फ्रीडमैन ने दुनिया को वहाँ से देखा जहाँ नई सड़कें बन रही थीं। मैं उसे वहाँ से देख रहा हूँ जहाँ उन सड़कों पर चलते वाहनों ने पैदल चलने की ताकत घटा दी है।
थॉमस फ्रीडमैन का ताजा लेख है न्यूयॉर्क टाइम्स में – Everybody Is a Loser in This Middle East War. वह लेख पढ़ा।
फिर उनकी पुरानी पुस्तक The World Is Flat निकाल ली।
उसे उलटते-पलटते एक प्रश्न मन में आया… क्या आज भी दुनिया उतनी ही सपाट है जितनी बीस वर्ष पहले दिखाई देती थी?
कुछ वर्ष पहले तक मैं दुनिया को समझने के लिए नक्शे देखता था। अब कभी-कभी लोगों की दिनचर्या देखता हूँ।
गांव में बैठा हूँ, पर सोच कभी विरार की लोकल ट्रेन में चली जाती है, कभी बंगलूरू के किसी सॉफ्टवेयर इंजीनियर के शयनकक्ष में और कभी पुणे की टैक्सी में बैठे उस बिहारी युवक तक पहुँच जाती है जो मोबाइल पर जर्मन सीख रहा है।
सोचता हूँ— मुंबई के विरार में रहने वाला एक युवक रोज़ चर्चगेट तक आने-जाने में तीन घंटे खर्च करता है। उसका मोबाइल उसे दुनिया भर की खबरें दे सकता है, लेकिन घर पहुँचने में फिर भी डेढ़ घंटा लगता है।
बंगलूरू का एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर रात के दो बजे फ़ोन उठाता है। शिकागो में बैठा उसका सहकर्मी किसी समस्या में फँसा है। तकनीक ने दोनों को लगभग एक ही कमरे में ला दिया है, लेकिन समय-क्षेत्र अब उसके शयनकक्ष तक पहुँच गया है।
पुणे में टैक्सी चलाने वाला बिहार का एक युवक मोबाइल पर जर्मन सीख रहा है। उसे उम्मीद है कि किसी दिन कोई जर्मन पर्यटक उसे पूरे भारत के भ्रमण के लिए नियुक्त कर सकता है। वह पुणे की सड़कों पर गाड़ी चला रहा है, बिहार में अपनी पत्नी को महीने का खर्च चलाने के लिये पैसे भेजने हैं, पर उसके सपनों का एक हिस्सा यूरोप में घूम रहा है।
इन लोगों में कोई समानता नहीं दिखती। फिर भी मुझे लगता है कि ये सब एक ही कहानी के पात्र हैं।
बीस वर्ष पहले थॉमस फ्रीडमैन ने “The World Is Flat”लिखी थी। उनका तर्क था कि तकनीक, इंटरनेट और वैश्वीकरण दुनिया को समतल बना रहे हैं। दूरी का महत्व घटेगा। प्रतिभा को अधिक अवसर मिलेंगे। दुनिया का एक कोना दूसरे कोने से अधिक आसानी से जुड़ सकेगा।
उस भविष्यवाणी में काफी सच्चाई थी।
मैं आज पूर्वांचल के एक गाँव में बैठकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बातचीत कर सकता हूँ। मेरी नातिन सौ किलोमीटर दूर है, लेकिन लगभग प्रतिदिन मेरे साथ पढ़ती है। दुनिया के किसी विश्वविद्यालय में हुई चर्चा का सार कुछ मिनटों में मेरे सामने आ सकता है। यह सब फ्रीडमैन की सपाट होती दुनिया का ही हिस्सा है।
लेकिन मुझे लगता है कि कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई।
दुनिया सपाट नहीं हुई। दुनिया में झुर्रियाँ पड़ गईं।
जब कपड़ा मेज़ पर फैला होता है तो उसकी सतह सरल होती है। लेकिन जब वही कपड़ा सिकुड़ता है या मोड़ा जाता है, तो दूर-दूर के हिस्से अचानक पास आ जाते हैं और पास के हिस्से दूर हो जाते हैं। मुझे आज की दुनिया कुछ ऐसी ही लगती है।
बंगलूरू और शिकागो पहले से अधिक पास आ गए हैं। लेकिन उसी प्रक्रिया में किसी इंजीनियर की रात और दिन के बीच की दूरी बढ़ गई है।
जर्मनी और पुणे पहले से अधिक पास आ गए हैं। लेकिन उस टैक्सी चालक के सामने अब एक नई चुनौती खड़ी हो गई है—उसे केवल सड़कें नहीं, भाषाएँ भी सीखनी हैं।
मैं अपने गाँव में बैठकर दुनिया से जुड़ सकता हूँ। लेकिन उसी समय मेरे आसपास ऐसे लोग भी हैं जिनकी दुनिया केवल मोबाइल की छोटी-सी स्क्रीन तक सीमित होती जा रही है।
दूरी समाप्त नहीं हुई है। दूरी का स्वरूप बदल गया है।
कभी दूरी किलोमीटर में मापी जाती थी। अब वह ध्यान, कौशल, भाषा और नेटवर्क में भी मापी जाती है।
एआई ने इस परिवर्तन को और तीव्र कर दिया है।
इसके समर्थक कहते हैं कि अब हर व्यक्ति के पास एक निजी शिक्षक, निजी शोध-सहायक और निजी सलाहकार होगा। यह बात काफी हद तक सही है। मैं स्वयं इसका लाभ उठाता हूँ। लेकिन मैं एक दूसरी संभावना भी देखता हूँ। हर व्यक्ति के पास अब एक निजी भ्रम-निर्माता, निजी मनोरंजन मशीन और निजी प्रतिध्वनि-कक्ष भी हो सकता है।
तकनीक दोनों भूमिकाएँ निभाने में सक्षम है।
समस्या मशीन में नहीं है। समस्या यह तय करने में है कि हम उससे क्या करवाना चाहते हैं।
हमने लंबे समय तक सूचना की कमी को समस्या माना था। अब सूचना की अधिकता समस्या बनती जा रही है। पहले ज्ञान तक पहुँचना कठिन था। अब ज्ञान और शोर को अलग करना कठिन हो गया है।
मुझे कभी-कभी लगता है कि भविष्य की सबसे दुर्लभ वस्तु तेल, डेटा या बिजली नहीं होगी। वह होगी—अविभाजित ध्यान। एकाग्रता। फोकस।
जिस व्यक्ति के पास किसी विषय पर लगातार दो घंटे सोचने की क्षमता बची होगी, वही वास्तव में संपन्न माना जाएगा।
फ्रीडमैन ने दुनिया को वहाँ से देखा जहाँ नई सड़कें बन रही थीं। मैं उसे वहाँ से देख रहा हूँ जहाँ उन सड़कों पर चलते वाहनों ने पैदल चलने की ताकत घटा दी है।
हर नई तकनीक कुछ नई क्षमताएँ देती है। लेकिन वह कुछ पुरानी क्षमताओं को अनावश्यक भी बना सकती है। ट्रैक्टर ने खेती को अधिक उत्पादक बनाया, लेकिन अधिकांश लोगों से बैलों के साथ खेत जोतने की क्षमता छीन ली। जीपीएस ने रास्ता ढूँढना आसान किया, लेकिन दिशाबोध को कमज़ोर किया। एआई हमारे लिए लिख सकता है, पढ़ सकता है, सार बना सकता है, तर्क कर सकता है। प्रश्न यह नहीं है कि वह क्या कर सकता है। प्रश्न यह है कि उसके उपयोग के बाद हम क्या करना बंद कर देंगे। हमारी कौन-कौन सी क्षमताएँ कुंद हो जायेंगी।
प्रगति का प्रश्न केवल यह नहीं है कि हम कितनी दूर और कितनी तेजी से जा सकते हैं। प्रश्न यह भी है कि यदि वाहन रुक जाए तो क्या हम अभी भी चल सकते हैं। बिना जीपीएस के अपना गंतव्य तलाश सकते हैं?
यहीं आकर मुझे झुर्रियों का रूपक एक और अर्थ देता है।

शुरू में मुझे लगता था कि झुर्रियाँ वृद्धावस्था का संकेत हैं। लेकिन बाद में मैंने सोचा कि वे हमेशा उम्र का संकेत नहीं होतीं। मनुष्य के चेहरे पर भी झुर्रियाँ तब अधिक दिखाई देती हैं जब वह थका हुआ हो, पर्याप्त नींद न ले पाया हो, शरीर पर तनाव अधिक हो। अच्छी नींद, थोड़ी सैर, साफ़ हवा और संतुलित दिनचर्या के बाद वही चेहरा कहीं अधिक तरोताज़ा दिखाई दे सकता है।
शायद सभ्यताओं के साथ भी कुछ ऐसा ही होता है।
संभव है कि हमारी सभ्यता बूढ़ी नहीं हुई है। संभव है कि वह केवल थकी हुई हो।
पिछले तीन दशकों में हमने वैश्वीकरण, इंटरनेट, स्मार्टफ़ोन, सोशल मीडिया और अब एआई जैसी क्रांतियों को लगभग बिना रुके आत्मसात किया है। हमने अपने ऊपर बहुत कुछ एक साथ लाद लिया है। शायद हमें प्रगति रोकने की आवश्यकता नहीं है। शायद हमें उसे पचाने की आवश्यकता है।
शायद हमें और अधिक सूचना नहीं, बल्कि बेहतर छनाई चाहिए। और अधिक संपर्क नहीं, बल्कि अधिक अर्थपूर्ण संपर्क चाहिए। और अधिक गति नहीं, बल्कि बीच-बीच में ठहरकर यह देखने की आवश्यकता है कि हम जा कहाँ रहे हैं।
मैं यह नहीं कहूँगा कि दुनिया टूट रही है। मैं यह भी नहीं कहूँगा कि दुनिया सपाट हो रही है।
मैं केवल इतना कहूँगा कि दुनिया में झुर्रियाँ पड़ गई हैं।
और झुर्रियाँ हमेशा पतन का संकेत नहीं होतीं।
कभी-कभी वे केवल यह बताती हैं कि शरीर या सभ्यता को थोड़ा विश्राम, थोड़ा संतुलन और थोड़ा आत्मनिरीक्षण चाहिए।
वैश्वीकरण ने दुनिया को जोड़ा। एआई ने उसे और कसकर मोड़ दिया। अब चुनौती जुड़ने की नहीं, उन झुर्रियों के बीच अपना संतुलन बनाए रखने की है।
ψψψ


