डेंगू, पपीता, बकरी और ड्रेगन फ्रूट


मेरी पत्नीजी (बहुत से लोगों की तरह) कब्ज से बचने के लिये रोज पपीता सेवन करती हैं। प्रति दिन, बारहों महीने। गांव में रहते हुये पपीते की सतत उपलब्धता कठिन है। उनके लिये पपीता-प्रबंधन कठिन काम था।

रामगुन फल का ठेला लगाने वाले सज्जन सहायता किया करते थे, पर पाया कि उनकी पपीता उपलब्ध कराने की सक्सेस रेट 40-50% से ज्यादा नहीं थी। वे पास की कछवांं मण्डी से अपने फल लाते हैं। कछंवा मण्डी में सब्जियाँ तो ठीक ठाक मिल जाती हैं पर फल के बारे में वह मण्डी बहुत व्यवस्थित नहीं है।

रामगुन के बहुधा फेल हो जाने पर घर पर माली का काम देखने वाले रामसेवक जी को कहा कि वे हर महीने एक दो पपीते के पौधे ही घर के परिसर में लगा दें, जिससे हर समय (किसी न किसी पपीते के पेड़ पर) पपीते मिलने लगें। पर पपीतों की भी शायद कोई यूनियन है। वे डाइवर्सीफाइड तरीके से फल नहीं देते, जैसे गायें गाभिन होती हैं और दूध देती हैं।

घर के बगीचे में पपीते। अभी कच्चे हैं।

कुल मिला कर; गांव में हर मौसम में पपीता पाने के लिये बनारस या मिर्जापुर शहर की बड़ी मण्डी या बाजार पर निर्भर रहना ही पड़ता है। पपीते के मुद्दे पर शहर जीता, गांव हारा!

रामसेवक बनारस के बंगलों में माली का काम करते हैं और गांव से सिवाय रविवार के बाकी दिन बनारस आते जाते हैं। सो एक दिन मुझे ब्रेन-वेव आई कि उन्हें ही कहा जाये कि वे हर दूसरे तीसरे दिन एक दो पपीते ले आया करें। उन्हें झिझकते हुये कहा तो वे सहर्ष तैयार हो गये। अब कोई परेशानी नहीं होती। रामसेवक जी की पपीता उपलब्ध कराने की सक्सेस रेट लगभग शत प्रतिशत है।

रामसेवक पपीता वैसा खरीदते हैं, जैसा अपने लिये खरीद रहे हों। मोल भाव कर और गुणवत्ता देख कर। अभी दो दिन पहले उन्होने फोन कर कहा कि दाम ज्यादा हैं और उनका खरीदने का मन नहीं हो रहा है। चालीस-पचास रुपये किलो मिलने वाला पपीता 80रु किलो से कम नहीं मिल रहा।

उन्हें कहा गया कि एक ही खरीदें, थोड़ा छोटा। एक सप्ताह में पपीता प्राइस इण्डेक्स में 8-10% नहीं, पूरे 100% का उछाल!

रात घर आने पर उन्होने पपीता देते हुये बताया कि डेंगू फैला है और लोग पपीता खरीदने पर टूट पड़े हैं। यह धारणा है कि पपीता गिरते प्लेटलेट्स की रामबाण दवा है।

डेंगू का प्रकोप और मरीज के गिरते प्लेटलेट्स पर मरीज के तीमारदारी में जुटे लोगों का पैनिक रियेक्शन होता ही है। ऐसे में, जिस भी पदार्थ में लोगों को लगता है कि श्वेत रक्त कणिकाओं को बढ़ाने की क्षमता होती है, उसका इंतजाम करने मेंं वे जुट जाते हैं।

डेंगू के प्रकोप के समय मेरे ड्राइवर ने बताया कि द्वारिकापुर के गड़रिया लोग अपनी भेड़ों का दूध 80रुपये पाव बेच रहे हैं। बकरियों का दूध भी उसी भाव जाता है। मेरा ड्राइवर डेंगू की शाश्वतता पर दाव खेलते हुये ड्राइवरी का काम छोड़ कर बकरी पालन पर ध्यान लगाने की कहने लगा है। अगले कुछ सालों में वह बकरी पालन के सभी पहलुओं पर मंथन कर अपने काम की लाइन बदल लेगा।

सिकंदर सोनकर ने ड्रेगन फ्रूट दिखाया

उधर महराजगंज बाजार का फल वाला सिकंदर सोनकर प्लास्टिक की पन्नियों में भरे विचित्र से फल अपनी दूकान के प्राइम लोकेशन पर जमा रहा था। उसने बताया कि फल का नाम ड्रेगन फ्रूट है। डेंगू की बीमारी में गिरते प्लेटलेट्स को थामने के लिये लोग इसका प्रयोग करते हैं। उसने एक पेटी ड्रेगन फ्रूट मंगाया है। एक पेटी में 18 फल और थोक कीमत 1500 रुपये। वह इसे 100रुपया फल के दाम से बेच रहा है।

पपीता, भेड़ बकरी का दूध या ड्रेगन फ्रूट – सभी ऑफ-बीट चीजों की बेतहाशा मांग है डेंगू के प्रकोप से लड़ने के लिये।

मैंने नेट छाना ड्रेगन फ्रूट के नाम से। विकिपेडिया पर इसका नाम पिताया है। यह केक्टस प्रजाति के पौधे का फल है। पकने पर यह फल हल्का मीठा होता है। तरबूज, नाशपाती और कीवी के मिलेजुले स्वाद वाला फल। विभिन्न वेब साईट्स पर यह बताया कि इसमें आयरन और विटामिन सी भरपूर होता है। किसी ने इसे डेंगू या प्लेटलेट्स बढ़ाने से नहीं जोड़ा। पर लोग हैं कि इसे भी डेंगू की रामबाण दवा मान रहे हैं।

एक पके पिताया की अनुदैर्ध्य काट। चित्र https://commons.wikimedia.org/w/index.php?curid=11849341 द्वारा

मच्छर रहेंगे ही। डेंगू मलेरिया जाने वाला नहीं लगता। ऐसे में गुलाब (मेरे ड्राइवर) की सोच की वह बकरी पालन करेगा; खराब नहीं। पर डेंगू का दोहन करने के लिये मैं क्या कर सकता हूं? मैं बकरी पालन तो कर नहीं सकूंगा। पर पपीता के पौधे लगा सकता हूं। उससे मेरी पत्नीजी का कब्ज भी दुरुस्त हो जायेगा और डेंग्फ्लेशन (Dengue-inflation) के समय मार्केट का दोहन भी किया जा सकेगा।

क्या पता, डेंगू और पपीता का समीकरण मुझे करोड़पति बना दे! 😆


पीयूष वर्मा के तैलीय औषध पर फीडबैक


पीयूष वर्मा जी ने मुझे स्पीड पोस्ट से औषधियों की शीशियों का पैकेट भेजा। उस पैकेट में जोड़ों के दर्द के लिये दो शीशी तैल था और एक शीशी दांत के स्वास्थ्य के लिये। मैंने उनसे जोड़ों के दर्द का तेल मांगा था; उन्होने मुझे दांत का दर्द वाला तेल बोनस के रूप में दिया। इस बोनस को गंवई भाषा में घेलुआ कहते हैं।

कुछ दिनों बाद उन्होने मुझे इन तेलों के प्रयोग पर एक क्विक फीडबैक देने को कहा। उन्होने तो मुझे एक 90 सेकेण्ड के वीडियो ह्वाट्सएप्प पर भेजने को कहा था; पर मेरे स्वभाव में तो कुछ भी कहना ब्लॉग के माध्यम से ही होता है। सो यह पोस्ट है! 🙂

उम्र बढ़ने के साथ साथ इन दोनो प्रकार के अंगों – जोड़ों और दांत – में कष्ट बढ़ते ही हैं। इसलिये पीयूष जी ने जो कॉम्बो पैक दिया, वह बहुत सही रहा। और मूल पदार्थ की बजाय मुझे घेलुआ – दांत का दर्द निवारक तेल – ज्यादा मुफीद लगा है अब तक!

दांतों का डायग्राम। विकिपीडिया से।

मेरे नीचे के इनसाइजर दांतों में क्षरण हो रहा है। रूट केनाल हेतु दो सिटिंग करनी होगी; ऐसा दांतों की डाक्टर जी ने कहा है। आगे के उन दो दांतों में उंगली लगाने पर भी दर्द होने लगा था। मुझे यह अहसास था कि इन सर्दियों में तकलीफ ज्यादा ही होगी। पर पीयूष जी का दांतों का तेल बड़े मौके पर मिला। उससे अब दांत बहुत बेहतर लग रहे हैं। दर्द तो नहीं ही हो रहा है। सर्द-गर्म पदार्थ खाने के कारण होने वाली झनझनाहट भी रुपये में दस आना भर कम लग रही है। … खैर, अभी भीषण सर्दी आनी बाकी है। तब देखें कि क्या होता है।

दांतों के तेल के प्रयोग की विधि बताई थी पीयूष जी ने। सवेरे हल्का ब्रश कर (जिससे दांतों में फंसे पदार्थ निकल जायें) एक उंगली से दांतों और मसूड़ों पर अच्छे से मालिश करनी होती है। उसके बाद 10 मिनट इंतजार कर दांतों का सामान्य ब्रश/मंजन/दातुन करना होता है।

एक हफ्ता उक्त तरह से प्रयोग करने पर मैं बेहतर महसूस कर रहा हूं। पहने मैं कड़ा अमरूद काटने के लिये इनसाइजर्स की बजाय मोलर दांतों का प्रयोग करता था। मुझे डर लगता था कि कहीं आगे के दो कमजोर दांत उखड़ न जायें। पर अब सामान्य आदमी की तरह फल बाइट करने में झिझक नहीं होती।

उंगली से दांतों-मसूड़ों पर तेल मलने के समय वह कड़वी दवाई जैसा नहीं लगता। उसका स्वाद सरसों के तेल जैसा होता है। कभी कभी मुझे लगता है कि पीयूष जी की दवाई के स्थान पर कच्ची घानी के सरसों के तेल से भी दांतों और मसूड़ों की मालिश भी शायद वैसी की फलदायक हो। वैसे अभी वह प्रयोग किया नहीं।

पीयूष वर्मा जी के प्रोफाइल चित्र। उनके ह्वाट्सएप्प अकाउण्ट से।

ऑस्टियोऑर्थराइटिस की समस्या के लिये उतने मनोयोग से मैंने पीयूष जी के जोड़ों के दर्द के तेल का प्रयोग नहीं किया है। वह प्रयोग करने के बाद बिस्तर या पायजामें में चिपकने वाली धूल बहुत खराब लगती है मुझे। सवेरे नहाने के आधा घण्टा पहले जोड़ों में वह तेल लगाने और फिर नहा कर अच्छे से तौलिये से शरीर पोंछना ठीक रहता है, पर वह अनुशासन ठीक से नहीं बन पाया। दिन में दूसरी बार जोड़ों में वह तेल लगाना झंझटिया लगता है। इसलिये उस तेल का प्रयोगानुशासन पचास फीसदी ही हो पाया है।

पर उसका भी सकारात्मक प्रभाव लगता है। पहले मैं पैदल चलने की बजाय साइकिल ही चलाया करता था। करीब 40-50 मिनट साइकिल चलाना हर दिन। अब मैं गूगल फिट एप्प पर कम से कम 3000 कदम चलने और कुल हार्ट प्वॉइण्ट के 60 का टार्गेट रखे हूं। यह टार्गेट रोज पार हो रहा है। करीब 3500-4500 कदम रोज पैदल चलने और एक घण्टा साइकिल चलाने में कोई दिक्कत नहीं हो रही है। पहले चलना दुरुह होता था, अब एक साथ दस पंद्रह मिनट की ब्रिस्क वाकिंग ( >100 कदम/मिनट) करना कठिन नहीं महसूस होता। अब इसमें पीयूष जी का तेल कारगर है या बेहतर मौसम – कहना कठिन है। शायद उसमें मेरी स्वास्थ्य को लेकर बढ़ी जागरूकता और सौ साल फिट-फाट जीने की चाह भी एक घटक हो!

टांगों की मालिश। बीच में रखी है पीयूष जी के भेजे तेल की शीशी।

पर जो हो, पीयूष जी के तेल कि उपलब्धता ने एक माहौल तो बनाया ही है कि जोड़ों के दर्द के लिये कुछ न कुछ तो किया जा सकता है।


पीयूष वर्माजी भोपाल के हैं। मेरे ब्लॉगर सुहृद रवि रतलामी जी शायद उनके पड़ोसी हैं। रवि जी की पत्नी गठिया के कारण घुटनों की जकड़न से परेशान थीं। बकौल रवि रतलामी (रवि श्रीवास्तव) उन्हें पीयूष जी के तेल से बहुत लाभ हुआ। तभी रवि जी ने मुझे पीयूष वर्मा जी से मिलवाया।

पीयूष जी के दांतों और जोड़ों के तेल के लाभ के बारे में मैं जितना अश्वस्त हूं, उतना मैंने ऊपर लिखा है। सही फीडबैक तो शायद सतत तीन चार महीने प्रयोग से ही दिया जा सकेगा। पर फिलहाल यह माहौल तो मेरे साथ बना ही है कि पैदल चल रहा हूं। खूब साइकिल चला रहा हूं और अपने घर के बगीचे के कड़े अमरूद खाने में बगीचे के अनामंत्रित अतिथि – तोतों के झुण्ड – से स्पर्द्धा कर ले रहा हूं। 😆


गांव की शाम


दिन गुजर गया। अच्छा ही था। एक घण्टे से ज्यादा शारीरिक गतिविधि थी। या तो इसी परिसर में चक्कर लगा लगा कर साइकिल चलाई या फिर 100 कदम प्रति मिनट से ज्यादा तेज चलते हुये पैदल चहलकदमी की। कहीँ बाहर नहीं गया। कुल नौ पुस्तकों का सार संक्षेप सुना। इनमें से एक या दो पुस्तकें पूरी पढ़नी हो सकती हैं। बाकी तो पढ़ी मानी जा सकती हैं।

शाम ढलते ढलते दोनो तरह के, विपरीत भाव मन में आ रहे हैं। एक और दिन के यूं ही गुजर जाने का भाव – कुछ नैराश्य भी; और दूसरे जीवन में कुछ सार्थकता का भाव। जीवन इन दो भावों के बीच झूलता है।

गांव की शाम अलग ही होती है। शहर में दिन अठारह घण्टे का होता है पर गांव में बारह घण्टे भर का। सूर्योदय से सूर्यास्त तक का। अंधेरा होने के घंटे भर में घर के आजू बाजू सियारों की हुआं हुआं की एकल और फिर समवेत ध्वनि सुनाई पड़ने लगती है। कभी कभी उससे अलग प्रकार की ध्वनियाँ भी आती हैं। शायद एक दो लोमड़ी भी हैं आसपास। उनके अचानक दिखने पर गांव के कुकुर भी सक्रिय हो जाते हैं। और उल्लू तो हैं ही बड़े घने वृक्षों पर। पोर्टिको में खड़े होने पर चमगादड़ों के आसपास उड़ने का आभास भी होने लगता है।

ये सभी जल्द ही सक्रिय हो जाते हैं और रात बड़ी तेजी से पूरे परिवेश को ढ़ंक लेती है।

सात साल पहले जब यहां आया था तो रात में कुछ भी नहीं दीखता था। अमूमन बिजली नहीं आया करती थी और आती भी थी तो स्ट्रीट लाइट नहीं होती थीं। फिर कुछ सोलर लाइटें बंटीं। उनसे साल भर रोशनी बढ़ी। पर जल्दी ही उनकी बैटरी बैठ गयी या चोरी चली गयी। सोलर पैनल भी गायब हो गये। उसके बाद विकास हुआ। हाईवे पर सतत बिजली जलने लगी। पास का रेलवे स्टेशन भी जगमग होने लगा और गांव में भी पहले से बेहतर हुई बिजली की दशा।

अब उतनी दुर्दशा नहीं है कि सूरज ढलने पर कुछ दिखाई ही न पड़े। पर गांव की आदत तो गांव ही की है। वह सांझ होने पर पलक ढरकाने लगता है। उसकी प्रकृति में खास बदलाव नहीं हुआ है। बदलाव काहे हो और कितना हो? गांव और शहर में अंतर तो होना ही चाहिये।

सूरज सवा पांच बजे ढलता है और गांव अपने को एक घण्टा पहले से समेटने लगता है। पक्षियों के झुण्ड जो खेतों में पेट भर रहे होते हैं, पेड़ों की ओर आने लगते हैं। औरतें जो शाम की निराई कर अपनी गाय के लिये घास छीलने में व्यस्त थीं, अपने गट्ठर समेट पर उसमें हंसिया खोंस, बोझ सिर पर लिये सिंगल फाइल में पगडण्डी पर चलती हुई झुण्ड में घर लौटने लगती हैं। लड़कियाँ और लड़के बकरी चराने निकले होते हैं। वे बकरियों की रस्सी थामे घर का रास्ता नापने लगते हैं। समोसे पकौड़ी के गुमटी वाले दुकानदार अंतिम खेप बेच कर अपना गल्ला समेटने लगते हैं।

दो घण्टे बाद यह तेज गतिविधि समाप्त हो चुकी होगी। सब सिमट चुके होंगे। अपने घर की देहरी पर बैठे लोग धीमे धीमे बातचीत कर रहे होंगे कऊड़ा के इर्दगिर्द। वह भी रात आठ नौ बजे तक ही होता है। उसके बाद लोग अपनी मड़ई या कमरों में हो जाते हैं। कऊड़ा की जगह कुकुर ले लेते हैं।

खेती किसानी के काम में भी परिवर्तन आया है। यहाँ पराली नहीं जलती। यहां पुआल/भूसा भी वैसा ही महत्व रखता है जैसा अनाज। वजन के हिसाब से जितना धान होता है उतना पुआल भी। धान 18रु किलो का होता है तो पुआल भी 5-6रु किलो का।

धान तो अस्सी फीसदी कट चुका है। सटका भी जा चुका है काफी हद तक। पुआल के गट्ठर समेटे जा रहे हैं। शाम होते होते पुआल समेटने की गतिविधि पर भी विराम लग जाता है। रात में अगर अगली फसल के लिये खेत में पानी देने का इंतजाम करना हो तो अधियरा लोग अपने गर्म कपड़े (जितने भी उनके पास होते हैं), टॉर्च आदि सहेज कर ट्यूबवेल और खेत के आसपास लपेटा पाइप बिछाने लगते हैं। केवल वही कुछ लोग हैं जो रात की शिफ्ट में काम करते हैं। या फिर अरहर के खेत की नीलगाय से रखवाली करने वाले।

शेष गांव सो जाता है। मेरे हिसाब से अनिद्रा की समस्या अधिकतर लोगों को नहीं है। मेरे जैसे कुछ ही होंगे। रात के साढ़े ग्यारह बजे मैं बिस्तर से उठ कर की-बोर्ड पर कुछ पंक्तियाँ लिखने की कोशिश कर रहा हूं।

आज सर्दी कुछ कम है। सियारों की हुआँ हुआँ भी कम ही है। रेलवे स्टेशन पर लूप लाइन में खड़ी ट्रेन का डीजल इंजन ऑन है। हर थोड़ी थोड़ी देर में छींकता है। एक ट्रेन तेजी से गुजर जाती है। अब शायद लूप में खड़ी इस मालगाड़ी का नम्बर लगे। मैं पूरी कोशिश कर अपने मन को रेल की पटरियों से वापस गांव में खींचता हूं। अन्यथा अभी मन रेल के यादों के तीन दशक में कुछ न कुछ खंगालने लग जायेगा।

गांव की शाम कब की जा चुकी। आधी रात होने को है। नयी तारीख आने को है। … तारीख पर तारीख! साठोत्तर जिंदगी भी शिलिर शिलिर चलती अदालती केस सी लगती है कभी कभी। उस सोच से अपने को बचाने की जुगत में रहना चाहिये हमेशा। जीवन अदालती केस नहीं, नित्य त्यौहार होना चाहिये। नहीं?

एक नये दिन की प्रतीक्षा में कुछ घण्टे नींद लेने का प्रयास किया जाये!


फोड़ के साइकिल व्यवसायियों के बारे में पुन:


बोकारो आने पर कोयला अवैध खनन के बाद उसे साइकिल पर ले कर चलने वालों को देखना मेरे लिये सदैव कौतूहल का विषय रहा है। एक दशक से ज्यादा समय से उन्हें देखता रहा हूं।

कल भी रास्ते में कई कोयला ले कर चलने वाले दिखे। एक दो जगह उन्हें मोटर साइकिल से धक्का लगाते सहकर्मी भी नजर आये। साथ चल रहे तिवारी बाबा ने बताया कि मोटर साइकिल वाले उन्हें तेज चलने में सहायता करते हैं। कहीं फ़ंसने की नौबत आती है तो वे साइकिल वाले को छोड़ कर भाग लेते हैं। साइकिल वाले भी पकड़े जाने पर साइकिल और कोयला फ़ैंक कर सटकने में यकीन करते हैं।

एक बस स्टाप पर कोयले की साइकिल खड़ी थी। उसके पास ही उसे धक्का देने वाली मोटर साइकिल भी थी।

मैने वाहन चालक इमरान को एक जगह कोयले लदी साइकिलों के पास वाहन रोकने को कहा। एक बस स्टाप पर कोयले की साइकिल खड़ी थी। उसके पास ही उसे धक्का देने वाली मोटर साइकिल भी थी। मुझे वाहन से उतर कर चित्र लेते देख मोटर साइकिल वाला अपनी मोटर साइकिल चालू कर निकल लिया।

मैं दो अन्य रुकी हुई साइकिलों के चित्र भी ले पाया।

एक एक साइकिल पर लदा इतना कोयला और उस जैसी सैकड़ों साइकिलें चलती हुईं। कितना अवैध (फ़ुटकर) कोयला खनन होता होगा? और इस अवैध अर्थव्यवस्था में जाने कितने लोगों को ठीकठाक रोजगार मिलता होगा? उनके रोजगार को कहीं आंकड़ों में दर्ज किया जाता है या वे बेरोजगार की श्रेणी में आते हैं?


आलसी आंख की शल्य चिकित्सा


जुलाई के महीने में डा. आलोक ने मेरी पत्नीजी की दांयी आंख की शल्य चिकित्सा की थी। मोतियाबिन्द की। उसके दो महीने बाद बांयी आंख का ऑपरेशन करना था; पर वह दशहरा-दीपावली-छठ के पर्व के कारण हम टालते गये। अब नवम्बर मे‍ं संयोग बना।

पत्नीजी की बांई आंख में, बकौल डा. आलोक एम्ब्लायोपिया – Amblyopia है। उस आंख के कमजोर होने के कारण बचपन से ही शरीर उस आंख का प्रयोग कम करता गया है। जिस अंग का प्रयोग कम हो तो उसका क्षरण होता ही है। बकौल डाक्टर साहब यह रोग बीस हजार में से एक को होता है। सो उस हिसाब से मेरी पत्नीजी विशिष्ट है‍!

बचपन में ही अगर यह एम्ब्लायोपिया नोटिस होता तो शायद कोर्स करेक्शन हो पाता। पर परिवारों में उतना सूक्ष्म निरीक्षण नहीं हो पाता – वह भी एक बड़े कुटुम्ब में रहते हुये। आज कल जहां न्यूक्लियर परिवार में एक दो बच्चे मात्र होते हैं, माता-पिता वह सूक्ष्म निरीक्षण कर पाते हों, शायद। अन्यथा समय के साथ साथ वह एम्ब्लायोपिया से प्रभावित आंख और भी कमजोर होती जाती है। उस आंख का चश्मा और भी मोटा होता जाता है और मोटे भारी लेंस के बावजूद भी सामान्य दृष्यता नहीं मिल पाती।

इस ऑपरेशन का लाभ यह हुआ है कि धुंधला आभास भर देने वाली आलसी आंख अब चैतन्य हो गयी है और दूर की लिखावट भी पढ़ने में सक्षम हो गयी है।

एम्ब्लायोपिया को साधारण भाषा में आलसी आंख – Lazy Eye कहा जाता है। मेरी पत्नीजी की बांयी आंख आलसी थी। उस आंख का मोतियाबिन्द ऑपरेशन के पहले उसकी दृष्यता, डाक्टरी भाषा मे‍ एफ़सी (Finger Counting) 2 थी। अर्थात दो मीटर दूर से वे यह भर बता पाती थीं कि सामने कितनी उंगलियां हैं। चक्षु परीक्षण का मानक चार्ट पढ़ने की सम्भावना ही नहीं थी।

डा. आलोक के अनुसार मेरी पत्नीजी की बांयी आंख में मोतियाबिन्द ज्यादा नहीं था। मात्र बीस प्रतिशत भर था। पर शल्य चिकित्सा द्वारा उनका ध्येय आंख में मल्टीफ़ोकल लेंस डाल कर उस आंख की दृष्यता बढ़ाना था।

वह छोटी सी लड़की नुमा पैरामेडिक जो यूं लगता था कि दसवीं कक्षा की छात्रा होगी; ने परीक्षण कुशलता से किया।

चुंकि बांयी आंख आलसी आंख थी, उसके लिये मोतियाबिन्द का मल्टीफ़ोकल लेंस भी ज्यादा पावर का चाहिये था। वह विशेष लेंस अरेन्ज करने में डाक्टर साहब को समय लगा। जब उन्होने उसकी उपलब्धता की हामी भरी तो हम अपने गांव से बोकारो आये। हमारे आने के कुछ घण्टे बाद ही डाक्टर साहब को कुरीयर ने लेंस का पैकेट उपलब्ध कराया। डा. आलोक के क्लीनिक/अस्पताल जाते ही पत्नीजी की आंख का परीक्षण हुआ और घण्टे भर में उस आलसी आंख का ऑपरेशन भी हो गया।

डा. आलोक के अस्पताल की दक्षता से मैं प्रभावित हुआ – फ़िर एक बार। …. वह छोटी सी लड़की नुमा पैरामेडिक जो यूं लगता था कि दसवीं कक्षा की छात्रा होगी; ने परीक्षण कुशलता से किया। उसके बाद डा. आलोक ने अपनी ओर से भी देख परख कर पत्नीजी को ऑपरेशन थियेटर में प्रवेश कराया।

डा. आलोक के अस्पताल की दक्षता से मैं प्रभावित हुआ – फ़िर एक बार।

हम लोग – पत्नीजी, मेरे बिटिया-दामाद और मैं डा. आलोक के अस्पताल सोमवार दोपहर ढाई बजे गये थे और चार बजे तक सब सम्पन्न हो चुका था।

ऑपरेशन के बाद आधा घण्टा एक बिस्तर पर लेटना था रीता पाण्डेय को। मेरी बिटिया उनके साथ बराबर मौजूद थी। दामाद जी – विवेक भी आसपास बने थे। उनके आजु बाजू रहने के कारण रीता पाण्डेय का तनाव जरूर कम रहा होगा।

पोस्ट ऑपरेशन आराम करने का कैबिन। ” एक वृद्ध तो अकेले थे। थोड़ी देर बाद वे खुल उठे और अपनी लाठी टटोल कर टेकते हुये जा कर गैलरी में बैठ गये।”

दो और मरीज थे वहां। एक वृद्ध तो अकेले थे। थोड़ी देर बाद वे खुद उठे और अपनी लाठी टटोल कर टेकते हुये जा कर गैलरी में बैठ गये। एक मरीज बाद में आये। ऑपरेशन के बाद वे सज्जन ज्यादा ही वाचाल हो गये थे। उनकी पत्नी उनके पांव दबा रही थी और बार बार उन्हें शान्त हो लेटने की कह रही थी। पर वह तो अपने ऑपरेशन के अनुभव इस प्रकार बता रहे थे कि मानो भूल जाने के पहले सब उगल देना चाहते हों। बेचारी पत्नी जो अपने पति की बलबलाहट भी समझ रही थी और यह भी जान रही थी कि सार्वजनिक स्थान पर उसे यह सब अनर्गल नहीं कहना-बोलना चाहिये; उसे बार बार चुप रहने को कहती हुई उसकी टांगे और तलवे सहलाती जा रही थी – मानो ऑपरेशन आंख का भले ही हुआ हो, उसको दर्द टांग में हो रहा हो! 😆

बिटिया-दामाद वाणी और विवेक डा. आलोक के क्लीनिक में

अगले दिन सवेरे हम दस बजे डा. साहब के चक्षु क्लीनिक पर गये आंख की पट्टी हटवाने। डा. साहब ने आंख का पोस्ट-ऑपरेशन परीक्षण कर देखा और बताया कि रेटीना पर लैंस अच्छी तरह सेट हो गया है। आंख की लालिमा समय के साथ दो चार दिन में समाप्त हो जायेगी।

सात नवम्बर को ऑपरेशन हुआ था। पांच दिन बाद 11 नवम्बर को डा. आलोक के क्लीनिक में आंख की दृष्यता का परीक्षण हुआ। आंख की विजन जो ऑपरेशन के पहले मात्र दो मीटर दूर की उंगलियो‍ की संख्या भर बताने की थी, अब छ फ़िट दूर की लिखावट उसी प्रकार पढ़ पाने की हो गयी थी जो सामान्य दृष्यता का व्यक्ति 24 फ़िट दूर की लिखावट पढ़ने की रखता है। अर्थात विजन 6/24 हो गया था। डाक्टर साहब के अनुसार महीने भर में यह और बेहतर हो कर 6/18 तो हो ही जायेगा। इस ऑपरेशन का लाभ यह हुआ है कि धुंधला आभास भर देने वाली आलसी बांयी आंख अब चैतन्य हो गयी है और दूर की लिखावट भी पढ़ने में सक्षम हो गयी है।

रीता पाण्डेय और डा. आलोक अग्रवाल

आलसी आंख छ दशक बाद चैतन्य – देशज भाषा में कहें तो छटपट – बनी! देर से ही सही, मेरी लुगाई जी पुनर्योवना हो रही हैं और हम जो हैं सो ही हैं! 🙂


मोबाइल गर्ल्स कूट्टम की तर्ज पर गोली, गिन्नी और गुन्जा


पिछले सप्ताह मैने एक पुस्तक का रिव्यू पढ़ा – “मोबाइल गर्ल्स कूट्टम – वर्किन्ग वीमेन स्पीक। पुस्तक की लेखिका हैं मधुमिता दत्ता। इसमे‍ कान्चीपुरम की नोकिया फ़ेक्टरी में काम करने वाली पांच महिलाओं की आपसी बातचीत है। वे महिलायें एक दो कमरे के फ़्लैट में रह रही हैं। सन 2013 की कथा है यह। सभी महिलायें अलग अलग पृष्ठभूमि से हैं। ग्रामीण महिलायें। हर एक के अपने अभाव हैं, अपनी आकांक्षायें। इस दो कमरे के फ़्लैट में रहते हुये और नोकिया की नौकरी मिलने के साथ वे अपने को अधिक आजाद, अधिक वर्जना से मुक्त और अधिक एम्पॉवर्ड पाती हैं जो उनकी आपस की बातचीत से झलकती है।

मधुमिता दत्ता कि पुस्तक का कवर
मधुमिता दत्ता कि पुस्तक का कवर

मधुमिता दत्ता से उनकी बातचीत का पॉडकास्ट, रेडियो पोट्टी के नाम से 2013 में स्पॉटीफ़ाई पर प्रस्तुत किया था। इसमें उन महिलाओं की बातचीत तमिळ में है जिसका भाषाई रूपान्तर वाला यह पॉडकास्ट उस समय बहुत लोकप्रिय हुआ था।

यह पुस्तक उसी पॉडकास्ट का पुस्तकाकार रूप है।


मैं फ़ेमिनिस्ट नहीं हूं। महिलाओं से बातचीत करना मेरे बस की बात नहीं। उनके प्रति मन में सम्वेदना भले हो, उनसे तादात्म्य स्थापित करना कठिन है।

बात यहीं खत्म हो जाती, या ज्यादा से ज्यादा मधुमिता दत्ता की किताब किण्डल पर खरीद कर पढ़ भर लेता। पर उससे अलग एक बात हुई। मैने अपने मित्र नागेश्वर से इस पॉडकास्ट/पुस्तक के बारे में बात की। छूटते ही नागेश्वर ने कहा – “अरे, ये कान्चीपुरम की लड़कियां तो मिस वाईपी की किचन की तीन लड़कियों की तरह हैं!”

श्रीमती वाईयी की किचन मे‍ गोली, गिन्नी और गुंजा
मिस वाईपी की किचन मे‍ गोली, गिन्नी और गुंजा

नागेश्वर मेरी उम्र का है। अभी इसी साल जुलाई में 67 का हुआ है। खब्ती और जुनूनी जीव है। उसके बारे में फ़िर कभी। वह बासठ-चौंसठ साल की मिस वाईपी (यशोधरा पुरन्दर) से कैसे मिला, उसके बारे में भी फ़िर कभी। वैसे मिस पुरन्दर बहुत अनूठी (पढ़ें दरियादिल) महिला हैं।

खैर न यह ब्लॉग कहीं गया है, न नागेश्वर नाथ और न यशोधरा पुरन्दर। आज तो मुझे उनके बारे में नहीं, मिस वाईपी के किचन की तीन लड़की नुमा महिलाओं – गोली, गिन्नी और गुन्जा की बात करनी है।

नागेश्वर ने बताया कि गोली, गिन्नी और गुन्जा उन लड़कियों के वास्तविक नाम नहीं हैं। मिस वाईपी को ग अक्षर पसन्द है। सो उनके अपने घरेलू नाम करण उन्होने ही किये है। उनकी किचन में वे नाम इतने प्रचलित हैं कि लड़कियां भी अपने को उसी नाम से आईडेण्टीफ़ाई करती हैं। उनके अपने घरों के नाम अलहदा हों, उससे कोई घालमेल नहीं होता।

तीनो लड़कियों की जिन्दगी, उनका परिवेश ब्ल्यू कॉलर क्लास का है। उनकी अपेक्षायें अपने और अपने परिवार को आगे बढ़ाने की हैं। जल्दी से जल्दी वे मध्य वर्ग में आ जाना चाहती हैं। उनके बच्चे हैं। सुख दुख हैं। टीवी है, फ़ोन और स्मार्टफ़ोन है। और भी छोटी मोटी सुविधायें और ढेरों अभाव हैं। पर वे यहां मिस वाईपी के किचन में आने के बाद चहकती रहती हैं। आपस में सहयोग भी करती है, लड़ती भी हैं और एक दूसरे की चुगली भी करती हैं। पर उनमें और मिस वाईपी में एक प्रगाढ़ बॉण्ड बन गया है।

नागेश्वर नाथ मेरी तरह गांवदेहात में नहीं रहता। वह शहरी जीव है। पर उसमें गांव की, गरीबी की, अभाव की समझ और तमीज है। एक तरह से वह मेरा शहरी क्लोन है, या मैं उसका गांव का रूप हूं। हां, वह ह्वाट्सएप्प और टेलीग्राम, जूम और वीडियो कॉन्फ़्रेन्सिन्ग के युग में भी सम्प्रेषण के लिये ई मेल का ही प्रयोग करता है।

नागेश्वर मे बताया कि मिस वाईपी गोली, गिन्नी और गुन्जा के बारे में वैसा ही विस्तार से बताने को तत्पर हो गयी हैं, जैसा मधुमिता दत्ता की किताब में नोकिया की लड़कियों के पॉडकास्ट और पुस्तक में है। वे लड़कियां हिन्दी बोलती है। इसलिये उनको समझने में मिस वाईपी को किसी टेली-रूपान्तर की जरूरत नहीं होगी। उनके कुछ देशज शब्द अर्थ के साथ जस का तस रखे जा सकते हैं।

मोबाइल गर्ल्स का पॉडकास्ट 8-9 अंकों का है। पुस्तक भी तीन सौ पेज से कुछ कम की है। गोली, गिन्नी और गुंजा को ले कर उसी आकार का प्रयोग हम – मिस वाईपी, नागेश्वर और मैं कर सकते है।

इस प्रयोग की सीमायें है। मिस वाईपी के साथ मेरा सम्पर्क नहीं होगा। वह नागेश्वर ही बतायेगा। वह भी ज्यादातर ई-मेल के माध्यम से। यदा कदा मैं उसे फ़ोन करूगा। वैसे वह फ़ोन अपने अलमारी में बन्द कर रखता है। वह सुविधाओं के होने के बावजूद मिनिमलिस्ट जीवन जीने का हिमायती है।

तो यह एक परिचयात्मक पोस्ट है। आगे हम गिन्नी, गुन्जा और गोली की बातचीत मिसेज वाईपी और नागेश्वर के माध्यम से करेंगे। क्या पता वह करते करते तीन सौ पेज की एक किताब ही बन जाये! 😆

मोबाइल गर्ल्स कुत्तम के पात्र
मोबाइल गर्ल्स कुट्टम के पात्र

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