सुंदर नाऊ की पतोहू #गांवपरधानी उम्मीदवार

साल भर बाद विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। यद्यपि प्रधानी का चुनाव पार्टी आधार पर नहीं हो रहा पर हर एक पार्टी अपने अपने पक्ष के प्रधान जितवाने का जोर लगायेगी। और ऐसा नहीं कर रही तो जल्दी ही करेगी भी। इस लिये सुंदर नाऊ की सिधाई की अपनी सशक्त ब्राण्ड वैल्यू है!


सुंदर नाऊ मेरे ब्लॉग के एक प्रतिष्ठित पात्र हैं। आपने उनके बारे में न पढ़ा हो तो कृपया लिंक खोल पढ़ने की कृपा करें।

मैं कई दिनों से सुन रहा था कि सुंदर परधानी के उम्मीदवार हैं। पर वे मुझसे मिले नहीं थे। वैसे भी गांव की राजनीति में मेरी कोई हैसियत तो है नहीं कि मेरा कृपापात्र बनने का कोई यत्न करे। किसी को रेलवे से कोई कामधाम (मसलन नौकरी की चाह) होता है तो जरूर चला आता है और उसे सामान्यत: सूखा जवाब मिलता है – भईया, हमारी खुद की नौकरी बड़ी मुश्किल से लगी थी रेलवे में। बड़ी पढ़ाई करनी पड़ी थी। अब तो हम रिटायर हैं, अब तो कुछ हैसियत नहीं रखते।

और सही में कुछ हैसियत नहीं है। पर सुंदर नाऊ मुझे पूरी इज्जत देते हैं।

सुंदर नाऊ

सुंदर अपने औजार और अपने हाथ साबुन से साफ कर चुके थे। कोरोना काल से यह अनुशासन चलन में आया है। उसके बाद मेरे बाल बनाने का अवसर था। सुंदर ने साफ गमछा उढ़ाते हुये कहा कि वे परधानी के लिये खड़े हो रहे हैं। वे यानि उनकी पतोहू। लड़का पतोहू तो बम्बई में हैं, दो-चार दिन में आयेंगे। बकिया, प्रचार वे कर ही रहे हैं।

मैंने उनसे परधानी परिदृष्य का उनका आकलन सुना। भगवानपुर में उनकी बड़ी जजिमानी है। वहां सबसे मिल लिये हैं। पहले हफ्ता-दस दिन में जाते थे; अब हर तीसरे दिन जजिमानी में जाते हैं। भगवानपुर में सभी ने उन्हें वोट का भरोसा दिया है। टुन्नू भईया (शैलेंद्र दुबे – भाजपा नेता) से मिल लिये हैं। उन्होने भी पूरा आश्वासन दिया है। “हाता में नाहीं गये; काहे कि उहां एक जबर कुकुर बा। दऊड़ाई ले थ। (अहाता – देवेंद्र भाई, कांग्रेस के प्रमुख के यहां नहीं गया, वहां एक खूंखार कुकुर है जो दौड़ा लेता है।)” पर बकौल सुंदर, देवेंद्र भाई उसे मानते हैं और उन्हे यकीन है कि वहां से उन्हे ही वोट मिलेगा।

सुंदर नाऊ मेरे (जितने भी शेष हैं) बाल काटते हुये। “परधान होई जाब त का, आपन काम न छोड़ब। (प्रधान हो जाऊंगा तो भी क्या? अपना काम तो नहीं छोड़ूंगा।)”

“चमरौटी वाले भी देंगे और पसियान से भी काफी वोट मिलेंगे। बिंद लोग भी बड़ी संख्या में मुझे वोट देने की बात किये हैं। यादव लोग तो आपस में ही उलझे हैं। चार पांच खड़े हैं उनकी बस्ती से।”

कुल मिला कर सुंदर को पक्का यकीन है कि वह परधानी निकाल लेंगे! वैसे कहने वाले कहते हैं कि सुंदर शर्मा कैसे परधानी करेंगे – उनकी बोली साफ नहीं है, गुड़गुड़ा कर बोलते हैं और सुनते भी ऊंचा हैं। उनकी ही जाति का भरतलाल भी मैदान में है (भरतलाल की उम्मीदवारी पर चर्चा आगे किसी पोस्ट में)। और बन भी गये तो उनको तो हर कोई दबा लेगा। पर जैसा बाइबिल में लिखा है – meek shall inherit the earth; सुंदर का सीधापन उनकी ताकत बन सकता है। दलित बस्ती के लोग यह समझ सकते हैं कि अगर चुनाव जीते तो सुंदर के पास अपनी समस्यायें ले कर जाया जा सकेगा। वर्ना अभी तो कई उम्मीदवार सिर्फ इसी आशा में प्रत्याशी हैं कि जीतने पर अपनी दबंगई, अपनी रंगबाजी छांटने का अवसर मिलेगा।

इस चुनाव में, जब सीट ओबीसी महिला के लिये पहली बार आरक्षित हुई है, गांव की जिंदगी में खलबलाहट देखने में आती है। इस बार यादव, नाऊ, कंहार, सोनार, बिंद आदि जातियों को अवसर मिला है। इसमें सबसे पुख्ता राजनैतिक-सामाजिक दशा यादवों की है। उनमें दबंगई भी है। समाजवादी पार्टी के शासन के दौरान वे सत्ता का लाभ भी चख चुके हैं। नाऊ सवर्णों के सबसर्वियेण्ट रहे हैं और अब भी उन्ही के साथ जीतने की आस लगाये होंगे। वैसे भी कहावत है – जहां गंगा तहां झाऊ, जहां बाभन तहां नाऊ! बाकी सभी ओबीसी जातियों के लोग इस और उस छोरों के बीच झूलते होंगे। वोट देने वाले लोग इस सब को तोल रहे होंगे – और चुनाव सिर्फ जलेबी, समोसा, दारू-मुरगा, पैसा बांटने के हार्डवेयर पर नहीं, इन जातिगत समीकरणों के सॉफ्टवेयर पर भी निर्भर करेगा।

साल भर बाद उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। यद्यपि प्रधानी का चुनाव पार्टी आधार पर नहीं हो रहा पर हर एक पार्टी अपने अपने पक्ष के प्रधान जितवाने का जोर लगायेगी। और ऐसा नहीं कर रही तो जल्दी ही करेगी भी। इस लिये सुंदर नाऊ की सिधाई की अपनी सशक्त ब्राण्ड वैल्यू है!


पद्मजा के नये प्रयोग

गांव में रहने के कुछ स्वाभाविक नुकसान हैं; पर यहां सीखने को शहर के बच्चे से कम नहीं है। शायद वह जो सीख पाये; वह शहरी बच्चे कभी अनुभव न कर सकें। वह भाषा, मैंनरिज्म और आत्मविश्वास में उन्नीस न पड़े; बाकी सब तो उसके पास जो है, वह बहुत कम को मिलता होगा अनुभव के लिये!


पद्मजा का स्कूल बंद है और खुलने की सम्भावना इस स्कूल सत्र में तो है ही नहीं। उसे घर में पढ़ाने का उपक्रम किया जा रहा है। उस विषय में मैंने पिछली एक पोस्ट में लिखा था।

उसके पास समय बहुत है। समय भी है और ऊर्जा भी अपार है। स्कूल के मित्र नहीं हैं। आसपास दलित-पासवान-बिंद बस्तियां हैं। उनके बच्चे कभी कभी घर में आ कर खेलते हैं। पद्मजा की साइकिल और घर में लगा झूला उनके लिये बड़ा आकर्षण है। यदा कदा पद्मजा को उन्हें टॉफियां देने को भी कहा जाता है।

उनके साथ पद्मजा खेलती है, पर वे स्कूल के मित्रों जैसे अंतरंग नहीं हो पाये हैं। उनके साथ थोड़ी सजगता रखनी पड़ती है। कुछ बच्चे छोटे हैं, पर उनकी भाषा में अपशब्द बहुत सहज भाव से हैं – वे उनका अर्थ नहीं जानते पर सीखे उन्होने अपने परिवेश से हैं। पद्मजा को अंततोगत्वा उनका भी परिचय पाना है; पर शायद यह वह उम्र नहीं है।

पौधा उगाने का प्रयोग करने को तैयार पद्मजा

मैजिक क्रेट में पौधा उगाने का एक एपरेटस आया है। कल पद्मजा ने उसे सेट किया। ऊपर के बर्तन में क्रेट में दी गयी मिट्टी की टिकिया रखी गयी है। नीचे के बर्तन में पानी है। पानी कैपिलरी-एक्शन से एक रस्सी के सहारे मिट्टी को गीला रखेगा। मिट्टी में सरसों के बीज डाले गये हैं। उपकरण को ऐसी जगह पर रख दिया गया है जहां दिन भर पर्याप्त सूरज की रोशनी मिले।

आज उस एपरेटस का निरीक्षण किया। नीचे के बर्तन में पानी कम हो गया है। ऊपर के बर्तन में मिट्टी और गीली हो गयी है और फूल भी गयी है। पानी रस्सी से केपिलरी-एक्शन से ऊपर के बर्तन में पंहुचा है; यह स्पष्ट हुआ है पद्मजा को। एक बर्तन में तो पूरा पानी केपिलरी एक्शन से मिट्टी में चला गया। दूसरी में, जिसमें शुरुआत में मिट्टी ज्यादा गीली थी, आधा पानी ऊपर पंहुचा।

बर्तन में केपिलरी-एक्शन का प्रयोग

पद्मजा को यह भी बताया गया कि रस्सी की तरह पौधों की जड़ें भी पानी को पौधे में ऊपर की ओर ले जाती हैं।

पद्मजा की विज्ञान की किताब में सूरज की छाया के बारे में लिखा है। सवेरे और शाम को छाया बड़ी और अलग अलग दिशा में होती है। दिन में छाया छोटी होती है। यह समझाने के लिये एक धूप घड़ी बनाने का प्रयोग किया। पद्मजा को छोटी-बड़ी छाया और उससे दिन का समय जोड़ने का कॉन्सेप्ट समझ आया। यह सब उसे कमरे में चित्र बना कर भी बताया जा सकता था। उसमें समय कम लगता पर शायद वह उसके दिमाग में ज्यादा देर नहीं टिकता। अब, धूप-घड़ी शायद वह बड़ी होने पर भी याद रखे!

धूप घड़ी का प्रयोग

धूप घड़ी वाले स्थान पर उसे एक बड़ा गोजर (शप्त-पद, सेण्टीपीड) भी दिखा। उस सेण्टीपीड के माध्यम से मैंने कीडो‌ं का भी ज्ञान देने का प्रयास किया।

कुछ भी नया बताने पर बहुत से सप्लीमेण्ट्री प्रश्नों के लिये तैयार रहना होता है। और कई बार प्रश्न नितांत अलग विषय के होते हैं। बहुधा मैं कोई किताब पढ़ रहा होता हूं या आराम कर रहा होता हूं, तब भी वह चली आती है अपनी जिज्ञासा का पिटारा ले कर।

उसकी नयी साइकिल आयी है। जन्म-दिन की भेंट यद्यपि जन्मदिन के रोज नहीं, कुछ सप्ताह बाद आयी। उस साइकिल को ले कर भी भांति भांति की कल्पनायें हो रही हैं। साइकिल का नाम उसने रखा है – पंख। पक्षी पंख से उड़ते हैं, पद्मजा साइकिल से उड़ना सीख रही है। इसी साइकिल से वह भारत घूमना चाहती है।

अपने “पंख” पर सवारी करती पद्मजा

आज बता रही थी कि वह जब साइकिल से मदुराई (मदुरै – तामिलनाडु) जायेगी तो वहां लड़कियों द्वारा बनाया जाने वाला कोलम देखेगी। उसे कोलम (स्त्रियों द्वारा बनाया जाने वाला अल्पना या रंगोली) के बारे में किसने बताया? शायद टेलीविजन ने। पर मुझे खुद भी यह नहीं मालुम था कि मदुरै की लड़कियां कोलम बनाती हैं। 😆

तमिळ महिलाओं द्वारा बनाया कोलम (चित्र सोर्स – https://bit.ly/3fnX2Sb )

गांव में बहुत बड़ा परिसर है पद्मजा के लिये। घर, पेड़, फूलों के पौधे, सब्जियां, परिसर में ही खेत और तरह तरह के जीव और पक्षी। बहुत कुछ है सीखने के लिये। और जो नहीं है वह ऑनलाइन तथा इण्टरनेट पर उपलब्ध वीडियो, पुस्तकों और कुरियर द्वारा आने वाले पैकजों के माध्यम से मिल रहा है। कुल मिला कर उसे एक शहरी बच्चे से कम संतृप्त सीखने को नहीं मिल रहा होगा।

गांव में रहने के कुछ स्वाभाविक नुकसान हैं; पर यहां सीखने को शहर के बच्चे से कम नहीं है। शायद वह जो सीख पाये; वह शहरी बच्चे कभी अनुभव न कर सकें। वह भाषा, मैंनरिज्म और आत्मविश्वास में उन्नीस न पड़े; बाकी सब तो उसके पास जो है, वह बहुत कम को मिलता होगा अनुभव के लिये!