धनरा भुंजईन की भरसायँ 


दूध लेते जाते मैं रोज वह पत्तियों का ढेर और भरसायँ देखता था। 

भरसायँ यानी मिट्टी का वह गोलाकार चूल्हा जिसमें दाना — चना, मक्का — भूना जाता है। गाँव में अभी भी दिख जाती है सड़क किनारे।

मुझे रोज यह भी नजर आता है कि पत्तियों का जखीरा बढ़ रहा है। पर दाना भूनने वाली भुंजईन को आज पहली बार देखा। साइकिल रोक कर उससे बात की।

वह कुछ पेशोपेश में दिखी। लगा कि मैं सरकारी जमीन पर — सड़क किनारे भरसायँ बनाने के लिये उसको दोषी ठहराऊंगा। पर जब लगा कि मैं अपनी जिज्ञासायें शांत करने के लिये उससे बात कर रहा हूं तो उसका भाव बदल गया। 

धनरा की भरसायँ
धनरा और उसकी सड़क किनारे भरसायँ

हाथ जोड़ कर बोलने लगी कि वह गरीब है, उसका कोई नहीं। यही दाना भूंज कर काम चलाती है। उसका नाम धनरा है और वह करहर की रहने वाली है — करहर यहां से तीन किलोमीटर दूर है। बगल की बगिया में पत्तियां ज्यादा मिलती हैं, इसलिये यह जगह उसने चुनी भरसायँ बनाने के लिये। 

वह बताती जाती थी और हर दूसरे वाक्य के बाद अपनी गरीबी – बेसहारगी को भी अंडरलाइन कर रही थी। 

उसने अपनी भाषा में भरसायँ का तरीका समझाया। एक ओर से नीचे से अंदर पत्तियां झोंकती है। झोंकने के पहले झाड़ियों की डंठल से बनी झाड़ू से उन्हे थपथपा कर दबाती है। भरसायँ के मुख्य चेंबर में पत्तियां जलती हैं और वह उसके सामने प्लेटफार्म पर बैठ तसले में दाना भूनती है। 

मुख्य चेम्बर से जुड़ा एक L आकार का छेद है, जिसपर दो ईंटें रखी हैं। यह छेद मुख्य चेम्बर में ऑक्सीजन/हवा नियंत्रित करता है। वह एक ईंट हल्की सी सरका कर यह नियंत्रण करती है। पर इस तकनीक को वह समझा नहीं पाती। हांथ हिला कर बताती है— एहर क हवा होये त ओहर जाये। ओहर क होये त एहर जाये। 

सदियों-सहस्त्राब्दियों की तकनीक है। चाल्कोलिथिक काल में भी ऐसे चूल्हे –  भरसायँ मिले हैं। धनरा के पास यह तकनीक उस काल से है — आज से 4-5 हजार साल पहले से। वह इस्तेमाल जानती है पर उसकी थ्योरी समझा पाना उसके बस का नहीं है। 

मुझे लगता है कि अगर मेन चेम्बर में ऊपर से थोड़ा नीचे तिरछे छेद हों तो ऊपर से हवा का एक और रास्ता मिल जाएगा। धुआँ कम निकलेगा, ईंधन की बचत और बढ़ेगी। धनरा का जुगाड़ू चूल्हा तब और पक्का हो जाएगा। 

धनरा का चूल्हा – भरसायँ अभी भी अच्छा है। पर तब शायद और बेहतर बन जाये। 

अमेजन पर लकड़ी का चूल्हा

अमेज़न पर एक लकड़ी का चूल्हा आजकल दिखता है — ढाई हज़ार का। कहता है सामान्य चूल्हे से 30% धुआँ और 65% बेहतर गर्मी। अगर यह सच है तो धनरा का जुगाड़ू चूल्हा 50-60% तो पहुँचता ही होगा — सिर्फ मिट्टी और मेहनत से — बिना एक छदाम खर्च किये।

धनरा अपनी गरीबी का रोना रोती रही। मेरे पास उससे सहानुभूति का कोई और तरीका नहीं था — मैने जेब से 50 रुपये का नोट निकाल कर उसे दिया। इतनी बातचीत, इतने डिमॉन्स्ट्रेशन के बाद शायद उसे उम्मीद भी थी कि कुछ मिल जायेगा उसे। 

जानकारी ले, लेखन के मसाले को नोटबुक में लिख मैं चला आया। सवेरे की सैर आज सार्थक हुई।

— ज्ञानदत्त पाण्डेय, विक्रमपुर, भदोही, 20 अप्रेल 26 


महामृत्युंजय पाठ का भंडारा – अगियाबीर की एक शाम


महामृत्युंजय पाठ के बाद भंडारा 

कल प्रेमनारायण मिश्र जी रात पौने नौ बजे आये। वे चित्रकूट धाम से लौट रहे थे और आज होने वाले भंडारे का निमंत्रण देने आये थे। रात का समय, यात्रा की थकान, और उसके बावजूद उनका आग्रह—इससे ही आयोजन का भाव समझ में आ रहा था।

प्रेमनारायण जी के यहां सात दिवसीय महामृत्युंजय मंत्र-जाप हुआ था। सात पंडित एक साथ बैठकर मंत्र का पाठ करते हैं—एक पंडित एक दिन में लगभग आठ घंटे लगाकर करीब 3000 जप करता है। इस तरह कुल मिलाकर डेढ़ लाख बार मंत्र का उच्चारण हुआ। यह संख्या सुनने में जितनी बड़ी लगती है, उतनी ही बड़ी उसकी साधना भी रही होगी।

जप की समाप्ति पर मनौती के अनुसार प्रेमनारायण जी चित्रकूटधाम हो कर आये और अगले दिन भंडारा रखा। परम्परा में यह क्रम जैसे स्वाभाविक रूप से जुड़ा हुआ है—जप, तीर्थ और फिर सामूहिक भोजन।

अपने घर उन्होंने बड़े आदर से मुझे बिठाया। भोजन का आग्रह किया, पर उसी दिन मेरे दांत का कैपिंग हुआ था और डेंटिस्ट साहब ने मोलर दांत पर जोर न देने को कहा था। सो मैंने भोजन के बजाय चाय ली। आधा-पौना घंटा रुक कर वापस लौट आया।

मिश्र जी का घर अगियाबीर के एक टीले पर है। अगियाबीर नियोलिथिक काल की उत्खनन साइट है—यह भी सम्भव है कि उनके घर के नीचे तीन-चार हजार साल पुरानी सभ्यता के अवशेष हों। उनके घर के आसपास पहली सदी की ईंटें बिखरी मिल जाती हैं। कुछ लोगों ने उनका उपयोग अपने मकान या बाड़ बनाने में कर लिया है। गंगा नदी उनके घर से लगभग दो सौ मीटर की दूरी पर है।

उनके ओसारे में बैठा था तो गौरैयों की चहचहाहट साफ सुनाई दे रही थी। वहां हर बार जाने पर एक साथ दो अनुभूतियाँ मिलती हैं—प्राचीनता और प्रकृति। एक तरफ इतिहास की परतें, दूसरी तरफ जीवन की सहज ध्वनियाँ।

महामृत्युंजय पाठ का कारण भी उन्होंने बताया। विगत कुछ समय में दो दुर्घटनाएँ उनके साथ घटी थीं और दोनों में उनका सकुशल बच जाना, उनके अनुसार, आश्चर्य से कम नहीं था। वे इसे ईश्वर की कृपा मानते हैं और उसी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिये उन्होंने यह जाप करवाया।

जाप के बाद समाज को भंडारे के माध्यम से जोड़ना इस देशकाल की परिपाटी है। हालांकि अब भंडारों का स्वरूप बदल रहा है—केटरर, बफे और एक तरह की व्यवस्थित दूरी। आयोजक हाथ बांधे खड़े रहते हैं और लोगों से बातचीत का समय मिलता है।

पर मिश्र जी के यहां परम्परा अभी जीवित है। लोग पांत में बैठते हैं और भोजन परोसने के लिये घर और आसपास के दर्जन भर—या उससे भी अधिक—नौजवानों की टीम लगी थी। वह टीम इतनी मुस्तैदी से काम कर रही थी कि कहीं कोई अव्यवस्था नजर नहीं आई।

मैं अगियाबीर के ही अपने मित्र गुन्नीलाल पांडेय जी के साथ वहां गया था। वहां एक शुक्ल जी भी थे—सतहत्तर साल की उम्र में मिर्जापुर से गंगापुल पार कर अपने स्कूटर से आये थे। इतनी उम्र में भी लोग 30–40 किलोमीटर स्कूटर चला रहे हैं—यह देख कर लगा कि अपने स्वास्थ्य को ऐसा बनाये रखना चाहिए कि गतिशीलता बनी रहे।

वापस लौटते समय प्रेमनारायण मिश्र जी ने आग्रहपूर्वक भोजन की पोटली—मिठाई के साथ—बांध दी। यह कहते हुए कि अगर मैं नहीं खा सकूंगा तो दीदी तो प्रसाद ले ही सकेंगी। यह आग्रह भी उस परम्परा का हिस्सा है जिसमें भोजन केवल भोजन नहीं रहता, प्रसाद बन जाता है।

गाँव-देहात में — और पूरे भारत में भी — जाप, भंडारा, भोजन, प्रसाद — सब ईश्वर से जुड़ा है। सेकुलर और रिलीजियस जीवन के बीच कोई स्पष्ट रेखा नहीं — या है भी तो बहुत धूमिल, बहुत झीनी। और शायद यही स्वाभाविक भी है — सहस्राब्दियों से मनुष्य इसी श्रद्धा के बल पर जीता आया है। यह आधुनिक  तर्कशास्त्र से परे है; पर जीवन से गहरे जुड़ी इस आस्था को सिरे से खारिज करना सरल नहीं है।

एकबारगी मन में आता है — मैं कोई बड़ा आयोजन तो नहीं कर सकता, पर घंटा-डेढ़ घंटा रोज़ देते हुए एक साल में डेढ़ लाख महामृत्युंजय पाठ कर सकता हूँ। हो सकता है कोई विलक्षण अनुभूति हो — जैसी प्रेमनारायण जी कह रहे थे। और हो सकता है न भी हो। पर यह यात्रा तो की जा सकती है।

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

— ज्ञानदत्त पाण्डेय
विक्रमपुर, भदोही
15/16 अप्रेल 2026

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पूरन वर्मा की झंझरी


Pooran Verma Pottery Shop

 < गांवदेहात डायरी >

तापक्रम चालीस डिग्री छूने लगा है। अब मिट्टी का मटका लेने का समय आ गया है। बाबू सराय में अमूल दूध वाले महेंद्र सिन्ह जी से पूछा—“आसपास कहीं मटकी की दुकान है? टोंटी लगी मटकी वाली?” उन्होंने बताया—“आगे करीब दो सौ मीटर पर एक दुकान है, अच्छी-अच्छी मिट्टी की चीजें मिलती हैं।”

परसाल गांव की कोहांइन एक मटकी दे गई थीं—अजीब सी शक्ल वाली। फेसबुक पर एक प्रजापति मित्र ने बताया था कि वह “गनटेढ़ी मटकी” है। पानी वह भी खूब ठंडा करती थी, पर उस विकलांग आकार से अपनापन नहीं बन पाया। इस बार तय था—मटकी ऐसी हो जो पानी भी ठंडा रखे और देखने में भी सुघड़ लगे। आखिर अब फोटो भी तो खिंचती है, और सोशल मीडिया पर जाती है।

दुकान मिली—पूरन वर्मा मिट्टी बर्तन भंडार। वहां तरह-तरह की चीजें थीं—मिट्टी के घड़े, घरिया, तसले, झांझर, अगरबत्ती स्टैंड, दीये जलाने के पात्र… और भी बहुत कुछ। गांवदेहात की इस दुकान में यह विविधता देखकर मन प्रफुल्लित हो गया। लगा कि अब ऐसी चीजों के लिए बनारस या प्रयागराज जाने की जरूरत नहीं रहेगी। घर में भी सुविधाएं बढ़ेंगी—पत्नीजी को हर साइज के गमले यहीं मिल जाएंगे।

मटकी दो तरह की दिखीं—एक भारी, दूसरी हल्की। पूरन जी ने बताया कि हल्की वाली “झंझरी” है, जिसमें रेत का अनुपात ज्यादा होता है। उसमें पानी ज्यादा ठंडा होता है, लेकिन मजबूती थोड़ी कम होती है। हमने झंझरी ही पसंद की—टोंटी लगी हुई, उपयोग में भी सुविधाजनक। साथ में वहीं से झंझरी रखने का प्लास्टिक का स्टैंड भी लिया। 

इसके साथ दही जमाने के लिए एक घरिया ली—उसका ढक्कन भी सुघड़ बना था। चिड़ियों के लिए पानी रखने को एक तसला भी लिया। अब घर-परिसर में ऐसे चार-छ तसले अलग-अलग जगह रखे जा सकेंगे—एक छोटा-सा जलस्रोत बनता हुआ।

पूरन जी के पास मिट्टी के हैंडल वाले पकाने के बर्तन और तवे भी थे। मन ललचाया, पर अब घर में खाना गैस की बजाय इंडक्शन पर बनने लगा है। सो संदेह रहा कि मिट्टी के बर्तन उसमें काम आएंगे या नहीं। इस पर अलग से जानकारी लेनी होगी।

पूरन जी के बेटे नीरज से बातचीत में पता चला कि पास के गुड़िया गांव में उनके परिवार और बस्ती के लोग मिट्टी के बर्तन बनाते हैं। पहले हाथ से चलने वाले चाक का इस्तेमाल होता था, अब बिजली से चलने वाले चाक आ गए हैं। नीरज ने बताया कि सरकार की योजना के तहत 15–20 परिवारों को ऐसे चाक और मिट्टी गूंथने की मशीनें मिली हैं—मुफ्त, इस शर्त पर कि वे पहले से इस काम में लगे हों।

गुड़िया गांव में छोटी चीजें बनती हैं, जबकि बड़े बर्तन चुनार के पास अहरौरा से आते हैं, जहां बड़ी भट्टियां हैं—जमीन में गड्ढा बनाकर उसमें आंवा लगाया जाता है और बर्तन पकाए जाते हैं।

नीरज ने कहा—“गांव आइए, पर सुबह छह-सात बजे। काम उसी समय होता है।” यह निमंत्रण भी एक नई यात्रा का संकेत है।

टोंटी वाली झंझरी  ₹180 में मिली। पहले लगा कि कीमत कुछ ज्यादा है, पर जब नीरज ने बताया कि यह तीन हिस्सों में बनती है—नीचे और बीच सांचे से, ऊपर का मुंह चाक पर—फिर तीनों जोड़े जाते हैं, और ढक्कन अलग से बनता है—तो लगा कि कीमत बिल्कुल वाजिब है। मोलभाव करने का कोई औचित्य नहीं था।

फिर भी गांवदेहात की एक प्रवृत्ति है—बिना मोलभाव के खरीदना जैसे अधूरा सौदा लगता है। शायद यह हमारे व्यवहार के गुणसूत्र में है।

रिटायरमेंट के बाद गांव में रहते हुए एक दशक से ज्यादा हो गया, पर अब भी आसपास नई खोजें मिलती रहती हैं। पूरन वर्मा की यह दुकान भी ऐसी ही एक खोज है। आगे उनके गांव जाकर, उनके चाक और कारीगरी को देखना बाकी है।

गांवदेहात में रहने का रोमांच अभी खत्म नहीं हुआ है—बल्कि लगता है, हर खोज अपने साथ कई और खोजों के दरवाजे खोलती है।

— ज्ञानदत्त पाण्डेय
विक्रमपुर, भदोही
15 अप्रेल 2026

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