नर्मदा दंड परिक्रमा : अध्याय 1



बलिया पेसेंजर से बरगी के ड्रेगन तक


अप्रेल 2026 — यात्रा का पहला महीना

यात्रा का प्रारम्भ — कटका स्टेशन — पैसेंजर ट्रेन में गुजरते प्रेमसागर

कटका स्टेशन पर गुजरते प्रेमसागर

सवेरे फोन आया तो प्रेमसागर की ट्रेन बनारस सिटी में खड़ी थी। उन्होंने बताया कि वे प्रयाग जा रहे हैं, वहाँ से चित्रकूट जाएंगे। किसी चंदन की लकड़ी का आठ इंच का टुकड़ा लेकर आगे निकलेंगे — नर्मदा की दंड-परिक्रमा के लिये।

मेरे हिसाब से यह शुद्ध हठयोग है। इससे साधक की आत्मिक उन्नति कितनी होती है, वही जाने। पर धर्म में इस तरह के प्रयोगों की परम्परा है। प्रेमसागर की इस यात्रा के माध्यम से मैं अपनी मानसिक हलचल ही दर्ज करूँगा। उसमें मेरी एक तरह की आर्मचेयर नर्मदा-यात्रा होगी — जहाँ मैं चल नहीं रहा, पर भीतर बहुत कुछ चल रहा है।

पत्नीजी से अनुरोध किया कि प्रेमसागर के लिये एक कैसरोल में पूरी-तरकारी बना दें। वह तैयार हो गया, पर ट्रेन लेट होती गई। जब गाड़ी कटका स्टेशन पर आई तो बारह बज चुके थे।

बहुत सालों बाद मैं प्लेटफॉर्म नम्बर 2 पर गया — जबकि स्टेशन घर से मात्र पाँच सौ कदम की दूरी पर है। प्रेमसागर का डिब्बा अंतिम था, तो पूरी लम्बाई चलकर वहाँ पहुँचा।

दो मिनट ही रुकी होगी गाड़ी। प्रेमसागर बाहर निकल कर दौड़ते हुए मेरे पास आये और चरण स्पर्श किया। भोजन का कैसरोल मेरे ड्राइवर अशोक ने उन्हें थमाया और ट्रेन चल दी। जाती ट्रेन के दरवाजे पर खड़े प्रेमसागर का चित्र मैंने खींचा।

सफेद कपड़ा पहने प्रेमसागर में मेरे प्रति आदर-भाव साफ दिख रहा था। आगे की कठिन यात्रा को लेकर कोई तनाव, कोई उहापोह — लेशमात्र भी नहीं। उनके गुणसूत्र में यायावरी है। यायावरी उनका ओढ़ना-बिछौना है, उनकी साँसों में बसी हुई है। लगता है नर्मदा की दंड-परिक्रमा के लिये वे वैसे ही निकले हैं जैसे मैं साइकिल लेकर गंगा किनारे टहलने निकलता हूँ।

पर यायावरी को मैं किसी अद्भुत तपस्या से नहीं जोड़ता। मेरी राय में वह कठिन जरूर है, उसमें संघर्ष है; पर अंततः वह एक साधारण मानवीय प्रवृत्ति ही है। हर आदमी कुछ न कुछ मात्रा में यायावर है — प्रेमसागर बस थोड़ा ज्यादा है।

दंड-नर्मदा-यात्रा का विवरण लिखते हुए मैं प्रेमसागर को महानता के चने के झाड़ पर नहीं चढ़ाऊंगा। वे नर्मदा को समझें तो ठीक; नर्मदा के किनारे-किनारे चलते हुए भी अगर अछूते निकल जायें, तो भी मुझे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। मेरी अपनी मानसिक यात्रा चलती रहनी चाहिये — बस।

सूर्यकुंड से बंजार-संगम — परिक्रमा का पहला दिन

04 अप्रेल 2026

उसके बाद प्रेमसागर का फोन बंद रहा। आज 4 अप्रेल को सवेरे मंडला से फोन आया। चित्रकूट से उन्होंने सवा बित्ते की चंदन की लकड़ी ले ली है। आज सवेरे वे नर्मदा-स्नान कर, केवल एक धोती के अधोवस्त्र में, कमर पर गमछे का फेंटा लपेटे, एक कमंडल में पीने के लिये जल लेकर दंड-परिक्रमा प्रारम्भ करने जा रहे हैं।

मंडला में नर्मदा के दक्षिण तट से प्रेमसागर ने दंड-परिक्रमा प्रारम्भ की। शुरुआत सूर्यकुंड से हुई — दक्षिणमुखी हनुमान जी को प्रणाम कर।

दंड-यात्रा का अर्थ है — बार-बार सड़क पर लेटना, उठना, और आगे बढ़ना। एक किलोमीटर में लगभग 1670 कदम, या 560 दंडवत। गंगा किनारे सुल्तानगंज से बैजनाथधाम की दंड-कांवड़-यात्रा का अनुभव उनके पास पहले से है। लेकिन यह नर्मदा-दंड-परिक्रमा उससे कहीं बड़ी है — करीब छब्बीस गुना बड़ी।

पूरी नर्मदा परिक्रमा दंडवत — लगभग सोलह लाख बार शरीर को धरती पर टिकाना और उठाना — बिना किसी साथ निभाते सहायक के।

सोलह लाख — संख्या सुनने में ही भारी लगती है।

आज की तय की गई दूरी मात्र दो किलोमीटर रही। शुरुआत थी, इसलिए शरीर और मन दोनों को लय पकड़नी है। धीरे-धीरे पाँच किलोमीटर प्रतिदिन का औसत बन जाएगा — ऐसा अनुमान है। कुल मिलाकर डेढ़ साल का समय इस यात्रा में लगेगा।

मैं सोचता हूँ — अगर इस यात्रा के साथ लिखना हो, तो क्या लिखा जाए? शायद रास्ते में मिलने वाले लोगों के बारे में। जो सहयोग करते हैं, जो रास्ता दिखाते हैं, जो पानी देते हैं, जो चुपचाप देखते हैं — उनके बारे में। लगभग पाँच सौ लोगों की कथाएँ — ‘नर्मदा के लोग’ — शायद यही इस यात्रा का असली लेखा-जोखा होगा।

आज सूर्यकुंड से बंजार-नर्मदा-संगम तक की यात्रा हुई। दो जगह लोगों ने प्रेमसागर को अतिथि की तरह रखा — मंडला में नर्मदा के उत्तर तट पर अंकित जी और उनकी धर्मपत्नी ने, और सतवार गाँव के देवचंद कुशवाहा ने। आज रात में ये दोनों परिवार एक साथ थे प्रेमसागर के साथ।

दंड-परिक्रमा से जुड़ते लोग

रींवा के स्वामीदीन पाण्डेय की बिटिया प्रियंका और उनके पति अंकित — मंडला में रहते हैं। स्वामीदीन जी ने उन्हें कहा था कि प्रेमसागर का ध्यान रखें। बात कहने भर की थी, पर उन्होंने उसे जिम्मेदारी की तरह लिया। घर बुलाया, सत्कार किया, और अब जहाँ भी प्रेमसागर रात में रुकते हैं, वहाँ पहुँच जाते हैं।

प्रेमसागर इस बात पर अटक जाते हैं — “भईया, मंडला पहुँचा तो बस डेढ़ घंटा लेट थी। ये लोग कोंरा में बच्चा लिये खड़े रहे मेरे इंतजार में।”

रास्ते में लोग दंड-यात्रा देखते हैं तो अपने-अपने घरों से बाहर निकल आते हैं। अजूबा लगता है उन्हें यह चलना। एक आदमी ने कहा — “बाबाजी, आप जैसे परकम्मावासी हों तो कितना अच्छा हो।”

पर इसी रास्ते में एक दूसरा दृश्य भी है। गाँव वालों ने बताया — एक यात्री ने गुस्से में एक बच्चे के पैर पर लाठी दे मारी थी। यात्रा पर निकलना आसान है; अपने राग-द्वेष, क्रोध — उन्हें छोड़ना शायद उतना आसान नहीं।

सूरजकुंड से गुरुम कुशवाहा साथ हो लिये हैं। पचास-पचपन के होंगे। तीन बेटे हैं। पत्नी ने बिना झिझक उन्हें परिक्रमा के लिए भेज दिया।

फोन पर गुरुम से मेरी बात हुई तो बोले — “एक लड़के को बिजली का करंट लग गया था। अब ठीक है, नर्मदा माई की कृपा से। वही अब अपने भाई के साथ पुट्टी लगाने के काम में जाने लगा है। यह यात्रा — माई के प्रति आभार है।”

उनके दो पड़ोसी साइकिल से निकले हैं — रोज पचास किलोमीटर चलने की ठान कर। गुरुम कहते हैं — “इतना हमसे नहीं होगा। बाबाजी के साथ धीरे-धीरे चलेंगे। उनके लिए पानी ले चलेंगे। साथ में परिक्रमा हो जाएगी।”

दो दिन से वन-विभाग के एसडीओ मौर्या साहब भी मिल रहे हैं। बोले — “जितना हो सकेगा, सहायता करेंगे।” धीरे-धीरे लोग जुड़ते जा रहे हैं। अगर कृपा बनी रही — तो यह यात्रा सिर्फ प्रेमसागर की नहीं रहेगी, कई लोगों की साझी यात्रा बन जाएगी।

छाले और जेठ की जलन

22 अप्रेल 2026

नियमित लिखना नहीं हो रहा, पर प्रेमसागर फोन कर या व्हाट्सऐप कर बता देते हैं अपनी दंड-यात्रा का हाल। घाघा से आगे निकल चुके हैं। सहस्रधारा पीछे छूट गई है।

दो रोज पहले घोघा में नोतमदास बैरागी जी के यहाँ रहे थे। बैरागी जी ने सवेरे साढ़े पाँच बजे उषाकाल में प्रेमसागर के दंड शुरू करते का वीडियो बना भेजा था। उस वीडियो को देखकर ही अंदाज हो जाता है इस पूरे कार्य की कठिनाई का।

वीडियो में प्रेमसागर पिछली शाम के बनाए चिन्ह की मिट्टी को समतल करते हैं। अपना फेंटा बाँधकर कान पकड़ तीन बार उठक-बैठक लगाते हैं — शायद नर्मदा माई से भूल-चूक के लिये क्षमा-याचना के प्रतीक के रूप में। उसके बाद उनका बैठने-लेटने-चिन्ह लगाने और उठ कर चिन्ह तक आगे बढ़ने का क्रम प्रारम्भ होता है। पास में कोई मंदिर है, जिस पर मानस की चौपाई का पाठ हो रहा है लाउडस्पीकर पर।

सवेरे का समय और दंड भरते प्रेमसागर — धर्म के प्रति श्रद्धा भी जगती है और यह प्रश्न भी कि काहे यह कर रहे हैं वे। क्या कोई और तरीका नहीं है आध्यात्मिकता का? यह अपनी मन की सारंगी के तार कुछ ज्यादा कसना नहीं है? इतना कसना कि जीवन-संगीत ही अलग-सा हो जाए। क्या इसमें यात्रा की सरलता है या कठिन यात्रा का अभिमान?

वे मुझे बताते हैं — “भईया, कार से चलते लोग भी रुककर पानी पिलाते हैं। कोई तो डाभ भी ले आते हैं पिलाने के लिये।”

गर्मी बहुत पड़ रही है। सड़क का डामर इतना गरम हो जाता है कि 9-10 बजे रुकना पड़ता है। रोज 4-5 किलोमीटर दंड भरा जा रहा है। हाथों, सीने और पेट पर छाले पड़ जा रहे हैं। छाले फूट भी जाते हैं। बोरो-प्लस पास में है छालों पर लगाने को।

“भईया, अभी तो सड़क किनारे पेड़ नहीं हैं पर डिप्टी साहब बता रहे हैं — आगे सागौन के जंगल मिलेंगे तो छाया रहेगी। छाया में दूरी ज्यादा तय हो पाएगी।”

मैंने सोचा था कि घाघा के बैरागी जी से फोन पर बात करूँगा, पर वह हो नहीं पाया। यात्रा के लोगों से जुड़ने का अर्थ है रोज प्रेमसागर के लिये 3-4 घंटे का समय निकाल कर जानकारी संजोना और लिखना। उसका न साहस बन रहा है, न अनुशासन।

प्रेमसागर एक विलक्षण यात्रा कर रहे हैं। तीन सप्ताह हो रहे हैं यात्रा को। वे मान कर चल रहे हैं कि मैं उनके साथ हूँ — वर्चुअल तरीके से ही सही। वे मेरी झिझक को सहमति मान कर चल रहे हैं। मैं अभी इस गुणा-भाग में लगा हूँ कि क्या मैं कोई एक लाख शब्द का दस्तावेज — रूखी रिपोर्ट नहीं, पठनीय लेखन — लिख पाऊँगा? मुझे अभी अपने पर भरोसा नहीं है।

सतपुड़ा का जंगल और महुआ की छाँह

24 अप्रेल 2026

प्रेमसागर जी ने सवा दस बजे फोन किया — सतपुड़ा के जंगल से। सागौन के पेड़ों पर पत्ते नहीं हैं। सड़क धूप में भभकने लगती है दस बजे तक। दंड-परिक्रमा रोककर एक महुआ की छाया में गमछा बिछाया है। शाम चार बजे तक यहीं विश्राम होगा।

महुआ में पत्ते हैं और नए भी आए हैं। टपक भी रहा है महुआ। नर्मदा जी दो किलोमीटर दूर होंगी पर जंगल से कोई एहसास नहीं होता।

प्रेमसागर के कहने से भवानी प्रसाद मिश्र की कविता याद आती है — ‘सतपुड़ा के घने जंगल…’ दंड-यात्रा चल रही है। कोई जंगली सूअर कहीं खुरखुरा रहा होगा।

एक और बात बताई प्रेमसागर जी ने — नर्मदा दंड-परिक्रमा करने वाले को सोना भी जमीन पर पड़ता है। पिछली रात ठाडा गाँव में ओसारे में जमीन पर बिस्तर बिछाया था। गृहस्वामी और उसका परिवार साथ था। घर कोई बहुत संपन्न का नहीं दिखता, पर है साफ-सुथरा और सलीकेदार। पहले हल-बैल-गाड़ी होते, अब मोटर साइकिल है।

मैं तो कल्पना ही कर सकता हूँ कि बाबाजी को भोजन में क्या मिला होगा — मड़ुआ की रोटी और कोदों का भात? या अब गाँव भी गेहूँ-धान पर आ गया होगा? मन मेरा ललचाता है — आखिर यात्रा तो प्रेमसागर ही कर रहे हैं, अकेले।

उमेश यादव का पपीता, और मूंग के खेत

25 अप्रेल 2026

नर्मदा-दंड-परिक्रमा करते प्रेमसागर के प्रति अनुराग रखने वाले — सहायक लोग मिलते और जुड़ते हैं। जहाँ तक हो सकता है — चले आते हैं अपनी-अपनी श्रद्धा अनुसार।

श्रद्धा पता नहीं धर्म पर होती है या मानवता पर। प्रेमसागर पर या नर्मदा पर। पर है प्रचुर।

अहमदपुर के उमेश यादव जी दंड-यात्रा से जुड़े आते हैं। कभी पानी की बोतलें लिए — कभी पपीता। अनजान लोग भी रुकते हैं। हाल पूछते हैं और पानी-नारियल देते हैं। दंड-यात्रा में कष्ट ही नहीं है, मिलने वाले लोगों के व्यवहार की तरावट भी है।

बाईस दिन हुए हैं दंड-परिक्रमा को। अभी तो शुरुआत ही मानी जाए।

26 अप्रेल 2026

आज का पड़ाव प्रेमसागर बताते हैं — साल्ले डंडा। कहते हैं इस नाम की नदी भी है, सूखी हुई। बरसाती नदी है। यहाँ के पूर्व सरपंच ज्ञानी लाल जी के यहाँ दोपहर का विश्राम हुआ और शाम को दंड भरने के बाद रात भी वहीं रहेंगे।

गाँव में कच्चे-पक्के दोनों तरह के घर हैं। किसान गेहूँ काट चुके हैं। कुछ मूंग की भी फसल ले लेते हैं धान की खेती से पहले। कोदों नहीं होता यहाँ।

बगल के ब्लॉक में लोग बता रहे थे कि इस दफा राशन में सरकार ने कुटकी बाँटा है। आज से तीस साल पहले मंडला के परिक्रमा-विवरणों में कुटकी-कोदों-साँवा जैसे मोटे अनाज का जिक्र है। भोजन में भी उन्हीं का इस्तेमाल। वह सब अब नहीं है।

प्रेमसागर बताते हैं — खेती हल-बैल से भी होती है और ट्रेक्टर से भी। बैलगाड़ियाँ भी दिखती हैं। इलाका पारम्परिक और मशीनी खेती की संधि पर है।

“कल बैलगाड़ी का फोटो लेने की कोशिश करूँगा, भईया।”

पलाश और सोलर कुकर की उपमा

27 अप्रेल 2026

नर्मदा-दंड-परिक्रमा प्रेशर कुकर की रसोई नहीं है। धीमी आँच पर बनती खिचड़ी की तरह है। स्वाद धीरे-धीरे घुलता है अन्न में — कुछ उस तरह।

पर आजकल तो सूरज तप रहे हैं, रसोई की उपमा सोलर कुकर से करनी चाहिए। साढ़े पाँच बजे शुरू की परिक्रमा — नौ बजे तक थामने का समय हो जाता है। पहली पारी की खिचड़ी।

नर्मदा परिक्रमा मार्ग बन रहा है। गर्दा उड़ रहा है। श्रमिक कहते हैं — “यहीं पेड़ की छाँह में आराम करो बाबा।”

प्रेमसागर कहते हैं — “अब चार बजे शाम को शुरू करूँगा। एक किलोमीटर बचा है घाटी पार करने में। वैसे भईया, यह कच्ची पगडंडी बेहतर है दंड-यात्रा के लिये। पक्की सड़क पर तो डामर ज्यादा ताप देता है।”

उमेश यादव फिर आये — आज पत्नी लक्ष्मी और छोटी बेटी को भी साथ ले आये। बेटी के हाथ में पानी की बोतल है — शायद उसी को सौंपने की जिम्मेदारी दी गई है। बड़ी बेटी प्रियंका घर पर रही, पर पपीते भेजे। 40 डिग्री के जंगल में यह परिवार — नर्मदा माई की सेवा में अपनी तरफ से।

जंगल की ओर नजर डाली जाये। महुआ भी टपक रहा है। पलाश भी फूला है। मानो जंगल बिना आग दहक रहा हो। बस सागौन खँखड़ हो गया है — आठ-आठ फुट की दूरी पर लगाए सागौन के पेड़ बल्लियों की तरह ठूँठे खड़े हैं।

कल का आतिथ्य देने वाले साल्ले डंडा के ज्ञानी लाल वर्कड़े जी का चित्र मोबाइल से प्रेमसागर भेजते हैं। पाँव खाट पर फैलाए बैठे ज्ञानी लाल जी। ज्ञानी लाल जी जैसे सैकड़ों-हजारों मिलेंगे जिनकी सहायता से प्रेमसागर की दंड-यात्रा पूरी होगी।

जंगल का बीहड़ रास्ता और वेगड़ जी की स्मृति

28 अप्रेल 2026

यह भी कोई रास्ता है? जो चित्र प्रेमसागर ने भेजे हैं उनमें जंगल के पेड़ों के बीच जगह भर नजर आती है। कंकड़-पत्थर वाली जगह। कोई दूब नहीं, कोई सभ्यता का निशान नहीं। पानी भी नहीं। मात्र धूसर रंग।

चरवाहों ने बनाया होगा — दो जगहों के बीच कौआ-उड़ान की दूरी। जो परिक्रमावासी हर इंच बचाते हैं, जंगल से नहीं डरते — वे यही चुनते हैं। प्रेमसागर भी इसी पर दंड भर रहे हैं। कंकर-पत्थर है, पर डामर नहीं दहकता। जब तक यह गर्मी है — यह बीहड़ रास्ता उस अलकतरे वाली सड़क से बेहतर है।

सूखी पत्तियाँ
पग खुद रास्ता गढ़े
जंगल सहमत

कंकर की चुभन
देह नापे हर इंच
मौन परिक्रमा

दंडवत देह
डामर से ठंडी मिट्टी
यात्रा भीतर की

सन् 1977 में वेगड़ जी ने नर्मदा-यात्रा की — तब बरगी बाँध नहीं था। नर्मदा से निकटता और आत्मीयता दोनों रही होगी तब। अब तो वेगड़ जी भी नहीं रहे।

बरगी बाँध बना — हजारों एकड़ जंगल डूबे, गाँव डूबे, लोग उजड़े। नर्मदा का स्वभाव बदला। जो oral history थी — बुजुर्गों की स्मृति में, उनकी भाषा में — वह भी धीरे-धीरे डूब गई। अब न वे लोग हैं, न वे किनारे, न वह नर्मदा।

नक्शे में देखता हूँ तो बरगी का जलभराव ड्रेगन जैसा दिखता है — कहीं मोटा, कहीं पतला, कहीं पतली-पतली पूँछ जैसा।

नक्शे में देखता हूँ तो बरगी का जलभराव ड्रेगन जैसा दिखता है — कहीं मोटा, कहीं पतला, कहीं पतली-पतली पूँछ जैसा। प्रेमसागर अभी उसी पूँछ के पास हैं। आगे पूरा ड्रेगन होगा।

पर दंड-यात्री बेखबर निकलता जाएगा। किसी बुजुर्ग के पास नहीं बैठेगा — “बाबा, आपके बचपन में नर्मदा माई कैसी रही होंगी?” — यह प्रश्न नहीं पूछेगा। बरगी का नाम नहीं लेगा कभी। नर्मदा के बदलाव से अनजान — प्रेमसागर की देह परिक्रमा कर रही है, नर्मदा अनजानी रहती है।

यह विस्मृति भी तो एक त्रासदी है।

जंगल का विदाई-भोज

29 अप्रेल 2026

तीन-चार दिन में जंगल खत्म हुआ।

जंगल और सभ्यता की संधि पर चार परिक्रमावासी मिल गये — प्रेमसागर, संजय शुक्ल, लक्ष्मीनारायण और हीरालाल प्रजापति। चारों साधु के वेश में। चारों की दाढ़ी बढ़ी हुई। जमीन पर बैठ गये। पपीता और सींगदाना निकला। किसी के पास चाकू था — पपीता कटा, बँटा, खाया गया।

जंगल को यही वेश पसंद है शायद। हजारों साल से मानव जंगल में ऐसे ही विचरता रहा होगा।

आगे नर्मदा-सेवा-आश्रम है। उसके बाद सड़क — नर्मदा के समानान्तर, पर नर्मदा से चार कोस दूर। मंडला में नर्मदा 500 मीटर चौड़ी थी। बरगी के पास वही नर्मदा 12 किलोमीटर हो जाती है। डूबी हुई, फैली हुई, स्थिर। जैसे कोई नदी नहीं, झील हो।

एक परिक्रमा और होनी चाहिये — बाँधों के तीरे-तीरे। यह नर्मदा की असली कथा होगी।

रात सिंहनपुरी में बीती — डॉक्टर जसवंत यादव जी के घर। गाँव सिवनी जिले का, पर मंडला करीब है। नर्मदा चार किलोमीटर दूर है। किनारे पर सेलवडा, पिपरिया रैय्यत और झुरकी — बरगी के ड्रेगन की पूँछ के किनारे बसे गाँव।

जसवंत यादव जी के परिवार का चित्र देखा। एक अधेड़ महिला — माथे पर टिकुली, कमर पर मोटी करधनी। ऐसी करधनी आजकल कहाँ दिखती है। हाथ बता रहे हैं — यह हाथ आराम से नहीं जीते। गाय-गोरू, रसोई, खेत।

सोचता हूँ — सवेरे उठते ही जाँत चलाती होंगी? जाँत चलाने के गीत अभी बचे होंगे इस घर में? या बरगी बाँध की आधुनिकता उन्हें भी डूब में ले गई?

जंगल और नर्मदा की संधि पर है यह गाँव। मेरे लिये खास है — पर इसकी कथाएँ नहीं मिलीं। प्रेमसागर आगे बढ़ गये, कथाएँ पीछे रह गईं।

यह अधूरापन साथ रहेगा — जब तक यह यात्रा चलेगी।

[लेखकीय नोट: यह अध्याय अप्रेल 2026 में लिखा गया — जब यात्रा नई थी और मैं खुद तय नहीं कर पाया था कि इससे मेरा रिश्ता क्या है। वह असमंजस सच्चा था। उसे सँवारा नहीं है।]

〰〰〰

कक्षा 8 में जाने का अनुभव


कक्षा आठ में जाने का अनुभव मेरे जीवन का एक बहुत खास और यादगार समय था। इसमें मेरे मन में एक साथ कई तरह की भावनाएँ चल रही थीं—डर, खुशी, उत्साह और थोड़ा सा दुख भी। कक्षा शुरू होने से एक दिन पहले रात को मैं बिल्कुल ठीक से सो नहीं पा रही थी। मैं बार-बार यही सोच रही थी कि अब मैं बड़ी हो रही हूँ। यह सोचकर मुझे थोड़ा अजीब भी लग रहा था, क्योंकि मुझे लग रहा था कि सब कुछ बहुत जल्दी बदल रहा है।

मेरे मन में यह भी चल रहा था कि अब नया सेक्शन होगा, नए बच्चे होंगे और सब कुछ नया होगा। मुझे यह सोचकर अच्छा भी लग रहा था कि मैं नए लोगों से मिलूँगी, लेकिन साथ ही यह दुख भी था कि मेरे कुछ पुराने दोस्त अब मेरे साथ नहीं होंगे। मेरी एक बहुत अच्छी दोस्त त्रिशा दूसरे सेक्शन में चली गई थी, और यह बात मुझे अंदर से थोड़ा उदास कर रही थी।

जब मैंने अपनी नई किताबें देखीं, तो मेरे मन में और भी ज्यादा भावनाएँ आ गईं। सोशल साइंस (SST) की किताब मुझे बहुत अच्छी लगी। उसके चैप्टर्स देखकर मुझे लगा कि इसे पढ़ने में मज़ा आएगा और मैं बहुत कुछ नया सीखूँगी। लेकिन जैसे ही मैंने मैथमैटिक्स की किताब देखी, मैं थोड़ा डर गई। उसमें इतने सारे सम और इक्वेशंस थे कि मुझे लगा कि यह सब मेरे लिए बहुत कठिन होगा। उस समय मैं किताबों को देखकर थोड़ी घबराई भी और थोड़ा उत्साहित भी हुई।

अगले दिन जब मैं स्कूल पहुँची और अपनी नई कक्षा में गई, तो मेरा दिल तेज़ धड़क रहा था। क्लास में नए चेहरे थे और माहौल भी अलग लग रहा था। तभी हमारी क्लास टीचर, सरिता मिश्रा मैम क्लास में आईं। उनके चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान थी, और जैसे ही उन्होंने हमें देखा, उन्होंने बहुत ही प्यार और अपनापन के साथ हमारा स्वागत किया। उस पल क्लास का माहौल एकदम बदल गया।

मैम का स्वभाव बहुत अलग था। वह एक तरफ सख्त थीं, तो दूसरी तरफ बहुत ही दयालु भी थीं। जैसे ही क्लास शुरू हुई, उन्होंने देखा कि एक बच्चे ने इमोजी बैज नहीं पहना था। हमारे स्कूल में इमोजी बैज पहनना जरूरी होता है, क्योंकि इससे हम अपने भाव दिखाते हैं। हमारे पास चार तरह के इमोजी बैज होते हैं—happy, tired, angry, sad ( 😀🥱😡☹️) —और हम उस दिन जैसा महसूस करते हैं, वैसा बैज पहनते हैं।

उस बच्चे ने बैज नहीं पहना था, तो मैम ने उसे थोड़ी सख्ती से डांटा। उस समय उनकी आवाज़ में अनुशासन साफ दिखाई दे रहा था और पूरी क्लास एकदम शांत हो गई। लेकिन उसी के बाद उन्होंने उसे प्यार से समझाया कि यह सिर्फ एक नियम नहीं है, बल्कि अपने मन की बात बताने का एक तरीका है। उनके इस व्यवहार से हमें समझ आया कि वह हमें सिर्फ डांटती नहीं हैं, बल्कि हमें सही रास्ता भी दिखाती हैं।

फिर मैम ने हम सब से बात की। उन्होंने बहुत ही सच्चे और शांत तरीके से कहा कि “यह क्लास सिर्फ पढ़ाई की जगह नहीं है, यह हमारा एक परिवार है।” उन्होंने कहा कि पूरे साल हम एक परिवार की तरह रहेंगे—कभी हम हँसेंगे, कभी छोटे-मोटे झगड़े भी होंगे, लेकिन हम हमेशा एक-दूसरे का साथ देंगे।

उस दिन के बाद मैंने महसूस किया कि कक्षा आठ सिर्फ कठिन पढ़ाई नहीं है, बल्कि यह एक नई शुरुआत है। अब मुझे धीरे-धीरे अपनी किताबों से उतना डर नहीं लगता। सोशल साइंस मुझे अब भी बहुत पसंद है, और मैथ से थोड़ा डर अभी भी है, लेकिन अब मैं कोशिश करती हूँ कि उसे समझ सकूँ।

उन्होंने अपना अनुभव भी साझा किया। उन्होंने बताया कि जब वह खुद कक्षा आठ में थीं, तब उन्हें समझाने वाला कोई खास नहीं था। उन्हें भी डर लगता था और वह भी हमारी तरह घबराई हुई थीं। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि आज हमारे पास बहुत कुछ है—अच्छे शिक्षक, किताबें और मदद करने वाले लोग—इसलिए हमें डरने की जरूरत नहीं है, बल्कि खुश होना चाहिए कि हमें इतना कुछ सीखने का मौका मिल रहा है।

मैम की बातों में सख्ती भी थी और अपनापन भी। कभी-कभी उनकी सख्ती देखकर थोड़ा डर लगता था, लेकिन उनकी बातों में जो सच्चाई और देखभाल थी, वह साफ महसूस होती थी। उनके स्वभाव मेरे मन में एक अलग ही भावना बनने लगी— उनकी सख्ती अजीब लगती थी, तो उनका प्यार बहुत अच्छा लगता था।

इस पूरे अनुभव ने मुझे यह सिखाया कि हर नई शुरुआत में थोड़ा डर होना सामान्य है, लेकिन अगर हमें सही शिक्षक मिल जाएँ, तो वही डर धीरे-धीरे खत्म हो जाता है।

कक्षा आठ की शुरुआत मेरे लिए सिर्फ एक बदलाव नहीं थी, बल्कि एक सीख थी, जिसने मुझे थोड़ा और मजबूत बना दिया।


कालीन का कारीगर


गुन्नीलाल जी के यहाँ से लौट रहा था। सवेरे साढ़े आठ का समय। धूप अभी तीखी नहीं हुई थी।

सामने एक आदमी साइकिल पर था — सिर पर गमछे का फेंटा बाँधे, पीठ सीधी, पीछे कैरियर में टिफिन दबाया हुआ। चाल में जल्दी थी, पर थकान भी। मैंने बिजली की साइकिल तेज़ की और बगल में आ गया।

काम पर जा रहे हैं? — मैंने पूछा।

मेरी उम्र का असर था, या वह स्वभाव से ही विनम्र था — रुका नहीं, पर मुड़ कर देखा। बोला — जी। बाबू सराय की कारपेट फैक्टरी में। नौ बजे से शिफ्ट है।

बातचीत का दरवाज़ा खुल गया।

नाम पूछा — जीवन लाल। करहर के।

बाबूसराय के हाईवे की उत्तर पट्टी पर बरनवाल कारपेट का कारखाना है। जीवन लाल वहाँ फिनिशिंग का काम करते हैं। गाँव-गाँव से लोग कालीन बुन कर लाते हैं — क्वालिटी के हिसाब से भुगतान होता है। उसके बाद जीवन लाल जैसे पाँच-सात किस्म के फिनिशर उसे सजाते-सँवारते हैं। सुपरवाइज़र अप्रूव करता है। तब कालीन बिकने जाती है।

कहाँ जाती है? — मैंने पूछा।

देस में कहाँ बिकेगी — जीवन लाल ने कहा — ज़्यादातर बाहर जाती है।

यहाँ गंगा किनारे के गाँवों में — गड़ौली, कमहरिया, करहर — बुनी गई, बाबू सराय में फिनिश हुई कालीन जर्मनी या अमेरिका के किसी ड्राइंग रूम में बिछती है।

जैसे मेट्रो सिटी में हाई राइज़ लग्ज़री फ्लैट बनाने वाला कारीगर उनमें एक रात गुज़ारने का सपना नहीं देख सकता — उसी तरह यह बारह-पंद्रह साल पुरानी जंग लगी साइकिल वाला जीवन लाल अपने घर में वह कालीन बिछाने की कहाँ सोच सकता है।

नौ से छः की ड्यूटी है। एक से दो के बीच लंच ब्रेक। तब वह यही टिफिन खोलेगा — शायद अकेले, शायद साथियों के साथ। यह मैं पूछ न सका।

पूछना चाहता था — चाय मिलती है बीच में? आपस में गप-सड़ाका होता है? — पर जीवन लाल अचानक रुक गये।

यहाँ मुझे पाँच मिनट का काम है…

मैं आगे निकल आया।

पर वह जंग लगी साइकिल मन में अटकी रही — उस कालीन की तरह जो बिछती है जर्मनी के ड्राइंग रूम में, बुनी जाती है गंगा किनारे के किसी अँधेरे कमरे में। और फिनिश करता है जीवन लाल — जिसका चेहरा हम नहीं जानते, जो गमछे से सिर ही नहीं मुंह भी ढंके रहता है।


Design a site like this with WordPress.com
Get started