गोविंद लॉकडाउन में बम्बई से लौट तीन बीघा मेंं टमाटर उगा रहे हैं

वे लॉकडाउन के समय बंबई से अपने घर वापस लौटे थे। वहां ऑटो चलाते थे। यहां समझ नहीं आया कि क्या किया जाये। फिर यह सब्जी उगाने की सोची।


बहुत से लोग अब पुन: मेट्रो शहरों में पलायन कर गये हैं। बसें भर भर कर जा रही हैं। बहुत सी बसों का किराया महानगरों के कारखाना मालिक सीधे बस वालों को ऑनलाइन भर रहे हैं। मैं यह जानता हूं, इसलिये कि मेरे साले साहब – विकास दुबे बस मालिक हैं। उनकी बसें जो लॉकडाउन में गांव में खड़ी कर दी गयीं थीं, अब सब ठीकठाक बिजनेस कर रही हैं। विकास के बस करोबार पर तो फिर कभी लिखूंगा; अभी तो एक ऐसे व्यक्ति के बारे में बताना है जो महानगर वापस नहीं लौटा।

मैंने कमहरिया के योगेश्वरानंद आश्रम जाते समय देखा कि सड़क से जुड़े एक विस्तृत इलाके में जाली की बाड़ लगी है और उसमें एक मचान भी बना है। पहले यह जगह कुशा/कास/सरपत की घास से भरी होती थी। कोई खेती वहां नहीं होती थी। गंगा के पास यह इलाका – करीब 100-200 बीघा – यूं ही कास उगे बंजर जैसा हुआ करता था। बीच बीच में कहीं कोई बाजरा या ज्वार की फसल दिखाई देती थी। वहां इस तरह की बाड़ और मचान का मिलना मन में कौतूहल जगा गया।

अगले दिन उसी स्थान पर साइकिल पर जोन्हरी का डंठल लादे आते एक सज्जन मिले। नाम बताया शिवशंकर सिंह। वे कमहरिया गांव के ही निवासी हैं। वे बोले कि केवटाबीर की ओर का कोई यादव है, जिसने यह किराये पर जमीन ले कर टमाटर की खेती शुरू की है।

कमहरिया गांव के शिवशंकर सिंह

“यह जमीन पंद्रह साल पहले तक बहुत उपजाऊ थी। जब हल बैल से खेती होती थी तो पूरे इलाके में खेती किसानी से गुलजार रहता था। पास में जो कुंआ है, उसमें ट्यूबवेल था सिंचाई के लिये। फिर खेती करने वाले रहे नहीं। नयी पीढ़ी शहर जा कर नौकरी में लग गयी। बहुत से लोगों ने औने पौने भाव में जमीन बेच दी। अब यह बाहर से आ कर टमाटर की खेती करने लगे हैं।”

शिवशंकर सिंह जी से बात कर हटा ही था कि मोटर साइकिल पर खेती करने वाले तीन चार सज्जन आ गये। उनमें गोविंद जी से बात हुई। गोविंद ही यह टमाटर की खेती का काम कर रहे हैं।

गोविन्द, बरैनी के रहने वाले। उन्होने कमहरिया में टमाटर की खेती प्रारम्भ की है।

गोविंद मुझे एक तरफ से बाड़ हटा कर अपने खेत में ले कर गये। मैं वहां उनके मचान की फोटो लेना चाहता था। वह भी लिया। उसके साथ उनके इस व्यवसाय के बारे में भी बातचीत की। वे मुझसे बातचीत करते कुछ असहज थे – किसी भी अपरिचित से अपने नये शुरू किये उद्यम की बात करने में जो असहजता होती थी, वह थी। अपने बारे में कोई बढ़ चढ़ कर कहने की प्रवृत्ति नहीं दिखी उनकी। मेरे प्रश्नों के उत्तर भर दिये।

गोविंद के खेत के बीच में बना मचान

वे लॉकडाउन के समय बंबई से अपने घर वापस लौटे थे। वहां ऑटो चलाते थे। यहां समझ नहीं आया कि क्या किया जाये। फिर यह सब्जी उगाने की सोची। यह जमीन पूरी तरह जंगली घास से भरी थी। अपने खेत के बाहर उगी कुशा की ओर दिखा कर कहा कि सब जमीन वैसी ही थी। उसको मेहनत से खेत में बदला। टमाटर की पौध लगाई। अब तक पौध काफी बड़ी हो चुकी होती पर एक बार घणरोज (नीलगाय) का झुण्ड उन्हें चर गया।

गोविंद ने मुझे टमाटर के पौधे दिखाये जिनके तने के ऊपरी भाग की डण्डी नीलगाय द्वारा चर ली गयी थी। यह पुख्ता बाड़ शायद उस दुर्घटना के बाद लगाई हो। सिंथेटिक मोटी जाली की बाड़ मुझे मजबूत और आकर्षक लगी।

दूर किनारे पर कुआं भी दिखाया गोविंद ने। उसमें ट्यूबवेल लगा है। बिजली की सप्लाई आती है। वहां से लपेटा पाइप के जरीये खेत के बीचोंबीच बनाये एक गड्ढे में पानी भरते हैं वे और वहां से छोटे बर्तनों के द्वारा प्रत्येक पौधे को सींचा जाता है। अभी पूरे खेत पर पौधे नहीं लगे हैं। शायद आधे से कम हिस्से पर ही खेती हो पायी है। पर जुताई कर पूरी जमीन बुआई के लिये तैयार है।

गोविंद के खेत के बाहर की कुशा/सरपत वाली जमीन। नेपथ्य में जो एक अलग पेड़ दिखता है, वहां कुआं है, जिससे गोविंद के खेत में पानी की सप्लाई मिलती है।

खेत के आसपास की जमीन भी खाली है; यद्यपि उसे भी खेत के रूप में विकसित करने में मेहनत लगेगी। गोविंद ने स्पष्ट तो नहीं बताया, पर शायद वे अपनी सब्जी की खेती के लिये आसपास की जमीन भी लेने का विचार भी कर रहे हो! इस तरह की जमीन को खेत के लिये परिवर्तित करना एक भागीरथ प्रयत्न सरीखा है। मैंने गोविंद को मेहनत और उससे मिलने वाले लाभ के विषय में उनके गणित को जानने हेतु कुछ प्रश्न किये। उनका कहना था कि काम शुरू भर कर दिया है। बहुत सोच विचार की जहमत नहीं उठाई। शायद इस तरह की शुरुआत एक एडवेंचर सरीखी है – उसके बारे में पूरा रुपया-आना-पाई का हिसाब लगा कर शुरुआत करने वाले मेरी तरह के लोग होते हैं – जो आकलन ही करते रह जाते हैं; शुरुआत ही नहीं करते। गोविंद, लगता है जैसे जैसे समस्यायें आती होंगी, वैसे वैसे उससे जूझते होंगे। पर उनकी प्रकृति का अंदाज तो भविष्य में उनसे निरंतर आदान-प्रदान से ही लग सकेगा।

गोविंद के खेत में पंद्रह बीस मिनट मैंने व्यतीत किये होंगे। उनका मोबाइल नम्बर भी, भविष्य में सम्पर्क करने के लिये ले लिया। मेरे मन में उनके प्रॉजेक्ट का भविष्य और सफलता जानने की जिज्ञासा प्रबल है। लॉकडाउन के बाद महानगर वापस न लौट कर यहीं एक सार्थक व्यवसाय की जद्दोजहद करने वाले गोविंद एक ऑउटलायर तो हैं ही। लकीर से हट कर चलने वाले हर व्यक्ति के प्रति मन में जिज्ञासा भी होती है और शुभेक्षा भी।

आखिर, गांव में साइकिल ले कर निकलने – देखने – लिखने वाला मैं भी एक ऑउटलायर ही तो हूं।

मुझे अच्छा लगेगा, अगर पाठक गोविंद को उनके उद्यम के लिये शुभकामना देंगे। उन्हें सफल होना ही चाहिये।


बाढ़ू का नाम कैसे पड़ा?

बाढ़ू ने बताया कि सन 1948 की बाढ़ में जन्म होने के कारण उनका नाम बाढ़ू पड़ गया और वही नाम चलता चला आ रहा है।


बाढ़ू मेरे मित्र हैं। सन अढ़तालीस की पैदाइश। उस हिसाब से मुझसे सात साल बड़े हुये।

मेरे घर दही ले कर आते थे, तभी से उनसे मित्रता हुई। घर में दही की जरूरत न भी होती थी, तो मैं उनसे आधा किलो या एक पाव जरूर खरीदता था। उसके साथ उनकी बातें सुनने को मिलती थीं। बीच में वे मुझे दूध भी बेचने लगे थे। पर वह सिलसिला चला नहीं।

बाढ़ू यादव।

आजकल बाढ़ू ने अपनी पाही पर भन्टा लगाया है। कुछ दिन पहले उनसे तीस रुपये का बैंगन लिया था बाटी-चोखा के भुर्ता के लिये। उस समय मेरे पास खुल्ले पैसे नहीं थे तो आज साइकिल भ्रमण के दौरान उन्हे देने के लिये उनकी पाही पर रुका। सवेरे का समय। बाढ़ू मड़ई के बाहर रखी चौकी पर नहीं थे। पास के अपने सब्जी के खेत में थे। वहां से निकल कर सडक के किनारे मुझसे मिलने और बातचीत करने आये।

प्रगल्भ हैं बाढ़ू। बताने लग गये कि सन अढ़तालीस की बाढ़ के समय उनकी पैदाइश हुई। उस साल बाढ़ आयी थी। वैसी बाढ़ फिर कभी नहीं आयी। उस बाढ़ में उनका द्वारिकापुर का घर गिर गया था और उनका जन्म अपने घर की बजाय ठाकुर साहब के ओसारे में हुआ।

बाढ़ में जन्म होने के कारण उनका नाम बाढ़ू पड़ गया और वही नाम चलता चला आ रहा है।

“जब मेरा जन्म हुआ था तो गांव में बहुत एका था। बहुत भाईचारा। माई बताती हैं कि उस समय हर घर से दो-चार रोटी बन कर माई के सऊरी में होने के कारण आती थीं। कुल मिला कर तीन चार बित्ता रोटियाँ हो जाती थीं। हर घर वाला बाढ़ की विपदा के बावजूद सहायता को तत्पर रहता था।”

“ये मास्टर (मेरे बड़े साले साहब – पण्डित डा. देवेंद्रनाथ दुबे, जो स्कूल मास्टर नहीं, प्रोफेसर थे) , मेरे साथ यहीं तुलसीपुर के प्राइमरी स्कूल में पढ़ते थे। आधी छुट्टी में अपने घर ले जाते थे। वहां खिचड़ी खाने को मिलती थी। खा पी कर फिर आते थे हम लोग स्कूल। घिऊ मजे क होत रहा खिचड़ी में (घी खूब होता था खिचड़ी में)।”

बाढ़ू अपने बचपन और अतीत के वर्णन में चले गये थे। मुझे घर लौटने की जल्दी थी। मैं उन्हे वापस लाया। चलते चलते उनका हाल पूछा। बताया कि “गोड़वा क चोट त ठीक होइ ग बा, पर घेटुना अब पकड़ई लाग बा। बुढ़ाई क असर बा (पैर की चोट तो अब ठीक हो गयी है पर घुटना अब जकड़ने लगा है। उम्र का असर हो रहा है)।”

मैंने कहा कि फुर्सत से उनके साथ बैठूंगा और उनकी जीवन गाथा सुनूंगा। सात साल बड़े होने के बावजूद बाढ़ू मुझसे ज्यादा स्वस्थ हैं और उनकी याददाश्त और बोलने की शक्ति में कोई कमी नहीं है। पिछले छ-सात दशकों में गांवदेहात कैसा बदला है और उसपर एक ग्रामीण क्या राय रखता है, वह बताने के लिये बाढ़ू एक उपयुक्त व्यक्ति हैं।

आप अपेक्षा कर सकते हैं कि बाढ़ू से बाद में मैं मिलता और गांवदेहात को गहनता से जानने – लिखने के लिये इनपुट्स लेता रहूंगा।


स्कूल बंद हैं तो घर में ही खोला एक बच्चे के लिये स्कूल

सात साल की पद्मजा का अध्यापक बनना मुझे कठिन काम लगा। बहुत ही कठिन। एक बच्चे की मेधा और उसकी सीखने के स्तर पर उतर कर सोचना आसान काम नहीं है। केल्कुलस पढ़ाना साधारण जोड़, घटाना पढ़ाने की अपेक्षा आसान है।


सात महीने हो गये। स्कूल बंद हैं। पहली से दूसरी में बिना परीक्षा लिये पंहुच गयी है पद्मजा (मेरी पोती)। कुछ समय ह्वाट्सएप्प पर स्कूल वालों ने होमवर्क देने और नोटबुक पर किये कार्य के उसी चैट में भेजे चित्र को जांचने का यत्न किया। पर वह सब ठीक से चल नहीं पाया। गांव में माता पिता बच्चों को पढ़ाने के लिये स्कूल का पर्याय नहीं बन पाये। उनके पास समय और काबलियत दोनो की कमी रही। अत: स्कूल बंद ही माने जा सकते हैं – उचित टेक्नॉलॉजी और संसाधनों के अभाव में।

पद्मजा के स्कूल की तुलना में सरकारी स्कूल तो और भी दयनीय दशा में हैं। गांव के सरकारी स्कूलों के बच्चे, तो छुट्टा घूम ही रहे हैं। आपस में आसपड़ोस के बच्चों में हेलमेल तो हो ही रहा है। वे अभी भी कोई कोरोना अनुशासन का पालन नहीं कर रहे और स्कूल अगर खुले तो भी स्थिति वैसी ही रहेगी।

मेरी पत्नीजी और मेरी पोती पद्मजा। लगता है किसी चिड़िया या किसी गिलहरी/गिरगिट का अवलोकन हो रहा है।

मैंने पद्मजा के स्कूल के मालिक कैलाश जी से बात की। उन्होने बताया कि इस महीने के अंत तक वे पीटीए मीटिंग बुला कर अभिभावकों से सलाह करने के बाद ही स्कूल खोलने के बारे में कुछ तय कर पायेंगे। वे अपनी ओर से तो पूरा प्रबंधन कर सकते हैं। सेनीटाइजर, मास्क, हैण्डवाश आदि की सुविधा उपलब्ध करा सकते हैं। पर बच्चे तो बच्चे ही हैं। आपस में मिलेंगे ही। एक दूसरे का पानी पी जाते हैं। एक दूसरे का भोजन भी शेयर करते हैं। वह सब कैसे देखा जा सकता है?

महीने भर में; बड़ी कक्षाओं के स्कूल खुलने और अन्य गतिविधियों पर पंद्रह अक्तूबर से ढील दिये जाने के कारण संक्रमण कैसा चलता है और अभिभावक कितना आश्वस्त महसूस करते हैं; उसी आधार पर छोटे बच्चों का स्कूल खोलने का निर्णय हो पायेगा।

मुझे यह पक्के तौर पर लग रहा है की पद्मजा का इस स्कूल सत्र का मामला खटाई में पड़ गया है। अत: मैंने तय किया कि इस साल की सभी विषयों की पूरी पढ़ाई घर पर ही कराई जाये। अभी साल/सत्र के छ महीने बचे हैं। उसको इस साल का पूरा सेलेबस घर पर पढ़ाया-पूरा किया जा सकता है।

इस निर्णय के साथ मैं, एक रिटायर्ड व्यक्ति से एक बच्चे का पूर्णकालिक अध्यापक बन गया। जब मैं, चार दशक पहले, बिट्स, पिलानी में छात्र था, तो मुझे विभागाध्यक्ष महोदय ने मेरी अभिरुचि और योग्यता को ध्यान में रखते हुये मुझे लेक्चररशिप का ऑफर दिया था। तब दिमाग भी उर्वर था और कुछ ही समय में मैं परा-स्नातक और और पीएचडी कर लेता। पर उस समय पारिवारिक दबाव और खुद की चाहत से लगा कि सरकारी अफसरी कहीं बेहतर रहेगी। अगर मैं अपने विभागाध्यक्ष जी का ऑफर स्वीकार कर लेता तो मेरी व्यवसायिक दिशा कुछ और ही होती।

अब परिस्थितियाँ मुझे पहली/दूसरी कक्षा का अध्यापक बना रही हैं। 😆

सात साल की पद्मजा का अध्यापक बनना मुझे कठिन काम लगा। बहुत ही कठिन। एक बच्चे की मेधा और उसकी सीखने के स्तर पर उतर कर सोचना आसान काम नहीं है। केल्कुलस पढ़ाना साधारण जोड़, घटाना पढ़ाने की अपेक्षा आसान है। अपनी पत्नीजी को मैंने अपनी आशंकायें बतायीं, पर मेरी सुनी नहीं गयी। मैं “द कर्स ऑफ नॉलेज” से अभिशप्त था। मुझे पद्मजा के स्तर पर उतर कर सोचने और समझाने की क्षमता विकसित करनी थी।

डिज्नी-बायजू पैकेज

बाजयू की अर्ली लर्न पेकेज वाली कक्षा में पद्मजा

यह मेरा सौभाग्य था कि कुछ महीने पहले डिज्नी-बायजू का अर्ली लर्नर्स का पैकेज पद्मजा के लिये ले लिया था। अभी वह बायजू के टैब से, अपने हिसाब से जो मन आ रहा था, वह कर रही थी। बायजू का यह पैकेज लेने के बाद मुझे लग रहा था कि यह भारतीय (और मेरे संदर्भ में गंवई) परिवेश के लिये फिट नहीं बैठता था। इस कारण से मैंने उसके प्रयोग पर बहुत ध्यान नहीं दिया था।

पर अब मैंने पाया कि भाषा कीं समस्या के बावजूद पद्मजा मेरी अपेक्षा उन डिज्नी चरित्रों से बेहतर तालमेल से पढ़ाये गये विषय समझ रही थी। उसके वीडियो और गेम्स में आने वाले चरित्र – डीटी, जेन और जेक्सन उसे कहीं आसानी से गणित और अंग्रेजी सिखा रहे थे। मैंने उसी पैकेज से अपना टीचिंग प्रारम्भ करने की सोची।

बायजू की फेसिलिटेटर महोदया से बातचीत कर यह तय किया कि पद्मजा का अब तक का पढ़ा प्लान व्यवस्थित तरीके से एक बार पुन: रिवाइज कर लिया जाये और जो कुछ उसने नहीं पढ़ा; उसे पूरा कराया जाये। लगभग एक महीने में मैंने छ महीने के लर्निंग प्लान का बैकलॉग निपटा कर व्यवस्थित कर लिया। इस प्रक्रिया में पद्मजा को कुल चौबीस बैजेज में से बीस प्राप्त हो गये। उसकी विभिन्न स्किल्स में भी अति उत्तम (Excellent) कोटि प्राप्त हो गयी, जो पहले सामान्य स्तर की थी।

महीने भर बाद बायजू की पद्मजा के लिये नियत अधीक्षिका स्वाति प्रिया जी से चर्चा हुई तो उन्होने न केवल पद्मजा की प्रगति पर संतोष व्यक्त किया वरन यह भी कहा कि प्रगति अभूतपूर्व है।

डिज्नी/बायजू का यह टैबलेट सहित आने वाला अर्ली लर्निंग पैकेज अच्छा है; पर फिर भी मैं यह कहना चाहूंगा कि यह इण्डिया के लिये है, भारत के लिये नहीं। आवश्यकता है कि यह हिंदी या हिंगलिश में डब किया जाये और उसमें भारतीय परिस्थितियों के संदर्भ भी लिये जायें। और मुझे यह यकीन है कि बायजू की टीम में पर्याप्त इनहाउस टैलेण्ट होगी।

इस पढ़ाने की प्रक्रिया में बायजू/डिज्नी पैकेज के अलावा मैंने भी अपने इनपुट्स दिये। पद्मजा को यह अहसास कराया कि क्लास में किस प्रकार से अपनी बात को समझाया, बताया जाता है। किस प्रकार से अपने परिवेश को देखा जाता है। किस शब्द का कैसे उच्चारण किया जाता है। कैसे दुनिया को समझा जाता है। मैंने उसके लिये एक ग्लोब मंगाया और उसे विश्व के अनेक स्थानों और भूत काल में की गयी प्रमुख यात्राओं के बारे में भी जानकारी दी। पद्मजा को अब कोलम्बस, वास्कोडिगामा और झेंग हे (Zheng He) जैसे नाविकों के बारे में पता है। यह भी ज्ञात है कि उन्होने कहां से कहां तक यात्रायें की थीं।

मैंने उसे विज्ञान और हिंदी पढ़ाने की रूपरेखा भी बनाई।  

ज्वाइण्ट डायरी

मैंने एक ज्वाइण्ट डायरी बनाई, जिसमें मैंने अपने विचार लिखे और उसमें पद्मजा को भी लिखने, या चित्र बना कर बताने को कहा। मैंने लिखा कि किस तरह पद्मजा ने एक अच्छे सम्प्रेषक की तरह अपना प्रेजेण्टेशन दिया था। वह रात में सभी लाइट बुझा कर बोर्ड पर टॉर्च से फोकस कर एक डॉक्यूमेण्ट्री फिल्म की तरह समझा रही थी। सात साल की बच्ची के लिये यह कर पाना अभूतपूर्व था! कुल मिला कर “द कर्स ऑफ नॉलेज” से मैंने पार पाने की विधा तलाश ली थी और पद्मजा जो शुरुआत में मुझसे डरी सहमी रहती थी, अब मित्र बन चुकी थी। ज्वाइण्ट डायरी में उसने लिखा तो बहुत नहीं, पर उससे उसके व्यक्तित्व में परिवर्तन बहुत हुआ।

पद्मजा अपने ह्वाइट बोर्ड पर तरह तरह के कार्टून बनाती और मुझे उनपर व्याख्यान देती है!

घर का बना स्कूल

मैंने पद्मजा की स्टडी टेबल को नाम दिया बीडीबी (बाबा-दादी-बबिता) स्कूल। यह नाम उसके स्कूल – बीएलबी पब्लिक स्कूल की तर्ज पर रखा गया। अपने कमरे के बाहर यह नाम एक पन्ने पर प्रिण्ट कर बायजू के स्टिकर के साथ लगा दिया। स्कूल का समय भी नियत कर दिया। सवेरे साढ़े नौ बजे और दोपहर साढ़े तीन बजे।

प्रति दिन तीन से चार घंटे के बीच अध्ययन अध्यापन का कार्यक्रम रहता है। अभी तो पुराना बैकलॉग होने के कारण सप्ताह में सातों दिन चला स्कूल पर अब सप्ताह में एक दिन छुट्टी रहने का तय किया है हमने।

घर में मेरे बेडरूम में चलता पद्मजा का स्कूल

पद्मजा समय पर उठने लगी; समय पर क्लास के लिये उपस्थित होने लगी। अपने टैबलेट को विधिवत चार्ज करने लगी। किताबें और एक्सरसाइज बुक्स सम्भाल कर रखने लगी।

पिछले डेढ़ महीनों में घर में बहुत परिवर्तन हुये हैं। मेरा और मेरी पोती के समीकरण में व्यापक परिवर्तन हुआ है। पद्मजा में जो बदलाव है, वह तो अपनी जगह; मुझमें भी परिवर्तन हुये हैं। मुझे भी एक काम मिल गया है।

इस परिवर्तन में कीली की भूमिका डिज्नी/बायजू के अर्ली लर्नर प्रोग्राम ने निभाई है। उसने मुझे छोटे बच्चे को पढ़ाने/समझाने का एक नया नजरिया दिया है। स्वाति प्रिया जी ने भी बहुत सकारात्मक तरीके से मुझे सुना और अपने सुझाव/निर्देश दिये हैं।

फिलहाल मैं बच्चों की मानसिकता की बेहतर समझ के लिये डा. हईम सी गिनॉट (Haim C Ginott) की क्लासिक पुस्तक Between Parent and Child पढ़ रहा हूं। यही सब चलता रहा और स्वाति प्रिया जैसों के उत्साहवर्धक इनपुट्स मिले; तो शायद मेरे ब्लॉग का चरित्र बदल जाये। गंगा किनारे साइकिल पर भ्रमण करने वाले व्यक्ति की बजाय बच्चों पर सोच रखने वाले की पोस्टें आने लगें “मानसिक हलचल” पर। देखें, आगे क्या होता है!

अभी तो पद्मजा विषयक कुछ ही पोस्टें ब्लॉग पर हैं।

पद्मजा पाण्डेय मेज पर बैठ कर कार्टून बनाती और उसकी कथा मुझे सुनाती हुई।

केदारनाथ चौबे, परमार्थ, प्रसन्नता, दीर्घायु और जीवन की दूसरी पारी

उनका जन्म सन बयालीस में हुआ था। चीनी मिल में नौकरी करते थे। रिटायर होने के बाद सन 2004 से नित्य गंगा स्नान करना और कथा कहना उनका भगवान का सुझाया कर्म हो गया है।


वे द्वारिकापुर में गंगा किनारे मिलते हैं। कथावाचक हैं। गंगा किनारे चबूतरे पर स्नानार्थियों, महिलाओं को कथा सुनाते दिखते हैं। भागवत कथा। और भी अन्य कथायें। बातचीत में रामचरित मानस, भागवत पुराण और अन्य ग्रंथों से मुक्त हस्त उद्धरण देते पाया है उन्हे। अच्छा कहते हैं। सरल आदमी हैं।

केदारनाथ चौबे

मुझसे जब भी मिलते हैं, कुछ न कुछ धर्म-कर्म की बातें सुनाते हैं। अभी फरवरी के महीने में मुझसे बोले थे कि इस चैत्र के नवरात्र में वे द्वारिकापुर के मंदिर पर भागवत कथा कहेंगे और उस संदर्भ में मेरा योगदान लेने मेरे घर पर भी आयेंगे। पर उसके बाद कोरोना संक्रमण के कारण लॉकडाउन हुआ और उनका मेरे घर आना या उनका कथा कहना नहीं हो पाया।

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करें मास्टरी दुइ जन खाइँ, लरिका होइँ, ननियउरे जाइँ

गुन्नीलाल जी का मत है कि हमें 50-30-20 के नियम का पालन करना चाहिये। “जितनी आमदनी हो, उसके पचास प्रतिशत में घर का खर्च चलना चाहिये। तीस प्रतिशत को रचनात्मक खर्च या निर्माण के लिये नियत कर देना चाहिये। बचे बीस प्रतिशत की बचत करनी चाहिये।


आपको इस पोस्ट का शीर्षक अजीब सा लग सकता है। यह स्कूल मास्टर की आर्थिक दशा पर अवधी/भोजपुरी में कही एक कहावत है जो गुन्नीलाल पाण्डेय जी ने उद्धृत की। अभिप्राय यह कि, उनके युग में, (अनियंत्रित आदतों के कारण) स्कूल मास्टर दो का ही खर्च संभालने लायक होता था, बच्चे ननिहाल की कृपा से पलते थे। … आज भी कमोबेश वही हालत होगी, बावजूद इसके कि वेतन पहले की अपेक्षा बहुत सुधर गये हैं। बहुत बड़ी आबादी अपने खर्चे अपनी आय की सीमा में समेटने की आदतों को नहीं अपनाती… और यह इस प्रांत/देश की बात नहीं है – वैश्विक समस्या है। उपभोक्तावाद ने उत्तरोत्तर उसे और विकट बना दिया है।

श्री गुन्नीलाल पाण्डेय

गुन्नी लाल पाण्डेय मेरी जीवन की दूसरी पारी के प्रिय मित्र हैं। वे स्कूल मास्टर के पद से रिटायर हुये हैं। पहली पारी में उनसे मुलाकात तो सम्भव नहीं ही होती। दूसरी पारी में भी अगर मैं अगर एक कॉन्ट्रेरियन जिंदगी जीने की (विकट) इच्छा वाला व्यक्ति न होता और मेरी पत्नीजी मेरी इस खब्ती चाहत में साथ न देतीं तो गुन्नीलाल जी से मुलाकात न होती। उनसे मैत्री में बहुत और भी ‘अगर’ हैं, पर उनसे मैत्री शायद हाथ की रेखाओं में लिखी थी, तो हुई।

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