भरतलाल की सगाई



भरतलाल शर्मा मेरा सरकारी भृत्य है. उसकी अस्थाई नौकरी लगते ही गांव-देस में उसकी इज्जत बढ गई. पांच हजार की पगार की स्लिप उसने गर्व से सबको दिखाई. सब परिजन-दुर्जन कर्जा मांगने में जुट गये. उसके भाई जो उससे बेगार कराते थे और उसकी सारी मजदूरी हड़प जाते थे, अब उससे हक से/बेहक से पैसा मांगने लगे. बिना मां-बाप का भरतलाल इतना अटेंशन पाकर कुप्पा होगया. लिहाजा बचत का बड़ा हिस्सा धर्मादे में जाने लगा. जो कर्जा उसने दिया उसे कोई चुकाने का नाम ही नही लेता.

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शेयर मार्केट धड़ाम

शेयर बाजार धड़ाम होता है, चढने के लिये. असली चीज आशावाद है.



उधर चिदंबरम जी बजट भाषण की तैयारी कर रहे थे, इधर शेयर मार्केट दुबला हुआ जा रहा था. मुन्ना का कहना सही है – भैया, बहुत से दिन सांड़ों के होते हैं; कभी कभी तो भालुओं की भी चांदी कटनी चाहिये. मुन्ना धुर आशावादी है. मैं शेयर मार्केट के बारे में बात कर आशावाद का टानिक उससे लेता हूं. मेरा शेयर मार्केट में ज्यादा स्टेक नहीं है, सो थोडा बहुत तात्कालिक घाटा आशावाद के टानिक के लिये अच्छा है. मुन्ना से बात कर मैं अपने स्टॉक की नैसर्गिक मजबूती के बारे में आश्वस्त हो कर ’मस्त’ हो जाता हूं. बजट की चीर फाड़ की जहमत नहीं उठाता. Continue reading “शेयर मार्केट धड़ाम”