रात भर बारिश होती रही। अब तक इस मौसम में मानसून करीब अस्सी प्रतिशत कमजोर रहा था, इसलिए यह बारिश किसानों के लिए बड़ी राहत लेकर आई। सुबह तक पानी थम चुका था और साइकिल लेकर निकलने का मौसम बन गया था। कमीज़ की जेब में नोकिया का चुटपुटिया मोबाइल रखा और मैं निकल पड़ा। कटका पड़ाव, गड़ौली, छोटी गड़ौली, देवकली, अगियाबीर और करहर का कोना—सब घूमता-फिरता जब घर लौटा तो ढाई घंटे की साइकिल पूरी हो चुकी थी।
इतनी देर की सवारी शरीर को पसीने से तरबतर करने और मोबाइल में डेढ़ दर्जन तस्वीरें भर लेने के लिए काफी थी। दिन भर की कसरत भी हो गई और देखने-सुनने को भी भरपूर मिला।
खेतों में पानी लबालब था। गांव की टूटी सड़कों पर गड्ढे भर गए थे। ईंट-भट्ठे के पास की धूल अब कीचड़ बन चुकी थी। उस पर साइकिल चलाते हुए यही लगता था कि जरा-सा संतुलन बिगड़ा तो कूल्हे की हड्डी चटकने में देर नहीं लगेगी।
खेतों में औरतें धान का बेहन उखाड़कर उसके गट्ठर बना रही थीं या पानी भरे खेतों में रोपाई कर रही थीं। जो भी आदमी खेत की ओर जा रहा था, उसके हाथ में एक-दो फरसे जरूर थे। उनका काम था खेत की मेड़ दुरुस्त करना, ताकि बरसात का पानी खेत में रुका रहे। कहीं सड़क किनारे जमा पानी अपने खेत की ओर मोड़ा जा रहा था, कहीं किसी गड्ढे का पानी। इस मौसम में फरसा ही जल-संरक्षण का सबसे बड़ा औजार था।
एक सज्जन दो फरसे लिए जा रहे थे। मैंने साइकिल रोककर उनसे अनुरोध किया कि थोड़ा बगल की ओर खड़े हो जाएँ ताकि वे और उनके फरसे दोनों ठीक से तस्वीर में आ जाएँ। उन्हें आश्चर्य हुआ कि इस छोटे-से मोबाइल से भी तस्वीर ली जा सकती है।

बातचीत भी हुई। उन्होंने अपना नाम रमेश सिंह बताया। मैंने भी अपना परिचय दिया। ठाकुर-बाभन सम्मेलन की स्थिति बन गई। उन्होंने हाथ बढ़ाया—शायद पैलगी के भाव से। मैंने भी हाथ बढ़ाया—हाथ मिलाने के भाव से। अंततः हम हैंडशेक पर सहमत हुए। चलते-चलते मैंने कहा कि कभी यूँ ही घूमते हुए उनके गांव-घर भी आऊँगा।
एक जगह एक महिला चरी काटकर सड़क किनारे गट्ठर जमा कर रही थी। अब चरी की फसल का मौसम तो बीत चुका है। उसी खेत में, जहाँ उसके टखनों तक पानी भरा था, कुछ ही देर बाद धान की रोपाई होनी थी। उसके हँसिए की गति बता रही थी कि समय बिल्कुल नहीं है।
मैंने यूँ ही पूछा, “क्या है यह?”
महिला कुछ कहती, उससे पहले उसके आदमी ने ऐसे समझाया मानो किसी शहर के अनपढ़ आदमी को ज्ञान दे रहा हो—”गाय-गोरू का चारा है। कुट्टी की मशीन से काटकर खिलाया जाएगा।”
मैंने भी अपने को पर्याप्त नासमझ बनाए रखा। उसे समझाने का आनंद लेने में बाधा डालने का क्या फायदा!
एक लड़का साइकिल-सग्गड़ पर धान का बेहन लादे खेत की ओर जा रहा था। उसके दो साथी पीछे से सग्गड़ को दौड़ते हुए धक्का दे रहे थे। जब वह तेज हो जाती थी तो उचककर उसी पर सवार भी हो लेते। मैं पीछे-पीछे धीरे-धीरे साइकिल चलाता रहा और उनके तीन-चार चित्र ले लिए। बेहन का वहन भी हो रहा था, खेती का काम भी और बच्चों का खेल भी। गांव में कई बार काम और खेल एक-दूसरे से अलग नहीं होते।
इस पूरे रंगमंच पर मैं पीछे-पीछे साइकिल चलाता, तस्वीरें खींचता, एक छोटा-सा साइड रोल निभा रहा था।
सग्गड़ पर बैठा एक बच्चा मेरी साइकिल देखकर बोला—
“होअ, देखअ! बिजली क साइकिल लागत बा! काहे दद्दा, बिजली क अहई न?”
उसकी सग्गड़ की सवारी के साथ मेरी साइकिल का कौतूहल भी जुड़ गया।
आगे एक ट्रैक्टर धान के खेत में पानी बराबर कर रहा था। संयोग से मेरे पहुँचने के ठीक पहले उसका काम पूरा हुआ और वह खड़ंजे वाली पतली सड़क पर आ गया। वहाँ उसे ओवरटेक करने की कोई गुंजाइश नहीं थी। मैं धीरे-धीरे उसके पीछे चलता रहा।
इसी बीच पत्नीजी का फोन आ गया। घर लौटने में सचमुच देर हो रही थी। जैसे ही ट्रैक्टर मुख्य सड़क पर पहुँचा, मैंने उसे पार किया और घर की राह पकड़ ली। ज्यादा घूमने के चक्कर में सत्तर साल की उम्र में इस तरह की फालतू घुमक्कड़ी पर मेम साहब का व्याख्यान सुनना तय ही था।
आज खेती-किसानी और धान की रोपाई की भरपूर रहचह देखने को मिली। मौसम ने साथ दिया तो फिर किसी दिन साइकिल उठाकर निकल पड़ेंगे।
ΨΨΨΨΨ



