गांवदेहात का जेम्स हैरियेट


आज फिर दांतों का फॉलोअप था डाक्टर स्वमित्र के क्लीनिक में। फिर कई रेडियोग्राफिक शूट। फिर थोड़ी दांतों की घिसाई। फिर दांतों के रूट्स तक फाइल चुभाने की फाइन ट्यूनिंग। मैं कुर्सी पर आधा लेटा था। मुंह खुला। भीतर धातु के औज़ारों की खनखनाहट। बोल नहीं सकता था, पर सुन सब रहा था।

इसी बीच लगभग पचहत्तर-अस्सी साल का एक ग्रामीण भीतर आया।

डाक्टर ने एक नज़र देखी और हल्का-सा बुदबुदाए—अरे, अभी तो बाहर जाने को निकलना था। इनके साथ जो मरीज हैं, उनका प्रेगनेंसी का केस है। दवाइयाँ जाने बिना हाथ कैसे लगाया जाए?

मेरे मुंह में उपकरण ठुंसे थे, पर कान बाहर की बातचीत पर टिके थे।

डाक्टर ने पूछा – “दद्दा, दवाई की पुर्जी लाए हैं?”

उन्होंने मुड़ी-तुड़ी कागज़ की पर्ची आगे कर दी। उस पर जो लिखा था, वह किसी गुप्त लिपि जैसा था। एक डॉक्टर का लिखा दूसरा डॉक्टर नहीं पढ़ सकता। कोई कम्पाउंडर भी नहीं—सिवाय उसी डॉक्टर के कम्पाउंडर के।

अगर कोई और पढ़ ले तो सिंधु सभ्यता की लिपि पढ़ने का दावा कर सकता है।

दद्दा ने मेज़ पर दवाइयों के खाली खोखे उंडेल दिए। अब स्वमित्र का काम था—उनसे उनकी पतोहू की प्रेगनेंसी के इलाज की कहानी जोड़ना। कौन-सी दवा, कितने दिन, किसलिए रही होगी?! 

Dentist And Wrappers
डेंटिस्ट और खाली दवा के रेपर्स

मैं कुर्सी पर पड़ा था—इलाज भी करा रहा था और कथाएँ भी बटोर रहा था।

गांवदेहात की डाक्टरी आसान काम नहीं है। पिछली बार एक महिला आई थीं। महीनों दांत का दर्द झेलती रहीं। बीच में ममहर के किसी झोलाछाप से दवा ले ली। दर्द दब गया, पर गाल के अंदर और मसूड़ों पर छाले पड़ गए।

डाक्टर ने उस दिन साफ़ झुंझलाहट में कहा था—
“दर्द बंद होना इलाज नहीं होता। शरीर को चुप करा देना इलाज नहीं होता।”

झोलाछापों का आत्मविश्वास अद्भुत होता है। “दस मिनट में आराम, गारंटी।” उनके पास न एक्स-रे, न हिस्ट्री, न जवाबदेही। पर भरोसा भरपूर।

और भरोसा—गांवदेहात में—सबसे सस्ती और सबसे महँगी चीज़ दोनों है।

ऐसे दृश्य देख कर मुझे जेम्स हैरियेट याद आते हैं। अंग्रेज़ पशु-चिकित्सक—जिन्होंने ग्रामीण इलाकों में काम करते हुए अपने अनुभव लिखे। उनकी All Creatures Great and Small में इलाज से ज़्यादा जीवन दर्ज है—लोग, उनकी आदतें, उनकी भोली जिदें।

हमारे यहां भी कितनी कथाएँ रोज़ जन्म लेती हैं।
मुड़ी-तुड़ी पुर्जियाँ। खाली दवा के खोखे। अधूरी जानकारी। और डॉक्टर का अपार धैर्य।

मैं कुर्सी से उठा तो सोच रहा था—
डेंटिस्ट होना एक पेशा है। पर गांवदेहात में डेंटिस्ट होना—एक कथाकार होने की प्रबल संभावना भी है। एक अनूठा अवसर। 

अगर मैं स्वमित्र या खुशबू की जगह होता, तो हर रोज की कथाओं के शायद नोट्स भी रखता। लोगों से अवधी-भोजपुरी में बतियाता। दांत लगाता और साथ-साथ कहानियाँ भी सहेजता।

हर कोई जेम्स हैरियेट हो यह ज़रूरी नहीं।
पर गांवदेहात में काम करने वाला हर डॉक्टर चाहे तो, अपनी डायरी में
कुछ जीवन दर्ज कर सकता है।

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बूढ़ा आदमी और दांत का डाक्टर


दांत के डाक्टर साहब और उनकी जूनियर ने मेरे बाँई ओर के दाँतों का अंतिम रेडियोग्राफ शूट कर परिणाम देखा और संतोष की साँस ली। आज की मेरी सिटिंग पूरी हुई।

स्वमित्र, डाक्टर साहब ने पूछा—बाहर जो दद्दा बैठे हैं, उनका क्या मामला है। पहले आ चुके हैं?

खुशबू, जूनियर डाक्टर, ने बताया—नहीं, पहले तो नहीं देखे।

बाहर निकलते निकलते डाक्टर साहब और दद्दा की बातचीत सुनाई पड़ी। दद्दा इलाज का दाम तौलने आए थे और अपने को पर्याप्त गरीब-निरीह दिखाने में सफल लग रहे थे। उन्होंने कहा—
“हमार दंतवा बनई देब्य?” (मेरे दांत बना देंगे?)

उनका कहना था कि भरोसगंज में दांत लगवाए थे। खाते समय दांत गिर कर टूट गए। अब खाना नहीं खा पाते। बड़ी तकलीफ है।

यह साफ़ लगता था कि भरोसगंज में उनका भरोसा उठ गया था। इन डाक्टर साहब के बारे में सुनकर यहाँ आए थे। उन्होंने मुँह खोल कर अपने नीचे और ऊपर के दांत दिखाए। एक-आध दांत ही बचे थे। शायद चबाने के मोलर तो नहीं ही रहे होंगे।

इससे पहले कि डाक्टर अपना ओपीनियन देते, दद्दा ने मुद्दे की बात की—
“केतना लागे? हमरे लगे ढेर बा नाहीं।” (कितना पैसा लगेगा? मेरे पास ज़्यादा नहीं है।)

पूछने पर बताया कि भरोसगंज में एक हज़ार में दांत बनवाए थे। शायद यह अंडरस्टेटमेंट हो। दद्दा हज़ार रुपये को बेंचमार्क बनाना चाहते थे।

डाक्टर साहब ने कहा—
“तोहर हड्डी नाहीं बा जौने पर दांत टिकि सकइ।”

फिर उस वृद्ध की मायूसी का असर रहा होगा कि बोले—
“अच्छा, पाँच मिनट रुकिए। एक बार ध्यान से देख कर बताऊँगा कि कुछ हो सकता है या नहीं।”

खुशबू ने देखा कि मैं इस वार्तालाप में रुचि लेता खड़ा हूँ। वह मेरे लिए एक कुर्सी ले आई। बैठने के लिए।

मैं, पूरी जिज्ञासा के बावजूद, वहाँ रुका नहीं—घर से निकले दो घंटे हो गए थे। पत्नीजी घर पर इंतज़ार करती होंगी। मैं चला आया।

पर मन लगा रहा कि उस वृद्ध का क्या हुआ होगा।
डाक्टर साहब कोई समाधान दे पाए होंगे या नहीं।

अगर रुका होता, तो शायद देख पाता…
आख़िर दद्दा को पूरे दांत नहीं चाहिए थे। उन्हें इतना चाहिए था कि खाना फिर से खाना लगे। मिक्सी, ग्राइंडर, उबाल-छान—इन सबके बीच उनकी दुनिया नहीं थी। एक तरफ़ की चौभर मिल जाए तो रोटी-दाल-भात खा सकें।

आप क्या सोचते हैं—क्या हुआ होगा उस ग्रामीण दद्दा का?
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कभी-कभी लगता है—
कुछ पेशों में यह संभावना हमेशा रहती है कि आदमी
सिर्फ़ अपना काम न करे,
कुछ कहानियाँ भी अपने नोट्स में जमा ले,
भविष्य में लिखने के लिए।
शायद स्वमित्र (डाक्टर साहब) के पास वह संभावना खुली है।

सबस्टेक पर पोस्ट का लिंक – https://gyandutt.substack.com/p/130

कुंठित लोगों की असहिष्णुता


एआई उनकी बैसाखी बन गया है, तो वे अपने को और भी फूला हुआ पाते हैं।

अजीब किस्म के कॉन्स्टीपेटेड लोग हैं। मानसिक बवासीर के शिकार।
मुझे याद आता है—साल भर पहले मैंने सर्दियों में साइकिल चलाने के बारे में लिखा था। पोस्ट में बस इतना था कि ठंड के बावजूद मैंने एक घंटा साइकिल चलाई। उम्र के हिसाब से कई लोगों ने आश्चर्य और प्रशंसा जताई। पर एक सज्जन ने लिखा—“अंदर रहा कर बुड्ढ़े, नहीं तो जल्दी मर जाएगा।”

कुछ लोग ऐसे हैं जो किसी बुढ़ाते की कोई भी ‘साहसिक’ बात पचा नहीं पाते। उन्हें कब्ज़ हो जाती है। कुछ न मिले तो रिटायरमेंट पर व्यंग कसते हैं, बुढ़ापे में सनकी होने, सठिया जाने, स्मृतिलोप से ग्रस्त होने की बात करने लगते हैं।

कल एक सज्जन ने भारत में “विकसित” एआई मॉडल पर एक लम्बा लेख ठेला। लेख में बात थी, पर कनेक्शन नहीं था—न लेखक से, न पाठक से। जगह-जगह दोहराव, भाषा में सूखापन। पढ़ते हुए लगा कि या तो यह किसी विभागीय प्रेस-विज्ञप्ति से निकला है, या एआई को आदेश दे कर लिखवाया गया है।

एआई के साथ अगर सौहार्दपूर्ण संवाद किया जाए तो वह भाषा-लालित्य के साथ किसी पढ़े-लिखे व्यक्ति की तरह लिखता है। पर अगर उसे मात्र बाइनरी आदेश दिए जाएँ, तो वह सूखा भूसा परोसता है। उस लेख का कंटेंट ठीक था, पर प्रस्तुति ठीक वैसी ही—भूसे जैसी।

मैंने एक साइट से पूछा—यह मानव का लिखा है या एआई का? उत्तर मिला—81 प्रतिशत एआई। यह बात उन सज्जन को बताई तो वे आहत हो गए। आहत होते ही उन्होंने अपने को महान लेखक घोषित किया और मुझे सनकी व नकारात्मक बता दिया। उनके शब्द थे—

“सनक गए हैं क्या आप? लगता है पहली बार मेरा लेख पढ़ रहे हैं। मैंने खुद दो जगह चेक किया—Quillbot पर 0% और ZeroGPT पर 50% बता रहा है। इतनी समझ तो इस उम्र में होनी चाहिए कि भारतीय भाषाओं में विदेशी मॉडल गच्चा खाते हैं।
मैं उसी तरह लिखता आया हूँ जब एआई चैटबॉट्स आए भी नहीं थे। तकनीकी विषयों पर मैं कॉलेज के समय से लिख रहा हूँ।
इलाज करवाइए अपना। बुढ़ापे में इतनी नकारात्मकता ठीक नहीं।”

old man and redicule
अपमान झेलता बूढ़ा आदमी

मैं ऐसे तथाकथित लिक्खाड़ पत्रकारों से पहले भी मिल चुका हूँ। 2007–08 में, जब हिंदी ब्लॉगिंग की शुरुआत थी, तब इन्हीं लोगों ने अपना मुहल्ला-कस्बा जमा रखा था। यह भी सच है कि उनमें कई संयत और सज्जन हैं, पर कई निहायत बदतमीज़ और भीतर से खोखले भी हैं। इतने वर्षों में लोग बदले नहीं—या शायद और ज़्यादा असहिष्णु हो गए हैं।

अब एआई उनकी बैसाखी बन गया है, तो वे अपने को और भी फूला हुआ पाते हैं। वे यह मान ही नहीं पाते कि कोई और—कोई नौकरशाह, कोई सीनियर सिटीजन—भी लिख सकता है, शब्दों का सधा हुआ प्रयोग कर सकता है, या उनके विपरीत विचार रख सकता है। लिहाज़ा और कुछ न मिले तो नौकरशाह को भ्रष्ट कह देंगे, बूढ़े को सनकी और सठियाया बता देंगे। और अगर वह प्रतिक्रिया दे दे, तो उसके जल्दी दिवंगत होने का शाप भी दे देंगे।

असल समस्या लेखन नहीं है।
समस्या यह है कि कुछ लोग यह स्वीकार नहीं कर पाते कि दुनिया में उनकी आवाज़ के अलावा भी आवाज़ें हैं—और उनमें से कुछ उम्रदराज़, स्वतंत्र और असहमत भी हो सकती हैं।

अजीब कुंठा है लोगों में।

पर, शायद उस बहस में मैं भी बेकार पड़ गया। उम्र का तक़ाज़ा है कि अब कदम नाप कर रखूँ।

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