दांत का कीड़ा झड़वाये अशोक पण्डित

गांव में नहर की बगल में नटों के घर हैं। उनकी औरतें ये कीड़े निकालती हैं। जिस ओर के दांत में दर्द हो, उस ओर के कान में दवा डालती हैं और कान की तरफ सिर झुकाने पर दांत के कीड़े कान से निकलते हैं। कीड़े निकलने के पांच दस मिनट बाद ही आराम हो जाता है।


दांत के दर्द से परेशान हैं अशोक पण्डित। अशोक पण्डित यानी अशोक दुबे। मेरे वाहन चालक हैं। मेरे गांवदेहात की समझ को अपने दृष्टिकोण से परिपुष्ट करने में मेरे सहायक। वे गांव की हलचल बताने और उसपर अपनी सोच जाहिर करने में संकोच नहीं करते।

जब वे घर पर आते हैं तो उनसे ज्यादा बातचीत नहीं होती। पर जब कार में सारथी कर निकलते हैं; तब बात प्रारम्भ होती है – “तब असोक, फलाने क का हालचाल बा?”

फलाने के हालचाल से शुरू हुई बातचीत महुआ, मुसहर, चुनाव, पोखरी, आसपास हुये मर्डर या एक्सीडेण्ट, भूत-प्रेत … सब तक घूम आती है। निर्भर करता है कि कितनी दूर जाना है और कितना रिसेप्टिव मैं हूं। कभी कभी जब कान में पॉडकास्ट सुनने के लिये ईयरफोन ठुंसा होता है तो मौन ही चलता है। कभी जब मौसम अच्छा हुआ या कार में वातानुकूलन ठीक रहा तो ज्यादा मुद्दों पर भी चर्चा हो जाती है। … आजकल जब पॉडकास्टिंग पर मेरे अनगढ़ प्रयोग हो रहे हैं तो मन होता है कि अशोक पण्डित के साथ यह सारथी-पॉडकास्ट भी रिकार्ड किया जाये।

वह दिन भी शायद कभी आ ही जायेगा। बशर्ते कि पाठक/श्रोता यह न कह बैठें कि जीडी, ये पॉडकास्टिंग तुम्हारे बस की नहीं। … जब मैंने ब्लॉगिंग शुरू की थी, सन 2007 में, तो ज्यादातर पाठकों की राय थी कि मुझे न ढंग से हिंदी आती है और न अंगरेजी। पर अपनी (घटिया) हिंदी में भी दरेरा मार कर हिंदी ब्लॉगिंग जिंदा रखी। जिद्दी स्वभाव के कारण। शायद वही अब पॉडकास्टिंग को भी चलाये – वही जिद और जुनून।

बहरहाल, अशोक पण्डित पर लौटा जाये। करीब हफ्ते भर से अशोक पण्डित दांत के दर्द से परेशान हैं। परसों नहीं आये। कुछ खबर भी नहीं दी। वैसे फोन कर बताना या फीडबैक देना अशोक पण्डित के चरित्र में है नहीं। आपकी गरज है तो उनसे पता कर लें। और अगर अशोक पण्डित का फोन आउट ऑफ रीच है – जो अक्सर होता है – तो उनके किसी पड़ोसी को खबर करें कि वह अशोक से बात करा दे।

जब वे नहीं आये तो फोन कर उनके न आने का कारण पूछा। अशोक ने बताया कि दांत में दर्द बढ़ गया है और वे कीड़ा झड़वाने जा रहे हैं।

उसके बाद वे कल भी अवतरित नहीं हुये। आज आये। जब उनके साथ मार्केट जा रहा था तो मैंने पूछा – कीड़ा झड़वाये? किस ओझा के पास गये थे?

जब अशोक के साथ मार्केट जा रहा था तो मैंने पूछा – कीड़ा झड़वाये? किस ओझा के पास गये थे?

मेरा अंदाज यह था कि दांत के दर्द का इलाज भी भी दवा और दुआ के तालमेल से होता होगा गांव में। दवा दांत का डाक्टर देता होगा और झड़वाने का काम कोई ओझा या तांत्रिक करता होगा। पर अशोक ने जो बताया वह अलग ही चीज थी। बोले – नाहीं, कौनो ओझा नाहीं। दांते क कीड़ा झरवावई ग रहे। गंउआँ क नट हयें जे कीड़ा निकालथीं। दुई किरौना निकला। ओकरे बाद आराम बा। ( नहीं, कोई ओझा नहीं। दांत के कीड़े झड़वाने गया था। गांव के ही नट लोग निकालते हैं। दो कीड़े निकले। उसके बाद आराम है।)

अशोक ने और जोड़ा – पिछली दईंया झरवाये रहे त सात ठे निकरा रहा। (पिछली बार दांत में दर्द होने पर झड़वाया था तो सात कीड़े निकले थे।)

नट घुमन्तू जनजाति के लोग हैं तो बाजीगरी दिखा कर पेट पालते हैं। आपने नट लड़की को मटका सिर पर रखे एक हवा में तानी रस्सी पर चलते देखा होगा। अच्छा तमाशा होता है वह। पर नट लोग यह दांत से कीड़े निकालने की भी हाथ की सफाई दिखा कर दांत के दर्द को भी भुनाते हैं; यह आज ही पता चला।

अशोक ने दांत के कीड़े निकालने की विधि भी मुझे स्पष्ट की। गांव में नहर की बगल में नटों के घर हैं। उनकी औरतें ये कीड़े निकालती हैं। जिस ओर के दांत में दर्द हो, उस ओर के कान में दवा डालती हैं और कुछ मंत्र फूंकती हैं। फिर उस कान की तरफ सिर झुकाने पर दांत के कीड़े कान से निकलते हैं। कीड़े निकलने के पांच दस मिनट बाद ही आराम हो जाता है।

कितने बड़े कीड़े होते हैं?

चींटी जितने। उससे भी कुछ छोटे। कीड़े निकालने की फीस बीस रुपया लेती हैं वे औरतें।

मेरे आगे के एक दांत में काला धब्बा हो गया था। उसे डेंटिस्ट को दिखाने दांत के डाक्टर के पास भी अशोक पण्डित ही ले कर गये थे। स्टेज – 2 केविटी थी, जिसको साफ कर फिलिंग का काम एक सिटिंग में डाक्टर ने किया था। चार हजार रुपये का खर्च आया। पर अपने लिये अशोक ने नटिनी के पास जा कर कीड़े निकलवाना बेहतर उपाय समझा! जबकि अशोक की समस्या शायद ज्यादा गहरी हो – जिसमें रूट केनाल ट्रीटमेण्ट या दांत का उखड़वाना ही निदान हो। पर अशोक को तो सात या दो कीड़े निकलवा कर ही आराम हो गया है। और खर्चा भी मात्र बीस रुपये आया!

मुझे यकीन है कि अशोक पण्डित दो-तीन महीने में फिर नट के यहां कीड़ा झड़वाने जांयेगे ही। अगली बार कितने कीड़े निकलेंगे, यह जानने की मुझे उत्सुकता रहेगी। पता चला तो आपको भी खबर करूंगा।

दांत का कीड़ा झड़वाये अशोक पण्डित – पॉडकास्ट

बहरहाल, आपको भी उस नट का मोबाइल नम्बर या विजटिंग कार्ड चाहिये क्या? 😆


साण्डा – धान की खेती

किसानों ने मुझे बताया कि साण्डा की पैदावार का धान ज्यादा स्वस्थ होता है; चावल के दाने बड़े होते हौं और धान की कुटाई में चावल टूटता बहुत कम है। पर साण्डा वाली खेती मेहनत मांगती है।


दस पंद्रह दिन से बारिश नहीं हुई थी। लोगों ने धान की खेती के जो मंसूबे बांधे थे वे धूमिल पड़ते जा रहे थे। सुग्गी, जो हमारा छोटा सा खेत आधे पर जोतती है, ने कहा कि बिना पानी के उसकी धान की नर्सरी भी सूख रही है। बाल्टी बाल्टी पानी दे कर उन पौधों को किसी तरह जिंदा रखा है। अगर जल्दी रोपाई नही की गयी तो फसल होगी ही नहीं। उसके लिये खेत में पानी डालना होगा। पुराना लपेटा पाइप खराब हो गया है। खेत तक ट्यूबवेल से पानी ले जाने के लिये नया पाइप खरीदना होगा। उसमें चार हजार रुपये का खर्चा है।

धान की रोपाई करता किसान परिवार

पाइप तो हमें ही खरीदना है, सुग्गी को नहीं। धान के लिये चार हजार का खर्च अखर रहा था। पाइप खरीद लेने पर उसके लिये पूरा गांव मांगने आने लगेगा; आखिर सब को इस समय खेत में पानी देने की जरूरत है। खरीदने की बजाय यह मंगनी का चलन खूब है। हमारे घर की कई चीजें लोग मांग कर ले जाते हैं और उसे इस्तेमाल भी बेदर्दी से करते हैं। इसके अलावा लौटाने की परम्परा है ही नहीं। वे उसे आगे किसी को बांट देते हैं और वह आगे और किसी को। आप को अपनी चीज याद रखनी होती है। अन्यथा अमुक को दी गयी चीज तमुक, घमुक, धमुक से होती हुई अंतत: गायब ही हो जाती है। हमारी कई चीजें इसी तरह गायब हुई हैं।

हम लपेटा पाइप खरीदने के उहापोह में ही थे, कि वरुण देव ने कृपा की। कल सवेरे तेज बारिश हुई और देर तक हुई। सब ओर पानी ही पानी हो गया। ताल तलैया पोखर भर कर ओवरफ्लो करने लगे। गांव की मुख्य सड़क, जो हाईवे से आसपास के आधा दर्जन गांवों को जोड़ती है; वह फिर जलमग्न हो गयी। गांव आवागमन से कट गया पर धान की खेती करने के लिये यह वरदान ही था।

गांव की मुख्य सड़क, जो हाईवे से आसपास के आधा दर्जन गांवों को जोड़ती है; वह फिर जलमग्न हो गयी।

कल रात की आवाज तो बहुत ही अलग थी। मेढ़क, जो बीच में शांत हो गये थे, फिर समवेत स्वरों में टर्राने लगे थे। रेंवा की आवाज उसमें अपना योगदान कर रही थी। मेघाअच्छादित आसमान होने से अंधेरा भी घना था। अंधेरा, पानी और रात की आवाज मेस्मराइज कर रहे थे। मन होता था कि बाहर निकल आसमान तले यूंही चुपचाप बैठे रहा जाये।

आज सवेरे आसमान खुला था। धूप भी निकली थी। सुग्गी का पूरा परिवार – सुग्गी-सुग्गा (उसका नाम राजू है) और उसके दो लड़के तथा धान की रोपाई में मदद के लिये दो-तीन बिरादरी वाले; सब आ गये थे। आज वह धान रोप कर छुट्टी पा जायेगी।

साण्डा के पूले – गठ्ठर बनाता सूबेदार

घर से साइकिल ले कर निकलने पर सूबेदार दिखा। वह बनारस में लॉण्ड्री चलाता है। वहां से कपड़े ला कर गांव में धोता है। उसके अलावा कुछ अधिया पर खेती भी करता होगा। अपनी धोबी बिरादरी में सम्पन्न है। इस बार प्रधानी के चुनाव में भी खड़ा हुआ था। सुबेदार कन्नौजिया साण्डा नर्सरी से निकाले धान के बेहन के पूले (गठ्ठर) बना रहा था। साथ में उसकी लड़की हाथ बटा रही होगी।

साण्डा नर्सरी होने के कारण बेहन के पौधे काफी बड़े और स्वस्थ थे। सूबेदार ने बताया कि अभी कुछ दिन और नर्सरी में रखना चाहिये था; पर बारिश होने और नहरा (नहर) में पानी आने से आज ही रोपाई की सोची है उसने।

धान के बीज एक छोटे खेत में डाले जाते हैं और लगभग बीस दिन में पौधे एक बित्ता लम्बे हो जाते हैं। कुछ किसान सीधे इसी पौध को खेत में रोपते हैं। उस रोपाई में तीन चार पौधे एक साथ रोपने होते हैं। चार पौधे करीब चार चार-छ इंच की दूरी पर लगाने होते हैं। पर अगर बीस दिन के बाद इसी नर्सरी से निकाल पर एक दुगनी बड़े क्षेत्रफल की नर्सरी में पौधे लगाये जायें तो अगले बीस दिन में पौधे लगभग एक फुट लम्बे और स्वस्थ हो जाते हैं। फिर उन पौधों को खेत में रोपा जाता है। तब एक एक पौधा लगभग 9 इंच की दूरी पर रोपा जाता है। इस बीस बीस चालीस दिन की नर्सरी की तकनीक को साण्डा कहा जाता है।

कुछ किसान बीस दिन की नर्सरी वाली खेती करते हैं और कुछ साण्डा वाली। साण्डा तैयार करने में अधिक गणना, अधिक प्लानिंग और अधिक श्रम लगता है, पर उससे बीज कम लगते हैं और पैदावार भी ज्यादा होती है। इसके अलावा किसानों ने मुझे बताया कि साण्डा की पैदावार का धान ज्यादा स्वस्थ होता है; चावल के दाने बड़े होते हौं और धान की कुटाई में चावल टूटता बहुत कम है। पर साण्डा वाली खेती मेहनत मांगती है। उस खेत को पानी की जरूरत भी ज्यादा होती है। सामान्यत: निचली या ताल वाले खेतों में साण्डा खेती की जाती है।

साण्डा के पौधे

मैंने सूबेदार से पूछा कि वो कहां लगायेंगे साण्डा वाले पौधे। उन्होने जो खेत बताया वह नहर के पास था और नीचे की जमीन होने के कारण जलमग्न भी था। … निश्चय ही सूबेदार की धान की फसल अच्छी होगी।

मैल्कम ग्लेडवेल की पुस्तक आउटलायर में एक अध्याय धान की खेती वाले इलाकों में रहने वालों की गणित विषय में दक्षता की बात कही गयी है। चीन और भारत के विद्यार्थी तभी मैथ्स में यूरोपीय और अमेरिकन देशों के विद्यार्थियों से बीस साबित होते हैं। भारत में धान की खेती का लम्बा इतिहास रहा है। गोरखपुर के पास तराई के क्षेत्र लहुरादेवा में तो नौ हजार साल पहले धान की खेती का प्रमाण पुरातत्व वालों ने स्थापित किया है।

साण्डा – धान की खेती का पॉडकास्ट

जब मैंने मैल्कम ग्लेडवेल की उस पुस्तक में पढ़ा था तो आशय इतना स्पष्ट नहीं हुआ था। पर यहां धान की खेती, उसकी नर्सरी बनाना, उसका साण्डा बेहन तैयार करना। खेत के क्षेत्रफल का आकलन कर नर्सरी, साण्डा और अंतिम रोपाई का इलाका तय करना – यह सब सूझबूझ और गणना से ही सम्भव है। मक्का-ज्वार-बाजरा या गेंहू जैसी खेती जैसा नहीं है कि खेत में बीज बिखेर दिये; एक दो बार पानी दिया, निराई की और फसल काटी। धान अनुशासन और उसपर भी साण्डा अनुशासन देखना बहुत रोचक है।

आपको अपने बच्चे को गणित में दक्ष बनाना हो तो उसे साण्डा धान की खेती की दीक्षा देनी चाहिये। 😆


साण्डा अजीब सा नाम है। मुझे याद आता है कि मेरे उड़िया मित्र बीजू पट्टनायक के लिये साण्डा सम्बोधन किया करते थे। बीजू वास्तव में राजनीति में दबंग से – सांड़ की तरह। सांड़ से बना साण्डा। पर धान के इस बेहन तैयार करने की तकनीक को कैसे साण्डा कहा जाने लगा? यह मुझे किसी ने स्पष्ट नहीं किया।