यह साल बॉयोग्राफी के नाम सही!

ये सभी सही पात्र हैं, जीवनी लेखन के। इनके माध्यम से आधुनिक समय में ताराशंकर बंद्योपाध्याय के गणदेवता या मुन्शी प्रेमचंद के कई उपन्यासों का सीक्वेल बन सकता है। पर वह सब करने के लिये मुझे जीवनी विधा का बारीकी से अध्ययन करना चाहिये।


नये साल का पहला महीना लगभग खत्म होने के कगार पर है। मैंने गुडरीड्स की साइट पर साल भर में 52 पुस्तकें पढ़ने का लक्ष्य रखा है। पर पठन, साल दर साल, किसी योजनाबद्ध तरीके से नहीं हो पाता। पुस्तक ले कर बैठने पर व्यवधान बहुत होते हैं। पांच सात पेज एक सिटिंग में पढ़े तो बहुत माना जाये। कई पुस्तकें तो मात्र टॉयलेट की सीट पर बैठे पढ़ी जाती हैं। दिन में एक या दो बार दस दस मिनट के लिये। कवर टु कवर पढ़े जाने को अगर पुस्तक खत्म करना माना जाये तो बहुत कम पढ़ा जाता है। उसकी आठ दस गुना पुस्तकें चिड़िया-उड़ान की तरह – इधर उधर चुग कर पढ़ी हैं।

पिछले पांच साल से मेरा मुख्य जोर, प्रिय विषय ट्रेवलॉग रहा है। खुद मैंने यात्रायें बहुत कम की हैं। हिंदू परम्परा में चारधाम यात्रा का कॉन्सेप्ट है। वैसा कुछ नहीं किया। सेकुलर भ्रमण भी नहीं हुआ। कभी किसी जगह किसी और काम से गया तो आसपास की जगहें देख लीं। उनके बारे में कुछ लिख दिया – वह इतना सा ही ट्रेवल है। इस लिये मैंने भारत और विश्व को देखने समझने के लिये पुस्तकों का सहारा लिया। पूरी-आधी-तीही मिला कर करीब सौ पुस्तकें मैंने पढ़ी/देखीं यात्रा विषय पर।

अब सोचता हूं कि किसी अन्य विषय को लिया जाये।

दो विषय मुझे आकर्षित करते हैं – सौंदर्य और जीवनियां। बावजूद इसके कि मेरे आसपास और दुनियाँ में बहुत कुछ बदरंग है, भदेस है या क्रूर है; बहुत कुछ ऐसा भी है जो शुभ है, सुंदर है और माधुर्य युक्त है। सौंदर्य को पढ़ने के लिये मुख्य विधा कविता-पठन है। पर बाई-डिजाइन कविता मुझे समझ नहीं आती। कई पुस्तकें मेरे पास कविता की हैं; पर वे सामान्यत: उपेक्षित ही रहती हैं। लिहाजा, सौंदर्य/माधुर्य पर फिलहाल जोर देने का साहस नहीं कर रहा। वह भविष्य के लिये छोड़ता हूं।

जीवनी या बॉयोग्राफी दूसरा क्षेत्र है, जो आकर्षित करता है।

जब मैंने दूसरी पारी में गांव की ओर पलायन किया तो मन में यह था कि एक ऐसे पात्र की खोज करूंगा जो अंचल में रहते हुये, अपनी नैतिकता और चरित्र को (लगभग) साफ रखते हुये अपना जीवन वृत्तांत बताये और जिसे लिख कर न केवल उसके जीवन का, वरन गांवदेहात के पिछले पचास साल के परिवर्तन का लेखा-जोखा बन सके। यह व्यक्ति अगर अपने को गरीबी/पिन्यूरी से ऊपर उठा कर अपनी निगाह में सफल बन गया हो तो सोने में सुहागा।

पहले ही महीने में मुझे रामधनी मिले। उम्र लगभग मेरे जैसी होगी। कोलाहलपुर के दलित। कोलाहलपुर गंगा किनारे का गांव है और उनसे मुलाकात गंगा तट पर ही हुई थी। बुनकर थे, पर उम्र के साथ वह काम अब खत्म कर चुके थे। उन्होने बताया कि उनके बचपन में जितनी गरीबी थी, अब वैसी नहीं है। मुझे लगा कि रामधनी एक ऐसे पात्र हो सकते हैं, जिनकी जीवनी सुनी-लिखी जा सकती है। उनके बारे में मैंने 13 नवम्बर 2015 को पोस्ट भी किया था –

कल रामधनी से मिला घाट पर।
जाति से चमार पर बुनकर। उनका जीवन तुलसीराम (मुर्दहिया) से कितना अलग रहा? यह जानना है

Ramdhani, Dalit, Kolahalpur
रामधनी, बुनकर, कोलाहलपुर

उस समय मैंने ताजा ताजा मुर्दहिया पढ़ी थी। पर गांव में जब घूमा‌ टहला तो लगा कि मुर्दहिया में जिस प्रकार का दलित दमन का चित्रण है, वह अतिशयोक्ति पूर्ण है। मैं कई बार रामधनी को ले कर लिखने की सोचता था, पर नये नये पात्र मिलते गये। नई नई बातें होती गयीं और उनके साथ आठ दस घण्टे बिता कर उनके बारे में नोट्स बनाना/लिखना रह ही गया। रामधनी की सम्प्रेषण क्षमता अच्छी थी। वे एक बॉयोग्राफी के सही पात्र हो सकते थे। उनके माध्यम से 50 साल के गंगा किनारे के गांव में हुये बदलाव दर्ज हो सकते थे। … पर वह अभी तक नहीं हो सका।

दूसरे सज्जन हैं श्री सूर्यमणि तिवारी। उनपर मेरी कुछ ब्लॉग पोस्टें हैं। वे शुरू में मुझे अपने कामधाम में जोड़ना चाहते थे। पर मैं निर्द्वंन्द्व घूमने में रुचि लेता था। मेरी पत्नी जरूर कहती रहूं कि मैं उनके काम में या उनके अस्पताल में किसी प्रकार जुड़ूं। उनके बॉयोग्राफी लेखन में मुझे रुचि थी। इस अंचल के एक मामूली स्कूल मास्टर से शुरुआत कर किस प्रकार उन्होने यहां और अमेरिका में अपना व्यवसाय बनाया, बढ़ाया; वह एक सशक्त कथा होगी पिछले पचास साठ सालोंं के इस अंचल के परिदृष्य की।

उनके बारे में मैंने ब्लॉग पर लिखा था –

पता चला कि वे सेल्फ मेड व्यक्ति हैं. वे जब इंटर कॉलेज में थे, तभी उनके पिताजी का निधन हो गया था. पढ़ने मेें अच्छे थे तो पढ़ाई के बाद अध्यापक बन गये पास में जंगीगंज के एक स्कूल में. उन्हें जब यह समझ आया कि 3 भाई और दो बहनों का परिवार स्कूल मास्टरी की सेलरी में नहीं संभाला जा सकता तो घोसियां के अपने एक मित्र के पिताजी से कार्पेट व्यवसाय की बारीकियां समझी. 1971 में वह काम प्रारंभ किया और कालांतर में (1979 में) कार्पेट के बाजार, अमेरिका गए. वहां 1986 में अपने बेटे को ले जा कर पढ़ाया. इंजीनियर और एम बी ए बनाया.

सन 2004 में उनका अमरीका स्थित व्यवसाय 25 मिलियन (डालर) टर्नओवर का बना उनके अथक परिश्रम से.

Suryamani Tiwari
सूर्या ट्रॉमा सेण्टर और सूर्यमणि तिवारी

तिवारी जी से मेरा सम्पर्क बना रहा। उनके साथ अब भी मुलाकात-बातचीत होती है। पर उनके विषय में लिखने की बात आई गई हो गयी।

मुझे और भी पात्र दिखे। पास ही के एक गांव दिघवट में एक सज्जन मिले थे। कोई तिवारी जी हैं। मेरे अपने मित्र गुन्नीलाल पांड़े तो हैं ही। देवेंद्र भाई – मेरे सबसे बड़े साले साहब भी ऐसे एक पात्र हैं जो जमींदारी से आज नौकरी पेशा और गांव की प्रधानी-राजनीति का विस्तृत केनवास रखते हैं।

ये सभी सही पात्र हैं, जीवनी लेखन के। इनके माध्यम से आधुनिक समय में ताराशंकर बंद्योपाध्याय के गणदेवता या मुन्शी प्रेमचंद के कई उपन्यासों का सीक्वेल बन सकता है। पर वह सब करने के लिये मुझे जीवनी विधा का बारीकी से अध्ययन करना चाहिये।

शिखर से सागर तक

अब, इस साल मैं सोचता हूं कि ट्रेवलॉग छोड़ बायोग्राफी पठन पर मुझे जोर देना चाहिये।

अभी हाल ही में मैंने एक पुस्तक अज्ञेय की जीवनी पर – शिखर से सागर तक खरीदी है। अज्ञेय मेरे प्रिय लेखक हैं। उनकी जीवनी से प्रारम्भ करना एक अच्छी शुरुआत होगी।

मेरे पास कागज पर और किण्डल/कैलीबर/टैब-रीडर पर करीब 25-30 बॉयोग्राफी विषयक पुस्तकें हैं।

यह साल बॉयोग्राफी के नाम सही! 😀

Biography Books

रसूल हम्जातोव का त्सादा और यहां का गांव

रसूल हम्जातोव जैसी दृष्टि मेरी क्यों नहीं? अपने गांव को ले कर क्यों मैं छिद्रान्वेशी बनता जा रहा हूं। उसके लोगों, बुनकरों, महिलाओं, मन्दिरों, नीलगायों, नेवलों-मोरों में मुझे कविता क्यों नहीं नजर आती। नदी, ताल और पगडण्डियां क्यों नहीं वह भाव उपजाते?


जन्मदिन पर बहुत से लोगों ने शुभकामनायें दीं। सोशल मीडिया में जन्मदिन की शुभकामनायें ठेलने का रिवाज है। लोग आलसी भी हों तो फेसबुक वाला जबरी ठिलवाता रहता है। प्रियंकर जी रस्म अदायगी वाले अन्दाज में नहीं, हृदय के कोर से दिये मुझे शुभकामनायें। उनका ई-मेल मिला।

उसमें शुभकामनाओं के साथ एक लम्बी हिंदी पुस्तकों की सूची थी तथा उपहार स्वरूप एक पुस्तक की पीडीएफ प्रति भी –

“साथ ही रसूल हम्जातोव की अनुपम गद्य-पुस्तक ‘मेरा दागिस्तान’ आपको जन्मदिन के उपहार की तौर (पीडीएफ फॉर्म में) भेज रहा हूं . यह मेरी सर्वाधिक प्रिय पुस्तकों में से एक है . हम्जातोव का गद्य कविता को नाकों चने चबवाता भावपूर्ण गद्य है . वैसे भी पुस्तक सूची में आपको कविता के प्रकोप से बचा कर रक्खा है ।” 🙂

पुस्तकों की लम्बी सूची में हिन्दी के उत्कृष्ट फिक्शन और नॉन-फिक्शन थे। वह सब जिसे पढ़ने में मुझे शायद एक दशक लग जाये।


फेसबुक नोट्स में नवम्बर 19′ 2017 को पब्लिश की गयी पोस्ट।

यह पोस्ट फेसबुक नोट्स में अक्तूबर 2017 में पब्लिश की थी। अब मुझे पता चल रहा है कि अक्तूबर 2020 से फेसबुक ने नोट्स को दिखाना बंद कर दिया है। यह बहुत ही दुखद है। मुझे वहां से निकाल कर यह ब्लॉग पर सहेजनी पड़ रही है पोस्ट। 😦



मैने यह सूची उनसे इस लिये मांगी थी कि वे पुस्तकें पढ़ कर हिन्दी भाषा में मेरा शब्द ज्ञान 2000 से बढ़ कर पांच सात गुणा हो जायें। वे शब्द जिनके साथ सोना-जागना हो। पहले तो प्रियंकर जी ने यह कह कर टालने की बात की थी कि कोई आवश्यकता नहीं है – मेरा शब्द ज्ञान पर्याप्त है। पर बाद में मेरी बात मान कर यह ई-मेल भेज दिया।

Rasul Gamzatov
Rasul Gamzatovich Gamzatov was a popular Avar poet. Among his poems was Zhuravli, which became a well-known Soviet song.
रसूल हम्ज़ातोव

पर असल चीज, असल उपहार वह सूची नहीं, रसूल हम्ज़ातोव का हिन्दी अनुवाद में उपन्यास था – मेरा दागिस्तान। रसूल हम्ज़ातोव (रूस के) काकेशिया के दागिस्तान के अवार भाषा के कवि थे। यह उनकी गद्य रचना है। और क्या गजब की रचना। यह उनके गांव त्सादा के इर्द-गिर्द घूमती पुस्तक है। एक गद्य काव्य। ज्यादा इस लिये नहीं लिखूंगा कि – 1) प्रियंकर जी को मेरे पठन का उथलापन स्पष्ट हो जायेगा और; 2) अभी पढ़ने में जो आनन्द आ रहा है, उसे शब्दों में समेटना सम्भव नहीं लग रहा।

मैने उनके द्वारा भेजी गई पीडीएफ़ प्रति को किण्डल के अनुसार परिवर्तित किया और अब किण्डल पर पढ़ रहा हूं। जन्मदिन पर इससे बेहतर कोई उपहार नहीं हो सकता था। प्रियंकर जी, सुन रहे हैं न?!

मेरा दागिस्तान के बारे में कल अपनी पत्नीजी से चर्चा कर रहा था – रसूल जैसी दृष्टि मेरी क्यों नहीं? अपने गांव को ले कर क्यों मैं छिद्रान्वेशी बनता जा रहा हूं। उसके लोगों, बुनकरों, महिलाओं, मन्दिरों, नीलगायों, नेवलों-मोरों में मुझे कविता क्यों नहीं नजर आती। नदी, ताल और पगडण्डियां क्यों नहीं वह भाव उपजाते? क्यों मन में रागदरबारी जैसा व्यंग ही घूमता रहता है? कहीं न कहीं गलती मेरे अपने मन में है। मुझे अपना कोर्स करेक्शन करना चाहिये।

Rasul Gamzatov
My Dagistan in Hindi
 on Kindle
रसूल हम्ज़ातोव की मेरा दागिस्तान का एक पृष्ठ, किण्डल पर।

इसी भाव से आज सबेरे घर से निकला बटोही (साइकिल) के साथ। द्वारिकापुर में गंगा तट पर दृष्य बहुत आनन्ददायक था। मछली पकड़ने-खरीदने वालों के अलावा आज मुझे सोंईस कई बार उछलती दिखी। लगता है, सरकार ने जो कुछ भी किया है, उससे प्रदूषण कुछ कम हुआ है और सोंईस (गांगेय डॉल्फिन) की संख्या बढ़ी है।

boats for tourists Prayag to Varanasi
पाल वाली रंगबिरंगी सैलानी डोंगियां।

सोंईस के अलावा मुझे बनारस से बिन्ध्याचल लौटती सैलानी वाली तीन पाल वाली डोंगियां भी दिखीं। अपने परिवेश के बारे में आज सब कुछ काव्यात्मक था। पर वापस लौट कर साइकिल का ताला खोला तो नजर पड़ी कि आगे वाले पहिये में हवा नहीं है। देखा तो पीछे वाला पहिया भी वैसा ही था। किसी व्यक्ति ने दोनो पहियों के वाल्व (छुछ्छी) चुरा लिये थे।

“काव्य से कर्कशता के मोड में चला गया मन। गंगा के करार पर उतरते-चढ़तें मेरे गठियाग्रस्त घुटने थक कर चूर थे। पत्नीजी को फोन किया तो उल्टा सुनने को मिला – मैं तो पहले ही कहती थी कि कहां ऊचे-खाले घूमते रहते हो!”

काव्य से कर्कशता के मोड में चला गया मन। गंगा के करार पर उतरते-चढ़तें मेरे गठियाग्रस्त घुटने थक कर चूर थे। ऐसे मे साइकिल ढो कर ले चलना मेरे लिये सम्भव नहीं था। मेरी कार का ड्राइवर भी आज रविवार होने के कारण आने वाला नहीं था कि कार बुला कर घर लौटा जाये। पत्नीजी को फोन किया तो उल्टा सुनने को मिला – मैं तो पहले ही कहती थी कि कहां ऊचे-खाले घूमते रहते हो!

भला हो राजन भाई मेरे साथ थे। उन्होने पता किया कि उस गांव में हरिजन बस्ती में एक साइकिल रिपेयर करने वाला है। मैं कुंये की जगत पर बैठा और वे अपनी साइकिल मेरे पास छोड़ मेरी साइकिल ठीक करवाने गये।

इस दौरान कौतूहल वश लोग आते जाते मुझे देख रहे थे। एक ट्रेक्टर वाला रोकने की मुद्रा में आया, फिर चलता चला गया। रोज सवेरे गंगा स्नान को आने वाले रिटायर्ड मास्टर चौबेजी गुजरे। उन्होने मुझसे पूछा – क्या हुआ? मैने बताया कि कोई मेरे साइकिल के पहियों के वाल्व चुरा ले गया है।

मैं कन्फ्यूज हो गया – गांव को किस नजर से देखूं – रसूल हम्ज़ातोव का त्सादा गांव मानूं या श्रीलाल शुक्ल की “रागदरबारी” का शिलिर-शिलिर जीने वाला शिवपालगंज?

मुझे लगा कि वे सहानुभूति में कुछ कहेंगे। पर वे “अच्छा-अच्छा” कह कर आगे बढ़ गये। मानो कोई खास बात नहीं हो।

राजन भाई साइकिल ठीक करा कर लौटे। उस साइकिल वाले ने छुछ्छियां लगाईं और हवा भरी। कोई पैसा भी नहीं लिया। एक ही गांव में छुछ्छी-चोर भी निकले और निस्वार्थ सहायता करने वाले भी।

मैं कन्फ्यूज हो गया – गांव को किस नजर से देखूं – रसूल हम्ज़ातोव का त्सादा गांव मानूं या श्रीलाल शुक्ल की “रागदरबारी” का शिलिर-शिलिर जीने वाला शिवपालगंज?

(पोस्ट में रसूल हम्जातोव के चित्र विकीपीडिया से, साभार)

छुछ्छी का चोरी-स्थल। चित्र में राजन भाई।

नहुष -स्वर्ग से पतित नायक

नहुष में स्वर्ग से पतित होने पर भी मानवीय दर्प बना है। यही दर्प आज भी सफलता से डंसे पर अन्यथा कर्मठ मानवों में दिखता है। यही शायद मानव इतिहास की सफलताओं की पृष्ठभूमि बनाता है।


नहुष महाभारत का एक महत्वपूर्ण और एक अत्यंत रोचक चरित्र है। इसलिये कि हम सब में नहुष है। हम सब, जो कालखण्ड के किसी न किसी अंश में सफल रहे हैं। सत्ता, यश, शौर्य और आत्ममुग्धता को हासिल कर चुके हैं। और उसे, “ज्यों की त्यौं धर दीनी चदरिया” जैसे त्याग नहीं पाये हैं। शिखर से हटने पर भी मन में नहुष-भाव बना ही रहता है, मैथिलीशरण गुप्त जी के शब्दों में –

फिर भी उठूंगा और बढ़ के रहूंगा मैं। नर हूं, पुरुष हूं मैं, चढ़ के रहूंगा मैं।

नहुष गुप्त जी का महत्वपूर्ण खंड काव्य है। वह महाभारत का एक उपाख्यान है। इंद्र शापित होने के बाद नहुष को इंद्र का आसन दिया जाता है और वह शची पर मुग्ध हो जाता है। सुर सरिता से सद्यः स्नात शची पर।

खण्ड काव्य का अंश देखें –

स्वर्ग से पतित होता नहुष

शची उपाय ढूँढती है नहुष से बचाव का। वह प्रस्ताव भेजती है कि नहुष को वरण करने को तैयार है अगर नहुष सप्त ऋषियों की ढोई पालकी में उसे लेने आयें। उतावली में नहुष एक ऋषि को लात मारता है और क्रोधित ऋषि उसे स्वर्ग से पतित कर देते हैं।

मैथिली शरण गुप्त जी के नायक नहुष में स्वर्ग से पतित होने पर भी मानवीय दर्प बना है। यही दर्प आज भी सफलता से डंसे पर अन्यथा कर्मठ मानवों में दिखता है। यही शायद मानव इतिहास की सफलताओं की पृष्ठभूमि बनाता है।

आप तिहत्तर पेज के नहुष खंड काव्य को इन्टरनेट आर्काइव से डाउनलोड कर सकते हैं ;पीडीएफ फार्मेट में।


मुझे गंगा किनारे लूटा बीर घाट पर यह गिरा बबूल का पेड़ दिखा। और उसे देख गंगा नदी के पवित्र तट पर पतित नहुष की याद हो आई। इसके धरती पर पड़े तने से अनेक अनेक टहनियां ऊर्ध्व उठ रही थीं। उनमे उठने और स्वर्ग की ओर जाने की अदम्य इच्छा स्पष्ट नजर आ रही थी। नहुष ही तो था वह पेड़। पतन और मृत्यु से दो चार होता वह वृक्ष हार नहीं मान रहा था।

टूटा बबूल का पेड़, गंगा तट पर। उसकी डालियाँ ऊपर उठ रही हैं. मृत्य स्वीकार नहीं कर रहीं। हार नहीं मान रही हैं। नहुष की तरह!

मुझे खंड काव्य का अंश याद हो आया। उसका स्केन किया अंश प्रस्तुत हैं –


वह बबूल का पतित पेड़, सुरसरि गंगा का किनारा और सवेरे का समय – सब मुझे नहुष की याद दिलाते रहे। वैसे भी; जीवन की दूसरी पारी में नहुष जैसे नायक चरित्र आकर्षित करते हैं। महाभारत के उप-आख्यान से पता नहीं चलता कि नहुष ने स्वर्ग से पतित होने पर क्या किया, पर कोई आधुनिक कालिदास (अभिज्ञान शाकुंतल के रचनाकार), या वी.एस. खाण्डेकर (ययाति नामक उपन्यास के लेखक) जैसा रचनाकार नहुष के साथ एक नयी कथा का ताना-बाना बुन सकता है। री सरेक्शन ऑफ अ फेल्ड बिजनेस एम्पायर के कई किस्से तो होंगे ही। हम तलाश करें तो आधुनिक काल में दूसरी पारी के सफल नहुष मिलेंगे और अनेक मिलेंंगे।

नहुष – बबूल और गंगा तट

मुझे क्या पढ़ना, देखना या सुनना चाहिये?


पढ़ने, देखने या सुनने के इतने विकल्प जीवन में पहले कभी नहीं थे। अब टेलीवीजन का महत्व खत्म हो गया है। जो कुछ है वह मोबाइल या टैब पर है। जब लिखना होता है तब टैब या लैपटॉप पर जाना ठीक लगता है। उसके लिये कभी कभी लगता है कि विण्डोज वाले लैपटॉप की बजाय एक मिड-रेंज का क्रोमबुक बेहतर रहेगा। उससे, बकौल आजकल की भाषा के, अनुभव सीम-लेस हो जायेगा।  पर उसको लेने के बारे में अभी तय नहीं कर पाया हूं।

कोरोना संक्रमण काल ने पढ़ने, देखने (वीडियो देखने) या सुनने (पॉड्कास्ट सुनने) के अलावा विकल्प सीमित कर दिये हैं। पर यह सीमित होना भी एक तरह से असीमित सम्भावनायुक्त है।

किण्डल – Photo by freestocks.org on Pexels.com

जब से किण्डल आया है, कागज पर उपलब्ध पुस्तक पढ़ने का चाव जाता रहा है। मेरे किण्डल पर करीब एक हजार और कैलीबर पर दो हजार से ऊपर पुस्तकें हैं। अत: हार्ड-बाउण्ड या पेपरबैक पुस्तक का नम्बर नहीं लगता है। कभी कभी तो (अगर किण्डल पर सस्ती मिल रही हो, तो कागज पर उपलब्ध पुस्तक का भी किण्डल संस्करण खरीद लिया है।

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हेमेन्द्र सक्सेना जी के संस्मरण – पुराने इलाहाबाद की यादें (भाग 4)

भारत के उज्वल भविष्य की हमारी आशायें किसी अनिश्चय या भय से कुन्द नहीं हुई थीं। हम यकीन करते थे कि आम आदमी की जिन्दगी आने वाले समय में बेहतर होने वाली है।


यह हेमेंद्र सक्सेना जी की इलाहाबाद के संस्मरण विषयक अतिथि ब्लॉग पोस्टों का चौथा और अंतिम भाग हैैै।

भाग 3 से आगे –

कॉफी हाउस नियमित जाने वाले लोग वेटरों को उनके नाम से जानते और सम्बोधित करते थे। वेटर बड़ी स्मार्ट वर्दी – झक साफ सफ़ेद पतलून, लम्बे कोट और माड़ी लगी पगड़ी – में रहते थे। हेड वेटर के कमर में लाल और सुनहरी पट्टी हुआ करती थी जबकि अन्य वेटर हरी पट्टी वाले होते थे।

वे अधिकतर केरळ और तमिलनाडु के होते थे और इसके कारण इलाहाबाद का कॉस्मोपॉलिटन चरित्र और पुख्ता होता था। अधिकांश व्यवसायी पारसी या गुजराती थे -जैसे पटेल, गुज्डर (Guzder) या गांधी।

दो चाइनीज स्टोर और एक बंगाली मिठाई की दुकान भी हुआ करती थी। देश विभाजन के बाद कुछ पंजाबी भी आये। मुझे अच्छी तरह याद है मिस्टर खन्ना की लॉ की पुस्तकों की दुकान। खन्ना जी अपने छात्र दिनों के गवर्नमेण्ट कॉलेज लाहौर की यादों की बातें किया करते थे।

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