कालीन का कारीगर


गुन्नीलाल जी के यहाँ से लौट रहा था। सवेरे साढ़े आठ का समय। धूप अभी तीखी नहीं हुई थी।

सामने एक आदमी साइकिल पर था — सिर पर गमछे का फेंटा बाँधे, पीठ सीधी, पीछे कैरियर में टिफिन दबाया हुआ। चाल में जल्दी थी, पर थकान भी। मैंने बिजली की साइकिल तेज़ की और बगल में आ गया।

काम पर जा रहे हैं? — मैंने पूछा।

मेरी उम्र का असर था, या वह स्वभाव से ही विनम्र था — रुका नहीं, पर मुड़ कर देखा। बोला — जी। बाबू सराय की कारपेट फैक्टरी में। नौ बजे से शिफ्ट है।

बातचीत का दरवाज़ा खुल गया।

नाम पूछा — जीवन लाल। करहर के।

बाबूसराय के हाईवे की उत्तर पट्टी पर बरनवाल कारपेट का कारखाना है। जीवन लाल वहाँ फिनिशिंग का काम करते हैं। गाँव-गाँव से लोग कालीन बुन कर लाते हैं — क्वालिटी के हिसाब से भुगतान होता है। उसके बाद जीवन लाल जैसे पाँच-सात किस्म के फिनिशर उसे सजाते-सँवारते हैं। सुपरवाइज़र अप्रूव करता है। तब कालीन बिकने जाती है।

कहाँ जाती है? — मैंने पूछा।

देस में कहाँ बिकेगी — जीवन लाल ने कहा — ज़्यादातर बाहर जाती है।

यहाँ गंगा किनारे के गाँवों में — गड़ौली, कमहरिया, करहर — बुनी गई, बाबू सराय में फिनिश हुई कालीन जर्मनी या अमेरिका के किसी ड्राइंग रूम में बिछती है।

जैसे मेट्रो सिटी में हाई राइज़ लग्ज़री फ्लैट बनाने वाला कारीगर उनमें एक रात गुज़ारने का सपना नहीं देख सकता — उसी तरह यह बारह-पंद्रह साल पुरानी जंग लगी साइकिल वाला जीवन लाल अपने घर में वह कालीन बिछाने की कहाँ सोच सकता है।

नौ से छः की ड्यूटी है। एक से दो के बीच लंच ब्रेक। तब वह यही टिफिन खोलेगा — शायद अकेले, शायद साथियों के साथ। यह मैं पूछ न सका।

पूछना चाहता था — चाय मिलती है बीच में? आपस में गप-सड़ाका होता है? — पर जीवन लाल अचानक रुक गये।

यहाँ मुझे पाँच मिनट का काम है…

मैं आगे निकल आया।

पर वह जंग लगी साइकिल मन में अटकी रही — उस कालीन की तरह जो बिछती है जर्मनी के ड्राइंग रूम में, बुनी जाती है गंगा किनारे के किसी अँधेरे कमरे में। और फिनिश करता है जीवन लाल — जिसका चेहरा हम नहीं जानते, जो गमछे से सिर ही नहीं मुंह भी ढंके रहता है।


सिब्बू गुरू की बारात


Near Ganga River

आज साइकिल गुन्नीलाल जी के यहाँ मुड़ गई। ग्वाले के यहाँ से वे दूध ले कर आ चुके थे। नीम की छाँव में अपना मोबाइल स्क्रॉल कर रहे थे। मुझे देख कर उठे, स्वागत किया। नीम के नीचे ही कुर्सी और टेबल लाये — धूल साफ कर बिठाया। तब बातचीत शुरू हुई।

बोले — साहेब, बिआह-बरात-दुआर का सीजन शुरू हो गया है। ढेरों निमंत्रण मिल रहे हैं। जाना पड़ रहा है। समय भी लग रहा है और पैसा भी।

क्या रेट है? सौ रुपया? — मैंने पूछा।

गुन्नीलाल जी ने बताया — सौ का रेट पुराना हो गया। अब डबल हो गया है। दो सौ एक से कम काम नहीं चलता। महीने में पाँच-दस बरात-दुआर हो गये तो हज़ार-दो हज़ार निकल जायेंगे।

मैंने पूछा — पहले कितना रेट था? आपके बचपन में?

बोले — सन 1965 में एक रुपया रेट था। जो ज़्यादा रईस हो, वह दो रुपया देता था। मुसहर के बनाये दोना में बुनियाँ मिलती थी पानी पीने को। कोई ज़्यादा किया तो साथ में एक फाँक नमकीन भी। बराती का स्वागत भी यही होता था — पानी पिलाने में।

फिर उन्होंने मेरे हाथ को हल्के से थपकाया — एक मज़ेदार किस्सा बताता हूँ। सन 1967 की बात है। सिब्बू गुरू की बरात जा रही थी गंगा पार। दो असवारी थीं उसमें। असवारी माने पालकी।

एक असवारी में घर का बुज़ुर्ग बैठा था, दूसरी में दुलहा — यानी सिब्बू गुरू। सिब्बू गुरू छः फुट के थे, लम्बे-चौड़े। बम्बई में ट्रक चलाते थे। वज़न बहुत ज़्यादा था। लूटाबीर के किनारे पहुँची बारात — दो असवारी और पचास हम लोग, पैदल। उछलते-कूदते हनुमान जी की सेना की तरह। पर भारी शरीर होने के कारण सिब्बू गुरू की असवारी की डांड़ टूट गई।

फिर क्या हुआ? — मैंने पूछा।

गंगा किनारे बाँस काटा गया। एक नई डांड़ बनी। असवारी नाव से गंगा उस पार गई। हम लोग भी नाव से गंगा पार किये। ससुराल उस पार के गंगा किनारे के गाँव में ही थी, तो ज़्यादा पैदल नहीं चलना पड़ा।

हम सब मन ही मन सोच रहे थे कि बुनियाँ-नमकीन से स्वागत होगा। पर घराती ज़्यादा ही गरीब थे। दोना में सिर्फ दो-तीन बताशे मिले।

गुन्नीलाल जी बोलते रहे, नीम की पत्तियाँ हिलती रहीं। मैं सोच रहा था — यही गंगा है, यही किनारा है लूटाबीर का। वहीं कहीं सिब्बू गुरू की पालकी की डांड़ टूटी थी।

फिर गुन्नीलाल जी बदलाव पर आये — ये देखो साहेब, कितना अंतर आ गया है। अब बरात वालों का स्वागत छेना की मिठाई, गुलाब जामुन, काजू-बादाम वाली नमकीन और कोल्ड-ड्रिंक या कॉफी-चाय से होने लगा है। कोई कितना भी दरिद्र हो, बताशे की सोच ही नहीं सकता।

मैंने पूछा — सिब्बू गुरू अभी हैं?

नहीं, अब नहीं रहे। उनके भाई जद्दू गुरू भी ऊपर चले गये। पर अगली पीढ़ी बम्बई में ड्राइवरी करती है। सिब्बू पाँच-दस टन के ट्रक चलाते रहे होंगे — अब वाले कम से कम तीस टनर लेकर चलते हैं। एक-दो ने तो अपने ट्रक भी खरीद लिये। डांड़ टूटने वाली पालकी से तीस टन तक — यही तो सफर है। जलवा हो गया है।

तब दुआर करने का रेट एक रुपया था, अब दो सौ के पार भाग रहा है।

अब स्वागत में बताशे का ज़माना तो कभी नहीं आयेगा!


घड़ी, साइकिल, बाजा बनाम राइडर


मेरे बचपन में दहेज का मानक था — घड़ी, साइकिल और बाजा – रेडियो। तेल से चुआती जुल्फी टेये नई शादी वाला दुलहा गांव में साइकिल ले कर घड़ी पहने और रेडियो पर बिनाका गीत माला सुनता निकलता था। जलवा होता था।

अब समय बहुत बदल गया है। बगल में शादी तय हुई है। छेकईया में — तिलक की रस्म में — सब तय-तमाम हुआ है। पर लड़का मुंह फुलाये है। मोटर साइकिल में जो ब्रांड देने को कहा है लड़की के पिता ने, वह उसे पसंद नहीं — उसे तो कोई नई ब्रांड की राइडर चाहिये। लड़की इंटर पास है। लड़के से एक दर्जा ज्यादा पढ़ी है; पर उससे क्या। मोटर साइकिल पर पीछे बिठा ले चलेगा तो राइडर वाला जलवा थोड़े होगा — चाहे वह कितनी भी पढ़ी हो।

लड़कियां अब ज्यादा पढ़ रही हैं, ज्यादा योग्य हैं। पर बाज़ार अभी भी वही है — दहेज लड़की वाला ही देता है। यही पहेली मेरी समझ में नहीं आती।

साइकिल से निकलता हूँ तो गाँव की गलियों में मोटर साइकिलें ही मोटर साइकिलें दिखती हैं — खड़ी भी, दौड़ती भी। बाज़ार में चलने की जगह नहीं। लोन पर ले कर दहेज में मोटर साइकिल देना आसान हो गया है। ऋणम कृत्वा घृतम पिबेत।

कई-कई गांवों में लड़कों की शादी नहीं हो रही। कोई पूछने वाला ही नहीं आता। पहले तो घर के सामने बंधे दो बैल और एक गइया शादी के लिये नेसेसरी और सफीशियेंट कंडीशन होती थी। अब वह नहीं रहा। अब नौकरी — भले ही बम्बई में होटल में बेयरा की हो — ज़रूरी है। लिहाजा, बेरोजगारी के जमाने में कई बिना शादी के रह जा रहे हैं। इंतजार में अधेड़ हो जा रहे हैं। और दहेज फिर भी लड़की वाला ही दे रहा है।

बहुत सम्भव है आज से दस साल बाद जेन-अल्फा का नौजवान बेरोजगार हो; सरकार की यूनिवर्सल बेसिक इनकम पर जिंदा हो; पर चलता दहेज में माँगे चार चक्का पर ही हो।

दरअसल मामला मोटर साइकिल का है ही नहीं। मामला इज्ज़त और हैसियत का है। लड़की का बाप दहेज देकर इज्ज़त खरीदता है — लड़का दहेज लेकर हैसियत जताता है। राइडर वाली मोटर साइकिल उस पूरे समीकरण में = का चिन्ह लगाती है।

घड़ी-साइकिल-बाजा का ज़माना गया। चिन्ह वही रहा।


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