सरसों के खलिहान की लिपाई

फसल इस साल बढ़िया है। खेतों में दिखता है कि सरसों, अरहर, गेंहूं – सब अच्छा ही हुआ है। किसान और अधियरा, दोनो ही प्रसन्न होने चाहियें। महिला, जो खलिहान लीप रही थी, उसके कथन में भी सामान्य प्रसन्नता ही थी, मायूसी नहीं।


सवेरे इनारा से पानी खींचते देखा एक आदमी को। यह कुंआ लगभग परित्यक्त है। किसी को पानी निकालते देखा नहीं था। नयी बात थी। पूछा – क्या पानी पीने लायक है कुंये का?

कुंये से पानी खींचता आदमी

“पीने के लिये नहीं, उस खलिहान लीपने के लिये पानी चाहिये, वहीं ले कर जा रहा हूं।” – उस व्यक्ति ने महुआरी की ओर इशारा किया। वहां एक महिला पेड़ के नीचे की जमीन बुहार रही थी। मैं वहां से चला गया। वापस लगभग दस मिनट बाद लौटा तो पाया कि महुये के पेड़ के नीचे जमीन बुहारी जा चुकी थी। गोबर से लीपने का काम चल रहा था। साइकिल रोक मैं चित्र लेने गया तो महिला, जो जगह लीप रही थी, खड़ी हो गयी और पुरुष एक झाड़ू से पानी और गोबर जमीन पर फैलाने लगा।

पुरुष एक झाड़ू से पानी और गोबर जमीन पर फैलाने लगा।

महिला ने बताया कि सरसों की पिटाई करने के लिये वे जमीन तैयार कर रहे हैं। सरसों बगल के उमेश पण्डित के खेत की है। वे उसे अधिया पर जोतते हैं। सरसों की कटाई हो चुकी है। सूख भी गयी है। अब पीट कर उससे सरसों के दाने निकालने का समय है।

Mustard field
खेत में सरसों के गठ्ठर बनाने में लगा अधियरा दम्पति

यह खलिहान लिपाई के दो दिन बाद भी वहां सरसों के ढ़ेर नहीं नजर आये। तब मैंने पास के खेत की ओर नजर घुमाई तो उस अधियरा दम्पति को सूखी सरसों की फसल के गठ्ठर बनाने के उपक्रम में पाया। वे दोनों मिल कर पुआल को उमेठ कर रस्सी बना रहे थे। उसी रस्सी से गठ्ठर बांधे जाने थे। आदमी के पास उसकी चुनौटी – जिसमें चूना और सुरती (कच्चा तम्बाकू) होता है – रखी थी। एक गरम कपड़ा भी था। शायद सवेरे सवेरे निकलने पर थोड़ी सर्दी से बचाव के लिये पहनता हो। पास में प्लास्टिक का मग भी था, जिसमें वे पानी लाये होंगे पुआल को गीला कर रस्सी बनाने के लिये नरम करने को।

मैंने यूंही बात करने के लिये पूछा – गठ्ठर कितने वजन का होता है?

“नाहीं बताई सकित जीजा। ओतना होथअ जेतना उठावा जाई सकई (नहीं बता सकता जीजा। उतना होता है, जितना उठाया जा सके)।” – उसने बताया। पता चला कि उसका नाम फुलौरी है। फुलौरी पाल।

इस गांव का मैं सार्वजनिक जीजा या फूफा हूं। आखिर गांव मेरी पत्नीजी का है! 😆

फसल इस साल बढ़िया है। खेतों में दिखता है कि सरसों, अरहर, गेंहूं – सब अच्छा ही हुआ है। किसान और अधियरा, दोनो ही प्रसन्न होने चाहियें। महिला, जो खलिहान लीप रही थी और मुझसे बात कर रही थी, उसके कथन में भी सामान्य प्रसन्नता ही थी, मायूसी नहीं।

धान, गेहूं और सरसों मुख्य फसलें हैं इस इलाके की। जोत छोटी है और जनसंख्या ज्यादा। बेचने के लिये बहुत सरप्लस नहीं होता है। अधियरा तो अपने उपभोग भर का ही पाता होगा। जमीन का मालिक शायद बेच पाता हो। धान और गेंहू तो नहीं, अरहर और सरसों मुझे खरीद कर ही लेने होते हैं। सरसों के खलिहानों से कोई बेचने वाला मिले और सरसों मिल सके तो मैं पचास साठ किलो लेना चाहूंगा। उससे तेल पेराई से साल भर की जरूरत पूरी हो सकेगी। वर्ना तो सलोनी ब्राण्ड कच्ची घानी के तेल के पाउच/बोतल ही खरीदे जाते हैं।

रस्सी बटता अधियरा दम्पति

सरसों के खलिहान को ध्यान से देखने का मेरा मकसद वही है। और गांव में रहने पर यह परिवर्तन धीरे धीरे आया है। शायद कुछ समय में सरसों बेचने वाले किसान को भी तलाश लूं! 🙂


#गांवपरधानी की रहचह

ढूंढ़ी यादव तुरंत हाथ जोड़ने का पोज बना लिये। उन्होने बताया कि सूरज उगते ही प्रचार में निकल देते हैं और यही करते रात हो जाती है। उन्होने किरपा बनाये रखने का एक बार और अनुरोध किया। यह भी बताया कि अपनी जीत के लिये आश्वस्त हैं।


भगवानदास साफ नीले रंग के कुरते और झक्क सफेद पायजामे में खड़े थे, उमेश पण्डित की दुकान के पास। गले में साफ गमछा। एकबारगी लगा कि वह भी तो परधानी में उम्मीदवार नहीं हो गये?! पर वैसा नहीं था। परधानी ओबीसी के लिये आरक्षित हो गयी है; उनकी जात बिरादरी उसमें नहीं आती। वह बोल रहे थे – “एतना जने खड़ा होत हयें। सब बोटई मांगत हयें। केऊ बाटी चोखा खियावई क नाम नाहींं लेत बा। (इतने लोग खड़े हो रहे हैं प्रधानी के लिये; सभी वोट ही मांग रहे हैं। कोई बाटी-चोखा खिलाने के लिये हामी नहीं भर रहा।)”

उमेश दुबे (बांंये) और भगवानदास सरोज

मैंने फोटो लेने के लिये अपना फीचर फोन निकाला तो भगवानदास अटेंशन की मुद्रा में आ गये। उन्हे लग गया कि फोटो खिंचवानी है।

भगवानदास मेरे सोशल मीडिया के क्लासिक पात्र हैंं। पहले वह अपने घर के पास दिखते थे; और सवेरे की साइकिल सैर के दौरान ही दिखते थे; तो तुरंत खड़े हो कर मुझे अंगरेजी में “गुड नाइट सर” कहते थे। कालांतर में किसी ने उन्हे गुड नाइट की बजाय गुड मॉर्निंग सिखाया होगा। वर्ना साल दो साल तक तो वह मुझे गुड नाइट ही करते रहे! अंग्रेजी में इस हिंदी पट्टी का हाथ बहुत ही तंग है! 😆

आगे एक जगह परधानी के टटके (टटके=ताजा) पोस्टर लगे और फटे दोनो दिखे। प्रधानी ओबीसी महिला के लिये आरक्षित है। इसलिये महिला की फोटो पोस्टर में लगाना मजबूरी है। पर उसमें पति, श्वसुर या पुत्र का नाम जरूर लिखा जाता है। असल चुनाव तो पति/श्वसुर/पुत्र ही लड़ रहे होते हैं।

एक नोच कर फैंका गया पोस्टर

एक जमीन पर फैंका पोस्टर किसी निर्मला देवी का था। उनके श्वसुर स्वर्गीय लक्खन यादव और पति या पुत्र अनिल कुमार यादव का नाम था। यह पोस्टर कई और दीवारों पर लगा भी दिखा। लगता है कि रात में किसी ने लगाये होंगे और सवेरे सवेरे किसी अपोजिट पार्टी वाले ने नोच दिया होगा। बहरहाल पोस्टर लगने की शुरुआत हो गयी है। अब दर्जन भर उम्मीदवार गांव की सभी लावारिस और विज्ञापन के लिये उपयुक्त दीवारें एक दो दिन में पोस्टरों से पाट देंगे।

महिलायें खड़ी हैं परधानी चुनाव में पर प्रचार पुरुष ही कर रहे हैं। ढूंढ़ी यादव मुझे दिख गये लेवल क्रासिंग पर। चार दिन पहले उनसे मुलाकात हो चुकी थी।

ढूंढ़ी यादव के बारे में छ मार्च की ट्वीट

मैंने उन्हे कहा कि पहले वाली फोटो अच्छी नहीं आयी थी, एक बार और खींचनी है। वे तुरंत हाथ जोड़ने का पोज बना लिये। उन्होने बताया कि सूरज उगते ही प्रचार में निकल देते हैं और यही करते रात हो जाती है। उन्होने किरपा बनाये रखने का एक बार और अनुरोध किया। यह भी बताया कि अपनी जीत के लिये आश्वस्त हैं; बावजूद इसके कि उनकी बिरादरी से ही तीन चार और खड़े हो गये हैं। “आप का आसीर्बाद रहा तो सीट निकाल ले जायेंगे”।

ढूंढ़ी यादव

घर वापस लौटा तो सुंदर नाऊ पहले से आ चुके थे। मेरे बाल काटने का दिन था। पर सुंदर मुख्यत: परधानी के प्रचार के लिये आये थे। साथ में उस्तरा, कैंची, कंघी आदि लिये थे। सो बाल भी कटाये मैंने। पैसे देते समय सुंदर ने कहा – “पईसा चाहे जिनि द। वोटवा जरूर दई दिय्ह्य (पैसे की कोई खास बात नहीं, वोट जरूर दे दीजियेगा)।” खैर सुंदर नाऊ से बाल कटवाई के दौरान हुये संवाद अगली #गांवपरधानी पोस्ट के लिये। 🙂

मेरे घर पर सुंदर नाऊ पहले ही आ चुके थे। वे भी परधानी लड़ रहे हैं।