कुछ परिस्थितियाँ बदली नहीं जातीं। उनमें अपने मन को बदला जाता है।
एक औरत धान की नर्सरी से पौधे उखाड़कर उनके छोटे-छोटे गट्ठर बना रही थी। इधर उसे बेहन कहते हैं। दो छोटे बच्चे भी उसके साथ थे। वे पौधे समेटते, गट्ठर पकड़ाते और बीच-बीच में पानी में छपाछप भी कर लेते।
नर्सरी में इतना पानी था कि पैर पूरी तरह धँसते नहीं थे, पर गीले जरूर हो जाते थे। औरत ने सिर पर छाता लगा रखा था। शायद धूप से बचने के लिए। शायद बारिश की आशंका से। गाँव में छाता अक्सर दोनों काम करता है।
मैं कुछ दूर से यह दृश्य देख रहा था। आकाश में बादल थे, पर इतने भी नहीं कि कोई काम रोक दे।
फिर अचानक जैसे मौसम ने अपना मन बदल लिया। पहले हवा चली। फिर वह तेज होती गई। कुछ ही क्षणों में बादल उमड़ आए और बिना किसी भूमिका के मूसलाधार वर्षा शुरू हो गई।
धान की नर्सरी देखते-देखते पानी से भर गई। बच्चों ने काम छोड़ दिया। औरत ने बेहन के गट्ठर किनारे रखे और तीनों घर की ओर चल पड़े।
पर तभी एक छोटा-सा क्षण आया। ऐसा क्षण, जिसे शायद उन्होंने शब्दों में कभी व्यक्त नहीं किया होगा।
उन्हें समझ में आ गया कि अब बचने जैसा कुछ नहीं है। कपड़े भीग चुके थे। घर तक पहुँचते-पहुँचते और भी भीगना ही था। जितनी लड़ाई लड़नी थी, हार चुके थे। अब छाता साधे रखना ही बोझ हो गया था। और तभी संघर्ष समाप्त हो गया।
औरत ने छाता बंद कर दिया।
वे पास के गूलर के पेड़ के नीचे खड़े हो गए। पेड़ की छाया भी उस बारिश में कोई बहुत बड़ा आश्रय नहीं थी। पत्तियों से मोटी-मोटी बूँदें टपक रही थीं। बच्चे शायद कुछ कह रहे थे। औरत मुस्कुरा रही थी। वे बारिश रुकने का उतना इंतज़ार नहीं कर रहे थे, जितना उसके बीच कुछ पल जी रहे थे।
बारिश थोड़ी हल्की हुई। वे तब भी तुरंत नहीं चले। मुझे लगा, वे अब भीगने से नहीं बच रहे थे; वे भीगने को स्वीकार कर चुके थे।

जीवन में शायद बहुत-सी परिस्थितियाँ ऐसी ही होती हैं। हम पहले उनसे लड़ते हैं। बचने की पूरी कोशिश करते हैं। छाते खोलते हैं। रास्ते बदलते हैं। दौड़ते हैं। लेकिन एक क्षण ऐसा भी आता है जब पता चलता है कि अब इस बारिश से बचना संभव नहीं।
उस क्षण दो रास्ते होते हैं। एक—भीगते हुए भी शिकायत करते रहना। दूसरा—छाता बंद कर देना।
उस महिला ने शायद कोई दार्शनिक ग्रंथ नहीं पढ़ा होगा। ‘स्वीकार’ पर कोई व्याख्यान भी नहीं सुना होगा। पर उस दिन उसने मुझे बिना बोले यह पाठ पढ़ा दिया।
कुछ परिस्थितियाँ बदली नहीं जातीं। उनमें केवल अपने मन का मौसम बदला जा सकता है।
मैं दूर से यह सब देख रहा था। मेरे पास शब्द हैं, इसलिए मैं यह लिख पा रहा हूँ। मैं कवि होता तो शायद बादलों, गूलर और धान के पौधों को रूपक बना देता।
पर सच कहूँ तो वर्षा का असली अर्थ मेरे शब्दों में नहीं था। वह उस महिला के बंद किए हुए छाते में था। उन दो बच्चों की भीगी हुई हँसी में था।
वे शायद कभी इस घटना पर लेख नहीं लिखेंगे, कविता भी नहीं। पर उस दिन वर्षा को सबसे अच्छी तरह उन्होंने ही पढ़ा था। मैं तो केवल अपने बरामदे की सुरक्षित जगह से देख भर रहा था।
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