राघवेंद्र दास – बीजापुर, कर्णाटक के पदयात्री


लगता है लम्बी लम्बी पदयात्रायें करना मेरी लकीरों में लिखा नहीं है पर लम्बी पदयात्रायें करने वालों से मिलना, पहचानना मेरे भाग्य में है। या शायद मैं नेशनल हाईवे के किनारे गांव में रहता हूं, इसलिये ऐसे लोगों से मिलना सरल है और मेरी प्रवृत्ति में आ गया है ऐसे ‘अजीबोगरीब’ लोगों से मिलना।

आज राघवेंद्र दास मिले। बीजापुर, कर्णाटक से दो झोला और एक बोतल पानी लिये हवाई चप्पल पहने चले आ रहे हैं। गेरुआ वस्त्र पहने; हल्का सा तिलक। इकहरा बदन। थोड़ा सांवला रंग। सिर पर गमछे का स्कार्फ। कन्नड पुट लिये हिंदी। बताया कि बीजापुर के इंडी तहसील के जेवुर गांव के हैं। वहां से चल कर रायचूर के पास से नेशनल हाईवे 8 पकड़ कर वाराणसी चले आये। अब बनारस से निकले हैं – मथुरा-वृन्दावन जायेंगे। उसके आगे जहां भगवान ले जायें! – वे ऊपर आसमान की ओर हाथ कर बोलते हैं कि सब ईश्वर आधीन है। उनकी पदयात्रा ईश्वर आधीन है।

राघवेंद्र दास – अपने दो थैले और निशान (झण्डा) लिये। बस इतना ही सामान लिये चल रहे हैं।

जहां जगह मिलती है, सो जाते हैं। लोग भोजन करा देते हैं। भूख लगती है तो लोगों से भोजन मांग लेते हैं। साथ में एक चद्दर है। दो थैलों में थोड़ा बहुत सामान है। थैले भी बड़े नहीं हैं। हाथ में एक झण्डा लिये हैं। जहां जहां जाते हैं, लोग वहां के निशान दे देते हैं। वह सब झण्डे की लाठी में लपेट लेते हैं।

महराजगंज बाजार से अपने गांव की ओर आते हुये मैंने उस परिवेश से अलग लगते व्यक्ति को देखा तो रिफ्लेक्स एक्शन के रूप में कमीज की ऊपरी जेब में रखा नोकिया का छोटा मोबाइल निकाल कर चित्र खींच लिया। उनसे पूछा – कहां से आ रहे है?

“बीजापुर” उन सज्जन ने जवाब दिया। मुझे लगा कि पास किसी विजयपुर के होंगे। किसी धार्मिक अनुष्ठान में जाते हुये। विंध्याचल के आगे एक विजयपुर है जहां शीतलामाता का मंदिर है। पर सज्जन ने जब जोड़ा – कर्णाटक से” और उनके लहजे में दक्षिण भारतीय पुट झलका, तब मुझे लगा कि ये सामान्य स्थानीय पदयात्री नहीं हैं। उन्होने अपने स्थान के बारे में मैसुरू और हुबली आदि नाम लिये। उससे लग गया कि वे लम्बी पदयात्रा करते हुये आ रहे हैं।

राघवेंद्र दास रामानंद सम्प्रदाय के अनुयायी हैं। उन्होने अपने गुरु महोदय का नाम भी बताया। पिछले दो महीने आठ दिन से वे यात्रा कर रहे हैं। करीब दो हजार किमी चले होंगे – यद्यपि सही सही आंकड़ा नहीं रखा अपने पास। इन दो महीने में तो इतना चले हैं, वैसे भी पिछले चार पांच साल से चलते रहे हैं। माता पिता ऊपर जा चुके हैं। परिवार नहीं है। सो चलने में कोई बाधा नहीं है।

मैं राघवेंद्र से बातचीत करने सड़क किनारे एक पत्थर पर उनके साथ बैठ गया। राघवेंद्र ने मुझसे धर्म की बात की, कबीर की बात की, अपने गुरू की बात की, जीवन जीने के बारे में बात की। आधा मैंने सुना और आधा ध्यान राघवेंद्र को देखने में लगा रहा।

बाधा नहीं है, तो भी क्या है यह घुमक्कड़ी? तुलसी कलियुग का वर्णन करते लिख रहे हैं – “नारि मुई घर सम्पति नासी। मूड़ मुड़ाई भयें सन्यासी॥” राघवेंद्र दास के माता पिता नहीं रहे, पत्नी नहीं बच्चे नहीं। तो जोगिया कपड़ा पहन निकल दिये? मांगने पर भोजन मिल जायेगा। बस वही जरूरत है?! आदमी का सेंस ऑफ ग्रेटीफिकेशन किससे संतुष्ट होता है? आदमी में कम ही सही, कुछ राजसिक वृत्तियाँ तो होती हैं। उनका पोषण या उनका शमन कैसे होता है? आजकल रोटी कपड़ा मकान और इण्टरनेट की मूलभूत जरूरतें होती हैं; वे कैसे पूरी होती हैं?

मैं राघवेंद्र से पूछता हूं – उनका मोबाइल नम्बर क्या है? और उत्तर मुझे ट्रिप कर देता है। “कोई मोबाइल नहीं है। जब भजन करो, ध्यान करो तो किसी न किसी का फोन आ जायेगा। फोन तो ध्यान खा जायेगा। मैंने फोन ही नहीं रखा। जितना कम सामान, उतना सुखी जीवन।” – मुझे लगता है कि राघवेंद्र और मुझमें बहुत अंतर है। रहन सहन में भी और वासनाओं/सोच में भी। राघवेंद्र को समझने के लिये राघवेंद्र दास के स्तर पर उतरना पड़ेगा। कर नहीं पाऊंगा मैं।

मैं राघवेंद्र से बातचीत करने सड़क किनारे एक पत्थर पर उनके साथ बैठ गया। राघवेंद्र ने मुझसे धर्म की बात की, कबीर की बात की, अपने गुरू की बात की, जीवन जीने के बारे में बात की। आधा मैंने सुना और आधा ध्यान राघवेंद्र को देखने में लगा रहा। इस व्यक्ति ने कम साधन के साथ चलने को ही अपना ध्येय बना लिया है। पर ऐसा नहीं कि उसमें चाह नहीं है। वह बार बार मुझे और मेरी साइकिल को देखते रहे। मुझसे पूछा – “यह साईकिल कहां से ली? कितने की है? मेरे साइज की साइकिल तो थोड़ी बड़ी होगी। आपका हाईट कम है मेरा तो पांच फिट आठ इंच है। यहां बाजार में मिलती है? होलसेल वाला है बेचने वाला?”

साइकिल के बारे में अनेकानेक सवाल। राघवेंद्र का मन साइकिल पर लग गया है। साइकिल उनको यात्रा करने की सहूलियत देगी। “पहले मेरे पास साइकिल थी। वह छोड़ कर पैदल निकला मैं। पर लगता है साइकिल काम आयेगी।” – राघवेंद्र ने कहा।

मेरे पास राह चलते राघवेंद्र को भोजन कराने के लिये कुछ नहीं था। मैंने अपना पर्स निकाल कर उन्हें पांच सौ रुपये दिये। राघवेंद्र ने अपना थैला खोल कर एक पतली सी पुस्तिका, जिसपर कन्नड़ या तेळुगू में लिखा था; में पांच सौ रुपये सहेज दिये। मुझे धन्यवाद दिया और कहा कि ये पांच सौ उन्हें साइकिल खरीदने में सहायक होंगे।

मेरे बारे में राघवेंद्र ने अपना इम्प्रेशन मुझे बताया – “आप मेरा छोटे मोबाइल से फोटो ले रहे थे तो मैं सोचा देखो कितना गरीब आदमी है। साइकिल से चला आ रहा है और पुराना छोटा मोबाइल (फीचर फोन) है। पर इस उम्र में भी कितना देख रहा है।”

अच्छा लगा राघवेंद्र का बेबाक अपना सोचना बताना। मुझे इसी तरह बहुत से ग्रामीण भी निरीह, जिज्ञासु और गरीब (?) समझते होंगे। मैंने अपने स्मार्टफोन से भी उनके कई चित्र लिये। उन्हें यह भी बताया कि मैं रेलवे की नौकरी से रिटायर हुआ था। उन्होने मुझसे मेरी पेंशन के बारे में पूछा, फिर खुद ही अटकल लगाई – दस हजार तो मिलती होगी? उनकी अटकल पर मैंने हां हूं कर सहमति सी व्यक्त की। मैंने उनके बारे में पूछा था, उन्होने मेरे बारे में, मेरे बच्चों के बारे में पूछा।

विदा होते समय बातचीत करते हम दो तीन बार उठे और फिर बैठ गये। ज्यादातर राघवेंद्र ही बोलते जा रहे थे। बस यही मुलाकात ही तो हमारे पास थी। आगे कोई सम्पर्क सूत्र था ही नहीं। कोई मोबाइल नम्बर नहीं राघवेंद्र का। आज के और उस डिपार्टिंग के बाद मात्र स्मृति भर ही रहेगी। फिर मिलना होगा नहीं।

विदा होते समय मैंने राघवेंद्र को गले लगाया। उसी तरह जैसे प्रेमसागर को लगाया था। राघवेंद्र को मैंने प्रेमसागर के बारे में अपना लिखा दिखाया था बैठ कर। राघवेंद्र ने कहा – “मेरे बारे में भी लिख दीजियेगा। हो सकता है आपका लिखा देख कर कोई मुझे खाना ही खिला दे। मेरी उतनी ही जरूरत है।”

राघवेंद्र दास के साथ मैं सड़क किनारे

घर लौटा तो राघवेंद्र की ही सोचता रहा। राघवेंद्र जैसे भी हैं दुनियां में और महादेव हैं तो उन जैसों से मुझे मिलाते रहते हैं।


राघवेंद्र को दिये पांच सौ रुपयों के बारे में भी कथा रोचक है। और उसमें कुछ विलक्षण तत्व हैं। सवेरे साइकिल सैर के लिये निकलते समय मेरे जेब में पर्स नहीं होता। आज मैंने जाने क्यूं पर्स रख लिया था। उसमें एक भी पैसा नहीं था। मात्र एटीएम कार्ड था। दूध, सब्जी लेने में पर्स की जरूरत नहीं पड़ी। पड़ती भी नहीं है। यूपीआई पेमेण्ट से काम चल जाता है। महीने में मेरी कैश डीलिंग बहुत कम है। अगर जरूरत पड़ती है कहीं सौ पचास रुपये की तो किसी दुकान से यूपीआई पेमेण्ट कर उससे कैश मांग लेता हूं।

पर आज सवेरे एक ए.1 का एटीएम पड़ा और उसका दरवाजा खुला था। पता नहीं क्या मन में आया मैं यह देखने के लिये कि मेरा एटीएम काम करता है या नहीं और एटीएम मशीन आजकल पैसा रखती है या नहीं; मैं अंदर चला गया। चार हजार रुपये कैश निकाल लिये। तो पर्स में पांच पांच सौ के आठ नोट आ गये थे।

राघवेंद्र जिस रास्ते पर मिले, सामान्यत: उससे वापस नहीं लौटता हूं मैं। पर उस दिन वहीं से मुड़ गया। उस रास्ते पर मुड़ना, राघवेंद्र दास से मुलाकात और मेरे पास पर्स होना, उसमें चार हजार रुपये आ जाना – यह सब संयोग भर था? और मैंने चार हजार रुपये निकाले थे, उसमें से पांच सौ रुपये देना क्या ऐसा नहीं था कि महादेव परीक्षा ले रहे हों कि यह बंदा चार हजार में से कितना दे देता है?! आप एक घटना को कई कई तरह से देख समझ और वर्णन कर सकते हैं। वही घर लौटने पर मेरी पत्नीजी और मैंने किया।

फ्रूगल जीवन और भूख लगने पर भोजन मांग लेना – दो बातें मेरे मन में घूम रही हैं। फ्रूगल जीवन तो मैं जीना चाहता हूं। कुछ प्रयास भी करता हूं। पर भूख लगने पर मांग कर खा लेने का भाव अभी तो नहीं ही आया या आने की सम्भावना भी नहीं लगती है। शायद वह आना, अपने आप को और सिकोड़ने की पराकाष्ठा हो। शायद।

राघवेंद्र से आगे मिलना होगा नहीं। पर एक छोटी सी मुलाकात मन में बहुत कुछ उथल पुथल दे गयी।

मैंने अपना पर्स निकाल कर उन्हें पांच सौ रुपये दिये। राघवेंद्र ने अपना थैला खोल कर एक पतली सी पुस्तिका, जिसपर कन्नड़ या तेळुगू में लिखा था; में पांच सौ रुपये सहेज दिये। मुझे धन्यवाद दिया और कहा कि ये पांच सौ उन्हें साइकिल खरीदने में सहायक होंगे।

चारधाम यात्रा के अंतिम धाम की ओर प्रेमसागर


आठ मई 2022 –

सात मई की शाम को प्रेमसागर अगस्त्य मुनि की लॉज में डेरा डाले थे। आठ की सुबह आगे रवाना हुए। गूगल मैप के अनुसार अगस्त्य मुनि से केदार 71 किमी दूर है। इस यात्रा में तीन दिन लगने चाहिये थे। पर प्रेमसागर ने वह दूरी दो दिन में ही तय कर ली। वही नहीं वे वापस भी लौट आये, रात भर चलते हुये। गजब प्रॉवेस। गजब ऊर्जा, गजब इच्छा शक्ति।

मैंने उनके केदार होने के बारे में पहले ही लिख दिया है। अब उनके द्वारा बीच के दिनों में दिये इनपुट्स के आधार पर यह विवरण लिख रहा हूं। प्रेमसागर के साथ नित्य चर्चा के अनुसार ट्रेवलॉग लेखन की आदत छूटने के कारण तारतम्य गड़बड़ हो गया है। कभी कभी यह भी लगता है कि जब आधे से ज्यादा यात्रा का विवरण है ही नहीं तो अब पैबंद-पैचवर्क का क्या तुक है? लेकिन फिर लिखने में जुट जाता हूं।

आठ मई, चाय की दुकान

आठ मई की सुबह प्रेमसागर का फोन आया। वे तीन किलोमीटर चल चुके थे सवेरे। चाय की दुकान पड़ी थी, तो चाय पीने रुक गये थे। “यहां सब कुछ बहुत मंहगा है। इसमें इन बेचारे दुकानदारों की गलती नहीं। यही कुछ महीने हैं जिनमें इन्हें दुकान से आमदनी होती है। उसके बाद तो साल का आधा भाग बिना कोई ग्राहक के चला जाता है। अभी जिस दुकान में आया हूं, वह तीन दिन पहले खुली है। यहीं गांव के हैं दुकान वाले। लोकल। पर दुकान का सब सामान उन्हें नीचे रुद्रप्रयाग से ले कर आना होता है। पास में बाजार नहीं है। रास्ते में यात्री बहुत हैं, पर वाहनों में हैं। पैदल चलने वाला तो मुझे कोई दिखा ही नहीं आज। चाय तीस रुपये कप मिल रही है। इस कीमत के कारण मैंने पीना बहुत कम कर दिया है। दिन में एक दो कप, बस।” – प्रेमसागर ने कहा।

प्रेमसागर का इरादा गुप्तकाशी पंहुचने का था। अगस्त्य मुनि से गुप्तकाशी 26-26 किमी दूर है। “महादेव की कृपा हो जो आज गुप्तकाशी पंहुचा दें।” कांधे पर कांवर और अन्य सामान था। “अब साथ के सामान को पहले की अपेक्षा बहुत कम कर लिया है। पर फिर भी 10-15 किलो तो होगा ही। गर्म कपड़ा है – एक गर्म चद्दर और बेडशीट। गर्म जैकेट भी है।”

प्रेमसागर की कांवर और पिट्ठू – कुल वजन करीब 15 किलो होगा।

मैंने चाय की दुकान पर सामान और कांवर का चित्र ले कर भेजने को कहा। सामान जरूर 15 किलो के आसपास होगा, पर साइज में काफी था। बल्की। उसे उठा कर पहाड़ पर चढ़ना मशक्कत है। गुजरात में तो प्रेमसागर को सामान के कर पीछे पीछे चलने वाले भक्त लोग मिल गये थे; यहां सब उन्हें खुद ही करना था। व्यक्ति की पहचान इसी से होती है कि सुविधा-असुविधा सब में वह सम भाव से रहे। यहां अकेले चलने को ले कर प्रेमसागर को बहुत कुड़बुड़ाते नहीं पाया मैंने। यह जरूर कह रहे थे कि महादेव सहायता करें। किसी तरह पार लगा दें। “महादेव आज शाम तक गुप्तकाशी पंहुचा दें! आगे रास्ता ऊंचा और कठिन है।”

प्रेमसागर ने फोटो भेजते समय लिखा – अंकित नेगी; ये बच्चा ट्विटर मे देखा था मुझे , रोक कर नास्ता पानी कराया।

पर शाम तक वे गुप्तकाशी नहीं पंहुच पाये। चार किलोमीटर पहले ही मौसम खराब हो गया। आंधी और बारिश होने लगी। उन्हें रुकना पड़ा। एक लॉज में शरण मिली। लॉज के भरत सिंह जी काम आये। यहां किराया भी मामूली था – दो सौ रुपया। भोजन तो शायद भरत सिंह जी ने ही करा दिया।

रास्ते में एक हाइडल पावर प्लाण्ट पड़ा। जगह जगह बोर्ड लगे हुये थे कि जमीन धसक सकती है। कहीं कहीं तो सतत टूटटे पहाड़ दिखे। रास्ते के कष्ट और मौसम की विकटता के कारण प्रेमसागर बहुत चित्र नहीं ले सके। उनके चित्रों में वैसे भी धुंधलापन है। शायद लेंस पर कुछ जमा हो गया है। या फिर मौसम के कारण दृष्यता कम हो गयी रही हो।

नौ मई 2022 –

नौ मई को सवेरे चल कर प्रेमसागर शाम तक फाटा पंहुचे। कुल 19 किमी चले होंगे। शाम को किसी लॉज में जगह मिली। काफी डिस्काउण्ट के बाद 1200 रुपये में। प्रेमसागर के कहने से लग रहा था कि उनके पास ज्यादा आर्थिक रीसोर्स हैं नहीं। दो हजार रुपये प्रति दिन के खर्चे का भार ज्यादा ही होगा। मैं सोचता था कि पोरबंदर-राजकोट के अनुभव के बाद प्रेमसागर की रहने खाने और अन्य जरूरतों की समस्या नहीं रहेगी। मैं सही नहीं सोचता था। प्रेमसागर ने कुछ कहा नहीं, पर मैंने अपने हिसाब से कुछ पैसा उनके यूपीआई पते पर – prem12shiv@sbi – पर भेजा। इसके पहले मैंने प्रेमसागर के बारे में लिखा भर था; उनकी आर्थिक सहायता खुद करने की नहीं सोची थी। कभी 500रुपये से ज्यादा दिया नहीं था। यदा कदा उन्होने मिठाई खाने के लिये 10 रुपये मांगे थे तो मैंने 100रुपये भेजे थे। बस।

आशा करता हूं कि लोग उनकी सहायता करेंगे।

दो दिन से प्रेमसागर केदार नाथ धाम में चल रही एक अफवाह की बात कर रहे थे – कि वहां भगदड़ से 12-15 लोगों की मृत्यु हो गयी है और कपाट बंद कर दिये गये हैं। वापस आते लोग यह अफवाह सुना रहे थे। ऐसी कोई खबर कहीं मीडिया में पाई नहीं गयी। अंतत: आज नौ मई शाम को प्रेमसागर ने बताया कि शायद कोई पुलीस वाला ज्यादा कमाई के फेर में एक साथ ज्यादा लोगों को मंदिर के पास जमा कर लिया था। उसके कोई अनहोनी टालने के लिये कुछ समय के लिये मंदिर के कपाट बंद किये गये थे। … जहां मेला लगता है, लोग जुटते हैं वहां अफवाह भी जन्म लेती है। और यह संचार के त्वरित साधनों के युग में भी होता है!

10-11 मई 2022 –

दस मई को सवेरे साढ़े आठ बजे प्रेमसागर से बात हुई। वे फाटा से भोर तीन बजे ही निकल लिये थे। उनका इरादा एक ही दिन में केदारनाथ दर्शन सम्पन्न करने का था। पता नहीं यह निर्णय उन्होने क्यों किया। शायद रास्ते में चाय पानी भोजन और रहने की दरों में बेतहाशा उछाल ने उन्हें यह प्रेरित किया हो कि जल्दी से जल्दी दर्शन कर लौट जायें। या भगवान महादेव जल्दी आने को कह रहे थे। जो भी कारण हो, एक ही दिन में 36 किमी जाने और छतीस किमी वापसी की यात्रा प्रेमसागर ने सम्पन्न की। साथ में शायद बहुत सामान नहीं लिया था – फाटा में शायद कहीं रखा हो। साथ में एक पिट्ठू और गोमुख का जल लिया होगा।

सवेरे साढ़े आठ बजे वे सोन प्रयाग में थे। एक छड़ी खरीद रहे थे। आगे के ऊंचे रास्ते में बिना छड़ी और रेनकोट के चलना कठिन होता।

इसके आगे का विवरण मैंने केदारनाथ, 11वाँ ज्योतिर्लिंग दर्शन सम्पन्न, प्रेमसागर नामक पोस्ट में दे रखा है। प्रेमसागर 36 किमी चल कर केदार दर्शन कर अगले दिन 11 मई को सवेरे तक फाटा वापस आ चुके थे। पहाड़ की हिमाद्रि की 72 किमी से अधिक की यात्रा एक दिन में – अपने दमखम का इतना कठिन परिचय, और संकल्प की दृढ़ता का इतना प्रमाण महादेव को शायद पहले कभी न दिया हो। महादेव निश्चय ही प्रसन्न हुये होंगे!

जय केदार! हर हर महादेव!

12-13 मई 2022-

केदार यात्रा से फाटा 11 मई को लौटे प्रेमसागर। पर फाटा नहीं रुके। वे आठ मई की शाम को गुप्तकाशी के चार किमी पहले एक लॉज में ठहरे थे। वह स्थान ऊखीमठ के सामने है। ऊखीमठ मंदाकिनी के दूसरे छोर पर है और यह नदी के इस छोर पर। वहीं के भरत सिंह जी उन्हें फाटा से सम्भवत अपने दुपहिया वाहन पर लॉज में ले आये। यहां उनका किराया भी नाम-मात्र का था और भरत सिंह जी का आतिथ्य भी। पूरे दिन और रात भर वे सोये। अगले दिन सवेरे वे रवाना हो कर किसी वाहन से रुद्रप्रयाग आ गये।

कर्णप्रयाग से चोटी का दृष्य। मैसम खराब हो रहा था।

तेरह मई को शाम के समय कर्णप्रयाग से प्रेमसागर ने बात की। सवेरे जल्दी चल कर प्रेमसागर करीब 33-34 किमी चल कर कर्णप्रयाग पंहुचे थे। रुद्रप्रयाग से बदरीनाथ की पैदल यात्रा वे कर रहे हैं। केदारनाथ की यात्रा की चारधाम यात्रा एक अनुषांगिक (सबसीडियरी/एंसिलियरी) यात्रा है। वैसे भी कांवर यात्री को गंगोत्री/गोमुख से जल लेना होता है केदारनाथ को चढ़ाने के लिये। केदारनाथ के दर्शन के बाद शैव-वैष्णव एकात्मता के प्रतीक के रूप में बदरीनाथ का दर्शन उसके साथ जुड़ा है। वैसे भी प्रेमसागर अब तक यमुनोत्री गंगोत्री/गोमुख और केदार की यात्रा सम्पन्न कर चुके हैं। अब उन्हें हिमालय में बदरीनाथ दर्शन ही करने हैं।

कर्णप्रयाग – पिण्डार (दांये) और अलकनंदा का संगम

कर्णप्रयाग के कुछ चित्र भेजे। यहां पिण्डार नदी अलकनंदा में आ कर मिलती हैं। संगम है दोनो नदियों का। वहीं किसी लॉज में प्रेमसागर रुके थे। उनके भेजे चित्रों में संगमस्थल और अलकनंदा पर एक पैदल-पुल अच्छे से दीखता है। मौसम खराब था। बारिश होने लगी थी। ज्यादा चित्र वे दिन भर की यात्रा के नहीं दे पाये, पर जो दिये, वे संतोषजनक कहे जा सकते हैं।

कर्णप्रयाग संगम पर प्रेमसागर

अकेले यात्रा पर हैं प्रेमसागर। केदार यात्रा सम्पन्न करने का संतुष्टि भाव उनमें है और बदरीनाथ धाम की यात्रा सम्पन्न करने की आतुरता है। आगे 120 किमी की पैदल यात्रा है बदरीनाथ तक। कल उनका ध्येय गोपेश्वर पंहुचने का है। गोपेश्वर 37-38किमी दूर है। मैं नक्शे में देखता हूं तो रास्ते में नंदप्रयाग दिखता है, जहां अलकनंदा में नंदाकिनी नदी आ कर मिलती हैं। … इलाके में जाने कितने प्रयाग हैं – जाने कितने संगम। यह जरूर है कि प्रेमसागर के बारे में न लिखना होता तो मैं गढ़वाल के नक्शे को इतनी बारीकी से नहीं देखता। और इतनी बारीकी से प्रेमसागर ने भी नहीं देखा होगा। वे तो लोगों के बताये रास्ते पर निकल पड़ते हैं। अपने पैरों, अपनी कांवर और अपने वेश का सहारा लिये हुये। प्रेमसागर पहाड़ के लोगों से प्रभावित हैं – “भईया वे सब बहुत सरल हैं और सहायता करना चाहते हैं। उनकी भी मजबूरी है। कमाई के लिये यही कुछ महीने उन्हें मिलते हैं। इस कमाई से ही उन्हें साल भर का खर्च चलाना होता है।”

मेरा इस यात्रा के दौरान प्रेमसागर से सम्पर्क उतना रीयल टाइम नहीं है। मैं पहले की तरह उन्हें बार बार फोन नहीं करता। हर कदम पर उनकी यात्रा ट्रैक नहीं करता। वे दिन में एक बार फीडबैक देते हैं। वही मुख्यत: सम्पर्क है। एक ट्रेवलॉग लिखने के लिये यह पर्याप्त नहीं कहा जा सकता। तनिक भी नहीं। पर यही चल रहा है। जब तक मैं यात्रा के विषय में चार्ज हूँगा, तब तक हिमालय की यह यात्रा सम्पन्न हो जायेगी। बदरीनाथ दर्शन में दो-चार दिन भर ही लगेंगे। उसके बाद हेमकुण्ट साहिब या फूलों की घाटी तो प्रेमसागर की यात्रा में होगा नहीं।

खैर, देखें आगे की यात्रा कैसे होती है!

हर हर महादेव!

घर के बगीचे में


लॉकडाउन के समय मेरी पत्नीजी इस ब्लॉग पर एक को-ऑथर के रूप में घर की गतिविधियों के बारे में लिखा करती थीं। फिर उनका अभ्यास छूट गया। मेरे ख्याल से एक फेसबुक पेज बना कर उन्हें घर के बारे में लिखना चाहिये।

पर घर में उनकी चलती है। मेरे ख्याल का क्या?! 😀

अब आज देखा – छितवन के पेड़ पर एक घोंसला टांगा है – चिडिया का कार्ड-बोर्ड का बना घर। अपेक्षा थी कि उसमें छोटी चिड़िया – मुनिया, गौरय्या या रॉबिन भी – अपने अण्डे दे कर बच्चे पालेगी। पर उन्हें यह पसंद नहीं आया। वे पेड़ों पर केमॉफ्लॉज करते हुये अपना घोंसला बनाना, अपनी मेहनत से बनाना पसंद करती हैं। रॉबिन जरूर ऐसे कार्ड बोर्ड के घोंसले इस्तेमाल करती है। पर ज्यादातर गिलहरी अपना कब्जा जमाती है।

छितवन के पेड़ पर एक घोंसला टांगा है

गिलहरी हमारे ही घर के छोटे कपड़े चुराती है। दो जोड़ी मोजे उसकी चोरी से ही बरबाद हुये हैं, और उनमें से एक तो नया ही था। कपड़े, कतरन, रेशे, पत्तियों के लंबे टुकड़े – वह सब घोंसले में पैक करती है। इस तरह कि लगे कि इस घोंसले में कुछ भी नहीं है। फिर उसमें वह चुपके से आ कर बच्चे जनती है। महीना भर आती जाती रहती है। बच्चों को दूध भी पिलाना होता होगा। शायद कुछ खाने की चीजें भी वहां जमा करती हो। यह भी हो सकता है कि लंबे अर्से तक वह वहीं जमी रहती है, इसलिये अपने भोजन का भी इंतजाम करती हो।

अब इस छितवन के घोंसले पर गिलहरी अपना कब्जा जमा चुकी है। उसने सारे छेद कतरनों-करकट से पैक कर दिये हैं। अभी यह किये दो दिन ही गुजरे हैं। शायद बच्चे जन दिये हों।

गांव में सीसीटीवी का इन्तजाम नहीं है, वर्ना एक कैमरा वहीं छितवन पर फोकस कर महीना भर की गतिविधि रिकार्ड करना बहुत रोचक होता।

घर में एक नांद है। मेरे साले साहब, शैलेंद्र दुबे, मेरे पड़ोसी की गौशाला की एक स्पेयर नांद मेरी पत्नीजी मांग कर ले आयी थीं। उसमें पानी भर कर एक कमलिनी की कलम लगा दी गयी थी। एक साल बाद लगा कि शायद मर गयी है कमलिनी। यह सोचा कि पानी बदल कर फिर प्रयोग किया जाये। या सब कुछ हटा कर नांद साले साहब को सधन्यवाद वापस कर दी जाये। पर कमलिनी को शायद हमारा इरादा पसंद नहीं आया। वह फिर से पनपने लगी। पूरे नांद में फैल गयी। और आज उसके इस दूसरे अवतार में पहला फूल खिला!

कमलिनी को शायद हमारा इरादा पसंद नहीं आया। वह फिर से पनपने लगी। पूरे नांद में फैल गयी। और आज उसके इस दूसरे अवतार में पहला फूल खिला!

उसका चित्र आज पत्नीजी ने भी खींचा और मैंने भी। वे तो शायद अपने चित्र को ह्वात्सएप्प के अपने ग्रुप/ग्रुपों में प्रेषित करें। मैं उसे ब्लॉग पर ही चिपका रहा हूंं। नांद, कमलिनी, कार्पेट घास का लॉन, गमले और विभिन्न पौधे – फूल – सब मेरी पत्नीजी और मेरे माली रामसेवक जी की मेहनत है। उनके पास इस बागवानी विधा और उसमें पलते जीवजंतुओं के बहुत से अनुभव हैं और बहुत सी कहानियां भी। वे उन्हें ब्लॉग पर प्रस्तुत करें तो छोटे-मोटे रस्किन बॉण्ड (0.10RuskinBond) जैसा काम हो सकता है। पर पता नहीं उनका यह करने का मन होगा या नहीं। …. लिखने और अभिव्यक्ति के लिये आधा बीघे का घर का परिसर बहुत होता है। पूरी दुनियाँ इसमें समा सकती है।

कमलिनी

केदारनाथ, 11वाँ ज्योतिर्लिंग दर्शन सम्पन्न, प्रेमसागर


मैं प्रेमसागर से तालमेल नहीं बिठा पाया। उन्होने अपनी कांवर यात्रा का ‘लास्ट-पुश’ जोर से दिया। कल सवेरे तीन बजे निकल लिये फाटा से। सवेरे साढ़े आठ बजे उनका फोन सोनप्रयाग से आया। बाजार की चहल पहल के शोर के बैकग्राउण्ड में वे एक लाठी खरीद रहे थे – “भईया, अब यहां छड़ी और रेनकोट के बिना काम नहीं चलेगा। रेनकोट का इंतजाम कर लिया है। छड़ी खरीद कर आगे बढ़ूंगा। आज केदार दर्शन करने का कोशिश है। इसलिये सवेरे तीन बजे निकल लिया हूं। देर भी होगी, तो भी आज केदारनाथ पंहुच ही जाऊंगा।”

सोनप्रयाग में छड़ी और रेनकोट के साथ प्रेम सागर

फाटा से केदार 40 किमी दूर है। खड़ी चढ़ाई के बीच पैदल यात्रा चालीस किलोमीटर की; वह भी जिंदगी में पहली बार – मुझे लगा कि ज्यादा ही अटेम्प्ट कर रहे हैं प्रेमसागर। पर उनके कहे के बीच मुझे किंतु-परंतु कहने का अवसर नहीं था। नेटवर्क बहुत अच्छा नहीं था। बात बमुश्किल हो रही थी। उनके भेजे चित्र और उनकी लाइव लोकेशन तो मुझे मिल ही नहीं पाये। दिन में कहां कैसे यात्रा हुई, पता नहीं। शाम सात बजे उनका फोन आया पर कोई आवाज नहीं थी। मैंने दो सिम बदल बदल कर बात करने की कोशिश की पर एक भी शब्द नहीं आया-गया। ह्वाट्सएप्प पर ऑडियो कॉल तो लगी नहीं। इण्टरनेट काफी कमजोर था। … सो पता नहीं चला कि प्रेमसागर कहां से बात कर रहे थे।

दस मई, 2022 को शाम सात बजे के पहले केदार दर्शन के बाद अपनी लाठी और रेनकोट के साथ प्रेमसागर

असल में वे केदारनाथ दर्शन कर चुके थे। उसके बाद मुझे फोन कर सूचित करने का प्रयास कर रहे थे। पर फोन लगा नहीं।

आज मैंने सवेरे पांच बजे उन्हें रिंग किया। वे सोनप्रयाग में थे। बताया – “भईया कल शाम दर्शन हो गये। बाहर आ कर आपको फोन किया था, पर बात नहीं हुई। प्रवीण भईया, सुधीर भईया को भी फोन किया था, पर फोन लगा नहीं। दर्शन के बाद वहां से लौट कर रात में ही आज दो बजे सोनप्रयाग पंहुचा। साथ में दस पंद्रह दर्शन कर लौटने वाले लोग थे। यहां सरदारों की ओर से लंगर चल रहा है। उसी में भोजन किया। फिर आपस में बातचीत होती रही। अब नींद से आंख भारी हो रही है। पर फाटा लौट कर वहां दिन भर सोऊंगा।”

रास्ते का एक दृश्य, प्रेमसागर का भेजा हुआ

गजब आदमी! कल दिन भर चलता रहा। चालीस किलोमीटर चल कर फाटा से केदारनाथ दर्शन किये। फिर लौट कर चालीस किमी पैदल चल कर वापस फाटा पंहुचेगा (अपडेट – साढ़े नौ बजे फाटा पंहुच गये प्रेमसागर फाटा में, जहां उन्होने लॉज में अपना सामान रखा हुआ है)! अस्सी किलोमीटर की पहाड़ की पैदल यात्रा तीस घण्टे में। उस बीच केदारनाथ के ‘वंस-इन-लाइफटाइम’ वाले दर्शन। प्रेमसागर ने अपनी क्षमता की असीमता का सशक्त सिगनेचर प्रस्तुत कर दिया! हर हर महादेव!

पिछले तीन दिन की तरतीबवार यात्रा कर विवरण तो अलग से, प्रेमसागर से और इनपुट्स लेने के बाद प्रस्तुत करूंगा; फिलहाल यह बता रहा हूं, कि द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा का इग्यारहवां ज्योतिर्लिंग दर्शन सम्पन्न हो गया है। बारहवां ज्योतिर्लिंग – बाबा बैजनाथ धाम – तो प्रेमसागर का अपना ‘घर’ है। जहां वे 100 से अधिक बार कांवर यात्रा कर चुके हैं। कई बाद दण्ड – दण्डवत करते हुये भी – यात्रा की है वहां की। सो एक प्रकार से कहा जा सकता है कि अपना संकल्प प्रेमसागर ने केदार दर्शन कर पूरा कर लिया है! जय हो!

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
प्रेमसागर की पदयात्रा के प्रथम चरण में प्रयाग से अमरकण्टक; द्वितीय चरण में अमरकण्टक से उज्जैन और तृतीय चरण में उज्जैन से सोमनाथ/नागेश्वर की यात्रा है।
नागेश्वर तीर्थ की यात्रा के बाद यात्रा विवरण को विराम मिल गया था। पर वह पूर्ण विराम नहीं हुआ। हिमालय/उत्तराखण्ड में गंगोत्री में पुन: जुड़ना हुआ।
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची

अब प्रेमसागर को बदरीनाथ जाना है। वह पैदल यात्रा होगी या वाहन से – मुझे मालुम नहीं। उनके नियमानुसार तो अब वाहन से वह यात्रा कर सकते हैं – जितना उपलब्ध हो। उसके बाद वाराणसी वाहन के प्रयोग से आकर, वाराणसी से सुल्तानगंज-देवघर की कांवर यात्रा करनी होगी उन्हें। पर वह सब बाद के लिये।

फिलहाल तो यह सूचना कि, प्रेमसागर का केदार दर्शन सम्पन्न हुआ।

प्रेमसागर का भेजा केदारनाथ का दृष्य

जय बाबा केदारनाथ। हर हर महादेव!


कांवरयात्रा – गंगोत्री से रुद्रप्रयाग और आगे


पांच मई 2022 – गंगोत्री से बौरारी (नई टिहरी शहर)

चार मई को, पिछले दिन की गोमुख की बर्फबारी भरी यात्रा में भीगने के बाद, प्रेमसागर मौनिया बाबा के आश्रम में विश्राम किये। पांच मई को उन्हें चलना था रुद्रप्रयाग के लिये। रुद्रप्रयाग से गंगोत्री की पैदल यात्रा वे कर चुके थे; इसलिये वापसी की यात्रा वाहन के प्रयोग से की। आश्रम के बंधु लोग उन्हें 94 किमी कार में ले कर आये और फिर उन्होने बस पकड़ी। शाम के समय वे नई टिहरी – बौरारी पंहुचे। बस अड्डे के पास ही एक लॉज में रात्रि विश्राम किया। उनके साथ नासिक के दो लोग – भगवान मारुति लाटे और वामन टी राव गायकवाड़ भी थे। इन सज्जनों से उनकी मुलाकात गंगोत्री आश्रम में ही हुई थी; वैसे नासिक में त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग दर्शन के दौरान प्रेमसागर जहां रुके थे, इन दोनो सज्जनों का गांव/डेरा ज्यादा दूर नहीं था। पर महादेव ने उन्हें मिलाया गंगोत्री में ही।

उनके साथ नासिक के दो लोग – भगवान मारुति लाटे (बांये) और वामन टी राव गायकवाड़ भी थे।

ये दोनो सज्जन भी जाने वाले हैं केदार, पर पैदल नहीं बस में बैठ कर। बौरारी तक का ही उनका साथ प्रेमसागर के साथ था। बौरारी के बाद प्रेमसागर अकेले कांवर पदयात्रा करने वाले हैं केदारनाथ की। उसके बाद प्रेमसागर बदरीनाथ भी जायेंगे। वह यात्रा भी पैदल होगी या वाहन का प्रयोग होगा, मैं अभी नहीं कह सकता। प्रेमसागर से उसके बारे में बात नहीं हुई है।

प्रेमसागर ने बताया कि उत्तराखण्ड में वे हरिद्वार पंहुचे थे। वहां से ऋषिकेश, नीलकण्ठ, देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग, श्रीनगर, चंबा, जमुनोत्री, घरासूपिण्ड और वहां से गंगोत्री पंहुचे थे। गंगोत्री में उनका मुझसे सम्पर्क पुनः हुआ था।

अब नई टेहरी से वे रुद्रप्रयाग बस से जायेंगे। आगे केदार की यात्रा कांवर पदयात्रा होगी।

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
प्रेमसागर की पदयात्रा के प्रथम चरण में प्रयाग से अमरकण्टक; द्वितीय चरण में अमरकण्टक से उज्जैन और तृतीय चरण में उज्जैन से सोमनाथ/नागेश्वर की यात्रा है।
नागेश्वर तीर्थ की यात्रा के बाद यात्रा विवरण को विराम मिल गया था। पर वह पूर्ण विराम नहीं हुआ। हिमालय/उत्तराखण्ड में गंगोत्री में पुन: जुड़ना हुआ।
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द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची

मैं गंगाजी की यात्रा के मार्ग को गूगल मैप पर ट्रेस करता हूं। गोमुख से भागीरथी निकल कर गंगोत्री होते हुये देवप्रयाग पंहुचती हैं। वहां उनमें अलकनंदा आ कर मिलती हैं। इनके मिलन से देवप्रयाग संगम के बाद उनका नाम गंगा हो जाता है।

इस संगम के पहले रुद्रप्रयाग में भी एक संगम है। वहां मंदाकिनी नदी अलकनंदा में आ कर मिलती हैं। और आगे रुद्रप्रयाग से देवप्रयाग तक उनका नाम अलकनंदा रहता है। प्रेमसागर मुझे देवप्रयाग के अलकनंदा और भागीरथी संगम के चित्र नहीं दे पाये। शायद उनके मोबाइल में से डिलीट हो गये हैं। प्रेमसागर अपने मोबाइल में सम्भवत: पहले की यात्रा के चित्र भी डिलीट कर चुके हैं। नागेश्वर तीर्थ तक के चित्र तो मेरे ब्लॉग पर मिल सकते हैंंउसके बाद त्र्यम्बकेश्वर, भीमाशंकर, गृश्नेश्वर, मल्लिकार्जुन, रामेश्वरम और फिर गंगोत्री तक के चित्र हैं या नहीं, कह नहीं सकता। प्रेमसागर ट्रेवल लाइट में यकीन करने वाले हैं। और उस सिद्धांत से चित्र भी निकल गये! 🙂

बौरारी (नई टिहरी) में राणा होटल

बौरारी में वे राणा होटल में ठहरे। साथ में दोनो महाराष्ट्रीय सज्जन भी थे। वहां के चित्र उन्होने भेजे हैं।

प्रेम सागर बताते हैं कि दोनों मराठी सज्जन उनकी हिंदी समझते हैं और वैसी हिन्दी बोलते हैं जो समझ में आ जाती है। सम्प्रेषण की असुविधा उनके साथ नहीं हुई।

छ मई 2022 – बौरारी से रुद्रप्रयाग

सवेरे छ बजे प्रेमसागर ने सम्पर्क किया तो वे अंतरराज्यीय बस अड्डे पर बस पकड़ कर रुद्रप्रयाग के लिये रवाना हो गये थे। उन्होने बताया कि बारह बजे तक वे रुद्रप्रयाग पंहुचने वाले हैं। वहां से वे ‘आज ही के दिन आगे पांच किलोमीटर ही सही, थोड़ा तो पैदल चलेंगे ही’।

पर वह चलना अंतत: नहीं हो पाया। अगले दिन प्रेमसागर ने बताया कि मौसम खराब हो गया था। आंधी पानी आ गया था। इसलिये रुद्रप्रयाग में ही केदारनाथ-बदरीनाथ आश्रम धर्मशाला में वे रुक गये। यह धर्मशाला वाली जगह यूं ही राह चलते उन्हें दिख गयी थी – “बारिश हो रही थी। यह जगह दिखी तो पूछने पर रुकने के लिये जगह मिल गयी। किराया होटलों की अपेक्षा कम था और भोजन तो प्रबंधक साहब ने अपने घर से मंगवा कर करा दिया। पूरा आतिथ्य!”

सात मई 2022 – रुद्रप्रयाग से आगे

सवेरे साढ़े छ बजे प्रेमसागर अपनी “कांवर कस” रहे थे। कांवर टाइट करना भी कांवरिया-जीवन में मुहावरा हो जाता है। मुहिम पर चलने के पहले की तैयारी कांवर कसना या टाइट करना होती है। अकेले यात्रा करनी है उन्हें। “अकेले ही चलेंगे भईया। कोई रास्ते में मिल जाये तो मिल जाये। वर्ना महादेव तो हैं ही।” प्रेमसागर ने कहा।

मैंने उन्हे उत्तर दिया – “महादेव तो सतत आपके साथ हैं। तभी तो इतनी लम्बी यात्रा कर पाये हैं!”

“सो तो है भईया। पर इतनी लम्बी यात्रा में कभी कभी बीच में हिम्मत डोल जाती है। आप जैसे लोग ही सहारा देते हैं। वर्ना कभी कभी तो चाय के लिये भी पैसा नहीं रहता।”

“पर मैंने तो सोचा कि बहुत से लोग साथ होंगे। गुजरात के लोग साथ नहीं हैं। उनसे बात नहीं होती?”

“होती है, बराबर बात होती है। वे लोग तो बहुत सहायता किये। गौशाला और वृद्धाश्रम के लिये जमीन भी मुहैय्या करा रहे हैं। पर मेन बात है भईया कि मेरे स्वभाव में मुंह खोलना नहीं है। वे लोग अपेक्षा करते हैं कि मुंह खोल कर बोलें तो।”

लगता है मुंह खोलने की अपेक्षा और न खोलने की वृत्ति के बीच द्वन्द्व है। पहले जब प्रेमसागर एकाकी चल रहे थे तो उनके यूपीआई एड्रेस को मैं ब्लॉग पोस्ट में दिया करता था। पता नहीं कि उसकी आवश्यकता बनती है या नहीं? वैसे उनका यूपीआई एड्रेस है – prem12shiv@sbi

शाम तक प्रेमसागर करीब पच्चीस किमी चले। रास्ते में उन्होने रुद्रप्रयाग से निकलते ही मंदाकिनी और अलकनंदा संगम और अन्य स्थलों के चित्र भेजे। मंदाकिनी का जल हरा-नीला और अलकनंदा का श्वेत दीखता है।

रुद्रप्रयाग संगम पर मंदाकिनी (गाढ़ा रंग) और अलकनंदा का जल अलग अलग पता चलता है। चित्र मंदाकिनी की ओर से लिया गया है। प्रेमसागर मंदाकिनी किनारे यात्रा कर रहे हैं।

शाम का डेरा अगस्त्य मुनि लॉज में था। किंवदंति के अनुसार यहीं मंदाकिनी के तट पर अगस्त्य मुनि ने तपस्या की थी। अगस्त्य मुनि (कुम्भज ऋषि) को सामान्यत: दक्षिण भारत से जोड़ा जाता है जिन्होने समुद्र को सोख लिया था या विंध्याचल को और उन्नत होने से रोक दिया था। रामायण में अगस्त्य का आश्रम गोदावरी तट पर था। पर केदार के रास्ते में भी उनकी तपस्थली/गृह स्थान है, यह नई जानकारी थी मेरे लिये।

(अगस्त्य मुनि लॉज और अगस्त्य मुनि तपस्थली, मंदाकिनी के तीर पर।)

आगे का विवरण आने वाली पोस्टों में!

हर हर महादेव! जय केदारनाथ-बदरीनाथ!!!


प्रेमसागर – गंगोत्री से गोमुख और वापस


करीब सप्ताह भर से प्रेमसागर गंगोत्री में थे। एक दिन मुझे गंगोत्री के परिवेश और गंगा माता के मंदिर के लाइव वीडियो-दर्शन कराये थे। उसके बाद किन्ही मौनी बाबा के आश्रम में डेरा जमाये। इस सप्ताह भर में मैं मन बनाता रहा कि गंगोत्री से केदार की यात्रा का विवरण ब्लॉग पर डालूं। मैं लगभग पैसिव था – लिखने का अर्थ दिन में तीन चार घण्टे डिजिटल-यात्रा में लगाना ही पड़ता। लेकिन जब प्रेमसागर ने गंगोत्री से गोमुख की यात्रा के बारे में मुझे बताया और यात्रा के चित्र भेजे तो लिखने के बारे में निश्चय हो ही गया।

मई तीन, 2022 की गोमुख यात्रा

आज पांच मई है। तीन मई को प्रेमसागर जी ने गोमुख की यात्रा की। बीस किलोमीटर पहाड़ की यात्रा में गंगोत्री से जाना और गोमुख से जल ले कर गंगोत्री वापस लौटना – बहुत कठिन काम है। ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी में दम फूलता है। पर प्रेमसागर वह कर गये। राजेंद्रग्राम से अमरकण्टक की चढ़ाई में प्रेमसागर ने कहा था कि अगर संकल्प न लिये होते तो वह चढ़ाई कभी चढ़ते नहीं। गंगोत्री-गोमुख की चढ़ाई, मेरे अनुमान से उससे ज्यादा दुरुह होगी। पर अमरकण्टक से अब तक प्रेमसागर की प्रकृति, साहस और आत्मविश्वास में बहुत कुछ बदला है। बहुत कुछ सार्थक बदलाव आया है।

प्रेमसागर ने भी बताया कि ऑक्सीजन की कमी महसूस हो रही थी। साथ में आठ नौ लोग थे। वन विभाग के लोग थे। उसके अलावा कलकत्ता के कुछ यूट्यूबर थे। वन कर्मी साथ थे तो रास्ते में असुविधा नहीं हुई। रास्ता उनका जाना पहचाना था। उन्होने कहा कि गोमुख जा कर एक ही दिन में लौट आना है। वे नहीं चाहते थे कि रास्ते में ओवरनाइट स्टे किया जाये। इसलिये जाने आने की दूरी एक दिन में तय की। अन्यथा लोग रास्ते में आठ किलोमीटर बाद चीड़वासा और भोजवासा में रात्रि विश्राम करते हैं। गोमुख में रात गुजारने की सुविधा नहीं है।

रास्ते में साइनबोर्ड

रास्ता दुरुह था। करीब दो फिट चौड़ा। उतना संकरा रास्ता पैदल ही पार करने के लिये ही उपयुक्त होता है। वही किया जा रहा था। एक ओर पहाड़ की चढ़ाई और दूसरी ओर 1000 फीट (कम से कम) का गह्वर, जिसमें भागीरथी बह रही थीं। दर्शनीय तो था ही पूरा इलाका। कई जगह वन विभाग के बने पुल से पार करना पड़ा।

“बन वाले हमको अकेले जाने की परमीशन नहीं दिये। बोले – बाबा लोग का भरोसा नहीं। क्या पता कौन बाबा किस गुफा में आसन जमा ले। एक बार बैठ जाने पर उस बाबा को वहां से निकालना मुश्किल होता है।” – प्रेमसागर ने बताया।

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
प्रेमसागर की पदयात्रा के प्रथम चरण में प्रयाग से अमरकण्टक; द्वितीय चरण में अमरकण्टक से उज्जैन और तृतीय चरण में उज्जैन से सोमनाथ/नागेश्वर की यात्रा है।
नागेश्वर तीर्थ की यात्रा के बाद यात्रा विवरण को विराम मिल गया था। पर वह पूर्ण विराम नहीं हुआ। हिमालय/उत्तराखण्ड में गंगोत्री में पुन: जुड़ना हुआ।
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची

“बर्फ का पहाड़ था गोमुख। ऊपर मिट्टी जमा था। बर्फ गर्मी में पिघलने से पानी निकल रहा था। रास्ते में कई जगह मिट्टी के धसकने की चेतावनी के बोर्ड लगे हुये थे। पूरे रास्ते भर बर्फ की बारिश होती रही। बर्फ के छोटे छोटे टुकड़े थे। उसके कारण मोबाइल से चित्र लेना मुश्किल था। जो फोटो खींचे भी वे नीले नीले आये हैं। बर्फ की बारिश ऐसी थी कि विण्डचीटर होने के बाद भी भीग गये। यात्रा लम्बी और बहुत कष्टदाई थी। रात नौ बजे वापस गंगोत्री पंहुचने पर मौनीबाबा के आश्रम वाले कहे कि एक दिन विश्राम कर परसों निकलियेगा रुद्रप्रयाग के लिये। वैसे कार्यक्रम चार मई को ही निकलने का था।” – प्रेमसागर तीन तारीख की रात गंगोत्री वापस आ कर चार को वहां रुके और पांच मई को सवेरे आठ बजे तक वाहन से रुद्रप्रयाग के लिये निकल लिये।

प्रेमसागर अपने गंगोत्री-गोमुख के सहयात्रियों के साथ

रुद्रप्रयाग से गंगोत्री की पद यात्रा वे कर ही चुके थे गंगोत्री जाने के समय। अब रुद्रप्रयाग से केदार की अस्सी किलोमीटर की यात्रा – जिसमें तीन-चार दिन लगेंगे छ मई को सवेरे प्रारम्भ होगी। जब तक केदारनाथ पंहुचेंगे, वहां मंदिर खुल चुका होगा।

केदार की यात्रा के लिये गोमुख से भागीरथी का जल उठाना महत्वपूर्ण कृत्य था, जो तीन मई को प्रेमसागर ने सम्पन्न कर लिया। अब देवप्रयाग से केदार और फिर बदरीनाथ की यात्रा करनी है उन्हें। केदार की यात्रा के बाद चार-पांच दिन लगेंगे बदरीनाथ की यात्रा में। अर्थात कुल दस दिन। … दस दिन का पहाड़ का डिजिटल भ्रमण मेरा भी होगा। प्रेमसागर का साथ बीच में टूट गया था, तो अभी अटपटा लग रहा है। सम्पट बैठने में दो तीन दिन लगेंगे! प्रेमसागर अपने संकल्प से बंधे हैं और मुझे पहाड़ की यात्रा आकर्षित कर रही है। दोनो के ध्येय अलग अलग हैं; पर परिणति ब्लॉग की पोस्टों में होगी। … यात्रा इसी का नाम है। अलग अलग ध्येय के लोग एक साथ जुड़ते हैं और कुछ दूर साथ साथ चलते हैं। कुछ साथ चलते हैं तो सुहृद हो जाते हैं।

प्रेमसागर का अपना जो भी नेटवर्क बना हो, मेरे लिये वे अब भी वही प्रेमसागर हैं जो विक्रमपुर के ओवरब्रिज के पास भादौं महीने में कांवर उठाये जा रहे थे। देखते हैं अगले दस दिन हम दोनों के सामुहिक डिजिटल जुड़ाव से क्या क्या निकलता है।

हर हर महादेव!


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