घड़ी, साइकिल, बाजा बनाम राइडर


मेरे बचपन में दहेज का मानक था — घड़ी, साइकिल और बाजा – रेडियो। तेल से चुआती जुल्फी टेये नई शादी वाला दुलहा गांव में साइकिल ले कर घड़ी पहने और रेडियो पर बिनाका गीत माला सुनता निकलता था। जलवा होता था।

अब समय बहुत बदल गया है। बगल में शादी तय हुई है। छेकईया में — तिलक की रस्म में — सब तय-तमाम हुआ है। पर लड़का मुंह फुलाये है। मोटर साइकिल में जो ब्रांड देने को कहा है लड़की के पिता ने, वह उसे पसंद नहीं — उसे तो कोई नई ब्रांड की राइडर चाहिये। लड़की इंटर पास है। लड़के से एक दर्जा ज्यादा पढ़ी है; पर उससे क्या। मोटर साइकिल पर पीछे बिठा ले चलेगा तो राइडर वाला जलवा थोड़े होगा — चाहे वह कितनी भी पढ़ी हो।

लड़कियां अब ज्यादा पढ़ रही हैं, ज्यादा योग्य हैं। पर बाज़ार अभी भी वही है — दहेज लड़की वाला ही देता है। यही पहेली मेरी समझ में नहीं आती।

साइकिल से निकलता हूँ तो गाँव की गलियों में मोटर साइकिलें ही मोटर साइकिलें दिखती हैं — खड़ी भी, दौड़ती भी। बाज़ार में चलने की जगह नहीं। लोन पर ले कर दहेज में मोटर साइकिल देना आसान हो गया है। ऋणम कृत्वा घृतम पिबेत।

कई-कई गांवों में लड़कों की शादी नहीं हो रही। कोई पूछने वाला ही नहीं आता। पहले तो घर के सामने बंधे दो बैल और एक गइया शादी के लिये नेसेसरी और सफीशियेंट कंडीशन होती थी। अब वह नहीं रहा। अब नौकरी — भले ही बम्बई में होटल में बेयरा की हो — ज़रूरी है। लिहाजा, बेरोजगारी के जमाने में कई बिना शादी के रह जा रहे हैं। इंतजार में अधेड़ हो जा रहे हैं। और दहेज फिर भी लड़की वाला ही दे रहा है।

बहुत सम्भव है आज से दस साल बाद जेन-अल्फा का नौजवान बेरोजगार हो; सरकार की यूनिवर्सल बेसिक इनकम पर जिंदा हो; पर चलता दहेज में माँगे चार चक्का पर ही हो।

दरअसल मामला मोटर साइकिल का है ही नहीं। मामला इज्ज़त और हैसियत का है। लड़की का बाप दहेज देकर इज्ज़त खरीदता है — लड़का दहेज लेकर हैसियत जताता है। राइडर वाली मोटर साइकिल उस पूरे समीकरण में = का चिन्ह लगाती है।

घड़ी-साइकिल-बाजा का ज़माना गया। चिन्ह वही रहा।


घर के बगीचे के कोने की दुनियाँ


corner in garden

घर के सामने की दांये कोने पर कम ही जाता हूं। वहां गूलर, नीम और पीपल के तीन पेड़ हैं। त्रिदेव की तरह। वहां रामसेवक घर की किचन गार्डनिंग करते हैं। एक कोने में दुमुही – सैंडबोआ और धामिन – असाढ़िया चूहे खाने वाले सांप की भी उपस्थिति है। कभी कभी तीतर भी अपना परिवार बनाता है उधर।

आज उस ओर गया। पत्नीजी साथ थीं — उन्होंने एक-एक पौधे का परिचय कराया, जैसे किसी पुराने मोहल्ले में घर की बुजुर्ग मालकिन पड़ोसियों को कराती हैं। बोड़ा-बजरबट्टू की हरी भरी बेल फैल गई है, सफेद-बैंगनी फूलों के साथ। तीस-चालीस सूरजमुखी के पौधे हैं — कंधे तक ऊँचे — और सभी मुँह पूरब की ओर किये हैं, सूरज की तरफ।

बाद में, चित्र में देखा तो पीछे त्रिदेव भी खड़े थे — सूरजमुखी के साक्षी।

गाजर और धनिया अब फूल-फल-बीज तक पहुँच गये हैं — अपना पूरा जीवनक्रम चुपचाप पूरा करते हुए।
लेमन ग्रास तो खूब छंछड़ा है। रामसेवक की कैंची ने लगता है उसे संवार दिया है — आकर्षित करता है। दो दिन पहले आनंद और राजकुमारी आये थे — राजकुमारी उसके चित्र ले गईं। कलकत्ता में शायद उनके यहां है नहीं लेमन ग्रास।

घरपरिसर का हर एक कोना अपना अपना दुख-सुख लिये मौन जी रहा है। शायद सोचता भी हो कि इस घर का खूसट बुढ़ऊ मालिक उनके आसपास क्यों नहीं आता।

आज सोचा — रोज सवेरे दस मिनट वहाँ जाना चाहिये। उनसे संवाद करना चाहिये।

संहजन की फलियां सुखाई जा रही हैं


Moringa Drying

हमारे घर में संहजन नहीं है। एक लगाया था पर उसकी पत्तियां और फलियाँ कड़वी होती थीं। सो उसे हटा दिया। उसकी जगह कोई और फलदार पौधा लगा है।

सुभाष जी को मालुम था कि हमारे यहां संहजन नहीं है। तो उन्होने ढेर सारी फलियाँ भेज दीं। काफी तो हमने दाल में उबाल कर चूस कर खाईं। बची हुई फलियों के दो-तीन इंच के टुकड़े काट कर कड़ी धूप में सुखाये जा रहे हैं। पूरी तरह सूख जायेंगे तो उनको मिक्सी में पीस कर पाउडर बनेगा।

वह पाउडर व्यंजनों में या दही आदि में मिलाया जायेगा। मैंने पढ़ा है कि संहजन घुटनो के दर्द के लिये फायदेमंद होता है। अमेजन पर यह सुपर – फूड कहा गया है और ₹2000 प्रति किलो बिकता है।

घर में यह सुखाने-पीसने से एक पाव संहजन.मोरिंगा पाउडर तो बन ही जायेगा। फ्री में सुपर – फूड उत्पादन कर लेंगे हम गांवदेहात और घरपरिसर में। प्रयोग सफल रहा तो अगले साल सुभाष दुबे जी से और फलियां मांगी जायेंगी!


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