गांवदेहात डायरी

सुनील ओझा जी का निधन 29 नवम्बर 2023 को हुआ। उसके बाद से मेरा गड़ौलीधाम जाना नहीं हुआ।
गड़ौलीधाम सुनील भाई का ड्रीम-प्रॉजेक्ट था। इसके जरिये वे गांवदेहात की सूरत बदलने की सोचते थे। यहां एक गौशाला होती, एक चिकित्सालय, एक शिव मंदिर। आसपास के वृद्धों को भोजन उपलब्ध कराने की व्यवस्था। मैं जब भी उनसे मिलता था, उनके पास इलाके के बदलाव के लिये कोई न कोई योजना रहती थी—एक और योजना, एक और विचार।
हम दोनों एक ही साल—1955 की पैदाइश थे। वे मुझसे दो महीने बड़े थे। एक दिन बातचीत में हमने यह साझा किया कि मैं 103 साल जीने और कुछ करते रहने की इच्छा के साथ चलता हूं। उन्होंने कहा कि उनका भी ऐसा ही कुछ विचार है—वे 105 साल का प्लान रखते हैं।
पर वे 68 की उम्र में ही चले गये।
एक बार सवेरे की बातचीत में मैंने कहा था कि मैं अपनी साइकिल चलाकर रोज उनके धाम आया करूंगा। रोज उनसे बातचीत होगी और रोज मैं कुछ न कुछ लिखूंगा। गड़ौलीधाम पर पचास से ज्यादा पोस्टें ब्लॉग पर लिखूंगा।
पर जब वे नहीं रहे तो गड़ौलीधाम जाना भी बंद हो गया। अब देखता हूं तो उस विषय पर कुल 18 पोस्टें हैं। पचास पूरी होने के लिये भी 32 और होनी चाहिये थीं, पर सुनील भाई के असामयिक निधन और गड़ौलीधाम परियोजना में आये व्यवधान के कारण गाड़ी वहीं रुक गई।
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पिछले महीनों शैलेश आये थे और वे जाते हुए गड़ौलीधाम होते गये। उन्होंने मुझे सुझाया कि मैं वहां के चक्कर लगाऊं। वहां कांची पीठ के शंकराचार्य के संस्थान के साथ कोलाबोरेशन हुआ है। एक गुरुकुल प्रारम्भ हुआ है जहां वेद अध्ययन करने वाले बटुक हैं। गौशाला है और एक चिकित्सालय बनने जा रहा है।
तब भी मैं गया नहीं। आज उस बात को महीना भर से ज्यादा हो गया था। पर अचानक आज मेरी साइकिल गड़ौलीधाम की ओर मुड़ ही गई।
वहां शिवजी के मंदिर पर ओम प्रकाश मिश्र जी मिले, जो पूजा-अर्चना कर रहे थे। उन्होंने मुझे भी तांबे के लोटे में जल दिया शिवलिंग पर चढ़ाने के लिये। फिर हॉल में बैठने को कहा और मेरे लिये चाय भिजवाई। पूजा पूरी कर उन्होंने मुझे तिलक लगाया और प्रसाद दिया। उनका स्नेह और आदर पाकर मैं अभिभूत हो गया।
हॉल में आठ बटुक दरी पर बैठे अपनी नोटबुकों में ऋचायें लिख रहे थे। सब अलग-अलग जगहों से आये थे—बिहार, रीवा, शोणभद्र… पाँच नये थे, जिन्हें आये लगभग एक साल हुआ था। तीन उनके सीनियर थे। सभी धोती पहने हुए और माथे पर त्रिपुंड लगाए।
लिख तो वे बॉलप्वाइंट पेन से रहे थे, पर उनकी लिखावट सुगढ़ थी। उनमें बालसुलभ चपलता भी थी। मौका पाकर वे मेरी बैटरी वाली साइकिल का हॉर्न बजा कर, बत्ती जला कर देखने लगे। मुझसे उन्होंने उसके चलने का तरीका भी पूछा। एक तो चलाना भी चाहता था, पर मैंने मना किया—वह सामान्य साइकिल की तरह हल्की नहीं है और बच्चे के लिये संभालना मुश्किल हो सकता है।
वहां से गंगाजी के दर्शन भी किये मैंने। किनारे पर सब्जी की खेती करने वालों को काम करते देखा। सब शांत और मोहक था वहां।
अब लगता है कि वहां के चक्कर लगा करेंगे। गड़ौलीधाम पर पचास पोस्टों का लक्ष्य अब, सुनील भाई के न रहने के बावजूद पूरा होगा।
…क्या पता, सुनील ओझा जी कहीं से देख रहे हों मुझे और मेरी नई बिजली वाली साइकिल को।
— ज्ञानदत्त पाण्डेय
विक्रमपुर, भदोही
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