नर्मदा दंड परिक्रमा: अध्याय 4


घंसौर से आगे – नदी सौंदर्य दिखाती है, सड़क इंतजाम करती है

21 मई

मेरे हिसाब से प्रेमसागर को घंसौर से बरगी की ओर बढ़ना चाहिये था। नर्मदा उत्तर में हैं। पर वे पश्चिम की ओर निकल गये। सड़क की सहूलियत तय कर रही है — चलना किस दिशा में होगा।

आज लखनादोन रोड पर दो-ढाई किलोमीटर दंड भर कर आठ बजे ही रुक गये। डामर की सड़क सुबह से तपने लगी थी।

पूरे उत्तर भारत में लू बह रही है। मैं घर के बाहर नहीं निकल रहा — वातानुकूलित कार में भी नहीं। ऐसे में अलकतरे की काली सड़क पर लेट-लेट कर बढ़ना; दिन में दो किलोमीटर भी बहुत हैं।

तीन दिन घंसौर में रहना है — रामदीन चौकसे जी के यहाँ। भोजन के लिये लोग अपने-अपने घर बुला रहे हैं। आज रामगोपाल यादव जी के यहाँ जीमना हुआ।

रामदीन जी के बेटे सत्यम की राय है — बरगी की ओर रास्ता खराब है। गाँव दूर-दूर हैं। ठहरने और भोजन की दिक्कत होगी। लखनादोन की तरफ निकलना बेहतर है।

लखनादोन चालीस किलोमीटर दूर है। उसके आगे श्रीनगर-कन्याकुमारी हाईवे। सड़कों के रास्ते नरसिंहपुर पहुँचा जा सकेगा, पर पूरी यात्रा में नर्मदा तीस से साठ किलोमीटर दूर रहेंगी। बरगी का ड्रेगन उन्हें पास नहीं आने देगा। ग्वारीघाट, धुआँधार — सब बायपास।

नर्मदा की अठखेलियाँ, उनका उछलना-कूदना — इस यात्रा में नहीं होगा। यह शरीर के तप की यात्रा है; नर्मदा के सौंदर्य की नहीं।

मैं सोचता हूँ — यात्रा के असली साथी प्रेमसागर नहीं हैं। वे तो एक दूरबीन हैं; कभी साफ, कभी धुंधली, कभी गलत दिशा में फोकस करती हुई। असली पात्र तो रामदीन चौकसे, सत्यम और रामगोपाल यादव जैसे लोग हैं — जो अपने छोटे-छोटे इंतजामों से यात्रा को सम्भाले हुए हैं।

सत्यम की ऑनलाइन सेवाओं की दुकान है — फार्म भरना, खाता-खतौनी, आधार। उनके पिता रामदीन जी पशुओं और लोगों दोनों की चिकित्सा करते हैं। रामगोपाल यादव शिक्षक हैं।

“भईया लोग इतने संस्कारी हैं कि बाहर से घर पर कोई लड़की भी आ जाये तो उसके पैर छू कर प्रणाम करते हैं।” — प्रेमसागर ने कहा। 

आज बालपुर तक दंड भरा गया। सी.एल. यादव जी — जो बी.एल.ओ. हैं — उन्हें वापस घंसौर ले आये। कल बालपुर में डेरे का इंतजाम भी उन्हीं ने किया है।

नदी सौंदर्य दिखाती है, सड़क इंतजाम करती चलती है। फिलहाल प्रेमसागर ने नदी नहीं, सड़क चुनी है।

22 मई

आज दंड भरते प्रेमसागर बालपुर के आगे निकल गये। दोपहर का विश्राम और भोजन छविलाल गोलानी जी के यहाँ हुआ। वे उप सरपंच हैं।

परिवार के लोगों ने उनका पैर धो कर पाँवपूजन किया। एक फोटो में बाबाजी सोफे पर बैठे हैं और चार लोग श्रद्धा से हाथ जोड़े खड़े हैं। ऊपर टांड पर देवी-देवताओं के शीशे जड़े फ्रेम। गाँव-अंचल के सरल जीवन का सीधा चित्र।

“भईया, इलाके के लोग बहुत सीधे लगते हैं। श्रद्धा बहुत है, पर अपने आसपास से आगे की जानकारी कम।” — प्रेमसागर बोले। 

वे अपने पेट और हथेलियों का चित्र भेजते हैं। दंड भरने से पेट पर कालिमा पड़ गई है। हथेलियाँ गर्म सड़क से छिल कर लाल हो गई हैं।

लोगों की श्रद्धा का अर्जन शरीर को झुलसा कर ही सम्भव है।

शाम पाँच बजे वे फिर घंसौर में हैं — रामगोपाल यादव जी के घर। व्हाट्सऐप पर उनके पिता, मामाजी, पत्नी और नाती के साथ कई चित्र आते हैं। नाती छोटा है — साल भर का होगा। आँखों में काजल लगाया है। बड़ी-बड़ी आँखों वाला सुंदर बालक।

लगता है आधा दर्जन लोग विदाई देने जमा हैं। रामगोपाल जी अपने वाहन से उन्हें अगले पड़ाव तक छोड़ कर आयेंगे।

धीमे चलती दंड यात्रा में आगे और पीछे के लोग कई-कई दिन तक आते-जाते-मिलते रहते हैं। धीमी यात्रा में मानवीय जुड़ाव का गाढ़ापन बढ़ जाता है। लोग अपने लगने लगते हैं।

मजेदार है — दंड यात्रा में शरीर घिसना। उसके घर्षण से श्रद्धा की ऊष्मा पैदा करना और उस ऊष्मा से यात्रा की सुविधाएँ पकाना। श्रद्धा से भोजन, ठहराव, सहायता, साथ — सब निकलता है।

यात्रा केवल पैरों से नहीं चलती; वह दूसरों की भावनात्मक ऊर्जा पर भी चलती है। एक तरह की स्लो कुकिंग है यह। स्वाद धीरे-धीरे भीतर तक उतरता है।

23 मई

पचास दिन हो गये दंड भरते। रोज कितना आगे बढ़े होंगे?

सूर्यकुंड, मंडला से घंसौर के आगे बालपुर तक का रास्ता मैंने नक्शे पर ट्रेस किया। दूरी निकाली — कुल पचहत्तर किलोमीटर के आसपास। पाँच-सात किलोमीटर की कमी भी मान लें तो बयासी किलोमीटर।

औसत निकालें तो हर दिन लगभग नौ सौ-पचास दंड। रोज पौने दो किलोमीटर से कुछ कम। प्रेमसागर शायद तीन-चार किलोमीटर मान कर चलते होंगे। मैं गणना और आँकड़े की बात करता हूँ, वे श्रम और अनुमान की।

उनके पास छाले हैं, पेट पर कालिमा है और हथेलियों की ललाई है। मेरे पास नक्शा है, माउस है और मॉनीटर की स्क्रीन है।

स्क्रीन से यात्रा करता हूँ तो प्रेमसागर बालपुर के मिशन प्राथमिक शाला के पास से गुजरते नजर आते हैं। दंड भरते शायद स्कूल पर उनकी नजर भी न पड़ी हो।

नक्शे में स्कूल के दो साल पुराने चित्र और वीडियो चस्पाँ हैं। बच्चे घरेलू पोशाक में फिल्मी गीतों पर नाच रहे हैं। मास्टर साहब टाइट जीन पहने हैं। गाँव के भीतर शहर और सिनेमा दोनों प्रवेश कर चुके हैं।

प्रेमसागर को यह कहाँ दिखेगा — प्राइमरी का एक लमघोड़ा बच्चा शाहरुख खान के अंदाज में हाथ फैला कर नाच रहा है। गूगल का नक्शा भी कम यात्रा नहीं कराता।

दंड यात्रा में अनिश्चितता भी बहुत है। कल दिन में प्रेमसागर बालपुर में रात के डेरे की बात कर रहे थे। रात में उनका चित्र मिला कि वे ईश्वरपुर ग्वारी के किसी खपरैल वाले घर में हैं। बालपुर से थोड़ा आगे का गाँव।

खपरैल की ढलवाँ छत केवल सुंदर ही नहीं लगती — बाहर की गर्मी से दो-तीन डिग्री कम ताप वाली भी होगी। मोटी मिट्टी की दीवारें, चूने की पुताई, लकड़ी का भरपूर इस्तेमाल। आजकल के सीमेंट के बंद डिब्बेनुमा मकान क्या बराबरी करेंगे।

जैसे प्रेमसागर की यात्रा धीमी है, वैसे ही धीमे बदलते समय का अहसास भी ये मकान देते हैं। घास-फूस की झोंपड़ी से यह खपरैल वाला घर कितनी पीढ़ियों में विकसित हुआ होगा?

घर अकेला नहीं। छविलाल जी के पिता चार भाई हैं। चारों के घर आस-पास। बड़े पिताजी रिझनलाल सत्तर साल के हैं। बताते हैं — बारात गई-आई बैलगाड़ी पर थी। बाद में डीजल-पेट्रोल वाले वाहन आ गये, पर बैलों से खेती बारह साल पहले तक होती रही।

रिझनलाल जी अंतर बताते हैं — गरीबी बहुत थी पहले, अब साधन बढ़ गये हैं। मईया की परिक्रमा भी लोग झटपट वाहन से कर अपनी घर-गिरस्ती सम्भालना चाहते हैं। धीमी चाल से चलने वाले कम होते जा रहे हैं।

“धन्य भाग हमारे कि महराज जी आये हमारे यहाँ।”

मैंने जो भी कुछ उनसे पूछा, हामी में उन्होंने ‘हओजी’ कहा — ‘हाँ जी’ नहीं। इलाके की भाषा में यही प्रचलित है। रिझनलाल जी के पास अनुभव है, आकलन है और अपनी अलग सोच है।

24 मई

“भईया, नीचाई पर दंड भरना कठिन होता है। शरीर रपटता है। ऊँचाई बेहतर है।”

हजारों किलोमीटर की यात्रा एक-एक छोटी सुविधा-असुविधा नापते हुए ही पूरी होती है।

रात्रि विश्राम मेहता गाँव के रामकुमार शिवहरे जी के घर हुआ। दंड भरते प्रेमसागर उन्हें सड़क पर ही मिल गये थे।

“महराज जी, नया घर बन रहा है। एक दिन वहाँ भी रह कर आशीर्वाद दे दीजिये।”

छोटा परिवार है — रामकुमार, उनकी पत्नी, दो बच्चे और उम्रदराज पिताजी। पिताजी ने प्रेमसागर से शिकायत की —

“महराज, इस छोटे लड़के को समझाइये। पढ़ने में मन नहीं लगता। चुपके से ट्रैक्टर की चाभी ले गया और गड्ढे में पलटा दिया।”

बाबाजी का काम केवल दंड भरना नहीं, शिक्षा देना भी है।

मकान बड़ा है — सात कमरे, दो बरामदे। अपनी और बटाई की जोड़ कर रामकुमार जी चालीस एकड़ से अधिक खेती करते होंगे। दिन में रोटी-दाल-सब्जी थी। रात में पूरी, चावल और आम का गुरम्मा भी।

दंड भरने का प्रताप है। परिक्रमा में लोगों का वजन कम होता है — ऐसा सत्कार मिलता रहा तो कहीं बाबाजी का वजन बढ़ न जाये।

केवल भोजन ही नहीं; लोग फल भी बहुत लाते हैं। इतने कि अपने काम भर का रख कर प्रेमसागर बाकी बाँट देते हैं। खजूर दो-तीन किलो इकट्ठा हो गया है। सवेरे दो-तीन खजूर और केला लेकर दंड भरने निकलते हैं।

“कल तो भईया, औरतें अपने घर के बाहर झाड़ू-बुहार कर रही थीं। मुझे दंड भरता देख वे गमछे से मेरे आगे सड़क बुहारती आगे चलने लगीं। मैं फोटो लेना चाहता था, पर संकोच कर गया।” — प्रेमसागर

कहीं कोई नहीं मिलता था। पानी माँगने पर लोग केवल टंकी की ओर इशारा कर देते थे। और यहाँ लोग फ्रिज का ठंडा पानी, शरबत लेकर रास्ते में खड़े मिलते हैं। जगहों की अपनी प्रकृति होती है। अपने देवता। वे लोगों में अलग-अलग भाव जगाते हैं।

“कल मैं दंड भर रहा था और एक छोटी बच्ची दूर तक साथ-साथ चलती रही। हर आदमी, हर बच्चा अपने हिसाब से जुड़ाव का अहसास देता है। अच्छा लगता है भईया।” — प्रेमसागर

जुड़ाव अच्छा लगे तो ठीक, पर जुड़ाव में आसक्ति हो जाये तो बात बिगड़ती है।

यहाँ लोग बताते हैं — पाँच महीना पहले एक बाबाजी दंड भरते आ रहे थे। वे पूजा के लिये ढाई सेर दूध और डाला भर बेलपत्र-फूल माँगते थे। धीरे-धीरे लोग उनसे ऊब गये।

लोगों में श्रद्धा है; पर उसे जब रबर की तरह ताना जाये, तो वह टूट जाती है।

25 मई

मेहता बड़ा गाँव लगता है। नर्मदा परिक्रमा मार्ग पर है। यहाँ पंचायत भवन में अन्नक्षेत्र चलता है। तीस-पैंतीस परकम्मावासियों के रहने और भोजन की व्यवस्था है।

कल शाम मेहता के दस-बारह लोग प्रेमसागर से मिले थे। आज सवेरे उनका सामान पंचायत भवन में ले आये। नर्मदा किनारे श्रद्धा अक्सर रसोई के धुएँ के रूप में दिखती है।

मोहनलाल जी नर्मदा सेवा समिति के अध्यक्ष हैं। अन्नक्षेत्र का प्रबंध देखते हैं। उन्होंने बताया कि यहाँ बहुत से लोग मूलतः महोबा इलाके से आये हैं।

बुंदेलखंड की कठिन जिंदगी की तुलना में हाईवे और नर्मदा किनारे का यह इलाका उन्हें बेहतर लगा होगा। मैं अपने पूर्वजों के बारे में सोचने लगता हूँ — वे भी तो सरयूपार से निकल कर गंगा किनारे प्रयाग जिले में आ बसे थे। किसी पुराने वैवाहिक सम्बन्ध, व्यापार या संकट ने किसी पूर्वज को महोबा से यहाँ ला कर बसा दिया होगा। अकाल खेत से पहले आदमी की जड़ें सुखाता है।

प्रेमसागर एक वाक्य फेंक कर आगे बढ़ जाते हैं और मैं उसके पीछे इतिहास की पगडंडी पर भटक जाता हूँ।

मेहता गाँव के पास एक तालाब है। अच्छा पक्का घाट बना है। पानी है — बहुत नहीं, पर इतना भी कम नहीं कि चिंता हो। जेठ की गर्मी में यदि यह स्थिति है तो बरसात के बाद लबालब भर जाता होगा।

पानी में थोड़ी जलकुम्भी दिखती है — जगह-जगह शरीर में खुजली की तरह। उसके बावजूद तालाब सुंदर लगता है।

बरसात में हर तालाब उदार लगता है, असली परीक्षा जेठ में होती है। और इस परीक्षा में यह तालाब अच्छे नंबर पाता लगता है।

प्रेमसागर ने बताया कि इस इलाके में शाम के समय भी दंड भरा जा रहा है।

“लखनादौन अब सत्ताईस किलोमीटर है नक्शे में भईया। वहाँ से लोग फोन करने लगे हैं।”

26 मई

मेहता से कहानी आठ किलोमीटर है। अभी वहाँ पहुँचने में दो दिन लगेंगे। तब तक प्रेमसागर पंचायत भवन के अन्नक्षेत्र में टिके हैं। लोग मिलने आते रहते हैं। शाम होते-होते सतसंग जम जाता है। कोई गाँव का इतिहास सुनाता है, कोई पुरानी कथा, कोई रास्ते की खबर।

उन्हीं लोगों ने बताया — महोबा से कई जातियों के लोग लगभग चार सौ साल पहले यहाँ आकर बसे थे। तब यह इलाका घने जंगल से भरा था। लोगों ने जंगल काटा, जमीन साफ की, रहने और खेती का इंतजाम बनाया।

“कुछ और जानकार लोग आयेंगे तो पक्के तौर पर कुछ पता चलेगा। पर इतना जरूर लगता है कि विस्थापन बड़ी संख्या में हुआ था।” — प्रेमसागर

इतिहास यहाँ किताबों में नहीं मिलता। वह लोगों की बातचीत में बिखरा रहता है। कोई चलते-चलते एक वाक्य कह देता है और उसके पीछे सदियों की धूल उड़ती दिखने लगती है।

दोपहर में अन्नक्षेत्र में दो परिक्रमावासियों में झगड़ा हो गया — सत्तर वर्ष के जीवनलाल और पचहत्तर के भगवानलाल। दोनों चचेरे भाई। दोनों ने ओंकारेश्वर से परिक्रमा शुरू की थी। यहाँ आते-आते दोनों में कहा-सुनी हो गई।

जीवनलाल विदिशा जिले के अपने गाँव से शायद ही कभी बाहर निकले थे। खेती-बारी और गाँव के छोटे दायरे में ही पूरी जिंदगी बीती। नर्मदा परिक्रमा उनके लिये पर्यटन नहीं थी — एक धार्मिक इच्छा थी। बुढ़ापे में एक बार माँ नर्मदा के किनारे-किनारे चल लेना। इसी भरोसे वे भगवानलाल के साथ हो लिये थे।

भगवानलाल रास्ते जानते हैं, लोगों से बात करना जानते हैं, कहाँ रुकना है, कहाँ मुड़ना है — यह सब सम्भाल लेते हैं। जीवनलाल उनके पीछे-पीछे चलते हैं। दोनों का सामान भी वही साइकिल पर ढोते हैं। रास्ते का खर्च भी वही करते हैं। पर बदले में डाँट, झिड़की और ताने भी लगातार सुनते रहते हैं।

यहाँ आते-आते शायद बात कुछ ज्यादा बढ़ गई थी। भगवानलाल छोड़ कर चले जाने की धमकी दे रहे थे। जीवनलाल चुपचाप सुन रहे थे। उनकी चुप्पी में विरोध कम, असहायता ज्यादा थी — जैसे उन्हें सचमुच लगता हो कि गलती उन्हीं की है।

भगवानलाल की शिकायत थी कि जीवनलाल के कारण रात भर सो नहीं पाये।

“क्या किया उन्होंने?” — प्रेमसागर ने पूछा।

“कुछ नहीं। यहाँ मच्छर बहुत हैं। करवट बदलते रहे।”

जीवनलाल बगल में बैठे रहे। सिर झुकाये। जैसे मच्छरों के पैदा होने में भी कहीं न कहीं उनका ही दोष हो।

प्रेमसागर ने बीच-बचाव किया। भगवानलाल को कड़ाई से समझाया भी। तब जाकर मामला कुछ शांत हुआ। दोनों शाम तक आगे निकल गये। जाते-जाते जीवनलाल ने धीरे से कहा —

“महराज जी, आपने अच्छा किया। आग पर पानी डाल दिया।”

परिक्रमा केवल नदी के किनारे चलना नहीं है। आदमी अपना स्वभाव, अपना अहंकार, अपनी आदतें और अपनी कमजोरियाँ साथ लेकर चलता है। कहीं वे दबे रहते हैं, कहीं उफन कर बाहर आ जाते हैं।

प्रेमसागर ने बताया — अभी इलाके में ककड़ी, खीरा और तरबूज खूब बोया गया है।

28 मई

कहानी तक दंड यात्रा पहुँच गई है। कहानी कोई कथा नहीं — जगह का नाम है।

कल डेरा मेहता से उठ जायेगा। अगला पड़ाव कहाँ होगा और किसके यहाँ — यह अभी तय नहीं है। मुकेश ठाकुर जी अपने घर बुला रहे हैं। वन विभाग के एसडीओ साहब पीडब्ल्यूडी रेस्ट हाउस में ठहराने की बात कर रहे हैं।

बीते रोज धर्मेंद्र पटेल जी ने दोपहर का भोजन कराया। उनके, उनकी पत्नी जी और माता-पिताजी और लड़के के साथ चित्र भेजे। एक चित्र में धर्मेंद्र जी पाँव छू रहे हैं। दंड यात्री का ओहदा सामान्य परकम्मावासी से दस गुना ज्यादा होता ही होगा। उसी ओहदे का भाव दिखा चित्र में। 

गर्मी तो पहले जैसी ही है, पर उमस बढ़ गई है। अन्नक्षेत्र के श्रद्धालुओं ने कूलर का इंतजाम कर दिया है, पर वह अब अप्रभावी-सा लगता है। पसीना सूखता ही नहीं। जमीन पर बिछा बिस्तर तक नम महसूस होता है।

दरोट कलाँ में भागवत कथा 
दरोट कलाँ में भागवत कथा 

दंड भर कर लौटते समय बगल के गाँव दरोट कलाँ के साहू जी ने प्रेमसागर को रोका। उनका नया घर बना है। भागवत कथा रखी गई है। हाथ जोड़ कर आग्रह किया — प्रेमसागर कथा सुनने आयेंगे तो उनका मान बढ़ जायेगा।

दरोट के ही तिवारी जी व्यासपीठ पर हैं। नौजवान हैं। रहते जबलपुर के ग्वारीघाट में हैं। कथा-पुराण का व्यवसाय गाँवों की अपेक्षा शहरों में अधिक फलता-फूलता है।

“एक खास बात हो रही है, भईया। पूरे परिक्रमा मार्ग पर हर बीस किलोमीटर पर सरकार धर्मशालाएँ बनवाने जा रही है। रहने, भोजन और सोलर बिजली की व्यवस्था होगी। हर धर्मशाला का बजट सत्तर लाख रुपये है।” — प्रेमसागर

सुबह आठ बजे तक ही उमस और गर्मी दंड भरना कठिन बना देती है।

“आप तो बनारस के पास हैं भईया। आप ही बाबा विश्वनाथ से कहिए कि गर्मी थोड़ी कम कर दें।” — प्रेमसागर

काशी विश्वनाथ से भौगोलिक निकटता यदि बाबा तक अर्जी पहुँचाने की सुविधा देती, तो वहाँ के पंडा-पुजारियों का क्या जलवा होता।

वैसे जलवा तो नर्मदा माई का होना चाहिए, पर इस समय यह इलाका नर्मदा से अधिक बरगी के ड्रेगन के प्रभाव में लगता है। जहाँ प्रेमसागर हैं, वहाँ से ठीक उत्तर में लगभग चौंतीस किलोमीटर दूर बरगी के उस ड्रेगन का मुँह है — जो लगातार आग उगल रहा है। उमस और गर्मी शायद उसी की फुँफकार और लपटों का असर हैं।

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खाड़ी की जंग से पस्त अर्थव्यवस्था के बहाने कुछ विचार


चार महीने पहले तक हम अर्थव्यवस्था की मजबूती की खुशफहमी में थे कि होरमुज़ की जंग ने सपना तोड़ दिया। डॉलर के मुकाबले रुपया गिर रहा था पर उसे हम अपने निर्यात के लिये अच्छा मान रहे थे। लेकिन जंग के कारण जब कच्चा तेल सौ डॉलर पार हुआ तो अर्थशास्त्रियों की चोटी खड़ी हो गई।

होरमुज़ की जंग और डॉलर के मुकाबले रुपये की तेजी से गिरती कीमत ने अखबार अर्थशास्त्रियों के आकलन से भर डाले — चालू खाता घाटा, तेल आयात, ब्याज दरें, विदेशी पूंजी। मुझे लगा कि यह सब सही है। पर अर्थशास्त्रियों के लेख शायद कहानी पूरी नहीं कहते।

मुद्रा केवल आर्थिक दस्तावेज नहीं, सामाजिक विश्वास-पत्र भी है। दुनिया यह देखती है कि यह समाज कितना भरोसेमंद, अनुशासित और उत्पादक है। भारत के बारे में वह सब दांव पर है। कठिन समय आ गया है।

भारत को महान बनाना केवल GDP बढ़ाने का प्रश्न नहीं है। यह रुपये की ताकत का भी प्रश्न है। और रुपया केवल रिज़र्व बैंक की तिजोरी में नहीं रहता; वह समाज की आदतों, निर्णयों और सार्वजनिक व्यवहार में भी रहता है।

जब एक इंजीनियर पुल बनाते समय मानक तोड़ता है, जब एक बाबू फाइल टालता है, जब अदालत वर्षों तक निर्णय नहीं देती, जब सार्वजनिक संपत्ति को “सरकारी माल” मान कर छेड़ा जाता है, तब उसका असर केवल सुविधा पर नहीं पड़ता। धीरे-धीरे पूरी अर्थव्यवस्था की कार्यक्षमता घटती है। लागत बढ़ती है। समय नष्ट होता है। ऊर्जा निरर्थक घर्षण में खर्च होती है। इसकी ओर कितने लोगों का ध्यान जा रहा है?

एक आदमी का पान थूकना रुपये को नहीं गिराता। पर करोड़ों लोगों की यह मानसिकता कि “यह सार्वजनिक जगह मेरी जिम्मेदारी नहीं” — किसी भी राष्ट्र को भीतर से हल्का बनाती है। यह थेथरई राष्ट्रीय चरित्र बन गई है। जब भी कोई गहरा संकट आता है, यह थेथरई उभर आती है। दृश्य में सब कुछ दिखता है, पर लोग उसकी ओर गौर नहीं करते।

अर्थव्यवस्था के के बहाने विचार
आदतें और अर्थव्यवस्था

वहीं दूसरी ओर जापान जैसे देश केवल तकनीक से मजबूत नहीं बने; उन्होंने सार्वजनिक अनुशासन को निजी आदत बनाया। हम यह देखने की बजाय आंकड़े देखना चाहते हैं — वह कम कड़वा होता है।

भारत की समस्या यह नहीं कि लोग मेहनत नहीं करते। गांव का किसान, शहर का ड्राइवर, रेलवे का गैंगमैन, छोटा दुकानदार — सब कठिन परिश्रम करते हैं। काम करते हैं तभी घर की रसोई चलती है और सुविधायें आती हैं।

समस्या शायद दूसरी है: हममें से बहुत लोग व्यवस्था से मूल्य बनाने की बजाय उससे अधिकतम निकाल लेने की मानसिकता में फँसे हैं। व्यवसाय सेवा कम, “व्यवस्था से ज्यादा से ज्यादा तेल निकालना” अधिक बन जाता है।

सरकारें भी इस कमजोरी को कुछ हद तक ढँक सकती हैं। राज्य का पहला स्वभाव संकट को ढंकना होता है, आमूल बदलाव नहीं। राशन, सब्सिडी, मुफ्त बिजली, नकद सहायता — ये सब झटकों को जब्त करने के औज़ार हैं। धीरे-धीरे समाज राहत को अधिकार और किफायत को मूर्खता मानने लगता है। इसलिए आम आदमी को रुपये की डॉलर के मुकाबले कमजोरी देर से महसूस होती है।

लेकिन अर्थव्यवस्था के मूल रोग केवल राहत से नहीं जाते। यदि उत्पादकता, संस्थागत भरोसा और सार्वजनिक चरित्र कमजोर हों तो मुद्रा अंततः दबाव में आती है। जब संकट आता है, जब कोई ब्लैक–स्वान घटना होती है — जैसे खाड़ी की लड़ाई — तब पर्दा तेजी से उधड़ जाता है।

इन झटकों से इम्यून बनने के लिये देश को अंदर से मजबूत बनाना होगा। मेक-इंडिया-ग्रेट-अगेन।

भारत को “ग्रेट” बनाने का अर्थ शायद यह नहीं कि हर घर में एसी हो। वह तो कर्ज और आयात से भी आ सकता है। असली प्रश्न (जो मेरे दिमाग में उठते हैं) यह है कि:

क्या ट्रेन समय पर चलती है?
क्या अदालत तारीख पर तारीख की बजाय त्वरित निर्णय देती है?
क्या गांव–नगर साफ रहते हैं?
क्या अफसर निर्णय लेने का साहस रखते हैं या मात्र फाइलें सरकाते हैं?
क्या नागरिक सार्वजनिक चीज़ को अपनी चीज़ मान उसकी देखभाल करते हैं?
क्या नेता दिन के अंत में यह आकलन करता है कि जितना समाज उसे दे रहा है उसने उससे ज्यादा पे-बैक किया?

रुपये की ताकत अंततः इन्हीं तरह की अदृश्य आदतों पर टिकी हो सकती है।

हो सकता है भविष्य की सबसे बड़ी आर्थिक नीति किसी वित्त मंत्री के भाषण से नहीं, बल्कि नागरिक व्यवहार के छोटे बदलावों से निकले — कम बर्बादी, अधिक जिम्मेदारी, बेहतर काम, समय का सम्मान, और सार्वजनिक जीवन में थोड़ी अधिक ईमानदारी।

क्योंकि मुद्रा का मूल्य केवल विदेशी बाजार तय नहीं करते। समाज भी तय करता है कि उसकी अपनी मुद्रा कितनी सम्मानित होगी।

शायद अगली बड़ी लड़ाई डॉलर से पहले आदतों की होगी।

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कहां नहीं है कट मनी, दबंगई, सिंडीकेट


गांव में आ कर शुरू शुरू में लगता था कि यहां वह सब नहीं होगा जिसकी शिकायत शहरों और राजनीति में की जाती है। कट मनी, दबंगई, सिंडीकेट, उगाही — ये सब कहीं दूर की चीजें लगती थीं। गांव मानो बचपन में लौटने की जगह था।

शायद हम गांव को देखना नहीं, याद करना चाहते हैं। इसलिये बहुत कुछ दिखता नहीं।

मुझे गांव में रहते दस साल हो गये। शुरुआती महीनों में मैं भी उसी “अहा! ग्राम्य जीवन भी क्या है!” वाले रोमांटिसिज्म में था। धीरे धीरे वह परत उतरने लगी। फिर वे चीजें दिखने लगीं जो पहले दृश्य में थीं, पर दृष्टि में नहीं थीं।

किसी को आवास योजना दिलवाने में हिस्सा। शौचालय का पैसा निकलवाने में हिस्सा। सरकारी सामान बंटने में हिस्सा। गरीबों के मुफ्त राशन से कटौती। नाम अलग अलग हो सकते हैं, पर प्रकृति एक ही है। बंगाल उसे “कट मनी” कहता है। कहीं और उसका कोई दूसरा नाम है। यह सब दृष्टिगत होने लगा।

सार्वजनिक चीजों पर निजी दबंगई भी दिखती है; भरपूर। कहीं रास्ते पर कब्जा, कहीं तालाब पर, कहीं मिट्टी या बालू पर। गांव में यह सब और सहज हो जाता है, क्योंकि यहां शक्ति का प्रदर्शन ज्यादा प्रत्यक्ष है।

जब साइकिल ले कर निकलता हूं और पतली सड़क पर मिट्टी लादे ट्रैक्टर धूल उड़ाते निकल जाते हैं, तो वह केवल धूल नहीं लगती। उसके पीछे पूरा एक तंत्र दिखाई देने लगता है। ट्रैक्टर वाला अकेला नहीं है। उसके पीछे स्थानीय दबंगई, सरकारी तंत्र, छोटे बड़े नेता, अधिकारी — सबकी कोई न कोई परत जुड़ी महसूस होती है। शायद ऊपर तक।

कट मनी दबंगई सिंडीकेट
कट मनी दबंगई सिंडीकेट

धीरे धीरे समझ में आने लगा कि बंगाल या किसी एक प्रदेश की बदनामी दरअसल केवल डिग्री का अंतर है। प्रवृत्ति लगभग हर जगह मौजूद है। आधुनिक समाज का यह स्थायी तत्व सा लगता है — चाहे व्यवस्था लोकतंत्र कहलाये, तानाशाही या कुछ और।

फिर सवाल उठता है कि यह सब देखता आदमी क्या करे? सिस्टम से लड़े या आंख बंद कर ले? अपने रिटायरमेंट का सुकून बचाये रखे? या जो दिख रहा है, उसे दर्ज करे?

जिन लोगों के पास मजबूत कलम थी, उन्होंने दर्ज किया। व्यंग्य लिखा, उपन्यास लिखे, पात्र गढ़े। इसीलिये ‘रागदरबारी’ आज भी पढ़ी जाती है। वह केवल हंसाती नहीं, अपने समय के समाज की बनावट भी दिखाती है।

शायद वही काम छोटे स्तर पर ब्लॉग पोस्ट भी करती हैं। वे किसी व्यवस्था को बदलती हों या नहीं, पर समय का एक रिकॉर्ड जरूर छोड़ जाती हैं। बाद में कोई देखे तो उसे पता चले कि गांव केवल सरसों के खेत, पोखर और बैलगाड़ी भर नहीं था। उसके भीतर कट मनी, दबंगई, सिंडीकेट और छोटे छोटे समझौते भी थे।

लगता है ये प्रवृत्तियाँ समाज के रक्तबीज हैं। नाम बदलते हैं, तरीके बदलते हैं, पर वे किसी न किसी रूप में फिर उग आती हैं। फर्क केवल इतना है कि कोई उन्हें देख कर चुप रह जाता है, कोई एक ब्लॉग पोस्ट लिखता है, और कोई ‘रागदरबारी’।

अपनी अपनी कलम की ताकत का मामला है। 

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