
गांवदेहात डायरी
बाल बढ़ गये थे। साइकिल चलाते देख नंदलाल ने दूर से ही पैलगी उछाली — पालागी गुरू जी। अब तो आपके बाल आइन्स्टीन कट लग रहे हैं।
मुझे भी लगा कि तेल-फुलेल-कंघी से दूरी रखने और नाई को नियमित न बुलाने के कारण मेरी शक्ल वैसी हुई होगी, वर्ना आइन्स्टीन जैसा बौद्धिक व्यक्तित्व मेरा है ही नहीं। दूसरे, आइन्स्टीन के बाल तो उनकी पत्नी काट दिया करती थीं; मुझ अविवाहित के पास वह सहूलियत कहां?
मंहगू नाई का फोन नम्बर मेरे पास था। वह अगले दिन शांतिधाम में हाजिर था। चारखाने की लुंगी, धारी दार बुश-शर्ट और सिर पर फेंटा बांधे। यही उसका सामान्य ड्रेस है। जब वह बुश-शर्ट धोने डाल देता है तो बनियान पहने ही पूरा बरियापुर घूमता रहता है।
शांतिधाम के कम्पाउंड में मौलीसिरी के पेड़ के नीचे उसने मेरे लिये कुर्सी मेज बिछाई। मेरा बाल बनाने का किट — उस्तरा, ब्लेड, कंघी, कैंची और गमछा — मेरे लिये जमा दिया। फिर एक मग पानी रख मुझे बुला ले गया।
कम्पाउंड में चरखियां और गिलहरियां शोर मचा रही थीं। एक नेवला इधर उधर भाग रहा था। वह उनका जंगली दुश्मन है। तितलियां नेवले से बेखबर इधर उधर उड़ रही थीं। मधुमक्खियां गेंदे और जीनिया के फूलों पर मंडरा रही थीं। उनके बीच मेरे बाल मंहगू काट रहा था।
किसी शहर में बाल कटाने का यह आनंद कहां?
मंहगू बाल काटते समय – अन्य नाऊओं से अलग – चुपचाप रहता है। उससे बात करने के लिये उससे सवाल करने होते हैं। बाल कटाते हुये मैने उसे खोद-खोद कर जानकारियां निकालीं।
वह अकेला ही बरियापुर में रहता है। उसके तीन भाई तीन जगह काम करते हैं। एक जीन की पैंट बनाने के कारखाने में अहमदाबाद में है। उससे छोटा वापी में केमीकल डाई के कारखाने में लगा है। तीसरा, और सबसे बड़ा भाई बम्बई में वाचमैनी करता है। वह खुद वापी में काम करता था, पर छोड़ कर गांव चला आया।
तीस हजार महीने की पगार छोड़ वापस गांव क्यों आया? मेरे पूछने पर उसका उत्तर इधर उधर का – अस्पष्ट ही था। कुछ सवाल अनुत्तरित ही रह जाते हैं। उसमें से यह भी है — क्या कारण है कि लोग पलायन करते हैं और क्या कारण है कि तमाम असुविधाओं – आर्थिक तंगी को झेलते – गांव में वापस आना चाहते हैं।
आखिर मैं भी शहर में क्लब और गोल्फ कोर्स की सुविधा छोड़ साइकिल थाम काहे गंगा किनारे इस कस्बे – बरियापुर – में आ कर बस गया हूं।
मंहगू मेरे बाल काट एक चार इंच के शीशे में मेरी शक्ल दिखाता है। मेरे संतोष व्यक्त करने के बाद वह मेरे सिर, कंधे और हाथों की चम्पी करता है। मौलीसिरी के पेड़ के नीचे यह सुख शहर में कहां?
— नीलकंठ चिंतामणि
शांतिधाम, बरियापुर
10 अप्रेल 2026
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