साइकिल के कैरियर पर घोड़जई


गांवदेहात डायरी


रास्ते में एक साइकिल-ठेले पर सरसों की कटी बालें थीं। उनके ऊपर आड़े तरीके से कुछ खरपतवार रखा था। मैंने ठेले का चित्र रुक कर लिया। बाद में जब पंकज अवधिया जी के घर उनसे मिला तो फोटो दिखा कर पूछा—यह घास क्या है?

“और तो खरपतवार है, पर घोड़जई की बालें भी लगती हैं। बीस साल पहले जब मेरे पास घोड़ा था तो उसे यही खिलाता था। अब तो यह खरपतवार ही है। न निकालो तो गेहूँ की पैदावार दबा देता है।” पंकज बोले।

बीस मिनट पंकज जी के यहाँ रुक कर एक गिलास मट्ठा पीया और फिर रवाना हुआ। मन में घोड़जई घूम रही थी। जब तक घोड़जई का पौधा देख न लूँ, तब तक चैन कहाँ?

रास्ते में एक खेत में महिला निराई कर रही थी। गेहूँ का खेत। मैं साइकिल किनारे रोक पतली-सी मेड़ पर बैलेंस बनाता उसके पास पहुँचा। पूछा—खेत में घोड़जई है?

उसने निराई की घास दिखानी शुरू की— “ये अंकरी है, ये मटरहिया, ऊ बुंदहिया… पर इसमें घोड़जई नहीं है।”

उसने खेत में नज़र घुमाई, ध्यान से देखा और बोली— “रुको ज़रा।”

खेत से वह गेहूँ जैसी लंबी घास तलाश कर उखाड़ लाई—
“ये है घोड़जई!”

मैं उस महिला का फोटो लेने लगा तो उसने मुँह फेर लिया। खिलखिलाते हुए बोली— “घोड़जई क फोटो ल, हमार का करब्य?”

साइकिल के कैरियर पर करीब चार फुट लंबे घोड़जई के पौधे दबाए और रास्ते भर नुमाइश करता शांतिधाम पहुँचा। रास्ते में जैप्रकाश दिख गया। अपने चिर-परिचित अंदाज़ में जोर से बोला— “रामराम साहब! आज कौनों खेत में हिल गये रहे का?”

शांतिधाम में अपने कमरे में आकर इंटरनेट ऑन किया। चैटजीपीटी ने फोटो देख बताया—घोड़जई मूलतः वही कुल (Poaceae) की घास है जिसमें गेहूँ, जौ और असली ओट आते हैं। फर्क बस इतना है कि यह उसका जंगली रूप है। हरी अवस्था में यह अच्छा पशु चारा भी है।

भारत में शहरों में जो ओट्स का दलिया आजकल “हेल्थ फूड” बन गया है, वह असल में उसी घास परिवार से आता है जो खेत में खरपतवार बनकर उगता है। फर्क बस इतना है कि शहर वाले उसे पैकेट में खरीदते हैं और गाँव में वह खेत से खुद आ जाता है।

अब मन होता है—घोड़े भले ही न हों मेरे पास, शांतिधाम में एक क्यारी घोड़जई उगा कर गेहूँ के आटे में पिसवा लिया करूँ। घर बैठे ओट्स की खेती!

— नीलकंठ चिंतामणि

शांतिधाम, बरियापुर

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साइकिल और गौरैया


गांवदेहात डायरी

बरियापुर के शांतिधाम से निकलता हूं साइकिल ले कर तो दो विकल्प होते हैं—गंगाकिनारे पंडा जी के पास जा कर निरहू की चाय की गुमटी पर चाय पी लूं, या फिर साइकिल को रेल लाइन की ओर मोड़ दूं और उस पार के गांवों को तब तक नापूं जब तक लौटने का वक़्त न हो जाये।
आज मैंने दूसरा विकल्प चुना।

रेलवे का फाटक बंद था—शायद देर से बंद हुआ था। मैंने खड़े वाहन गिने। आठ मोटरसाइकिलें। मेरी साइकिल वहां अकेली थी। दूसरी ओर भी मोटरसाइकिलें ही थीं, थोड़ी कम।

छह साल पहले जब मैंने शांतिधाम में अपने लिये आवास चुना था, तब यहां साइकिलें ही दिखती थीं। आधे दशक में ही उनकी जगह मोटरसाइकिल ने ले ली है। बहुत कुछ वैसे ही जैसे गौरैया तेजी से गायब हो गईं। अब चरखियां और कौए ही नजर आते हैं।

साइकिल चला कर वापस लौटा तो मन में गौरैया थी और साइकिल।
क्या साइकिल नई गौरैया है?

क्या वह भी खत्म हो जायेगी?

चीन के बारे में सोचा। वहां भी धूल और धुएं से गांव-शहर भर गये थे तो उन्होंने बड़े पैमाने पर साइकिल ट्रैक बनाये। साइकिल को उसकी ड्यू इज्जत बख्शी। अब बीजिंग की हवा भी साफ है, आसमान नीला नजर आता है।
यहां तो गंगाकिनारे भी नदी का दूसरी ओर का नजारा धुंधला रहता है और आसमान धूसर।

साइकिल वापस आयेगी तो आसमान भी, हवा भी साफ होगी।

गांव के मार्केट में दोपहिया वाहनों की बिक्री में 12 प्रतिशत का उछाल है। शहर में यह बढ़ोतरी 6-7 प्रतिशत है। गांव में लोगों के पास पैसा भी आया है और आसान किश्तों में लोन की सहूलियत भी। अब गरीब भी मोटरसाइकिल वाला है।

आंकड़े बताते हैं कि गांवदेहात में साइकिल की बिक्री केवल 2 प्रतिशत बढ़ रही है। गांव में भी लोग ज्यादातर अपने बच्चे को जन्मदिन पर छोटी साइकिल खरीद कर दे रहे हैं।

पहले गांव का बच्चा बड़ों की साइकिल से कैंची चला कर सीखता था। अब वह सीधे अपने नाप की साइकिल से शुरू करता है। सम्पन्नता गांवदेहात में भी आई है।

शांतिधाम लौट कर आज की सुबह की सैर पर मनन करता हूं तो मन में गौरैया और साइकिल दोनों आते हैं। अब गांव की पतली सड़कों पर मोटरसाइकिल, ट्रैक्टर, कार और अब हाईवा ट्रक भी दिखने लगे हैं।

अब गांव न गौरैया के लिये बचा और न साइकिल के लिये।

— नीलकंठ चिंतामणि
शांतिधाम, बरियापुर 

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हरामी कोई गाली है?


गांवदेहात डायरी

साइकिल से देखा गांव 

सुबह की हल्की धूप बरियापुर पर पड़ रही है।
जीवन लाल, तीस-बत्तीस साल का दुबला-पतला नौजवान, खादी जैसी कमीज़ और गले में काला बैग टाँगे साइकिल पर बैठता है। बैग में फाइलें, एक रजिस्टर, कैलकुलेटर और अब तो एक स्मार्टफोन भी—जिससे वह कैशपोर के माइक्रोफिनांस ग्रुप की उपस्थिति और कलेक्शन दर्ज करता है।

दलित बस्ती में कुल सोलह महिलाओं का समूह है, पर आईं कुल चार-पाँच ही हैं। बाकी किसी के हाथ से किश्त भिजवा देती हैं। और ज़्यादातर दिन जीवन लाल मान जाता है। किश्त ले लेता है, पर उनके अंगूठे या साइन की जगह खाली छोड़ देता है—अगली बार उनसे कार्रवाई पूरी करा लेता है।

पर आज वह अड़ गया। मिज़ाज कुछ बिगड़ा हुआ था। बोला—सारी औरतों को बुलाओ। जब सब आएँगी तभी आज की मीटिंग होगी।

मिलनी को जल्दी थी। कताई सेंटर पर जाना था। देर होगी तो सेंटर का मालिक रुपया काट लेगा। उसने जीवन लाल से चिरौरी की, पर जीवन लाल नहीं माना।

कुछ तल्खी में उसने कहा—
“साहब, देखत नाहीं हयअ, अबेर होत बा।”

जीवन फिर भी नहीं माना तो वह बोली—
“साहेब, तूं त बड़ हरामी हौ।”

और तब तो जीवन लाल ने बवाल कर दिया। अपने मैनेजर को फोन कर बताया कि औरतें मान नहीं रहीं, उल्टे मुझे गाली दे रही हैं। मैनेजर ने भी जीवन लाल का ही पक्ष लिया। उसकी शह मिलने पर झगड़ा और बढ़ गया।

मिलनी रुआँसी होकर बोली—
“हे साहेब, हम गारी कहाँ दिहा? हमने गाली कहाँ दी?”

मुझे बाद में मेरी कामवाली ने यह घटना बताई तो मैंने कहा—हरामी कहना गाली नहीं तो क्या है? हरामी का मतलब तो वही हुआ जिसके पिता का कोई पक्का पता न हो, यानी माता दुश्चरित्र हो।

वह बोली—
“ओ साहब! ई त बोलचाल के भाषा ह। अपने लड़के से भी हम कह देत हैं—हरामी, ई काम ऐसे काहे किया। अपनी बेटी से कह देत हैं—रंड़वा, सुनत काहे नाहीं?”

उनकी आम बोलचाल की भाषा ने कितना बड़ा बखेड़ा खड़ा कर दिया।

जब तक सोलहों महिलाएँ नहीं आ गईं, और जब तक मिलनी ने जीवन लाल के पैर छूकर अपने कान पर हाथ नहीं रखा—मीटिंग पूरी नहीं हुई।

बताइए, भला “हरामी” भी कोई गाली है?
वह तो यहाँ बोलचाल का एक सम्पुट भर है।

नीलकंठ चिंतामणि
शांतिधाम, बरियापुर
9 मार्च 2026

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