करिया पासी की नेगेटिविटी


गांवदेहात डायरी

करिया पासी
करिया पासी

मैंने शायद ही कभी करिया पासी को प्रसन्न देखा हो। सर्दी, गर्मी, बरसात—सबमें वह समभाव से नेगेटिव ही रहता है। मेहनती है, पर दऊ (भगवान) को हमेशा कोसता पाया जाता है।

आज वह खेत के किनारे मिला। सरसों और गेंहू की फसल अच्छी लग रही थी। लगा कि आज तो खुश होना चाहिये उसे।

मैंने पूछा— “फसल तो अच्छी लग रही है!”

“हां, मटरहिया घास चौपट कर दे रही है।” — उसने ठुड्डी खुजाते कहा। फिर दो और कारण जोड़ दिये—
“लिल्लीगाई एहर से भगावअ त ओहर से आई जात हईं। अब सरसईया काटे क टाइम बा त आधा दाना खेत में ही झरि जात बा।”

मैंने देखा— सामने लहलहाती फसल खड़ी थी और करिया उसकी कमियाँ गिना रहा था।

करिया का भाग्य शायद कभी उज्जर नहीं हो सकता।

मैंने पूछा— “मटरहिया घास कैसी होती है?”

उसने खेत से उखाड़ कर दिखाई। सचमुच मटर जैसी लग रही थी। छोटी-छोटी फलियाँ, जैसे किसी ने मटर को सिकोड़ दिया हो।

आदमी ने सहस्त्राब्दियों में लगभग हर घास को परख कर देख लिया होगा—पत्तियों की सब्जी बनाई होगी, दानों का आटा या बेसन पीसा होगा। जो किसी काम की नहीं निकलीं, वे अंततः बकरी-गाय के हिस्से में चली गईं।

करिया के लिये मटरहिया खरपतवार है—गेंहू और सरसों को दबाने वाली।
सुश्रुत के दृष्टिकोण से देखें तो कोई भी वनस्पति निरर्थक नहीं; सब औषध है।

पर करिया की नेगेटिविटी का इलाज करने वाली कोई औषध नहीं।
दस साल से उसे लगभग इसी भाव में देखता आया हूं।

मैंने उससे कहा— “मटरहिया घास का एक पौधा मेरी साइकिल की टोकरी में डाल दो। शांतिधाम पहुँच कर उसकी फोटो चैट जीपीटी को दिखाऊँगा और पूछूँगा—सुश्रुत उसकी उपयोगिता पर क्या कहते।”

वहाँ से चला तो एक बार पीछे मुड़ कर देखा।
करिया खेत में मटरहिया घास तलाश रहा था।

— नीलकंठ चिंतामणि
शांतिधाम, बरियापुर

17 मार्च 2026

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सुनील भाई ओझा के बाद गड़ौलीधाम 


गांवदेहात डायरी 

गड़ौलीधाम में ओमप्रकाश शर्मा जी और बटुक। रेखाचित्र।

सुनील ओझा जी का निधन 29 नवम्बर 2023 को हुआ। उसके बाद से मेरा गड़ौलीधाम जाना नहीं हुआ।

गड़ौलीधाम सुनील भाई का ड्रीम-प्रॉजेक्ट था। इसके जरिये वे गांवदेहात की सूरत बदलने की सोचते थे। यहां एक गौशाला होती, एक चिकित्सालय, एक शिव मंदिर। आसपास के वृद्धों को भोजन उपलब्ध कराने की व्यवस्था। मैं जब भी उनसे मिलता था, उनके पास इलाके के बदलाव के लिये कोई न कोई योजना रहती थी—एक और योजना, एक और विचार।

हम दोनों एक ही साल—1955 की पैदाइश थे। वे मुझसे दो महीने बड़े थे। एक दिन बातचीत में हमने यह साझा किया कि मैं 103 साल जीने और कुछ करते रहने की इच्छा के साथ चलता हूं। उन्होंने कहा कि उनका भी ऐसा ही कुछ विचार है—वे 105 साल का प्लान रखते हैं।

पर वे 68 की उम्र में ही चले गये।

एक बार सवेरे की बातचीत में मैंने कहा था कि मैं अपनी साइकिल चलाकर रोज उनके धाम आया करूंगा। रोज उनसे बातचीत होगी और रोज मैं कुछ न कुछ लिखूंगा। गड़ौलीधाम पर पचास से ज्यादा पोस्टें ब्लॉग पर लिखूंगा।

पर जब वे नहीं रहे तो गड़ौलीधाम जाना भी बंद हो गया। अब देखता हूं तो उस विषय पर कुल 18 पोस्टें हैं। पचास पूरी होने के लिये भी 32 और होनी चाहिये थीं, पर सुनील भाई के असामयिक निधन और गड़ौलीधाम परियोजना में आये व्यवधान के कारण गाड़ी वहीं रुक गई।

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गड़ौलीधाम पर पहले लिखी मानसिक हलचल ब्लॉग पर पोस्टों की सूची इस पेज पर देखें – 👉 https://gyandutt.com/gagaulidham/

पिछले महीनों शैलेश आये थे और वे जाते हुए गड़ौलीधाम होते गये। उन्होंने मुझे सुझाया कि मैं वहां के चक्कर लगाऊं। वहां कांची पीठ के शंकराचार्य के संस्थान के साथ कोलाबोरेशन हुआ है। एक गुरुकुल प्रारम्भ हुआ है जहां वेद अध्ययन करने वाले बटुक हैं। गौशाला है और एक चिकित्सालय बनने जा रहा है।

तब भी मैं गया नहीं। आज उस बात को महीना भर से ज्यादा हो गया था। पर अचानक आज मेरी साइकिल गड़ौलीधाम की ओर मुड़ ही गई।

वहां शिवजी के मंदिर पर ओम प्रकाश मिश्र जी मिले, जो पूजा-अर्चना कर रहे थे। उन्होंने मुझे भी तांबे के लोटे में जल दिया शिवलिंग पर चढ़ाने के लिये। फिर हॉल में बैठने को कहा और मेरे लिये चाय भिजवाई। पूजा पूरी कर उन्होंने मुझे तिलक लगाया और प्रसाद दिया। उनका स्नेह और आदर पाकर मैं अभिभूत हो गया।

हॉल में आठ बटुक दरी पर बैठे अपनी नोटबुकों में ऋचायें लिख रहे थे। सब अलग-अलग जगहों से आये थे—बिहार, रीवा, शोणभद्र… पाँच नये थे, जिन्हें आये लगभग एक साल हुआ था। तीन उनके सीनियर थे। सभी धोती पहने हुए और माथे पर त्रिपुंड लगाए।

लिख तो वे बॉलप्वाइंट पेन से रहे थे, पर उनकी लिखावट सुगढ़ थी। उनमें बालसुलभ चपलता भी थी। मौका पाकर वे मेरी बैटरी वाली साइकिल का हॉर्न बजा कर, बत्ती जला कर देखने लगे। मुझसे उन्होंने उसके चलने का तरीका भी पूछा। एक तो चलाना भी चाहता था, पर मैंने मना किया—वह सामान्य साइकिल की तरह हल्की नहीं है और बच्चे के लिये संभालना मुश्किल हो सकता है।

वहां से गंगाजी के दर्शन भी किये मैंने। किनारे पर सब्जी की खेती करने वालों को काम करते देखा। सब शांत और मोहक था वहां।

अब लगता है कि वहां के चक्कर लगा करेंगे। गड़ौलीधाम पर पचास पोस्टों का लक्ष्य अब, सुनील भाई के न रहने के बावजूद पूरा होगा।

…क्या पता, सुनील ओझा जी कहीं से देख रहे हों मुझे और मेरी नई बिजली वाली साइकिल को।

— ज्ञानदत्त पाण्डेय
विक्रमपुर, भदोही

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शांतिधाम में तेल की फिक्र


गांवदेहात डायरी

बरियापुर में गंगा किनारे रहना और एक साधारण साइकिल से घूमना-टहलना। उसके अलावा डेस्कटॉप पर एक-दो घंटा की-बोर्ड पीटना — यही काम है मेरा।
पर फिर भी मन होरमुज़, ईरान, अरब और इजराइल के चक्कर मारता रहता है आजकल।

जेब में पैसे नहीं थे, पर स्मार्टफोन था। मैंने पेट्रोल पम्प की ओर रुख किया।

हीरालाल ने आवाज लगाई—
“का गुरूजी! सइकिलिया में भी तेल भरऊबे का?”

हमउम्र हैं हीरालाल पाठक। चलते-चलते परिचय हुआ था। जन्म का दिन और साल एक ही निकला, बस वहीं से दोस्ती हो गई।

मैंने कहा—
“साइकिल में नहीं, जेब में भराना है। किराने वाले को पहली बोहनी कैश में चाहिए।”

पेट्रोल पम्प पर बिरेंदर से सौ रुपये खुल्ले लिये और यूपीआई से भेज दिये। उसी समय एक कार में भरे जाते पेट्रोल पर नजर चली गई।

मन अचानक रेल के दिनों में पहुंच गया।

बीटीपीएन के रेक याद आये। वे जिनमें पेट्रोल-डीज़ल-नेफ्था जाया करता था।
बाजवा का ऑयल लोडिंग यार्ड याद आया — जहां पैंतालीस साल पहले मेरी प्रोबेशनरी ट्रेनिंग हुई थी।
मथुरा रिफाइनरी और वहां का अतुल भी याद आया — आईओसी में चीफ मार्केटिंग अफसर था। दोस्त ही बन गया था मेरा।

रेल और तेल का पुराना नाता है। कभी टैंकर रेकों से ही देश भर में तेल जाता था। धीरे-धीरे वह यातायात पाइपलाइन पर शिफ्ट होता चला गया।

आजकल होरमुज़ जलडमरूमध्य की खबरें पढ़ता हूँ तो वही पाइप लाइन की सोच फिर लौट आती है। फारस की खाड़ी से निकलने वाले जहाज उस संकरे रास्ते से गुजरते हैं। अब कुछ तेल पाइपलाइन से भी बाहर जाने लगा है — यूएई और सऊदी ने ऐसे रास्ते बना लिये हैं।
पाइपलाइनें काम की चीज हैं।

शांतिधाम लौटते समय साइकिल के साथ-साथ मन में तेल का यह सारा कारोबार भी चलता रहा।
सोचा — पेट्रोल पम्प पर खुल्ले पैसे लेने न गया होता तो शायद यह सब भी न सोचता।

शायद सही कहते हैं — बुढ़ापे में आदमी सठिया जाता है।

सवेरे तीन बजे नींद खुली। तीखी गंध आ रही थी। रेलवे स्टेशन की ओर से हवा आ रही थी।

नेफ्था की गंध मेरी चिर-परिचित गंध है। कोई रेक जरूर स्टेशन पर खड़ा होगा। और किसी वैगन से थोड़ा-बहुत लीकेज होगा।

मैं रेल सेवा में होता तो कंट्रोल को फोन करता — अगले प्वाइंट पर वैगन एग्जामिनर से रेक चेक कराने को कहता।

पर फिर अपनी रिटायर जिंदगी याद आई।
और धीरे-धीरे फिर सो गया।

अब तुम रेलवे के विभागाध्यक्ष नहीं हो, नीलकंठ।
अब नेफ्था की गंध से परेशान होने की जरूरत नहीं है।

— नीलकंठ चिंतामणि
शांतिधाम, बरियापुर
15 मार्च 2026

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