कोई भी व्यवस्था जो सर्वश्रेष्ठ को चुनने में असफल है, वह अंततः सबसे कमजोर को ही धोखा देती है।
भारतीय लोकतंत्र पिछले कुछ दशकों से एक अजीब द्वंद्व में फँसा हुआ है। एक ओर अनुपातिक प्रतिनिधित्व की राजनीति है—जिसने ऐतिहासिक अन्यायों को दृश्यता दी, आवाज़ दी और एससी, एसटी, ओबीसी आदि के लिये सत्ता के दरवाज़े खोले। दूसरी ओर शासन की वास्तविक गुणवत्ता है—जो चुपचाप, लेकिन लगातार, कमजोर होती चली गई।
इस द्वंद्व को अक्सर “जाति बनाम मेरिट” के रूप में पेश किया जाता है, लेकिन यह प्रस्तुति स्वयं समस्या का हिस्सा है। असली संघर्ष ऊंची और नीची जाति के बीच नहीं, बल्कि मिडियॉक्रिटी और उत्कृष्टता के बीच है। और वह किसी जाति की बपौती नहीं है।
अनुपातिक प्रतिनिधित्व की राजनीति का एक स्वाभाविक परिणाम यह रहा कि राज्य ने न्यूनतम योग्यता को पर्याप्त मानना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे यह न्यूनतम योग्यता ही आदर्श बन गई। परीक्षाएँ, भर्तियाँ, पदोन्नतियाँ—हर जगह प्रक्रिया का उद्देश्य सर्वश्रेष्ठ को चुनना नहीं, बल्कि विवाद से बचना हो गया। यही वह बिंदु है जहाँ औसत होना केवल सहन की जाने वाली चीज़ नहीं रही, बल्कि संस्थागत रूप से पुरस्कृत होने लगी।
इस व्यवस्था का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि मध्यमता (मिडियॉक्रिटी – Mediocrity) केवल किसी एक सामाजिक समूह को नुकसान पहुँचाती है। वास्तव में, यह भ्रम इसलिए बना रहता है क्योंकि मध्यमता के सबसे तीखे दुष्परिणाम सबसे कमजोर पर ही पहले पड़ते हैं। जिनके पास निजी विकल्प नहीं—न महँगी शिक्षा, न नेटवर्क, न चयन की सुविधा—वे ही सबसे पहले बाहर होते हैं। लेकिन राजनीतिक भाषा इस तथ्य को स्वीकार नहीं करती; वह इसे पहचान की लड़ाई में बदल देती है।
इस समस्या को एक स्तर पर बिहार में प्रशांत किशोर ने एड्रेस करने का प्रयास किया था। पर उनकी विफलता (?) के बाद उस तरह के विकल्प पर सोचा ही नहीं जा रहा है, शायद।
यहीं से उस नेतृत्व की आवश्यकता पैदा होती है, जिसे हम सुविधा के लिए PK 2.0 कह सकते हैं।
यह नाम किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि एक नेतृत्व-प्रकार का संकेत है।
PK 2.0 की राजनीति पहचान को नकारती नहीं, लेकिन उस पर टिकती भी नहीं। वह यह मानकर चलती है कि अनुपातिक प्रतिनिधित्व का चरण (आरक्षण का युग) अपना ऐतिहासिक काम काफी हद तक कर चुका है। अब समाज का अगला संकट दृश्यता का नहीं, क्षमता का है। यह संकट नैतिक नहीं, संरचनात्मक है—और इसलिए इसका समाधान भी संरचनात्मक होना चाहिए।
> PK 2.0 का पहला और सबसे महत्वपूर्ण गुण होगा—भाषा का परिवर्तन।
वह यह नहीं कहेगा कि “किसी वर्ग या जाति के साथ अन्याय हो रहा है।”
वह यह कहेगा कि “राज्य ऐसी प्रक्रियाएँ चला रहा है जो उत्कृष्टता को पहचानने में अक्षम हैं।”
यह बदलाव मामूली नहीं है। जैसे ही बहस व्यक्ति या समूह से हटकर प्रक्रिया पर आती है, राजनीति का पूरा मैदान बदल जाता है। तब प्रश्न यह नहीं रह जाता कि कौन आगे आए, बल्कि यह हो जाता है कि कैसे चुना जाए।
> PK 2.0 की दूसरी विशेषता होगी—मध्यमता को नैतिकता का चोला न पहनने देना।
आज मध्यमता अक्सर “संवेदनशीलता”, “समावेशन” या “सामाजिक संतुलन” के नाम पर बचाई जाती है। PK 2.0 इस भाषा को स्वीकार नहीं करेगा। वह साफ़ कहेगा कि कोई भी व्यवस्था जो सर्वश्रेष्ठ को चुनने में असफल है, वह अंततः सबसे कमजोर को ही धोखा देती है। यह कथन किसी समूह के खिलाफ नहीं, बल्कि एक प्रणाली के खिलाफ होगा।
> तीसरी विशेषता—समस्या का साझा स्वभाव उजागर करना।
PK 2.0 यह नहीं बताएगा कि मध्यमता (Mediocrity) किसे नुकसान पहुँचा रही है; वह यह दिखाएगा कि यह किसी का भला नहीं कर रही है।
खराब शिक्षक सबसे पहले गरीब बच्चे को नुकसान पहुँचाता है।
खराब डॉक्टर सबसे पहले साधनहीन मरीज़ को।
खराब प्रशासन सबसे पहले उसी नागरिक को, जिसके पास विकल्प नहीं।
PK 2.0 कोई भावनात्मक अपील नहीं करेगा, बल्कि ठंडा, तथ्य-आधारित तर्क देगा। यहीं manipulation और alignment का फर्क स्पष्ट होता है। Manipulation में किसी जाति/वर्ग/तबके को “इस्तेमाल” किया जाता है; alignment में यह दिखाया जाता है कि एक ही विफलता सबको अलग-अलग तरीकों से चोट पहुँचा रही है।
> चौथी विशेषता—हमलों को झेलने की क्षमता।
PK 2.0 पर हमला अनिवार्य होगा। कहा जाएगा कि यह “पुरानी सवर्ण चाल” है, “नया नामकरण” है, या “छिपा हुआ एजेंडा” है। लेकिन यह हमला तभी तक असरदार होगा, जब तक PK 2.0 अपने तर्क से डिगेगा। जैसे ही वह व्यक्ति या पहचान की बहस में उतरा, वह हार जाएगा। लेकिन अगर वह हर बार प्रक्रिया, डेटा और परिणाम पर लौटता रहा, तो हमलावरों को अपना मैदान बदलना पड़ेगा—और यही उनकी कमजोरी होगी। बिहार में कुछ हद तक मैदान बदलते हमने देखा है।
> पाँचवीं और शायद सबसे कठिन विशेषता—लोकप्रिय न होने का साहस।
उत्कृष्टता कभी तात्कालिक रूप से लोकप्रिय नहीं होती। वह मेहनत माँगती है, अनुशासन माँगती है और असहज प्रश्न उठाती है। PK 2.0 को यह स्वीकार करना होगा कि वह चुनावी राजनीति में त्वरित नायक नहीं बनेगा। उसका काम किसी एक चुनाव से अधिक, एक पूरे चरण को बदलने का होगा।
यही कारण है कि बिहार जैसे राज्यों में प्रशांत किशोर का पहला प्रयास अटका। उन्होंने जिस भाषा में बात की, वह भविष्य की थी; जिस समाज से बात की, वह वर्तमान की असुरक्षाओं में फँसा था। वह द्स हजार रुपये के तात्कालिक लाभ को नकार नहीं सका। यह विफलता नहीं थी, बल्कि समय का अंतराल था।
भारत आज उसी अंतराल में खड़ा है। जातिगत पहचान की राजनीति ने अपनी सीमाएँ दिखा दी हैं, लेकिन उत्कृष्टता की राजनीति अभी भाषा खोज रही है। यूजीसी की गाइडलाइंस पर छटपटाहट के मूल में सवर्ण नहीं, वह है।
PK 2.0 उसी भाषा का नाम है। यह किसी वर्ग को ऊपर उठाने की परियोजना नहीं, बल्कि राज्य को उसके न्यूनतम मानकों से ऊपर खींचने की कोशिश है।
अंततः प्रश्न यह नहीं है कि समाज उत्कृष्टता चाहता है या नहीं।
प्रश्न यह है कि क्या वह मध्यमता (मीडियाक्रिटी) को सुरक्षा मानना छोड़ने के लिए तैयार है।
PK 2.0 की जरूरत यहीं से पैदा होती है—
एक ऐसे नेतृत्व की, जो यह असुविधाजनक सच कह सके कि
समस्या यह नहीं है कि कौन आगे आ रहा है,
समस्या यह है कि हम किसे और कैसे आगे आने दे रहे हैं।

यह PK 2.0 कहां से आयेगा? तामिलनाडु से, उत्तर प्रदेश से या अर्थयुग के सबसे नीचे के पायदान वाले बिहार से?
मेरे ख्याल से वह बिहार या पूर्वी उत्तरप्रदेश से नहीं आयेगा। यहां दस हजार का लालच वोट का चुम्बक बन सकता है। यह आयेगा तमिलनाडु + शहरी महाराष्ट्र + कुछ दक्षिणी शहर-राज्य क्लस्टर से; जहां जातिगत प्रतिनिधित्व की राजनीति अपना चक्र पूरा कर चुकी है, शिक्षा का न्यूनतम स्तर ऊपर है, और युवाओं में सरकारों के भदेस पन से ऊब है। वहाँ ₹10,000 को लोग “ठीक है” कहकर जेब में डालेंगे, लेकिन वोट उससे तय नहीं होगा।
PK 2.0 का रास्ता बिहार से शुरू होना नैतिक रूप से आकर्षक लगता है, लेकिन रणनीतिक रूप से आत्मघाती है। और वह प्रशांत किशोर ने PK 1.0 में किया।
यह पोस्ट सबस्टेक पर भी उपलब्ध है – https://gyandutt.substack.com/p/297
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