बटोही ने पहले गाँव-देहात दिखाया। दस किलोमीटर की परिधि में — शरबतखानी से जगतानंद धाम, पचेवरा से गिर्दबड़गांव — सब उसके साथ नापा। वह अब भी नाप सकती है। पर मेरे घुटने अब उतनी मेहनत की इजाज़त नहीं देते। इसीलिये ईबटोही आई।
बटोही अब दूसरे रोल में है। रोज़ चालीस-साठ मिनट घर-परिसर में गोल-गोल चक्कर। कान में हेडफोन, मोबाइल पर कोई किताब ऑडियो में — कभी टॉलस्टाय, कभी अरब-इजराइल युद्ध पर विश्लेषण।
हर चक्कर में कोई आठ सेकेंड के लिये सामने की सड़क दिखती है। बस इतने में रंगमंच बदल जाता है। कभी ट्रैक्टर, कभी हँसिया लिये कटाई को जाती औरतें, कभी कोई फेरीवाला, कभी पानी की बोतल थामे खेत की ओर जाता बिसुनाथ।
सवेरे जल्दी निकलूँ तो पता चलता है — कौन पक्षी सबसे पहले उठा। पड़ोस में किस ओर पहले धुआँ उठा। किसके यहाँ परांठे की गंध आई।
बटोही के साथ अब गंगा किनारे नहीं जाना होता। पर जो अनुभव होते हैं — वे पहले से ज़्यादा दार्शनिक हो गये हैं।
ईबटोही ने घुटनों की समस्या हल की और घूमने की परिधि बढ़ा दी। साइकिल चलाते बच्चों और जवानों को पीछे छोड़ता हूँ — फिर जानबूझकर धीमा करके उन्हें आगे निकलने देता हूँ — फिर पछाड़ता हूँ। यह खेल अपने आप में मज़ेदार है।
कार की जगह ईबटोही से बाज़ार। लोग बैटरी वाली साइकिल देखकर रुकते हैं, सवाल करते हैं। जवाब देने में एक अलग किस्म का संवाद है — जो कार की बंद खिड़की से कभी नहीं मिलता।
अभी गर्मी है। मानसून आयेगा। ईबटोही थोड़ा रुकेगी।
पर शरद का इंतज़ार है।
तब तीस-चालीस किलोमीटर दूर के वे मित्र और रिश्तेदार — जिनके यहाँ “जाना नहीं हो पाया” — उनके द्वार खुलेंगे। सुरेश पटेल को बड़ी शिकायत है कि मैं उनके यहाँ नहीं गया — पैंतीस किलोमीटर दूर हैं। यह शिकायत दूर होगी। बभनियाँव का पुरातत्व स्थल — वर्षों से देखने की साध है — वह भी देखा जायेगा।
बनारस और प्रयागराज — हो सकता है, वहां भी चक्कर हो जाये।

बटोही भीतर की यात्रा है। ईबटोही बाहर की। दोनों मिलकर मुझे साध रहे हैं।
बढ़ती उम्र यूँ कटेगी — दो साइकिलों की जुगलबंदी के साथ।
— ज्ञानदत्त पाण्डेय, विक्रमपुर, भदोही, 21 अप्रेल 26
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