भीख मांगने वाली — पूजा और मंदिर


मैंने उन दोनों को सवेरे दूध लेकर आते देखा था। एक अधेड़ या बुढ़िया और दूसरी लड़की। महिला की पीठ उम्र से झुक गई थी। लड़की के चेहरे पर दुनिया को देखने की बालसुलभ जिज्ञासा थी। दोनों ही गरीब या गरीबी की सबसे निचली पायदान पर। मैं बिजली वाली साइकिल से था तो चलता चला गया।

पर दो घंटे बाद मेरे घर के आगे वे बैठी दिखीं। तब उनके पास गया। बुढ़िया ने बताया कि बैठकर वे जो भीख मांगकर मिला है, वह खा रही हैं। उनके पास एक डोलू में पानी था। लड़की के हाथ में एक स्टील का गिलास था। खाने का सामान प्लास्टिक की थैलियों में था। लड़की के पास एक गठरी रखी थी और बुढ़िया के पास एक पतली लाठी और एक-दो थैले थे। बताया कि परानापुर के पास नंदवा की हैं। कई बार भीख मांगने आ चुकी हैं।

पूजा और मंदिर — थोड़ी देर का पड़ाव।

“फलाने कोठी वाले ने पांच सेर चावल दिया था…” उसने कहा तो मुझे लगा कि उसके सामान में पांच किलो सामान तो हो नहीं सकता। बताया कि कुछ साल पहले दिया था। पांच साल पहले के दान को उसने दान का बेंचमार्क बना लिया था। वह बताकर ज्यादा से ज्यादा भीख पाने की आशा रखती थी।

पाँच साल पहले मिले पाँच सेर चावल आज भी उसकी स्मृति में सुरक्षित थे। गरीबी में अच्छी घटनाओं की स्मृति भी शायद ज्यादा दिनों तक चलती है।

अशोक (मेरे ड्राइवर) ने कहा कि मुसहरिन हैं ये। पर उनके पहनावे और चेहरे-मोहरे से वैसी लगी नहीं मुझे। वनवासी नहीं लगीं। पर यह भी हो सकता है कि भारत में आठ-दस दर्जन जीनोम आपस में गड्डमड्ड हो चुके हैं। कौन कितना आर्य है, कितना अनार्य; कितना क्या है — कहना कठिन है। पर वे मानव हैं और उनकी दशा के प्रति मेरे मन में सहज करुणा उपजी। पत्नीजी से मैंने अनुरोध किया और उन्होंने दो मिठाई के पीस उनके लिए भिजवाए।

महिला को इतनी अच्छी मिठाई की आशा नहीं थी। उसने बड़े ध्यान से देखा। एक बारगी उसके मन में खाने का विचार आया; पर जाने क्या सोचकर लड़की के हाथ से स्टील का गिलास लेकर उसमें सहेजकर वे मिठाइयाँ रख लीं।

हमारे लिए मिठाई खाने की चीज थी, उसके लिए सम्भालकर रखने की।

शायद तुरंत खाने की बजाय जब तक अगले भोजन का जुगाड़ बनेगा, तब तक वह मन ही मन मिठाई का स्वाद लेती रहेगी। हमारे घर से निकली दो मिठाइयाँ उसके लिए शायद अगले भोजन तक पहुँचने का एक छोटा-सा सुख थीं।

लड़की का नाम बताया — पूजा। अपना बताया मंदिर। मंदिर कुछ अजीब सा नाम लगा। शायद मैंने ठीक से न सुना हो। शायद मंदिरा हो। पर पूजा नाम तो संस्कारी लगा। लड़की उसकी नातिन है — लड़की की लड़की। उसका परिवार है? लड़की कहाँ रहती है? प्रयागराज में क्या करती है? कुछ जवाब बुढ़िया ने दिए और कुछ अनुत्तरित छोड़ दिए।

वे उठकर जाने लगीं। उनके मन में शायद मिठाई का स्वाद होगा। पर मेरे मन में उनके बारे में सोच बनी रही — मुसहरिन हैं? क्या आर्थिक आधार होगा उनका? अगले भोजन का कोई भरोसा होगा मन में?

वे उठकर जाने लगीं।

खैर — इतना तो है कि उनकी जिंदगी चल ही रही है।

मनुष्य की जिंदगी चलती रहने और अच्छी तरह चलने में बहुत फर्क है।

मैं उनके बारे में सवालों को लेकर क्या कर सकता हूँ। कुछ भी तो नहीं।


इराया का नामकरण


नवजात बच्ची के माता-पिता के सामने एक दिन अचानक एक बड़ी जिम्मेदारी आ खड़ी होती है—बच्ची का नाम क्या रखा जाए?

नाम ऐसा हो जो घर में अच्छा लगे, सुनने में मधुर हो, बहुत आम भी न हो और इतना अजीब भी न हो कि बच्ची बड़ी होकर पूछे—“मेरा नाम रखा किसने था?”

आजकल माता-पिता इस काम में काफी रचनात्मक हो गए हैं। वे पुराने नामों को देखते हैं, संस्कृत की ओर जाते हैं, दूसरे भारतीय भाषाओं में झाँकते हैं, कभी-कभी अपनी कल्पना से भी एक नाम गढ़ लेते हैं। ऐसा ही कोई नाम हो सकता है—इराया।

अब यहीं से असली कहानी शुरू होती है।

काशी के किसी संस्कृत पंडित को नाम सुनाइए। वे चश्मा ठीक करेंगे, शब्द को दो-तीन बार मन ही मन तोलेंगे और फिर पूछेंगे—“इसकी व्युत्पत्ति क्या है?”

माता-पिता कहेंगे—“पता नहीं। अच्छा लगा, इसलिए रख दिया।”

पंडितजी शायद थोड़ा कुड़बुड़ाएँगे। कहेंगे कि संस्कृत में इसका कोई स्पष्ट आधार नहीं दिखता, प्रत्यय-विधान कहाँ है, धातु क्या है, रूप कैसे बना—वगैरह।

माता-पिता फिर भी बच्ची को इराया ही बुलाएँगे।

इराया
इराया का नामकरण

क्योंकि भाषा की दुनिया में एक अजीब-सी बात है। किसी शब्द को पैदा होने के लिए हमेशा व्याकरण की अनुमति नहीं चाहिए। कभी-कभी उसे केवल लोगों का इस्तेमाल चाहिए।

मान लीजिए इराया बड़ी होकर कोई मशहूर सेलिब्रिटी बन गई। अब देश में हजारों माता-पिता अपनी बेटियों का नाम इराया रखने लगे। इंटरनेट पर “इराया नाम का अर्थ” खोजा जाने लगा। स्कूलों में इराया नाम की बच्चियाँ मिलने लगीं।

अब शब्द की सामाजिक स्थिति बदल गई।

कल तक वह एक माता-पिता की निजी रचनात्मकता थी। आज वह नाम समाज में घूम रहा है।

फिर मान लीजिए किसी दिन प्रधानमंत्री किसी सार्वजनिक भाषण में कहते हैं—“हमारी बेटियाँ, हमारी इराया, हमारे देश का भविष्य हैं।”

बस।

काशी के पंडितजी अब भी कह सकते हैं कि व्युत्पत्ति संदिग्ध है। लेकिन भाषा के बाजार में इराया नामक व्यक्तिवाचक संज्ञा की दुकान खुल चुकी है।

और फिर आता है शब्दकोश।

शब्दकोश वास्तव में भाषा का जन्म प्रमाणपत्र नहीं होता। वह अधिकतर भाषा का रजिस्टर होता है। पहले लोग बोलते हैं, फिर शब्दकोशकार उसे दर्ज करते हैं।

कल्पना कीजिए, वर्षों बाद शिकागो विश्वविद्यालय के डिजिटल हिंदी शब्दसागर में कोई शोधकर्ता “इराया” खोज रहा है। उसे उसके पुराने प्रमाण मिलते हैं। वह प्रयोगों की तारीखें खोजता है। अर्थ और सामाजिक प्रसार का इतिहास बनाता है।

शायद वह लिखता है—

“Contemporary Hindi female given name, increasingly attested from the early twenty-first century…”

और तब हम हँस सकते हैं।

क्योंकि इराया तब तक शायद गूगल की सीईओ बन चुकी होगी।

जिस बच्ची के नामकरण के समय काशी के पंडित ने कुड़बुड़ाकर पूछा था—“यह कौन-सा नाम है?”—उस नाम का इतिहास अब विश्वविद्यालय के डिजिटल डेटाबेस में सुरक्षित है।

यानी यात्रा कुछ ऐसी हुई:

माता-पिता की कल्पना → बच्ची का नाम → पड़ोस में प्रयोग → दूसरे माता-पिता द्वारा अनुकरण → सामाजिक प्रतिष्ठा → सार्वजनिक भाषण → व्यापक प्रयोग → शब्दकोश।

भाषा का लोकतंत्र कुछ ऐसा ही है।

व्याकरण शब्द को जन्म देने की क्षमता रखता है, लेकिन समाज उसे जीवन देता है।

और कभी-कभी समाज इतना जिद्दी होता है कि पहले शब्द बना लेता है और बाद में व्याकरणाचार्य को उसके लिए जगह बनानी पड़ती है।

इसलिए मुझे लगता है कि “इराया” की असली परीक्षा यह नहीं है कि काशी का पंडित उसे आज स्वीकार करता है या नहीं।

असली परीक्षा यह है कि क्या लोग उसे कल भी बोलेंगे?

अगर बोलते रहे, तो एक दिन शब्दकोश में वह ठसक से खड़ी होगी।

और तब शायद किसी पन्ने के नीचे बहुत छोटे अक्षरों में लिखा होगा—

First attested use: somewhere in eastern Uttar Pradesh.

काशी के पंडितजी को तब भी आपत्ति हो सकती है।

लेकिन इराया मुस्करा रही होगी।

जरई और रक्षाबंधन


राखी का बाजार बचा रहा, जरई का संसार चला गया।

गरिमा, मेरी बहन, की राखी समय पर आ गई है—स्पीड पोस्ट से। सालों से पोस्ट ऑफिस के माध्यम से मिलती रही है। पहले सामान्य लिफाफे में आती थी, फिर कोई समय आया कि स्पीड पोस्ट से आने लगी। शायद सामान्य डाक पर हम जैसे सामान्य लोगों का भी भरोसा कम हो गया था।

अब राखी के दिन का इंतजार है। मेरी बहन की राखी मेरी पत्नीजी ही बांधती रही हैं। रेलवे की नौकरी ने अवकाश नहीं दिया देश के पश्चिमी भाग से प्रयाग-लखनऊ आने का और तब से घरेलू यात्रायें करने की आदत ही जाती रही। अब बूढ़ा व्यक्ति अपनी आदतें नहीं बदल पाता। घुटनों का दर्द बहाना देते हैं कहीं न जाने, न हिलने का।

लेकिन जरा और पीछे जाऊं—अपने बचपन में—तो राखी की स्मृतियां हैं ही नहीं।

तब लड़कियां तालाब से नागपंचमी के दिन मिट्टी लाती थीं। उसमें अपने-अपने जौ के बीज बोती थीं। फिर रोज उन छोटे-छोटे पौधों का अंकुरण और उनका बढ़ना देखती थीं। सबमें प्रतिस्पर्धा भी होती थी कि किसके पौधे—जरई—कितने ज्यादा बढ़ रहे हैं।

उस छोटे-से मिट्टी के पात्र में जाने कितनी चीजें एक साथ चलती थीं—तालाब का पानी, खेत की मिट्टी, जौ का बीज, लड़की के हाथ का श्रम और कई दिनों की प्रतीक्षा। नागपंचमी को बोया गया बीज केवल पौधा नहीं था; वह आने वाले त्योहार की तैयारी था। उसे हर दिन देखना पड़ता था। उसमें पानी देना पड़ता था। उसके बढ़ने का इंतजार करना पड़ता था।

जरई
इतिहास बन गई जरई

राखी के दिन की तरह एक सुबह उठकर सब कुछ तैयार नहीं मिल जाता था।

लड़कियाँ भादौं की कजरी तीज पर वही पौधे अपने भाइयों और पिता के सिर पर या कानों पर पहनाती थीं। जरई ही राखी का प्रतीक होती थी। उसमें गांव-देहात, ऋतु, मौसम, अन्न, जल, तालाब और जरई के लिए किया गया श्रम जुड़ता था।

जरई की सबसे पहली मेरी स्मृति कलुआ बुआ और मेरे बाबा की है। बाबा शम्भू-के-पूरा के स्कूल में हेडमास्टर थे और घर में भी उनका अनुशासन कड़ा था। घर के सबसे बड़े के कारण कुटुम्ब में उन्हें मालिक कहा जाता था। मालिक को कोई जरई पहना सकता है, यह मेरी कल्पना में भी नहीं था। पर मैने देखा कि बुआ बाबा (अपने पिताजी) के कान पर जरई खोंस और कुछ बालें सिर पर बिखेर, डर के मारे भागीं। मालिक को भी आश्चर्य हुआ होगा। कुछ जोर से बोले भी वे। किसी ने घर के जनाना में आकर सूचना दी — कलुई मालिक के जरई बांधे बा!

यह कुटुम्ब के लिए बड़ी बात थी। मालिक ने अपना डंडा भले फटकरा, जोर से बोले, लेकिन अपनी बंडी से निकाल कर एक डब्बल (शायद एक आना) कलुआ बुआ को दिया भी। मुझे भी यकीन हुआ कि बाबा के कठोर व्यक्तित्व के पीछे कोमलता भी रहती है कहीं।

अब जरई जैसा निरीह जौ का पौधा चमचमाती राखी, साथ में मिठाई का डिब्बा, चॉकलेट का हैम्पर और डिजाइनर रोली-चावल की प्रतिस्पर्धा कहां कर पाएगा!

राखी एक दिन में खरीदी जा सकती है, जरई के लिए नागपंचमी से इंतजार करना पड़ता है।

सो जरई इतिहास हो गई!

अब तो एक दशक से गांव में हूं, पर गांव में भी जरई उपजाते और भाई के सिर-कान पर जरई को बांधते नहीं देखा। तालाब हैं, मिट्टी है, जौ भी कहीं न कहीं बोया जाता होगा, भाई-बहन भी हैं—लेकिन वह छोटी-सी परंपरा उनके बीच से निकल गई है।

शायद यही परंपराओं के खत्म होने का सबसे विचित्र तरीका है। कोई घोषणा नहीं होती। कोई दिन तय नहीं होता कि आज से यह परंपरा समाप्त। बस एक साल कोई नहीं करता, दूसरे साल कम लोग करते हैं, तीसरे साल बच्चों को पता ही नहीं होता कि किया क्या जाता था। फिर किसी बूढ़े को अचानक याद आता है कि अरे, ऐसा भी तो होता था!

इस साल राखी 28 अगस्त को है और जरई/कजरी तीज 31 अगस्त को। पर तुरत-फुरत में रक्षाबंधन तो मनाया जा सकता है, जरई नहीं। जरई की तैयारी तो नागपंचमी के दिन से होती है।

अब तो अमेजन ने भाई-बहन के संबंध—राखी का बाजार—थाम लिया है। आपने सोचने, भेजने में देर भी कर दी तो क्या; आप अभी अमेजन या फ्लिपकार्ट पर बटन दबाएं तो घंटे भर में दूर मुंबई या बेंगलुरु में राखी और उसके साथ अन्य बाजार-जनित सामान के चमचमाते पैकेट की डिलिवरी हो सकती है।

बाजार ने इस त्योहार की एक बड़ी समस्या हल कर दी है—दूरी की। भाई प्रयागराज में हो, बहन मुंबई में या बेंगलुरु में, राखी पहुंच जाएगी। मिठाई पहुंच जाएगी। चॉकलेट पहुंच जाएगी। उपहार पहुंच जाएगा। संबंध का प्रतीक समय पर दरवाजे तक आ जाएगा।

लेकिन जरई जैसी perishable जौ की बालियों को डिलिवर करने में बाजार की न चाह है, न उसकी लॉजिस्टिक्स विकसित हो सकती है। जरई को किसी गोदाम में रखा नहीं जा सकता। उसे महीनों पहले पैक करके नहीं भेजा जा सकता। उसे कुरियर बॉक्स में डालने के लिए नहीं बनाया गया। उसे तो अपने ही गांव की मिट्टी में, अपने ही तालाब के पानी से, अपने ही मौसम में उगना पड़ता है।

राखी के साथ बाजार घर आता है; जरई के साथ गांव।

शायद इसीलिए जरई का खो जाना केवल एक पुराने त्योहार की छोटी-सी रस्म का खो जाना नहीं है। उसके साथ त्योहार की वह धीमी गति भी गई जिसमें मौसम को आने दिया जाता था, बीज को फूटने दिया जाता था, पौधे को बढ़ने दिया जाता था और बच्चे को उसके बढ़ने को देखने दिया जाता था।

आज हमारे पास त्योहार पहले से कहीं अधिक चमकदार हैं, लेकिन उनके लिए इंतजार कम हो गया है।

कोई फिल्मी सितारा, कोई प्रधानमंत्री या कोई बड़ा अभियान जरई को फिर से उगा दे तो बात और है। तब शायद सोशल मीडिया पर उसकी तस्वीरें आएंगी, “हमारी खोई हुई परंपरा वापस लाएं” जैसे अभियान चलेंगे और अमेजन पर भी शायद ‘Traditional Jarai Rakhi’ का कोई पैकेट दिखाई दे जाए! लेकिन तब वह जरई होगी या जरई की स्मृति—यह कहना कठिन है।

क्योंकि राखी डिलिवर हो सकती है, जरई नहीं। उसे डिलिवर करने के लिए एक कुरियर नहीं, एक मौसम चाहिए।

ΨΨΨ

ब्लॉग पर 2013 की एक पोस्ट है जरई पर। मेरी बुआ उसमें मेरे पिताजी को जरई बांध रही हैं। अब बुआ भी नहीं रहीं और पिताजी भी। उनकी और जरई की स्मृति जिंदा बची है। मेरे साथ रहेगी।

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