात से सहमत दिखे।

नाप और डिजाइन तय होने पर राजबली ने कहा – “मेरा काम (भोला की तरह) टालमटोल का नहीं है। बनने में जितना समय लग सकता है, उतने की ही बात करूंगा मैं और समय पर देने का पूरी कोशिश करूंगा। आप सोमवार को तैयार हुआ मान कर चलिये। बनते ही शिवकुमार आप को फोन पर बता देगा।”

“बहुत अच्छा! आपकी बात से लगता है कि मचिया बन जायेगा और अच्छा ही बनेगा!”

राजबली जी से तो पहली बार मिला था मैं। पर उनके लड़के और पोतों – ईश्वरचंद्र और विद्यासागर – से मेरा कई बार काम कराना हो चुका है। वे सभी बहुत सज्जन और नैतिकता से ओतप्रोत हैं। ज्यादा दाम मांगने या समय पर उपस्थित न होने की बात उनके साथ नहीं हुई। राजबली का व्यक्तित्व भी प्रभावशाली लगा। पहले पता होता कि राजबली कारपेण्टर का काम करते हैं, तो भोला की बजाय उनसे ही सम्पर्क करता।

बहरहाल मुझे दो – तीन दिन बाद अच्छी गुणवत्ता का मचिया मिलने की उम्मीद हो गयी है। हमने बनारस की गलियों को तलाशने का विकल्प फिलहाल ताक पर रख दिया है। रघुनाथ जी की ट्वीट को एक महीना हो गया है। अब तक गांव में मचिया बन नहीं सकी। लोगों ने यह भी कहा कि काहे मचिया की सोच रहे हैं आप। इससे बढ़िया तो प्लास्टिक का काफी ऊंचा वाला अच्छा पीढ़ा हो सकता है।

पर लोग क्या जानें एक मचिया की तलब को। बहुत कुछ वैसी ही होती है, जैसे राजबली जी को खड़ाऊँ बनाते देख मैंने उनसे कहा कि मेरे लिये भी एक जोड़ा खड़ाऊँ बना दें।

खैर, खड़ाऊं तो बनना, पहनना बाद में; फिलहाल मचिया बने। अब दाव अब राजबली जी की साख पर है! 😀

सोम (या मंगलवार तक इंतजार) करता हूं।

राजबली द्वारा बनता मोटे तल्ले का खड़ाऊँ

चाय की चट्टी, मोही और माधुरी

खुद ही छोटा बच्चा। चार साल का होगा। अभाव में पलता। पर कुछ भी मिलने पर अपनी छोटी बहन को देने की बात पहले मन में आयी उसके। कौन सिखाता है यह संस्कार। यह स्नेह।


चाय की चट्टी पर खड़ा था वह बच्चा। एक टी-शर्ट और नेकर में। नंगे पैर। नेकर पीछे से कुछ ज्यादा ही फटी थी, जिससे उसका पीछे का भाग झांक रहा था। एक नाक से पानी बह रहा था। सांवला रंग। आकर्षक चेहरा। भावपूर्ण आंखें। पर कम से कम दो दिन से नहाया नहीं था।

मैने नाम पूछा। बताया – मोही।

फेसबुक नोट्स में 21 अप्रेल 2016 की पोस्ट। फेसबुक ने नोट्स फेज आउट कर दिये, इस लिये ब्लॉग पर सहेजी। पर यह छोटी पोस्ट पुरानी नहीं पड़ी है!

कहां रहते हो? उसने हाथ से बताया – रेलवे लाइन के उस पार।

अरुण (चाय की चट्टी पर बैठे मालिक) को मैने कहा कि पांच रुपये की पकौड़ियां उसे दे दे। मैने अरुण को पकौड़े के पैसे दिये। कागज में रख कर पकौड़ियां उस बच्चे को दीं तो कागज के साथ ही लपेट उसने दोनो हाथों में ले लिया।

मैने कहा – खा लो।

“नाहीं। घरे लई जाब। ओके देब। छोट बा हमसे – माधुरी। (नहीं घर ले जाऊंगा। मुझसे छोटी है माधुरी। उसको दूंगा।)”

खुद ही छोटा बच्चा। चार साल का होगा। अभाव में पलता। पर कुछ भी मिलने पर अपनी छोटी बहन को देने की बात पहले मन में आयी उसके। कौन सिखाता है यह संस्कार। यह स्नेह।

एक कोने से मेरी आंख नम हो आयी।

Mohi the kid
चाय की चट्टी पर मोही। हाथ में लिये है कागज में लपेटी पकौड़ियां।

पहले की कुछ टिप्पणियाँ –

दिनेशराय द्विवेदी – आप की बेहतरीन पोस्टों में से एक।

Gyanendra Tripathi – स्नेह संस्कारगत नहीं होता वह तो प्रकृति प्रदत्त होता है। संवेदनशीलता मूल में होनी चाहिये, स्नेह अनुभव में उतर जाता है, फिर दुनिया की बाक़ी चीज़ें फीकी हो जाती हैं।

Priyankar Paliwal – दिखने वाली भौतिक गरीबी से ज्यादा खतरनाक है मन की गरीबी . भावों की गरीबी . जहां भावों की गरीबी नहीं है वहां अभाव नहीं खलता, प्रेम पलता है . छुटकी माधुरी का यह चार साल का संरक्षक, उसका यह अभावग्रस्त पर भाव-समृद्ध बड़ा भाई मोही यानी ‘मोही द ग्रेट’ अपने आचरण से यह उद्घोषणा करता है कि मनुष्य का मूल स्वभाव प्रेम है, प्रतिस्पर्धा नहीं . सावधान रहें आपकी रिपोर्टिंग अब एक कवि की रिपोर्टिंग होती जा रही है . 🙂


पद्मजा पाण्डेय के नये साल के ग्रीटिंग्स

इसमें चीनी पाण्डेय ने बहुत कुछ सीखा। अपने रोज के मिलने वाले, घर में काम करने वालों और आसपड़ोस के बच्चों से जुड़ाव सीखना एक सही बात है! गांव की समझ उससे मजबूत होती है।


पद्मजा (चीनी, चिन्ना) बहुत दिनोंं से कह रही थी नये साल को मनाने के लिये। स्कूल बंद होने से बच्चे को कोई नया करने को चाहिये। तब मैंने चीनी के साथ सोचा कि ग्रीटिंग कार्ड बनाये जायें। जब मेरे बच्चे छोटे थे तब यह सब मैं खाली समय में उनके साथ करती थी। ढाई तीन दशक बाद अब फिर मन हुआ वही सब करने के लिये अपनी पोती के साथ।

ग्रीटिंग कार्ड

महराजगंज के दुकान वाले सज्जन ने ग्रीटिंग कार्ड के बारे में पूछने पर कहा – आजकल ग्रीटिंग कौन खरीदता है मैडम ह्वाट्सएप्प के जमाने में!

स्कूल नहीं चल रहे तो दुकान में बच्चों के लिये चार्ट पेपर भी मिलना कठिन था, पर उनकी दुकान पर मोटा कागज पड़ा मिल गया। इतना मोटा भी नहीं था, पर कामचलाऊ तो था ही। दुकानदार को मैंने बताया कि घर पर ही पोती को सिखायेंगे ग्रीटिंग कार्ड बनाना।


पद्मजा के बारे में अन्य पोस्टें –

  1. स्कूल बंद हैं तो घर में ही खोला एक बच्चे के लिये स्कूल
  2. पद्मजा के नये प्रयोग
  3. चीनी पाण्डेय ने बनाई चिड़िया की कहानी
  4. कोविड19 लॉकडाउन काल में चिन्ना पांड़े – रीता पाण्डेय
  5. चिन्ना पांड़े, लॉयन और मटर पनीर
  6. पद्मजा पान्दे, चूनी धईके तान्दे…

मोटा पेपर देख कर चिन्ना बहुत उत्साहित हुई। उसने कहा कि ग्रीटिंग कार्ड बनाने हैं और वाल हेंगिंग भी। कितने बनाने हैं उसकी गिनती होने लगी। एक एक बच्चे को ग्रीटिंग कार्ड देने में संख्या बहुत बड़ी हो रही थी। इसलिये यह तय किया गया कि एक परिवार को एक कार्ड और एक चाकलेट दिया जायेगा। उसमें उस परिवार के सारे बच्चे कवर हो जायेंगे।

वाल हैंगिंग

अपनी बिटिया के साथ तो मैं सुतली की वाल हैंगिंग, रुमाल में कढ़ाई, गुड़िया बनाना, साइंस की वर्कबुक में चित्र बनाना और तरह तरह के अन्य प्रॉजेक्ट्स में व्यस्त रहती थी। ड्राइंग और क्राफ्ट उनकी पढ़ाई का जरूरी हिस्सा हुआ करता था। अब पता नहीं स्कूलों में इस तरह के क्लास हुआ करते हैं या नहीं। चिन्ना के साथ साथ आगे पता चलेगा। आखिर, बच्चों के पूरे विकास के लिये हर तरह की क्रियेटिविटी तो बहुत जरूरी है।

ड्राइवर अशोक को ग्रीटिंग देती पद्मजा

इस साल चिन्ना स्कूल बंद होने के कारण अपने बाबा के साथ घर के बगीचे में घूम घूम कर साइंस और भूगोल की जानकारी लेती रहती है। घर के पेड पौधों, जीवों, सूरज के सवेरे से शाम तक घूमने और रात में चांद तारों की पोजीशन देखने परखने से उसे बहुत कुछ समझ आ रहा है। पर यह क्राफ्ट वाली रचनात्मकता भी मेरे ख्याल से जरूरी है।

ग्रीटिंग आदान प्रदान के बाद नीलम आण्टी (पतली वाली) और कुसुम आण्टी के साथ पद्मजा । नीलम और कुसुम घर में काम करती हैं।

मेरा नाती, विवस्वान तो अब छठी कक्षा में है। वह तबला बजाना, स्केच और पेण्टिंग करना सीख चुका है। आजकल कोडिंग सीख कर एप्प बनाने लगा है। चिन्ना को भी वह सब या उसी तरह की अपनी रुचि के मुताबिक करना है। इसकी डांस में रुचि है। गांव में उसे नृत्य कैसे सिखाया जा सकता है, अभी समझ नहीं आ रहा। वह कप्यूटर पर अपने बाबा के साथ पावरप्वाइण्ट बना कर अपनी बात समझाने की कला सीख गयी है। कभी लगता है वह अच्छी टीचर बनेगी।

पेपर वाले अंकल को ग्रीटिंग देते समय पद्मजा। अखबार वाले अपने साथ सेल्फी ले रहे थे चिन्ना की!

फिलहाल हम लोगों ने ग्रीटिंग्स और वाल हैंगिंग बनाये। इसमें चीनी पाण्डेय ने बहुत कुछ सीखा। अपने रोज के मिलने वाले और घर में काम करने वालों से पारिवारिक जुड़ाव सीखना एक सही बात है! गांव की समझ उससे मजबूत होती है।

उसके अलावा आस पड़ोस के बच्चे भी आये जिनको ग्रीटिंग कार्ड में ज्यादा रुचि नहीं थी, पर जो चिन्ना की दी चॉकलेट, घर के परिसर में खेलने और झूले पर बैठने-झूलने तथा चिन्ना की साइकिल चलाने में ज्यादा उत्साहित थे। वे दिन भर आते रहे और चीनी हो भी सामाजिक व्यवहार करने के अवसर मिले। हम लोग बच्चों के शोर से ऊब गये पर चिन्ना नहीं!

और यह सब तुच्छ से कागज पर कलर पेंसिल से कुछ उकेर कर ग्रीटिंग कार्ड बनने से हो पाया।


सुंदर नाऊ

सिर पर बालों का बोझ सामान्य से ज्यादा होने पर अकल भी कुंद होती है – ऐसा अहसास मुझे होता है। अलबर्ट आइंस्टाइन के बारे में मेरी सोच है कि वे और भी जोरदार वैज्ञानिक होते अगर उनके पास नियमित आने वाला नाऊ होता। भले ही सुंदर की तरह सीधा सादा गंवई नाऊ होता!


सुंदर एक निहायत सामान्य नाऊ है। सीधा सादा। ओल्ड फैशंड। वैसे गांव में नया फैशन भी क्या होता है? मेरे घर में बाल काटता रहा है पिछले चार साल से। पिताजी थे तो हर हफ्ते आता था। उनकी दाढ़ी एक बार बनती थी सप्ताह में। रविवार को आता था। उसका बहुत इंतजार रहता था पिताजी को। न आने पर बैचैन हो जाते थे। सुंदर के लिये नहीं, दाढ़ी बनवाने के लिये। कई बार तो उसके देर करने पर अकेले घर से निकल नाई की दुकान पर जाने का उपक्रम किया था उन्होने। पर डिमेंशिया ग्रस्त पिताजी पर कड़ी नजर रखी जाती थी और उन्हें अनुनय विनय से और न मानने पर जोर देकर भी घर में रखा जाता था। अगर सुंदर एक दिन नहीं आता था तो मैं उनकी शेविंग करने की कोशिश करता या ड्राइवर के साथ उन्हे नाई की दुकान पर भेजता था।

पर सुंदर ने नागा बहुत कम किया। रेलवे स्टेशन पर अपनी गुमटी वाली नाई की दुकान में वह जितना कमाता; उससे काफी ज्यादा हमारे घर पाता था।


एक अन्य पोस्ट पढ़ें – गांव का नाई । कोरोनाकाल में नाई व्यवसाय की गांव में स्थिति पर है यह पोस्ट।


पिताजी के देहावसान के बाद सुंदर की जरूरत नियमित नहीं रह गयी। मैं और मेरा लड़का, दोनो अपनी शेविंग खुद कर लेते हैं। मेरे बाल सुंदर ही काटता है, पर उम्र बढ़ने के साथ साथ बाल पतले और कम घने होते जा रहे हैं। केश कर्तन अप्रासंगिक होता जा रहा है। दो-तीन महीने में एक बार बाल कटवाने की जरूरत पड़ती है। लड़के को (या ज्यादा कहें तो उसकी पत्नी को) सुंदर का पुरनिया स्टाइल बाल काटना पसंद नहीं है। अगर विकल्प होता है तो वह बाहर सैलून पर जा कर बाल कटवाता है।

“बफर (बफे)भोज होये तो दो तीन मन की पूड़ी छनाये के बाद ही शुरू करना चाहिये। ताजा गरम देने के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिये। पूड़ी ठण्डी भी रहे तो कोई फरक नहीं। खाना तो इत्मीनान से हो।”

सुंदर शर्मा, नाऊ

मेरे बाल कटवाने के लिये अब सुंदर का तकाजा करना पड़ता है। इधर उधर दिखने पर मैं या मेरा ड्राइवर अशोक सुंदर को बोलते हैं आने के लिये। पर कभी सुंदर नहीं आता तो कभी हम बटोही (साइकिल) के साथ भ्रमण पर निकले होते हैं। इस कारण बाल बढ़ते चले जाते हैं। कनपटी को छूते हैं और फिर कनपटी को ढ़ंकने लगते हैं। बाल का बढ़ना बोझ सा लगने लगता है। सिर पर बालों का बोझ सामान्य से ज्यादा होने पर अकल भी कुंद होती है – ऐसा अहसास मुझे होता है। अलबर्ट आइंस्टाइन के बारे में मेरी सोच है कि वे और भी जोरदार वैज्ञानिक होते अगर उनके पास नियमित आने वाला नाऊ होता। भले ही सुंदर की तरह सीधा सादा गंवई नाऊ होता!

मेरे बाल काटता सुंदर नाऊ

कोरोना काल में सुंदर को हाथ और उपकरण साबुन से मल मल कर धोने और उसके बाद मुंह पर कस कर गमछा लपेट कर ही बाल बनाने दिया जाता था। अब संक्रमण कुछ थमने के साथ थोड़ी ढील हो गयी है। हाथ और उपकरण तो धो-पोंछ कर साफ करता ही है। उपकरण के नाम पर केवल कैंची और तोड़ कर आधा ब्लेड लगाने वाला उस्तरा भर उसका होता है। उसकी कटोरी-कंघी की बजाय घर की कटोरी-कंघी उपयोग की जाती है। शरीर के ऊपरी भाग पर गमछा/शॉल भी घर का ही लपेटा जाता है। अब वह मुंह पर गमछा नहीं लगाता। उससे कई बार कहा है कि हमारे घर के उपयोग के लिये एक कैंची और उस्तरा खरीद कर ले आये। पैसे हम देंगे। पर वह ऐसा करता नहीं। शायद अपने उपकरण पर ही हाथ सेट है उसका।

अभी काफी बिजी रहा है सुंदर। दो एक लोग सर्दी के मौसम में टपक गये तो उनके कर्मकाण्ड में वह लिप्त हो गया। कल बमुश्किल समय निकाला उसने हमारे घर के लिये। बाल काटते समय बतियाता रहा। लगभग मोनोलॉग।

“तेरही में बफर भोज (बफे खाना) रखते हैं पर पूड़ी के लिये बहुत मशक्कत करनी होती है। पांत बैठी हो तो पूड़ी देर से आने पर लोग पानी पीते बैठे रहते हैं; पर बफर में तो बहुत धक्की धक्का हो जाता है। अब फलाने के यहां तो मैंने खाया ही नहीं। बदन में वैसे भी अब जोर नहीं है। खाने में लगता तो धक्का लात खाता। बफर भोज होये तो दो तीन मन की पूड़ी छनाये के बाद ही शुरू करना चाहिये। ताजा गरम देने के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिये। पूड़ी ठण्डी भी रहे तो कोई फरक नहीं। खाना तो इत्मीनान से हो।”

बाल काटने के बाद वह मेरी पत्नीजी को बुलाता है – “बहिन आई क देखि ल। नाहीं त बाद में कहबू कि ठीक नाहीं कटा रहा।” बहिन (मेरी पत्नी पूरे गांव की बहिन-फुआ/बुआ हैं 😀 ) आ कर बारीकी से निरीक्षण करती हैं और तब अप्रूवल होता है। पत्नी द्वारा यह लास्ट इंस्पेक्शन की सुविधा केवल गांव में ही हो सकती है। 🙂

बाल काटने के बाद सुंदर सिर की मालिश अनुष्ठान की रस्म अदायगी करता है। “अब जोर नाहीं बा। उमर होई गई बा।” वह यह कहने से मालिश की गुणवत्ता के बारे में कोई शिकायत का विकल्प ही खत्म कर देता है। बदले में मैं उसे कान के अंदर और कान पर उगे बालों को ठीक से साफ करने की हिदायत देता हूं। पूरा बाल काटना पंद्रह मिनट में खतम हो जाता है। उसके बाद मेरे लड़के का नम्बर लगता है।

उसके बाद मेरे लड़के का नम्बर लगता है।

आज बाल कटाने के बाद दो तीन महीने तक सुंदर की जरूरत नहीं रहेगी। कभी कभी सोचता हूं कि पिताजी की तरह हफ्ते में एक बाद सुंदर से हजामत बनवाना शुरू कर दूं। पर अभी तक किसी नाई से अपनी दाढ़ी नहीं बनवाई। उम्र बढ़ने पर शायद नाऊ की जरूरत पड़े दाढ़ी बनाने के लिये। पर तब तक तो सुंदर भी फेज आउट हो जायेगा। उसके परिवार के लोग तो बम्बई में सैलून मेंं काम करते हैं। तब – आज से दस पंद्रह साल बाद – कोई नया सिस्टम बनाना होगा। तब तक सुंदर जैसे लोग गांव में रहेंगे, बचेंगे भी या नहीं। तब गांव गांव रहेगा कि छोटा मोटा सबर्ब हो जायेगा?

पर काहे इतना लम्बा सोचा जाये!? अभी तो सुंदर शर्मा आ ही रहे हैं!


अलाव

प्रज्वलित होती आग को निहारते समय अगर आदमी मौन हो कर सोचने की प्रक्रिया में उतरे तो जीवन, उसकी सार्थकता, मरण और मरण के आगे के कई प्रश्न तैरने लगते हैं। उन प्रश्नों और विचारों को सयास पकड़ना और भविष्य के लिये संंजोना एक अभूतपूर्व अनुभव है।


कल आसमान खुला नहीं। सवेरे सूरज समय पर दिखे पर उनकी आभा नहीं थी। आसमान में आग के गोले की तरह नहीं, माथे की टिकुली जैसे थे। एक केसरिया रंग का छोटा सा बटन। उसके बाद बादल ही छाये रहे दिन भर।

आसमान में आग के गोले की तरह नहीं, माथे की टिकुली जैसे थे सूरज

इन सर्दियों के मौसम में पहला ही दिन था, जब कऊड़ा (अलाव) की जरूरत महसूस हुई। और जब अलाव जला तो पूरे दिन जलता रहा।

पहले अलाव का कल का ट्वीट

गर्म लकड़ियों के टुकड़े चिमटे की सहायता से अलाव से निकाल कर एक पानी के तसले में ठण्डा किये गये और काफी चारकोल भी बनाया गया। यह चारकोल घर के अंदर सिगड़ी जला कर गर्मी लाने के लिये उपयोगी रहेगा। आशा है, आने वाले महीना डेढ़ महीना में कुछ दिन तो ऐसे होंगे ही जिसमें घर के अंदर गर्माहट के लिये सिगड़ी की जरूरत हो। पिछली सर्दियों में महीनों सिगड़ी जलानी पड़ी थी और लकड़ी का कोयला बहुत मंहगे दाम (लगभग दूध के भाव) खरीदना पड़ा था। इस साल हम पहले से ही सतर्क हो गये हैं। घर में जलाऊ लकड़ी पर्याप्त है। अलाव जला कर बैठने और वहां चारकोल बनाने का काम भी चलेगा।

कल अलाव में शकरकंद और आलू भूने गये। भुने कंदों का स्वाद लाजवाब था। शाम के समय और भी शकरकंद बाजार से मंगवा ली है। यह भी पढ़ा है कि मधुमेह का मरीज भी थोड़ा बहुत शकरकंद खा सकता है। सो मैंने सीमित मात्रा में भुनी कंद खाई। फेसबुक और ट्विटर पर सलाह मिली की मूंगफली और बैंगन भी अलाव में भूने जा सकते हैं। उनके साथ भी, आने वाले दिनों में प्रयोग होंगे।

अलाव का इतिहास मानव के सभ्य होने का इतिहास है। आग के किनारे गोलबंद आदमी सामाजिक बना। प्रज्वलित होती आग को निहारते समय अगर आदमी मौन हो कर सोचने की प्रक्रिया में उतरे तो जीवन, उसकी सार्थकता, मरण और मरण के आगे के कई प्रश्न तैरने लगते हैं। उन प्रश्नों और विचारों को सयास पकड़ना और भविष्य के लिये संंजोना एक अभूतपूर्व अनुभव है।

यह अनुभव कल कुछ सीमा तक मिला और आगे कई कई दिनों तक मिलता रहेगा। 🙂


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अलाव हमारे लिये तो आवश्यकता कम, सर्दियों का अनुभव ज्यादा है। पर गांव में घूमते हुये जगह जगह जलते अलाव और उसके इर्दगिर्द ठिठुरते बैठे लोगों को देख कर स्पष्ट होता है कि कऊड़ा सर्दियां काटने की अनिवार्यता है। रात किसी प्रकार लोग गुजारते हैं। आजकल धान का पुआल इफरात में उपलब्ध है। उसे जमीन या तख्ते पर बिछा कर लोग सोते हैं। भोर होते ही उठ कर कऊड़ा जलाने का उपक्रम करने लगते हैं। पिछले दिन जो भी घास-फूस, टहनियां, बटोरन जमा की होती हैं; उनको जमा कर अलाव जलता है और उसी के इर्दगिर्द सवेरे का भोजन बनाने का भी उपक्रम होता है। सवेरे पांच बजे से नौ-साढ़े नौ बजे तक अलाव की मॉर्निंग शिफ्ट चलती है। शाम पांच बजे फिर अलाव जलाने की जुगत मेंं लग जाते हैं ग्रामीण। वैसे शाम का कऊड़ा उतना नहीं प्रचलित जितना सवेरे का।

दो साल पहले सिद्धिनाथ मंदिर में बहेतू पशुओं की गौशाला चलाने वाले जोगी बाबा पर ब्लॉग पोस्ट लिखी थी – जोगी बाबा – सिद्धिनाथ मन्दिर का साधू और अनाथ गौवंश को पालनेवाला। वह विलक्षण साधू दिन भर धूनी (अलाव) जलाये रहता था। सर्दियों में उस अलाव और साथ में चाय/चिलम की उपलब्धता से अनेक श्रद्धालु जुट जाते थे। उन्हीं के माध्यम से जोगी बाबा को अपने आश्रम की गौशाला के लिये स्वयमसेवक मिल जाते थे।

धूनी के पास मेरे लिये चाय बनाते जोगी बाबा। चित्र तीन साल पहले का है।

अलाव के महत्व को मैंने जोगीबाबा के सम्पर्क में गहराई से अनुभव किया था। मैं उनसे तीन साल पहले मिला था। अभी भी उनके बारे में समाचार मिलता है कि वे उसी प्रकार निराश्रित गायों को आश्रय प्रदान कर रहे हैं। उनके इस कार्य में अलाव/धूनी की भी एक भूमिका है।

रात में अलाव बुझाने का समय हो गया है!

आज का अलाव तो उत्सव जैसा रहा। वह स्थान – पोर्टिको में एक ओर, गमलों और पौधों से कुछ दूर जिससे अलाव का धुआँ वनस्पति पर दुष्प्रभाव न डाले – एक रंगमंच सा रहा; जहां पात्र आते जाते रहे। शाम के समय तो राजन भाई भी आ गये। वे भी देर तक बैठे रहे, अलाव की गर्मी तापते। मैं जिस विचार में डूबने और भूत-भविष्य-वर्तमान पर अपनी सोच कुरेदने की बात ऊपर कर रहा था; उसका समय तो आगे आने वाले दिनों में आयेगा। तब देखें वह सब धुयें की तरह तैर कर निकल जायेगा या फिर भविष्य के जीवन में बदलाव के सूत्र भी उसमें निकलेंगे।

बहरहाल सर्दी का मौसम, कोहरा, बादल और लम्बे समय तक कऊड़ा/अलाव के समीप बैठना एक ऐसा टाइम ड्यूरेशन है, जिसकी प्रतीक्षा का समय खत्म हो गया है। अनुभूतियों का समय आ गया है।

मस्त रहो, जीडी!