भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
गांव में आ कर शुरू शुरू में लगता था कि यहां वह सब नहीं होगा जिसकी शिकायत शहरों और राजनीति में की जाती है। कट मनी, दबंगई, सिंडीकेट, उगाही — ये सब कहीं दूर की चीजें लगती थीं। गांव मानो बचपन में लौटने की जगह था।
शायद हम गांव को देखना नहीं, याद करना चाहते हैं। इसलिये बहुत कुछ दिखता नहीं।
मुझे गांव में रहते दस साल हो गये। शुरुआती महीनों में मैं भी उसी “अहा! ग्राम्य जीवन भी क्या है!” वाले रोमांटिसिज्म में था। धीरे धीरे वह परत उतरने लगी। फिर वे चीजें दिखने लगीं जो पहले दृश्य में थीं, पर दृष्टि में नहीं थीं।
किसी को आवास योजना दिलवाने में हिस्सा। शौचालय का पैसा निकलवाने में हिस्सा। सरकारी सामान बंटने में हिस्सा। गरीबों के मुफ्त राशन से कटौती। नाम अलग अलग हो सकते हैं, पर प्रकृति एक ही है। बंगाल उसे “कट मनी” कहता है। कहीं और उसका कोई दूसरा नाम है। यह सब दृष्टिगत होने लगा।
सार्वजनिक चीजों पर निजी दबंगई भी दिखती है; भरपूर। कहीं रास्ते पर कब्जा, कहीं तालाब पर, कहीं मिट्टी या बालू पर। गांव में यह सब और सहज हो जाता है, क्योंकि यहां शक्ति का प्रदर्शन ज्यादा प्रत्यक्ष है।
जब साइकिल ले कर निकलता हूं और पतली सड़क पर मिट्टी लादे ट्रैक्टर धूल उड़ाते निकल जाते हैं, तो वह केवल धूल नहीं लगती। उसके पीछे पूरा एक तंत्र दिखाई देने लगता है। ट्रैक्टर वाला अकेला नहीं है। उसके पीछे स्थानीय दबंगई, सरकारी तंत्र, छोटे बड़े नेता, अधिकारी — सबकी कोई न कोई परत जुड़ी महसूस होती है। शायद ऊपर तक।
कट मनी दबंगई सिंडीकेट
धीरे धीरे समझ में आने लगा कि बंगाल या किसी एक प्रदेश की बदनामी दरअसल केवल डिग्री का अंतर है। प्रवृत्ति लगभग हर जगह मौजूद है। आधुनिक समाज का यह स्थायी तत्व सा लगता है — चाहे व्यवस्था लोकतंत्र कहलाये, तानाशाही या कुछ और।
फिर सवाल उठता है कि यह सब देखता आदमी क्या करे? सिस्टम से लड़े या आंख बंद कर ले? अपने रिटायरमेंट का सुकून बचाये रखे? या जो दिख रहा है, उसे दर्ज करे?
जिन लोगों के पास मजबूत कलम थी, उन्होंने दर्ज किया। व्यंग्य लिखा, उपन्यास लिखे, पात्र गढ़े। इसीलिये ‘रागदरबारी’ आज भी पढ़ी जाती है। वह केवल हंसाती नहीं, अपने समय के समाज की बनावट भी दिखाती है।
शायद वही काम छोटे स्तर पर ब्लॉग पोस्ट भी करती हैं। वे किसी व्यवस्था को बदलती हों या नहीं, पर समय का एक रिकॉर्ड जरूर छोड़ जाती हैं। बाद में कोई देखे तो उसे पता चले कि गांव केवल सरसों के खेत, पोखर और बैलगाड़ी भर नहीं था। उसके भीतर कट मनी, दबंगई, सिंडीकेट और छोटे छोटे समझौते भी थे।
लगता है ये प्रवृत्तियाँ समाज के रक्तबीज हैं। नाम बदलते हैं, तरीके बदलते हैं, पर वे किसी न किसी रूप में फिर उग आती हैं। फर्क केवल इतना है कि कोई उन्हें देख कर चुप रह जाता है, कोई एक ब्लॉग पोस्ट लिखता है, और कोई ‘रागदरबारी’।
दंड यात्री ने लाइव लोकेशन शेयर कर रखा है। उसकी तस्वीर चलती नजर आती है — तबियत दुरुस्त है, दंड भरा जा रहा है। केदारपुर से आगे निकल गया है, इतना पक्का है। नक्शे में सड़क किनारे के गाँव दिखते हैं — सुदामापुर, बरेली, किंदराई।
मैं नक्शे पर माउस फेरता हूँ। इन जगहों के कोई चित्र गूगल नक्शे पर अपलोड नहीं हैं। शायद बहुत छोटे गाँव हैं — या उनका कोई आदमी नहीं जो अंतरजाल पर चित्र डाले। पर सड़क है तो वाहन भी होंगे। जमीन नक्शे में ऊँचाई पर दिखती है। नर्मदा की घाटी से ऊँची।
इन जगहों के उत्तर में नर्मदा किनारे छिंदवाहा और रोटो हैं। ये नाम पहचाने हैं। वेगड़ की पुरानी यात्राओं में ये नाम आते हैं। मैं प्रेमसागर की हिलती प्रोफाइल के साथ चार दशक पहले और आज के बीच दोलन करता हूँ।
उस समय वेगड़ जी के साथ दो-तीन लोग, एक स्केचबुक और तीन दिन का राशन रहा होगा। मेरे साथ गूगल नक्शा है। लैपटॉप का चौबीस इंच का मॉनीटर है और प्रेमसागर के साथ यदा-कदा होने वाला सम्पर्क है।
उनकी यात्रा खुर्दबीन से थी, मेरी दूरबीन से है। उन्होंने यात्रा भोगकर की थी। मैं सोचकर कर रहा हूँ। बहुत अंतर है।
यही अंतर मुझे बेचैन करता है — इस तरह चला जा सकेगा क्या? जितनी प्रेमसागर बता दें, उतनी ही यात्रा। बाकी तो जो है, वह सोचना है।
गूगल नक्शे में नर्मदा किनारे की जगहों के कुछ चित्र भी मिल जाते हैं। इलाके की फील आ जाती है। डूब के जल के बीच पेड़ों से भरे टापू नजर आते हैं। यह इलाका बरगी बांध के ड्रेगन की पूंछ का है — वह मोटा हिस्सा जो धड़ से जुड़ता है।
एक जगह एक वैन में लोग पार्थिव शिव की मिट्टी की प्रतिमाएँ लिये आये दिखते हैं — नर्मदा में शिवलिंग का विसर्जन कर रहे हैं। मेरे जैसा कुतर्की यह सवाल अड़ा देता है: विसर्जन नर्मदा में हो रहा है या बरगी में? किनारे तो बांध का इलाका है। नर्मदा तो मध्य में बहती होगी।
पर नर्मदा परिक्रमावासी इस झंझट में पड़ता ही नहीं। वह बरगी के ड्रेगन से कतराता हुआ यात्रा जारी रखता है। बरगी आने से पहले भी पार्थिव शिवलिंग का विसर्जन होता रहा होगा। तब लोग किसी वैन में नहीं, सिर पर परात में शिवजी को लेकर आते रहे होंगे। समय बदला है, परम्परा निर्वहन हो रहा है — पर तरीका आधुनिक हो गया है।
आज मेरे मन में कई सवाल हैं। इंतजार करता हूँ शाम को प्रेमसागर के फोन का। देखें वे कितनों के जवाब दे पाते हैं। वैसे मेरे ज्यादातर सवाल आउट-ऑफ-कोर्स लगते हैं — वे सवाल जिनका दंड परिक्रमा से कोई सीधा लेना-देना नहीं।
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08–09 मई 2026
प्रेमसागर ने बताया — रात वे केदारपुर में ही रहे। आज बरेली आये हैं। “मेन बात है भईया, वो रोक लिये। कुछ लोग मिलने आये थे, सो एक दिन और रुकना हो गया। वैसे कल दंड मैंने बरेली से आगे तक भरा था।”
प्रेमसागर के कथन में परतें हैं — सुविधा को ढंकती परतें। पर अकेले कठिन यात्रा करता दंड-यात्री कुछ सुविधा तो चाह ही सकता है।
दोपहर तक वे पोंडी तक दंड भर चुके हैं। आगे जंगल हैं। कितना दूर, उन्हें अभी ज्ञात नहीं।
दंड यात्रा सवेरे ही होती है। साढ़े पाँच बजे से चार घंटा। शाम तक सड़क तपती है और जब ताप कम होने लगता है तो साँझ घिर जाती है। केवल आधा घंटा होता होगा — उतने के लिये रुकना उचित नहीं लगता। एक घंटे में तीन-साढ़े तीन सौ दंड, यानी करीब ढाई किलोमीटर।
अभी जेठ है। आषाढ़ में जब मेघ आगे बढ़ेंगे और धरती का ताप कम होगा, दंड की दूरी भी बढ़ेगी। जल्दी में नहीं लगते प्रेमसागर।
बरेली में राजेंद्र सिंह जी के यहाँ रुकना हो रहा है। उनका घर देख लगता है कि भारत का गाँव अब चुपचाप बदल चुका है। तीन दशक पहले यही गाँव शायद पूरी तरह मिट्टी, खपरैल और सामूहिक जीवन का संसार रहा होगा। तब कोई परिक्रमा यात्री आता तो किसी मंदिर के ओसारे में ठहरता। गाँव का कोई दूध दे जाता, कोई आटा-दाल। रात को भजन-कीर्तन होता। गाँव सेवा करता था, पर दूरी बनाये रखता था।
राजेंद्र सिंह जी आदिवासी हैं — शिक्षा विभाग के अधिकारी, दर्जन भर स्कूल उनके अधिकार क्षेत्र में। श्रीमती राजेंद्र सिंह सीधी पर सुगढ़ लगती हैं। प्रेमसागर बताते हैं — सुसंस्कारी है परिवार। माताजी घर पहुँचने पर आदर से पैर धुलवाती हैं। यह सब तो अब और जगह लोप ही हो गया है।
अब गाँव में सड़क है, ट्रैक्टर है, रंगे हुए पक्के मकान हैं, डिश एंटेना है। सरकार और बाजार दोनों गाँव के भीतर तक पहुँच चुके हैं। इस सबके बीच संस्कार और परम्परा का द्वीप बनाये हैं राजेंद्र सिंह जी।
पहले गाँव यात्री को सीधा-पिसान, लकड़ी और मंदिर का ओसारा देता था — अब राजेंद्र सिंह जैसे के ड्राइंग रूम में जलपान, भोजन और मोबाइल चार्जर तक देने लगा है। आतिथ्य भाव वही है, पर उसका रूप बदल गया है। प्रेमसागर की यात्रा केवल नर्मदा किनारे की यात्रा नहीं — बदलते ग्रामीण भारत के बीच से गुजरती यात्रा भी है।
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09 मई 2026
इलाके में पानी की कमी नजर आती है। जंगल नहीं हैं — गाँव हैं और खेती है। पर पानी के लिये लोग दूर-दूर से सिर पर, पैदल, साइकिल या मोटरसाइकिल से पानी ढोते दिखते हैं।
चाँपाकल हैं पर गर्मी आते-आते सूख जाते हैं। भूगर्भ का पानी नीचे भाग रहा है। राजेंद्र सिंह जी का बोरवेल ढाई सौ फुट तक है। कई जगह चार-पाँच सौ फुट तक खोदना पड़ा है। लोग कहते हैं — एक परिक्रमावाले को किसी ने पानी नहीं दिया था, तो उसका श्राप लगा है इस इलाके को।
पर धरती तो माँ है। वह श्राप के बावजूद लोगों के पेट भरने का इंतजाम करती रहती है। दो फसलें — गेहूँ और धान — हो जाती हैं। मसूर और मूंग भी, जो कम समय और कम पानी माँगती हैं।
प्रेमसागर ने नये जमाने के कुएँ का एक फोटो भेजा — सीमेंट के पाइप एक के ऊपर एक, बिना जगत, बिना घिर्री-गड़ारी। रस्सी से बंधी बाल्टी सीधे डालते हैं। मशीन ने खोदा तो सामूहिक प्रयास नहीं रहा — सरकार घुसी है।
एक चित्र में सुंदर-सी लड़की सिर पर पानी का घड़ा और हाथ में बाल्टी लिये आती दिखती है। साँवली, पर सुराहीदार ग्रीवा वाली। बिना किसी सौंदर्य प्रसाधन के ऐसा सौंदर्य! मुझे अपनी महाबलीपुरम की मछेरन लड़की याद आ गई। चलते-चलते उस मत्स्यकन्या का चित्र मेरे मोबाइल में आ गया था — और अब तक लगता है मैंने उस सौंदर्य का अपहरण किया हो जैसे। ऐसा ही कुछ प्रेमसागर ने किया।
राजेंद्र सिंह बताते हैं — पानी की कमी से यहाँ दस एकड़ जमीन वाले भी नरसिंहपुर के दो एकड़ वाले के यहाँ जाकर मजदूरी कर रहे हैं। लोग मुम्बई, नागपुर, छिंदवाड़ा, बैतूल पलायन कर रहे हैं आजीविका के लिये।
राजेंद्र सिंह गोंड हैं। वे वृक्ष की पूजा करते हैं — बड़ा देव की। प्रकृति उनकी देवता है। हनुमान जी के भी भक्त हैं — पिताजी की तरह। नर्मदा केवल पाँच किलोमीटर पर हैं। फिर भी समझ नहीं पा रहे कि जल संकट क्यों हो रहा है।
बरगी बांध ने जब इतनी बड़ी नदी को रोका, इतने गाँव डूबे, इतने पेड़ खत्म हुए — तो भी कुएँ क्यों खोदने पड़ रहे हैं? पानी नीचे क्यों भाग रहा है? इस कन्या को सिर पर जल क्यों ढोना पड़ रहा है?
जब नर्मदा को बांध ही दिया है — जब बरगी का ड्रेगन आ ही गया है — तब नहरें क्यों नहीं हैं इस इलाके में? प्रेमसागर के पास इसकी जानकारी नहीं है। बोले — आगे पता करूँगा, भईया।
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10 मई 2026
आज सवेरे नक्शे में देखता हूँ तो प्रेमसागर का चित्र पोंडी के दो किलोमीटर आगे नजर आता है। बाद में पता चला कि वे गोकल्थाना तक पहुँच गये दंड भरते — पर राजेंद्र सिंह जी आज भी उन्हें बरेली वापस ले आये।
आगे घंसौर जाना है। उसके आगे तय नहीं। लोग कहते हैं सीधे नरसिंहपुर निकल लें। मेरे ख्याल से परिक्रमा नर्मदा के इर्दगिर्द होनी चाहिये। घंसौर से बरगी के रास्ते गोटेगाँव, फिर नरसिंहपुर — यही सही रहेगा। तय तो प्रेमसागर को करना है।
पोंडी से गोकल्थाना के बीच उतराई थी। नक्शे में एक जगह हेयरपिन बेंड भी दिखता है। आगे फिर रंग हरे से धूसर — चढ़ाई होगी।
पोंडी के दो चित्र देखकर लगता है इलाके में गरीबी ज्यादा ही है। सड़क किनारे टीन के जर्जर छप्पर की चाय, किराना और मोबाइल रीचार्ज की दुकानें। गरीबी कैसी भी हो — किराना के साथ मोबाइल रीचार्ज और चाय सब जगह मौजूद है।
इलाके की गरीबी के बावजूद प्रेमसागर को आतिथ्य-सत्कार मिले जा रहा है — इसमें आश्चर्य भी है और सुकून भी।
महाभारत काल का वह नेवला जो आधा सोने का हो गया था — इस इलाके से गुजरे तो शायद पूरा सोने का हो जाये!
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11–12 मई 2026
आगे जंगल का वह क्षेत्र आ रहा है जहाँ नेट और इंटरनेट दोनों नहीं होते। इस युग के पांडव होते तो विराट नगरी की बजाय यह इलाका चुनते अज्ञातवास के लिये।
प्रेमसागर की अटकती हुई आवाज आई। कभी कुछ वैसे जैसे ट्यूनिंग-फॉर्क झनझना रहा हो। नेटवर्क बहुत खराब है। जो समझ पाया — वे पहाड़ी के नजदीक पहुँच गये हैं। कल गोकल्थाना में नेमसिंह पुनहा जी के यहाँ रहे, आज बबलू पाठक जी के घर पर हैं।
सिवनी जिले का गोकल्थाना जंगल की संधि पर बसा गाँव है। ऐसा लगता है मानो सड़क और जंगल ने यहाँ आकर समझौता किया हो। इंटरनेट यहाँ सुविधा नहीं, संयोग है।
गाँव में खपरैल की नीची छत वाले घर हैं। गर्मी बाहर चालीस-बयालीस डिग्री तक चढ़ जाती है, पर रात में इतनी ठंड पड़ती है कि कंबल ओढ़ना पड़े। सर्दियों में एक इंच तक बर्फ जम जाती है। पास की पहाड़ी नाला-नुमा नदी में जनवरी तक पानी रहता है — दिसम्बर-जनवरी में उसमें डुबकी लगाना किसी हिमालयी धारा जैसा लगता है। मध्यप्रदेश के भीतर छिपे इस दूसरे मध्यप्रदेश की कल्पना मैदानों में बैठा आदमी आसानी से नहीं कर पाता।
लेकिन नेमसिंह जी के भतीजे के हाथ में प्लास्टिक की पानी की बोतल है। सड़क आ गई है तो मोटरसाइकिल भी आ गई है। शायद मैगी और नूडल्स भी पहुँच गये हों।
उपभोक्तावाद शायद ऐसे ही आता है — पहले बच्चे के लिये टॉफी बनकर, फिर चमकीले पैकेट बनकर। परीक्षित का तक्षक नाग भी शुरू में फल में छिपा छोटा कीड़ा ही था। बड़े बदलाव शोर मचाकर नहीं आते — वे पहले सुविधा बनकर आते हैं, फिर धीरे-धीरे जीवन की लय बदल देते हैं।
गोकल्थाना की लय बदल रही है। लोकगीत अब लोग नहीं गायेंगे, यूट्यूब से सुनने लगेंगे।
प्रेमसागर घंसौर की ओर बढ़ रहे हैं। आगे बारह किलोमीटर। चार दिन लगेंगे। वहाँ रेलवे स्टेशन भी है और बड़ी बस्ती भी। हो सकता है वहाँ नेटवर्क मिले।
दो-तीन दिन जब बात ठीक से नहीं होगी तो लिखना मेरे मन की मर्जी से होगा। मैं सोचता हूँ — वह इतना खराब भी नहीं! आखिर मन गंगा तीरे हो या नर्मदा तीरे — एक-सा ही सोचता है।
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13 मई 2026
सवेरे पौने आठ बजे दंड भरते प्रेमसागर के लिये एक ऑटो से चाय लेकर आये सूरज पुनहा और प्रदीप यादव। सूरज के सिर पर क्रिकेट खिलाड़ियों के चित्र वाली टोपी है और प्रदीप के केसरिया गमछे का फेंटा। दोनों मिलकर आधुनिकता और परम्परा — दोनों का जोड़ लगते हैं।
सड़क किनारे एक बड़ी स्टील की ग्लास में चाय पीते प्रेमसागर का चित्र है। जंगल में इतनी बड़ी ग्लास में चाय! मुम्बई का कोई होटल वाला यही सर्विस जंगल की संधि पर दे तो हजार रुपया वसूल ले।
उघारे बदन और कंठी-माला में प्रेमसागर स्वस्थ लगते हैं। दंड भरना कठिन है, पर उसमें मौज भी है। मैं सोचता हूँ — उस इलाके में चार-पाँच सौ घरों की जजमानी मिल जाये तो वहीं खपरैल का घर बनाकर बस जाऊँ।
अंतर प्रवृत्ति का है। मैं जहाँ देखता हूँ, बसने की सोचता हूँ। प्रेमसागर घूमने की। मेरे पैरों में गठिया है और उनके पैरों में चक्र!
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केदारपुर से घंसौर
18 मई 2026
दंड यात्रा चलते रहने की यात्रा नहीं है। इसमें यात्री एक ठिकाना तलाशता है। वहाँ से सवेरे पाँच बजे निकलकर एक-दो-तीन किलोमीटर दंड भरता है। जहाँ तक जाता है, वहाँ रास्ते भर लोग कौतूहल से देखते हैं। कोई पानी देता है, कोई शर्बत। दंड पूरा होने पर ठिकाने वाले घर से कोई लेने आ जाता है। कई बार एक ही ठिकाना पाँच दिन तक चल जाता है।
इस बीच आगे के ठिकाने की चर्चा भी चलती रहती है। इंतजाम हो जाता है। कभी-कभी तो आगे वाले परिवार और पहले वाले परिवार में रस्साकशी भी होती है — बाबाजी किसके यहाँ रहें और किसके यहाँ से आगे बढ़ें।
एक वीडियो में उजाला अभी-अभी फैलना शुरू हुआ था। सड़क पूरी तरह जागी भी नहीं थी। सूरज धुएँ और धूल की पतली परत के पीछे लाल सिक्के-सा अटका था। सूनी डामर पट्टी पर दंड परिक्रमा करता वह यात्री अपने शरीर को नाप की इकाई बना चुका था — दोनों हथेलियाँ आगे, फिर पूरा शरीर भूमि पर, फिर उठकर अगला दंड। किनारे खड़ी मोटरसाइकिल शायद पुनहा परिवार के किसी सदस्य की रही होगी, जो उसे आज की शुरुआत तक छोड़ने आया हो।
मैं सोचता हूँ — क्या सचमुच शरीर को इतना घिस देना जरूरी है, या मनुष्य को कभी-कभी अपनी आस्था दंड बनाकर नदी किनारे सूर्योदय देखना चाहिये?
एक चित्र में प्रेमसागर गद्दा बिछाये तख्त पर आसीन हैं। आसपास लोग कुर्सियों पर या जमीन पर बैठे हैं। यह केवल तपस्या का नहीं, उसके सामाजिक मान-सम्मान का भी चित्र लगता है। गोंड परिवार प्रेमसागर की अनूठी दंड यात्रा को सामूहिक स्वीकृति देता प्रतीत होता है।
उनकी बाईं ओर बैठी अधेड़ महिला के चेहरे पर आस्था से ज्यादा कौतूहल दिखता है। लगता है उसके भीतर साथ-साथ कई बातें चल रही हों — “इतनी तपस्या क्यों?”, “खाना खिलाना चाहिए”, “घर का काम भी पड़ा है”, “ये लोग कब तक बैठेंगे?” उसके चेहरे पर भक्ति से ज्यादा गृहस्थी और जिज्ञासा साथ-साथ दिखाई देती है।
एक और चित्र में दंड यात्री स्थानीय रसूखदार लोगों के साथ हैं — ठाकुर झाम सिंह चौहान उर्फ लाट्टा फंदा। पीछे परिवार की महिलाएँ हैं, जिनमें झाम सिंह जी की बेटी पिंकी भी हैं — भाजपा और आरएसएस की पदाधिकारी। प्रेमसागर अपनी दंड यात्रा से नेताओं और स्थानीय प्रभावशाली लोगों में भी कौतूहल जगा रहे हैं।
कल रात दंड यात्री केवलारी पहुँच गये। गोकल्थाना से यहाँ तक ग्यारह-बारह किलोमीटर। केवलारी से आगे तक दंड भर चुके हैं। “घंसौर आधा किलोमीटर बचा है भईया” — प्रेमसागर ने बताया।
केवलारी में नायकवार जी के यहाँ डेरा जमा। आज रात या कल घंसौर पहुँचकर डेरा बदलेगा। उसके बाद बरगी होते हुए गोटेगाँव की तरफ निकलना होगा।
आगे का रास्ता जाना-पहचाना न भी हो, लोगों का आतिथ्य भाव देख प्रेमसागर आत्मविश्वास से भरे लगते हैं। दंड भरना शरीर को थकाता जरूर है, लोगों को जोड़ता भी खूब है।
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19 मई 2026
कल शाम आये चित्रों से पता चला कि प्रेमसागर केवलारी से आगे बढ़कर घंसौर पहुँच गये हैं। नक्शे में घंसौर कोई बहुत छोटा गाँव नहीं लगता। रेलवे स्टेशन वाला, धीरे-धीरे कस्बे में बदलता एक पुराना ठिकाना।
नाम भी पुराना लगता है — घिसा हुआ, कई पीढ़ियों से लोगों की जुबान पर चढ़ता-उतरता। शायद कभी “घनेश्वर” रहा हो। कहते हैं, जंगल इतने घने थे कि तीन अहीर यहाँ आये तो दो को बाघ खा गया। तीसरे ने बरगद के नीचे खुदाई की तो मूर्ति मिली। वही घनेश्वर हुए। भारत के गाँव अपना इतिहास ताम्रपत्रों में नहीं, ऐसी कहानियों में बचाकर रखते हैं।
केवलारी में प्रेमसागर की तबियत कुछ नरम हुई थी। मौसम का असर बताया डॉ. भागीरथ सिहोसे ने। दवा दी। अब वे ठीक महसूस कर रहे हैं।
सोचता हूँ, दंड परिक्रमा में आदमी अकेला कम पड़ता है। कहीं न कहीं कोई डॉक्टर, कोई चाय वाला, कोई घर का बरामदा, कोई मोटरसाइकिल वाला युवक निकल आता है। तप व्यक्तिगत होता है, पर यात्रा सामाजिक।
हालाँकि नर्मदा यहाँ से बहुत दूर बह रही हैं। घंसौर उनकी धारा से सत्रह-अठारह किलोमीटर हट कर है। परिक्रमा अब नदी के बिल्कुल किनारे नहीं चलती। सड़क पकड़ लेती है। सुविधा का अपना गुरुत्व होता है।
सन 1980 के आसपास जब अमृतलाल वेगड़ निकले थे, तब उनके रास्ते में घाघा, बुदेहरा, पद्मीघाट, छिंदवाहा, रोटो, पायली और बरगी जैसे गाँव आते थे — नदी के पास-पास। अब नक्शे में वे नाम तो दिखते हैं, पर परिक्रमा की चाल बदल गई है। पहले श्रद्धा नदी के साथ चलती थी, अब सड़क के साथ चलती है। यह बदलाव केवल परिक्रमा का नहीं है — मनुष्य का भी है।
घंसौर में राजेश डोंगरे जी के यहाँ प्रेमसागर टिके हैं। एक समूह-चित्र आया है। कुर्सी पर प्रेमसागर लाल धोती में बैठे हैं, ऊपर से उघारे। पीछे घर वाले खड़े हैं — आदर में, श्रद्धा में, थोड़ा उत्सुक भी।
एक और चित्र में एक चमकीला दोना रखा है — उसमें बर्फी के चार टुकड़े, हर टुकड़े पर आधा बादाम चिपका। मुझे वही सबसे ज्यादा देर तक दिखता रहा। साथ में पानी की प्लास्टिक की बोतल कहती है — प्लास्टिक युग की यात्रा है यह। आगे अगर आदमी पर्यावरण बचाये तो ये बोतल गायब हो जाये।
छोटे-छोटे दृश्य समय का इतिहास लिखते हैं।
महाभारत के यक्ष-प्रश्न में सम्पन्न वह कहा गया है जो सप्ताह में एक-दो बार शाक-सब्जी खा ले। आज गाँव का सामान्य आदमी भी नाश्ते में समोसा-जलेबी खा लेता है। सम्पन्नता बदल गई है, स्वाद बदल गया है। शरीर भी बदला होगा, इच्छाएँ भी।
और शायद यात्राएँ भी।
कभी परिक्रमा जंगल काटती हुई चलती होगी। अब वह नेटवर्क, सड़क और बाजार के बीच से गुजरती है। श्रद्धा अभी भी है — पर उसके पैरों में अब धूल के साथ चप्पल भी है।
महीना भर हो गया है दंड भरते प्रेमसागर को। नक्शे पर दूरी जोड़ी जाये तो कच्ची-पक्की सड़कों, पगडंडियों, गाँवों-जंगलों से गुजरते पैंतालीस किलोमीटर नाप लिये हैं — दंड भरते। पच्चीस हजार से ज्यादा दंड। उनकी मानी जाये तो वे इससे दुगना नाप चुके हैं, पर नक्शे की गणना इतनी गलत नहीं हो सकती।
शुरुआती समय और गर्मी का मौसम — रफ्तार कुछ कम रही। अभी तो जेठ तप रहा है। कालिदास के मेघदूत जब अमरकंटक से उज्जैयिनी की ओर बढ़ेंगे — तब तेजी आयेगी। ऐसा प्रेमसागर का कहना है। बोलते हैं — “भईया, जब सड़क का डामर ठंडा होता है तो ज्यादा दंड भरा जाता है।”
भाषा भी अजीब है। गेहूँ नहीं पिसाया जाता — आटा पिसाया जाता है चक्की पर। उसी तरह शरीर को दंड की तरह धरती पर गिराया नहीं जाता — दंड भरा जाता है। इसमें भरने की क्या बात हुई भला? पर कहा जो जाता है, वही सही है।
शाम कल केवड़ारी के शिक्षक धनलाल केवलराम जी के घर डेरा लगा। आठ साल पहले रिटायर हुए। हरे रंग की गंजी पहने थे। रात के अँधेरे में चित्र साफ नहीं आता, पर अपनी पोती को साथ लेकर फोटो खिंचाया। घर साधारण — दीवार पर टंगे कपड़े, लोहे का संदूक, घरेलू सामान। पर दिल के धनी होंगे धनलाल जी। प्रेमसागर दिल के धनी को खोज ही लेते हैं।
आगे कुकरा गाँव पड़ा। वहाँ के डॉक्टर विकास सरकार ने सड़क पर उठते-लेटते प्रेमसागर को देखा होगा। घर बुलाया, चाय पिलाई।
विकास बंगाली हैं — कलकत्ते के। उनके बाप-दादा यहाँ आ कर बसे होंगे। चाँदसी दवाखाने के बंगाली डॉक्टर उन्नीसवीं सदी में अंग्रेजों के साथ भारत भर में फैले। आज कलकत्ते में चुनाव था। पूछने पर बोले — “लोग दीदी से ऊब गये हैं, इस बार हार जाएँगी।” तीन पीढ़ी पहले नर्मदा किनारे आया बंगाली कलकत्ते की खोज-खबर रखता है। वह चाँद पर भी चला जाये, कलकत्ते का हाल जरूर लेगा।
प्रेमसागर ने इलाके के भूगोल की जानकारी दी — पानी की कमी है इलाके में। गाँव में कुआँ है तो दूर-दूर से लोग पानी भरने आते हैं। बरगी बाँध बना, नर्मदा झील बनी — पर बरगी का ड्रेगन उसी क्रूरता से आग उगलता है। बाँध के डूब से थोड़ी ही दूर पानी की कमी है।
30 अप्रेल 2026
कल ज्यादा दंड नहीं भरा जा सका। असहनीय दर्द होने लगा। प्रेमसागर उठ नहीं पाये — दाएँ घुटने ने साफ विद्रोह कर दिया।
यह देह का अति-दोहन है या उम्र की आहट?
सवेरे साढ़े पाँच बजे केवड़ारी से यात्रा शुरू की थी। कुकरा में डॉक्टर विकास सरकार ने चाय पिलाई — पर थोड़ी ही देर बाद उन्हीं के यहाँ लंगड़ाते हुए वापस लौटना पड़ा। दिन उन्हीं के यहाँ आराम करते गुजरा।
रात नौ बजे दंड-यात्री से बातचीत हुई। उन्होंने अपनी विपदा बताई। यह भी कहा — “कल सवेरे फिर निकलेंगे।”
सवेरे विकास सरकार अपना आकलन दे रहे थे कि बंगाल में सरकार बदलेगी। शाम को एग्जिट पोल भी वैसा ही बता रहे हैं। पता नहीं, डॉक्टर साहब अब क्या सोच रहे होंगे — प्रेमसागर के यूँ लौट आने को कैसे लिया होगा? सवेरे किसी को चाय पिलाना और शाम को उसके लिए रात गुजारने का इंतजाम करना — दो अलग तरह की बातें हैं।
वैसे प्रेमसागर अच्छे नेटवर्कर हैं। उन्होंने एक सम्बन्ध खोज लिया — सरकार जी की बिटिया और प्रवीण भईया का बेटा, दोनों इंदौर में एक ही क्लास में साथ कोचिंग पढ़े हैं। एक पुराना परिचय, एक नया संयोग — इतना काफी था कि रात कट जाए। यायावर ऐसे ही चलते हैं — लोगों के सहारे, और थोड़ी-सी जुगत के भरोसे।
01 मई 2026
रात प्रेमसागर की डॉक्टर विकास सरकार जी के यहाँ अच्छी कटी। सवेरे दण्ड-परिक्रमा पर निकलने में कोई दिक्कत नहीं हुई। मौसम ने भी साथ दिया — धूप निकली पर ताप कम रहा। दण्ड ज्यादा भरा गया।
मंडला से दण्ड-यात्रा के दो अलग-अलग अंश प्रेमसागर बताते हैं — मंडला से घाघा तक गाँवों में कबीरपंथी अधिक हैं। उनका नर्मदा-परिक्रमा में सेवा-भाव उतना नहीं दिखता। उसके बाद जंगल आते हैं, फिर ये गाँव — जो नर्मदा तट से थोड़ा दूर हैं, पर लोगों में सेवा-भाव भरपूर है।
लोग खुद ही चले आते हैं — कोई चाय लेकर, कोई पानी, कोई शर्बत, कोई बस साथ देने। कई लोग अपने छोटे बच्चों को भी साथ लाते हैं — उन्हें दिखाने कि ये परिकम्मावासी हैं, इनकी सेवा करनी चाहिए। दण्ड-यात्री अपने नियम से बँधा रहता है — कहीं जा नहीं सकता। इसलिए गाँव वाले ही उसके पास आ जाते हैं। यह सिर्फ मदद भर नहीं है — यही वह तरीका है जिससे एक पीढ़ी अगली को सिखाती है कि नर्मदा-परिक्रमा क्या होती है।
जीवन अग्रवाला जी के यहाँ रुकना तय था, पर डॉक्टर विकास सरकार आए और आग्रह कर अपने साथ ले गए — “मेरी पत्नी ने आपका भोजन घर पर बना लिया है, आज वहीं चलिए।” दण्ड-परिकम्मावासी को दो लोग अपने-अपने यहाँ रुकने के लिए खींचें — यह अतिथेय-परम्परा की प्रगाढ़ता का ही संकेत है। नर्मदा की कृपा।
डॉक्टर साहब के यहाँ बच्चों की पढ़ाई को लेकर जो गंभीरता दिखती है, वह गाँव की नहीं, मध्यवर्ग की सोच है। बिटिया यूपीएससी की तैयारी में इंदौर में कोचिंग कर रही है। उनकी पत्नी कलकत्ते की हैं — बांग्ला भद्रलोक के संस्कार घर में दिखते हैं।
पूरी दण्ड-यात्रा में जुड़ते लोग हैं, आतिथ्य भरपूर है — पर नर्मदा नहीं दिखतीं। पाँच किलोमीटर उत्तर में धारा है, पर उस पर बरगी के ड्रेगन की पूँछ का ठहरा जल फैला है।
कल उसी ड्रेगन ने आग उगली — बरगी डैम के पास सैलानियों से भरा एक क्रूज उलट गया। उनतालीस लोग थे — नौ शव निकाले जा चुके थे, कुछ अब भी लापता।
रात में प्रेमसागर से बात हुई। वे इस हादसे से बेखबर थे। मैंने भी नहीं बताया।
क्यों नहीं बताया — यह सोचता हूँ तो लगता है, कुछ खबरें यात्री तक नहीं पहुँचानी चाहिए। जो आदमी अगले दिन फिर उठकर दंड भरने निकलेगा, उसे उस रात बरगी के डूबे हुए लोगों का बोझ क्यों दूँ? आर्मचेयर पर बैठे मुझमें यह विलासिता सहज है — दुख पढ़ने की, सोचने की। दंड भरते यात्री को नहीं।
दण्ड-यात्री अपनी धुन में चले — वही ठीक है। अपने घुटने का दर्द थामे। बरगी के ड्रेगन से उसका क्या लेना-देना?
02 मई 2026
कुकरा के आगे केदारपुर। वन विभाग के विश्राम गृह में दण्ड-यात्रा ने पड़ाव डाला। प्रेमसागर यहाँ के रास्तों के पुराने पदयात्री हैं, इसलिए सहूलियत और परिचय दोनों सहज मिल जाते हैं।
यह रेस्ट हाउस सन् 1932 की विरासती वास्तुकला को आज भी सहेजे हुए है। 2013 के जीर्णोद्धार ने दीवारों को नई पुताई और छत को नई खपरैल दी है, पर साखू-सागौन का फर्नीचर आज भी उसी पुराने रुतबे के साथ चमकता है। शेल्फ पर अंग्रेज़ों के ज़माने के चीनी मिट्टी के टी-पॉट और पीतल के लैम्प अब गरिमापूर्ण सेवानिवृत्ति में हैं — न वह दौर रहा, न किरोसीन की वह सुलभता।
रेस्ट हाउस के केयरटेकर हैं सतीश यादव। उनके पिता और उनके बाबा भी इसी के केयरटेकर रहे। सतीश का बेटा वेद कुमार भी पूरी तत्परता से प्रेमसागर की सेवा करता है। वन विभाग की पीढ़ियों को जोड़े रहने की परम्परा कायम रहे।
रात ढली, तो आतिथ्य के रंगमंच पर एक और दृश्य उभरा। सुनील और जीवन अग्रवाल जी ने चूल्हे की आँच पर प्रेमसागर के लिए सोंधे ‘गाकड़’ तैयार किए। राख की गर्मी से एक-एक कर निकलते वे सुनहरे गाकड़ उस दिन की कठिन दण्ड-यात्रा की थकान का एकमात्र इलाज थे। प्रेमसागर का चेहरा खिल उठा — “आनंद आ गया भईया! बाहर से कड़े, अंदर से बिल्कुल नरम।”
मुझे तत्काल अमृतलाल वेगड़ जी की पंक्तियाँ याद हो आईं —
“गाकड़ प्रकृति है, रोटी संस्कृति है और पूड़ी विकृति।”
सन् 1932 के उस पुराने विश्राम गृह में गाकड़ का वह सादगी-भरा भोज पूरी तरह प्रकृति का सान्निध्य था। दण्ड-परिक्रमा में देह का भारी श्रम है, तो आत्मा के लिए प्रकृति का भरपूर पोषण भी।
03 मई 2026
कल शाम प्रेमसागर ने खबर दी — “आज दंड नहीं दे पाया। बुखार आ गया। साथ में पेट भी खराब।” वन विभाग के गोपाल सिंह जी ने कहा — जब तक तबियत न सुधरे, रेस्ट हाउस में आराम करें। डॉक्टर साहब भी आए।
डॉक्टर साहब ने दो दिन आराम करने की सलाह दी। प्रेमसागर पर ही निर्णय छोड़ा — “आपको दवाई दे रहा हूँ। ज्यादा कमजोरी लगे तो पानी भी चढ़ा दूँ?”
ऐसा कहने पर ज्यादातर ग्रामीण पानी चढ़वाने पर यकीन करते हैं। पानी चढ़ा तो ताकत आयेगी। बाद में कहने को कहानी बनती है — बड़ी जबरदस्त बीमारी थी, तीन बोतल पानी चढ़ा तो जान में जान आई। प्रेमसागर ने पानी नहीं चढ़वाया।
“आज तो भईया दंड की हाजरी भर कर वापस लौट आया। दो-एक दिन आराम कर निकलूंगा।”
नब्बे साल पुराने इस रेस्ट हाउस में कई अंग्रेज और देसी अफसर रहे होंगे। नर्मदा किनारे जा बैठे होंगे या मछलियाँ पकड़ी होंगी। पर क्या कभी ऐसी उलट खोपड़ी का दण्ड-परिक्रमा करता यात्री भी रुका होगा?
प्रेमसागर से ज्यादा उलट जीव तो वेगड़ जी थे। उनकी यात्रा में नियम बहुत कम थे; नर्मदा का सान्निध्य और आनंद बहुत अधिक। बीमार होने पर दंड की हाजरी जैसा कुछ नहीं — बस शांत बैठ शांतिनिकेतन की याद करते या स्केच बनाते।
जब उन्होंने यात्रा की (1977–80) तो बरगी का डूब उतना नहीं था, पर आशंका बन चुकी थी। उन्होंने एक जगह लिखा है —
“पद्मीघाट में एक अच्छा आश्रम है, रात वहाँ रहे। भोर होते ही चल दिये। पेड़ ऐसे काले दिख रहे थे, मानो झुलस गये हों। शाम को बखारी पहुँचे। गाँव के पटेल के यहाँ रहने को तो मिल गया, लेकिन पानी माँगा, तो उसने रस्सी-बालटी थमा दी और कुआँ बता दिया। पानी लेने गये तो रस्सी मुश्किल से बीच कुएँ तक पहुँची! पानी पाताल को चला गया था। पास की झोंपड़ी का ग्रामीण हमारी परेशानी समझ गया। अपनी रस्सी ले आया, दोनों को जोड़ा, तब पानी निकला।”
नर्मदा यात्रा में पास के गाँवों में पानी की कमी — आज का पर्यावरणीय अभिशाप नहीं, तब का भी था जब बरगी का ड्रेगन नहीं आया था। अब तो ड्रेगन और भी बदल रहा है आबो-हवा।
अच्छा है। आज दंड-यात्री बीमार है तो सौंदर्य की नदी नर्मदा को पढ़ने-खंगालने का समय मुझे मिल गया।
07 मई 2026
दो दिन प्रेमसागर ने आराम किया। एसडीओ साहब, गोपाल सिंह जी ने खूब खोज-खबर ली। संतोष अग्रवाल जी, उनकी पत्नी और बच्चे भी कई बार आए। डॉक्टर साहब को भी बुलाया। केयरटेकर सतीश यादव जी और परिवार तो बाबा जी की सेवा में लगे ही थे। इतने लोगों की सेवा-शुभकामना हो तो ठीक होना ही था।
एक दिन दंड की हाजरी भर कर ही लौट आए। हाजरी माने कान पकड़ तीन बार उठक-बैठक और एक-दो दंड। उससे ज्यादा नहीं। अगले दिन एक किलोमीटर, उसके अगले दिन दो किलोमीटर। अब आगे की यात्रा के लिए डेरा बदला जाएगा।
केदारपुर में वन उतने घने नहीं दिखते, पर इलाका हरा-भरा है। मकान कच्चे-पक्के हैं। कुछ पर खपरैल की छत, कुछ पर डिश एंटीना। सन् अस्सी में जब वेगड़ गुजरे होंगे तो हो सकता है जंगल रहा हो, घर इक्के-दुक्के रहे हों, किसी किसी जगह रेडियो।
अब वैसा अँधेरा नहीं बचा। लोग दिल्ली-बम्बई-कलकत्ता से जुड़े हैं। पर पुराना पूरी तरह गया कहाँ? प्रेमसागर कुछ ठीक हुए तो पास की साप्ताहिक हाट घूम आए।
केदारपुर का बुधवासरीय हाट
केदारपुर की बुधवासरीय हाट
सब्जी-भाजी से लेकर बर्तन और सोना-चाँदी के आभूषण — सब मिलते हैं। लाई-चना-गट्टा, मिठाई, झाड़ू, मिट्टी के बर्तन — घड़ा, घरिया, पुरवा — सब है।
पीले तिरपालों के नीचे फैला हाट दूर से किसी अस्थायी नगर जैसा लगता है। दोपहर की धूल और शाम की रोशनी आपस में घुली रहती है। कहीं लाल मिर्च की बोरियाँ खुली हैं, कहीं धनिये और जीरे की गंध हवा में तैर रही है। एक तरफ तरकारी वाली औरतें जमीन पर बोरा बिछाए बैठी हैं; दूसरी तरफ ठठेरे अपनी पीतल-काँसे की थालियाँ ऐसे सजाए हैं जैसे धूप बेच रहे हों।
किसी दुकान पर बच्चा कटोरी बजा रहा है। कहीं बाट-तराजू की खनक है। कहीं बकरियों की मिमियाहट। कहीं आदमी दाम सुनकर मुस्कुरा रहा है, कहीं झुँझलाकर आगे बढ़ जा रहा है।
मिट्टी के घड़ों पर सफेद चूने से जो कलाकृति उकेरी है — देखते ही बनती है। काली मिट्टी के चमकदार पके मृद्भाण्ड तो कुषाण-कालीन कला के उत्कृष्ट नमूने लगते हैं। कुछ घड़ों पर बनी सफेद लहरदार रेखाएँ प्रेमसागर को नर्मदा की धारा जैसी लगी होंगी — जैसे किसी कुम्हार ने नदी को मिट्टी पर उतार दिया हो।
केदारपुर का हाट दो-तीन हजार साल पहले का भी है और आज का भी।
हाट में घूमते प्रेमसागर खरीदार नहीं थे। यही बात उन्हें बाकी भीड़ से अलग करती थी। लोग घर के लिए चीजें खरीद रहे थे — नमक, तेल, लोटा, चूड़ी, तरकारी, बच्चों के कपड़े। प्रेमसागर के पास रखने को कुछ था नहीं। उनकी पूरी गृहस्थी एक झोले में थी। वे बस धीरे-धीरे भीड़ के बीच से गुजरते रहे।
बाजार में हर चीज का भाव था; केवल उनकी यात्रा का कोई मोल नहीं था।
“भईया, सोना-चाँदी का गहना देखकर तो बहुत अचम्भा हुआ। फोटो लेना चाहता था सुनार की कलाकारी का, पर दुकान लगाने वाले ने मना कर दिया। कुम्हार और ठठेरों के फोटो ही ले पाया। पर था वहाँ सब कुछ।”
मुझे लगता है भारत की असली सभ्यता महानगरों से ज्यादा इन हाटों में बची है। यहाँ आदमी अभी भी चीज को हाथ में उठाकर परखता है। खरीदने से पहले बात करता है। दुकानदार ग्राहक का गाँव पूछता है। लेन-देन में मशीन से ज्यादा चेहरा काम आता है। यहाँ अर्थव्यवस्था अभी पूरी तरह निर्जीव नहीं हुई।
केदारपुर का बुधवासरीय हाट अमेजन और फ्लिपकार्ट से — और किसी भी मॉल से — कितना अलग है। जबकि हैं सब मौसेरे भाई ही।
दो दिन बारिश हुई। मौसम ठंडा हो गया। “हवा तेज थी भईया, बारिश भी खूब और ओले भी पड़े। दंड भरने के लिए अच्छा मौसम हो गया है।”
बारिश के बाद हाट की मिट्टी और भी गहरी महकती होगी। भीगे तिरपाल हवा में फड़फड़ाते होंगे। कहीं दुकानदार बोरी ढँक रहा होगा, कहीं औरत बच्चे को ओले दिखा रही होगी। प्रेमसागर शायद किसी छप्पर के नीचे खड़े यह सब देखते रहे हों। दण्ड-यात्रा में प्रकृति कभी शत्रु लगती है, कभी सहयात्री।
हर हाट शायद एक छोटा समय-द्वार है। वहाँ मोबाइल रिचार्ज भी है और वहीं मिट्टी का पुरवा भी। एक आदमी यूपीआई से पैसा दे रहा है, दूसरा मुट्ठी में सिक्के दबाए खड़ा है। एक लड़का कान में इयरफोन लगाए घूम रहा है और बगल में कोई बूढ़ा अभी भी धोती की गाँठ में नोट बाँधे है। भारत एक साथ कई सदियों में जीता है — यह बात हाट से ज्यादा कहीं साफ नहीं दिखती।
पर मुझ पैंट-कमीज धारी को कोई बाबा थोड़े ही समझता? मुझे तो हर सुविधा के पैसे देने होते। गेरुआ कपड़ा और माथे पर तिलक जो ठाठ देता है, वह मेरे नसीब में कहाँ!
केदारपुर का ठाँव पूरा हुआ है। कल से अगली जगह रहेंगे। आगे बरेली दिखता है नक्शे में — वहीं किसी नर्मदा-भक्त के यहाँ एक दिन का विश्राम तय हुआ है।
नर्मदा तट के दर्शन नहीं हो रहे, पर माई ध्यान रखती चल रही हैं।