विष्णु मल्लाह – बैकर मछरी पकड़े बा!

किसान की तरह मल्लाह भी मार्केट की चाल से मात खाता है। यहां यह जरूर था कि तुरत-फुरत उसे रोकड़ा मिल जा रहा था। किसानी में वह भी नहीं होता।


द्वारिकापुर टीले पर बटोही (साइकिल) खड़ी कर ताला लगाया तो दूर लोग दिखे – एक डोंगी और कुछ लोग। कयास लगाया – जरूर मछली खरीदने वाले होंगे। मैं अपने गठियाग्रस्त पैरों से धीरे धीरे चलता वहां पंहुचा। एक व्यक्ति, जाल से मछलियां निकाल रहा था। मुझे देख बोला – आवअ साहेब। आज एकर फोटो खींचअ। बैकर मछरी पकड़े बा। (आओ साहेब, इसकी फोटो खींचो। आज बैकर मछलियां पकड़ी हैं इसने।)।

दृष्य समझ आया। एक किशोर वय मल्लाह ने जाल बिछा कर मछलियां पकड़ी हैं। खरीदने वाले तीन थे। दो उसकी सहायता कर रहे थे जाल से मछलियां निकालने में। एक किनारे बैठा इन्तजार कर रहा था। उसे मात्र एक किलो मछली चाहिये थी घर में खाने के लिये। बाकी दोनो दुकानदार थे। जितनी मिल जाये, उतनी खरीदने वाले।

मल्लाह किशोर, दायें और मछली के दो खरीददार जाल से मछलियां निकालते हुये।

लड़का रात चार बजे उठा था मछली मारने। पांच बजे जाल लगाया था। ठीक ठाक मात्रा में मछलियां मिली आज। अब बेच कर घर जा सोने की जल्दी थी उसे। इस लिये उसकी सहायता के लिये दोनो खरीददार जल्दी जल्दी मछलियां निकलवा रहे थे।

सफ़ेद कमीज वाला कह रहा था – तोहरे बदे त ट्रेन गाड़ी रुकी रहअ थ। (तुम्हारे लिये तो ट्रेन गाड़ी रुकी रहती है।)

जिस व्यक्ति ने मुझे फोटो खींचने का निमन्त्रण दिया था, वह मुझे जानता था – तोहरे बदे त ट्रेन गाड़ी रुकी रहअ थ। (तुम्हारे लिये तो ट्रेन गाड़ी रुकी रहती है।)। मैने उसे करेक्ट किया कि अब मैं रिटायर हो गया हूं। अब ऐसी कोई सम्भावना नहीं है। पर उसने स्वीकार नहीं किया – तबऊ जलवा होये! (तब भी जलवा होगा)।

मैने उसका प्रतिवाद नहीं किया। लड़के से मछली मारने के बारे में पूछने लगा। जेब से छोटी नोटबुक और कलम निकाल ली थी। इस बीच एक चौथा ग्राहक भी आकर लड़के की मदद करने लगा।

चौथा ग्राहक सीन में अवतरित हुआ। सब देख कर बोला – आप इतना पूछ रहे हैं। लिख भी रहे हैं। इस सब से तो इसकी ** फट रही है साहब। क्या पता किसी कानून में धर लिया जाये कि क्यों मछली मार रहा है।

लड़का मेरे प्रश्नों के जवाब देने से कतरा रहा था। चौथा ग्राहक बोला – आप इतना पूछ रहे हैं। लिख भी रहे हैं। इस सब से तो इसकी ** फट रही है साहब। क्या पता किसी कानून में धर लिया जाये कि क्यों मछली मार रहा है।

कुछ देर मुझसे बात करने के बाद लड़का कुछ आश्वस्त दिखा। आपस में उन सब की चुहुल बाजी चल रही थी। लड़के ने बताया कि उसका नाम विष्णु है। गंगा उस पार सिंनहर गांव में रहता है। मछली मारने में मेहनत तो बहुत है। इस पर पहले ग्राहक ने जोड़ा – हां साहेब, मेहनत इसकी है, बेचने में पसीना हमारा है। हम दोनों मिल कर यह काम करते हैं। इसको फिक्र ज्यादा से ज्यादा मछली पकड़ने की है। हमें खरीदने और दुकान में बेचने की जुगत करनी होती है।

चौथे ग्राहक ने कहा – इसकी बात पर मत जाइये साहब। यह गिद्धराज है। पसीना वसीना नहीं बहाता यह। 🙂

लड़का मेरे प्रश्नों के जवाब देने से कतरा रहा था। चौथा ग्राहक बोला – आप इतना पूछ रहे हैं। लिख भी रहे हैं। इस सब से तो इसकी ** फट रही है साहब। क्या पता किसी कानून में धर लिया जाये कि क्यों मछली मार रहा है।

लड़का अपने जाल के बारे में बता रहा था – “यह नया जाल है। जाल तो साढ़े तीन सौ का भी आता है और हजार का भी। कोई जाल महीना भर चलता है, कोई साल भर भी चल जाता है। कोई गलत मछली आ जाये तो एक ही दिन में चीर देती है।… अलग अलग मछली के लिये अलग अलग जाल लगाना होता है। दोपहर में वह टेंगर मछली पकड़ेगा। उसके लिये अलग जाल ले कर आयेगा। जाल भी सीधे खरीद कर इस्तेमाल नहीं किया जाता। उसे अपनी जरूरत के मुताबिक तैयार करना होता है। जाल तैयार करना, मछली पकड़ना भर ही काम है उसका। बाकी, जितनी पकड़लेगा; वह सब बिक जायेगी। खरीदने वाले ये सब हैं ही।”

मछलियां जाल से लगभग निकोली जा चुकीं।

मैने देखा कि यद्यपि वह खुश है अपनी सभी मछलियां बेच कर; पर उसे वाजिब दाम तो नहीं ही मिलता। सभी मछलियां निकालने के बाद खरीददार खरीद रहे थे पर जितना रेट के हिसाब से कीमत बनती थी, उससे दस पांच कम ही दे रहे थे और एक आध मछली ज्यादा ही ले जा रहे थे। फिश-मार्केट की बार्गेनिंग का दृष्य था और लड़का इसमें बुरी तरह मात खा रहा था। पर उसे बहुत दुख नहीं हो रहा था इस बात का।

किसान की तरह मल्लाह भी मार्केट की चाल से मात खाता है। यहां यह जरूर था कि तुरत-फुरत उसे रोकड़ा मिल जा रहा था। किसानी में वह भी नहीं होता।

सभी मछलियां तुल गयीं। झिक झिक के बाद जो पैसे मिलने थे, मिल गये लड़के को। आज मछलियां काफ़ी थीं, इसलिये ग्राहकों में भी बटंवारा आसानी से हो गया।

लड़के के हाथ में एक मछली का कांटा चुभ गया है। उसे ले कर वह कुछ व्यग्र है, पर अधिक नहीं। ग्राहक मछली खरीद कर चले गये। वह खुश है आज का काम खतम कर। अब गंगा उसपार घर जा कर सोयेगा।

जब वह अपनी पतवार संभालने लगा तो मैने कहा – आज तो नहीं, गंगा उस पार तक कभी घुमा लाओगे मुझे?

पर वह तुरंत उस पार घुमाने को तैयार था। मैं नाव से उस पार गया। … उसका विवरण एक और पोस्ट में।


यह फेसबुक नोट्स से ब्लॉग पर सहेजी पोस्ट है। फेसबुक ने अपने नोट्स को फेज आउट कर दिया, इसलिये पोस्ट्स वहां से हटा कर यहांं रखनी पड़ीं। नोट्स में यह पोस्ट नवम्बर 2017 की है।


चाय की चट्टी, मोही और माधुरी

खुद ही छोटा बच्चा। चार साल का होगा। अभाव में पलता। पर कुछ भी मिलने पर अपनी छोटी बहन को देने की बात पहले मन में आयी उसके। कौन सिखाता है यह संस्कार। यह स्नेह।


चाय की चट्टी पर खड़ा था वह बच्चा। एक टी-शर्ट और नेकर में। नंगे पैर। नेकर पीछे से कुछ ज्यादा ही फटी थी, जिससे उसका पीछे का भाग झांक रहा था। एक नाक से पानी बह रहा था। सांवला रंग। आकर्षक चेहरा। भावपूर्ण आंखें। पर कम से कम दो दिन से नहाया नहीं था।

मैने नाम पूछा। बताया – मोही।

फेसबुक नोट्स में 21 अप्रेल 2016 की पोस्ट। फेसबुक ने नोट्स फेज आउट कर दिये, इस लिये ब्लॉग पर सहेजी। पर यह छोटी पोस्ट पुरानी नहीं पड़ी है!

कहां रहते हो? उसने हाथ से बताया – रेलवे लाइन के उस पार।

अरुण (चाय की चट्टी पर बैठे मालिक) को मैने कहा कि पांच रुपये की पकौड़ियां उसे दे दे। मैने अरुण को पकौड़े के पैसे दिये। कागज में रख कर पकौड़ियां उस बच्चे को दीं तो कागज के साथ ही लपेट उसने दोनो हाथों में ले लिया।

मैने कहा – खा लो।

“नाहीं। घरे लई जाब। ओके देब। छोट बा हमसे – माधुरी। (नहीं घर ले जाऊंगा। मुझसे छोटी है माधुरी। उसको दूंगा।)”

खुद ही छोटा बच्चा। चार साल का होगा। अभाव में पलता। पर कुछ भी मिलने पर अपनी छोटी बहन को देने की बात पहले मन में आयी उसके। कौन सिखाता है यह संस्कार। यह स्नेह।

एक कोने से मेरी आंख नम हो आयी।

Mohi the kid
चाय की चट्टी पर मोही। हाथ में लिये है कागज में लपेटी पकौड़ियां।

पहले की कुछ टिप्पणियाँ –

दिनेशराय द्विवेदी – आप की बेहतरीन पोस्टों में से एक।

Gyanendra Tripathi – स्नेह संस्कारगत नहीं होता वह तो प्रकृति प्रदत्त होता है। संवेदनशीलता मूल में होनी चाहिये, स्नेह अनुभव में उतर जाता है, फिर दुनिया की बाक़ी चीज़ें फीकी हो जाती हैं।

Priyankar Paliwal – दिखने वाली भौतिक गरीबी से ज्यादा खतरनाक है मन की गरीबी . भावों की गरीबी . जहां भावों की गरीबी नहीं है वहां अभाव नहीं खलता, प्रेम पलता है . छुटकी माधुरी का यह चार साल का संरक्षक, उसका यह अभावग्रस्त पर भाव-समृद्ध बड़ा भाई मोही यानी ‘मोही द ग्रेट’ अपने आचरण से यह उद्घोषणा करता है कि मनुष्य का मूल स्वभाव प्रेम है, प्रतिस्पर्धा नहीं . सावधान रहें आपकी रिपोर्टिंग अब एक कवि की रिपोर्टिंग होती जा रही है . 🙂


जंगर चोरई नहींं करता मैं – रामसेवक

वे अपने हिसाब से बनारस से खरीद लाते हैं फूलों के पौधे, गमले या अन्य उपकरण। मेरी पत्नीजी उनके साथ लगी रहती हैं। पौधों, वृक्षों को पानी देना, धूप में रखना या बचाना आदि नियमित करती हैं। मेरी पोती चिन्ना पांड़े भी रामसेवक अंकल से पूछने के लिये अपने सवाल तैयार रखती है।


रामसेवक 51 साल के हैं। उनकी बेटी की शादी हो गयी है। दो लड़के हैं, जो गांव में ही अपने अपने हिसाब से काम करते हैं। कोचिंग करना, जूते चप्पल की दुकान रखना और सब्जी का धंधा करना उनके व्यवसाय हैं। बड़े लड़के की शादी हो गयी है। उसकी पत्नी भी सिलाई कर अर्जन करती है। पूरे परिवार में कोई दुर्गुण नहीं है। अपने काम से काम रखने वाला परिवार। घर के सभी लोग काम में लगे हैं तो (अपेक्षाकृत) सम्पन्नता भी है। रहन सहन और पास पड़ोस से बेहतर है।

Ramsevak gardener
“मेरा शरीर पतला है, इसलिये मेहनत करने में दिक्कत नहीं होती।” – रामसेवक

रामसेवक खुद रोज बनारस जाते हैं। कई बंगलों और फ्लैट्स में बागवानी का काम देखते हैं। हर घर से समय तय है। नियत समय पर वहां पंहुचते हैं और पूरे समय काम में लगे रहते हैं। सवेरे आठ बजे के आसपास घर से निकल कर बस या ऑटो पकड़ने के लिये हाईवे की ओर जाते देखता हूं बहुधा। शाम के समय तीन साढ़े तीन बजे बनारस से वापस निकल देते हैं। पहले जब हाईवे पर फ्लाईओवर के काम चल रहे थे तो दो दो घण्टे जाम में लग जाते थे। अब, वाराणसी-प्रयाग नेशनल हाईवे का काम पूरा हो जाने के बाद, समय पर सांझ होने के पहले घर वापस आ जाते हैं।

रामसेवक हमारे घर रविवार की सुबह दो-तीन घण्टे बागवानी का काम देखते हैं। उनके आने से घर के पौधे जीवंत हो उठे हैं। अभी कोहरे के कारण फूल कुछ दब गये हैं, पर वैसे हमारी बगिया चमक गयी है।

रामसेवक हमारे लिये खुशियाँ लाते हैं!

छरहरे बदन के रामसेवक जब से आते हैं, काम में ही लगे रहते हैं। एक काम निपटाते ही दूसरा पकड़ लेते हैं। शायद मन में सोच कर रखते हैं कि यह करना है और उसके बाद इस चीज का नम्बर है। घर परिसर में एक जगह से दूसरी पर जाना हो तो फुर्ती से जाते आते हैं। जैसे कैसियस क्ले (मुहम्मद अली) को बॉक्सिंग का बटरफ्लाई कहा जाता था, रामसेवक बागवानी के बटरफ्लाई हैं।

“उन्होने काम जांचने को सीसीटीवी कैमरे लगा रखे हैं। दफ्तर से आने के बाद अपने कम्यूटर पर देख लेते होंगे कि कहां क्या काम हुआ है। वर्ना उनसे ज्यादा बातचीत नहीं होती। अपने हिसाब से काम करता रहता हूं। समय पूरा देता हूं। जंगर चोरई नहीं करता।”

“बनारस में लोग, जिनके यहां आप काम करते हैं, आपके काम में साथ साथ रहते हैं?”

“नहीं। उनके पास समय ही नहीं है। बाग बगीचे की जानकारी है। यह जानते और बता देते हैं कि क्या कहां लगना चाहिये। पर साथ साथ लगने के लिये समय नहीं है। उन्होने सीसीटीवी कैमरे लगा रखे हैं। दफ्तर से आने के बाद अपने कम्यूटर पर देख लेते होंगे कि कहां क्या काम हुआ है। वर्ना ज्यादा बातचीत नहीं होती। अपने हिसाब से काम करता रहता हूं। समय पूरा देता हूं। जंगर चोरई (जांगर – पौरुष/श्रमशीलता। जंगर चोरई – काम से जी चुराने की आदत) नहीं करता।” रामसेवक बताते हैं। “मेरा शरीर पतला है, इसलिये मेहनत करने में दिक्कत नहीं होती।”

“मेरे ख्याल से इसके उलट बात है। आप काम में लगे रहते हैं। काहिली नहीं दिखाते। इसी लिये शरीर इकहरा है। नहीं तो शरीर पर चर्बी चढ़ जाती और काम करने में फुर्ती नहीं रहती।”

जैसे कैसियस क्ले (मुहम्मद अली) को बॉक्सिंग का बटरफ्लाई कहा जाता था, रामसेवक बागवानी के बटरफ्लाई हैं।

लम्बा अर्सा हो गया, रामसेवक की पत्नी के देहावसान को। “तब बच्चे छोटे छोटे थे। मैंने सोचा कि अगर दूसरा विवाह किया तो इन बच्चों की जिंदगी बरबाद हो जायेगी। इसलिये मैंने अपना ध्यान काम करने और बच्चों को पालने में लगाया। पहले मैं यहीं गांव में कोचिंग करता था। फिर बनारस जा कर साइकिल पर टोकरी में ले कर गली गली पौधे बेचना शुरू किया। लोग पौधों के बारे में और उन्हे कैसे लगाया जाये, इसके बारे में पूछते थे। कुछ लोगों ने कहा कि उनके बगीचे में काम कर उसे ठीक करूं। वह मुझे ज्यादा रुचा। तब टोकरी में पौधे ले कर गली गली बेचने की बजाय यह काम शुरू किया जो आज कर रहा हूं।”

रामसेवक के बारे में मैंने सबसे पहले 13 जुलाई 2020 को लिखा था –

आज राम सेवक जी से संपर्क किया। गांव में मेरे पड़ोसी हैं। वाराणसी में बंगलों पर माली का काम करते हैं। ट्रेनें नहीं चल रहीं तो साइकिल से आते जाते हैं। रविवार ही गांव में बिता पाते हैं।
उन्होंने मान लिया है कि रविवार को समय दे कर मेरे अरण्य को मेनिक्योर करेंगे।
#गांवदेहात

13 जुलाई 2020 को लिखे के साथ चित्र।

तब से अब तक छ महीने हो गये हैं। अरण्य अब उपवन बन गया है। उपवन से बेहतर उपवन की दिशा में कार्यरत हैं रामसेवक। वे अपने हिसाब से बनारस से खरीद लाते हैं फूलों के पौधे, गमले या अन्य उपकरण। मेरी पत्नीजी उनके साथ लगी रहती हैं। पौधों, वृक्षों को पानी देना, धूप में रखना या बचाना आदि नियमित करती हैं। मेरी पोती चिन्ना पांड़े भी रामसेवक अंकल से पूछने के लिये अपने सवाल तैयार रखती है। “जब वे रविवार को आयेंगे तो उनसे ये सब पूछना है।” रामसेवक अंकल को अपना मित्र समझती है।

मैंने रामसेवक जी के बैंक अकाउण्ट का विवरण ले रखा है। मेरा बागवानी में योगदान केवल रामसेवक जी के अकाउण्ट में उनका महीने का पेमेण्ट और उनके लाये सामान का पैसा देना भर है। यदाकदा उनके चित्र लेता हूं और उनसे बात करता हूं। वे मेरे ब्लॉग के काम के हैं।

रामसेवक के आने के बाद अरण्य अब उपवन बन गया है।

मुझे यकीन है कि रामसेवक जी से हमारा सम्बंध चिरस्थायी होगा।


महराजगंज कस्बे का मोची – जमुना

जमुना जूता-चप्पल की मरम्मत करते हैं। उसके अलावा तल्ले बाहर से मंगवा कर उनपर जूता बनाने का भी काम करते हैं। मैंने उनसे दो तीन जोड़ी चप्पलें ली हैं। काफी मजबूत हैं।


रिटायरमेण्ट के बाद गांव में घर बनाने और बटोही (साइकिल) के साथ घूमने में जिन पात्रों से परिचय हुआ, उनमें जमुना मोची भी है। और वह यहां मिले सबसे अच्छे पात्रों में एक है। जमुना भी मूलत: यहां भदोही जिले का रहने वाला नहीं है। चालीस साल पहले यहां आया था छपरा से। उस समय महराजगंज कस्बे के बाजार मेंं इतनी दुकानें नहीं थीं। कुल चार पांच दुकानें और उनके बाद खेत और पेड़ थे। तब से जमुना यहीं रह गये।

छपरा में अपने गांव आते जाते हैं, पर रिहायश यहीं हो गयी है।

जूता-चप्पल-बैग आदि की मरम्मत करते हैं। उसके अलावा जूते चप्पलों के तल्ले बाहर से मंगवा कर उनपर जूता बनाने का भी काम करते हैं। मैंने उनसे दो तीन जोड़ी चप्पलें ली हैं। अच्छी ही चल रही हैं। काफी मजबूत हैं।

मुझे लगता है कि लोग मुझसे बात करना चाहेंगे, मेरी बोलने बतियाने का स्तर या मेरी मेधा आंकेंगे। पर इन दोनो महिलाओं (पत्नी-बिटिया) को लगता है कि लोग मेरे बौद्धिक स्तर की बजाय मेरे जूते का ब्राण्ड देखेंगे।

मेरा चमड़े का बाटा का जूता भी अब पुराना हो गया है। सोचता हूं कि बनारस या प्रयागराज की किसी हाई फाई दुकान से नया जूता खरीदने की बजाय जमुना से ही नया बनवा लिया जाये। पर मेरी पत्नीजी और मेरी बिटिया, जो मेरे व्यक्तित्व में अब भी राजपत्रित अधिकारी का अंश देखती हैं; को यह पचता नहीं कि किसी समारोह में मैं गांव के मोची का बना “चमरौधा” जूता पहन कर जाऊं। मुझे लगता है कि लोग मुझसे बात करना चाहेंगे, मेरी बोलने बतियाने का स्तर या मेरी मेधा आंकेंगे। पर इन दोनो महिलाओं (पत्नी-बिटिया) को लगता है कि लोग मेरे बौद्धिक स्तर की बजाय मेरे जूते का ब्राण्ड देखेंगे। इसलिये, फिलहाल अब तक जमुना से एक जोड़ी जूता नहीं बनवाया या खरीदा है।

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अपनी गुमटी में कार्यरत जमुना

हां, चमड़े की सभी चीजें, जिनका काम मरम्मत करा कर चल सकता है, वे मैं जमुना की गुमटी पर ले जाता हूं। उनकी जिंदगी बढ़ जाती है। एक चमड़े की बेल्ट, जो मैंने छब्बीस साल पहले खरीदी थी (जिसे मेरे एक निरीक्षक महोदय नीमच के बाजार से खरीद लाये थे), का चमड़ा अच्छी क्वालिटी का होने के बावजूद, उम्र लगभग पूरी हो चली है। उसकी लम्बाई कुछ कम करा कर एक चकत्ती लगवा कर दो बार जमुना के माध्यम से उसकी उम्र बढ़वा चुका हूं। कल फिर उसकी मरम्मत कराने जमुना के पास ले कर गया। उसका लूप (बेल्ट कमर में कसने के बाद खुला हिस्सा खोंसने वाला रिंग) टूट गया था। जमुना से नया बनवाया। दस रुपया बनवाई लगी।

jamuna mochi, cobbler,
जमुना मेरी बेल्ट मरम्मत कर देते हुये। बेल्ट पर चकत्ती पहले लगी थी, अब उसके आगे लूप लगवाया है!

एक नयी बेल्ट खरीदने की बजाय इस तरह से मरम्मत करवा कर पहनना मेरी पत्नीजी को तनिक नहीं सुहाता। पर अब उम्र बढ़ने के साथ देखता हूं कि उनका मेरी “चिरकुट” वृत्ति पर नाक-भौं सिकोड़ना पहले की अपेक्षा कम होता जा रहा है। जिंदगी भर उन्होने मुझे साहब बनाने, मेरा स्तर इम्प्रूव करने की जद्दोजहद की; अब शायद समझ गयी हैं कि मैं अपने मूल स्वभाव को त्यागने वाला नहीं हूं। 😀

जमुना

सवर्ण लोग उसकी गुमटी के सामने खड़े खड़े अपने जूते चप्पल मरम्मत करवाते हैं। उसकी दुकान पर बैठना सवर्णियत की तौहीन लगती होगी। मैं, बैठ कर उससे बतियाता हूं।

लॉकडाउन में कैसे काम चला?

प्रश्न सुन कर जमुना एकबारगी अपनी आंखें बंद कर लेता है। “उसकी तो सोचना भी खराब लगता है। कोई काम नहीं था, कोई ग्राहक नहींं। घर का खर्चा चलाने के लिये तीन लाख का कर्जा हो गया है।” – जमुना उत्तर देता है।


इस ब्लॉग पर यह 1500वीं पोस्ट है।


मैं पूछने के लिये पूछ लेता हूं – मेरे लिये जूता बना दोगे?

वह बनाये हुये जूते दिखाता है। वे पसंद नहीं आते। मैं फरमाइश करता हूं कि जूते का तल्ला अच्छा होना चाहिये, गद्देदार। जिससे चलने में सहूलियत हो। वैसा तल्ला उसके पास उपलब्ध नहीं है। मंहगे तल्ले के मंहगे जूते की मांग यहां नहीं है। वह नया तल्ला लाना भी नहीं चाहता।

“अभी जितना सामान है, जितने जूते बनाये हैं; उनकी भी ग्राहकी नहीं है। ग्राहक आ रहे हैं लॉकडाउन के बाद। पर ग्राहकों के पास पैसा नहीं है। लगन की ग्राहकी थी कुछ समय के लिये। वह भी ज्यादा नहीं। अब तो मरम्मत का ही काम मिलता है।” – जमुना के कहने से यकीन होता है कि लोग अभी दैनिक खर्च लायक खरीददारी कर रहे हैं कस्बे के स्तर पर। उनकी माली हालत सामान्य नहीं हुई है।

अपनी मरम्मत की गयी बेल्ट ले कर वापस लौटता हूं। कम से कम एक दो साल और चल जायेगी यह एण्टीक बेल्ट!

old belt
छबीस साल पुरानी, चमड़े की मरम्मत और चकत्ती लगायी बेल्ट।

रघुनाथ पांड़े जी का मृत्यु-पुराण

रघुनाथ पांड़े कहते हैं – मर जाने पर पूरा इत्मीनान कर लेना। डाक्टर से भी पूछ लेना। कहीं ऐसा न हो कि जान बची रहे। एक चिनगारी छू जाने पर कितना दर्द होता है। पूरी देह आग में जाने पर तो बहुत दर्द होगा। … न हो तो बिजली वाले फ़ूंकने की जगह ले जाना।


हाल ही में मैंने एक पोस्ट लिखी थी – रघुनाथ पांड़े और धर्मराज के दूत

उसमें मैंनेे स्पष्ट किया था –

ऐसा नहीं है कि रघुनाथ पांड़े जी अभी मृत्यु की सोचने लगे हैं। पिछ्ले साढ़े तीन साल से तो मैं देखता/सुनता ही रहा हूं उनका यह मृत्यु-पुराण। एक पोस्ट और फेसबुक नोट्स पर है इस विषय में। देर सबेर उसे भी ब्लॉग पर सहेजूंगा। फेसबुक की “कांइया” नीति ने फेसबुक नोट्स गायब जो कर दिये हैं! 

वह अक्तूबर 2018 की पोस्ट फेसबुक नोट्स आर्काइव्स से खींचतान कर निकाली है और नीचे प्रस्तुत है। यह पोस्ट आपको उम्र मेें नब्बे पार के एक व्यक्ति से परिचय कराती है; जो वैसे स्वस्थ है, पर देर सबेर होने वाली मृत्यु के बारे में सोचता रहता है।


मेरे मित्र गुन्नीलाल पांडे के पिता श्री रघुनाथ पाण्डेय। नब्बे प्लस की अवस्था। सब ठीकठाक है, पर मृत्यु से भय की बात हमेशा करते रहते हैं।

उन्होने बेटे से कहा – मुझे जरा लोरी जैसा सुनाया करो, जिससे नींद ठीक से आ जाये। “कौनों भूत जईसा बा सरवा, जेसे डर लागथअ। देखात नाहीं, पर बा। (कोई भूत जैसा है। दिखता नहीं पर भय लगता है उससे। लगता है कि है।)”

श्री रघुनाथ पाण्डेय। 

मृत्यु की सोच बड़ी कारुणिक है उनकी….

कहते हैं – मर जाने पर पूरा इत्मीनान कर लेना। डाक्टर से भी पूछ लेना। कहीं ऐसा न हो कि जान बची रहे। एक चिनगारी छू जाने पर कितना दर्द होता है। पूरी देह आग में जाने पर तो बहुत दर्द होगा। … न हो तो बिजली वाले फ़ूंकने की जगह ले जाना।

यह कहने पर कि बिजली वाला शवदाह तो बनारस में है, वे बोले – “तब यहीं ठीक रहेगा। आखिर मरने पर शव यात्रा में काफ़ी संख्या में लोग तो होने चाहियें। इतने लोग बनारस तो जा नहीं सकेंगे।”

हर आये दिन घर और पट्टीदार लोगों को बुलाते हैं – अब हम जात हई (अब मैं जा रहा हूं। कल शायद नहीं रहूंगा)। सब को हाथ जोड़ते हैं। अगले दिन फिर चैतन्य हो कर गांव में घूमते नजर आते हैं।

रघुनाथ पांड़े जी

कुछ दिन पहले जिऊतिया के समय उन्होने कहा कि उनकी तबियत ठीक नहीं है। बुखार है। डाक्टर के पास ले चला जाये उन्हें। संजय (उनके पोते) ने देखा तो बुखार नहीं था। उन्हें बताया गया कि आज दवा ले लें। घर में स्त्रियां जिऊतिया का निर्जल व्रत हैं। ऐसे में उन्हें ले कर अस्पताल जाना असुविधाजनक होगा। उन्हें दवा दी। दो घण्टे बाद अपने को ठीक महसूस करने लगे| उस प्लेसबो के मुरीद हो गये वे। बार बार वही दवा मांगने लगे। पेरासेटमॉल की गोली बहुत काम की निकली।

मुझे लगता है कि स्वास्थ्य के आधार पर अभी वे 4-5 साल तो चलेंगे ही। वैसे यह मृत्यु-पुराण पिछले दो साल से तो मैं सुन रह हूं। उसके पहले भी अपने परिवार में कहते रहे होंगे।

(गुन्नीलाल पाण्डेय बताते हैं कि सन 2014-15 से मृत्यु के बारे में सोचने-बोलने, अपना स्वास्थ्य खराब होने, दिल घबराने आदि की बातें करने लगे हैं। कुटुम्ब में उनसे उम्र में किसी छोटे की मृत्यु हो गयी थी। उसके सदमे में उन्हे लगा कि उनकी भी तबियत बिगड़ गयी है। वे भी जाने वाले हैं। लोग उस समय शवदाह के लिये गंगा घाट पर थे। गुन्नीलाल पिता की तबियत बिगड़ने की खबर पा कर घर वापस लौटे। सिवाय सदमे के बाकी सब ठीक था उनके साथ। दो घण्टे बाद सामान्य हो गये। पर उसके बाद से अपनी मृत्यु के बारे में बातें करने लगे हैं।

वैसे, गुन्नीलाल कहते हैं कि उनके पिताजी “मरना कत्तई नहीं चाहते”!)

सरल व्यक्ति हैं रघुनाथ पांडे और पिता/बाबा की पूरे मना से सेवा करने वाले हैं गुन्नी/संजय और उनका परिवार।

भगवान करे, रघुनाथ पांड़े शतायु हों!

यह पं. रघुनाथ पाण्डेय का ताजा चित्र है। वे धूप में बैठने के लिये अपनी खाट खुद घसीट कर ला रहे हैं। उन्हे देख कर नहीं लगता कि वे अस्वस्थ हैं।