कस्बे के बाजार के बदलाव की कथा अगर कही जाए, तो वह पिछले एक दशक में कहीं ज़्यादा स्पष्ट दिखती है। जब मैं रिटायर होकर यहाँ आया था, तब इक्का‑दुक्का ही प्रशिक्षित फ़िज़ीशियन थे; बाकी झोलाछाप। छोटी‑सी समस्या के लिए भी बनारस जाना पड़ता था, और ख़राब हाईवे व बढ़े ट्रैफ़िक के कारण दो घंटे से कम में पहुँचना मुश्किल था।
अब बनारस गये मुझे आठ महीना हो गया है। शहर जाने की जरूरत ही नहीं होती। सब यहीं काम चल जाता है।
यहां तक कि दांत की समस्या के लिये भी बनारस नहीं जाना पड़ा। पिछले एक साल से महराजगंज के डा. स्वमित्र दुबे मेरे दांत के डाक्टर हैं।
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डा. स्वमित्र के यहां नई जूनियर डेंटिस्ट
डा. स्वमित्र के यहां वह नवयुवती जूनियर डेंटिस्ट है। साल भर बाद हम वहां गये तो पाया कि सजा हुआ है उनका प्रतीक्षा कक्ष। नये साल का बधाई संदेश, झिलमिलाती झालर और दीवारों पर लटकते रंग बिरंगे गुब्बारे।
मेरी पत्नीजी ने कहा – ये नई लड़की के आने का परिणाम है। साफ सफाई और सजावट में एक नारी का टच है। और उसका व्यवहार भी कितना पॉलिश्ड है – गांव में होते हुये भी।
जब हम पंहुचे तो वह शेल्फ में लगी देवताओं की मूर्तियों और चित्रों को साफ कर पूजा कर रही थी। अगरबत्ती की सुगंध वातावरण में थी।

वह जूनियर डेंटिस्ट हैं—खुशबू दुबे, पास के लक्ष्मणा गाँव की। एक नवयुवती डॉक्टर का वर्णन करना मेरे लिए आसान नहीं, फिर भी—चेहरे पर शांत एकाग्रता, बिना बनावटी मुस्कान या दिखावटी आत्मविश्वास। काम पर टिकी निगाहें, सलीके से बँधे बाल, कमर तक जाती चोटी—गाँव और पेशेवर प्रशिक्षण का सटीक फ्यूज़न। न झिझक, न जल्दबाज़ी—बस यह भाव कि जो करना है, ठीक से करना है।
गाँव की पृष्ठभूमि और पेशेवर प्रशिक्षण का यह मेल उसके चेहरे पर और वेशभूषा से साफ़ पढ़ा जाता है; जैसे मेहनत ने व्यक्तित्व को धीरे-धीरे गढ़ा हो, और अब वह बिना शोर किए मौजूद है।
ऐसा प्रोफाइल महराजगंज के कस्बाई एम्बियेंस में – मैं एक दशक पहले, या एक साल पहले तक भी, कल्पना नहीं करता था।
मेरा ट्रीटमेंट तो डा. स्वमित्र ने किया, पर खुशबू पूरे समय उनकी सहायता को मौजूद रही। यहां तक हुआ कि मैने अपने केस से सम्बंधित प्रश्न भी खुशबू से पूछना सही समझा।

यह बदलाव कस्बे के चरित्र में परिवर्तन के रूप में देखा जाना चाहिये।
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एक पीढ़ी पहले दांत का क्या इलाज था?
राजन भाई 73-74 साल के हैं। उनका पीछे का एक दांत गायब है। पूछा कैसे और किसने उखाड़ा?
“छोट रहे – 11-12 साल के। गांउं में फलाने गुरू उखाड़े रहें।” – राजन भाई ने बताया।
फलाने गुरू किसानी करते हैं/थे। लगे हाथ दांत वांत भी देख लिया करते थे। औजार भी क्या रहे होंगे? हो सकता है रसोई की संडसी से उखाड़ा हो। एनीस्थीसिया के नाम पर बहलाने के लिये कोई कहानी सुनाई हो और दिमाग फिरते ही खट्ट से निकाल दिया हो दांत?
मैं जब गांव में रीवर्स माइग्रेट हुआ, तब भी इसी छाप की डाक्टरी देखा करता था। अभी भी बगल में मिरगी से ले कर भगंदर-फिश्तुला-बवासीर तक के इलाज की सिंगल विंडो झोंपड़ी है, जिसके सामने मैने 35-40 मोटरसाइकिलें खड़ी गिनी हैं। पचास साठ लोगों की लाइन!
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भरोसे की धीमी लड़ाई
पर स्वमित्र के लिये अभी भी अपनी साख के लिये मेहनत करनी होती है। वे बता रहे थे – “एक सज्जन आये जो फीस का नाम सुनते ही बांहे पीछे कर सीना निकाल बोले – ई महराजगंज में कउन आया है जो दांत देखने की फीस लेने की बात कर रहा है।”
“यही लोग बनारस जा कर खेत बेच मंहगा इलाज कराते हैं और वहां की फीस पर कुछ नहीं कहते।”
लोग अपने आसपास गुणवत्ता के उभरते द्वीप को नोटिस नहीं करते। अभी उन्हें यकीन ही नहीं है कि यहां बगल में स्तरीय सुविधा मिल सकती है। वे मान कर चलते हैं कि यह तो गंगा के करार की जमीन है, जहां सिर्फ सरपत उगता है – उत्कृष्टता और प्रतिभा की खेती यहां कहां!
लीनियर नहीं, लॉगरिद्मिक बदलाव
पर बदलाव तो हो रहा है। दस साल में बदलाव मैने देखा है। आगे वह और भी तेज होगा।
दांत की डाक्टरी तो एक पक्ष है। खुशबू की खुशबू केवल एक अकेले की नहीं होगी। बदलाब लीनियर नहीं, लॉग्रिद्मिक होता है!
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