पूरन वर्मा की झंझरी


Pooran Verma Pottery Shop

 < गांवदेहात डायरी >

तापक्रम चालीस डिग्री छूने लगा है। अब मिट्टी का मटका लेने का समय आ गया है। बाबू सराय में अमूल दूध वाले महेंद्र सिन्ह जी से पूछा—“आसपास कहीं मटकी की दुकान है? टोंटी लगी मटकी वाली?” उन्होंने बताया—“आगे करीब दो सौ मीटर पर एक दुकान है, अच्छी-अच्छी मिट्टी की चीजें मिलती हैं।”

परसाल गांव की कोहांइन एक मटकी दे गई थीं—अजीब सी शक्ल वाली। फेसबुक पर एक प्रजापति मित्र ने बताया था कि वह “गनटेढ़ी मटकी” है। पानी वह भी खूब ठंडा करती थी, पर उस विकलांग आकार से अपनापन नहीं बन पाया। इस बार तय था—मटकी ऐसी हो जो पानी भी ठंडा रखे और देखने में भी सुघड़ लगे। आखिर अब फोटो भी तो खिंचती है, और सोशल मीडिया पर जाती है।

दुकान मिली—पूरन वर्मा मिट्टी बर्तन भंडार। वहां तरह-तरह की चीजें थीं—मिट्टी के घड़े, घरिया, तसले, झांझर, अगरबत्ती स्टैंड, दीये जलाने के पात्र… और भी बहुत कुछ। गांवदेहात की इस दुकान में यह विविधता देखकर मन प्रफुल्लित हो गया। लगा कि अब ऐसी चीजों के लिए बनारस या प्रयागराज जाने की जरूरत नहीं रहेगी। घर में भी सुविधाएं बढ़ेंगी—पत्नीजी को हर साइज के गमले यहीं मिल जाएंगे।

मटकी दो तरह की दिखीं—एक भारी, दूसरी हल्की। पूरन जी ने बताया कि हल्की वाली “झंझरी” है, जिसमें रेत का अनुपात ज्यादा होता है। उसमें पानी ज्यादा ठंडा होता है, लेकिन मजबूती थोड़ी कम होती है। हमने झंझरी ही पसंद की—टोंटी लगी हुई, उपयोग में भी सुविधाजनक। साथ में वहीं से झंझरी रखने का प्लास्टिक का स्टैंड भी लिया। 

इसके साथ दही जमाने के लिए एक घरिया ली—उसका ढक्कन भी सुघड़ बना था। चिड़ियों के लिए पानी रखने को एक तसला भी लिया। अब घर-परिसर में ऐसे चार-छ तसले अलग-अलग जगह रखे जा सकेंगे—एक छोटा-सा जलस्रोत बनता हुआ।

पूरन जी के पास मिट्टी के हैंडल वाले पकाने के बर्तन और तवे भी थे। मन ललचाया, पर अब घर में खाना गैस की बजाय इंडक्शन पर बनने लगा है। सो संदेह रहा कि मिट्टी के बर्तन उसमें काम आएंगे या नहीं। इस पर अलग से जानकारी लेनी होगी।

पूरन जी के बेटे नीरज से बातचीत में पता चला कि पास के गुड़िया गांव में उनके परिवार और बस्ती के लोग मिट्टी के बर्तन बनाते हैं। पहले हाथ से चलने वाले चाक का इस्तेमाल होता था, अब बिजली से चलने वाले चाक आ गए हैं। नीरज ने बताया कि सरकार की योजना के तहत 15–20 परिवारों को ऐसे चाक और मिट्टी गूंथने की मशीनें मिली हैं—मुफ्त, इस शर्त पर कि वे पहले से इस काम में लगे हों।

गुड़िया गांव में छोटी चीजें बनती हैं, जबकि बड़े बर्तन चुनार के पास अहरौरा से आते हैं, जहां बड़ी भट्टियां हैं—जमीन में गड्ढा बनाकर उसमें आंवा लगाया जाता है और बर्तन पकाए जाते हैं।

नीरज ने कहा—“गांव आइए, पर सुबह छह-सात बजे। काम उसी समय होता है।” यह निमंत्रण भी एक नई यात्रा का संकेत है।

टोंटी वाली झंझरी  ₹180 में मिली। पहले लगा कि कीमत कुछ ज्यादा है, पर जब नीरज ने बताया कि यह तीन हिस्सों में बनती है—नीचे और बीच सांचे से, ऊपर का मुंह चाक पर—फिर तीनों जोड़े जाते हैं, और ढक्कन अलग से बनता है—तो लगा कि कीमत बिल्कुल वाजिब है। मोलभाव करने का कोई औचित्य नहीं था।

फिर भी गांवदेहात की एक प्रवृत्ति है—बिना मोलभाव के खरीदना जैसे अधूरा सौदा लगता है। शायद यह हमारे व्यवहार के गुणसूत्र में है।

रिटायरमेंट के बाद गांव में रहते हुए एक दशक से ज्यादा हो गया, पर अब भी आसपास नई खोजें मिलती रहती हैं। पूरन वर्मा की यह दुकान भी ऐसी ही एक खोज है। आगे उनके गांव जाकर, उनके चाक और कारीगरी को देखना बाकी है।

गांवदेहात में रहने का रोमांच अभी खत्म नहीं हुआ है—बल्कि लगता है, हर खोज अपने साथ कई और खोजों के दरवाजे खोलती है।

— ज्ञानदत्त पाण्डेय
विक्रमपुर, भदोही
15 अप्रेल 2026

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औरंगाबाद के रंजन कुमार


औरंगाबाद के रंजन कुमार

गांवदेहात डायरी

वह आगे चलता दिखा—दो झंडे लिये। एक तिरंगा और एक धर्म को दर्शाता तिकोना। मैं पीछे से साइकिल पर था। चलते-चलते ही उसका चित्र लिया और फिर उसके पास जाकर साइकिल रोक दी। पूछा—यह क्या लिये हैं और कहां जा रहे हैं?

उसने कहा—“राधे राधे।” मैंने अपना प्रश्न दो बार दोहराया। दोनों बार वही उत्तर—“राधे राधे।” जब मैंने भी “राधे राधे” कहकर उसका अभिवादन स्वीकार किया, तब संवाद खुला।

वह रंजन कुमार है। गांव गोरहाँ, जिला औरंगाबाद, बिहार से आया है। खाटू श्याम तक की यात्रा पर है। अभी तक 200 किलोमीटर चल चुका है। आगे 900 किलोमीटर और जाना है। मैंने उसके पैरों को देखा – चप्पल नहीं है। नंगे पैर। शायद गर्मी से बचाव के लिये उसने दोनो पैरों में क्रेप-बैंडेज बांध रखे हैं। यह भी हो सकता है पैरों में छाले पड़े हों।

बिना पैसे के निकला है। हाथ में मोबाइल है। उसने मुझसे एक सेल्फी लेने का अनुरोध किया। मुझे पूर्व दिशा की ओर—उल्टी दिशा में—मुड़ने को कहा। उसे पता था कि सवेरे के गोल्डन ऑवर में तस्वीर साफ आती तस्वीर लेने के लिये फ्रंट नहीं बैक कैमरे का इस्तेमाल किया उसने। यह भी ध्यान रखा कि रीयर कैमरा ज्यादा मेगा-पिक्सल का है।

उसने धर्म वाला झंडा एक हाथ में थामा था। तिरंगा झंडा पीठ में खोंसा हुआ था। दूसरे हाथ में खाटूश्याम जी की फोटो थी। मुझे उसने फोटो को एक ओर से पकड़ने को कहा फोटो लेने के लिये।

रंजन कुमार के चित्र से एआई द्वारा बनाई पेंटिंग

तस्वीर लेने के बाद उसने बताया कि अपने गांव में बेसहारा वृद्धा-विधवा महिलाओं के लिए एक आश्रम बनाना चाहता है। इस यात्रा के जरिये वह खाटू श्याम जी से अपने प्रोजेक्ट के लिए आशीर्वाद मांगने जा रहा है।

यहीं से मेरे भीतर सवाल उठने लगे।

बिना पैसे के यात्रा का अर्थशास्त्र क्या है? आज के समय में ऐसे यात्रा करते नौजवान कैसे दिख रहे हैं मुझे? नौकरी-रोजगार की कमी है—तो क्या यह एक तरह का पलायनवाद है? या यह रील-इंस्टाग्राम-फेसबुक के दौर का “लाइक-गिनक-टूरिज्म” है?

अस्सी के दशक में अमृतलाल वेगड़ ने नर्मदा परिक्रमा करते बाबाओं को उद्धृत करते लिखा था—परकम्मा पर लोग निकलते हैं जिससे पेट भी भर जाता है और पांव भी पूज जाते हैं। तब भी यात्रा में एक अर्थशास्त्र था—और एक सामाजिक स्वीकृति भी।

शायद वह धारणा आज भी कहीं बनी हुई है। बस उसमें अब सोशल मीडिया जुड़ गया है। रील, लाइक्स, फॉलोअर्स—ये नए “पांव पूजने” के तरीके हैं। अब पेट भी भर सकता है और प्रोफाइल भी।

रंजन कुमार दो झंडे लिये है—तिरंगा और खाटू श्याम जी का झंडा। दो झंडे लेकर चलना दुगना श्रम है। पर वह अपने ध्येय को एक साथ राष्ट्रीय और धार्मिक रूप दे रहा है। शायद इससे उसकी यात्रा की अपील बढ़ती है। शायद इससे रास्ते में मिलने वाले लोगों से उसे ज्यादा सहानुभूति, ज्यादा सहयोग मिलता है। यह एक तरह की नेटवर्किंग भी हो सकती है—अनजाने में या जान-बूझकर।

मेरे भीतर का विश्लेषक उसकी भावना की परतें खोलना चाहता है—जैसे किसी फल को काटकर देखना कि अंदर क्या है। लेकिन मैं अपने आप को रोकता हूँ। हर भावना को डाइसेक्ट करना जरूरी नहीं होता।

फिर भी एक बात साफ दिखती है—उसके द्वारा ली गई सेल्फी किसी न किसी सोशल मीडिया अकाउंट पर जाएगी। वहां उसका उपयोग होगा—शायद उसकी यात्रा के दस्तावेज के रूप में, शायद समर्थन जुटाने के लिए, शायद केवल साझा करने के लिए।

और हो सकता है, रंजन कुमार के जरिये मुझे भी कुछ लाइक्स मिल जाएँ।

अब दुनिया लाइक्स गिनकों की है। जीडी को भी पीछे नहीं रहना चाहिए?

— ज्ञानदत्त पाण्डेय
विक्रमपुर, भदोही
14 अप्रेल 2026

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साइकिल से घुमक्कडी करते कुंदन आर्य 


कुंदन आर्य के साथ सवेरे का समय

गांवदेहात डायरी

वह नौजवान साइकिल पर आगे एक बोर्ड लगाये था और पीछे कैरियर पर एक बैग। पहली नज़र में लगा—कोई फेरीवाला होगा, जो सवेरे-सवेरे निकल पड़ा है। गांव में ऐसे फेरीवाले अक्सर दिख जाते हैं।

जिज्ञासा हुई तो मैंने अपनी साइकिल आगे बढ़ाई और बोर्ड पढ़ा। तब पता चला—वे फेरीवाले नहीं, बल्कि मुजफ्फरपुर (बिहार) से वृन्दावन की साइकिल यात्रा पर निकले हैं। रोज़ लगभग पचास किलोमीटर चलते हैं, जहां जगह मिल जाये, वहीं रुक जाते हैं। कुल 970 किलोमीटर की यात्रा है, जिसमें अभी करीब 650 किलोमीटर शेष हैं।

नाम है—कुंदन आर्य। उम्र 28 वर्ष। अविवाहित। इससे पहले भी कई साइकिल यात्राएं कर चुके हैं—उज्जैन, ॐकारेश्वर, त्र्यम्बकेश्वर, घृष्णेश्वर और केदारनाथ तक। 2024 में केदारेश्वर की यात्रा की थी, फिर दो साल का विराम रहा। अब दोबारा निकल पड़े हैं।

मैंने पूछा—समय हो तो मेरे घर चाय पीते चलें? वे सहज ही मेरे साथ मुड़ लिये।

घर पर पत्नीजी ने उनका स्वागत किया। हाथ-मुंह धोकर कुंदन ने पहले मिठाई-पानी लिया, फिर चाय। इसी बीच उनकी बातें भी होती रहीं।

मुजफ्फरपुर में वे सरकारी अस्पताल में लोगों को निशुल्क भोजन कराते हैं। सप्ताह में एक-दो दिन, लगभग दो सौ लोगों को भोजन। इसके लिए उन्होंने एक संस्था बनाई है—महादेव फाउंडेशन। फेसबुक-इंस्टाग्राम पर सक्रिय हैं, और उनकी साइकिल पर सहायतार्थ क्यूआर कोड भी लगा है।

लोग मदद करते होंगे—मैंने सोचा। पर कुंदन ने कहा—यात्रा का खर्च तो अपना ही रहता है।

“लोग सहायता कर देते हैं, ढाबे वाले कभी बिना पैसे या कम पैसे में खिला देते हैं। पर मेरा ध्येय मुफ्त तलाशना नहीं है।”

यात्रा के लिए साइकिल भी उन्होंने साढ़े पांच हजार रुपये में खरीदी। मोटे टायर वाली ऑल-टेरेन साइकिल—दुकानदार ने उनका उद्देश्य देख कर रियायत दे दी।

पीछे कैरियर पर एक बैग और साथ में फोल्डिंग मच्छरदानी। जहां जगह मिले—किसी मंदिर के ओसारे में रुक जाते हैं। ज़मीन पर चादर, ऊपर मच्छरदानी—बस, रात गुज़र जाती है।

सुबह ठंडे समय में तीन-चार घंटे चलते हैं—बिना किसी जल्दबाज़ी के। शाम को फिर लंबा चलना होता है। कभी-कभी रात के बारह-एक भी बज जाते हैं।

मैंने पूछा—रास्ते में लोग कैसे मिलते हैं?

कुंदन बोले—“ज़्यादातर अच्छे ही मिलते हैं। मदद करने वाले। पर पांचों उंगलियां बराबर तो नहीं होतीं।”

आधा घंटा साथ बिताने पर लगा—यह लड़का सरल है। यात्राओं का कोई अहंकार नहीं। बार-बार अपनी संस्था और उसके काम की ही बात करता रहा—मानो वही उसका असली लक्ष्य हो।

सरल दिखने वाले लोग अक्सर भीतर से बहुत सुसंगत – व्यवस्थित होते हैं।

उन्हें खुद पता होता है कि वे क्या कर रहे हैं—बस भाषा में नहीं बताते।

वृन्दावन की यात्रा का विचार कैसे आया?

कुंदन कहने लगे—प्रेमानंद महाराज को सुनते रहे। मन में इच्छा जगी कि उनसे मिलना है—वह भी साइकिल यात्रा से उनके पास जा कर।

“दो-तीन दिन सपने में भी आये… फिर मैं रुका नहीं, निकल पड़ा।”

मेरे घर पर कुंदन ने तीस-चालीस सेकंड की एक रील भी बनाई। मैंने उनका फेसबुक पेज देखा—काफी लोग जुड़े हैं। सोशल मीडिया का अच्छा उपयोग कर रहे हैं।

पत्नीजी ने उनके साथ मेरा एक चित्र लिया—साइकिल सहित। गेट तक छोड़ने गया तो उन्हें गले लगा कर विदा किया। अच्छा लगा—28 साल के एक नौजवान से मिलना।

शायद आगे भी कभी बातचीत होती रहेगी।

भारत में केवल महापंडित राहुल सांकृत्यायन और बिमल डे ही नहीं हैं—कुंदन जैसे घुमक्कड़ भी हैं, जिन्हें अब सोशल मीडिया पहचान दे रहा है। उन्हें शायद किसी ग्रंथ-लेखन की दरकार नहीं। नये युग में ग्रंथ लेखन की जगह रील-लाइक्स-फालोवर्स ने बड़ी दक्षता से ले ली है। 

— ज्ञानदत्त पाण्डेय
विक्रमपुर, भदोही
13 अप्रेल 2026 

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