भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
सालों बाद कटका के प्लेटफार्म नम्बर 2 पर गया। वहीं मिला हरिहर। अंधा है वह। हाथ में एक लाठी, बगल में एक झोला—जिसमें बिस्कुट के पैकेट। उन्हीं को लेकर वह ट्रेनों के कॉरिडोर में चलता और बेचता है।
हरिहर प्लेटफार्म पर बैठने लगा तो किसी ने आगाह किया—“ट्रेन आवे वाली बा। आगे बैठबे त भहराई जइब।” एक सज्जन ने उसका हाथ पकड़कर जमीन पर बैठा दिया। बैठते हुए उसने अपना झोला गोद में खींच लिया—वही उसकी पूंजी है, वही उसका सहारा।
हरिहर को रोशनी नहीं दिखती—पर जिंदगी उसे पूरी साफ नजर आती है।
मैं पास ही खड़ा था। उससे बातचीत शुरू की। वह जो कुछ बता रहा था, बहुत सपाट ढंग से—जैसे यह सब कोई खास बात न हो, जैसे यह जीवन उसका रोज का सामान्य हो। पर उसके हर वाक्य के पीछे एक खालीपन था, जो सुनते-सुनते धीरे-धीरे भरता जाता था।
“लीलापुर से आ रहा हूं। पांच किलोमीटर दूर है। ट्रेन पकड़ूंगा। ज्ञानपुर तक जाऊंगा। उससे पहले सामान बिक गया तो पहले ही लौट लूंगा।”
मुझमें पुराना रेलवे अफसर जागा। मैंने पूछा—“टिकट लिया है या नहीं?”
“नाहीं साहेब। टिकट कभौं नाहीं लिहा।” — उसने वैसे ही कहा, जैसे बाकी सब कहा था। बिना किसी अपराध बोध के। … हम टिकट लेकर चलते हैं—वह जिंदगी बिना टिकट काट रहा है। पास ही किसी ने हंसी में जोड़ा—“रेलवई क बड़का साहब पूछत हयें। जेल होई जाए।”
जेल का नाम सुनकर भी उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं आया। बोला— “भेज दें साहब। उंहा ढंग से खाई के त मिले। बढ़िया खाना मिले—ऊ भी दो जून। अभी त कभी खाना मिलता है, कभी नहीं। दो बिस्कुट खा, पानी पी के रह लेता हूं।”
यह कहते हुए भी उसकी आवाज में कोई शिकायत नहीं थी—बस एक सीधी-सी जानकारी थी, जैसे वह किसी और के बारे में बता रहा हो।
हरिहर जैसे लोग भूख को भी आदत की तरह जी लेते हैं।
लीलापुर में वह अकेला रहता है। पत्नी गुजर चुकी है। एक बेटी थी—वह भी नहीं रही। बेटी के दो बच्चे थे—एक लड़की, एक लड़का—वे भी नहीं रहे। पट्टीदारों ने जमीन छीन ली। अब बस ट्रेन में बिस्कुट बेचकर जीवन चलता है।
मैंने पूछा—“जन्म से नहीं दिखता था या बाद में रोशनी चली गई?” हरिहर बोला—चार साल का था, तब बीमार हुआ। माई ने बम्बई में पिता को चिट्ठी लिखी। अठारह दिन बाद बाबू आये। डॉक्टर को दिखाया—जान बच गई, पर आंखें चली गईं। फिर माई-बाबू भी चले गये।
एक के बाद एक दुख झेलता गया हरिहर। पर वह उन्हें दुख की तरह नहीं गिनाता—बस घटनाओं की तरह बता देता है।
जहां मैं खड़ा था, उसी प्लेटफार्म पर—अगर वह पास में न बैठा होता, तो मुझे उसके बारे में कुछ भी पता न चलता। जैसे बहुत-सी जिंदगियां हमारे पास से गुजरती रहती हैं—बिना दिखे, बिना सुने।
मेरी जेब में हमेशा की तरह पर्स नहीं था। पास बैठे मोबाइल पर कुछ देखते एक नौजवान से मैंने कहा—“सौ-पचास रुपये दे सकते हो? मैं यूपीआई से दे दूंगा।”
उसने कारण पूछा। फिर एक छोटा-सा, पर अलग तरह का दृश्य उपजा। उसने अपने पर्स से बीस रुपये निकाले और हरिहर को दे दिये। मुझसे यूपीआई लेने से मना कर दिया। हरिहर यूं पैसे लेना नहीं चाहता था। वह झोले से बिस्कुट के पैकेट निकालने लगा—जैसे लेन-देन बराबर होना चाहिए। बहुत मना करने पर ही माना।
कभी मैं रेल का बड़ा अफसर था। अब वहां प्लेटफार्म पर बिना रुतबे, बिना पहचान के जाना सहज नहीं लगता। पर आज लगा—यूँ ही चले जाना चाहिए, ट्रेन के समय पर। और जेब में पर्स रखना चाहिये कुछ चिल्लर के साथ।
ट्रेन आने वाली थी। हरिहर खड़ा हो गया। बीस रुपया देने वाले नौजवान ने मेरे अनुरोध पर मेरा और हरिहर का एक चित्र भी खींच दिया मेरे मोबाइल से। सनद रहे कि कभी मैं हरिहर से मिला था।
गांवदेहात की, भारत की— कुछ कहानियां प्लेटफार्म पर बैठी होती हैं। और हम अक्सर उन्हें देखे बिना ही निकल जाते हैं।
— ज्ञानदत्त पाण्डेय विक्रमपुर, भदोही 28 मार्च 2026
यहां गांवदेहात में गांव कई हिस्सों में बंटा है—ब्राह्मण, केवट, पासी और चमरउट। इनके पुरुष अलग-अलग व्यवसाय में हैं और महिलाओं का जीवन भी अलग-अलग तरह से चलता दिखता है। मैं इन्हें हाशिये से देखता हूं; बहुत-सी बातें पत्नीजी से सुनकर समझता हूं।
हर हिस्से में महिलाओं की स्वतंत्रता, उनके काम और घर-समाज में उनकी भूमिका अलग है। यह सब देखते हुए तुलना अपने आप होने लगती है—किसकी ज्यादा चलती है, किसको ज्यादा अधिकार हैं, कौन ज्यादा सहज दिखता है।
यह विषय समाजशास्त्र का है और मेरी समझ सीमित है। फिर भी, एक आम आदमी की नजर से कुछ बातें दिखती हैं।
चमरउट की महिलाएं अपेक्षाकृत ज्यादा स्वतंत्र दिखती हैं। गांव में उनकी आवाजाही भी अधिक है। घर और बाहर—दोनों जगह वे काम में बराबर की हिस्सेदारी निभाती हैं। मेहनताना भले थोड़ा कम हो, पर उनकी भूमिका कम नहीं आंकी जाती। शायद इसी कारण वहां लड़की का जन्म ज्यादा सहजता से स्वीकार होता है।
छोटी लड़कियां घर का काम संभालती हैं और बड़ी होकर खेतों में बुआई, कटाई, निराई में लगती हैं। कई समूह सुबह-सुबह रोटियां बांधकर 20–25 किलोमीटर दूर खेतों में काम करने निकलते हैं। इस बाहर निकलने से उनमें एक आत्मविश्वास भी आता दिखता है।
ऐसे माहौल में कई बार काम के दौरान प्रेम संबंध भी बनते हैं और कुछ लड़कियां अपने विवाह के निर्णय खुद लेने लगती हैं। बताया जाता है कि समाज धीरे-धीरे इसे स्वीकार भी कर रहा है।
केवट महिलाओं में परंपरागत रूप से शादी-ब्याह में पूड़ी बेलने का काम रहा है। अब यह काम बदलकर समूहों द्वारा भोजन के ठेके लेने तक पहुंच गया है। इससे उनकी गतिशीलता और आर्थिक भूमिका दोनों बढ़ी हैं।
पसियान की महिलाओं को मैंने कम ही बाहर काम करते देखा है; वे अधिकतर घर और आसपास तक सीमित दिखीं। संभव है कि मेरा अवलोकन अधूरा हो।
ब्राह्मण महिलाओं के बारे में, मेरे देखने में, गांव में उनकी स्वतंत्रता अपेक्षाकृत सीमित है। बाहर निकलने और काम करने के अवसर कम हैं। पढ़ाई और विवाह जैसे निर्णय प्रायः पुरुषों द्वारा लिए जाते हैं। लड़कों को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति भी अधिक दिखती है। घूंघट की परंपरा भी अब तक बनी हुई है।
जाति यहां सिर्फ ब्राह्मण की पहचान नहीं तय करती— औरतों के जीने की सीमा भी खींच देती है। 🙁
यह एक सपाट अवलोकन है। हर वर्ग और हर उम्र के भीतर जीवन की कई परतें हैं, जिन्हें मैं पूरी तरह नहीं देख पाता। शायद उतनी सूक्ष्मता से देखना मेरे लिए सहज भी नहीं है।
फिर भी इतना स्पष्ट है कि गांव के अलग-अलग जातीय समूहों में महिलाओं का जीवन, उनकी स्वतंत्रता और उनके अनुभव—एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं।
एक ही गांव में रहती हैं सब औरतें— पर हर जाति की औरत का गांव अलग है।
— ज्ञानदत्त पाण्डेय विक्रमपुर, भदोही 27 मार्च 2026