भारतीय परिवारों की गर्माहट जितनी जल्दी पैदा होती है, उतनी ही जल्दी कभी-कभी धुँधली भी होने लगती है। कुछ रिश्ते शुरुआत में पूरे जोश, सम्मान, सहजता और नयी-नयी आत्मीयता के साथ फूल जाते हैं—जीजा, फूफा, समधी जैसी भूमिकाएँ इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। विवाह के शुरुआती सालों में इन पात्रों को एक तरह का “समारोह-प्रधान सम्मान” मिलता है। लोग आदर से बुलाते हैं, हर बात में शामिल करते हैं, वातावरण में एक उत्सव-सा रंग घुला रहता है।
लेकिन समय गुजरता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं, और यही रिश्ते धीरे-धीरे अपना तापमान खोने लगते हैं। कई बार तो बात खीझ, कटुता और अव्यक्त शिकायतों तक पहुँच जाती है। प्रश्न स्वाभाविक है—ऐसा क्यों होता है? क्या यह क्षरण अवश्यम्भावी है? और क्या इससे निकलने का कोई मार्ग है?
कृष्ण के जीवन को यदि सम्बन्धों की परख की कसौटी बनाया जाये, तो यह धुँधलापन न किसी एक पक्ष की गलती है, न कोई दुर्भाग्य। यह सम्बन्धों के स्वभाव की प्रक्रिया है, और इसे समझ लेने पर रिश्तों का बहुत सा बोझ अपने-आप हल्का हो जाता है।
पहला बिन्दु—आरम्भिक सम्मान का “अतिप्रकाश”
जीजा या फूफा को विवाह के शुरुआती वर्षों में जो भाव मिलता है, वह बहुत कुछ नयी परिस्थितियों, उत्सव और सामाजिक रस्मों का मिला-जुला परिणाम होता है। यह सम्मान नकली नहीं, वास्तविक होता है, पर टिकाऊ नहीं। इसे मैं “उत्सव का प्रकाश” कहूँगा—चमकदार पर अस्थायी। फुलझड़ी सरीखा।
समस्या तब पैदा होती है जब यह शुरुआती ऊँचाई व्यक्ति की स्थायी पहचान बन जाती है। आदमी सोच लेता है—“यह मेरी असली कीमत है, यह व्यवहार मुझे हमेशा मिलना चाहिए।”
जब कुछ सालों बाद यह गर्माहट स्वाभाविक रूप से थोड़ी कम होने लगती है, तो वही आदमी इसे अवनति समझ लेता है।
यहीं से ईगो का धुँआ उठता है।
कृष्ण की पहली सीख यहाँ यह है—
भूमिकाएँ स्थायी नहीं होतीं, वे बदलती हैं; जो बदलती भूमिकाओं को सहजता से स्वीकार ले, वह हल्का रहता है।
गोकुल के बाल-लीला करने वाले कृष्ण और कुरुक्षेत्र के सारथी कृष्ण में धरती-आसमान का अन्तर है। पर दोनों ही कृष्ण हैं।
वे कभी अतीत के गौरव से चिपके नहीं रहते।
जीजा/फूफा की भूमिका भी ऐसी ही है—शुरू में उत्सव माधुर्य, बाद में सामान्य ऊष्णता, फिर सीमित संलग्नता।
यदि आदमी इस परिवर्तन को रोकेगा, तो उलझाव बढ़ेगा।
दूसरा बिन्दु—सम्बन्धों का प्राकृतिक क्षय
मानव-सम्बन्ध स्थायी नहीं होते।
वे मनःस्थितियों, घरेलू प्राथमिकताओं, उम्र, सामर्थ्य और आपसी दूरी से प्रभावित होते हैं।
शादी के शुरू के वर्षों में घरों का आपस में आना-जाना ज्यादा खूब होता है।
सालों बाद बच्चे, स्कूल, नौकरी, खर्च, स्वास्थ्य और निजी चुनौतियों के बीच लोग सम्बन्धों को उसी ऊर्जा से नहीं निभा पाते।
इसमें किसी की बुराई नहीं है—यह जीवन का प्रवाह है।
महाभारत में एक गहरी बात है—कृष्ण किसी भी सम्बन्ध में “पूर्ण उपस्थिति” की अपेक्षा कभी नहीं करते।
वे वही भूमिका निभाते हैं जो दूसरा व्यक्ति, उस समय, उनसे चाहता है— सतत परिवर्तित होती भूमिकायें
कभी सखा,
कभी मार्गदर्शक,
कभी संदेशवाहक,
कभी सारथी,
कभी मौन उपस्थिति।
कृष्ण कहते हैं—सम्बन्धों में भूमिकाएँ नहीं बदलतीं तो बंधन टूटने लगते हैं।
जीजा/फूफा के रिश्ते में भी यही सत्य है।
अगर व्यक्ति यह मान बैठे कि “जैसा सम्मान पहले मिलता था, वही आज भी मेरा अधिकार है”,
तो वह धीरे-धीरे घुटता हुआ, कड़वा हो जाता है।
तीसरा बिन्दु—अपेक्षाओं का बोझ
सम्बन्धों में टॉक्सिसिटी का सबसे बड़ा स्रोत यही है—अपेक्षा।
“वे मुझे बुलायें।”
“वे पहले फ़ोन करें।”
“मेरी राय पूछें।”
“मेरे आने पर उत्साह दिखायें।”
ये अपेक्षाएँ बाहर से छोटी दिखती हैं, पर भीतर से बहुत भारी हैं।
कुरुक्षेत्र में कृष्ण अर्जुन से एक असाधारण बात कहते हैं—
“फल की अपेक्षा को छोड़ दो; कर्म और सम्बन्ध दोनों हल्के हो जायेंगे।”
यदि यह सूत्र हम जीजा/फूफा की भूमिका पर लगा दें तो स्पष्ट होता है—
सम्मान, आदर और निकटता की अपेक्षाएँ जितनी घटेंगी, सम्बन्ध उतना स्थिर रहेगा।
जब रिश्तों में अधिकार का दावा बढ़ता है, खटपट गहरी होने लगती है।
चौथा बिन्दु—हास्य और हल्कापन
कृष्ण का सबसे बड़ा गुण यह था कि वे हर परिस्थिति में स्वयं को हल्का रखते—एक मुस्कान, एक व्यंग्य, एक खेल।
यह हल्कापन सम्बन्धों को तरल बनाता है।
जो व्यक्ति अपने ऊपर हँस सकता है, वह कभी वैमनस्य का कारण नहीं बनता।
जीजा/फूफा का एक बड़ा संकट यह है कि वे अपनी भूमिका को बहुत गंभीरता से ले लेते हैं।
गंभीरता बढ़े तो व्यक्ति entitlement-driven हो जाता है।
और हक की डिमांड रिश्तों का सबसे भारी पत्थर है।
अगर आदमी अपने ऊपर हल्का हास्य रखे, खुले मन से बातचीत करे, और खुद को परिवार का “मूड-लिफ्टर” बनाए रखे, तो लोग उसे चुनौती की तरह नहीं देखते।
पाँचवाँ बिन्दु—समय पर पीछे हटने की कला
कृष्ण जहाँ जरूरत होती है वहाँ उपस्थित होते हैं,
और जहाँ उनकी उपस्थिति उलझाव बढ़ाये—वहाँ पीछे हट जाते हैं।
वे कभी टिकाऊ जीजा-फूफा-मामा नहीं बनते।
उनकी सारी रणनीति यही कहती है—उपस्थिति भी एक कला है।
जीजा/फूफा के रिश्ते में यह कला बहुत उपयोगी है—
साल में दस फ़ोन की जगह आठ कर दीजिये।
हर मुद्दे पर राय देने की जगह आधे मुद्दों पर चुप रहिये।
उपस्थिति कम करने का मतलब प्रेम कम करना नहीं होता,
यह सिर्फ खटपट या घर्षण कम करता है।
छठा बिन्दु—रूपान्तरण को स्वीकार करना
कृष्ण ने अपने जीवन में लगातार परिवर्तन स्वीकारा।
गोकुल का छोरा मथुरा का मुक्तिदाता बना,
फिर द्वारका का राजनेता,
और अंत में महाभारत का सारथी और दार्शनिक।
पर वे कभी ये नहीं कहते कि “मैं केवल वही हूँ जो पहले था।”
उनका रूपान्तरण ही उनकी शक्ति है।
जीजा/फूफा को भी अपनी भूमिका बदलनी है—
शुरुआत में वे उत्साह और उल्लास का केन्द्र होते हैं,
फिर धीरे-धीरे एक सामान्य, विश्वसनीय उपस्थिति।
अगर आदमी इस परिवर्तन को सम्मान के ह्रास की तरह न देखे,
तो सम्बन्ध स्वस्थ रहते हैं।

अब बड़ा प्रश्न—क्या जीजा/फूफा का “विलेन” बनना अवश्यम्भावी है?
शायद नहीं। कम से कम उस दिशा में प्रयास तो होने चाहियें।
वह अवश्यम्भावी तभी है जब व्यक्ति परिवर्तन स्वीकारने से इंकार कर दे।
पर यदि वह भूमिकाओं के बदलते प्रवाह को समझ ले,
अपेक्षाओं को हल्का कर दे,
अपने आप को व्यक्तित्व के स्तर पर तन्य-तरल रखे,
और उपस्थिति को थोपने की जगह साझा करे—
तो सम्बन्ध कभी टॉक्सिक नहीं बनता।
कृष्ण का जीवन यही बताता है—
जो खुद को हल्का रखता है, वह भारी रिश्तों को भी सहज बना लेता है।
और जो स्वयं को केन्द्र मान ले,
वह किसी भी रिश्ते में धीरे-धीरे धुँधला और कठोर हो जाता है।
अंत में यही—
जीजा/फूफा का रिश्तों में महत्व कम नहीं है,
बस उसका स्वरूप बदलता है।
जो इस बदलते स्वरूप को प्रेम और विवेक से स्वीकार ले,
वह रिश्ते की ऊष्मा को धुँधलाने नहीं देता।
वर्ना तो वही होता है जो आप यत्र-तत्र-सर्वत्र देखते हैं!
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