धनुषटंकार


 

धूमिल यादें

वह 1959-60 का समय होगा। मेरी यादें बहुत धूमिल हैं। चार-पांच साल का बच्चा, जो स्कूल भी नहीं जा रहा था, कितना याद रख सकता होगा। पर इतना याद है कि मेरा एक छोटा भाई हुआ था, जो जन्म के चौदहवें दिन ही चल बसा।

मेरी अम्मा सौरी में थीं—बंद कमरे में। मैं कमरे में जा भी नहीं पाया और भाई की शक्ल भी नहीं देख सका। अम्मा बताती थीं—बहुत गोरा था, स्वस्थ और गोल चेहरे वाला। पर दाई ने नाल काटने के लिए जिस हंसिया का इस्तेमाल किया, उसी से टिटनेस का संक्रमण हुआ, जो जानलेवा साबित हुआ।

बाद में मां ने रोते हुए बताया था कि उसकी पीठ अकड़कर धनुष की तरह हो गई थी। उससे स्पष्ट था कि वह टिटनेस के संक्रमण से गया। टिटनेस को हिंदी में धनुषटंकार कहा जाता है।

मेरे पिताजी नौकरी में थे—शायद कश्मीर में पोस्टिंग थी। महीने भर बाद वे आए। उस समय घर की रीत अलग थी—पुरुष बाहर दालान में रहते थे और महिलाएं भीतर कमरों में। मुझे साफ याद है—पिताजी अम्मा से मिलने अंदर आए थे। वे खटिया पर बैठे थे, अम्मा नीचे जमीन पर। अम्मा का रो-रोकर दोहरा हो जाना आज भी आंखों में है।

अब आंकड़े देखता हूं तो पता चलता है कि पूर्वांचल में उस समय शिशु-मृत्यु दर लगभग 200 प्रति हजार थी। यानी हर पांच में से एक बच्चा—टिटनेस, डायरिया, न्यूमोनिया या कुपोषण से—पहले साल में ही मर जाता था।

मेरा गांव कोई दूरदराज का गांव नहीं था। भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू  मेरे इलाके के सांसद थे। विजयलक्ष्मी पण्डित भी दो बार मेरे गांव के आसपास आ चुकी थीं। आज़ादी के आंदोलन ने इस इलाके को कई नेता दिए थे। पर स्वास्थ्य सुविधाएं यहां भी, देश के बाकी हिस्सों की तरह, लगभग नहीं थीं।

नेहरू उस समय बड़े बांधों और इस्पात के कारखानों में लगे थे। स्वास्थ्य उनकी प्राथमिकताओं में नहीं था—कम से कम गांवों तक तो नहीं। इलाके ने प्रधानमंत्री दिया, पर दाई अब भी हंसिया से ही नाल काट रही थी। इन दो भारतों के बीच एक कामचलाऊ पुल बनने में भी तीन दशक लग गए।

इस दुर्घटना के बाद पिताजी का तबादला दिल्ली हो गया और वे अम्मा और मुझे अपने साथ ले गए। बाद में, मुझसे नौ साल छोटी बहन का जन्म हुआ। वह आज जीवन के छह दशक पार कर अपनी तीसरी पीढ़ी के बच्चों के वीडियो व्हाट्सएप पर साझा करती है।

पर मेरे पास उस छोटे भाई को साझा करने के लिए बस कुछ धुंधली स्मृतियां हैं।

मेरी बहन के पास तो उसकी कोई स्मृति भी नहीं।

— ज्ञानदत्त पाण्डेय
विक्रमपुर, भदोही
11 अप्रेल 2026

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बरियापुर में मंहगू नाई 


गांवदेहात डायरी

बाल बढ़ गये थे। साइकिल चलाते देख नंदलाल ने दूर से ही पैलगी उछाली — पालागी गुरू जी। अब तो आपके बाल आइन्स्टीन  कट लग रहे हैं। 

मुझे भी लगा कि तेल-फुलेल-कंघी से दूरी रखने और नाई को नियमित न बुलाने के कारण मेरी शक्ल वैसी हुई होगी, वर्ना आइन्स्टीन  जैसा बौद्धिक व्यक्तित्व मेरा है ही नहीं। दूसरे, आइन्स्टीन के बाल तो उनकी पत्नी काट दिया करती थीं; मुझ अविवाहित के पास वह सहूलियत कहां? 

मंहगू नाई का फोन नम्बर मेरे पास था। वह अगले दिन शांतिधाम में हाजिर था। चारखाने की लुंगी, धारी दार बुश-शर्ट और सिर पर फेंटा बांधे। यही उसका सामान्य ड्रेस है। जब वह बुश-शर्ट धोने डाल देता है तो बनियान पहने ही पूरा बरियापुर घूमता रहता है। 

शांतिधाम के कम्पाउंड में मौलीसिरी के पेड़ के नीचे उसने मेरे लिये कुर्सी मेज बिछाई। मेरा बाल बनाने का किट — उस्तरा, ब्लेड, कंघी, कैंची और गमछा — मेरे लिये जमा दिया। फिर एक मग पानी रख मुझे बुला ले गया। 

कम्पाउंड में चरखियां और गिलहरियां शोर मचा रही थीं। एक नेवला इधर उधर भाग रहा था। वह उनका जंगली दुश्मन है। तितलियां नेवले से बेखबर इधर उधर उड़ रही थीं। मधुमक्खियां गेंदे और जीनिया के फूलों पर मंडरा रही थीं। उनके बीच मेरे बाल मंहगू काट रहा था। 

किसी शहर में बाल कटाने का यह आनंद कहां? 

मंहगू बाल काटते समय – अन्य नाऊओं से अलग – चुपचाप रहता है। उससे बात करने के लिये उससे सवाल करने होते हैं। बाल कटाते हुये मैने उसे खोद-खोद कर जानकारियां निकालीं। 

वह अकेला ही बरियापुर में रहता है। उसके तीन भाई तीन जगह काम करते हैं। एक जीन की पैंट बनाने के कारखाने में अहमदाबाद में है। उससे छोटा वापी में केमीकल डाई के कारखाने में लगा है। तीसरा, और सबसे बड़ा भाई बम्बई में वाचमैनी करता है। वह खुद वापी में काम करता था, पर छोड़ कर गांव चला आया।

तीस हजार महीने की पगार छोड़ वापस गांव क्यों आया? मेरे पूछने पर उसका उत्तर इधर उधर का – अस्पष्ट  ही था। कुछ सवाल अनुत्तरित ही रह जाते हैं। उसमें से यह भी है — क्या कारण है कि लोग पलायन करते हैं और क्या कारण है कि तमाम असुविधाओं – आर्थिक तंगी को झेलते – गांव में वापस आना चाहते हैं। 

आखिर मैं भी शहर में क्लब और गोल्फ कोर्स की सुविधा छोड़ साइकिल थाम काहे गंगा किनारे इस कस्बे – बरियापुर – में आ कर बस गया हूं। 

मंहगू मेरे बाल काट एक चार इंच के शीशे में मेरी शक्ल दिखाता है। मेरे संतोष व्यक्त करने के बाद वह मेरे सिर, कंधे और हाथों की चम्पी करता है। मौलीसिरी के पेड़ के नीचे यह सुख शहर में कहां? 

— नीलकंठ चिंतामणि
शांतिधाम, बरियापुर 

10 अप्रेल 2026

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मौसम का मिजाज 


गांवदेहात डायरी 

हफ्ता दस दिन हो गये, रोज बादल आ जा रहे हैं। आंधी आ रही है। किसान परेशान हो रहा है। गेंहूं की फसल तैयार है। कटाई का काम चलता – रुकता है। किसान की सांस भी ऊपर नीचे होती है। 

थ्रेशिंग करने वाले भी बहुत व्यस्त हैं। एक जगह से दूसरी जगह दौड़ लगा रहे हैं अपने ट्रेक्टर और थेशर अटैचमेंट के साथ। उनके रेट भी बढ़ गये हैं, पर बारिश आ जाने से उनका टाइम भी खोटा हो रहा है। 

जोखन की फसल कटी पड़ी है। बार बार थ्रेशर वाले को फोन करता है, बार बार वह कहता है कि अब आ रहा हूं, तब आ रहा हूं। खीझ कर वह भगवान को कोसता है— ई दऊ के हमार सुख नाहीं देखा जात। बहुत हरामी हयेन दऊ।
भगवान को कोसना और भगवान को अपने घर समाज का अंग मान कर गरिया भी देना— यह लिबर्टी हिंदू धर्म में ही मिलती है। 

कल शाम मौका पा कर हमारी अधियरा सुग्गी ने एक खेत के गेंहू की थ्रेशिंग कराई। गेंहू सफरते सफराते रात दस बज गये। फोन किया— दीदी, आई क बंटईया कराइ ल। 

मेम साहब रात दस बजे खेत में जा कर अंधेरे में खड़े हो आधा गेंहूं बंटाने के मूड में नहीं थीं। उन्होने कहा कि सुग्गी खुद ही बांट ले और उनका हिस्सा ला कर पंहुचा जाये। 

कई साल से अधियरा है सुग्गी। एतबार बन गया है उसकी ईमानदारी का। ज्यादा होगा तो थोड़ा बहुत उन्नीस बीस होगा। उतना झेलने को तैयार हैं मेम साहब। 

रात इग्यारह बजे सुग्गी के लड़के सगड़ी से दो फेरा कर गेंहू के बोरे पंहुचा गये। नीचे पोर्टिको में ही रख दिये। थ्रेशिंग की धूल में भूत की तरह लग रहे थे वे। गोविंदा ने तो कमीज-बनियान उतार दी थी। एक चड्ढी भर पहने था। किसानी मेहनत का काम है। उसमें फैशनबाजी का कोई स्थान नहीं।  

आधी रात के बाद ही सोये होंगे वे। 

… 

सवेरे देखा — पोर्टिको में आठ दस बोरे जमा थे। पांच क्विंटल गेंहू होगा। अभी कुछ और भी खेत हैं, उनमें कुछ खड़ी, कुछ कटी फसल है। अभी तनाव के दिन खत्म नहीं हुये हैं। दऊ का क्या भरोसा — अगले तीन चार दिन में तापक्रम गिरने, यदा कदा बारिश वाले मौसम की सूचना है। 

मैं अपनी साइकिल से सवेरे दूध-सब्जी लेने निकला तो आधे रास्ते में बारिश से सामना हुआ। एक परित्यक्त शेड में खड़ा हो गया। साइकिल भीगती रही। मुझे खड़ा देख बगल की एक वृद्ध महिला निकल कर आई और बोली— बारिश हल्की हो गई है। निकल सकते हो। कहां जाना है? 

“ज्यादा दूर नहीं, विक्रमपुर” — मैने कहा। अपने चश्मे से पानी की बूंदें पोंछीं और घर लौटा। 

मौसम ने मुझे बिना ज्यादा भीगे घर लौटने का मौका दिया। उसी तरह आंधी-पानी रुक रुक कर आने से किसान की धुकधुकी भले ही बढ़ी है, पर खलिहान निपटाने का मौका मिल ही जा रहा है। 

दऊ किसान को टेंटरहुक्स पर भले ही रखे हैं, पर मौसम की लगान भी थामे हैं। काम हो ही जा रहा है! 

— ज्ञानदत्त पाण्डेय
विक्रमपुर, भदोही
8 मार्च 2026 

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