प्रांग्शी की ऑनलाइन पाठशाला


ऑनलाइन शिक्षा, पालन-पोषण और बच्चे के भविष्य पर एक व्यक्तिगत नोट

कल शैलेश और उसकी पत्नी अतु मिलने आए थे। साथ में उनकी पाँच साल की बिटिया—प्रांग्शी।

जब वह कार से उतरी, तो उसके हाथ में खिलौना नहीं था, न कोई गुड़िया। एक टैबलेट था। उस पर उसकी क्लास चल रही थी। देश के अलग-अलग हिस्सों से बच्चे जुड़े थे और बैंगलूरु से टीचर। पाँच साल की उम्र और राष्ट्रीय क्लासरूम—यह दृश्य अपने आप में थोड़ा अजीब भी था और थोड़ा रोमांचक भी।

प्रांग्शी पहले हमारे झूले पर बैठ गई। हमारे घर का झूला उसे बहुत प्रिय लगता है। उसके हाथ में टैबलेट था, पैर हवा में। झूले की हल्की गति और स्क्रीन पर चलती क्लास—दो दुनियाएँ एक साथ।

कुछ देर बाद ड्राइंग टेबल पर उसका क्लासरूम सेट कर दिया गया। रंग, काग़ज़, पेंसिल—और बीच में डिजिटल आवाज़ें। अतु पास ही बैठी थी। बिरला ब्रेनिक्स की दिन में तीन–चार घंटे क्लास चलती है और एक अभिभावक का साथ रहना ज़रूरी है। आज वह भूमिका माँ निभा रही थी।

मैं देख रहा था।
और मन में सवाल उठ रहे थे।

भारत में ऐसे कितने बच्चे होंगे?
जो स्कूल नहीं जाते, लेकिन पढ़ते हैं।
जो बस्ते की जगह टैबलेट उठाते हैं।
जिनका शिक्षक एक शहर में नहीं, एक सर्वर पर बैठा है।

प्रांग्शी को देखकर एक बात साफ थी—वह खुश थी। न डरी हुई, न दबाव में। उसे जो आता है, वह कई दस साल के बच्चे नहीं कर पाते। आत्मविश्वास उसके हाव-भाव में था, बोलने में था, सवाल पूछने में था। यह कोई रटी हुई मेधा नहीं लगती थी—यह सहजता थी।

शायद इसकी वजह सिर्फ़ ऑनलाइन क्लास नहीं है।

प्रांग्शी की ऑनलाइन पाठशाला
प्रांग्शी की टैबलेट पर पाठशाला

प्रांग्शी पूरा देश घूम चुकी है।

उसका पिता उत्तर प्रदेश का है, माँ नागालैंड की। दो संस्कृतियाँ, दो भाषाई संसार, दो तरह की सामाजिक स्मृतियाँ—सब उसने देखी हैं। वह बारहों ज्योतिर्लिंग के दर्शन कर चुकी है। पाँच साल की उम्र में इन सबका अर्थ समझ में आया होगा या नहीं—यह सवाल बेमानी है। कुछ तो मन में गया होगा। दृश्य, भाव, रास्ते, भीड़, मंदिरों की गंध—कुछ न कुछ तो जमा हुआ होगा।

यह सब सोचते हुए मेरे मन में उत्साह भी था और संदेह भी।

क्या ऐसे बच्चे भविष्य में ज़्यादा सफल होते हैं?
या सिर्फ़ जल्दी आगे निकल जाते हैं; सफलता के एक पठार पर?

मुझे लगता है — ऐसे बच्चों की असली पूँजी उनकी अनुकूलन क्षमता है। वे नए माहौल से डरते नहीं। भाषा, लोग, स्थान—सब उनके लिए निरंतरता का हिस्सा बन जाते हैं। हमारे घर प्रांग्शी एक मिनट के लिये भी झिझकी नहीं। यह गुण भविष्य में डिग्री से ज़्यादा काम आएगा।

लेकिन जोखिम भी है।

अगर यह सब सिर्फ़ “परफॉर्मेंस” तक सीमित रह गया—कितना आगे है बच्चा, कितना जानता है—तो भीतर कहीं खालीपन भी आ सकता है। बच्चा तेज़ तो बनेगा, पर जड़विहीन न हो जाए—यह चिंता स्वाभाविक है। नहीं?

उसके अलावा जब बच्चा तीन चार घंटा टैबलेट के ऊपर ही सांस लेता है तो वह ज्यादा से ज्यादा टैबलेट के साथ जीने नहीं लग जायेगा? उसके जीवन में माइक्रोस्कोप से चींटी निहारना, नदी की लहरें गिनना, भरतनाट्यम सीखना और बगीचे में काम करना क्या दूसरी दुनियाँ नहीं होता जायेगा?

फिर झूले की ओर देखता हूँ।
प्रांग्शी अब भी वहीं है।

पास उसकी माँ है।
ड्राइंग चल रही है।
बीच-बीच में हँसी निकल जाती है।

और तब मुझे लगता है—शायद संतुलन यहीं है।

अगर डिजिटल क्लास के साथ झूला बना रहे,
अगर ज्ञान के साथ यात्रा बनी रहे,
अगर स्क्रीन के साथ बगीचे में नीबू के फल से भी आँखें जुड़ी रहें—
तो यह पाठशाला सिर्फ़ दिमाग़ नहीं, इंसान भी गढ़ सकती है।

यह शिक्षा सबके लिए नहीं है।
हर परिवार यह नहीं कर सकता। अव्वल तो अफोर्ड नहीं कर सकता- या करना नहीं चाहता और वह कर भी सके तो इतना बड़ा रिस्क अपने बच्चे के भविष्य के साथ नहीं लेता।

लेकिन जिनके पास यह अवसर है—उनके लिए यह एक प्रयोग है; अगर वे शैलेश-अतु की तरह प्रयोगधर्मी हैं।

और प्रांग्शी उस प्रयोग की एक छोटी-सी, मुस्कुराती हुई प्रयोगशाला है – हमारे झूले पर झूलती।

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चारवाक का युग आ गया है!


“जीवन का क्या भरोसा। जितना सामने है, उसका आनंद लो। कुछ नहीं है तो ऋण लेकर घी पियो।”

चारवाक ने यह बात बहुत पहले कह दी थी। तब शायद किसी ने गंभीरता से नहीं ली। आज लग रहा है — आदमी नहीं बदला, बस साधन बदल गये हैं। घी अब भी है, ऋण भी है; फर्क बस इतना है कि अब घी पेट में कम, पेट्रोल टैंक और सोशल मीडिया में ज़्यादा जाता है।

रेल फाटक बंद होता है तो जहां मुश्किल से कोई वाहन खड़ा होता था दस साल पहले, आज वहां डेढ़ दर्जन मोटर साइकिलें खड़ी हो जाती हैं। उतनी ही दूसरी ओर भी खड़ी हो जाती हैं।

रेल फाटक ही क्यों, बगल की सड़क पर आपसी कम्पीटीशन में दो ट्रेक्टर भी अगर फंस गये तो देखते देखते ढेरों मोटर साइकिलें रुक जाती हैं। मोटर साइकिलों का तो सैलाब आ गया है #गांवदेहात में।

मोटर साइकिलों का तो सैलाब आ गया है #गांवदेहात में।

इन मोटरसाइकिलों में से अस्सी प्रतिशत — या उससे भी ज़्यादा — लोन पर हैं। शायद यही वजह है कि उन्हें आंधाधुंध चलाने में ज़्यादा डर भी नहीं लगता। जो चीज़ पूरी अपनी नहीं होती, उसके गिर जाने का शोक भी आधा ही होता है।

लोन अब सिर्फ वाहन तक सीमित नहीं रहा।
बच्चे का जन्मदिन उधार पर मनाया जाता है। केक नहीं, पूरा इवेंट। कहीं-कहीं तो डीजे भी। शादी में नहीं — बच्चे के बर्थडे में। लगता है खुशी अब तभी पूरी होती है जब उसके साथ एक ईएमआई भी चल रही हो।

फलाने की बिटिया को बेटा हुआ तो पाँच बोलेरो भर कर लोग बधावा देने गये। डेढ़ लाख का सामान। कैशपोर से लोन उठा कर। पहले लोग खुशियाँ बाँटते थे, अब किस्तें बाँटते हैं। सामूहिक उत्सव अब सामूहिक देनदारी में बदल चुका है।

वह ज़माना गया जब महाजन “अनही ब्याज” पर कर्ज़ देता था — रुपया पर एक आना महीना — और देखते-देखते खेत लिखवा लेता था। अब महाजन सभ्य हो गया है। मात्र सतरह प्रतिशत पर लोन देता है। खेत नहीं लिखवाता, सिर्फ तारीख़ लिखवा लेता है।
डर अब डंडे का नहीं, मोबाइल के नोटिफिकेशन का है। उगाही करने आने वाले कर्मचारी का है।

कई लोग दो-तीन कंपनियों से अलग-अलग लोन लिये हैं। सब अपने-अपने तरीके से घी पी रहे हैं। कोई मोटरसाइकिल में, कोई मोबाइल में, कोई समारोहों में। चारवाक अगर आज होते तो शायद दर्शन नहीं लिखते — फाइनेंस एप लॉन्च करते।

Charvak Launching Loan App
चारवाक अगर आज होते तो शायद दर्शन नहीं लिखते — फाइनेंस एप लॉन्च करते।

शायद ही अब कोई घर, कोई परिवार, कोई गांव होगा जहाँ सुविधाओं के लिये लोन न लिया गया हो। सुविधा भी अब सुविधा नहीं रही — वह न्यूनतम जरूरत बन गई है। बिना उसके आदमी अधूरा लगता है। पेट भरने के लिये कमाने का युग अब नहीं है। राशन तो फ्री मिलता ही है।

लोगों का जीवन स्तर बढ़ा है। इसमें कोई शक नहीं।
लेकिन जीवन का बोझ भी उसी अनुपात में बढ़ा है। फर्क बस इतना है कि बोझ अब कंधे पर नहीं, कैलेंडर पर टंगा रहता है।

मैं यह सब देखकर न परेशान होता हूँ, न रोमांचित।
रिटायर आदमी हूँ। किनारे बैठकर देखता हूँ।
चारवाक का युग आया है — यह नोट करता हूँ।
घी कौन पी रहा है, कितनी किस्त में — यह हिसाब दूसरों पर छोड़ देता हूँ।

बस, इसी जुगत में रहता हूं कि इस उम्र में महर्षि चारवाक का शिष्य न बनना पड़े।

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महराजगंज कस्बे का बदलाव – दांत की डाक्टरी


कस्बे के बाजार के बदलाव की कथा अगर कही जाए, तो वह पिछले एक दशक में कहीं ज़्यादा स्पष्ट दिखती है। जब मैं रिटायर होकर यहाँ आया था, तब इक्का‑दुक्का ही प्रशिक्षित फ़िज़ीशियन थे; बाकी झोलाछाप। छोटी‑सी समस्या के लिए भी बनारस जाना पड़ता था, और ख़राब हाईवे व बढ़े ट्रैफ़िक के कारण दो घंटे से कम में पहुँचना मुश्किल था। 

अब बनारस गये मुझे आठ महीना हो गया है। शहर जाने की जरूरत ही नहीं होती। सब यहीं काम चल जाता है। 

यहां तक कि दांत की समस्या के लिये भी बनारस नहीं जाना पड़ा। पिछले एक साल से महराजगंज के डा. स्वमित्र दुबे मेरे दांत के डाक्टर हैं।

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डा. स्वमित्र के यहां नई जूनियर डेंटिस्ट 

डा. स्वमित्र के यहां वह नवयुवती जूनियर डेंटिस्ट है। साल भर बाद हम वहां गये तो पाया कि सजा हुआ है उनका प्रतीक्षा कक्ष। नये साल का बधाई संदेश, झिलमिलाती झालर और दीवारों पर लटकते रंग बिरंगे गुब्बारे।

मेरी पत्नीजी ने कहा – ये नई लड़की के आने का परिणाम है। साफ सफाई और सजावट में एक नारी का टच है। और उसका व्यवहार भी कितना पॉलिश्ड है – गांव में होते हुये भी। 

जब हम पंहुचे तो वह शेल्फ में लगी देवताओं की मूर्तियों और चित्रों को साफ कर पूजा कर रही थी। अगरबत्ती की सुगंध वातावरण में थी।

Junior Dentist
काम शुरू करने से पहले अगरबत्ती जला पूजा करती खुशबू। वह जूनियर डेंटिस्ट है।

वह जूनियर डेंटिस्ट हैं—खुशबू दुबे, पास के लक्ष्मणा गाँव की। एक नवयुवती डॉक्टर का वर्णन करना मेरे लिए आसान नहीं, फिर भी—चेहरे पर शांत एकाग्रता, बिना बनावटी मुस्कान या दिखावटी आत्मविश्वास। काम पर टिकी निगाहें, सलीके से बँधे बाल, कमर तक जाती चोटी—गाँव और पेशेवर प्रशिक्षण का सटीक फ्यूज़न। न झिझक, न जल्दबाज़ी—बस यह भाव कि जो करना है, ठीक से करना है।

गाँव की पृष्ठभूमि और पेशेवर प्रशिक्षण का यह मेल उसके चेहरे पर और वेशभूषा से साफ़ पढ़ा जाता है; जैसे मेहनत ने व्यक्तित्व को धीरे-धीरे गढ़ा हो, और अब वह बिना शोर किए मौजूद है।

ऐसा प्रोफाइल महराजगंज के कस्बाई एम्बियेंस में – मैं एक दशक पहले, या एक साल पहले तक भी, कल्पना नहीं करता था।

मेरा ट्रीटमेंट तो डा. स्वमित्र ने किया, पर खुशबू पूरे समय उनकी सहायता को मौजूद रही। यहां तक हुआ कि मैने अपने केस से सम्बंधित प्रश्न भी खुशबू से पूछना सही समझा। 

MAHRAJGANJ DENTIST
स्वमित्र और खुशबू ऑपरेशन करते हुये

यह बदलाव कस्बे के चरित्र में परिवर्तन के रूप में देखा जाना चाहिये।

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एक पीढ़ी पहले दांत का क्या इलाज था? 

राजन भाई 73-74 साल के हैं। उनका पीछे का एक दांत गायब है। पूछा कैसे और किसने उखाड़ा?

“छोट रहे – 11-12 साल के। गांउं में फलाने गुरू उखाड़े रहें।” – राजन भाई ने बताया।

फलाने गुरू किसानी करते हैं/थे। लगे हाथ दांत वांत भी देख लिया करते थे। औजार भी क्या रहे होंगे? हो सकता है रसोई की संडसी से उखाड़ा हो। एनीस्थीसिया के नाम पर बहलाने के लिये कोई कहानी सुनाई हो और दिमाग फिरते ही खट्ट से निकाल दिया हो दांत?

मैं जब गांव में रीवर्स माइग्रेट हुआ, तब भी इसी छाप की डाक्टरी देखा करता था। अभी भी बगल में मिरगी से ले कर भगंदर-फिश्तुला-बवासीर तक के इलाज की सिंगल विंडो झोंपड़ी है, जिसके सामने मैने 35-40 मोटरसाइकिलें खड़ी गिनी हैं। पचास साठ लोगों की लाइन! 

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भरोसे की धीमी लड़ाई

पर स्वमित्र के लिये अभी भी अपनी साख के लिये मेहनत करनी होती है। वे बता रहे थे – “एक सज्जन आये जो फीस का नाम सुनते ही बांहे पीछे कर सीना निकाल बोले – ई महराजगंज में कउन आया है जो दांत देखने की फीस लेने की बात कर रहा है।” 

“यही लोग बनारस जा कर खेत बेच मंहगा इलाज कराते हैं और वहां की फीस पर कुछ नहीं कहते।” 

लोग अपने आसपास गुणवत्ता के उभरते द्वीप को नोटिस नहीं करते। अभी उन्हें यकीन ही नहीं है कि यहां बगल में स्तरीय सुविधा मिल सकती है। वे मान कर चलते हैं कि यह तो गंगा के करार की जमीन है, जहां सिर्फ सरपत उगता है – उत्कृष्टता और प्रतिभा की खेती यहां कहां!

लीनियर नहीं, लॉगरिद्मिक बदलाव 

पर बदलाव तो हो रहा है। दस साल में बदलाव मैने देखा है। आगे वह और भी तेज होगा। 
दांत की डाक्टरी तो एक पक्ष है। खुशबू की खुशबू केवल एक अकेले की नहीं होगी। बदलाब लीनियर नहीं, लॉग्रिद्मिक होता है!

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