हरामी कोई गाली है?


गांवदेहात डायरी

साइकिल से देखा गांव 

सुबह की हल्की धूप बरियापुर पर पड़ रही है।
जीवन लाल, तीस-बत्तीस साल का दुबला-पतला नौजवान, खादी जैसी कमीज़ और गले में काला बैग टाँगे साइकिल पर बैठता है। बैग में फाइलें, एक रजिस्टर, कैलकुलेटर और अब तो एक स्मार्टफोन भी—जिससे वह कैशपोर के माइक्रोफिनांस ग्रुप की उपस्थिति और कलेक्शन दर्ज करता है।

दलित बस्ती में कुल सोलह महिलाओं का समूह है, पर आईं कुल चार-पाँच ही हैं। बाकी किसी के हाथ से किश्त भिजवा देती हैं। और ज़्यादातर दिन जीवन लाल मान जाता है। किश्त ले लेता है, पर उनके अंगूठे या साइन की जगह खाली छोड़ देता है—अगली बार उनसे कार्रवाई पूरी करा लेता है।

पर आज वह अड़ गया। मिज़ाज कुछ बिगड़ा हुआ था। बोला—सारी औरतों को बुलाओ। जब सब आएँगी तभी आज की मीटिंग होगी।

मिलनी को जल्दी थी। कताई सेंटर पर जाना था। देर होगी तो सेंटर का मालिक रुपया काट लेगा। उसने जीवन लाल से चिरौरी की, पर जीवन लाल नहीं माना।

कुछ तल्खी में उसने कहा—
“साहब, देखत नाहीं हयअ, अबेर होत बा।”

जीवन फिर भी नहीं माना तो वह बोली—
“साहेब, तूं त बड़ हरामी हौ।”

और तब तो जीवन लाल ने बवाल कर दिया। अपने मैनेजर को फोन कर बताया कि औरतें मान नहीं रहीं, उल्टे मुझे गाली दे रही हैं। मैनेजर ने भी जीवन लाल का ही पक्ष लिया। उसकी शह मिलने पर झगड़ा और बढ़ गया।

मिलनी रुआँसी होकर बोली—
“हे साहेब, हम गारी कहाँ दिहा? हमने गाली कहाँ दी?”

मुझे बाद में मेरी कामवाली ने यह घटना बताई तो मैंने कहा—हरामी कहना गाली नहीं तो क्या है? हरामी का मतलब तो वही हुआ जिसके पिता का कोई पक्का पता न हो, यानी माता दुश्चरित्र हो।

वह बोली—
“ओ साहब! ई त बोलचाल के भाषा ह। अपने लड़के से भी हम कह देत हैं—हरामी, ई काम ऐसे काहे किया। अपनी बेटी से कह देत हैं—रंड़वा, सुनत काहे नाहीं?”

उनकी आम बोलचाल की भाषा ने कितना बड़ा बखेड़ा खड़ा कर दिया।

जब तक सोलहों महिलाएँ नहीं आ गईं, और जब तक मिलनी ने जीवन लाल के पैर छूकर अपने कान पर हाथ नहीं रखा—मीटिंग पूरी नहीं हुई।

बताइए, भला “हरामी” भी कोई गाली है?
वह तो यहाँ बोलचाल का एक सम्पुट भर है।

नीलकंठ चिंतामणि
शांतिधाम, बरियापुर
9 मार्च 2026

नीलकंठ के कयास


[ नीलकंठ एक मानसिक चरित्र है। वह गंगा किनारे बरियापुर में रहता है। गंगा वहां मनोरम दृष्य बनाती हैं— यू टर्न इस तरह लेती हैं कि वहां घाट से सूर्योदय और सूर्यास्त, दोनो गंगा के जल में होते दिखते हैं। रेलगाड़ियों के प्रबंधन से थका नीलकंठ वहां एक रिटायर्ड होम में अगली पारी जी रहा है। 

उसने मुझे अपनी सोच का ई-मेल भेजा – “इसे अपने ब्लॉग पर ठेल देना, मैंने तुम्हारी ओर से बना दिया है”।

वह मैं पोस्ट कर रहा हूं।

नीलकंठ के कयास

खाड़ी में लड़ाई हो रही है और नीलकंठ खुश है। वह युद्धोन्मादी नहीं है। पर जब दुनिया की जमी हुई सतह कहीं टूटती है, तब उसे एक अजीब-सी उत्सुकता होती है। स्थिरता उसे ऊबा देती है।

जब आसपास डीजे के शोर में भोजपुरी गीत बजता है और औरत पटना में फ्लैट लेने की बात गा रही होती है, तब नीलकंठ जिद्दू कृष्णमूर्ति को सुनना चाहता है। जब पर्यावरणवादी जंगल बचाने की बातें करते हैं, तब वह विकास और गरीबी उन्मूलन के आँकड़े निकालने लगता है।

नीलकंठ का स्वभाव ही कुछ ऐसा है। वह कॉन्ट्रेरियन है। सब दायें जाते हैं तो वह बांये।

खाड़ी की लड़ाई शुरू हुई तो उसने घटनाओं को थोड़ी अलग नजर से देखा। शुरुआत में ही खामेनई और ईरान की टॉप लीडरशिप के साफ हो जाने की खबर आई तो वह मुस्कराया। उसे लगा कि इससे एक स्थिर लेकिन जकड़ा हुआ ढाँचा हिल सकता है। वह तब भी उत्सुक हुआ जब इजराइल की प्रॉक्सी के बजाय अमेरिका खुद मैदान में उतरा। उसे यह भी दिलचस्प लगा कि ईरान ने जवाब में खाड़ी के अपने बिरादरी के भाइयों—चचेरे ही सही—को भी लपेट लिया। आईआरजीसी के ठिकानों पर हमलों की खबरें आईं तो नीलकंठ ने उन्हें भी एक बड़े बदलाव के संकेत की तरह पढ़ा।

आगे की लड़ाई में वह क्या चाहता है?

नीलकंठ की कल्पना एक चेन रिएक्शन की है। वह चाहता है कि आईआरजीसी के भीतर दरारें पड़ें। गुटबाजी बढ़े। बसीज एक क्षण ऐसा आये जब अपनी ही जनता पर बंदूक तानने से मना कर दे। चीन और रूस दूर से देखते रहें और हस्तक्षेप न करें। इसी बीच अमेरिका उत्तर के कुर्द इलाकों के सहारे ईरान में दबाव बनाये। और जब ईरान की जनता को लगे कि सत्ता का ढाँचा अजेय नहीं है, तब वह सड़कों पर निकल आये।

नीलकंठ की कल्पना सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं है। वह खाड़ी के नक्शे पर और भी लहरें देखता है। वह सोचता है कि अगर होरमुज़ चार हफ्तों के लिये बंद हो जाये और तेल सौ डॉलर छू ले तो क्या होगा। पाकिस्तान में पेट्रोल की एक बूंद न बचे और खरीदने की ताकत भी न रहे—कटोरा आगे करने पर भी नहीं। बांगलादेश भी हाय-हाय करने लगे।

पर यह सब हमेशा के लिये नहीं। नीलकंठ चाहता है कि यह उथल-पुथल लंबी न चले। चार हफ्ते काफी हैं। उसके बाद लड़ाई अपने किसी तार्किक मुकाम पर पहुंच जाये। अगर बहुत लंबी चली तो सब थक जायेंगे और फिर वही जमी हुई स्थिति लौट आयेगी।

नीलकंठ खाड़ी युद्ध
अपनी मेज पर खाड़ी युद्ध खंगालता नीलकंठ

पाकिस्तान के बारे में नीलकंठ भारत की आधिकारिक नीति से अलग सोचता है। भारत अक्सर हाथी की चाल चलता है—धीमी, भारी और सावधान। नीलकंठ को वह चाल बहुत पसंद नहीं। वह चाहता है कि अगर चार हफ्तों का ऐसा उथल-पुथल वाला समय आये तो भारत भी अवसर देखे। उस दौरान पाकिस्तान तेल के बिना जूझ रहा हो और पश्चिम से बलूच और अफगान उसे कस कर कोंच रहे हों।

चार हफ्तों के युद्ध में, नीलकंठ को लगता है, भारत के लिये बहुत-से अवसर पैदा हो सकते हैं।

ये भविष्यवाणियाँ नहीं हैं। यह बस नीलकंठ के कयास हैं—एक ऐसे आदमी के, जिसे दुनिया की स्थिरता से ज्यादा उसके हिलने-डुलने में दिलचस्पी है।

कभी-कभी उसे खुद भी संदेह होता है कि कहीं वह घटनाओं को नहीं, बल्कि अपनी कल्पनाओं को देख तो नहीं रहा। पर फिर वह सोचता है—दुनिया बदलती भी तो ऐसे ही है, पहले किसी के मन में एक कयास बन कर।

नीलकंठ चिंतामणि
शांतिधाम, बरियापुर

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ट्रेवलिंग डेंटल टेक्नीशियन: इरशाद अहमद की कहानी


जो दांत बनारस में बनाते हैं और मुस्कान महराजगंज में लगाते हैं

डॉक्टर के क्लीनिक की गैलरी में एक आदमी बैठा था। हाथ में दांत का ताजा इम्प्रेशन लिए। मैं वहां अपनी बारी का इंतजार कर रहा था। वही आदमी इरशाद थे — दांत के टेक्नीशियन।

पिछले डेढ़ महीने में दांत के डॉक्टर साहब के यहां कई बार जाना हुआ। नया दांत लगाने का नाप लेने और लगाने के मौके पर वे रहते ही हैं…

मैं उनका नाम नहीं जानता था, पर पिछली बार विधिवत परिचय हुआ। वे किसी कस्टमर के दांत का नाप ले कर बाहर गैलरी में बैठे थे और मैं अपनी बारी का इंतजार कर रहा था।

उन्होंने बताया कि पांच साल से दांत बना रहे हैं। अब तक हजारों दांत बना चुके हैं — उनकी अपनी गणना में करीब डेढ़ लाख तक। और उनकी दक्षता का पैमाना यह है कि निन्यानबे प्रतिशत दांत सही बैठते हैं।

बनारस में वे अपनी डेंटल कास्टिंग लैब में काम करते हैं। उनके ग्राहक बनारस के डेंटिस्ट तो हैं ही, गाजीपुर से ले कर लालानगर तक के ग्रामीण और कस्बाई/शहरी दांत के डॉक्टरों से भी उन्हें काम मिलता है।

इरशाद का पूरा नाम इरशाद अहमद है। उनका गांव यहीं गिर्द बड़गांव के पास कुनबीपुर है। पर वे रहते बनारस में हैं। डेंटल तकनीशियन का काम अपने परिवार में ही सीखा — कुछ वैसे ही जैसे लुहार-बढ़ई अपने घर में सीखते हैं।

पर उनके परिवार में अलग पेशे में भी गये हैं लोग। उनके बाबा, डॉक्टर सनाउल्लाह एक होमियोपैथ थे — भदोही के नामी होमियोपैथ। डॉक्टर सनाउल्लाह स्वतंत्रता सेनानी भी थे। उनकी दादी तो 100 की उम्र पार कर गईं। उनके एक भाई मुरादाबाद में कार्डियोलॉजिस्ट तकनीशियन हैं।

डेंटल टेक्नीशियन का काम काफी हुनर का काम है। आदमी के नये दांत को जबड़ा सरलता से स्वीकार नहीं करता, अगर उनकी बनावट सही न हो। जीभ दांत को ठेलती है और जबड़े असहनीय दर्द में आ सकते हैं, अगर दांत सेट न हों।

इरशाद पहले जो दांत या दांतों का सेट बनाना है, उसका इम्प्रेशन लेते हैं। वे मरीज के मुंह में एक ट्रे रखते हैं जिसमें मुलायम मटीरियल — एल्जीनेट — भरा होता है। आजकल कहीं सिलिकॉन बेस्ड इम्प्रेशन मेटीरियल का भी इस्तेमाल होता है। कुछ ही मिनट में यह जम जाता है और दांतों व मसूड़ों की नेगेटिव छाप बन जाती है।

यह इम्प्रेशन ट्रे ले कर वे अपनी बनारस की लैब में जाते हैं। वहां नेगेटिव में डेंटल ग्रेड जिप्सम या डेंटल स्टोन भरते हैं। इससे दांत का पॉजिटिव मॉडल बनता है।

फिर पॉजिटिव मॉडल से मोम का मॉडल बनाते हैं। इसे वैक्स-अप कहा जाता है। इसमें असल दांत की ऊंचाई, शेप और दांत के काटने की सतह तय होती है। असल कारीगरी का अनुभव इसी में लगता है। दांतों का संतुलन, उपयोक्ता का डेंटल मेक-अप, मुस्कान की नैसर्गिकता और चबाने की सरलता इसी हुनर पर निर्भर होती है।

फिर तकनीशियन नकली दांत के मेटीरियल का चयन करते हैं। मेरे केस में मैंने मेटल-सेरामिक पसंद किया। सेरामिक उसे दांत की सफेदी और टेक्स्चर देता है और मेटल मजबूती। यह शायद सस्ता भी पड़ता है।

Dental Technician
अपनी दांतों की लैब में काम करते इरशाद अहमद

इसके बाद दांत की फिनिशिंग और पॉलिश होती है। फिर इरशाद दांत ले कर हमारे पास आते हैं। वे और डॉक्टर साहब मिल कर दांतों को लगा कर ट्रायल करते हैं। जरूरत पड़े तो फाइनल फिनिशिंग के लिये थोड़ी घिसाई भी करते हैं — नकली या उसके दूसरी ओर के असली दांत की भी।

मेरे साथ भी वैसा हुआ। एक आर्टीकुलेट पेपर को मेरे दांतों के बीच रख कर दांतों को रगड़ने को कहा गया। इससे सुनिश्चित किया कि सब ठीक सेट हुआ है।

इरशाद कम बोलने वाले आदमी लगे। आर्टीकुलेट पेपर को हाथ में ऐसे देख रहे थे जैसे कोई कारीगर अपनी ढलाई की नफासत को परखता है।

असल खेल बिल पेमेंट के समय हुआ। डॉक्टर साहब ने जो बिल बताया वह मेरी अपेक्षा से कम था।

मैं मोबाइल में वह अमाउंट टाइप कर चुका था। डॉक्टर साहब ने रोका और हंसते हुए कहा — ‘इतना नहीं, आप हमारे सम्मानित ग्राहक हैं।

और फिर जो पेमेंट लिया, उसे देखें तो बहुत सस्ते में इलाज हुआ माना जा सकता है।

इरशाद का कहना था कि बनारस में उन्हें दांत बनवाई में जो मिलता है, गांव देहात में उससे काफी कम मिलता है। पर कुल मिला कर उनका काम चल जाता है। वे अपने रूरल ग्राहक खोना नहीं चाहते। रूरल डेंटिस्टों के यहां जाने आने में समय भी लगता है और पेट्रोल भी। पर वह सब उनके इस ट्रेवलिंग डेंटल टेक्नीशियन मॉडल पर भारी नहीं पड़ता।

खुशबू ने बताया कि फलानी महिला बनारस से यहां आई थी अपना आरसीटी कराने और दांत लगवाने। वही कह रही थी कि बनारस में 15 हजार मांग रहे थे और यहां आठ-नौ हजार में काम हो गया।

अर्थात महराजगंज का स्वमित्र का डेंटल क्लीनिक एक तरीके से डेंटल टूरिज्म भी है।

लोग परदेश से भारत दांत लगवाने आते हैं। अब यह नया मॉडल है — लोग शहर से दांत के इलाज के लिये महराजगंज आयें।

गांव-कस्बों का यह नेटवर्क चुपचाप काम करता रहता है, पर कई बार शहर की महंगी व्यवस्था से ज्यादा असरदार साबित हो जाता है।

चलते चलते हमने नमस्कार – प्रणाम का आदान प्रदान किया। आज इतने समय में मैंने जाना कि दांत बनाना भी एक तरह की कारीगरी है, जिसे हम मरीज लोग अक्सर देख ही नहीं पाते।

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