मैने संकल्प न किया होता, तो यह यात्रा कभी न करता – प्रेमसागर


वन कर्मी प्रेम सागर जी को किरन घाटी, जहां से सड़क खराब होनी प्रारम्भ हुई थी, वहां से एस्कॉर्ट कर साथ साथ राजेंद्र ग्राम तक आये। उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते प्रेमसागर अभिभूत लगते हैं। उन्हीं की सहायता से वे यह यात्रा कर पहाड़ पार कर पाये। वर्ना रास्ता इतना खतरनाक था कि एक ओर पहाड़ और दूसरी ओर घाटी की गहरी खाई – कोई सपोर्ट ही नहीं था!

हृदय की बाईपास सर्जरी से आश्चर्यजनक रूप से बचे प्रेमसागर कल एक हजार मीटर ऊंचे मैकल को पार कर आये। पानी के बहाव और जगह जगह भूस्खलन से अवरुद्ध पहाड़ी मार्ग; जो कल दुपहिया वाहन के लिये भी बंद कर दिया गया था; को पैदल पर कर वे सीतापुर (अनूपपुर) से राजेंद्रग्राम पंहुचे।

उन्होने कहा कि अगर उन्होने पैदल द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा का संकल्प नहीं लिया होता तो वे कभी इस मार्ग से आते ही नहीं। वाहनों के लिये वैकल्पिक लम्बा मार्ग उपलब्ध है। किसी सैलानी की तरह उस मार्ग से वाहन द्वारा आते, इस ‘खतरनाक’ रास्ते से तो कतई नहीं।

लेकिन प्रेमसागर बताते हैं कि कल जब सीतापुर से चलने पर वन मिला था और यह समाचार कि वहां बाघ के पैरों के निशान मिले हैं और बाघ आसपास हो सकता है; तब भी उन्हे भय नहीं लगा था। “मन में सोच लिया कि बाघ तो चाहे अकेले हों या दस आदमी के झुण्ड में, वह जैसे व्यवहार करेगा वैसे ही करेगा। सब कुछ महादेव पर छोड़ दिया है तो क्या भय?! जिंदगी आज तक की होगी तो वह भी सही। जो महादेव चाहेंगे, वही होगा।” … महादेव के सम्बल पर चल रहे हैं प्रेमसागर और चलते चले जा रहे हैं।

छ साल पहले हृदय रोग से ग्रस्त वह व्यक्ति जो छ मीटर भी नहीं चल सकता था, आज पैदल मैकल पहाड़ चढ़ ले रहा है। यह चमत्कार ही है। प्रेम सागर कहते हैं कि अगर वे हृदय रोग से पूर्णत: उबरे न होते तो आज उनका हार्ट फेल हो गया होता! पहाड़ का रास्ता आगे पीछे आने वाला – अचानक मुड़ जाने वाला (अंग्रेजी के Z अक्षर की तरह टर्न का) – और सतत ऊंची होती धरती का था। नीचे देखने पर कुछ समतल नहीं, मात्र गहरी खाई दिखती थी। वैसी की ‘झांंई’ छूटने लगे और कमजोर हृदय वाले का दिल बैठ जाये।

जगह जगह भूस्खलन का नजारा था। छोटे बड़े पत्थर गिरे थे या गिर रहे थे। रास्ते में हनुमान जी का मंदिर मिला। पहाड़ की सबसे ऊंची जगह से लगभग दो-तीन किलोमीटर पहले। मंदिर में हनुमान जी की वृहदाकार, पंचमुखी, गेरू में लिपटी बड़ी बड़ी चमकदार आंखों वाली प्रतिमा थी। इस मंदिर के दोनो ओर ऊपर से अतिवृष्टि का जल वेग से ऐसे गिरा था कि अपने साथ पहाड़ की कई चट्टाने और मिट्टी धसका कर नीचे ले आया। यह चमत्कार ही था कि मंदिर बच रहा। मंदिर के आसपास तीन जगह सड़क पानी के तेज बहाव से क्षतिग्रस्त हो गयी। “मोटा मोटी एक महीने से यह भूस्खलन हो रहा है। तभी से सड़क रिपेयर का भी काम चल रहा है। सड़क बनती थी और फिर टूट जाती थी”।

रास्ते में हनुमान जी का मंदिर मिल। पहाड़ की सबसे ऊंची जगह से लगभग दो-तीन किलोमीटर पहले।

मंदिर में उन्होने विश्राम किया। वहां उन्हे गुड़ और जल का प्रसाद भी मिला। सतत चढ़ रहे पहाड़ के यात्री के लिये यह प्रसाद भी अमृत तुल्य है।

प्रेम सागर, द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवरिया जी पर पोस्टों के लिंक –
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11. रोक लिया आज धूप बारिश और पैर के दर्द ने
12. प्रेम सागर की पदयात्रा से तुम क्या चाहते हो, जीडी?
13. सोन, बाणगंगा, सोहागपुर और शहडोल
14. संकल्पों की कसौटी पर जीवन कसते प्रेमसागर
15. प्रेमसागर जी को लह गया नया स्मार्टफोन!
16. प्रेमसागर अनूपपुर की ओर
17. प्रेमसागर के बारे में आशंकायें
18. प्रेम सागर और रुद्राक्ष का रोपण
19. मैने संकल्प न किया होता, तो यह यात्रा कभी न करता – प्रेमसागर
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा
सड़क मार्ग को रिपेयर-रिस्टोर करने वाले कई मजदूर, कई यंत्र और अन्य कर्मी दिखे।

पहड़ की चढ़ाई पर सड़क मार्ग को रिपेयर-रिस्टोर करने वाले कई मजदूर, कई यंत्र और अन्य कर्मी दिखे। एक ठेकेदार खान साहब से प्रेमसागर की बात भी हुई। खानसाहब ने बताया कि वे स्खलन की लगभग चार जगहों पर चौड़ी रीटेनिंग दीवार बनाने का काम कर रहे हैं। दीवार की चौड़ाई पांच फुट की बनाई जा रही है – भूस्खलन की पुख्ता रोक के लिये। उस दीवार में कहीं भी ईंट या मलबा नहीं लगा है। उनका काम चौबीसों घण्टे चल रहा है। काम जल्दी पूरा करने का दबाव है। पर काम के दौरान भी भूस्खलन कई बार हुआ है।

ठेकेदार खान साहब ने बताया कि वे स्खलन की लगभग चार पांच जगहों पर चौड़ी रीटेनिंग दीवार बनाने का काम कर रहे हैं।

खान साहब भी प्रेमसागर की पैदल यात्रा पर आश्चर्य व्यक्त कर रहे थे। पर अलग थलग जगह पर इतनी ऊंचाई पर, संसाधनों की कमी के बावजूद कोई निजी उद्यमी चौबीस घण्टे काम करवा रहा है – यह भी आश्चर्य है। खान जैसों को देख कर भी एक राष्ट्रीय गर्व का भाव मन में आता है। उनका कार्य, उनका श्रम, उनकी एण्टरप्राइज तो कहीं कोई बोलता-बतियाता-प्रसारित भी नहीं करता। खान ने बताया कि सीमेंट और स्थानीय उपलब्ध पत्थर-गिट्टी-बालू का ही प्रयोग हो रहा है रीटेनिंग वाल बनाने में। बिना खड़े रहने की जगह के वह दीवार बनाना कठिन काम है।

ठेकेदार खान साहब

पहाड़ और जंगल – दोनो अभूतपूर्व हैं। प्रवीण दुबे जी बताते हैं कि ये जंगल शाल-वन हैं। सागौन की तो प्रकृति होती है कि वह किसी अन्य प्रकार के वृक्ष को पनपने नहीं देता, पर शाल अपने साथ बाकी सभी प्रकार के वृक्षों-वनस्पति को सहअस्तित्व में साथ लिये चलता है – पूरी बायोडाईवर्सिटी के साथ। इस जंगल में बहुत वैविध्य है। और जंगल के बीच में रहते हैं गोण जनजाति के लोग। वे बहुत सरल हैं जिन्हे प्रकृति के साथ रहना भरपूर आता है। उनके गुणसूत्र में प्रकृति है। जंगल की वनस्पतियों की उन्हें बहुत जानकारी है। उन्ही के माध्यम से चिकित्सा का उनका जो अनुभूत-ज्ञान है, उसपर बहुत कुछ शोध किया जा रहा है पर बहुत कुछ किया जाना शेष है। सामान्य शहरी आदमी उनकी इन विविधताओं की सोचता ही नहीं। वह यहां से गुजरा तो बस गुजर जाता है। अनुभव करने या रुकने का उसके पास समय ही नहीं होता।

प्रवीण जी बताते हैं कि ये जंगल शाल-वन हैं। सागौन की तो प्रकृति होती है कि वह किसी अन्य प्रकार के वृक्ष को पनपने नहीं देता, पर शाल अपने साथ बाकी सभी प्रकार के वृक्षों-वनस्पति को सहअस्तित्व में साथ लिये चलता है – पूरी बायोडाईवर्सिटी के साथ।

दस किलोमीटर खड़ी चढ़ाई चढ़ी प्रेमसागर ने। वह व्यक्ति जिसकी हृदय धमनियों में अवरोध रहा हो और जिसे बाईपास सर्जरी ही एकमात्र निदान बताया गया हो, वह इतना स्वस्थ हो जाये कि पैदल पहाड़ चढ़ जाये, अभूतपूर्व है। राजीव टण्डन जी बताते हैं कि हृदय की अवरुद्ध धमनियों का ब्लॉकेज खुलता तो नहीं है; पर शरीर की मृत्यु से जद्दोजहद करने की प्रवृत्ति कोलेटरल वेसल्स का निर्माण करती हैं जो अवरोध का मुकम्मल विकल्प बना देती हैं। प्रेमसागर जी के साथ वही हुआ होगा। पर वह भी तो चमत्कार में भी चमत्कार ही है। उसी को ही देवाधिदेव महादेव की कृपा कहा जा सकता है।

सबसे ऊंचे स्थान पर पंहुच कर प्रेमसागर को जो अनुभूति हुई, करीब 1000 मीटर के मैकल पर्वत पर चढ़ कर, उसके बारे में वे कहते हैं कि “लगा कि पहाड़ मेरे से छोटा पड़ गया”!

प्रेम सागर सब से ऊंचे स्थान पर पंहुच कर अपनी अनुभूति के बारे में कहते हैं कि लगा कि पहाड़ मेरे कदमों के नीचे है!

रास्ते में प्रेमसागर को कई झुण्ड बंदरों के मिले। लाल मुंह वाले मिले और काले मुंह वाले भी। एक बंदर का चित्र भी प्रेमसागर ने भेजा है। “बंदर खतरनाक थे। वह तो गनीमत थी कि मेरे पास छाता था, वर्ना मेरा बैग-झोला तो छीन कर तारतार कर देते, इस आशा में कि उसमें खाने की कोई सामग्री होगी”।

सड़क पार करता वानर।

जंगली जानवरों की इज्जत करने की चेतावनी वाला वन विभाग का एक बोर्ड भी उन्हें रास्ते में दिखा। जिसमें लिखा था – “जंगली जानवर अचानक सड़क पर आ सकते हैं। इन्हें दुर्घटनाग्रस्त करना दण्डनीय अपराध है।” कुल मिला कर यह कि सड़क पार करने का राइट ऑफ वे (right of way) यात्री का नहीं जंगल के जीवों का है। बहुत कुछ उसी तरह कि रेल लाइन पार करने का अधिकार ट्रेसपासर्स को नहीं है। राइट ऑफ वे, लेवल क्रासिंग पर भी, ट्रेन का है, सड़क वाहन का नहीं। मुझे याद आता है कि अफ्रीका के किसी वन में गुबरैले बहुत होते हैं। वहां बोर्ड लगा है कि राइट ऑफ वे गुबरैलों (Dung Beetles) का है।

वन कर्मी प्रेम सागर जी को किरन घाटी, जहां से सड़क खराब होनी प्रारम्भ हुई थी, वहां से एस्कॉर्ट कर साथ साथ राजेंद्र ग्राम तक आये। उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते प्रेमसागर अभिभूत लगते हैं। उन्हीं की सहायता से वे यह यात्रा कर पहाड़ पार कर पाये। वर्ना रास्ता इतना खतरनाक था कि एक ओर पहाड़ और दूसरी ओर घाटी की गहरी खाई – कोई सपोर्ट ही नहीं था!

प्रेम सागर ने एक झरने का चित्र भी भेजा है। ऐसे कई झरने वहां तेज वेग से जल उत्सर्जित कर रहे हैं। इन्ही से भूस्खलन हो रहा है और यही स्रोत हैं नदियों के जल के। “इसी तरह का पानी करीब एक डेढ़ किलोमीटर के सड़क मार्ग में तेज वेग से गिर रहा था और बह रहा था।”

डिप्टी रेंजर तिवारी जी

बाणसागर के डिप्टी रेंजर तिवारी जी के प्रति वे बहुत कृतज्ञ हैं। उनका परिवार राजेंद्रग्राम में रहता है। त्रिपाठी जी ने कहा कि भले ही रेस्ट हाउस में रहने की व्यवस्था है, प्रेमसागर उनके घर पर ही रुकें और एक दिन और उनके परिवार को उनके आतिथ्य का मौका दें। यहां राजेंद्रग्राम में वे तिवारी जी के परिवार के साथ ही उनके घर पर रुके हैं और कल भी रहेंगे। कल वे सोन नदी का उद्गम स्थल देखेंगे। “कल आपको उनकी उत्पति स्थल के चित्र भेजूंगा। उसके अलावा तिवारी जी ने बताया है कि एक और नदी (जुहिड़ा या जुआरी नदी?) का उद्गम पास में ही हुआ है। उसे भी देखने का अवसर मिलेगा।”

वन विभाग के लोगों की सहायता और उनके द्वारा मिले इज्जत सम्मान के लिये बारम्बार कृतज्ञता व्यक्त करते हुये जोड़ते हैं कि वे जब चले थे तो यह मान कर चले थे कि किसी पीपल के नीचे या किसी मंदिर में उन्हें रात गुजारने रहने का स्थान मिलेगा। भोजन का कोई ठिकाना न होगा। इस सब की तो उन्होने कल्पना भी न की थी। अब लगता है कि सहायता न मिली होती तो शायद यात्रा हो भी न पाती। लोग टिप्पणी आदि में देश के अन्य जगहों पर भी सहायता की बात लिखते हैं, उसे देख कर सम्बल और बढ़ता है। महादेव सहायता करते रहेंगे, यह यकीन है प्रेमसागर जी को।

पर महादेव बहुत डाईसी देव हैं। वे कब अपने भक्त की परीक्षा लेने लग जायें, कब पीपल के पेड़ या खुले आसमान की छत के नीचे उतार दें, उनका कोई भरोसा नहीं। अपनी पत्नी तक को उन्होने परीक्षा लेने में बक्शा नहीं। भक्त को अपनी प्लानिंग, अपनी तैयारी खुद करनी चाहिये, ऐसा मैंने प्रेमसागार जी को कहा।

महादेव का बैक-अप प्रोटेक्शन उनको भरपूर है – यह तो दिखता है; पर महादेव यह भी कहते होंगे कि बच्चा, कदम तो तुझी को आगे बढ़ाना है! 😆

हर हर महादेव! जय हो!

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प्रेम सागर : रुद्राक्ष का रोपण और राजेंद्रग्राम को प्रस्थान


19 सितम्बर 2021:

इग्यारह बजे प्रेमसागर का संदेश मिला – “संकरा वन है। अभी पता चला है कि बाघ या शेर आया हुआ है। उनके पैर का निशान मिले है। उसी जंगल को पार कर रहे हैं। यहाँ से ५ किलोमीटर किरन घाटी है (जहां रास्ता अवरुद्ध है) ॐ नमः शिवायः।”

कल प्रेमसागर ने सीतापुर, अनूपपुर में रेस्ट ही किया। बिचारपुर, शहडोल से सीतापिर, अनूपपुर का रास्ता लम्बा था। बकौल प्रेमसागर करीब 60 किमी चलना हुआ था। उसके बाद रविवासरीय विश्राम “शार्पेन द सॉ Sharpen the Saw” जैसा हो गया। पैरों की बैटरी रीचार्ज!

आज सवेरे उन्होने वहां नर्सरी/रोपनी में रुद्राक्ष का पौधा लगाया। रुद्राक्ष का पौधा उस व्यक्ति से रोपवाया जाता है, जो सरल हो, संत हो और उसके मन में किसी के प्रति दुर्भावना न हो। प्रवीण दुबे जी ने सम्भवत: उनके ये गुण देख कर ही उनसे कहा था कि वे रुद्राक्ष का रोपण करें।

रुद्राक्ष के पौधे को लगाते प्रेमसागर

मुझे याद है कि एक जगह पर विष्णुकांत शास्त्री जी से रुद्राक्ष लगवाया गया था – यही जान कर कि वे सरल और विद्वान व्यक्ति हैं। उनका जीवन सेल्फ-लेस रहा है। एक रुद्राक्ष का पौधा मुझे भी दिया था मेरे मित्र प्रदीप ओझा ने। वह दो साल खूब बढ़ा। ऊंचाई करीब आठ फुट तक हो गयी। पर अचानक एक सर्दी में उसके पत्ते झरे और वह सूख गया। शायद हम पर्याप्त सरल, संत, दुर्भावना रहित न थे या मेरे घर की आबोहवा रुद्राक्ष को रास न आयी! 😦

मैं कामना करता हूं कि सीतापुर नर्सरी का यह रुद्राक्ष पनपे और विशाल वृक्ष बने। यह 20-25 मीटर तक ऊंचा बड़ा वृक्ष होता है। … आज प्रेमसागार जी के यह पौधा लगाते चित्र देख लगता है कि एक बार फिर मैं कोशिश करूंगा अपने परिसर में रुद्राक्ष लगाने की। शायद प्रवीण दुबे जी का एक नया सेपलिंग मिलने में सहयोग मिल सके।

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द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा
सीतापुर से राजेंद्रग्राम

पौधा रोपण के बाद प्रेमसागर आज सवेरे आठ बजे वहां से राजेंद्रग्राम के लिये निकल पड़े। यह रास्ता करीब 35 किमी का है। बीच में किसी स्थान पर रास्ता अवरुद्ध हो गया है। “राजेंद्रग्राम से वन विभाग के त्रिपाठी जी ने फोन कर बताया है कि उस स्थान पर एस्कोर्ट कर अवरोध पार करा देंगे” – ऐसा प्रेमसागर जी ने सूचित किया। उन्होने बताया कि सामने एक चाय की दुकान है जहां वे चाय के लिये रुके हैं। जगह का नाम बताया जमुड़ी। उन्हें तब सीतापुर से निकले घण्टा-डेढ़ घण्टा हो गया था।

इग्यारह बजे उनका संदेश मिला – “सकरा वन (वन का नाम) है। अभी पता चला है कि बाघ या शेर आया हुआ है। उनके पैर का निशान मिले है। उसी जंगल को पार कर रहे हैं। यहाँ से ५ किलोमीटर किरन घाटी है (जहां रास्ता अवरुद्ध है) ॐ नमः शिवायः।

वन का चित्र सवेरे 10:36 का है।

संकरा वन जहां बाघ के पग-मार्क मिले हैं। प्रेम सागर यहां से गुजरे।

जंगल, बाघ और अकेला पार करता कांवर पदयात्री। पता नहीं मन में भय लगा था या नहीं! प्रेम सागर ने बताया कि जंगल काफी घना और बड़ा है। वन कैसा है, कौन कौन वृक्ष हैं, कैसी वनस्पति, कैसे जीव? यह उनसे नहीं मालुम हो सकता। मुझे मानसिक (डिजिटल) यात्रा करते समय कहीं और से भी इनपुट्स लेने चाहियें।

आज शाम को उनके राजेंद्रग्राम पंहुचने पर उनके वन, घाटी और अकेले पार करने के मानसिक अनुभव पता करूंगा। फिलहाल इसको पोस्ट करता हूं! 🙂

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प्रेमसागर के बारे में आशंकायें


18 सितम्बर 2021:

“आप मेरे बारे मेंं लिख रहे हैं, उससे मैं गर्वित नहीं होऊंगा, इसके लिये सजग रहा हूं और रहूंगा। आप डेली लिखें चाहे दिन में तीन बार भी लिखें, मैं उससे विचलित नहीं होऊंगा, भईया। लालसा बढ़ने से तो सारा पूजा-पाठ, सारी तपस्या नष्ट हो जाती है।”

सुधीर पाण्डेय

दो लोगों ने मुझसे प्रेमसागर जी के बारे में बातचीत की है। सुधीर पाण्डेय ने अपनी निम्न आशंकायें और निदान एक वॉईस मैसेज में व्यक्त किये हैं –

  • प्रेमसागर अभी रिजर्व ऊर्जा के बल पर आगे बढ़ते चले जा रहे हैं। जिस तरह का शारीरिक बनाव प्रेमसागर जी का है, शीघ्र ही इनके शरीर में आवश्यक तत्वोंं की कमी होने लगेगी। जरूरी है कि वे नित्य एक दो केले, जब सम्भव हो तो दूध या दही का प्रयोग करें जिससे मिनरल, आयरन और प्रोटीन की जरूरत पूरी हो सके। इसके अलावा उन्हें मल्टीविटामिन और कैल्शियम के सप्लीमेण्ट लेने चाहियें।
  • लम्बी दूरियाँ तय करने और लम्बे समय तक पैदल चलने से इनके पैरों में घाव हो जायेंगे। उसका उपाय जूता नहीं सेण्डिल है। जूते से पसीना होता है और वह अपने इनफेक्शन/जर्म्स देता है। सेण्डिल मोजे के साथ पहना जाये तो रास्ते की धूल कंकर से भी बचाव होगा।
  • तीसरा, उनको आगे पीछे से आने जाने वाले वाहनों से बचाव की अधिक जरूरत है। भारत में लोग अंधाधुंध वाहन चलाते हैं। सवेरे और शाम के धुंधलके में अपना बचाव करने के लिये उन्हें सड़क पर या रेलवे में काम करने वाले लोगों की तरह रिफ्लेक्टर वाले जैकेट का प्रयोग करना चाहिये जिससे उनको अंधेरे में चीन्हा जाना सरल हो। उन्हें चलना भी सड़क के दांई ओर चाहिये जिससे पीछे से आने वाले वाहनों की टक्कर का खतरा न हो।
  • उनके पास सही पहचान के लिये पहचान पत्र, आईडेण्टिटी लेपल होना चाहिये। भारत में अनपढ़ और अफवाह पर यकीन कर मारपीट करने वालों की कमी नहीं है। “बच्चे उठाने वाले” या “मुंहनोचवा” जैसी अफवाह पर लोग व्यर्थ उत्तेजित हो कर अजनबी और अकेले चलने वाले पर आक्रामक हो सकते हैं; होते हैं।
राजीव टण्डन

राजीव टण्डन जी, जो मेरे अन्यतम ब्लॉगर मित्र हैं; प्रेमसागर के अनूठे संकल्प से बहुत प्रभावित थे। उनके अनुसार भारत की इस प्रकार की यात्राओं के उन्हें तीन उदाहरण मिलते हैं इतिहास में – पहला है आदि शंकराचार्य का। दूसरा स्वामी विवेकानंद का। तीसरा महात्मा गांधी का। गांधी जी का ध्येय शायद अलग प्रकार का, राजनैतिक था; पर था वह भी विशाल ही। ये तीनों यात्रा से इतना निखरे कि अभूतपूर्व बन गये। प्रेमसागर के साथ क्या होगा, कहा नहींं जा सकता। उनका प्रयोग-प्रयास तो दशरथ मांझी जैसे की याद दिलाता है। उनके पास कांवर यात्राओं का पहले का भी अनुशासन है।

राजीव जी ने कहा – “पर पहले जिस प्रकार की उन्होने कांवर यात्रायें की, उसमें बहुत ज्यादा पब्लिसिटी नहीं रही होगी। अब वे जो कर रहे हैं; उसके बारे में आप जो लिख रहे हैं; उसका अप्रिय पक्ष यह है कि उन्हें जो लाइमलाइट मिलेगी वह उन्हें सहायता की बजाय उनके ध्येय में अवरोध बन सकती है।”

राजीव टण्डन जी की आशंका से मेरी पत्नीजी भी सहमत हैं। उनके अनुसार भगवान अपने भक्त की साधना की तीव्रता टेस्ट करने के लिये प्रसिद्धि, सफलता, प्रभुता जैसे कई चुग्गे डालते हैं। उनके कारण हुये अहंकार से साधक को निपटना पड़ता है। “आखिर देखिये न! नारद जैसे सरल भग्वद्भक्त ब्रह्मर्षि की भी यह परीक्षा लेते कितनी फजीहत कराई उन्होने। ये भगवान बहुत बड़े कलाकार हैं।”


प्रेमसागर पाण्डेय

मैंने उक्त मुद्दों पर प्रेमसागर जी से बड़ी बेबाकी से बातचीत की। सुधीर जी की आशंकाओं और सुझावों से मोटे तौर पर सहमत दिखे प्रेमसागर। सैण्डिल और मोजा पहनने को वे तैयार हो गये हैं। दो केले सेवन का दैनिक कृत्य करना उन्हें उपयुक्त लग रहा है। बीच में जब सुलभ हो दूध दही का प्रयोग भी करने को माना। मल्टीविटामिन आदि के बारे में सुधीर जी को बताना होगा। वैसे वे बबूल का गोंद और मिश्री रात में पानी में भिगो कर सवेरे उसका सेवन करने लगे हैं। बताया गया है कि वह शरीर में जरूरी पौष्टिकता देता है। वे अपने परिचय पत्र के बारे में भी सुधीर पाण्डेय जी से बात करेंगे। रिफ्लेक्टर वाले जैकेट के बारे में तो कोई धार्मिक अड़चन है ही नहीं, उसकी उपलब्धता का मुद्दा जरूर है। सतर्क चलने को तो वे भी महत्व देते हैं।

राजीव टण्डन जी और मेरी पत्नीजी की आशंकाओं के बारे में प्रेमसागर ने कहा – “भईया, इस बारे में पहले से पता है। सतर्क तो हम पहले से ही हैं। मेरे साथ बाबा धाम की कांवर यात्रा करने वाले बंधु ने भी इस बारे में पहले से आगाह कर दिया था कि बहुत से लोग आयेंगे उनसे विचलित नहीं होना है। मैं खुद लोगों को अपनी ओर से कहता हूं कि वे मुझे बाबाजी या महराज जी न कहा करें, भाई कह कर बुलाया करें। लोगों को अपनी ओर से मैं परिचय नहीं देता कि यह यह करने निकला हूं या काशी से आ रहा हूं। आज अनूपपुर के दस पंद्रह किलोमीटर पहले एक वृद्ध मिले थे। वे कहे कि उनकी पतोहू की डिलिवरी होनी है और वह बहुत पीड़ा में है। अगर वे कुछ मंतर जंतर सकें… मैंने उन्हें कहा कि मैं तो साधारण तीर्थयात्री हूं, कोई बाबा या महराज नहीं जो इस प्रकार की सहायता कर सकूं। हमें तो बाबा का ‘ब’ नहीं मालुम है। …।”

“आप मेरे बारे मेंं लिख रहे हैं, उससे मैं गर्वित नहीं होऊंगा, इसके लिये सजग रहा हूं और रहूंगा। आप डेली लिखें चाहे दिन में तीन बार भी लिखें, मैं उससे विचलित नहीं होऊंगा, भईया। लालसा बढ़ने से तो सारा पूजा-पाठ, सारी तपस्या नष्ट हो जाती है।”

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11. रोक लिया आज धूप बारिश और पैर के दर्द ने
12. प्रेम सागर की पदयात्रा से तुम क्या चाहते हो, जीडी?
13. सोन, बाणगंगा, सोहागपुर और शहडोल
14. संकल्पों की कसौटी पर जीवन कसते प्रेमसागर
15. प्रेमसागर जी को लह गया नया स्मार्टफोन!
16. प्रेमसागर अनूपपुर की ओर
17. प्रेमसागर के बारे में आशंकायें
18. प्रेम सागर और रुद्राक्ष का रोपण
19. मैने संकल्प न किया होता, तो यह यात्रा कभी न करता – प्रेमसागर
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा

कल 17 सितम्बर को प्रेमसागर शहडोल से अनूपपुर की पदयात्रा सम्पन्न किये। रास्ते में एक दो जगह बारिश के कारण रुकना पड़ा; पर व्यवधान ज्यादा नहीं हुआ। मैंने दो तीन बार बीच में बात की। मेरे मन में यह था कि अगर मौसम अचानक बहुत खराब हुआ तो फंस सकते हैं प्रेमसागर। पर वैसा कुछ हुआ नहीं। उनके उत्साह में कोई कमी नहीं लगी बातचीत में।

गूगल मैप में नया रास्ता और पुराना सर्फा नाला पुल

रास्ते में उन्हे सर्फा नदी (गूगल मैप में सर्फा नाला) मिली। किसी भी अलग सी चीज, अलग से दृश्य का चित्र लेने का मैंने उन्हें अनुरोध कर रखा है। उन्होने नदी का नाम बताया, उससे मैंने गूगल मैप पर सर्च किया। मैप के अनुसार उसपर एक पुराना पुल भी है। शायद नये पुल से उस पुराने पुल का चित्र प्रेमसागर जी ने लिया था –

सर्फा नाले के पुराने पुल का चित्र

प्रेमसागर जी को आगे सोन नदी मिली। उसके कुछ अच्छे चित्र उन्होने भेजे। बेहतर मोबाइल से बेहतर चित्र! मेघाच्छादित आकाश नजर आता है और नीचे अच्छी खासी जलराशि। नीचे जल था, ऊपर जल था! जलमय ही दृश्य था सोन नदी का।

सोन यहां काफी बड़े पाट वाली लग रही हैं – यद्यपि मैदानी भाग में जो उनका नद वाला चरित्र है, वह परिलक्षित नहीं होता। हम अजीब लोग हैं; झरना दिखे तो नदी, नदी दिखे तो नद या झील और नद दिखे तो सागर की कल्पना करने लगते हैं। जो सामने होता है उसे जस का तस अनुभव करने का सुख लेना हमारी प्रवृत्ति में नहीं है। एक अच्छे यात्री में वह प्रवृत्ति गहरे से होनी चाहिये। यह नहीं कि उसे विंध्य या सतपुड़ा का जंगल दिखे तो मन दन्न से अमेजन के जंगलों की कल्पना करने लगे। पर मैं तो पदयात्री हूं नहीं! मेरी अपनी सीमायें हैं!

सोन नदी, शहडोल से अनूपपुर के रास्ते में

सबसे घटिया यात्री वे होते हैं, जो बड़ा खर्चा कर जगहों पर जाते हैं और वहां देखने की बजाय अपना वानर जैसा मुंह कई कई कोणों से घुमा कर, ताजमहल के कगूरे पर हाथ रख कर और एफिल टावर से लटकती गर्लफ्रैण्ड का टनों चित्र लेना ही ध्येय मानते हैं यात्रा का। उत्तमोत्तम यात्री प्रेमसागर जैसे हैं। कभी मन होता है उनसे पूछूं कि अपना खर्चा का हिसाब रखते हैं? कितना खर्चा होता होगा सप्ताह भर में। और खर्चा क्या होगा? दो रोटी खाने वाला, पैदल बिना टिकट चलने वाले का खर्चा भी क्या?! यात्री हो तो प्रेमसागर जैसा। अपनी बुद्धिमत्ता के बोझ से दबा हुआ भी नहीं, बाबा विश्वनाथ की प्रेरणा से चलता चले जाने वाला यात्री। और अब तो मेरी लेखन जरूरतों के हिसाब से बेचारे अपना मोबाइल-कैमरा आदि साधने लगे हैं! 😆

रास्ते में अनूपपुर से करीब पंद्रह किलोमीटर पहले उन्होने काली माता के मंदिर में विश्राम भी किया था। उस मंदिर के चित्र भी हैं उनके ह्वाट्सएप्प मैसेज में। मैं सोचता हूं कि प्रेमसागर सुर्र से यात्रा करते चले जाते हैं। उस प्रकार की यात्रा करने वाला जो नहीं जानता कि उसका दांया पांव उठ रहा है या बांया। पर प्रेमसागर वैसे हैं नहीं। रास्ते में बोलते बतियाते, रुकते सुस्ताते भी चलते हैं। यह तो मेरी कमी है कि मैं उनसे विस्तार से खोद खोद कर पूछता नहीं। वह करता होता तो शायद यह डिजिटल ट्रेवलॉग (यह शब्द मेरा नहीं, प्रवीण पाण्डेय का दिया है!) बेहतर बन सकता।

रास्ते में पड़ा काली मंदिर

प्रेमसागर जी ने बताया कि प्रवीण दुबे जी ने फोन कर कहा है कि एक दिन वे अनूपपुर में गुजारें। इसलिये आज वे अनूपपुर में ही रहेंगे। प्रवीण दुबे जी बहुत सरल, मेधावी और संत स्वभाव के व्यक्ति हैं। उनकी सहायता से प्रेमसागर की यात्रा बहुत सहज ढंग से हो रही है। उन्होने एक दिन अनूपपुर में रुकने को कहा है तो उनके मन में कोई बात होगी ही। देखें, आज क्या करते हैं प्रेमसागर।

बिचारपुर शहडोल से सीतापुर अनूपपुर का रास्ता। मार्ग में सोन नदी पड़ती हैं।

कल प्रेमसागर के सोन नदी के चित्र देख कर मुझे थोड़ा कंफ्यूजन था कि अनूपपुर के सीधे रास्ते पर तो सोन पड़ती नहीं हैं। आज उन्होने मैसेज में बताया कि वे सीतापुर, अनूपपुर में हैं। यह अनूपपुर की बजाय बुरहर से अलग रास्ते पर पड़ता है। सीतापुर, अनूपपुर के कुछ चित्र भी प्रेम सागर ने दिये हैं।

सीतापुर अनूपपुर में डिप्टी रेंजर साहब राजेश कुमार रावत जी के साथ प्रेमसागर
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