गांवदेहात डायरी

बरियापुर के शांतिधाम से निकलता हूं साइकिल ले कर तो दो विकल्प होते हैं—गंगाकिनारे पंडा जी के पास जा कर निरहू की चाय की गुमटी पर चाय पी लूं, या फिर साइकिल को रेल लाइन की ओर मोड़ दूं और उस पार के गांवों को तब तक नापूं जब तक लौटने का वक़्त न हो जाये।
आज मैंने दूसरा विकल्प चुना।
रेलवे का फाटक बंद था—शायद देर से बंद हुआ था। मैंने खड़े वाहन गिने। आठ मोटरसाइकिलें। मेरी साइकिल वहां अकेली थी। दूसरी ओर भी मोटरसाइकिलें ही थीं, थोड़ी कम।
छह साल पहले जब मैंने शांतिधाम में अपने लिये आवास चुना था, तब यहां साइकिलें ही दिखती थीं। आधे दशक में ही उनकी जगह मोटरसाइकिल ने ले ली है। बहुत कुछ वैसे ही जैसे गौरैया तेजी से गायब हो गईं। अब चरखियां और कौए ही नजर आते हैं।
साइकिल चला कर वापस लौटा तो मन में गौरैया थी और साइकिल।
क्या साइकिल नई गौरैया है?
क्या वह भी खत्म हो जायेगी?
चीन के बारे में सोचा। वहां भी धूल और धुएं से गांव-शहर भर गये थे तो उन्होंने बड़े पैमाने पर साइकिल ट्रैक बनाये। साइकिल को उसकी ड्यू इज्जत बख्शी। अब बीजिंग की हवा भी साफ है, आसमान नीला नजर आता है।
यहां तो गंगाकिनारे भी नदी का दूसरी ओर का नजारा धुंधला रहता है और आसमान धूसर।
साइकिल वापस आयेगी तो आसमान भी, हवा भी साफ होगी।
गांव के मार्केट में दोपहिया वाहनों की बिक्री में 12 प्रतिशत का उछाल है। शहर में यह बढ़ोतरी 6-7 प्रतिशत है। गांव में लोगों के पास पैसा भी आया है और आसान किश्तों में लोन की सहूलियत भी। अब गरीब भी मोटरसाइकिल वाला है।
आंकड़े बताते हैं कि गांवदेहात में साइकिल की बिक्री केवल 2 प्रतिशत बढ़ रही है। गांव में भी लोग ज्यादातर अपने बच्चे को जन्मदिन पर छोटी साइकिल खरीद कर दे रहे हैं।
पहले गांव का बच्चा बड़ों की साइकिल से कैंची चला कर सीखता था। अब वह सीधे अपने नाप की साइकिल से शुरू करता है। सम्पन्नता गांवदेहात में भी आई है।
शांतिधाम लौट कर आज की सुबह की सैर पर मनन करता हूं तो मन में गौरैया और साइकिल दोनों आते हैं। अब गांव की पतली सड़कों पर मोटरसाइकिल, ट्रैक्टर, कार और अब हाईवा ट्रक भी दिखने लगे हैं।
अब गांव न गौरैया के लिये बचा और न साइकिल के लिये।
— नीलकंठ चिंतामणि
शांतिधाम, बरियापुर
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