शैलेश पाण्डेय – वाराणसी से नागालैण्ड यात्रा विवरण – 4 #ALAKH2011


पिछली पोस्ट में शैलेश ने दीमापुर से कोहिमा की यात्रा प्रारम्भ की थी। बस में। उसके बाद :-

नवम्बर’13; 2014

इस समय मैं पूरी तरह पूर्वोत्तर के मोहपाश में हूं।

पिफेमा गांव।
पिफेमा गांव।

यह पिफेमा गांव है।

"मैने नाश्ते के लिये जंगली सेब चुना है।"
“मैने नाश्ते के लिये जंगली सेब चुना है।”

दीमापुर से कोहिमा जाती बस इस समय यहां सवेरे के नाश्ते के लिये रुकी है। सवेरे दस बजे। मैने जंगली सेब का नाश्ता चुना है। नाश्ते में अन्य आईटम भी हैं। रसोई में तैयार किये आईटम भी। पर अपने वजन का ख्याल रखते हुये मैने यही चुना है।

दोपहर बारह बजे तक कोहिमा पंहुच गया हूं। दोपहर की धूप में कोहिमा बहुत सुन्दर लग रहा है।

नवम्बर’14; 2014

कोहिमा की सुबह के कुछ चित्र – IMG-20141114-WA0000

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 और यह – IMG-20141114-WA0004यहां के लोग सरल हैं। मैने जिन लोगों से सम्पर्क किया, वे उससे संतुष्ट थे जो उनके पास है और उसके लिये वे ईश्वर के शुक्रगुजार भी हैं।

अगर ऐसा है तो वे अमूमन प्रसन्न लोग होने चाहियें?  

हां, वे हैं। और शायद यह कारण है कि उम्रदराज होने के चिन्ह उनपर नहीं दिखाई देते।

क्या वे नहीं चाहते कि वे बाहर निकलें और पैसा कमायें? 

जिनसे मैं मिला, उनको देख कर तो लगता नहीं कि वे ऐसा चाहते हैं।

उन्हे यह तो पता होगा कि बाहर निकलने पर क्या सम्भावनायें हैं। चिकित्सा की, नौकरियों की, अध्ययन की। उन्हे यह भी मालुम होगा कि बाहर निकलने में क्या विषमतायें होंगी – अज्ञात कठिन जीवन आदि? 

व्यापक जानकारी तो नहीं है। पर कुछ सीमा तक है जरूर।

वे नागामीज़ बोलते हैं। नागमिया। आसान है उसे जानना। मैं धीरे बोली जाने वाली अन्ग्रेजी और नागमिया के कुछ शब्दों का प्रयोग कर काम चलाता हूं। नागामीज़ मैने बातचीत में सीखी है।

बढ़िया। कुछ लोगों के चित्र लेना। उनके बारे में जानकारी भी – नाम, परिचय और कुछ जानकारी – बाहरी दुनियां के लिये।

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जापुतो अंगामी की पुत्री नेब्युन्युओ के साथ शैलेश पाण्डेय

यह देखिये; ये ऐया (दीदी) हैं। श्रीमती जापुतो अंगामी की पुत्री।

और ये बच्चे हैं। अनाथ। जिन्हें वे पालती हैं।IMG-20141115-WA0002

अपनी सम्प्रेषण की कला की परीक्षा लेने का सबसे अच्छा तरीका है बच्चों से बातचीत करना। उनकी मुस्कान और उनका एक्टिव भाग लेना बातचीत में यह बताता है कि आपको बातचीत करने में सफलता मिल रही है।


जापुतो अंगामी को ’मदर’ कहा जाता है। वे कोहिमा राजकीय अस्पताल में नर्स थीं। एक बार एक महिला की बच्चा जनते समय मृत्यु हो गयी और उसका दुखी मर्द डर कर भाग गया। जापुतो ने बच्चे को पालने का बीड़ा उठाया। और उससे शुरुआत हुई एक महिला द्वारा चलाये जा रहे अनाथाश्रम की। अनाथ बच्चे – जिनमें बहुत से नागालैण्ड के विद्रोह का शिकार थे। सन 2009 की यह रिपोर्ट बताती है कि उस समय वहां लगभग 80 बच्चे थे, जिसमें से 29 विद्रोह से प्रभावित बच्चे थे।

जापुतो का देहावसान 2011 में 87 वर्ष की अवस्था में हुआ। 

जापुतो की पुत्री नेब्युन्युओ उनके कामकाज में हाथ बटाती थीं, अब वे यह काम देखती हैं। 


शैलेश ने इसके बाद राजधानी कोहिमा से आगे नागालैण्ड के एक गांव की यात्रा की। उसका विवरण भाग – 5 में।

शैलेश पाण्डेय – वाराणसी से नागालैण्ड यात्रा विवरण – 3 #ALAKH2011


राजबारी, दीमापुर के प्रस्तरखण्ड
राजबारी, दीमापुर के प्रस्तरखण्ड

पिछली पोस्ट में शैलेश दीमापुर पंहुचे थे 11 नवम्बर की रात में कामरूप एक्स्प्रेस से। उसके बाद दीमापुर में एक दिन व्यतीत किया और अगले दिन 13 नवम्बर को वहां से कोहिमा के लिये प्रस्थान किया। उसका भेजा विवरण :-

नवम्बर 12, दीमापुर में।

सवेरा जल्दी हो जाता है दीमापुर में। पूर्वोत्तर में जल्दी ही होता है। दुकानें आठ बजे पूरी तरह खुल चुकी हैं।

दीमापुर महत्वपूर्ण स्टेशन है रेलवे का। पर मेरी समझ नहीं आता कि काहे इतना चलताऊ स्टेशन बनाया गया है इसको सुविधाओं के हिसाब से। और कल तो कामरूप एक्स्प्रेस में गुवाहाटी के बाद पानी ही नहीं था। यह तो पक्का है कि पूर्वोत्तर को वह भाव नहीं मिल रहा जो मिलना चाहिये।

नागालैण्ड के डिप्युटी कमिश्नर का दफ़्तर दीमापुर में।
नागालैण्ड के डिप्युटी कमिश्नर का दफ़्तर दीमापुर में।

मैं दस बजे तक नागालैण्ड के डिप्युटी कमिश्नर के दफ़्तर पंहुच गया हूं। नागालैण्ड की यात्रा के लिये इनरलाइन परमिट लेना होता है।

इनरलाइन परमिट के लिये  जारी कूपन।
इनरलाइन परमिट के लिये जारी कूपन।

इसी दफ़्तर से मिलता है वह। आपको फार्म भर कर अपने स्थायी निवास का प्रमाणपत्र नत्थी करना होता है। उसके बाद एस.डी.ओ. सिविल के पास व्यक्तिगत रूप से पेश होना होता है। पेशी बाद आपको फाम आई.एल.पी.शाखा में जमा करा होता है। वहां वे आपका वेब कैमरा से चित्र लेते हैं और वे आपको फार्म जमा करने का कूपन देते हैं। कूपन के साथ परमिट लेने को 12 बजे बाद आना पड़ता है।

यह बहुत प्रिय नहीं है – पूर्वोत्तर को कमोबेश नियंत्रण में रखा जा रहा है – सड़क, रेल, नेटवर्क के द्वारा। बहुत खराब दशा है नेटवर्क की। मेरे पास एयरटेल और सेल-वन के सिम हैं। खराब दशा दोनो की।

कल मैं कोहिमा के लिये निकलूंगा।

अकेले?

हां भईया। यहां की उपेक्षा और मेरी अपनी दशा का मुझको भान – कि मैं कुछ विशेष नहीं कर सकता; मुझे मायूस करते है। यह देख कर क्रोध भी आता है कि इस क्षेत्र का कई व्यापारिक समुदायों ने सतत दोहन किया है।

ओह, कोई तो तरीका होगा कि इस दशा में भी प्रसन्न रहा जाये। … अपनी अपेक्षाओं को कम करके रखने से शायद यह हो सके।

काश यह इतना आसान होता! काश मैं अपने देखने-परखने में गलत होता!

मैने ये प्रस्तरखण्ड देखे – राजबारी, दीमापुर में। किस लिये होंगे? 

नवम्बर’13; 2014

दीमापुर से कोहिमा, बस से रवानगी।
दीमापुर से कोहिमा, बस से रवानगी।

सवेरे नौ बजे शैलेश ने अपनी बस से रवानगी का चित्र भेजा। दीमापुर से कोहिमा के लिये।

कोहिमा 74 किलोमीटर दूर है दीमापुर से। जाने के तीन विकल्प हैं: बस – 100रुपये; शेयर्ड टेक्सी – 220रुपये; पूरी टेक्सी 880रुपये। दीमापुर से निकलते ही लगता है जैसे स्वर्ग में आ गये।

कल तो मायूस /अवसादग्रस्त हो रहे थे। आशा है वह अवसाद दूर हो गया।

अवसाद का निमित्त तो शेष है; पर उसके लिये कुछ करने की मेरी सोच के कारण मेरी स्पिरिट्स में उछाल है! 🙂

शेष भाग – 4 में।