किंडलियों की दुनिया


उनकी किताबों की अलमारी दिखती नहीं—क्योंकि होती ही नहीं।

सोशल मीडिया पर एक अलग ही किस्म का साहित्यिक उत्सव चलता रहता है। कोई किताबों के मेले की तस्वीर डालता है, कोई लिटरेरी फेस्टिवल के मंच की, कोई अपनी हाल ही में खरीदी गई हार्डबाउंड किताबों की करीने से सजी हुई फोटो।

लगता है— किताबें अक्सर पढ़ने चीज़ नहीं होतीं—वे शोकेस मोड में होती हैं; दिखाने की नई खरीद। जैसे कहा जा रहा हो— देखो, मैं पढ़ने वालों की उस अभिजात्य वर्ग से हूँ जो मोटे कवर, कड़क जिल्द और भारी कीमतों में विश्वास करती है।

मेरी सोच बन चुकी है, यहाँ किताब से ज़्यादा उसके मालिक की सामाजिक पहचान प्रदर्शित की जा रही होती है। पढ़ना अब कोने में शांत हो बैठ करने का काम नहीं; वह एक सार्वजनिक वक्तव्य बन गया है। और हर सार्वजनिक वक्तव्य की तरह, उसमें भी वर्ग, श्रेणी और पदक्रम स्वाभाविक रूप से घुस आते हैं। हार्डबाउंड वाले हैं, पेपरबैक वाले हैं, और उनके बीच एक अनकहा तनाव है।

हार्डबाउंड वाले अक्सर पेपरबैक को कुछ इस तरह देखते हैं जैसे वह अस्थायी हो, हल्का हो, “पूरा” न हो। पेपरबैकीयों को यह बात पता भी होती है, और इसी से उनकी हल्की-सी इनफीरियॉरिटी जन्म लेती है।

और फिर—इन दोनों के बाहर—एक तीसरी प्रजाति है। वह ज्यादा नये प्रकार की है—
किंडलिये। वे जो सॉफ्ट कॉपी या किंडल पर पढ़ते हैं। कुछ किताबें वे खरीदते हैं, पर बहुत सी इंटरनेट से फ्री प्राप्त की गई होती हैं।

ये किंडलिये न हार्डबाउंड की शान में शामिल होते हैं, न पेपरबैक की जद्दोजहद में। वे न लिट-फेस्ट के टेंट में दिखते हैं, न किताबों के ढेर के आगे सेल्फ़ी लेते हैं। वे अक्सर मेरी तरह गाँव या कस्बे में, या शहर के उस कोने में रहते हैं जहाँ साहित्यिक हलचल नहीं पहुँचती। उनके पास पुस्तक मेले या लिट-फेस्ट में जाने का बजट नहीं होता। उनकी किताबों की अलमारी दिखती नहीं—क्योंकि होती ही नहीं। उनकी किताबें स्क्रीन के भीतर रहती हैं। अदृश्य। मौन।

किंडलिये किताबों की खबर अख़बार से पाते हैं—कभी किसी कॉलम में, कभी किसी छोटे से नोट में। अखबार भी अमूमन वे इंटरनेट पर पढ़ते हैं। कभी किसी ब्लॉग या पुराने लेखक की टिप्पणी से भी उन्हें पता चलता है किताब के बारे में। फिर वे जल्दबाज़ी नहीं करते। पहले वे देखते हैं कि इस किताब पर दूसरे पाठकों ने क्या कहा है। कई बार वे उन समीक्षाओं को भी पढ़ते हैं जो एक-दूसरे से बिल्कुल उलट होती हैं—क्योंकि किंडलिये जानते हैं कि अच्छी किताब वही होती है जिस पर असहमति हो।

फिर एक और चरण आता है, जो शायद आज के समय का नया साहित्यिक संस्कार है—वे किसी इंसान से नहीं, एक डिजिटल सहचर से पूछताछ करते हैं। कई साइट्स हैं जो पुस्तक के रीव्यूज़ देती हैं। उनके सवाल होते हैं— यह किताब किस परंपरा में है? यह लेखक किस तरह का जोखिम लेता है? क्या यह किताब पाँच साल बाद भी पढ़ी जाएगी?

यह पूछताछ किसी पुस्तक विक्रेता से नहीं होती, किसी फेस्टिवल के पैनल से नहीं—बल्कि शांति से, घर बैठे कीबोर्ड पर होती है।

और फिर—अगर संभव हो—खरीदने से पहले खोज होती है। क्या यह कहीं उपलब्ध है? क्या इसे पढ़कर देखा जा सकता है? क्या यह केवल नई होने के कारण महँगी है, या सचमुच ज़रूरी है? किंडलिये बजट को भी एक नैतिक प्रश्न की तरह देखते हैं। उनके लिए किताब खरीदना उपभोग नहीं, वित्तीय चयन है। एक गहन फिनांशियल स्क्रूटिनी!

यह सब प्रक्रिया दिखाने लायक नहीं होती। इसमें कोई फोटो नहीं बनती। कोई “अभी-अभी खरीदी” वाली पोस्ट नहीं निकलती। शायद यही कारण है कि किंडलिये सोशल मीडिया पर अदृश्य रहते हैं। लेकिन वे मौजूद होते हैं—शायद ज़्यादा गहराई से।

किंडल से पहले के जमाने की बात है। मुझे अपने एक पुराने प्रोफेसर की याद आती है। गणित पढ़ाते थे—विश्वनाथ कृष्णमूर्ति जी। एक बार वे एक शादी में गए। पंडित मंत्र गलत पढ़ रहा था। सर चुपचाप आगे आए, उसकी जगह बैठ गए, और पूरा वैवाहिक अनुष्ठान सही क्रम से करवा दिया। लेकिन जब दक्षिणा का समय आया, तो सारी दक्षिणा उसी पंडित को दे दी। सर ने कुछ भी अपने पास नहीं रखा।

मेरी राय में, यही किंडलिया स्वभाव है।
ज्ञान होना, पर मंच न माँगना।
योग्यता होना, पर श्रेय न लपकना।
काम सही होना—बस इतना काफ़ी है उनके लिये।

किंडलिये भी वही करते हैं। वे चाहें तो हार्डबाउंड की फोटो डाल सकते हैं। चाहें तो लिट-फेस्ट में जाकर नामचीन लेखकों के साथ फ्रेम में आ सकते हैं। लेकिन वे उस खेल में उतरते ही नहीं। इसलिए नहीं कि वे कर नहीं सकते—बल्कि इसलिए कि वे उसे ज़रूरी नहीं मानते।

एक अजीब-सी बात है। हार्डबाउंड और पेपरबैक की दुनिया में अभिजात्यता दिखाई जाती है। किंडलियों की दुनिया में अभिजात्यता अनुपस्थित रहती है—और शायद वही उसकी पहचान है। वे अपनी किताबें दूसरों के सामने नहीं रखते। वे अपने पढ़ने का प्रमाण नहीं देते। वे बस पढ़ते रहते हैं। कभी कोई किताब के बारे में कुछ उथला या गलत बोलता है तो प्रोफेसर कृष्णमूर्ति की तरह क्या सही है, बताते हैं; बिना कोई दिखावा किये।

और शायद इसी कारण, किंडलिये एक तरह से उत्तर एलिट काल के हैं। वे उस सामाजिक दौड़ से बाहर निकल चुके हैं जहाँ किताब भी स्टेटस सिंबल बन जाती है। उनके लिए किताब अब भी वही है—एक संवाद, एक टकराव, एक साथी।

GD Kindliya
ज्ञानदत्त किंडलिया

मेरी तरह उम्रदराज किंडलिये भी हैं — वे सत्तर प्लस के होने पर पढ़ने की जगह किताबें सुनने भी लगे हैं। किंडल या और कोई ई-रीडर किताब सुनने की सुविधा भी देता है। वे आंखें बंद कर मशीनी आवाज में हिंदी या अंगरेजी की किताब सुनते हैं। ज्यादा इमर्सिव रीडिंग करनी हो तो बच्चों की तरह सुनते हुये पढ़ते हैं।

यह भी सच है कि किंडलिये संख्या में बहुत नहीं होंगे। वे शोर नहीं करते, इसलिए गिने नहीं जाते। लेकिन (मेरा अनुमान है) वे धीरे-धीरे बढ़ रहे हैं। जैसे-जैसे किताबें महँगी होती जा रही हैं, जैसे-जैसे साहित्यिक आयोजन ज़्यादा प्रदर्शन-प्रधान होते जा रहे हैं, वैसे-वैसे कुछ लोग चुपचाप उस दुनिया से हटकर अपनी अलग दुनिया बना रहे हैं।

वहाँ न शोकेस है, न दक्षिणा की होड़। बस मंत्र ठीक पढ़ा जा रहा है।

और शायद—बस शायद—यही पढ़ने का सबसे सभ्य रूप है।

@@@@@@@

@@@@@@@

इकराम अंसारी


वह आदमी दुबला सा, गौरैया जैसा था। ओरोंथोलॉजिस्ट सलीम अली की तरह— शांत, पर्यवेक्षक। स्पेंसर्स के सुपर बाजार में अपनी बुर्का पहने पत्नी के साथ। ट्रॉली नहीं लिये था, एक बास्केट में थोड़ा सामान लेने आये थे दंपति।

मेरी ओर देखा तो मैने कह दिया – आपकी पर्सनालिटी बहुत आकर्षक लग रही है।”

वे मुस्कुराए, बड़ी गर्मजोशी से हाथ मिलाया। नाम बताया—इकराम अंसारी। भदोही में ही रहते हैं। नया बाजार में।

उनकी उम्र उनकी पत्नी ने बताई 75 प्लस। मैने अपनी बताई – सत्तर प्लस। उनकी बेगम इस अचानक मुलाकात से खुश नजर आ रही थीं।

बस।
कोई धर्म-चर्चा नहीं।
कोई राजनीति नहीं।
कोई ज्ञान नहीं बघारा – न उन्होंने न मैंने।

अपरिचित व्यक्ति, पर एक छोटी बातचीत दोनो को प्रसन्न कर गई!

आजकल हिन्दू–मुसलमानों के बीच बड़ी खाई हो गई है। यह बात आंशिक रूप से सही भी है।
लेकिन मुझे लगता है—खाइयाँ नारे से नहीं, अनुभव से भरती हैं।

कभी अगर इकराम जी की किसी महफ़िल में हिन्दुओं को लेकर कड़वी बात चले, तो शायद वे इतना कह सकें—
“नहीं, एक सज्जन अच्छे भी मिले थे स्पेंसर्स के मार्केट में।”

और कभी मेरी किसी बातचीत में मुसलमानों को एक ही रंग में रंगने की कोशिश हो, तो मेरे दिमाग में भी इकराम साहब का ‘सलीम अली’ वाला चेहरा आ जाएगा।

समाज को जोड़ने का काम बड़े भाषण नहीं करते,
छोटे, सच्चे मानवीय क्षण करते हैं।

आज का दिन ऐसा ही एक छोटा क्षण दे गया।
बस, साझा कर लिया। 🌱

इकराम अंसारी और उनकी बेगम

@@@

शायद समाज को जोड़ने के लिए हमें बहुत कुछ करने की ज़रूरत नहीं होती।
कभी-कभी बस इतना काफ़ी होता है कि हम सामने वाले को पहले एक इंसान की तरह देखें,
फिर बाकी पहचानें अपने-आप अपनी जगह पर आ जाती हैं।
सुपरमार्केट जैसे साधारण स्थानों में, ऐसे साधारण क्षण
चुपचाप याद दिला जाते हैं कि सामाजिक रिश्तों की मरम्मत
अक्सर बहुत छोटे औज़ारों से हो जाती है।

आज का दिन ऐसा ही एक छोटा औज़ार दे गया।

@@@@@@@

पक्षियों के बहाने बाभन की दशा — न लड़ सकते हैं, न आरक्षण है उनके लिये


इतिहास बताता है कि चुप वर्ग सबसे पहले टूटता है, और सबसे देर से सुना जाता है।

हमारे घर में, हर सुबह आँगन में बिखरे फीके नमकीन पर जो दृश्य बनता है, वह प्रकृति का खेल नहीं लगता, एक छोटा-सा समाज लगता है।

कौव्वे तेज़ी से आते हैं, तेज़ी से खाते हैं और ज़्यादा ले जाते हैं। उन्हें रोकने के लिये डंडा रखना पड़ता है, यानी शक्ति को शक्ति से संतुलित करना पड़ता है। चरखियाँ समूह में आती हैं, और समूह ही उनका अधिकार-पत्र होता है; वे किसी दाने को साझा करने की वस्तु नहीं मानतीं, उसे अपने लिये आरक्षित मान लेती हैं। यह सब स्वाभाविक लगता है, जब तक निगाह बुलबुल और रॉबिन पर नहीं जाती।

बुलबुल और रॉबिन मीठा गाती हैं, पर दाने के समय चुप रहती हैं। वे न तो भीड़ में घुस सकती हैं, न किसी को डराकर हटा सकती हैं। उनके लिये न गति हथियार है, न संख्या, न आक्रामकता। आप चाहकर भी उनकी सहायता नहीं कर पाते, क्योंकि जो दाना आप उनकी ओर फेंकते हैं, उस पर भी पहले वही क़ब्ज़ा कर लेते हैं जो पहले से ताक़तवर हैं। यह असमर्थता किसी एक व्यक्ति की नहीं, पूरी व्यवस्था की है।

यहीं से पक्षियों का दृश्य समाज में बदलने लगता है। भारत की सामाजिक संरचना में भी कुछ वर्ग ऐसे हैं जो न तो संघर्ष की भाषा जानते हैं, न भीड़ की राजनीति कर सकते हैं। वे अपनी दरिद्रता को नैतिक प्रश्न बना लेते हैं, अधिकार का नहीं। वे माँगने को अपमान मानते हैं, और लड़ने को अपनी प्रकृति के विरुद्ध। मेरे मत में यही वर्ग सबसे अधिक असुरक्षित होता है, क्योंकि वह किसी भी वितरण-प्रणाली के लिये अदृश्य रहता है।

बुलबुल हाशिये पर
हाशिये पर बुलबुल

गरीब बाभन की स्थिति कुछ ऐसी ही है। वह न परम्परागत शक्ति-संरचनाओं में बचा है, न नई प्रतिनिधित्व-आधारित राजनीति में समाया है। उसके पास न तो संख्या का बल है, न संगठन की आदत, न आक्रोश का वैध मंच। वह मान लेता है कि आरक्षण “उसके लिये बना ही नहीं”, और इसी मान्यता के साथ वह अपने को चर्चा से बाहर कर देता है। यह आत्म-बहिष्कार किसी नीति से कम क्रूर नहीं।

समस्या यह नहीं कि उसे कुछ मिलता नहीं; समस्या यह है कि उसके लिये “मिलना” कोई नैतिक रूप से स्वीकार्य स्थिति ही नहीं रह जाती। जैसे बुलबुल दाना माँग नहीं सकती, वैसे ही यह वर्ग अपने अभाव को मांगपत्र में बदल नहीं पाता। उसे लगता है कि अगर वह माँगेगा, तो उसकी सांस्कृतिक पूँजी भी गिर जायेगी। इस डर का समाज में कोई उपचार नहीं है, क्योंकि नीति भय नहीं देखती, केवल आँकड़े देखती है।

चरखियाँ दाना आरक्षित मानती हैं, क्योंकि उन्हें आरक्षण की भाषा आती है। कौव्वे डर पैदा करते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि संसाधन डर से सुरक्षित होता है। मैना थोड़ी लड़ लेती है, क्योंकि वह मोल-भाव की राजनीति समझती है। गिलहरी सबके बीच निडर होकर खा लेती है, क्योंकि उसके पास अपने होने का सहज आत्मविश्वास है। बुलबुल और रॉबिन के पास इनमें से कुछ भी नहीं है—न डर, न दावा, न संघर्ष, न आरक्षण।

मेरे मत में आज का भारत इन्हीं बुलबुलों और रॉबिनों को समझने में असफल है। हम या तो आक्रामक वंचना को पहचानते हैं, या संगठित असंतोष को। जो वर्ग चुप है, जो नैतिक है, जो “लाइन में खड़ा” है—वह स्वतः मान लिया जाता है कि ठीक होगा। लेकिन इतिहास बताता है कि चुप वर्ग सबसे पहले टूटता है, और सबसे देर से सुना जाता है।

यह लेख किसी के पक्ष में नहीं, एक असुविधाजनक खाली जगह की ओर इशारा है। जैसे आँगन में बिखरे नमकीन के बीच कुछ पक्षी हमेशा भूखे रह जाते हैं, वैसे ही हर खुली अर्थव्यवस्था में कुछ वर्ग हमेशा बाहर रह जाते हैं। वे किसी के शत्रु नहीं होते, पर किसी के एजेंडा में भी नहीं होते। और शायद यही उनकी सबसे बड़ी त्रासदी है।

आज का भारत भी उसी मोड़ पर खड़ा है, जहाँ नीति लड़ने वालों के लिये है, और नैतिकता देखने वालों के लिये। बुलबुल और रॉबिन फिर भी गाती हैं। सवाल यह नहीं कि उनका गीत सुना जायेगा या नहीं। सवाल यह है कि क्या उनके लिये कभी दाना भी बचेगा।

@@@@@@@

Design a site like this with WordPress.com
Get started