पक्षियों के बहाने बाभन की दशा — न लड़ सकते हैं, न आरक्षण है उनके लिये


इतिहास बताता है कि चुप वर्ग सबसे पहले टूटता है, और सबसे देर से सुना जाता है।

हमारे घर में, हर सुबह आँगन में बिखरे फीके नमकीन पर जो दृश्य बनता है, वह प्रकृति का खेल नहीं लगता, एक छोटा-सा समाज लगता है।

कौव्वे तेज़ी से आते हैं, तेज़ी से खाते हैं और ज़्यादा ले जाते हैं। उन्हें रोकने के लिये डंडा रखना पड़ता है, यानी शक्ति को शक्ति से संतुलित करना पड़ता है। चरखियाँ समूह में आती हैं, और समूह ही उनका अधिकार-पत्र होता है; वे किसी दाने को साझा करने की वस्तु नहीं मानतीं, उसे अपने लिये आरक्षित मान लेती हैं। यह सब स्वाभाविक लगता है, जब तक निगाह बुलबुल और रॉबिन पर नहीं जाती।

बुलबुल और रॉबिन मीठा गाती हैं, पर दाने के समय चुप रहती हैं। वे न तो भीड़ में घुस सकती हैं, न किसी को डराकर हटा सकती हैं। उनके लिये न गति हथियार है, न संख्या, न आक्रामकता। आप चाहकर भी उनकी सहायता नहीं कर पाते, क्योंकि जो दाना आप उनकी ओर फेंकते हैं, उस पर भी पहले वही क़ब्ज़ा कर लेते हैं जो पहले से ताक़तवर हैं। यह असमर्थता किसी एक व्यक्ति की नहीं, पूरी व्यवस्था की है।

यहीं से पक्षियों का दृश्य समाज में बदलने लगता है। भारत की सामाजिक संरचना में भी कुछ वर्ग ऐसे हैं जो न तो संघर्ष की भाषा जानते हैं, न भीड़ की राजनीति कर सकते हैं। वे अपनी दरिद्रता को नैतिक प्रश्न बना लेते हैं, अधिकार का नहीं। वे माँगने को अपमान मानते हैं, और लड़ने को अपनी प्रकृति के विरुद्ध। मेरे मत में यही वर्ग सबसे अधिक असुरक्षित होता है, क्योंकि वह किसी भी वितरण-प्रणाली के लिये अदृश्य रहता है।

बुलबुल हाशिये पर
हाशिये पर बुलबुल

गरीब बाभन की स्थिति कुछ ऐसी ही है। वह न परम्परागत शक्ति-संरचनाओं में बचा है, न नई प्रतिनिधित्व-आधारित राजनीति में समाया है। उसके पास न तो संख्या का बल है, न संगठन की आदत, न आक्रोश का वैध मंच। वह मान लेता है कि आरक्षण “उसके लिये बना ही नहीं”, और इसी मान्यता के साथ वह अपने को चर्चा से बाहर कर देता है। यह आत्म-बहिष्कार किसी नीति से कम क्रूर नहीं।

समस्या यह नहीं कि उसे कुछ मिलता नहीं; समस्या यह है कि उसके लिये “मिलना” कोई नैतिक रूप से स्वीकार्य स्थिति ही नहीं रह जाती। जैसे बुलबुल दाना माँग नहीं सकती, वैसे ही यह वर्ग अपने अभाव को मांगपत्र में बदल नहीं पाता। उसे लगता है कि अगर वह माँगेगा, तो उसकी सांस्कृतिक पूँजी भी गिर जायेगी। इस डर का समाज में कोई उपचार नहीं है, क्योंकि नीति भय नहीं देखती, केवल आँकड़े देखती है।

चरखियाँ दाना आरक्षित मानती हैं, क्योंकि उन्हें आरक्षण की भाषा आती है। कौव्वे डर पैदा करते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि संसाधन डर से सुरक्षित होता है। मैना थोड़ी लड़ लेती है, क्योंकि वह मोल-भाव की राजनीति समझती है। गिलहरी सबके बीच निडर होकर खा लेती है, क्योंकि उसके पास अपने होने का सहज आत्मविश्वास है। बुलबुल और रॉबिन के पास इनमें से कुछ भी नहीं है—न डर, न दावा, न संघर्ष, न आरक्षण।

मेरे मत में आज का भारत इन्हीं बुलबुलों और रॉबिनों को समझने में असफल है। हम या तो आक्रामक वंचना को पहचानते हैं, या संगठित असंतोष को। जो वर्ग चुप है, जो नैतिक है, जो “लाइन में खड़ा” है—वह स्वतः मान लिया जाता है कि ठीक होगा। लेकिन इतिहास बताता है कि चुप वर्ग सबसे पहले टूटता है, और सबसे देर से सुना जाता है।

यह लेख किसी के पक्ष में नहीं, एक असुविधाजनक खाली जगह की ओर इशारा है। जैसे आँगन में बिखरे नमकीन के बीच कुछ पक्षी हमेशा भूखे रह जाते हैं, वैसे ही हर खुली अर्थव्यवस्था में कुछ वर्ग हमेशा बाहर रह जाते हैं। वे किसी के शत्रु नहीं होते, पर किसी के एजेंडा में भी नहीं होते। और शायद यही उनकी सबसे बड़ी त्रासदी है।

आज का भारत भी उसी मोड़ पर खड़ा है, जहाँ नीति लड़ने वालों के लिये है, और नैतिकता देखने वालों के लिये। बुलबुल और रॉबिन फिर भी गाती हैं। सवाल यह नहीं कि उनका गीत सुना जायेगा या नहीं। सवाल यह है कि क्या उनके लिये कभी दाना भी बचेगा।

@@@@@@@

दिलीप चौरसिया से मुलाकात 


दिलीप से सवेरे बात होती है। वे महराजगंज में अपनी मेडिकल की दुकान पर हैं। उनका जो छोटा भाई मैडीकल दुकान चलाता है, बीमार हो गया है। अस्पताल में भर्ती है। उसका भी काम देखना होता है। 

हाईवे पर ऊपरी मंजिल में उनकी साड़ी की दुकान है — वहां मिलना हुआ उनसे। मैडीकल दुकान से मुझे मिलने वे साड़ी की दुकान में आ गये। गद्दी पर बैठे मिले। 

उनकी उम्र 55-56 साल की है। अपने, अपने पिताजी और अपने बाबा — जो पांच भाई थे; के बारे में बहुत कुछ जानते हैं और उनके माध्यम से जानते हैं महराजगंज का इतिहास। बाबा का जमाना 1920 का रहा। अर्थात सौ साल का इतिहास वे अच्छे से बता सकते हैं। 

Dilip Chaurasia
दिलीप चौरसिया

“आप सुनेंगे तो बहुत कहानियां हैं मेरे पास। अपने बचपन की तो हैं ही, पिताजी और बाबाजी के जमाने की भी हैं।” – दिलीप कहते हैं। 

उनके बचपन में उनकी बिरादरी के 15-20 घर थे। बाबा प्रधान के घर के पास जो गली है पूरब की तरफ, उसी में बाजार था। बाबा प्रधान के घर के पास का कुआं खारे पानी का था, बाकी सब कुयें – जो दिलीप के बाबा जी और भाइयों ने खुदवाये वे मीठे पानी के थे। पर फिर भी पानी की दिक्कत हो जाती थी। गर्मी आते आते कुयें सूख जाते थे। तब साइकिल से बाल्टा लटका कर पानी सरकारी ट्यूबवेलों से लाना पड़ता था। 

बिजली तो कभी कदा आती थी। आने पर इतना शोर मचता था कि अंधे को भी पता चल जाये बिजली आ गई है।… जब बिजली आती थी तो शोर मचता था, और जब नहीं होती थी—ज़िंदगी फिर भी चलती थी। 

कुंये पर भी जातिगत अनुशासन था। पहले उनकी बिरादरी (चौरसिया, अग्रहरी आदि) के लोग कुंये का इस्तेमाल करते थे, चूकि कुंआ उनका खुदवाया था। उसके बाद जायसवाल लोग कुंये पर आते थे। फिर खटीक और मुसलमान लोगों की बारी आती थी। 

एक जाति दूसरे के साथ कुयें की जगत पर नहीं चढ़ती थी। कभी हम लोगों को देरी हो गई और मुसलमान चढ़ गये तो हम उनके चले जाने के बाद ही कुंये पर जाते थे।  

नहाने, बर्तन मांजने, कपड़े धोने के लिये दो तालाब थे। एक हुसैनीपुर में सड़क किनारे और दूसरा कंसापुर में। अब तो कंसापुर में तालाब वैसा रहा नहीं, पहले बहुत मनोरम हुआ करता था वह। आदमी लोगों का घाट अलग था और महिलाओं का अलग। महिलाओं के दो घाट थे। पूरा तालाब चारों ओर पटिया के घाटों वाला था। 

Village Pond Year 1885
तालाब का चालीस-पचास साल पहले का दृष्य

सब लोग तालाब पर जाते थे। बीमार भी। उनके साथ घर का कोई और भी रहता था। कपड़े लोग दऊरी या बाल्टी में ले कर जाते आते थे। 

सभ्यता और संस्कार थे लोगों में। कोई पुरुष औरतों के घाट की ओर नहीं जाता था। बच्चा भी जब 11-12 साल का होता था तो वह भी स्त्रियों के घाट की ओर नहीं जाता था। 

हर आदमी तालाब को साफ रखता था। कोई साबुन लगा कर पानी गंदा नहीं करता था। अब तो वे सारे नियम टूट गये हैं। 

“हम लोग खूब तैरते थे उसमें। गाय भैंस भी ले जाते थे और उसमें नहाती भैसों पर घन्टों आनंद लेते थे हम।” – दिलीप  जिस तरह बता रहे थे, मानो वे अपने बचपन में खो गये हों! …तालाब में नहाती भैंसों पर बैठे बच्चे नहीं जानते थे कि वे भविष्य की स्मृतियाँ रच रहे हैं।

“सन 1968 में हमारे परिवार की मैडीकल की दुकान थी। बनारस से बैलगाड़ी से दवा आया करती थी। पूरे जिले में इस दुकान से दवा सप्लाई होती थी। जब मेरे बड़े पिताजी और पिताजी में बंटवारा हुआ तो वह दुकान बड़े पिताजी के हिस्से गई।”

Medicine on Bullock cart
बनारस से बैलगाड़ी से दवा आया करती थी।

“मेरे पास कोई चारा न था। हमने पढ़ाई की और फिर मैने सड़क के उस पार एक लोहे की गुमटी में दवा की दुकान खोली। मेह्नत की और ईश्वर ने बहुत साथ दिया। वह गुमटी की दुकान खूब चली। मैने काफी पैसा कमाया और उसी के बल पर आज 4-5 दुकानें हैं।” 

यह इतिहास किताबों में नहीं मिलता—यह कुओं की जगत, तालाब के घाट और गुमटी की कमाई में दर्ज है।

बहुत कुछ सुनाया और बहुत कुछ सुनाने को है दिलीप के पास। उनसे फिर मिलने की बात तय कर, मैने उनसे गले मिल कर विदा ली। 

फिर मिलना होगा उनसे – 100 साल का इतिहास खोलने का वायदा जो किया है उन्होने! महराजगंज का अतीत किसी राजमहल में नहीं, दिलीप चौरसिया जैसे लोगों की यादों में सुरक्षित है।  

@@@@@@@

सत्तर साल के जीडी को क्या करना चाहिए


इस उम्र में पहली समझ यह बनती है कि संख्या से लड़ना व्यर्थ है।

“जम्हूरियत इक तर्ज़-ए-हुकूमत है कि जिसमें,
बंदों को गिना करते हैं, तोला नहीं करते।” — इकबाल की नज़्म का हिस्सा।

भारत में अपीज़मेंट—तुष्टिकरण—की राजनीति है।
कभी “ब्राह्मण भारत छोड़ो” जैसे नारे सुनाई देते हैं।
जहाँ उम्मीद होनी चाहिए, वहाँ मायूसी है।
शिक्षा लचर है; न्यायपालिका (कम से कम लोअर ज्यूडीशियरी) भ्रष्ट है; और सार्वजनिक विमर्श चीख बन चुका है।
सोशल मीडिया खेमाबंदी है।

ऐसे में मेरे जैसा क्या कर सकता है?

सत्तर साल की उम्र कोई उछाल की अवस्था नहीं होती। यह वह उम्र है जब आदमी न सत्ता का आकांक्षी रहता है, न क्रांति का स्वयंसेवक। वह बस यह देखना चाहता है कि जिस समाज में वह रहा, पसीना बहाया, टैक्स दिया, बच्चे पाले—वह किस दिशा में जा रहा है। आज की जम्हूरियत में यह देखना और भी बेचैन करता है, क्योंकि यहाँ आदमी तो गिना जाता है, पर सुना नहीं जाता।

इस उम्र में पहली समझ यह बनती है कि संख्या से लड़ना व्यर्थ है।
भीड़ को उपदेश देकर नहीं बदला जा सकता—न व्हाट्सऐप फ़ॉरवर्ड रोककर, न टीवी एंकरों को कोसकर।
संख्या अपना काम करती है—वह सत्ता बनाती है, गिराती है, और फिर अगली संख्या की तैयारी में लग जाती है।

सत्तर साल का जीडी अगर अब भी यह माने कि वह “जनता को समझा देगा”, तो वह खुद को धोखा दे रहा है।

दूसरी, और अधिक कठोर समझ यह है कि चीख दोनों ओर है।
लेफ्ट की चीख भद्रलोक की चीख है—नैतिक श्रेष्ठता की चीख।
राइट की चीख सांस्कृतिक आक्रोश की।
दोनों में संवाद नहीं, सिर्फ़ प्रतिस्पर्धा है।

ऐसे में सत्तर साल के जीडी को यह तय करना पड़ता है कि वह किस भीड़ में अपनी आवाज़ मिलाए—या फिर भीड़ से अलग खड़ा रहे।
यह अलग खड़ा होना आसान नहीं है, पर यही एकमात्र सार्थक विकल्प है।

इस उम्र में जीडी को विचारधारा नहीं, विवेक चुनना चाहिए।
हर मुद्दे पर राय देना ज़रूरी नहीं।
हर अन्याय पर प्रतिक्रिया देना भी ज़रूरी नहीं।
लेकिन जहाँ वह बोले, वहाँ उसकी बात इतनी साफ़ हो कि उसे किसी खांचे में न डाला जा सके—न लेफ्ट का, न राइट का।

जीडी का सवाल सीधा होना चाहिए—
“क्या यह कदम समाज को दीर्घकाल में बेहतर बनाता है?”
संख्या के तराज़ू से नहीं, दीर्घकालिक परिणाम का अनुमान लगाता सवाल।

सत्तर साल का जीडी अब न आंदोलन खड़ा करेगा, न संस्थाएँ बदलेगा।
लेकिन वह छोटे विमर्श-द्वीप बना सकता है—
ब्लॉग, स्थानीय बातचीत, पारिवारिक चर्चाएँ, पत्नी और पोती के साथ संवाद।

यह कोई कम काम नहीं है।
लोकतंत्र का असली बीज वहीं पड़ता है जहाँ कोई व्यक्ति बिना भय, बिना लाभ, बिना तालियों की चाह के सोचता और बतियाता है।

सत्तर साल के जीडी को क्या करना चाहिए

इस उम्र में सबसे ज़रूरी काम है—अपने भीतर अधिनायकवाद को मरने देना।
यह मान लेना कि “मेरी पीढ़ी ज़्यादा समझदार थी” भी एक तरह का अधिनायक भाव है।
जीडी को सुनना होगा—युवा की उलझनें, उनकी ग़लतियाँ, और कभी-कभी उनकी मूर्खताएँ भी।
क्योंकि जम्हूरियत अगर संख्या की है, तो भविष्य भी संख्या का ही होगा।

अंततः, सत्तर साल के जीडी को यह स्वीकार करना चाहिए कि वह इतिहास नहीं बदल पाएगा।
पर वह यह तय कर सकता है कि इतिहास के किस हिस्से में वह खड़ा था—
चीख में, चुप्पी में, या सोच में।

और शायद, इसी को जीना कहते हैं।

आगे के पाँच, दस या तीस साल—
भगवान जाने हाथ की आयु-रेखा कितनी लंबी है—
उसे यही करते रहना चाहिए।

@@@@@@@

Design a site like this with WordPress.com
Get started