डिजिटल उपकरण और सॉफ्टवेयर रंग और लिंग भेद करते हैं?!

पूर्व-पश्चिम का भेद एक बात। भारत में तो सॉफ्टवेयर/आर्टीफीशियल इण्टेलिजेंस; सवर्ण-वंचित, पुरुष-महिला, गरीब-अमीर, शहरी-ग्रामीण आदि में भेदभाव के घटकों से भारत के समाज को आगे और बांटने वाला बन सकता है (अगर समाज इस विभेद को भांप पाये, तो)।


आर्टीफीशियल इण्टेलिजेंस (मशीनी बुद्धि) का युग शुरू हो रहा है। उत्तरोत्तर कार्य आदमी से हट कर डिजिटल सॉफ्टवेयर जनित बुद्धिमत्ता के हिस्से आता जायेगा। इसलिये कार्य करने के तरीके भी उसी प्रकार के लोगों से प्रभावित होंगे जो मशीनी बुद्धि के जनक हैं।

द इकॉनॉमिस्ट के ताजा अंक में लेख है कि विश्व के उपकरणों का डिजाइन गोरे आदमी के इर्दगिर्द हुआ है। मसलन पल्स ऑक्सीमीटर (जिसका कोरोना काल में बहुत प्रयोग हो रहा है) लगभग 12% बार काले आदमी में गोरे की अपेक्षा ऑक्सीजन का स्तर अधिक बताता है। यह त्वचा से प्रकाश के गुजरने के आधार पर तय होता है। चूंकि ऑक्सीमीटर के आंकड़े आधार पर लोगों को अस्पताल में भर्ती किये जाने का निर्णय किया जाता है, इसलिये गोरे आदमी को अस्पताल में जगह मिलने की सम्भावना बढ़ जाती है। और इसके भयानक परिणाम हो सकते हैं – सुपात्र अस्पताल में भर्ती होने से वंचित हो सकता है।

और भी उदाहरण हैं इंफॉर्मेशन टेक्नॉलॉजी के डोमेन में रंग भेद के। मसलन गोरे व्यक्ति को लीगल सॉफ्टवेयर काले की अपेक्षा कम सजा प्रस्तावित करता है।

इसी प्रकार लिंग भेद के भी उदाहरण हैं यंत्रों के डिजाइन में। कार की सीटबेल्ट का डिजाइन बहुधा आदमी को ध्यान में रख कर किया जाता है, औरत को ध्यान में रख कर नहीं।

लेख में अन्य उदाहरण इस प्रकार हैं –

  • चिकित्सा के एलगॉरिथ्म मैडिकल पर खर्च के विगत के आंकड़ों के आधार पर आगे की सुविधायें डिजाइन करते हैं। पर यह भी सत्य है कि काले लोग गोरों की अपेक्षा स्वास्थ्य पर काम खर्च करते हैं। इसलिये ये सॉफ्टवेयर उनके साथ बाई-डिजाइन भेदभाव करते हैं।
  • क्लिनिकल ट्रायल बहुधा गोरे आदमी के पक्ष में झुके होते हैं। औरतों को कम शामिल करने का तर्क यह होता है कि अगर वे ट्रायल के दौरान गर्भवती हो गयीं तो ट्रायल उसके भ्रूण को हानि पंहुचा सकता है। वे क्लिनिकल ट्रायल को और व्यापक बना कर इस घटक को अप्रभावी बना सकते हैं; पर वैसा किया नहीं जाता। अत: इन ट्रायल के परिणाम भेदभाव युक्त होते हैं।
  • मैडीकल उपकरणों की खरीद के सॉफ्टवेयर गोरों और पुरुषों के पक्ष में झुके हुये हैं। वे इस बात को ध्यान में रख कर डिजाइन नहीं किये जाते कि अस्पतालों में या डाक्टर के वेटिंग रूम में भीड़ किनकी होती है।
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उपभोक्ता सामग्री के सॉफ्टवेयर तो अंतत: बाजार की प्रतिस्पर्धा से सुधर जायेंगे। पर पॉलिसी तय करने के या लीगल सॉफ्टवेयर में यह अनुचित झुकाव चलेगा और उसके लिये शायद कालों और महिलाओं को, भविष्य में, अपनी आवाज उठानी पड़े।

तकनीकी विकास भी लोगों को आंदोलनों के मुद्दे प्रदान करता रहेगा। 😀

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द इकॉनॉमिस्ट का यह लेख तो सम्भवत: अमेरिका या पश्चिम की ओर झुका हुआ है और वह कालों और महिलाओं से भेदभाव की ही बात करता है। पर, उसका तर्क आगे बढ़ाते हुये, यह भी कहा जा सकता है कि ग्लोबल डिजाइन और सॉफ्टवेयर पश्चिम-पूर्व का भी भेद करता है। सॉफ्टवेयर मुख्यत: पश्चिमी मानसिकता से बनाया जाता है – और भले ही भारत में वह बेंगलुरु में बना हो, उसमें पश्चिमोन्मुखी मानसिकता का ही बोलबाला होना स्वाभाविक (?) है।

पूर्व-पश्चिम का भेद एक बात। भारत में तो सॉफ्टवेयर/आर्टीफीशियल इण्टेलिजेंस; सवर्ण-वंचित, पुरुष-महिला, गरीब-अमीर, शहरी-ग्रामीण आदि में भेदभाव के घटकों से भारत के समाज को आगे और बांटने वाला बन सकता है (अगर समाज इस विभेद को भांप पाये, तो)।

आर्टीफीशियल इण्टेलिजेंस पर बहुत कुछ लिखा, कहा जायेगा। केवल तकनीकी लोगों द्वारा ही नहीं, समाजशास्त्रियों, मनोवैज्ञानिकों, कलाकारों, दार्शनिकों, इतिहासकारों, पुरातत्वविदों, अधिवक्ताओं, ऑकल्ट में दखल रखने वालों, ज्योतिषियों आदि सभी द्वारा कहा जायेगा। मेरी तो जिंदगी अपनी क्रियात्मकता के शिखर पर नहीं है, पर #गांवदेहात के एकांत में बैठे मुझ को भी यह क्षेत्र बहुत रोचक लगता है। जो जवान हैं, उनके लिये तो न केवल यह रोचक है; वरन बहुत चैलेंज और बहुत सम्भावनायें भी खोलता है!


कोरोना संक्रमण – फिर दुबकने का समय

“आवाज अड्डा” कार्यक्रम के बाद यह अहसास हुआ कि बीमार पड़ने पर अस्पताल में जगह मिलना नेक्स्ट-टू-इम्पॉसिबिल है। सो किसी बाहरी सहायता की ओर देखने की बजाय अपनी खोल में दुबकना ज्यादा उचित स्टेटेजी प्रतीत हो रही है।


कल सीएनबीसी आवाज पर “आवाज अड्डा” में एक डाक्टर साहब बता रहे थे कि नेताओं-मंत्रियों के फोन अस्पताल के मुखिया लोग उठाने में हिचकिचा रहे हैं। उन्हें अंदेशा है कि वे अपने करीबी के लिये कोरोना-बेड की मांग करेंगे और बेड खाली ही नहीं हैं। पत्रकार (हर्षवर्धन त्रिपाठी) ने कहा कि लखनऊ में उत्तर प्रदेश के एक धाकड़ मंत्री जी दिन भर फोन लगाते रह गये पर अस्पताल वाले ने फोन नहीं उठाया।

मैं पूर्वी उत्तर प्रदेश के आंकड़े देखता हूं, जो अतिशयोक्ति जी एक वेबसाइट पर उपलब्ध करा देते हैं। उसमे भदोही जैसे ग्रामीण जिले में भी कोरोना संक्रमण चार दिन में दुगना हो रहा है। आरोग्यसेतु एप्प पर भी मेरे घर के आसपास कोरोना के मामले देखने में आने लगे हैं। और सुगबुगाहट यह भी है कि मामलों की अण्डर-रिपोर्टिंग हो रही है।

सवेरे साइकिल ले कर दूध लेने जाते समय मैं देखता हूं कि मास्क पहने लोगों में भी चरघातांकी (Exponential) वृद्धि हुई है। हफ्ता भर पहले कोई बिरला ही मास्क पहने नजर आता था, अब कई लोग – लगभग दस प्रतिशत लोग – दिखने लगे हैं। सवेरे सात-आठ बजे सड़क पर लोग उतने ही हैं, जितने होते थे। पर मास्कधारी या गमछे से मुंह ढ़ंके बढ़ गये हैं।

भदोही जिले में कोरोना के शूट होते दैनिक मामले

सरकार इस बार भय नहीं बांट रही। पर आंकड़े बांट रहे हैं। और पंचायती चुनाव के बीच, कोरोना अपने को अखबार की हेडलाइन में ले आया है; जबरी।

मैं ठीक एक साल पहले की अपनी पोस्ट देखता हूं। उनमें मैं लॉकडाउन के दौरान बंद किराना की दुकानों और नाई की दुकानों के हाल की बात करता हूं। तब सेेे अब, एक साल बाद, संक्रमण कहीं ज्यादा है। भय कहीं कम। पर भय बिल्ड-अप हो रहा है। मसलन कल आवाज अड्डा के कार्यक्रम के बाद जब यह अहसास हुआ कि बीमार पड़ने पर अस्पताल में जगह मिलना नेक्स्ट-टू-इम्पॉसिबिल है; किसी बाहरी सहायता की ओर देखने की बजाय अपनी खोल में दुबकना ज्यादा उचित स्टेटेजी प्रतीत हो रही है।

ठीक साल भर बाद वही दशा है – मेरे बाल बढ़ गये हैं और सुंदर नाऊ को बुला बाल कटवाने का मन नहीं हो रहा है!

गिलोय और काढ़ा पीना नियमित हो गया है।

मैं और मेरी पत्नीजी इस गांवदेहात के अपने घर में हैं। इसकी अपनी चारदीवारी है। और अपना एक्स्लूसिव गेट। हम दोनो को आईसोलेट रहना है – ज्यादा से ज्यादा। घर में नियमित दो प्राणी आते हैं – नौकरानी और वाहन चालक। उनके साथ मेल मिलाप का तरीका तय करना है। और वह उतना अनौपचारिक नहीं होगा, जितना अब था। कोरोना सोशल डिस्टेंसिंग के नॉर्म्स वापस ले आयेगा। मास्क और सेनीटाइजर तो अभी भी साथ रहते थे, पर अब सेनीटाइजर की खपत बढ़ जायेगी। हस्तप्रक्षालन की आवृति बढ़ेगी। अभी गिलोय और काढ़ा पीना; जो बीच में नहीं हो रहा था; नियमित हो गया है।

जहाज का पंछी फिर जहाज पर आता है। कछुआ हल्की की आहट पर खोल में दुबक जाता है। खोल में दुबकने का ही समय है।

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