मानसून ने चुपचाप हाजिरी लगा दी


पूरे जून भर बादल आते रहे, अनमने से। बरसने का उनका कोई इरादा नहीं था। भदोही जिले में तो जून के अंत तक लगभग 99 प्रतिशत वर्षा की कमी दर्ज हुई। धान की नर्सरियाँ प्रतीक्षा में सूखने लगी थीं और किसान आसमान को कुछ अधिक देर तक देखने लगे थे। मौसम विभाग के अनुमान हर घंटे अपने कहे से पलटते रहे, पर बादल मानो अपनी ही मर्जी पर अड़े थे।

ऐसे में मानसून आया भी तो वैसे नहीं, जैसा देखता आया हूं। उसका आगमन किसी विजयी सेना जैसा होता था। पहले हवा चलती, फिर काले बादल उमड़ते, बिजली चमकती, गरज सुनाई देती और उसके बाद झमाझम वर्षा। मौसम का एप्प देखे बिना ही अहसास हो जाता था कि धरती के अधरों पर पहला मेघ झरने जा रहा है।

कल दोपहर मैं विश्राम के बाद स्ट्रेचिंग का व्यायाम कर रहा था। उमस थी तो बाहर क्या हो रहा है, वह झांकने का ध्यान ही नहीं आया। तभी पत्नीजी ने आकर कहा, “आज चाय बाहर पोर्टिको में पी जाए। बारिश हो रही है, मौसम अच्छा हो गया है।”

मैं बाहर आया तो सचमुच बारिश हो रही थी। इतनी चुपचाप कि उसके आने का पता ही नहीं चला। हवा बिल्कुल नहीं थी। पानी धीरे-धीरे गिर रहा था और धरती बिना किसी हड़बड़ी के उसे अपने भीतर समेटे जा रही थी। कहीं बहाव नहीं, कहीं उफान नहीं। बस, आकाश, पेड़ों और मिट्टी के बीच एक शांत संवाद हो रहा था।

तभी मन में आया—यह मानसून तो बिल्ली की तरह दबे पाँव घर में घुस आया है। शायद यह उपमा घर में घूमती उस बिल्ली से आई होगी जो कब किसी कबूतर के लिये दुबक कर बैठ जाती है, पता ही नहीं चलता।

एक और शरारती विचार आया। कहीं मानसून को भी मेरी तरह ऑस्टियोआर्थराइटिस तो नहीं हो गया? पहले वह दौड़ता हुआ आता था, अब जैसे लाठी टेकता हुआ चलता है। जो मानसूनी व्यवहार पहले असामान्य लगता था, वही अब सामान्य होने लगा है।

चाय लेकर बैठा तो सामने अपना बगीचा था। दस वर्ष पहले यह नहीं था। खेत था। कुछ खरपतवार थी, और कुछ नहीं। घर बनना शुरू हुआ तो उसके साथ पेड़ भी लगाने लगे हम —नीम, छितवन, आम, चीकू, अमरूद, नींबू, सागौन, शमी और तुलसी। पेड़ लगाने का सुख यह है कि आदमी अपने भविष्य का भी थोड़ा-सा रोपण कर देता है।

इस साल की इस पहली बारिश में सबसे अधिक प्रसन्न श्रावणी दिखाई दी। गुलाबी फूलों से लदी उसकी डालियाँ झुक गई थीं। लगा जैसे वह वर्षा का स्वागत नहीं, उसका अभिवादन कर रही हो। फूल नमस्कार की मुद्रा में थे।

सवेरे धूप निकलने पर अरुणा कपड़े धोकर बगीचे की रस्सियों पर डाल गई थी। शाम को लौटकर आती तो उतार लेती। पर मानसून ने दबे पांव अतिथि की तरह आकर धोखा दे दिया। कपड़े सूखने के बजाय भीग गए। बाहर निकला तो एक क्षण को लगा कि दौड़कर उतार लूँ। फिर लगा कि अब उसका कोई अर्थ नहीं है।

भीगे कपड़ों को देखकर बचपन याद आया। तब बारिश का मतलब ही भीगना होता था। कोई जल्दी नहीं होती थी। अब भीग जाने पर पहले कपड़े बदलने का विचार आता है। एलर्जी और छींकें याद आ जाती हैं।

मानसून का पहला दिन
मानसून का पहला दिन

उम्र आनंद नहीं छीनती, केवल उसकी शर्तें बदल देती है।

इसी बीच अमेजन का डिलीवरी करने वाला युवक पार्सल लेकर आया। बारिश के कारण अपनी मोटरसाइकिल कार के शेड में खड़ा कर वहीं रुक गया। पत्नीजी ने उसे भीतर बुला लिया। वह कुछ झिझकता हुआ आया। समझ नहीं पा रहा था कि जूते उतारे या नहीं। चाय के लिए भी उसने पहले मना किया, लेकिन उसके चेहरे से लग रहा था कि गरम चाय उसे अच्छी लगेगी।

पहला घूँट पीते ही उसका संकोच टूट गया। फिर उसने कप चाय दोनों हाथों से थाम लिया और अपनी कहानी शुरू कर दी। बनारस के पुराने मोहल्ले का जायसवाल परिवार। पुश्तैनी मकान का विवाद। सीधे-सादे पिता, जो भदोही आकर बस गए। जुझारू बेटा, जिसने अपना हिस्सा लेने के लिए मारपीट भी झेली और मुकदमा भी। पहले ऑटो चलाता था। अब अमेजन की डिलीवरी करता है। रोज पचास से अधिक पार्सल पहुँचाता है और लगभग तीस किलोमीटर के दायरे में घूमते-घूमते शाम को एक हजार रुपये के आसपास कमाकर घर लौटता है।

आश्चर्य मुझे उस युवक की कहानी पर नहीं, अपने ऊपर हुआ। मैं बहुत धैर्यवान श्रोता नहीं हूँ। अगर उसी समय कोई फोन आ गया होता, कोई मिलने आ गया होता या कोई और काम निकल आया होता, तो शायद मैं उठ खड़ा होता। लेकिन न कोई व्यवधान आया, न मैं उठा। वह बोलता गया और मैं सुनता रहा। बीच-बीच में मन में यह भी आया कि अब बात पूरी होनी चाहिए, लेकिन फिर लगा कि उसे आज कह लेने दीजिए। शायद उसे भी उस दिन जल्दी नहीं थी। बारिश ने उसकी दौड़ भी रोक दी थी और मेरी भी।

उसके जाने के बाद मैंने महसूस किया कि गिग इकॉनॉमी के बारे में मेरी धारणा थोड़ी बदल गई है। पहले उसमें केवल कठिनाई और असुरक्षा दिखाई देती थी। कल पहली बार उसमें श्रम का स्वाभिमान भी दिखाई दिया। मेहनत बहुत है, लेकिन वह किसी के सामने हाथ फैलाकर नहीं, अपने श्रम से घर चला रहा है। हर व्यवस्था का मूल्यांकन दूर से नहीं किया जा सकता; कभी-कभी एक कप चाय और आधे घंटे की बातचीत भी हमारी राय बदल देती है।

सोचता हूँ, नौकरी में होता तो यह बातचीत शायद पाँच मिनट भी न चलती। तब समय हमेशा किसी और का होता था। अब समय मेरा है। शायद इसी कारण अब लोगों की बातें सुनने का अवसर मिलता है। कौन जाने, वह युवक किसी दिन किसी कहानी या उपन्यास में एक छोटे-से पात्र के रूप में फिर सामने आ जाए। लेखक पात्र नहीं गढ़ता, उन्हें रास्ते में बटोरता चलता है। हर मौसम में — मानसून की किचिर पिचिर में भी!

शाम ढलने लगी थी। बारिश अब भी उसी मंथर गति से गिर रही थी। उसे देखते-देखते अचानक पिताजी याद आ गए। बुढ़ापे में उनके हाथ काँपते थे। एक चेक पर हस्ताक्षर करने में चार-पाँच चेक खराब हो जाते थे। हर हस्ताक्षर धीरे-धीरे बनता था, जैसे हाथ पहले रुकता हो, फिर आगे बढ़ता हो।

बारिश अब भी उतनी ही धीमी थी। लगा, जैसे कोई वृद्ध काँपते हाथों से रजिस्टर में अपनी हाजिरी दर्ज कर रहा हो। उसने कोई घोषणा नहीं की, बस बता गया कि वह आ चुका है।

आषाढ़ का पहला दिन था। कालिदास होते तो शायद “आषाढस्य प्रथमदिवसे…” से मेघदूत रच देते। मेरे हिस्से में बस बरामदे की एक कुर्सी, चाय का कप, भीगे कपड़े, एक अमेज़न वाला युवक और अपने पिता के काँपते हुए हस्ताक्षर आए। मुझे लगता है, फिलहाल यही मेरा मेघदूत है।

ψψψ

एक रिटायर्ड अधिकारी का साइकिलवाद


रेलवे में नौकरी के दिनों की एक छोटी-सी आदत थी, जो तब सामान्य लगती थी। प्रयागराज या गोरखपुर के रेलवे जोनल मुख्यालय में एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर तक पैदल जाया जा सकता था, पर पैदल अकेले नहीं। साथ में चपरासी चलता था, फाइलें उठाए। बिल्डिंग के बाहर ड्राइवर कार लगाए खड़ा रहता था। वह दरवाज़ा खोलकर बैठाता था। आगे चपरासी बैठता था। दूसरी बिल्डिंग में उतरते ही वही क्रम फिर शुरू हो जाता था।

उस समय यह व्यवस्था थी। मैंने उसके बारे में कभी विशेष सोचा भी नहीं।

रिटायरमेंट के बाद जब गाँव लौटा तो वह पूरी व्यवस्था एक ही दिन में समाप्त हो गई। न ड्राइवर, न चपरासी, न सरकारी गाड़ी। उसके स्थान पर मेरे पास थी एक साधारण साइकिल।

शुरू में वह केवल आने-जाने का साधन थी। फिर धीरे-धीरे उसने मुझे गाँव को देखने का एक नया तरीका सिखा दिया।

साइकिल पर चलते हुए गति इतनी होती है कि रास्ता छूटता नहीं और इतनी कम होती है कि पेड़ पर बैठे पक्षी, खेत में काम करते किसान, पोखर का पानी, कच्ची सड़क की धूल और किसी बुज़ुर्ग का बरामदे में बैठा चेहरा—सब दिखाई देने लगते हैं। कार में ये सब दृश्य केवल पृष्ठभूमि बनकर निकल जाते हैं।

मैंने आसपास के गाँवों, पगडंडियों और खेतों को देखना शुरू किया। जेब में एक छोटी नोटबुक रहती, हाथ में मोबाइल फोन। जहाँ कुछ रोचक दिखा, उसका चित्र लिया, दो पंक्तियाँ लिखीं और आगे बढ़ गया। धीरे-धीरे मुझे समझ में आया कि मैं केवल साइकिल नहीं चला रहा हूँ; मैं अपने देखने का तरीका बदल रहा हूँ।

अब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि रिटायरमेंट मेरे जीवन का पलट-बिंदु था। अंग्रेज़ी में जिसे Tipping Point कहते हैं। उसके बाद जीवन की दिशा बदल गई। अफसरवाद से साइकिलवाद की ओर।

साइकिलवाद का अर्थ केवल साइकिल चलाना नहीं है। वह तो उसका सबसे दिखाई देने वाला प्रतीक भर है। वास्तविक परिवर्तन भीतर हुआ था।

उसके बाद दो घटनाएँ और हुईं जिन्होंने मेरी सोच को और आकार दिया। पहली थी कोरोना महामारी। दूसरी, होरमुज़ क्षेत्र का संकट, जिसके कारण कुछ समय के लिए ऊर्जा और रसोई गैस को लेकर अनिश्चितता का वातावरण बना।

अब मुझे लगता है कि ये दोनों मेरे जीवन के बदलाव-बिंदु थे। दिशा उन्होंने नहीं बदली; दिशा तो रिटायरमेंट ने बदल दी थी। पर उन्होंने मेरी चाल बदल दी। जैसे नदी वही रहती है, पर कहीं उसका प्रवाह तेज़ हो जाता है और कहीं धीमा।

कोरोना ने यह सिखाया कि मनुष्य जितना समझता है, उससे कहीं कम चीज़ों में भी जीवन चल सकता है।

होरमुज़ संकट ने यह प्रश्न खड़ा किया कि यदि ऊर्जा महँगी होती चली जाए तो क्या हमारी जीवन-शैली बदलनी चाहिए?

इन प्रश्नों ने मुझे अपने जीवन की छोटी-छोटी आदतों को देखने पर मजबूर किया।

हमारी छोटी आल्टो कार अब दस वर्ष पुरानी हो चुकी है। उसे बदलने का समय था। पहले मैं शायद बिना अधिक सोचे नई कार ले लेता। इस बार निर्णय टाल दिया। कार अभी चल रही है। दो वर्ष और चलेगी। क्यों न चलने दिया जाए?

बाज़ार जाने से पहले अब एक नया प्रश्न उठता है—क्या यह काम साइकिल से हो सकता है?

अमेज़न खोलने से पहले दूसरा प्रश्न आता है—क्या यह वस्तु सचमुच चाहिए?

धीरे-धीरे मैंने पाया कि खरीदारी केवल पैसे का मामला नहीं होती। वह मन की बेचैनी का भी मामला होती है। बाज़ार चाहता है कि हम लगातार कुछ नया चाहते रहें। शायद आत्मनिर्भरता का पहला कदम यह है कि हम हर इच्छा पर तुरंत प्रतिक्रिया देना बंद कर दें।

इसी समय मेरे पढ़ने का संसार भी बदलने लगा।

हेनरी डेविड थरू मुझे पहले भी अच्छे लगते थे, पर अब वे अधिक समझ में आने लगे। आधुनिक मिनिमलिस्ट लेखकों को पढ़ने लगा। इन दिनों सुबह घर के परिसर में साइकिल चलाते हुए मार्क बॉयल की द वे होम सुनता हूँ। उसमें बार-बार एक बात आती है—यदि जीवन सरल हो जाए तो मनुष्य का समय वापस उसके पास लौट आता है।

मुझे लगता है कि मैं भी शायद उसी दिशा में धीरे-धीरे चल रहा हूँ। बिना किसी क्रांति के। बिना किसी घोषणा के।

रसोई तक भी यह परिवर्तन पहुँच गया।

माइक्रोवेव में बिना तेल की सब्ज़ियाँ बनाने के प्रयोग शुरू हुए। फिर लगा कि यदि वही काम कम बिजली में हो सके तो और अच्छा। अब 150 वाट के स्लो कुकर के साथ प्रयोग चल रहे हैं।

इन प्रयोगों से पत्नीजी बहुत प्रसन्न नहीं हुईं।

उन्हें लगता है कि मैं उनके कार्यक्षेत्र में अनावश्यक दख़ल दे रहा हूँ। उनका कहना भी गलत नहीं। पर अब यह घरेलू संवाद भी जीवन का एक नया अध्याय बन गया है। वे मुस्कराकर कहती हैं—”जब जवान थे, तब तो मेरी तरफ देखा नहीं। ट्रेनों को चलवाने और इंटरचेंज गिनने में लगे रहे। अब जब झुर्रियाँ आने लगी हैं, तब तुम्हें मेरी याद आई।”

मैं उनकी बात सुनकर हँस देता हूँ। सच पूछिए तो शायद वे ठीक ही कहती हैं।

उम्र बढ़ने का एक लाभ यह भी है कि आदमी धीरे-धीरे अपनी प्राथमिकताएँ बदलना सीख लेता है।

अब मुझे सुविधा से अधिक पर्याप्तता आकर्षित करती है।

गति से अधिक लय।

उपभोग से अधिक प्रयोग।

और बाज़ार से अधिक गाँव।

इसी परिवर्तन को यदि कोई नाम देना हो तो मैं उसे साइकिलवाद कहूँगा।

यह कोई विचारधारा नहीं है। न ही यह दूसरों को अपनाने का आग्रह है। यह तो केवल मेरे जीवन के प्रयोगों का नाम है।

फिलहाल इसके कुछ सूत्र मुझे दिखाई देते हैं—

  • जहाँ साइकिल जा सकती है, वहाँ कार ले जाना संसाधनों का दुरुपयोग है। भोजन इतना सरल हो कि बनाने में आधा घंटा न लगे, और इतना पौष्टिक हो कि शरीर आधा दिन शिकायत न करे।
  • हर नई चीज़ पर विश्वास करने से पहले स्वयं प्रयोग किया जाए।
  • जो काम घर पर हो सकता है, उसके लिए बाज़ार पर निर्भरता कम की जाए।
  • गाँव सबसे बड़ा विश्वविद्यालय है। पेड़, पक्षी और किसान उसके प्रोफेसर हैं। मेरा घर-परिसर उसकी प्रयोगशाला है।
  • उम्र बढ़ने का अर्थ गति कम होना नहीं, बल्कि अनावश्यक चीज़ें कम होना है।
  • सुविधा नहीं, पर्याप्तता जीवन का लक्ष्य हो।

मुझे पूरा विश्वास है कि यह सूची बदलती रहेगी। कुछ सूत्र छूट जाएँगे। कुछ नए जुड़ेंगे। जीवन कभी स्थिर नहीं रहता।

शायद आगे मैं घर में अधिक सब्ज़ियाँ उगाऊँ। शायद ऊर्जा की बचत के और तरीके खोजूँ। शायद कुछ समय बाद यह भी समझ में आए कि जिन वस्तुओं को मैं अनिवार्य मानता था, उनमें से आधी की आवश्यकता ही नहीं थी।

और यह भी संभव है कि इनमें से कई प्रयोग असफल हो जाएँ। असफलता से मुझे कोई शिकायत नहीं होगी। शिकायत केवल तब होगी जब प्रयोग करना बंद हो जाएगा।

कौन जाने, कुछ वर्षों बाद मेरी साइकिल के कैरियर पर दो पुस्तकें हों, हैंडल से सब्ज़ियों और फलों की टोकरी लटक रही हो, और घर लौटकर मैं स्लो कुकर में रात का भोजन चढ़ा रहा होऊँ। उस समय शायद कोई पूछे कि यह सब क्यों?

तब मैं केवल इतना कहूँगा—मैंने जीवन को थोड़ा हल्का करने की कोशिश की है।

यदि उस प्रयास को कोई नाम देना हो, तो मेरे लिए वह साइकिलवाद है।

साइकिलवाद

ψψψ

मेरे घर की जलमुर्गी


मेरे घर में एक जलमुर्गी आती है।

मैं यह नहीं कह सकता कि वह यहीं रहती है। पक्षियों के पते मनुष्यों की तरह नहीं होते। फिर भी वह इतनी नियमितता से आती है कि घर का हिस्सा लगने लगी है। जैसे कोई पड़ोसी हो जो बिना सूचना दिए आता-जाता रहता हो।

उसकी चाल मुझे शुरू से आकर्षित करती रही है। अधिकांश पक्षी या तो फुदकते हैं या जल्दी-जल्दी चलते हैं। यह न तो फुदकती है, न भागती है। गर्दन थोड़ा आगे निकाले, नपे-तुले कदम रखती हुई चलती है। जैसे संसार में कहीं कोई विशेष जल्दी न हो। कई बार उसे देखते हुए मुझे लगता है कि वह चल नहीं रही है, कैटवाक कर रही है।

गर्मी की दोपहरों में वह घर के पोर्टिको की छाया में दिखाई देती है। कभी पानी के तसले तक जाती है। पानी पीती है। कभी मूड हुआ तो थोड़ी देर स्नान कर लेती है। उसका स्नान भी उसके व्यक्तित्व जैसा है—संयमित। न कोई उछल-कूद, न पानी की फिजूलखर्ची। बाहर निकलकर वह बड़ी तन्मयता से अपने पंख सँवारती रहती है।

मैं घर के परिसर में अक्सर साइकिल चलाता हूँ। कई बार उसके पास से गुजरता हूँ। शुरू में वह मुझे देखकर हट जाती थी। अब भी हटती है, पर केवल उतना जितना उसे आवश्यक लगता है। जैसे उसने अनुभव से तय कर लिया हो कि यह आदमी और उसकी साइकिल असुविधा तो हो सकते हैं, पर खतरा नहीं।

हम दोनों के बीच वर्षों में एक प्रकार की समझ विकसित हो गई है। मैं उसका रास्ता नहीं रोकता। वह मेरे कामों में दखल नहीं देती।

फिर भी मैं स्वीकार करता हूँ कि मेरे मन में एक छोटी-सी इच्छा है।

मैं कभी-कभी कल्पना करता हूँ कि मैं बरामदे में बैठा चाय पी रहा हूँ। जलमुर्गी अपनी उसी नपी-तुली चाल में आती है। पानी पीती है। और फिर मेरी मेज के पास से निकल जाती है। शायद मेरे पैरों के बीच से भी। बिना घबराहट। बिना किसी विशेष सावधानी के। जैसे मैं वहाँ हूँ ही नहीं।

जल मुर्गी
नहाती जलमुर्गी। हमारे लिये धूमिल चित्र के आधार पर एआई का बनाया हुआ।

यह इच्छा थोड़ी स्वार्थी है।

मैं उसे छूना नहीं चाहता। उसे पालतू भी नहीं बनाना चाहता। मैं केवल इतना चाहता हूँ कि वह मुझे अपने संसार की उन चीजों में गिने जिनसे डरने की आवश्यकता नहीं होती।

कुछ दिन पहले मैंने उसे अचानक उड़ते देखा। यह असामान्य था। वह सामान्यतः चलकर दूरी बनाती है। उस दिन वह सीधे उड़कर एक पेड़ की शाखा में जा छिपी। मैंने चारों ओर देखा। थोड़ी दूर एक बिल्ली गुजर रही थी।

तब मुझे लगा कि जलमुर्गी संसार को हमसे कहीं अधिक स्पष्टता से देखती है। वह जानती है कि किससे कितना डरना है। मेरी साइकिल उससे कहीं बड़ी है, पर बिल्ली उसके लिए अधिक खतरनाक है।

पिछले वर्ष उसका एक बच्चा बिल्ली का शिकार हो गया था। उसके बाद वह कई महीनों तक दिखाई नहीं दी। मैं नहीं जानता कि उस अनुपस्थिति का कारण क्या था। पर इतना अवश्य है कि तब से जब भी कोई बिल्ली दिखती है, मुझे उसकी सतर्क आँखें याद आ जाती हैं।

शायद यही कारण है कि मैं उसके विश्वास को लेकर इतना उत्सुक रहता हूँ।

जंगली जीवों के साथ संबंध मित्रता से नहीं बनते। वे धीरे-धीरे बनते हैं। वर्षों के सह-अस्तित्व से। बिना किसी घोषणा के।

अभी वह मुझसे कुछ फीट की दूरी बनाए रखती है। और संभव है कि जीवन भर बनाए रखे। शायद वही उचित भी है।

फिर भी जब मैं सुबह चाय लेकर बरामदे में बैठता हूँ, तो और पक्षियों के साथ उसकी भी प्रतीक्षा करता हूँ। वह आए, अपनी उसी कैटवाक चाल में पानी के तसले तक जाए, और लौटते समय मुझे बिल्कुल महत्व न दे।

मैं अब शायद मानने लगा हूँ कि मैंने नहीं, उसने मुझे और मेरे परिसर को स्वीकार किया है। पानी के तसले के पास रखा रोटी का टुकड़ा जब वह बिना किसी हिचक के टूंगती है, तो यह विश्वास और पुख्ता हो जाता है।

एक सहज कृतज्ञता जन्म लेती है मुझमें – जलमुर्गी ने मेरे घर को अपने संसार में शामिल कर लिया है।

ψψψ

Design a site like this with WordPress.com
Get started