जरई और रक्षाबंधन


राखी का बाजार बचा रहा, जरई का संसार चला गया।

गरिमा, मेरी बहन, की राखी समय पर आ गई है—स्पीड पोस्ट से। सालों से पोस्ट ऑफिस के माध्यम से मिलती रही है। पहले सामान्य लिफाफे में आती थी, फिर कोई समय आया कि स्पीड पोस्ट से आने लगी। शायद सामान्य डाक पर हम जैसे सामान्य लोगों का भी भरोसा कम हो गया था।

अब राखी के दिन का इंतजार है। मेरी बहन की राखी मेरी पत्नीजी ही बांधती रही हैं। रेलवे की नौकरी ने अवकाश नहीं दिया देश के पश्चिमी भाग से प्रयाग-लखनऊ आने का और तब से घरेलू यात्रायें करने की आदत ही जाती रही। अब बूढ़ा व्यक्ति अपनी आदतें नहीं बदल पाता। घुटनों का दर्द बहाना देते हैं कहीं न जाने, न हिलने का।

लेकिन जरा और पीछे जाऊं—अपने बचपन में—तो राखी की स्मृतियां हैं ही नहीं।

तब लड़कियां तालाब से नागपंचमी के दिन मिट्टी लाती थीं। उसमें अपने-अपने जौ के बीज बोती थीं। फिर रोज उन छोटे-छोटे पौधों का अंकुरण और उनका बढ़ना देखती थीं। सबमें प्रतिस्पर्धा भी होती थी कि किसके पौधे—जरई—कितने ज्यादा बढ़ रहे हैं।

उस छोटे-से मिट्टी के पात्र में जाने कितनी चीजें एक साथ चलती थीं—तालाब का पानी, खेत की मिट्टी, जौ का बीज, लड़की के हाथ का श्रम और कई दिनों की प्रतीक्षा। नागपंचमी को बोया गया बीज केवल पौधा नहीं था; वह आने वाले त्योहार की तैयारी था। उसे हर दिन देखना पड़ता था। उसमें पानी देना पड़ता था। उसके बढ़ने का इंतजार करना पड़ता था।

जरई
इतिहास बन गई जरई

राखी के दिन की तरह एक सुबह उठकर सब कुछ तैयार नहीं मिल जाता था।

लड़कियाँ भादौं की कजरी तीज पर वही पौधे अपने भाइयों और पिता के सिर पर या कानों पर पहनाती थीं। जरई ही राखी का प्रतीक होती थी। उसमें गांव-देहात, ऋतु, मौसम, अन्न, जल, तालाब और जरई के लिए किया गया श्रम जुड़ता था।

जरई की सबसे पहली मेरी स्मृति कलुआ बुआ और मेरे बाबा की है। बाबा शम्भू-के-पूरा के स्कूल में हेडमास्टर थे और घर में भी उनका अनुशासन कड़ा था। घर के सबसे बड़े के कारण कुटुम्ब में उन्हें मालिक कहा जाता था। मालिक को कोई जरई पहना सकता है, यह मेरी कल्पना में भी नहीं था। पर मैने देखा कि बुआ बाबा (अपने पिताजी) के कान पर जरई खोंस और कुछ बालें सिर पर बिखेर, डर के मारे भागीं। मालिक को भी आश्चर्य हुआ होगा। कुछ जोर से बोले भी वे। किसी ने घर के जनाना में आकर सूचना दी — कलुई मालिक के जरई बांधे बा!

यह कुटुम्ब के लिए बड़ी बात थी। मालिक ने अपना डंडा भले फटकरा, जोर से बोले, लेकिन अपनी बंडी से निकाल कर एक डब्बल (शायद एक आना) कलुआ बुआ को दिया भी। मुझे भी यकीन हुआ कि बाबा के कठोर व्यक्तित्व के पीछे कोमलता भी रहती है कहीं।

अब जरई जैसा निरीह जौ का पौधा चमचमाती राखी, साथ में मिठाई का डिब्बा, चॉकलेट का हैम्पर और डिजाइनर रोली-चावल की प्रतिस्पर्धा कहां कर पाएगा!

राखी एक दिन में खरीदी जा सकती है, जरई के लिए नागपंचमी से इंतजार करना पड़ता है।

सो जरई इतिहास हो गई!

अब तो एक दशक से गांव में हूं, पर गांव में भी जरई उपजाते और भाई के सिर-कान पर जरई को बांधते नहीं देखा। तालाब हैं, मिट्टी है, जौ भी कहीं न कहीं बोया जाता होगा, भाई-बहन भी हैं—लेकिन वह छोटी-सी परंपरा उनके बीच से निकल गई है।

शायद यही परंपराओं के खत्म होने का सबसे विचित्र तरीका है। कोई घोषणा नहीं होती। कोई दिन तय नहीं होता कि आज से यह परंपरा समाप्त। बस एक साल कोई नहीं करता, दूसरे साल कम लोग करते हैं, तीसरे साल बच्चों को पता ही नहीं होता कि किया क्या जाता था। फिर किसी बूढ़े को अचानक याद आता है कि अरे, ऐसा भी तो होता था!

इस साल राखी 28 अगस्त को है और जरई/कजरी तीज 31 अगस्त को। पर तुरत-फुरत में रक्षाबंधन तो मनाया जा सकता है, जरई नहीं। जरई की तैयारी तो नागपंचमी के दिन से होती है।

अब तो अमेजन ने भाई-बहन के संबंध—राखी का बाजार—थाम लिया है। आपने सोचने, भेजने में देर भी कर दी तो क्या; आप अभी अमेजन या फ्लिपकार्ट पर बटन दबाएं तो घंटे भर में दूर मुंबई या बेंगलुरु में राखी और उसके साथ अन्य बाजार-जनित सामान के चमचमाते पैकेट की डिलिवरी हो सकती है।

बाजार ने इस त्योहार की एक बड़ी समस्या हल कर दी है—दूरी की। भाई प्रयागराज में हो, बहन मुंबई में या बेंगलुरु में, राखी पहुंच जाएगी। मिठाई पहुंच जाएगी। चॉकलेट पहुंच जाएगी। उपहार पहुंच जाएगा। संबंध का प्रतीक समय पर दरवाजे तक आ जाएगा।

लेकिन जरई जैसी perishable जौ की बालियों को डिलिवर करने में बाजार की न चाह है, न उसकी लॉजिस्टिक्स विकसित हो सकती है। जरई को किसी गोदाम में रखा नहीं जा सकता। उसे महीनों पहले पैक करके नहीं भेजा जा सकता। उसे कुरियर बॉक्स में डालने के लिए नहीं बनाया गया। उसे तो अपने ही गांव की मिट्टी में, अपने ही तालाब के पानी से, अपने ही मौसम में उगना पड़ता है।

राखी के साथ बाजार घर आता है; जरई के साथ गांव।

शायद इसीलिए जरई का खो जाना केवल एक पुराने त्योहार की छोटी-सी रस्म का खो जाना नहीं है। उसके साथ त्योहार की वह धीमी गति भी गई जिसमें मौसम को आने दिया जाता था, बीज को फूटने दिया जाता था, पौधे को बढ़ने दिया जाता था और बच्चे को उसके बढ़ने को देखने दिया जाता था।

आज हमारे पास त्योहार पहले से कहीं अधिक चमकदार हैं, लेकिन उनके लिए इंतजार कम हो गया है।

कोई फिल्मी सितारा, कोई प्रधानमंत्री या कोई बड़ा अभियान जरई को फिर से उगा दे तो बात और है। तब शायद सोशल मीडिया पर उसकी तस्वीरें आएंगी, “हमारी खोई हुई परंपरा वापस लाएं” जैसे अभियान चलेंगे और अमेजन पर भी शायद ‘Traditional Jarai Rakhi’ का कोई पैकेट दिखाई दे जाए! लेकिन तब वह जरई होगी या जरई की स्मृति—यह कहना कठिन है।

क्योंकि राखी डिलिवर हो सकती है, जरई नहीं। उसे डिलिवर करने के लिए एक कुरियर नहीं, एक मौसम चाहिए।

ΨΨΨ

ब्लॉग पर 2013 की एक पोस्ट है जरई पर। मेरी बुआ उसमें मेरे पिताजी को जरई बांध रही हैं। अब बुआ भी नहीं रहीं और पिताजी भी। उनकी और जरई की स्मृति जिंदा बची है। मेरे साथ रहेगी।

विकास मिश्र, अट्ठाईस सिलेंडर और एक संतुष्ट जिंदगी



बीए पास ड्राइवर, जिसने बम्बई-गुजरात देखा और फिर घर के पास की छोटी नौकरी चुन ली

छह अगस्त को गैस सिलेंडर बुक किया था। आज अठारह तारीख को आया। इतने दिनों में दो-तीन बार फोन करके पूछताछ की जा सकती थी, लेकिन अब रसोई का काफी काम इंडक्शन पर शिफ्ट हो गया है, इसलिए सिलेंडर की चेजिंग पहले जैसी तीखी नहीं रही।

फिर भी आज जब इंडेन का सिलेंडर आया तो उसके साथ विकास मिश्र भी आए। एक छोटी-सी पिक-अप गाड़ी लेकर। लगभग सात क्विंटल की। बताया कि गाड़ी खराब हो गई थी। जब तक नहीं बनी, उसे बनवाने में लगे रहे और ठीक होते ही आज सिलेंडर लेकर निकल पड़े।

पहले बड़ी पिक-अप आती थी और दो आदमी होते थे। अब छोटी गाड़ी है और उसमें अकेले विकास। वही ड्राइवर, वही डिलीवरी देने वाले, वही पर्ची काटने वाले और वही कार्ड में एंट्री करने वाले। यह एजेंसी की कॉस्ट कटिंग है या कारोबार कुछ घटा है, पता नहीं। लेकिन विकास को इससे कोई शिकायत नहीं है।

वह वैसे भी शिकायत करने वाले आदमी नहीं लगते।

सिलेंडर की सप्लाई में एक DAC नंबर का आदान-प्रदान होता है। छह अंकों का कोई कोड। सिलेंडर बुक होने के बाद डिलीवरी के समय ग्राहक से वह नंबर लेकर एजेंसी में डिलीवरी दर्ज की जाती है।

इस बार काफी दिन निकल गए तो एजेंसी के एक सज्जन ने दो दिन पहले फोन किया। बोले, नंबर बता दीजिए। नंबर बता देने पर वे डिलीवरी दिखा सकते थे और उसके बाद सिलेंडर पहुंचाना उनकी भलमनसाहत पर निर्भर करता। मुझे अनजाने आदमी को नंबर बताने का उतना भरोसा नहीं था। विकास का फोन आया होता तो दे देता।

आज विकास ने सिलेंडर पहुंचाया तो पता चला कि मेरे ऑनलाइन भुगतान वाले सिलेंडर की डिलीवरी पहले ही दिखाई जा चुकी है।

यह नंबर वहां पहुंचा कैसे?

विकास इस पर बस मुस्कराए। कोई जवाब नहीं दिया।

मामला मेरी समझ में नहीं आया। लेकिन इस देश में NEET की परीक्षा के पर्चे लीक हो सकते हैं तो छह अंकों का DAC नंबर कौन-सी बड़ी चीज है! रहस्य वहीं पड़ा रहा।

वैसे विकास को देखकर व्यवस्था के इस छोटे-से गोरखधंधे से ज्यादा दिलचस्प खुद विकास लगते हैं।

वह हंसमुख आदमी हैं। हमारे स्टोर से खाली सिलेंडर निकालते हैं, नया भरा हुआ सिलेंडर उसकी जगह रखते हैं और पर्ची-किताब का काम निपटाकर अगले ग्राहक की ओर चल देते हैं। काम में कोई हड़बड़ी नहीं, लेकिन बेवजह रुकने का समय भी नहीं। आज मेरे घर में रहते हुए ही उनके मोबाइल पर दो-तीन फोन आ चुके थे।

विकास मिश्र इंडेन डिलिवरी वाले
गैस सिलेंडर डिलिवरी वाले विकास मिश्र

लगता है गांवदेहात में गैस सिलेंडर को लेकर अभी भी अफरातफरी रहती है।

विकास रोज अट्ठाईस सिलेंडर लेकर निकलते हैं। दिन भर में डिलीवरी पूरी करते हैं और काम खत्म। कभी गाड़ी खराब हो जाए तो भी छुट्टी नहीं मिलती; गाड़ी को गैराज ले जाकर बनवाना भी उन्हीं की जिम्मेदारी है।

महीना पूरा होने पर बारह हजार रुपये खाते में आ जाते हैं, ऐसा उन्होने बताया।

डिलीवरी के समय कुछ लोग बीस-पच्चीस रुपये टिप दे देते हैं। विकास के मुताबिक उससे चाय-पानी और पानमसाले का खर्च निकल जाता है।

बारह हजार रुपये। बीए पास आदमी। अट्ठाईस सिलेंडर। छोटी पिक-अप। दिन भर की डिलीवरी। किसी दूसरे कोण से देखें तो यह कहानी अभाव की लग सकती है। लेकिन विकास को देखकर ऐसा निष्कर्ष निकालना आसान नहीं है।

सन 2018 में उन्होंने बीए किया था। हालांकि ड्राइविंग उससे पहले ही शुरू कर दी थी। बम्बई और गुजरात में कारवां में पिक-अप चलायी। ट्रकों पर हेल्पर भी रहे और देश का पश्चिमी हिस्सा देखा। बताया कि अभी वे जितना महीने में कमाते हैं, उतना कारवां में हफ्ते भर में कमा चुके हैं।

अर्थात बाहर की दुनिया उन्होंने देखी है। केवल गांव से निकलकर शहर में मजदूरी करने का अनुभव नहीं, बल्कि देश के दूसरे हिस्सों की सड़कें, लंबे सफर, ट्रक, कारवां और प्रवासी कामगारों की दुनिया—सब कुछ थोड़ा-बहुत देखा हुआ है।

फिर भी अंततः घर लौट आए।

मैंने बाहर काम करने और यहां काम करने के फर्क की बात छेड़ी तो उन्होंने लगभग सहजता से कहा—आप जानते ही हैं, घर ज्यादा जरूरी है।

बस।

इसमें कोई भाषण नहीं था। न घर-परिवार के त्याग का भाव, न बाहर की दुनिया को कोसना, न कमाई की शिकायत।

हर आदमी बाहर जाकर ज्यादा कमाना नहीं चाहता। कुछ लोग घर के पास कम कमाकर भी अपनी जिंदगी को ज्यादा मानते हैं।

विकास उन्हीं में से एक लगते हैं।

लेकिन इसे केवल कम आकांक्षा कहना भी ठीक नहीं होगा। वह मूर्ख नहीं हैं। बीए किया है, ड्राइविंग जानते हैं, देश का एक हिस्सा घूम चुके हैं, अपने काम और उसकी कमाई का हिसाब समझते हैं। शायद उन्हें यह भी पता है कि बाहर जाकर बीस-पच्चीस हजार कमाने का मतलब केवल ज्यादा पैसा नहीं होता—घर से दूरी, अनिश्चितता, रहने-खाने का खर्च और परिवार से अलगाव भी उसी पैकेज में आता है।

हो सकता है उन्होंने बाहर और घर की नौकरी के नफा-नुक्सान का गहन हिसाब कर रखा हो। किया ही होगा।

कुछ लोग जीवन में ऊपर उठना चाहते हैं। कुछ लोग जीवन को बस ठीक रखना चाहते हैं। आखिर व्यक्ति अपनी प्राथमिकताएं अपनी प्रकृति से ही बनाता है।

शादी हो चुकी है। दो बच्चे हैं—दस और छह साल के। दोनों स्कूल जाते हैं। घर पास के कईयर मऊ में है।

मैं उनकी पत्नी के बारे में पूछना चाहता था। वह कितनी पढ़ी हैं? घर कैसे चलता है? खेती-बाड़ी है या नहीं? परिवार की अपनी जमीन कितनी है? खेती में विकास का हाथ लगता है या नौकरी ही उनका मुख्य सहारा है?

बच्चों को लेकर भी पूछना था। वे अपने बच्चों को क्या बनते देखना चाहते हैं? क्या चाहते हैं कि बेटे-बेटी भी उनके जैसा काम करें, या पढ़-लिखकर कोई दूसरी दुनिया चुनें?

ये सवाल रह गए।

विकास के पास समय कम था। फोन आ रहे थे और अभी कई घरों में सिलेंडर पहुंचाने थे।

शायद अगली बार पूछूंगा।

मुझे यह भी जानना है कि अगर उन्हें उतने ही पैसे में फिर बम्बई-गुजरात में गाड़ी चलाने का अवसर मिले तो क्या वे जाएंगे? और अगर यहां कमाई बढ़ जाए तो क्या वे बाहर जाने का विचार बिल्कुल छोड़ देंगे?

इन सवालों के जवाब से शायद यह पता चलेगा कि विकास की शांति वास्तव में संतोष है, पारिवारिक जिम्मेदारी है या जीवन के बारे में कोई बहुत व्यावहारिक फैसला।

अभी तो इतना ही दिखता है कि आदमी में कुंठा नहीं है।

गाड़ी खराब हो जाए तो उसे बनवाता है। अट्ठाईस सिलेंडर लेकर निकलता है। दिन भर घूमता है। घर लौटता है। महीने के अंत में बारह हजार रुपये आते हैं।

और शायद उसे यह जिंदगी स्वीकार ही नहीं, पसंद भी है।

बीए पास करने के बाद ड्राइविंग करते रहना हमेशा हार नहीं होता। कभी-कभी आदमी नौकरी नहीं, जीवन को अपनी शर्तों पर जीना चुनता है।

बारिश का मौसम है। कई दिनों से साइकिल लेकर निकलना नहीं हो रहा। घर पर आने-जाने वाले लोग भी कम हो गए हैं। ऐसे में आज विकास मिले तो उन्हीं पर लिखने का मन बन गया।

देश-परदेश घूम चुके विकास ने अंततः घर को चुना। उससे उनकी कमाई कम हुई होगी। शायद जिंदगी बड़ी हो गई।

अगला सिलेंडर लेकर वह शायद डेढ़ महीने बाद आएंगे। तब तक इस मुलाकात के छूटे हुए सवाल मन में रहेंगे।

शायद अगली बार खेती की बात होगी। पत्नी की। बच्चों की। और यह भी कि दस-बारह साल बाद वह अपने बेटे और बेटी को किस दुनिया में देखना चाहते हैं।

तब शायद विकास मिश्र की कहानी थोड़ी और पूरी होगी।

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मोबाइल नहीं, डिजिटल कल्पवास चाहिए


मोबाइल को जीवन में रस और जीवन के बड़े अर्थ से जोड़ने का उपक्रम

सुबह साइकिल लेकर निकलता हूँ। घरपरिसर में ही गोल गोल चक्कर।  साइकिल बहुत तेज नहीं चलाता—इतनी ही कि शरीर चलता रहे और मन को पीछे छूट जाने का डर न हो। कान में किसी किताब की summary चलती है, लेकिन 1X पर नहीं, 0.8X पर।

धीमी साइकिल। धीमी आवाज़।

इसका एक अप्रत्याशित लाभ है। सुनाई गई बात और अगली बात के बीच थोड़ा-सा खाली स्थान बच जाता है। उस खाली जगह में अपना विचार घुस आता है। कभी-कभी किताब से अधिक महत्वपूर्ण वही विचार हो जाता है।

ऐसी ही एक सुबह Arthur C. Brooks की *The Meaning of Your Life* की summary सुन रहा था। काम, vocation, जीवन के अर्थ और उस पुराने Zen प्रसंग की बात थी—”Chop wood. Carry water.”

कहानी में एक युवा साधु ज्ञान प्राप्त करने की आकांक्षा से Zen गुरु के पास जाता है। गुरु उसे साधारण काम देता है—लकड़ी काटो, पानी भरो। साधु वर्षों तक यही करता रहता है। उसके मन में उम्मीद है कि एक दिन enlightenment आएगा और तब जीवन बदल जाएगा।

दशक बीत जाते हैं। वह स्वयं गुरु बन जाता है। पुराने गुरु से पूछता है—अब क्या करना है?

उत्तर मिलता है— लकड़ी काटो। पानी भरो।

अर्थात enlightenment ने काम नहीं बदला। काम करने का ढंग बदल दिया।

मैं साइकिल चलाता रहा और मुझे अचानक दो पुराने चेहरे याद आए। चेहरे क्या याद आए, मन ने गढ़ लिए। उनके छाया-बिम्ब मन में थे, पर गहरे रंग मन ने भरे। 

पहला चेहरा था फ़कीर चन्द का।

कल्पना कीजिए, सन् 1675 का कोई फ़कीर चन्द। रावलपिंडी के पास किसी गाँव में खेती करता है। दिन भर खेत में रहा। शाम को घर के बाहर चबूतरे पर ढोलक लेकर बैठ गया।

लोग इकट्ठे होने लगे। बतकही शुरू हुई। किसी की भैंस खो गई है। किसी की लड़की की कुड़माई की तैयारी चल रही है। गांव का ही रामदास फिर अपनी पत्नी से लड़ रहा है। कोई बाहर से आया आदमी नई खबर लाया है। बीच-बीच में फ़कीर चन्द ढोलक बजाता है। कोई गीत निकलता है। फिर हँसी। फिर बातचीत। फिर ढोलक।

फ़कीरचन्द किसी दर्शनशास्त्र को नहीं जानता। उसे “meaning of life” का प्रश्न परेशान नहीं करता। वह enlightenment की खोज में नहीं है। उसे अपने जीवन का purpose define करने की जरूरत महसूस नहीं होती।

वह बस शाम में मौजूद है। उससे पूछा जाए—”शाम कैसे बीत गई?”

तब वह शायद कहे—”अरे, ढोलक बजाते-बजाते पता ही नहीं चला।”

आज का आदमी भी यही कह सकता है—”रील देखते-देखते पता ही नहीं चला।”

लेकिन दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है। फ़कीर चन्द की तल्लीनता किसी उपकरण ने पैदा नहीं की। वह जीवन के बीच पैदा हुई थी। उसकी ढोलक, लोग, किस्से, गाँव—यही उसकी शाम थे। वह यह जाने बिना कि “रस लेना” क्या होता है, रस ले रहा था।

मुझे तो लगता है कि फ़कीर चन्द उस Zen शिष्य से भी एक कदम आगे है। Zen का शिष्य लकड़ी काटते समय enlightenment की प्रतीक्षा कर रहा है। फ़कीर चन्द ढोलक बजाते समय किसी अगली अवस्था की प्रतीक्षा नहीं कर रहा है। उसे कहीं और पहुँचना ही नहीं है।

शायद वह जीवन को सुधारने की कोशिश भी नहीं कर रहा। वह उसे जी रहा है। बस! 

और फिर मुझे जयदेवा माई याद आती हैं।

आज से करीब अस्सी वर्ष पहले की गरीब स्त्री। उनके जीवन का सबसे बड़ा उत्सव था माघ मास का त्रिवेणी कल्पवास।

लेकिन कल्पवास उनके लिए केवल माघ का एक महीना नहीं था। माघ में नहाकर लौटते ही अगले माघ की तैयारी शुरू हो जाती— अचार डालना है। वड़ियाँ बनानी हैं। अनाज बचाना है। पिसान रखना है। लकड़ी जुटानी है।

एक-एक छोटी चीज अगले वर्ष के कल्पवास से जुड़ी हुई थी। उनका पूरा वर्ष जैसे माघ के महीने की ओर धीरे-धीरे बह रहा था।

जयदेवा माई को भी शायद यह पता नहीं था कि वे “जीवन के अर्थ” की तलाश कर रही हैं। उन्होंने कोई पुस्तक नहीं पढ़ी थी जिसमें लिखा हो कि मनुष्य को एक दीर्घकालिक purpose चाहिए। उन्हें vocation का सिद्धान्त नहीं मालूम था।

वे बस अपना जीवन जी रही थीं।

लेकिन उनके जीवन के साधारण कामों में एक बड़ी धुरी थी— अचार केवल अचार नहीं था। लकड़ी केवल लकड़ी नहीं थी। अनाज केवल अनाज नहीं था। हर चीज अगले माघ की ओर जा रही थी।

यहाँ फ़कीर चन्द और जयदेवा माई मुझे एक साथ दिखाई देते हैं।

फ़कीर चन्द हमें सिखाता है कि जीवन के अर्थ को पहले शब्दों में पकड़ना जरूरी नहीं। आप बिना किसी दर्शन के भी जीवन में पूरी तरह उपस्थित हो सकते हैं।

जयदेवा माई दिखाती हैं कि जीवन के छोटे-छोटे काम किसी बड़े अर्थ से जुड़ जाएँ तो पूरा वर्ष एक दिशा पा सकता है।

और Brooks का Zen प्रसंग इन दोनों को एक तीसरी भाषा देता है—लकड़ी काटो, पानी भरो।

Mobile and Purpose of Life
फ़कीरचन्द, जयदेवा, जेन कथा और मेरी साइकिल

काम वही है। अर्थ उस काम के साथ हमारे सम्बन्ध में है।

यहीं आधुनिक  मोबाइल की कहानी शुरू होती है।

मोबाइल को हम प्रायः दोष देते हैं। कहते हैं कि उसने मनुष्य को स्वाइप करने वाला जीव बना दिया है। घंटों अंगूठा चलता रहता है और समय का पता नहीं चलता।

लेकिन मोबाइल ने मनुष्य में तल्लीन होने की क्षमता पैदा नहीं की। वह क्षमता फ़कीर चन्द में पहले से थी। मोबाइल ने केवल उस क्षमता के सामने एक नया संसार रख दिया।

अब हमारे पास ऐसी चीज है जो हर पाँच सेकंड में नया दृश्य दे सकती है। अगली सूचना, अगला वीडियो, अगली टिप्पणी, अगली उत्तेजना। और सबसे खतरनाक बात—इसका कोई स्वाभाविक अंत नहीं है।

फ़कीर चन्द की शाम समाप्त होती थी। जयदेवा माई का माघ समाप्त होता था। पर मोबाइल का फ़ीड समाप्त नहीं होता।

इसलिए समस्या शायद मोबाइल नहीं है। समस्या यह है कि आधुनिक जीवन में हमारे पास फ़कीर चन्द जैसी सहज तल्लीनता भी कम हो गई है और जयदेवा माई जैसा दीर्घकालिक कल्पवास भी।

हम या तो किसी चीज में डूबना चाहते हैं, या किसी बड़े उद्देश्य की तलाश में भटकते हैं; और मोबाइल दोनों के बीच की खाली जगह भर देता है।

शायद इसका समाधान जीवन से मोबाइल छीन लेना नहीं है।  हमें अपने जीवन में कुछ ऐसे काम फिर से खोजने हैं जिनमें हम उपस्थित हो सकें—और कुछ ऐसे काम भी, जिनकी तैयारी महीनों और वर्षों तक चल सके।

यह हो सकता है — किसी के लिए पुस्तक लिखना। किसी के लिए बगीचा लगाना। किसी के लिए गाँव का इतिहास दर्ज करना। किसी के लिए बच्चों को पढ़ाना। किसी के लिए कोई कला सीखना। किसी के लिए नदी के किनारे पेड़ लगाना। और किसी के लिए, शायद, रोज सुबह धीरे-धीरे साइकिल चलाते हुए मोबाइल पर ही किसी किताब को 0.8X पर सुनना और उसके बीच पैदा होने वाले अपने विचारों को पकड़ लेना।

तब मोबाइल हमारा जीवन नहीं होगा। वह जीवन के काम आएगा।

तब वह distraction नहीं, साधन होगा। प्रोपेलर होगा, चालक नहीं।

शायद आधुनिक मनुष्य को “डिजिटल डिटॉक्स” से अधिक “डिजिटल कल्पवास” की जरूरत है। डिजिटल कल्पवास का अर्थ मोबाइल छोड़ना नहीं है। अर्थ यह है कि मोबाइल को किसी ऐसी यात्रा में लगा देना जो अगले पाँच सेकंड में समाप्त नहीं होती।

फ़कीर चन्द को enlightenment नहीं चाहिए था। जयदेवा माई को meaning की परिभाषा नहीं मालूम थी। Zen के साधु को enlightenment चाहिए थी, लेकिन अंत में उसे फिर वही मिला—लकड़ी काटो, पानी भरो।

और शायद हमसे भी जीवन यही कह रहा है— कुछ ऐसा खोजो जिसे करते हुए तुम्हें समय का पता न चले। तुम्हें रस मिल रहा है, इसका अहसास न होते हुए भी वह सतत मिलता रहे। 

कुछ ऐसा भी खोजो जिसके लिए आज का छोटा काम कल के बड़े अर्थ से जुड़ता हो।

और फिर अपने  मोबाइल को उसी काम में लगा दो।

शायद यही डिजिटल युग का कल्पवास है।


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