हरिहर से बातचीत


गांवदेहात डायरी

Harihar at Platform
कटका प्लेतफार्म पर मैं और हरिहर

सालों बाद कटका के प्लेटफार्म नम्बर 2 पर गया। वहीं मिला हरिहर। अंधा है वह। हाथ में एक लाठी, बगल में एक झोला—जिसमें बिस्कुट के पैकेट। उन्हीं को लेकर वह ट्रेनों के कॉरिडोर में चलता और बेचता है।

हरिहर प्लेटफार्म पर बैठने लगा तो किसी ने आगाह किया—“ट्रेन आवे वाली बा। आगे बैठबे त भहराई जइब।”
एक सज्जन ने उसका हाथ पकड़कर जमीन पर बैठा दिया। बैठते हुए उसने अपना झोला गोद में खींच लिया—वही उसकी पूंजी है, वही उसका सहारा।

हरिहर को रोशनी नहीं दिखती—पर जिंदगी उसे पूरी साफ नजर आती है।

मैं पास ही खड़ा था। उससे बातचीत शुरू की। वह जो कुछ बता रहा था, बहुत सपाट ढंग से—जैसे यह सब कोई खास बात न हो, जैसे यह जीवन उसका रोज का सामान्य हो।
पर उसके हर वाक्य के पीछे एक खालीपन था, जो सुनते-सुनते धीरे-धीरे भरता जाता था।

“लीलापुर से आ रहा हूं। पांच किलोमीटर दूर है। ट्रेन पकड़ूंगा। ज्ञानपुर तक जाऊंगा। उससे पहले सामान बिक गया तो पहले ही लौट लूंगा।”

“सामान क्या है?”
“झोरा में बिस्कुट क पैकेट हयें। पांच रुपया क एक। क्रीम वाले।”

मुझमें पुराना रेलवे अफसर जागा। मैंने पूछा—“टिकट लिया है या नहीं?”

“नाहीं साहेब। टिकट कभौं नाहीं लिहा।” — उसने वैसे ही कहा, जैसे बाकी सब कहा था। बिना किसी अपराध बोध के। … हम टिकट लेकर चलते हैं—वह जिंदगी बिना टिकट काट रहा है।
पास ही किसी ने हंसी में जोड़ा—“रेलवई क बड़का साहब पूछत हयें। जेल होई जाए।”

जेल का नाम सुनकर भी उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं आया। बोला—
“भेज दें साहब। उंहा ढंग से खाई के त मिले। बढ़िया खाना मिले—ऊ भी दो जून। अभी त कभी खाना मिलता है, कभी नहीं। दो बिस्कुट खा, पानी पी के रह लेता हूं।”

यह कहते हुए भी उसकी आवाज में कोई शिकायत नहीं थी—बस एक सीधी-सी जानकारी थी, जैसे वह किसी और के बारे में बता रहा हो।

हरिहर जैसे लोग भूख को भी आदत की तरह जी लेते हैं।

लीलापुर में वह अकेला रहता है। पत्नी गुजर चुकी है। एक बेटी थी—वह भी नहीं रही। बेटी के दो बच्चे थे—एक लड़की, एक लड़का—वे भी नहीं रहे। पट्टीदारों ने जमीन छीन ली। अब बस ट्रेन में बिस्कुट बेचकर जीवन चलता है।

मैंने पूछा—“जन्म से नहीं दिखता था या बाद में रोशनी चली गई?”
हरिहर बोला—चार साल का था, तब बीमार हुआ। माई ने बम्बई में पिता को चिट्ठी लिखी। अठारह दिन बाद बाबू आये। डॉक्टर को दिखाया—जान बच गई, पर आंखें चली गईं। फिर माई-बाबू भी चले गये।

एक के बाद एक दुख झेलता गया हरिहर।
पर वह उन्हें दुख की तरह नहीं गिनाता—बस घटनाओं की तरह बता देता है।

जहां मैं खड़ा था, उसी प्लेटफार्म पर—अगर वह पास में न बैठा होता, तो मुझे उसके बारे में कुछ भी पता न चलता।
जैसे बहुत-सी जिंदगियां हमारे पास से गुजरती रहती हैं—बिना दिखे, बिना सुने।

मेरी जेब में हमेशा की तरह पर्स नहीं था। पास बैठे मोबाइल पर कुछ देखते एक नौजवान से मैंने कहा—“सौ-पचास रुपये दे सकते हो? मैं यूपीआई से दे दूंगा।”

उसने कारण पूछा। फिर एक छोटा-सा, पर अलग तरह का दृश्य उपजा। उसने अपने पर्स से बीस रुपये निकाले और हरिहर को दे दिये। मुझसे यूपीआई लेने से मना कर दिया।
हरिहर यूं पैसे लेना नहीं चाहता था। वह झोले से बिस्कुट के पैकेट निकालने लगा—जैसे लेन-देन बराबर होना चाहिए। बहुत मना करने पर ही माना।

कभी मैं रेल का बड़ा अफसर था। अब वहां प्लेटफार्म पर बिना रुतबे, बिना पहचान के जाना सहज नहीं लगता।
पर आज लगा—यूँ ही चले जाना चाहिए, ट्रेन के समय पर। और जेब में पर्स रखना चाहिये कुछ चिल्लर के साथ।

ट्रेन आने वाली थी। हरिहर खड़ा हो गया। बीस रुपया देने वाले नौजवान ने मेरे अनुरोध पर मेरा और हरिहर का एक चित्र भी खींच दिया मेरे मोबाइल से। सनद रहे कि कभी मैं हरिहर से मिला था।

गांवदेहात की, भारत की—
कुछ कहानियां प्लेटफार्म पर बैठी होती हैं।
और हम अक्सर उन्हें देखे बिना ही निकल जाते हैं।

— ज्ञानदत्त पाण्डेय
विक्रमपुर, भदोही
28 मार्च 2026

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जातियों में बंटी औरतें


गांवदेहात डायरी

गांव की औरतें


यहां गांवदेहात में गांव कई हिस्सों में बंटा है—ब्राह्मण, केवट, पासी और चमरउट। इनके पुरुष अलग-अलग व्यवसाय में हैं और महिलाओं का जीवन भी अलग-अलग तरह से चलता दिखता है। मैं इन्हें हाशिये से देखता हूं; बहुत-सी बातें पत्नीजी से सुनकर समझता हूं।

हर हिस्से में महिलाओं की स्वतंत्रता, उनके काम और घर-समाज में उनकी भूमिका अलग है। यह सब देखते हुए तुलना अपने आप होने लगती है—किसकी ज्यादा चलती है, किसको ज्यादा अधिकार हैं, कौन ज्यादा सहज दिखता है।

यह विषय समाजशास्त्र का है और मेरी समझ सीमित है। फिर भी, एक आम आदमी की नजर से कुछ बातें दिखती हैं।

चमरउट की महिलाएं अपेक्षाकृत ज्यादा स्वतंत्र दिखती हैं। गांव में उनकी आवाजाही भी अधिक है। घर और बाहर—दोनों जगह वे काम में बराबर की हिस्सेदारी निभाती हैं। मेहनताना भले थोड़ा कम हो, पर उनकी भूमिका कम नहीं आंकी जाती। शायद इसी कारण वहां लड़की का जन्म ज्यादा सहजता से स्वीकार होता है।

छोटी लड़कियां घर का काम संभालती हैं और बड़ी होकर खेतों में बुआई, कटाई, निराई में लगती हैं। कई समूह सुबह-सुबह रोटियां बांधकर 20–25 किलोमीटर दूर खेतों में काम करने निकलते हैं। इस बाहर निकलने से उनमें एक आत्मविश्वास भी आता दिखता है।

ऐसे माहौल में कई बार काम के दौरान प्रेम संबंध भी बनते हैं और कुछ लड़कियां अपने विवाह के निर्णय खुद लेने लगती हैं। बताया जाता है कि समाज धीरे-धीरे इसे स्वीकार भी कर रहा है।

केवट महिलाओं में परंपरागत रूप से शादी-ब्याह में पूड़ी बेलने का काम रहा है। अब यह काम बदलकर समूहों द्वारा भोजन के ठेके लेने तक पहुंच गया है। इससे उनकी गतिशीलता और आर्थिक भूमिका दोनों बढ़ी हैं।

पसियान की महिलाओं को मैंने कम ही बाहर काम करते देखा है; वे अधिकतर घर और आसपास तक सीमित दिखीं। संभव है कि मेरा अवलोकन अधूरा हो।

ब्राह्मण महिलाओं के बारे में, मेरे देखने में, गांव में उनकी स्वतंत्रता अपेक्षाकृत सीमित है। बाहर निकलने और काम करने के अवसर कम हैं। पढ़ाई और विवाह जैसे निर्णय प्रायः पुरुषों द्वारा लिए जाते हैं। लड़कों को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति भी अधिक दिखती है। घूंघट की परंपरा भी अब तक बनी हुई है।

जाति यहां सिर्फ ब्राह्मण की पहचान नहीं तय करती—
औरतों के जीने की सीमा भी खींच देती है।
🙁

यह एक सपाट अवलोकन है। हर वर्ग और हर उम्र के भीतर जीवन की कई परतें हैं, जिन्हें मैं पूरी तरह नहीं देख पाता। शायद उतनी सूक्ष्मता से देखना मेरे लिए सहज भी नहीं है।

फिर भी इतना स्पष्ट है कि गांव के अलग-अलग जातीय समूहों में महिलाओं का जीवन, उनकी स्वतंत्रता और उनके अनुभव—एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं।

एक ही गांव में रहती हैं सब औरतें—
पर हर जाति की औरत का गांव अलग है।

— ज्ञानदत्त पाण्डेय
विक्रमपुर, भदोही
27 मार्च 2026

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युद्ध से मुक्ति की जुगत


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गांव में ईंधन की जुगत
गांव में ईंधन के समाधान

तीन दिन से हमने गैस स्टोव का प्रयोग नहीं किया। हम लाई-चना या केले पर जिंदा नहीं रहे, न ही बाजार से पका हुआ भोजन खरीदा। घर में रोटी, पराठा, सब्जी, दाल, चावल—सब कुछ बना। स्वाद भी मिला और पौष्टिकता भी बनी रही।

हमने न लकड़ी जलाई, न उपले खरीदे, न कोयले का भाव पूछा। अरुणा से मिट्टी का चूल्हा बनाने को भी नहीं कहा। काम राइस कुकर की धीमी कुकिंग और इंडक्शन पर हुआ। तीन केवीए के सोलर सिस्टम का इस्तेमाल।

घर बैठे हमने होरमुज़ की त्रासदी को जैसे अंगूठा दिखा दिया।
हमने युद्ध नहीं रोका, पर अपनी रसोई को उससे मुक्त कर लिया।

कल नरेश से बात हुई। वह बड़ौदा में हैं। वहां आसपास सबके पास पाइप्ड गैस सप्लाई है, पर वह अकेले रहते हैं—सालों से न एलपीजी सिलिंडर लिया, न पाइप गैस का उपयोग किया। उनका काम इंडक्शन से चल जाता है। बर्तन मांजने वाली नौकरानी भी बहुत पहले छोड़ दी—इंडक्शन से बर्तन कम गंदे होते हैं।

बिजली पर निर्भरता हो तो जिंदगी कुछ ज्यादा साफ-सुथरी हो जाती है।

अरुणा मेरी बात सुन रही थी। बोली—“सबसे ज्यादा गंदे बर्तन लकड़ी-उपले पर खाना बनाने में होते हैं। मांजते-मांजते दम निकल जाता है।”

मैंने उसके लिए ऑनलाइन इंडक्शन चूल्हा खरीद दिया। कीमत वह अपनी पगार से धीरे-धीरे चुका देगी। उसके यहां रसोई तक बिजली ले जाने के लिये लंबा तार नहीं था—हमने अपने घर से एक पुराना एक्सटेंशन कॉर्ड दे दिया।

गैस उसने बुक कराई है—रोज सप्लाई का इंतजार करती है। लेकिन अब इंडक्शन आ जाने से उसकी तात्कालिक व्यग्रता खत्म हो गई है।

सुबह पांच बजे बिजली आई तो कहने लगी—
“हम त उठतई मान दिन भर क खाना बनाइ लिहा इंडक्शनवा पर।”

अब उसकी रसोई बिजली के आने-जाने के साथ सिंक्रोनाइज़ होने लगी है।

युद्ध या आपदा में जिंदगी रुकती नहीं—बस उसका तरीका बदल जाता है। लोगों के व्यवहार में लंबे समय के बदलाव उतर आते हैं।

आगे क्या होगा? लोग फिर लकड़ी-उपले पर लौटेंगे? गोबर गैस का प्रसार होगा—जिससे रसोई की गैस भी मिले और रासायनिक खाद का विकल्प भी? सरकार क्या करेगी?

रोचक यह है कि गांव में हर आदमी अपने स्तर पर रसोई बचाने की जुगत कर रहा है। कोई लकड़ी ढूंढ रहा है, कोई उपले या भूसी। जिसके पास पैसा है, वह कोयला खरीदने की सोच रहा है।

हर आदमी कुछ कर रहा है—कोई सरकार या ‘परसासन’ का मुंह नहीं देख रहा।
गांव में सरकार नहीं आती—जुगाड़ पहले पहुंच जाता है।

यह व्यवहार वैसा ही है जैसा 100-200 साल पहले गांव का था। आत्मनिर्भरता की वह पुरानी प्रवृत्ति जैसे फिर लौट आई है।

मेरे घर में पेड़ों की छंटाई से जो लकड़ी बची थी, वह मेरा ड्राइवर और नौकरानी बीन ले गये। दोनों उपले भी तलाश रहे हैं—
“फूआ, उपरियौ मंहग होई गई बा…”
“पहिले एक रुपया क मिलत रहा, अब दुई रुपया क हो गइल—आ साइज भी छोट हो गइल।”
“उपरी नाहीं, चपरी बेंचत हयें सब!”

डिसरप्शन बड़ा है और व्यापक है। असर सबसे ज्यादा उन देशों पर है जो खाड़ी के तेल और गैस पर निर्भर थे। गांवदेहात अपेक्षाकृत कम प्रभावित है—पर प्रभावित तो है ही।

— ज्ञानदत्त पाण्डेय
विक्रमपुर, भदोही

26 मार्च 2026

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