इराया का नामकरण


नवजात बच्ची के माता-पिता के सामने एक दिन अचानक एक बड़ी जिम्मेदारी आ खड़ी होती है—बच्ची का नाम क्या रखा जाए?

नाम ऐसा हो जो घर में अच्छा लगे, सुनने में मधुर हो, बहुत आम भी न हो और इतना अजीब भी न हो कि बच्ची बड़ी होकर पूछे—“मेरा नाम रखा किसने था?”

आजकल माता-पिता इस काम में काफी रचनात्मक हो गए हैं। वे पुराने नामों को देखते हैं, संस्कृत की ओर जाते हैं, दूसरे भारतीय भाषाओं में झाँकते हैं, कभी-कभी अपनी कल्पना से भी एक नाम गढ़ लेते हैं। ऐसा ही कोई नाम हो सकता है—इराया।

अब यहीं से असली कहानी शुरू होती है।

काशी के किसी संस्कृत पंडित को नाम सुनाइए। वे चश्मा ठीक करेंगे, शब्द को दो-तीन बार मन ही मन तोलेंगे और फिर पूछेंगे—“इसकी व्युत्पत्ति क्या है?”

माता-पिता कहेंगे—“पता नहीं। अच्छा लगा, इसलिए रख दिया।”

पंडितजी शायद थोड़ा कुड़बुड़ाएँगे। कहेंगे कि संस्कृत में इसका कोई स्पष्ट आधार नहीं दिखता, प्रत्यय-विधान कहाँ है, धातु क्या है, रूप कैसे बना—वगैरह।

माता-पिता फिर भी बच्ची को इराया ही बुलाएँगे।

इराया
इराया का नामकरण

क्योंकि भाषा की दुनिया में एक अजीब-सी बात है। किसी शब्द को पैदा होने के लिए हमेशा व्याकरण की अनुमति नहीं चाहिए। कभी-कभी उसे केवल लोगों का इस्तेमाल चाहिए।

मान लीजिए इराया बड़ी होकर कोई मशहूर सेलिब्रिटी बन गई। अब देश में हजारों माता-पिता अपनी बेटियों का नाम इराया रखने लगे। इंटरनेट पर “इराया नाम का अर्थ” खोजा जाने लगा। स्कूलों में इराया नाम की बच्चियाँ मिलने लगीं।

अब शब्द की सामाजिक स्थिति बदल गई।

कल तक वह एक माता-पिता की निजी रचनात्मकता थी। आज वह नाम समाज में घूम रहा है।

फिर मान लीजिए किसी दिन प्रधानमंत्री किसी सार्वजनिक भाषण में कहते हैं—“हमारी बेटियाँ, हमारी इराया, हमारे देश का भविष्य हैं।”

बस।

काशी के पंडितजी अब भी कह सकते हैं कि व्युत्पत्ति संदिग्ध है। लेकिन भाषा के बाजार में इराया नामक व्यक्तिवाचक संज्ञा की दुकान खुल चुकी है।

और फिर आता है शब्दकोश।

शब्दकोश वास्तव में भाषा का जन्म प्रमाणपत्र नहीं होता। वह अधिकतर भाषा का रजिस्टर होता है। पहले लोग बोलते हैं, फिर शब्दकोशकार उसे दर्ज करते हैं।

कल्पना कीजिए, वर्षों बाद शिकागो विश्वविद्यालय के डिजिटल हिंदी शब्दसागर में कोई शोधकर्ता “इराया” खोज रहा है। उसे उसके पुराने प्रमाण मिलते हैं। वह प्रयोगों की तारीखें खोजता है। अर्थ और सामाजिक प्रसार का इतिहास बनाता है।

शायद वह लिखता है—

“Contemporary Hindi female given name, increasingly attested from the early twenty-first century…”

और तब हम हँस सकते हैं।

क्योंकि इराया तब तक शायद गूगल की सीईओ बन चुकी होगी।

जिस बच्ची के नामकरण के समय काशी के पंडित ने कुड़बुड़ाकर पूछा था—“यह कौन-सा नाम है?”—उस नाम का इतिहास अब विश्वविद्यालय के डिजिटल डेटाबेस में सुरक्षित है।

यानी यात्रा कुछ ऐसी हुई:

माता-पिता की कल्पना → बच्ची का नाम → पड़ोस में प्रयोग → दूसरे माता-पिता द्वारा अनुकरण → सामाजिक प्रतिष्ठा → सार्वजनिक भाषण → व्यापक प्रयोग → शब्दकोश।

भाषा का लोकतंत्र कुछ ऐसा ही है।

व्याकरण शब्द को जन्म देने की क्षमता रखता है, लेकिन समाज उसे जीवन देता है।

और कभी-कभी समाज इतना जिद्दी होता है कि पहले शब्द बना लेता है और बाद में व्याकरणाचार्य को उसके लिए जगह बनानी पड़ती है।

इसलिए मुझे लगता है कि “इराया” की असली परीक्षा यह नहीं है कि काशी का पंडित उसे आज स्वीकार करता है या नहीं।

असली परीक्षा यह है कि क्या लोग उसे कल भी बोलेंगे?

अगर बोलते रहे, तो एक दिन शब्दकोश में वह ठसक से खड़ी होगी।

और तब शायद किसी पन्ने के नीचे बहुत छोटे अक्षरों में लिखा होगा—

First attested use: somewhere in eastern Uttar Pradesh.

काशी के पंडितजी को तब भी आपत्ति हो सकती है।

लेकिन इराया मुस्करा रही होगी।

जरई और रक्षाबंधन


राखी का बाजार बचा रहा, जरई का संसार चला गया।

गरिमा, मेरी बहन, की राखी समय पर आ गई है—स्पीड पोस्ट से। सालों से पोस्ट ऑफिस के माध्यम से मिलती रही है। पहले सामान्य लिफाफे में आती थी, फिर कोई समय आया कि स्पीड पोस्ट से आने लगी। शायद सामान्य डाक पर हम जैसे सामान्य लोगों का भी भरोसा कम हो गया था।

अब राखी के दिन का इंतजार है। मेरी बहन की राखी मेरी पत्नीजी ही बांधती रही हैं। रेलवे की नौकरी ने अवकाश नहीं दिया देश के पश्चिमी भाग से प्रयाग-लखनऊ आने का और तब से घरेलू यात्रायें करने की आदत ही जाती रही। अब बूढ़ा व्यक्ति अपनी आदतें नहीं बदल पाता। घुटनों का दर्द बहाना देते हैं कहीं न जाने, न हिलने का।

लेकिन जरा और पीछे जाऊं—अपने बचपन में—तो राखी की स्मृतियां हैं ही नहीं।

तब लड़कियां तालाब से नागपंचमी के दिन मिट्टी लाती थीं। उसमें अपने-अपने जौ के बीज बोती थीं। फिर रोज उन छोटे-छोटे पौधों का अंकुरण और उनका बढ़ना देखती थीं। सबमें प्रतिस्पर्धा भी होती थी कि किसके पौधे—जरई—कितने ज्यादा बढ़ रहे हैं।

उस छोटे-से मिट्टी के पात्र में जाने कितनी चीजें एक साथ चलती थीं—तालाब का पानी, खेत की मिट्टी, जौ का बीज, लड़की के हाथ का श्रम और कई दिनों की प्रतीक्षा। नागपंचमी को बोया गया बीज केवल पौधा नहीं था; वह आने वाले त्योहार की तैयारी था। उसे हर दिन देखना पड़ता था। उसमें पानी देना पड़ता था। उसके बढ़ने का इंतजार करना पड़ता था।

जरई
इतिहास बन गई जरई

राखी के दिन की तरह एक सुबह उठकर सब कुछ तैयार नहीं मिल जाता था।

लड़कियाँ भादौं की कजरी तीज पर वही पौधे अपने भाइयों और पिता के सिर पर या कानों पर पहनाती थीं। जरई ही राखी का प्रतीक होती थी। उसमें गांव-देहात, ऋतु, मौसम, अन्न, जल, तालाब और जरई के लिए किया गया श्रम जुड़ता था।

जरई की सबसे पहली मेरी स्मृति कलुआ बुआ और मेरे बाबा की है। बाबा शम्भू-के-पूरा के स्कूल में हेडमास्टर थे और घर में भी उनका अनुशासन कड़ा था। घर के सबसे बड़े के कारण कुटुम्ब में उन्हें मालिक कहा जाता था। मालिक को कोई जरई पहना सकता है, यह मेरी कल्पना में भी नहीं था। पर मैने देखा कि बुआ बाबा (अपने पिताजी) के कान पर जरई खोंस और कुछ बालें सिर पर बिखेर, डर के मारे भागीं। मालिक को भी आश्चर्य हुआ होगा। कुछ जोर से बोले भी वे। किसी ने घर के जनाना में आकर सूचना दी — कलुई मालिक के जरई बांधे बा!

यह कुटुम्ब के लिए बड़ी बात थी। मालिक ने अपना डंडा भले फटकरा, जोर से बोले, लेकिन अपनी बंडी से निकाल कर एक डब्बल (शायद एक आना) कलुआ बुआ को दिया भी। मुझे भी यकीन हुआ कि बाबा के कठोर व्यक्तित्व के पीछे कोमलता भी रहती है कहीं।

अब जरई जैसा निरीह जौ का पौधा चमचमाती राखी, साथ में मिठाई का डिब्बा, चॉकलेट का हैम्पर और डिजाइनर रोली-चावल की प्रतिस्पर्धा कहां कर पाएगा!

राखी एक दिन में खरीदी जा सकती है, जरई के लिए नागपंचमी से इंतजार करना पड़ता है।

सो जरई इतिहास हो गई!

अब तो एक दशक से गांव में हूं, पर गांव में भी जरई उपजाते और भाई के सिर-कान पर जरई को बांधते नहीं देखा। तालाब हैं, मिट्टी है, जौ भी कहीं न कहीं बोया जाता होगा, भाई-बहन भी हैं—लेकिन वह छोटी-सी परंपरा उनके बीच से निकल गई है।

शायद यही परंपराओं के खत्म होने का सबसे विचित्र तरीका है। कोई घोषणा नहीं होती। कोई दिन तय नहीं होता कि आज से यह परंपरा समाप्त। बस एक साल कोई नहीं करता, दूसरे साल कम लोग करते हैं, तीसरे साल बच्चों को पता ही नहीं होता कि किया क्या जाता था। फिर किसी बूढ़े को अचानक याद आता है कि अरे, ऐसा भी तो होता था!

इस साल राखी 28 अगस्त को है और जरई/कजरी तीज 31 अगस्त को। पर तुरत-फुरत में रक्षाबंधन तो मनाया जा सकता है, जरई नहीं। जरई की तैयारी तो नागपंचमी के दिन से होती है।

अब तो अमेजन ने भाई-बहन के संबंध—राखी का बाजार—थाम लिया है। आपने सोचने, भेजने में देर भी कर दी तो क्या; आप अभी अमेजन या फ्लिपकार्ट पर बटन दबाएं तो घंटे भर में दूर मुंबई या बेंगलुरु में राखी और उसके साथ अन्य बाजार-जनित सामान के चमचमाते पैकेट की डिलिवरी हो सकती है।

बाजार ने इस त्योहार की एक बड़ी समस्या हल कर दी है—दूरी की। भाई प्रयागराज में हो, बहन मुंबई में या बेंगलुरु में, राखी पहुंच जाएगी। मिठाई पहुंच जाएगी। चॉकलेट पहुंच जाएगी। उपहार पहुंच जाएगा। संबंध का प्रतीक समय पर दरवाजे तक आ जाएगा।

लेकिन जरई जैसी perishable जौ की बालियों को डिलिवर करने में बाजार की न चाह है, न उसकी लॉजिस्टिक्स विकसित हो सकती है। जरई को किसी गोदाम में रखा नहीं जा सकता। उसे महीनों पहले पैक करके नहीं भेजा जा सकता। उसे कुरियर बॉक्स में डालने के लिए नहीं बनाया गया। उसे तो अपने ही गांव की मिट्टी में, अपने ही तालाब के पानी से, अपने ही मौसम में उगना पड़ता है।

राखी के साथ बाजार घर आता है; जरई के साथ गांव।

शायद इसीलिए जरई का खो जाना केवल एक पुराने त्योहार की छोटी-सी रस्म का खो जाना नहीं है। उसके साथ त्योहार की वह धीमी गति भी गई जिसमें मौसम को आने दिया जाता था, बीज को फूटने दिया जाता था, पौधे को बढ़ने दिया जाता था और बच्चे को उसके बढ़ने को देखने दिया जाता था।

आज हमारे पास त्योहार पहले से कहीं अधिक चमकदार हैं, लेकिन उनके लिए इंतजार कम हो गया है।

कोई फिल्मी सितारा, कोई प्रधानमंत्री या कोई बड़ा अभियान जरई को फिर से उगा दे तो बात और है। तब शायद सोशल मीडिया पर उसकी तस्वीरें आएंगी, “हमारी खोई हुई परंपरा वापस लाएं” जैसे अभियान चलेंगे और अमेजन पर भी शायद ‘Traditional Jarai Rakhi’ का कोई पैकेट दिखाई दे जाए! लेकिन तब वह जरई होगी या जरई की स्मृति—यह कहना कठिन है।

क्योंकि राखी डिलिवर हो सकती है, जरई नहीं। उसे डिलिवर करने के लिए एक कुरियर नहीं, एक मौसम चाहिए।

ΨΨΨ

ब्लॉग पर 2013 की एक पोस्ट है जरई पर। मेरी बुआ उसमें मेरे पिताजी को जरई बांध रही हैं। अब बुआ भी नहीं रहीं और पिताजी भी। उनकी और जरई की स्मृति जिंदा बची है। मेरे साथ रहेगी।

विकास मिश्र, अट्ठाईस सिलेंडर और एक संतुष्ट जिंदगी



बीए पास ड्राइवर, जिसने बम्बई-गुजरात देखा और फिर घर के पास की छोटी नौकरी चुन ली

छह अगस्त को गैस सिलेंडर बुक किया था। आज अठारह तारीख को आया। इतने दिनों में दो-तीन बार फोन करके पूछताछ की जा सकती थी, लेकिन अब रसोई का काफी काम इंडक्शन पर शिफ्ट हो गया है, इसलिए सिलेंडर की चेजिंग पहले जैसी तीखी नहीं रही।

फिर भी आज जब इंडेन का सिलेंडर आया तो उसके साथ विकास मिश्र भी आए। एक छोटी-सी पिक-अप गाड़ी लेकर। लगभग सात क्विंटल की। बताया कि गाड़ी खराब हो गई थी। जब तक नहीं बनी, उसे बनवाने में लगे रहे और ठीक होते ही आज सिलेंडर लेकर निकल पड़े।

पहले बड़ी पिक-अप आती थी और दो आदमी होते थे। अब छोटी गाड़ी है और उसमें अकेले विकास। वही ड्राइवर, वही डिलीवरी देने वाले, वही पर्ची काटने वाले और वही कार्ड में एंट्री करने वाले। यह एजेंसी की कॉस्ट कटिंग है या कारोबार कुछ घटा है, पता नहीं। लेकिन विकास को इससे कोई शिकायत नहीं है।

वह वैसे भी शिकायत करने वाले आदमी नहीं लगते।

सिलेंडर की सप्लाई में एक DAC नंबर का आदान-प्रदान होता है। छह अंकों का कोई कोड। सिलेंडर बुक होने के बाद डिलीवरी के समय ग्राहक से वह नंबर लेकर एजेंसी में डिलीवरी दर्ज की जाती है।

इस बार काफी दिन निकल गए तो एजेंसी के एक सज्जन ने दो दिन पहले फोन किया। बोले, नंबर बता दीजिए। नंबर बता देने पर वे डिलीवरी दिखा सकते थे और उसके बाद सिलेंडर पहुंचाना उनकी भलमनसाहत पर निर्भर करता। मुझे अनजाने आदमी को नंबर बताने का उतना भरोसा नहीं था। विकास का फोन आया होता तो दे देता।

आज विकास ने सिलेंडर पहुंचाया तो पता चला कि मेरे ऑनलाइन भुगतान वाले सिलेंडर की डिलीवरी पहले ही दिखाई जा चुकी है।

यह नंबर वहां पहुंचा कैसे?

विकास इस पर बस मुस्कराए। कोई जवाब नहीं दिया।

मामला मेरी समझ में नहीं आया। लेकिन इस देश में NEET की परीक्षा के पर्चे लीक हो सकते हैं तो छह अंकों का DAC नंबर कौन-सी बड़ी चीज है! रहस्य वहीं पड़ा रहा।

वैसे विकास को देखकर व्यवस्था के इस छोटे-से गोरखधंधे से ज्यादा दिलचस्प खुद विकास लगते हैं।

वह हंसमुख आदमी हैं। हमारे स्टोर से खाली सिलेंडर निकालते हैं, नया भरा हुआ सिलेंडर उसकी जगह रखते हैं और पर्ची-किताब का काम निपटाकर अगले ग्राहक की ओर चल देते हैं। काम में कोई हड़बड़ी नहीं, लेकिन बेवजह रुकने का समय भी नहीं। आज मेरे घर में रहते हुए ही उनके मोबाइल पर दो-तीन फोन आ चुके थे।

विकास मिश्र इंडेन डिलिवरी वाले
गैस सिलेंडर डिलिवरी वाले विकास मिश्र

लगता है गांवदेहात में गैस सिलेंडर को लेकर अभी भी अफरातफरी रहती है।

विकास रोज अट्ठाईस सिलेंडर लेकर निकलते हैं। दिन भर में डिलीवरी पूरी करते हैं और काम खत्म। कभी गाड़ी खराब हो जाए तो भी छुट्टी नहीं मिलती; गाड़ी को गैराज ले जाकर बनवाना भी उन्हीं की जिम्मेदारी है।

महीना पूरा होने पर बारह हजार रुपये खाते में आ जाते हैं, ऐसा उन्होने बताया।

डिलीवरी के समय कुछ लोग बीस-पच्चीस रुपये टिप दे देते हैं। विकास के मुताबिक उससे चाय-पानी और पानमसाले का खर्च निकल जाता है।

बारह हजार रुपये। बीए पास आदमी। अट्ठाईस सिलेंडर। छोटी पिक-अप। दिन भर की डिलीवरी। किसी दूसरे कोण से देखें तो यह कहानी अभाव की लग सकती है। लेकिन विकास को देखकर ऐसा निष्कर्ष निकालना आसान नहीं है।

सन 2018 में उन्होंने बीए किया था। हालांकि ड्राइविंग उससे पहले ही शुरू कर दी थी। बम्बई और गुजरात में कारवां में पिक-अप चलायी। ट्रकों पर हेल्पर भी रहे और देश का पश्चिमी हिस्सा देखा। बताया कि अभी वे जितना महीने में कमाते हैं, उतना कारवां में हफ्ते भर में कमा चुके हैं।

अर्थात बाहर की दुनिया उन्होंने देखी है। केवल गांव से निकलकर शहर में मजदूरी करने का अनुभव नहीं, बल्कि देश के दूसरे हिस्सों की सड़कें, लंबे सफर, ट्रक, कारवां और प्रवासी कामगारों की दुनिया—सब कुछ थोड़ा-बहुत देखा हुआ है।

फिर भी अंततः घर लौट आए।

मैंने बाहर काम करने और यहां काम करने के फर्क की बात छेड़ी तो उन्होंने लगभग सहजता से कहा—आप जानते ही हैं, घर ज्यादा जरूरी है।

बस।

इसमें कोई भाषण नहीं था। न घर-परिवार के त्याग का भाव, न बाहर की दुनिया को कोसना, न कमाई की शिकायत।

हर आदमी बाहर जाकर ज्यादा कमाना नहीं चाहता। कुछ लोग घर के पास कम कमाकर भी अपनी जिंदगी को ज्यादा मानते हैं।

विकास उन्हीं में से एक लगते हैं।

लेकिन इसे केवल कम आकांक्षा कहना भी ठीक नहीं होगा। वह मूर्ख नहीं हैं। बीए किया है, ड्राइविंग जानते हैं, देश का एक हिस्सा घूम चुके हैं, अपने काम और उसकी कमाई का हिसाब समझते हैं। शायद उन्हें यह भी पता है कि बाहर जाकर बीस-पच्चीस हजार कमाने का मतलब केवल ज्यादा पैसा नहीं होता—घर से दूरी, अनिश्चितता, रहने-खाने का खर्च और परिवार से अलगाव भी उसी पैकेज में आता है।

हो सकता है उन्होंने बाहर और घर की नौकरी के नफा-नुक्सान का गहन हिसाब कर रखा हो। किया ही होगा।

कुछ लोग जीवन में ऊपर उठना चाहते हैं। कुछ लोग जीवन को बस ठीक रखना चाहते हैं। आखिर व्यक्ति अपनी प्राथमिकताएं अपनी प्रकृति से ही बनाता है।

शादी हो चुकी है। दो बच्चे हैं—दस और छह साल के। दोनों स्कूल जाते हैं। घर पास के कईयर मऊ में है।

मैं उनकी पत्नी के बारे में पूछना चाहता था। वह कितनी पढ़ी हैं? घर कैसे चलता है? खेती-बाड़ी है या नहीं? परिवार की अपनी जमीन कितनी है? खेती में विकास का हाथ लगता है या नौकरी ही उनका मुख्य सहारा है?

बच्चों को लेकर भी पूछना था। वे अपने बच्चों को क्या बनते देखना चाहते हैं? क्या चाहते हैं कि बेटे-बेटी भी उनके जैसा काम करें, या पढ़-लिखकर कोई दूसरी दुनिया चुनें?

ये सवाल रह गए।

विकास के पास समय कम था। फोन आ रहे थे और अभी कई घरों में सिलेंडर पहुंचाने थे।

शायद अगली बार पूछूंगा।

मुझे यह भी जानना है कि अगर उन्हें उतने ही पैसे में फिर बम्बई-गुजरात में गाड़ी चलाने का अवसर मिले तो क्या वे जाएंगे? और अगर यहां कमाई बढ़ जाए तो क्या वे बाहर जाने का विचार बिल्कुल छोड़ देंगे?

इन सवालों के जवाब से शायद यह पता चलेगा कि विकास की शांति वास्तव में संतोष है, पारिवारिक जिम्मेदारी है या जीवन के बारे में कोई बहुत व्यावहारिक फैसला।

अभी तो इतना ही दिखता है कि आदमी में कुंठा नहीं है।

गाड़ी खराब हो जाए तो उसे बनवाता है। अट्ठाईस सिलेंडर लेकर निकलता है। दिन भर घूमता है। घर लौटता है। महीने के अंत में बारह हजार रुपये आते हैं।

और शायद उसे यह जिंदगी स्वीकार ही नहीं, पसंद भी है।

बीए पास करने के बाद ड्राइविंग करते रहना हमेशा हार नहीं होता। कभी-कभी आदमी नौकरी नहीं, जीवन को अपनी शर्तों पर जीना चुनता है।

बारिश का मौसम है। कई दिनों से साइकिल लेकर निकलना नहीं हो रहा। घर पर आने-जाने वाले लोग भी कम हो गए हैं। ऐसे में आज विकास मिले तो उन्हीं पर लिखने का मन बन गया।

देश-परदेश घूम चुके विकास ने अंततः घर को चुना। उससे उनकी कमाई कम हुई होगी। शायद जिंदगी बड़ी हो गई।

अगला सिलेंडर लेकर वह शायद डेढ़ महीने बाद आएंगे। तब तक इस मुलाकात के छूटे हुए सवाल मन में रहेंगे।

शायद अगली बार खेती की बात होगी। पत्नी की। बच्चों की। और यह भी कि दस-बारह साल बाद वह अपने बेटे और बेटी को किस दुनिया में देखना चाहते हैं।

तब शायद विकास मिश्र की कहानी थोड़ी और पूरी होगी।

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