जनसंख्या की दौड़; ज्यादा बच्चे पैदा करना और अपना घेट्टो बनाना ब्राह्मणत्व का निदान नहीं है!
एक कोने में दाना डालो तो बुलबुल आती है। धीरे, झिझकती हुई। दो-चार दाने उठाती है और उड़ जाती है। टिक नहीं पाती वहां। उससे पहले कौआ आ जाता है। फिर चर्खियाँ। शोर, झपट्टा, कब्ज़ा जमा लेते हैं वे। बुलबुल पीछे हट जाती है—पर मेरा घर परिसर छोड़ जाती नहीं। अगली बार जब हम वहां बैठते हैं, वह फिर आती है। बार-बार।
यहीं से मेरे मन में “बुलबुलान” का विचार जन्म लेता है—क्यों न एक अलग, सुरक्षित जगह बनाई जाए, जहाँ बुलबुल बिना डर दाना चुग सके। यही विचार जब समाज में उतरता है, तो “बाभनपट्टी” बन जाता है—अपना इलाका, अपनी सुरक्षा, अपनी बभनौटी हो।
यह विचार ग़लत नहीं है। पर यह थकान से पैदा हुआ है। आठ दशक की आरक्षण राजनीति के बाद, जब कुछ समूह दबंग दिखने लगते हैं, तो प्रतिक्रिया स्वाभाविक है। जो कभी नैतिक केंद्र में था, वह आज हाशिये पर खड़ा महसूस करता है। और हाशिये से अक्सर विचार जन्म लेता है —“अलग हो जाओ”।
पर समस्या यहीं शुरू होती है।
बुलबुलान की हाइपोथिसिस असल में प्रकृति के विरुद्ध एक छोटा-सा विद्रोह है। जंगल को बाँटना आसान नहीं होता। कौए उड़कर आ ही जाते हैं। चर्खियाँ रास्ता ढूँढ ही लेती हैं। अलगाव स्थायी नहीं रहता, संघर्ष के नये मैदान, नये गोल-पोस्ट बन जाते है। बस।
बाभनपट्टी भी वैसी ही होगी। वह सुरक्षा नहीं, एक मानसिक किला बनेगी। भीतर डर रहेगा कि कहीं कोई घुस न आए। बाहर वालों को शक रहेगा कि भीतर कुछ छुपाया जा रहा है। इतिहास बताता है—घेट्टो आत्मसम्मान नहीं, संकुचन पैदा करते हैं।
असल सवाल यह नहीं कि ब्राह्मण को चोट लगी है या नहीं। चोट लगी है—यह मान लेना ही बेहतर है और सच्चाई भी है। असल सवाल यह है कि उस चोट का इलाज क्या है।
ब्राह्मण की ऐतिहासिक भूमिका कभी “ज्यादा ताकतवर” होना नहीं थी। न संख्या में, न शोर में, न दबंगई में। उसकी भूमिका थी—अर्थ देने की, व्याख्या करने की, सीमाएँ याद दिलाने की। जैसे ही वह भीड़ की भाषा बोलने लगता है, वह वही बन जाता है जिससे वह अलग था।
ब्राह्मण अपना गुणसूत्र खो बैठता है।
बाभनपट्टी भी वैसी ही होगी। वह सुरक्षा नहीं, एक मानसिक किला बनेगी। भीतर डर रहेगा कि कहीं कोई घुस न आए। बाहर वालों को शक रहेगा कि भीतर कुछ छुपाया जा रहा है। इतिहास बताता है—घेट्टो आत्मसम्मान नहीं, संकुचन पैदा करते हैं।
इसलिए समाधान बुलबुलान नहीं है। समाधान है बुलबुल की रणनीति -जो वह जानती है, पर बाभन नहीं जानता। वह है – कम शोर। सही समय। सही जगह। और यह भरोसा कि जंगल सिर्फ़ कौओं का नहीं है।
बुलबुल जंगल छोड़कर कहीं और नहीं जाती। वह जंगल में ही अपने लिए जगह बनाती है—कभी डाल पर, कभी किनारे, कभी सुबह-सुबह, कभी सांझ ढले। वह भिड़ती नहीं, पर मिटती भी नहीं। वह अपनी मधुर आवाज को अपना यूएसपी बनाती है। आदमी उसे कौए और चरखी की बजाय ज्यादा प्रिय मानता है।

“बाभनपट्टी” का विचार दरअसल हार की स्वीकृति है—कि साझा स्पेस अब हमारा नहीं रहा। बुलबुल यह स्वीकार नहीं करती। वह लौटती रहती है। वह बनी रहती है।
शायद यही फर्क है। अलग बसने और टिके रहने में। जनसंख्या की दौड़ में; ज्यादा बच्चे पैदा करने में और अपना घेट्टो बनाने में ब्राह्मणत्व का निदान नहीं है!
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