गिरीश ने कहा – संघ के सामाजिक लपेटक तलाशेंगे मेरे लिये


उम्र बढ़ने के साथ साथ दीर्घ और स्वस्थ्य जीवन के बारे में आकांक्षा स्वाभाविक रूपसे बढ़ती जाती है।

ब्ल्यू जोंस की साइट पर मैं अपनी और अपनी पत्नीजी के दीर्घ जीवन की क्विज के परिणाम में पाते हैं कि हमारा और सब तो ठीक ठाक है, पर अपना लाइफ स्पॉन (और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण, अपना हेल्थ स्पॉन) लम्बा करने के लिये हमें सामाजिक रूप से लोगों/समूहों/धार्मिक संगठनों से और जुड़ना चाहिये।

आप अपने लिये इस क्विज को भरना और परिणाम जानना चाहते हैं तो इस लिंक पर जा सकते हैं।

ब्ल्यू जोंस के डान बटनर ने विश्व भर के दीर्घ जीवी लोगों के समूहों और उनके स्थानों का अध्ययन किया है। यह नेशनल ज्योग्राफिक वाली संस्था के साथ है। उनकी दीर्घ और प्रसन्नता युक्त जीवन विषयक पुस्तकें तथा पठनीय सामग्री रोचक भी है और काम की भी। यह विशेषत: जीवन के दूसरे पारी के लोगों के लिये महत्वपूर्ण है।


कल गिरीश सिंह जी हमारे घर पर थे एक घण्टे के लिये। वे अपने गांव आये हुये हैं। नवरात्रि के दौरान उनका मन बना विध्यवासिनी देवी के दर्शन करने का। सो वे मोटर साइकिल पर अपने गांव से निकल लिये। करीब पचास किमी यात्रा कर उन्होने विंध्याचल में दर्शन किया। वहीं एक पूरी कचौरी वाली दुकान पर नाश्ता किया और लौट लिये। वापसी में जब वे मेरे गांव के समीप पंहुचे तो फोन पर मेरी उपस्थिति टटोली। यह जान कर कि मैं घर पर ही हूं, वे मिलने चले आये। … बहुत अच्छा रहा उनसे मिलना। मेरी पत्नी जी और मैं गिरीश से मिलने पर हमेशा आत्मीय प्रसन्नता से सराबोर होते रहे हैं। इस बार भी हुये।

घर के पोर्टिको में श्री गिरीश सिंह

गिरीश ने बताया कि वे पचपन के हो रहे हैं। अपना कारोबार अगली पीढ़ी को लगभग थमा दिया है। वे तभी उसमें ध्यान देते हैं, जब बेटा उनसे देखने को या सलाह देने को कहता है। अन्यथा वे अपने समय को अपने अनुसार व्यतीत कर रहे हैं। घूम रहे हैं, लोगों से मिल रहे हैं और संघ का काम कर रहे हैं। संघ अर्थात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ।

गिरीश की बातों से लगा कि संघ के लोग बहुत मिलनसार, मितव्ययी, लोगों को देखने परखने और उनकी संघ के लिये उपयोगिता तोलने में दक्ष हैं। ऐसे लोग अगर मिलते हैं तो उनसे जुड़ाव का वे एक कदम आगे बढ़ कर प्रयास करते हैं। और वे लोग, जो जुड़ना चाहते हैं पर जिनमें अपने आप को दिखाने की, अपनी राजनैतिक आकंक्षा की राजसिक वृत्ति का लेश भी होता है, उसे वे अगला दरवाजा टटोलने को इंगित करते हैं।

अरविंद आश्रम के आदरणीय माहेश्वरी जी ने एक बार एक सत्संग में कहा था कि आश्रम के लोग आपको देख परख कर अगर आपकी चोटी पकड़ लेते हैं और आजीवन आपकी चोटी छोड़ते नहीं। उनसे जुड़ाव उस स्तर का प्रगाढ़ होता है। गिरीश की बातों से लगा कि संघ के लोग भी चोटी पकड़ने पर छोड़ते नहीं! 😆

गिरीश का कार्यक्षेत्र मुम्बई और महाराष्ट्र का है। वहां के कई संघ से जुड़े लोगों के बारे में उन्होने चर्चा की। वे लोग जीवन के अनेक क्षेत्रों में – वैज्ञानिक, लेखक, व्यवसायी, शिक्षक आदि – उत्कृष्टतम लोग हैं। वे लोग सरल हैं और अपनी उपलब्धि की डींग नहीं हाँकते। वे बड़ी सहजता से मिलते हैं। उनका हास्य भी निश्छल और संक्रामक होता है। “हहाई क मिलथीं भईया ओ पचे! ( पूरी तरह अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते मिलते हैं वे भईया)” – गिरीश ने उनमें से एक दो सज्जनों के बारे में बताया।

गिरीश सिंह जी

संघ के लोगों, प्रचारकों की जैसी बात गिरीश ने की, उससे लगा कि उस प्रकार के लोगों से नियमित सम्पर्क मेरे “दीर्घ जीवन की साधना” के प्रॉजेक्ट के कमजोर सामाजिक पक्ष का सुधार सकता है; जिसकी बात ब्ल्यू जोंस के डॉन बटनर जी वाली क्विज करती है।

गिरीश के पूर्वांचल के इस इलाके के सम्पर्क सूत्र उतने सघन नहीं हैं, पर उनके अनुज हरीश – हरिशंकर सिंह – अपने गांव में रहते हुये कृषि के अपने प्रयोगों के साथ संघ की वाराणसी के आसपास की गतिविधियों से गहन जुड़े हैं। हरीश के सम्पर्क सूत्रों को टटोल कर गिरीश मेरी सामाजिकता का दायरा बनाने के लिये लोगों को तलाशने का यत्न करेंगे – ऐसा गिरीश जी ने मुझे आश्वासन दिया।

“मैं बहुत सक्रिय नहीं हो सकता। वे लोग अगर अपेक्षा अधिक करेंगे तो जमेगा नहीं।” – मैंने अपनी शंका व्यक्त की। जीवन के इस दौर में कोई मुझे सामाजिकता में बहुत ‘पेरना’ चाहे तो मेरे अंदर रस नहीं, मात्र खुज्झा ही मिलेगा। मैंने गिरीश को अपनी अंतर्मुखी प्रवृत्ति स्पष्ट की। गिरीश ने बताया – भईया, आप निश्चिंत रहें। वे लोग आपमें आपके जुड़ाव लायक चीज तलाश ही लेंगे।


संघ कितना दक्षिण पंथी है और मुझसे कितनी दांई ओर है उसकी विचारधारा – यह प्रश्न मेरे मन में विश्वविद्यालय के दिनों से उठता रहा है। पिलानी में एक साल मुझसे सीनियर काबरा जी ने मुझे संघ में कुछ ज्यादा ही लपेटने की कोशिश की थी, तो मैं अपनी लाठी, गणावेश खरीदने के बावजूद भी छिटक गया था। तब से अब तक संघ को हाशिये से ही देखता रहा हूं। अब – चार पांच दशक बाद – सामाजिकता की जरूरत महसूस होने के साथ संघ की याद आ रही है। अब गिरीश जी ने आश्वासन दिया है कि वे मेरे लिये संघ के एक ऐसे सामाजिक लपेटक की तलाश करेंगे जो मेरी वृत्ति के साथ तालमेल कर सकें। देखते हैं, क्या होता है!

अपनी विचारधारा का दक्खिन-वाम तौलना मेरा एक मानसिक व्यायाम रहा है। बहुत कुछ वैसे ही जैसे हम अपनी नेट-वर्थ की गणना हर साल या कुछ महीने में हम करते हैं; उसी तरह वाम-दक्षिण के स्केल पर अपनी स्थिति तलाशता रहता हूं। अपने आप को क्या समझता हूं, मैं ठीक ठीक पिनप्वाइण्ट नहीं कर सका। अपने आसपास गरीबी-विपन्नता और शोषण देख कर कभी कभी साम्यवादी सोच मन में जोर मारती है। पर फिर यह भी लगता है कि वे लोग अगर कुछ कर रहे होते तो विश्व की विपन्नता कम हो गयी होती। उनके उदग्र-नक्सली तौर तरीके तो कभी भाये नहीं। धुर दक्षिणपंथ से भी भय लगता है। शायद कभी थ्रू एण्ड थ्रू सोचा नहीं समाज की सोशियो-इकनॉमिक समस्याओं पर। … और साम्य-समाजवाद के वे आइकॉन – लेनिन, माओ, ग्वेवेरा, कास्त्रो आदि कभी मुझे भाये नहीं। उनकी बजाय राजा राम का आदर्शवाद और उस समय का समाजवाद ज्यादा मनमाफिक लगता है।

ऐसे मुझ जैसे व्यक्ति को संघ वाले बुद्धिजीवी कितना लपेट पायेंगे? कितना काम का समझेंगे मुझे?


संघियों को तोलने का भी मन है। कहीं पढ़ा, या सुना है कि संघी अब वाया भाजपा सत्ता मिलने के कारण वे तपस्वी संघी नहीं रहे। भाजपा का शीर्ष नेतृत्त्व भी राजसत्ता का ग्लैमर दिखा कर, उन्हें प्रोटोकॉल की, सुविधाओं की रेवड़ी बांट कर उनके बड़े काडर को हड़प रहा है। अब संघ के लोग सरसंघचालक के प्रभुत्व में कम, भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के प्रभाव में ज्यादा हो रहे हैं। … इस बात को भी तोलने का मन है।


गिरीश उस दिन घण्टा भर मिलने के बाद चले गये। उनसे बिछुड़ने का मन तो नहीं हो रहा था, पर जाना तो था ही उन्हें। हां, अब गिरीश के फोन की प्रतीक्षा है – मेरे लिये वे कोई संघी लपेटक तलाश पाये या नहीं! 😆

घर से विदा होते समय गिरीश जी।

गिरीश जी और उनके भाई हरिशंकर सिंह के ट्विटर हेण्डल आप देख सकते हैं।


कैस्टर और मस्टर्ड


पता नहीं आजकल बिट्स, पिलानी में विभिन्न सोशियो-इकनॉमिक बैकग्राउण्ड के विद्यार्थियों के वर्गों के लिये कोई संज्ञायें हैं या नहीं या हैं तो कौन सी है? मेरे जमाने में – सत्तर-अस्सी के दशक में – कैस्टर और मस्टर्ड हुआ करते थे। कैस्टर (अरण्डी) अंग्रेजीदाँ विद्यार्थी थे। स्कूली शिक्षा उनकी बड़े शहरों में हुई होती थी। अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा पाये वे फार्वर्ड माने जाते थे। लड़कियों के हॉस्टल, मीरा भवन, की छात्रायें सामान्यत: उन्ही केस्टरों के साथ मिला करती थीं। पहले दूसरे वर्ष में कक्षाओं में प्रश्न पूछने और प्रोफेसरों से बोलने बतियाने में वे ही आगे हुआ करते थे। मैं केस्टरों में नहीं था।

मस्टर्ड (सरसों) उन छात्रों को कहा जाता था, जो हिंदी माध्यम से पढ़े, छोटे शहरों या कस्बों के होते थे। उनकी पृष्ठभूमि निम्न मध्यवर्ग की होती थी। अंग्रेजी में बोलना उन्हें नहीं आता था। मैं राजस्थान के एक कस्बे – नसीराबाद (अजमेर) – से आया था और मेरा बैकग्राउण्ड लोअर मिडिल क्लास से मिडिल क्लास के बीच में कहीं था। हिंदी माध्यम से पढ़ा था। गरभ – गणित-रसायन-भौतिकी – के अंक बहुत अच्छे थे पर उन्हें पढ़ा हिंदी माध्यम से ही था। सो अंगरेजी में हाथ बहुत ही तंग था। लड़कियों से बोलने बतियाने की कोई आदत नहीं थी। मैं मस्टर्ड था। खांटी सरसों!

पहले वर्ष की कक्षायें मेरे लिये टॉर्चर ही थीं। बिट्स में हिंदी की बहुत कद्र नहीं थी। पढ़ाया गया ज्यादा समझ नहीं आता था। प्रोफेसर जो पढ़ाते थे, उसका पहले मन में हिंदी अनुवाद करता था। एक दो महीने बाद कक्षा में एक दो सवाल अंग्रेजी में पूछने का यत्न करता था, पर कई बार अंग्रेजी बोलने में गड़बड़ा जाता था। उसने अच्छा खासा इनफीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स दिया। पर हम मस्टरों की संख्या पिलानी के हिंदी पट्टी में होने के कारण, अच्छी खासी थी। हम लोग स्कूली शिक्षा में अद्वितीय होने के कारण ही बिट्स में प्रवेश पाये थे, सो जद्दोजहद करने की इच्छा अदम्य थी। दो तीन सेमेस्टर लगे मुझे अपनी अंग्रेजी सुधारने मेंं। तब कक्षा में पर्याप्त पार्टीसिपेटिव बन पाया। फिर भी रहा रहा मस्टर्ड का मस्टर्ड ही। आज भी वही हूं। अपने काले पंख रंग कर हंसों की जमात में शामिल हो कर दोयम दर्जे का केस्टर बनने की कोशिश नहीं की। हां, कुछ मस्टर्ड स्यूडो केस्टर जरूर बन गये। … धुर दक्षिणपंथी मस्टर्ड होने के कारण मैं अपने जुनून को पालता गया और आज अपने वानप्रस्थ आश्रम में इस गांव में रहता, साइकिल चला रहा हूं। परदेस या किसी मेट्रो में नहीं बसा।

केस्टर -अरण्डी

दो ग्रेफिटी वाली पत्रिकायें छात्र निकालते थे। हिंदी वाली ‘रचना’ कही जाती थी। अंग्रेजी वाली का नाम मुझे अब याद नहीं है। मैं हिंदी वाली वाल-मैगजीन का सम्पादक था। साठ सत्तर प्रतिशत लेखन भी मुझे करना होता था। उसकी हिंदी आज मेरे ब्लॉग की हिंदी से अलग प्रकार की थी। उस समय हिंदी की पत्रिका ‘दिनमान’ छपा करती थी। उसकी भाषा और रघुवीर सहाय के लेख/सम्पादकीय का मेरे ऊपर प्रभाव था। हिंदी के अखबारों, धर्मयुग और दिनमान की नकल करने का प्रयास करता था और वह बहुत अच्छा प्रयास नहीं था। फिर भी मस्टर्डों में वह पत्रिका – वाल मैगजीन – ठीकठाक पैठ रखती थी।

हम वह पत्रिका हाथ से एक मेटल स्टाइलस से लिखा करते थे। नीले रंग के मोमिया स्टेंसिल पर लिख कर उसकी साइक्लोस्टाइलिंग मशीन से करीब सौ प्रतियां निकाली जाती थीं। चार से आठ पन्ने की पत्रिका हम प्रत्येक हॉस्टल के और बिट्स के सभी नोटिस बोर्डों पर पिन कर टांगा करते थे। अधिकांश छात्र वहीं खड़े खड़े पढ़ा करते थे। कुछ प्रतियां हम सहेज कर रखने और बांटने के लिये भी बनाते थे। एक दो साल मैंने वह पत्रिका निकालने का काम किया।

मैं जन्मजात मस्टर्ड; हिंदी से अंग्रेजी और अंग्रेजी से फिर हिंदी में आया हूं। उसका असर यह है कि न हिंदी अच्छी बनी और न अंग्रेजी। दुविधा में दोनू गये, माया मिली न राम।
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मैं रहा रहा मस्टर्ड का मस्टर्ड ही। आज भी वही हूं। अपने काले पंख रंग कर हंसों की जमात में शामिल हो कर दोयम दर्जे का केस्टर बनने की कोशिश नहीं की। हां, कुछ मस्टर्ड स्यूडो केस्टर जरूर बन गये।

कालांतर में; चूंकि सारी पढ़ाई अंग्रेजी में होती थी; मेरा सोचना और अभिव्यक्त करना अंग्रेजी में होने लगा। मेरी हिंदी खुरदरी और अंग्रेजी के शब्दों से भरी होने लगी। तकनीकी शब्दों और कहावतों का हिंदी तर्जुमा मिलता नहीं था। इसलिये, भले ही प्रवृत्ति में मैं मस्टर्ड ही रहा, मेरी हिंदी लंगड़ी होती गयी। पिलानी से निकलने के बाद लगभग तीन दशकों तक हिंदी में अभिव्यक्ति का यत्न बहुत कम रहा।

सन 2007 में अचानक रवि रतलामी के ब्लॉग पर नजर पड़ी और मुझे समझ आया कि हिंदी में लिखने और ब्लॉगिंग का भी एक संसार विकसित हो रहा है। मेरी मस्टर्डीयता ने जोर मारा। मैंने हिंदी में ब्लॉग बनाया। शुरुआती हिंदी अटपटी रही ब्लॉग पर। करीब रुपया में सात आठ आना भर अंग्रेजी के शब्द, देवनागरी में लिखे होते थे उसमें। अब भी हैं। अब 7-8 आना से कम हो कर एक दो आने पर आ गये हैं। हिंदी में हाथ तंग है, पर फिर भी हिंदी पट्टी के पाठकों ने मुझे स्वीकार कर लिया है। शायद!

मैं जन्मजात मस्टर्ड; हिंदी से अंग्रेजी और अंग्रेजी से फिर हिंदी में आया हूं। उसका असर यह है कि न हिंदी अच्छी बनी और न अंग्रेजी। दुविधा में दोनू गये, माया मिली न राम। मैं स्वांत: सुखाय लिखता जाता हूं। सोच में मैं खांटी मस्टर्ड हूं। महिलाओं के साथ बोलते बतियाते अभी भी झिझक होती है मुझे। हमेशा आशंका रहती है कि मैंने कुछ ऐसा तो नहीं कहा-लिखा जो फीमेल जेण्डर को रिडीक्युलस लगे। केस्टरों के प्रति, अंग्रेजी गानोंं, फिल्मों और स्यूडो-मॉर्डेनिटी के प्रति वह भाव है जो उन्हें अपने डोमेन में स्वीकार नहीं करना चाहता। सड़सठ साल की उम्र तक जब अरण्डी (केस्टर) नहीं बना तो अब क्या बनूंगा।

सीनियर सिटिजन बनने के बावजूद भी मेरी आंतों में अच्छे बेक्टीरिया अभी भी ठीक ठाक हैं। कब्ज की शिकायत मुझे नहीं होती है। यदाकदा पूड़ी-कचौडी खा भी लिया तो ईसबगोल सेवन से काम चल जाता है। अगले दिन निपटान ठीक ही होता है – बिना प्रयास किये। इसलिये मुझे अरण्डी के तेल की या केस्टर पन्थ में दीक्षा लेने की जरूरत नहीं पड़ी। उसके उलट, डालडा, रिफाइण्ड तेलों को लांघते हुये अब हम सरसों के तेल का सेवन करने लगे हैं। घर में अब कच्ची घानी का सरसों का तेल ही आता है। अभी तो मन हो रहा है कि एक किचन एक्स्पेलर खरीद कर घर में ही सरसों का तेल निकाला जाये अपने इस्तेमाल के लिये। सो मैं और मेरा परिवार मस्टर्डपंथी ही है। 😆

सरसों। मस्टर्ड

सर्दियां आने को हैं। गेंहू के साथ सरसों की बुआई होगी। सरसों के फूल मुझे प्रिय हैं। उनका इंतजार है। आखिर हूं तो मस्टर्ड ही न मैं! 😆


सपने में सिर काटई कोई


तीन बज रहे होंगे। अर्धनिद्रा में मैंने सपना देखा कि यात्रा कर रहा हूं और मेरा बैग-सूटकेस गायब हो गया है। सब कुछ उसी में है। मेरा आईडेण्टिटी, पैसा, सब कुछ। सपने में ही तुलसीदास जी का स्मरण हो रहा है – सपने में सिर काटई कोई, बिनु जागे दुख दूर न होई। … बालकाण्ड में शिव-पार्वती संवाद।

नींद में ही नींद खुल जाती है। स्मरण होता है कि मैं तो घर पर बिस्तर पर हूं। आश्वस्त हो कर नींद पुन: आ जाती है और एक घण्टा और सोता हूं।

विचित्र सा स्वप्न है – जाग्रत भी है और स्वप्न भी। सभी कुछ खो जाने का स्वप्न शायद एक तरह की असुरक्षा की भावना है। पर स्वप्न में ही यह भान कि स्वप्न मुझे मूर्ख बना रहा है – वह अटपटा है।

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यात्रा करता नहीं आजकल। रेलवे का फ्री पास लिये भी तीन-चार साल हो गये। उतना ही समय ट्रेन में कदम रखे हो गया। उसके पहले भी, जब रेल का अधिकारी था, तब भी कई दशकों से ऐसी नौबत नहीं आई कि अकेले यात्रा करनी पड़े। अधिकांशत: रेल के सैलून में चलना होता था, या ट्रेन में चलने पर भी साथ में दो-चार लोग तो होते ही थे। यात्रा में मेरा सामान कभी खोया नहीं। खोने की सम्भावना भी नहीं होती थी।

सामान ही नहीं, कभी भीड़ में किसी उचक्के ने जेब से पर्स या पैसे भी नहीं उड़ाये कई दशकों से। मुझे याद आता है कि आई आई टी गेट के पास कटवारिया सराय से पैदल आ कर मैं डीटीसी की बस पकड़ रहा था। बस में चढ़ते समय एक व्यक्ति ने मेरी जेब से बीस रुपये निकाल लिये थे। पीछे मुड़ कर मैंने उसे भागते भी देखा था। उसके बाद इस तरह की कोई घटना नहीं हुई।

रेल परिचालन की नौकरी ने मुझे निर्मम टाइप बना दिया था। सम्वेदनशील बनने और दिखाने के लिये मुझे अतिरिक्त मेहनत और मानसिक कवायद करनी होती थी।… और अब, सपने में ही सही, अपने असबाब को खोने का भय हो रहा है! शायद उम्र के बढ़ने के साथ इस तरह के असुरक्षा के भय बढ़ें; इस तरह के सपने और आने लगें।

वह भी दिन थे। सन 1980 की बात होगी। मैं दिल्ली में कटवारिया सराय में एक कमरा किराये पर ले कर रहता था। सरकार का राजपत्रित अधिकारी हो गया था। पर दिल्ली में सरकारी मकान मिलना सम्भव नहीं था। निर्माण भवन में दफ्तर था और आने जाने के लिये डीटीसी बस का उपयोग होता था। मैं आईआईटी में पार्ट-टाइम स्टूडेण्ट भी था। उसका सबसे बड़ा लाभ था कि साढ़े बारह रुपये का महीने भर का स्टूडेण्ट-पास बन जाता था। सो वैसे दिन कट रहे थे। उस समय बीस रुपये बड़ी चीज थी। खोने पर दुख तो था, पर इतना बड़ा दुख नहीं जितना आज सपने में सामान खो जाने का हो रहा था।

जेबकतराई, छिनैती, ट्रेन में सामान की उचक्कई या जहरखुरानी से व्यक्तिगत रूप से सन 1980 के बाद कोई पाला नहीं पड़ा। रेल की नौकरी के शुरुआती वर्षों में यात्रा करते समय एक चेन और ताले के साथ यात्रा करता था। ट्रेन की सीट से अटैची-ब्रीफकेस बांध कर ताला लगाने की आदत थी। पर रेलवे का पैराफर्नेलिया मिलने पर वह आदत जाती रही। किसी समारोह आदि में भीड़ में कभी कभी धक्के खाने पड़ते थे। रेल मंत्री जी का कार्यक्रम होने पर मजबूरन उसमें सम्मिलित होना पड़ता था। पर भीड़ में मैं अपना एक हाथ जेब में पर्स पर रखता था। भले ही मेरे पास ज्यादा पैसे न हों (सौ दो सौ से ज्यादा नहीं), पर पर्स का जाना पसंद नहीं था – आखिर किसे हो सकता है! 😀

मुझे याद है कि इंदौर रेलवे स्टेशन पर रेलमंत्री किसी नयी ट्रेन को झण्डी दिखा रहे थे। जलसे में मण्डल रेल प्रबंधक महोदय रेल मंत्रीजी को सी-ऑफ करने गये तो भीड़ में किसी ने उनका पर्स उड़ा दिया था। उनके आसपास रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स और जीआरपी वाले भी रहे ही थे, पर फिर भी जेबकतरा अपनी कलाकारी दिखा गया। … यह रेल नौकरी के दौरान इक्का दुक्का घटनाओं(दुर्घटनाओं) में से है। सामान्यत: रेल अधिकारी सुरक्षित ही रहे पाये मैंने। उस हिसाब से आज का सपना अजीब सा है।

ऐसा नहीं कि चोरी-उचक्कई-जहरखुरानी आदि होती नहीं हैं। पर उनके प्रति मुझमें सेंसिटिविटी का अभाव जरूर था। मुझे याद है कि रेलवे में हो रही जहरखुरानी पर मीटिंगों में चर्चा के दौरान जब बाकी सभी अधिकारी तत्मयता से उसमें भाग लेते थे; मैं उबासी लिया करता था। उस समय मेरे मन में यही चलता था कि वैगनों का लदान कैसे बढ़ाया जाये या मेरे सिस्टम पर ट्रेन-स्टॉक/वैगनों की भीड़ किस तरह सिस्टम के बाहर ठेली जाये। रेल परिचालन की नौकरी ने मुझे निर्मम टाइप बना दिया था। मेरी भाषा भी पुलीस वाले थानेदार की तरह उज्जड्ड और लठ्ठमार हो गयी थी। सम्वेदनशील बनने और दिखाने के लिये मुझे अतिरिक्त मेहनत और मानसिक कवायद करनी होती थी।… और अब, सपने में ही सही, अपने असबाब को खोने का भय हो रहा है! शायद उम्र के बढ़ने के साथ इस तरह के असुरक्षा के भय बढ़ें; इस तरह के सपने और आने लगें।

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मेरी पत्नीजी को फ्लैश-बैक में जाना और अपने पुराने संस्मरण लिखना पसंद नहीं। उनके अनुसार वह लिखते समय मैं जानबूझ कर अपने आप को दयनीय, विपन्न और निरीह दिखाता हूं। मुझे अपने को अतिसामान्य दिखाने का जो भाव है, वह किसी तरह अपने को औरों से अलग दिखाने की प्रवृत्ति का ही प्रदर्शन है। “और सपने तो आते रहते हैं, उनको लेकर लिख डालना – यह भी कोई बात हुई?!”

पर पत्नीजी मुझे चमकाने, ‘साहब’ बनाने में लगी रहेंगी और मैं अपनी मनमौजियत में निरीह भाव से (?) लिखता रहूंगा! 😆


रेल के यार्डों में घूमते हुये


सन 1984-85 में मैंने अपनी रेल यातायात सेवा की प्रोबेशनरी ट्रेनिंग की थी। उस दौरान मुझे अनुभव लेने के लिये यार्डों में भेजा गया। माल यातायात के लिये उस समय शंटिंग यार्ड बहुत महत्वपूर्ण हुआ करते थे। रेलवे तब रेक लदान की ओर मुड़ चुकी थी और अस्सी प्रतिशत लदान पूरी रेक का होने लगा था, पर तब भी कई मालगोदाम और औद्योगिक इकाइयां इतनी बड़ी नहीं थीं कि तीस-चालीस आठ पहिया वैगनों का एक मुश्त लदान कर सकें। फुटकर या पीसमील लदान तब भी रेल यातायात का बहुत सा हिस्सा था।

उस समय शंटिंग यार्ड महत्व रखते थे। उनकी कार्यप्रणाली समझना एक यातायात अधिकारी की ट्रेनिंग के लिये आवश्यक घटक था। मेरे उस समय के ट्रेनिंग नोट्स में पांच सात रेल यार्डों का विस्तृत विवरण है। उनमें मैंने पर्याप्त समय व्यतीत किया था।

चित्र ओपनवर्स लाइब्रेरी से लिया गया।

दिल्ली का तुगलकाबाद यार्ड मैंने एक सप्ताह में कवर किया था। पूरे यार्ड में मैं घूमा था। शण्टिंग इंजन पर चल कर शण्टिंग का अनुभव लिया था। मुझे याद है कि हर शाम चीफ यार्ड मास्टर साहब के साथ आधा एक घण्टा उनके दफ्तर में – जो यार्ड की लाइनों के बीच एक दो मंजिला इमारत में था और जहां बैठ कर पूरे यार्ड का विहंगम दृश्य दीखता था – उनसे टिप्स लेते व्यतीत करता था। वे एक कप चाय और एक बालूशाही मगांते थे मेरे और अपने लिये। बालूशाही साधारण ही होती थी। यार्ड के बीच उसका मिलना ही अपने आप में बड़ी बात थी। मैं चीफ यार्ड मास्टर साहब (उनका नाम वेद प्रकाश था) के आतिथ्य, उनके यार्ड की प्रणाली समझाने के तरीके और उनकी सज्जनता से बहुत अभिभूत था। यही कारण है कि चार दशक बीतने को आये पर उनकी याद अभी भी मन में बनी है और उनकी बालूशाही का स्वाद अभी भी मन में है। उनके साथ बैठकों के बाद से ही मुझे बालूशाही पसंद आने लगी! 🙂

बाद में हम प्रोबेशनर अफसरों को अपने अपने रेलवे जोन अलॉट हो गये। मुझे पश्चिम रेलवे मिला। उसके बाद अधिकांश ट्रेनिग अपनी जोन में हुई। तब मैंने कोटा मण्डल के ईदगाह, जमुना ईस्ट बैंक, बयाना, गंगापुर, सवाई माधोपुर आदि के यार्डों में ट्रेनिंग की। ट्रेनिंग के दौरान आगरा में मैं ईदगाह के रेस्ट हाउस और आगरा फोर्ट स्टेशन के ऊपर बने यात्री निवास की डॉर्मेट्री में रुका करता था। अकेले रहना होता था, और ईदगाह से आगरा फोर्ट तक पैदल आना जाना होता था। रेल पटरी बहुत गंदी हुआ करती थी। आसपास के स्लम्स के लोग वहीं अपना दैनिक निपटान करते थे। उसकी दुर्गंध से चलना दूभर होता था। इसके अलावा कभी भी पैर विष्ठा पर पड़ने की सम्भावना होती थी। मैं रेल लाइन के साथ बनी सड़क, जिसके किनारे बहुत दूकानें थीं और सड़क बहुत किचिर पिचिर वाली होती थी; से पैदल आया जाया करता था। मुझे पैदल बहुत चलना पड़ता था।

एकाकी जीवन, यार्ड में सीखने के लिये की गयी मेहनत और भोजन का कोई मुकम्मल इंतजाम न होना – यह सब खिन्नता देता था। आगरा मुझे अपनी भीड़ और गंदगी के कारण कभी पसंद नहीं आया। पर इन सब के बावजूद मैंने अपनी ट्रेनिग को बहुत गम्भीरता से लिया। गम्भीरता से न लेता तो ट्रेनिंग बंक कर घर (ईलाहाबाद) भाग गया होता। पार मैने कोताही नहीं की।

मुझे याद है कि मेरे पास पैसे भी कम ही होते थे। भोजन पर खर्च किफायत से करता था। आगरा फोर्ट स्टेशन पर भोजनालय में एक या दो कटलेट और एक स्लाइस ब्रेड-चाय यही नाश्ता होता था। हर रोज वही नाश्ता। वेटर भी जान गया था कि मैं वही लूंगा, जो सबसे सस्ता नाश्ता था। कटलेट की क्वालिटी बहुत अच्छी नहीं थी। मछली के आकार की कटलेट जो कटलेट कम आलू की टिक्की ज्यादा लगती थी और जिसका तेल मुझे अप्रिय था; का कोई विकल्प मैं नहीं तलाश पाया। कभी कभी शाम के भोजन के लिये मेरे चाचाजी – जो आगरा फोर्ट पर जी.आर.पी. में सब-इंस्पेक्टर थे – अपने घर बुला लिया करते थे। उनका डेरा स्टेशन के दूसरी ओर, मस्जिद के पास एक दो मंजिला मकान की बरसाती में था। वहां वे सपरिवार रहते थे। उनके घर जाना अच्छा तो लगता था, पर मैं अपने अंतर्मुखी व्यक्तित्व के कारण उनके बार बार बुलाने पर ही एक दो बार जाया करता था। … ट्रेनिग के दौरान की उदासी और गम्भीरता मेरी अपनी ओढ़ी हुई थी। कभी अपना रक्तचाप नापा नहीं, पर अब लगता है कि उस दौरान भी, अपनी नौजवानी के समय, मुझे उच्च रक्तचाप रहा करता होगा। 😦

आगरा की बजाय मुझे गंगापुर सिटी और सवाई माधोपुर के यार्डों में ट्रेनिग ज्यादा भाई। स्टीम इंजन शंटिंग किया करते थे। यार्ड से सम्बद्ध स्टीम शेड में भी मैंने समय व्यतीत किया। उसी समय से स्टीम इंजनों के साथ का नॉस्टल्जिया बना हुआ है। एक दो डीजल के पप्पू इंजन – डब्ल्यूडीएस 4 भी होते थे। बच्चा इंजन। उनकी खींचने की क्षमता बहुत कम थी। पर फिर भी वे मुझे आकर्षित करते रहते थे।

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गंगापुर सिटी में रेस्ट हाउस में रहने का इंतजाम तो ठीक था, पर भोजन देहाती टाइप था। भगई पहने वहां का अटेण्डेण्ट कभी कभी मेरा पैर भी दबाया करता था, मेरी अनिच्छा के बावजूद। पर जब उसे पता चला कि मैं सिविल इंजीनियरिंग विभाग का अफसर नहीं हूं तो पैर दबाने की उसकी तत्परता काफूर हो गयी। तब उसे अपेक्षा होने लगी कि मैं उसे रुपया-आठ आना टिप दे दिया करूं। लालची टाइप वह बंदा मुझे पसंद नहीं था। पर मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। उसी से मैं उसके सुख दुख पर बात किया करता था। यूं उसकी ठेठ राजस्थानी बोली मुझे कम ही समझ आती थी।

गंगापुर स्टेशन के बाहर छोटी बजरिया थी। करीब एक-डेढ़ दर्जन कस्बाई दूकानें। छोटी मोटी खरीददारी वहीं करता था मैं। वहां कभी कभी कचौरी खरीद कर खाता था (जिसमें बहुत मिर्च होती थी)। अकेले। कोई मित्र तो था नहीं।

यार्ड की ट्रेनिंग के बाद थक जाता था मैं, पर फिर भी रात में सोचने को बहुत कुछ होता था। उस समय की अगर डायरी लिखी होती तो काम का दस्तावेज होती। वैसे उस समय लिखने का कोई अनुशासन नहीं था। हिंदी में लिखना तो कम ही होता था।

अब तो उस समय की यादों की मात्र चिंदियां भर हैं। यादों की कतरनें!

पर चूंकि मैं कोई पुस्तक नहीं लिख रहा; केवल ब्लॉग की खुरदरी पोस्ट लिख रहा हूं; यादों की कतरने ही उसमें उतारना और 1000 शब्द लिख देना पर्याप्त है। नहीं?


मॉर्निंग पोजीशन की याद


सवेरे तीन बजे नींद खुल गयी। नींद जल्दी खुलने का कोई न कोई निमित्त होता है। आज वह “मॉर्निग पोजीशन” था।

रेलवे की जिंदगी जो नहीं जानते उनके लिये मॉर्निंग पोजीशन अजीब शब्द हो सकते हैं, पर रेलवे अफसर के लिये वे दैनिक धर्मग्रंथ सरीखे हैं। पच्चीस तीस पन्नों की गठ्ठी समय अपने हाथ में लिये या कांख में दबाये चलने की कल्पना अब भी करता हूं। तीन दशक से ज्यादा समय उनके साथ गुजरा है। रेलवे अफसर ही नहीं, उनके परिवार के लोग भी उस पोजीशन को देखने समझने लग जाते हैं!

जब मैंने रेलवे की नौकरी ज्वाइन की थी तो पहली पोस्टिंग रतलाम में सहायक परिचालन सुपरिण्टेण्डेण्ट (बाद में उसे सहायक परिचालन प्रबंधक कहा जाने लगा) के रूप में हुई थी। उस समय परिचालन विभाग में पोस्टिंग मिलना और वह भी रतलाम जैसी “कठिन” डिवीजन पर – यह चुनौती भरा असाइनमेण्ट था। मेरे पास चार बड़े अखबार के जैसे और लगभग 10-15 ए4 साइज के पन्ने सवेरे कण्ट्रोल का चपरासी दे कर जाने लगा। उन पोजीशन के पेजों का खाका (प्रोफार्मा) या तो मुद्रित होता था या साइक्लोस्टाइल्ड। पर उसमें आंकड़े हाथ से भरे होते थे। आंकड़ों के अलावा मुख्य अनहोनी घटनाओं का विवरण – जिसे अनयूजुअल शीट कहा जाता था, वह रेलवे की कूट भाषा में छोटे छोटे वाक्यों में लिखी होती थी।

मॉर्निग पोजीशन ने रेल परिचालन की जिंदगी व्यवस्थित की थी। उसने आंकड़ों के पिजन-होल्स बनाये थे मस्तिष्क में – जो रोज अपडेट किये जाने की मांग करते थे। अब जिंदगी अलग प्रकार से चल रही है। पर मेण्टल पिजन होल्स बनाने की और उन्हे अपडेट कर जिंदगी बेहतर करनी की जरूरत मुझे महसूस हुई सवेरे उठते समय।

सबसे जूनियर अधिकारी होने के कारण मुझे कार्बन लगा कर बनाई गयी अंतिम प्रति मिलती थी मॉर्निंग पोजीशन की और उस धुंधली पोजीशन को समझना बहुत बड़ा सिरदर्द होता था। मेरा बहुत सा समय न समझ में आये धुंधले आंकड़े या अक्षर पुन: लिखने मेंं बरबाद हुआ करता था।

रेलवे की दैनिक पोजीशन के अनुसार दिनचर्या कैसे चलती थी, कैसे तनाव भरे दिन गुजरते थे और आंकड़े पढ़ने, समझने तथा त्वरित निर्णय लेने की वृत्ति कैसे विकसित हुई, वह अलग कथा है। उसने मेरे जीवन को बहुत गढ़ा-बदला है। पर यहां बात उन मॉर्निग पोजीशन की शीटों भर की कर रहा हूं।

रोज लिखी जाने वाली डायरी। “रोज रात में डायरी लिखने के अलावा होगा यह काम – मॉर्निग पोजीशान के जरीये दिनचर्या को व्यवस्थित करना!”

वह पोजीशन रात्रि शिफ्ट में आये कण्ट्रोलरों/ट्रेन क्लर्कों की टीम बनाती थी। मशीन की तरह वे काम करते थे। अलग अलग जगहों से आंकड़े जुटाना, अलग अलग चौपड़ियोंं(रजिस्टरों) से आंकड़े उठाना, लिखना और उनका जोड़ आदि लगा कर अंतिम आकार देना बहुत ही मशीनी काम होता था; जो वे दक्षता से करते थे। सवेरे पांच साढ़े पांच बजे तक उन्हें वह पोजीशन तैयार करनी होती थी। उसके बाद कण्ट्रोल का चपरासी हम अधिकारियों के घर पर मॉर्निग पोजीशन का बंडल पंहुचाता था। बहुत कुछ अखबार वाले की तरह।

नाइट शिफ्ट में वे कैसे काम करते थे और किस तरह अपनी नींद पर जीत कर वह पोजीशन बनाते थे, उसे देखने के लिये मैंने एक रात उनके साथ गुजारी थी और कण्ट्रोल सेण्टर की वह रात आज भी मुझे स्मरण है। उस रात ने मुझे कण्ट्रोल परिवार का अंतरंग सदस्य बना दिया। वे लोग मेरे आधीन कर्मचारी नहीं वरन सुख दुख के साथी बन गये!

रेल के अधिकारी रेलवे कॉलोनी में रहते थे। सभी दो तीन किलोमीटर के अंदर। सो चपरासी को बहुत दिक्कत नहीं होती थी। कभी कभी ही कोई नया या लापरवाह या रात में लिये अल्कोहल के प्रभाव में कोई चपरासी देरी या घालमेल करता था। पर अधिकांशत: पोजीशन बनाने-बांटने का सिस्टम सुचारू काम करता था। एक ऑर्केस्ट्रा की तरह।

कालांतर में मॉर्निग पोजीशन का आकार और प्रकार बदला। किर्र किर्र आवाज करते डॉटमेट्रिक्स लाइन प्रिन्टर का युग जल्दी ही खत्म हो गया। इंक-जेट और लेसर प्रिण्टर से पोजीशन का स्वरूप बेहतर हुआ। हाथ से भरे शब्द और आंकड़े कम होते गये। पर पोजीशन का कण्ट्रोल सेण्टर में बनना और ‘छपना’ बदस्तूर होता रहा।

जब मैने अपने रेलवे के जूते फाइनल तौर पर टांगे, तब तक मैं मॉर्निग पोजीशन के साथ जिया।

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सन 2008-09 में इलाहाबाद में जब मुझे उत्तर मध्य रेलवे के माल यातायात का मुख्य प्रबंधक बनाया गया, तब मैं रेलवे कॉलोनी की बजाय अपने पिताजी के घर में रहने लगा था। वह घर दफ्तर से बीस किमी दूर, शहर के दूसरे छोर पर था। समस्या यह खड़ी हुई कि मेरी मॉर्निग पोजीशान मेरे पास कैसे पंहुचे? समाधान के रूप मुझे मेरे घर पर एक अलग फोन चैनल, एक लेसर प्रिण्टर और ए4 साइज के कागजों के बण्डल सप्लाई किये गये। कण्ट्रोल के कर्मी मुझे तीस पैंतीस पेज की भारी भरकम पोजीशन फैक्स या ई-मेल करते थे। मैं उसे तुरंत डाउनलोड पर प्रिण्ट और स्टेपल कर अपनी सवेरे की ‘रामायण’ प्रारम्भ करता था। अपने घर में मैं चपरासी, क्लर्क, अटेण्डेण्ट और अफसर – सब था। कभी कभी जब बीएसएनएल की लाइन खराब होती थी तो फैक्स/डाउनलोड/प्रिण्ट होने में एक घण्टे से ज्यादा लग जाता था।

उत्तर मध्य रेलवे के महाप्रबंधक महोदय – जो मेरे शुरुआती दिनों से मेरे मेण्टोर थे, ने मेरी घिसाई से तरस खा कर मुझे एक और बेंग्लो-पीयून देने का प्रस्ताव रखा, पर मैंने उसे स्वीकार नहीं किया। घर वालों के बीच एक और रेल कर्मी घूमे, यह मुझे अपनी प्राइवेसी में अतिक्रमण सा लगा। अफसरी की टीम-टाम पसंद करने वाले मेरे बंधु इस व्यवहार को अजीब मानते होंगे; पर यह मेरे पर्सोना का अंग सदैव रहा है। दफ्तर में भी बहुत से अधिकारियों के साथ फाइलेंं और ब्रीफकेस थामे चपरासी चलते थे, पर मैं अपनी फाइल-ब्रीफकेस खुद उठाने में यकीन करता था। वह तब जब मैं विभागाध्यक्ष बन गया था!

आज सवेरे तीन बजे नींद खुली तो मन में विचार था कि जैसे दिनचर्या रेलवे परिचालन की मॉर्निग पोजीशन के इर्दगिर्द घूमती थी, वैसे ही अब रिटायर्ड जिंदगी को व्यवस्थित करने के लिये मुझे दैनिक या साप्ताहिक पोजीशन बनानी चाहिये। उसमें पांच सात म्यूचुअल फण्ड या स्टॉक्स की पोजीशन हो, दिन भर में पढ़े गये पन्नो का हिसाब हो, लोगों को फोन पर कॉण्टेक्ट करने का लेखा हो, नित्य कितनी साइकिल चलाई और कितना व्यायाम किया वह भी हो। करीब 25-50 आंकड़े युक्त एक पेज की शीट। उस शीट को बनाना और उसमें आंकड़े भरना एक तरीका होगा जिंदगी व्यवस्थित करने का।

मॉर्निग पोजीशन ने रेल परिचालन की जिंदगी व्यवस्थित की थी। उसने आंकड़ों के पिजन-होल्स बनाये थे मस्तिष्क में – जो रोज अपडेट किये जाने की मांग करते थे। अब जिंदगी अलग प्रकार से चल रही है। पर मेण्टल पिजन होल्स बनाने की और उन्हे अपडेट कर जिंदगी बेहतर करनी की जरूरत मुझे महसूस हुई सवेरे उठते समय।

पता नहीं उस तरीके के काम करूंगा या नहीं, पर आज मन बन रहा है कि एक नया रजिस्टर खोला जाये और उसमें नित्य मॉनीटर किये जाने वाले आंकड़ों का एक प्रोफार्मा बनाया जाये। रोज रात में डायरी लिखने के अलावा होगा यह काम – मॉर्निग पोजीशन के जरीये दिनचर्या को व्यवस्थित करने का काम! 😀


विश्व से जुड़े रहने की तलब


सवेरे तीन बजे उठा हूं। उम्र बढ़ने के साथ नींद जल्दी ही खुल जाती है। निपटान के बाद लैपटॉप खोलता हूं। पर इण्टरनेट? बारिश में उसका राउटर काम नहीं कर रहा। तीसरी बत्ती जल ही नहीं रही। रात में तूफान था तो घर के ऊपर एण्टीना से आता इण्टरनेट बंद कर दिया था। अब चालू करने पर बूट ही नहीं हो रहा।

बिना इण्टरनेट के सब सून है। सवेरे साढ़े तीन बजे हैं। इण्टरनेट प्रोवाइडर को फोन कर ठीक करने को कहा भी नहीं जा सकता। टेलीवीजन भी ऑन करना उचित नहीं है। पत्नीजी की नींद में खलल पड़ेगा। लेकिन सवेरे सवेरे – भोर होने के पहले भी – विश्व से जुड़े रहने की तलब का क्या किया जाये?

इंफ्यूजर का प्रयोग कर एक कप चाय बनाई जाती है। यह इनफ्यूजर भी बढ़िया चीज है। ग्रीन चाय के टी-बैग्स की बजाय इसका प्रयोग बहुत किफायती है। चाय का बड़ा मग ले कर बैठता हूं। मोबाइल का हॉटस्पॉट ऑन कर लैपटॉप चलाया जाता है। ई-मेल चेक होती हैं। द हिंदू वाले की लम्बी ई-मेल जिसमेंं कल का खबरों का राउण्ड अप है। साम्यवादी रुंझान का अखबार है पर खबरों का शोर कम है इसमें। व्यर्थ में हीरो-हीरोइनों की चटपटी खबरें नहीं परोसता। सो सब्स्क्राइब कर रखा है।

इंफ्यूजर का प्रयोग कर एक कप चाय बनाई जाती है। यह इनफ्यूजर भी बढ़िया चीज है। ग्रीन चाय के टी-बैग्स की बजाय इसका प्रयोग बहुत किफायती है।

आधा घंटा लैपटॉप पर लगता है। उसके बाद मोबाइल पर सोशल मीडिया खंगालने का अनुष्ठान होना है पर आजकल उसे कम से कम कर दिया है। टैब पर अखबार खंगालने का समय हो गया है। तीन चार अखबार सवेरे साढ़े चार तक आ जाते हैं मैग्ज्टर पर। गांव विक्रमपुर कलाँ, जिला भदोही, उत्तर प्रदेश में बैठे आदमी के लिये मुम्बई, चैन्ने और लंदन की डेटलाइन वाले अखबार!

यह खबर जानने की चाह क्यों है?

एक गांव के उपेक्षित कोने में रह रहा हूं मैं। बारिश हो रही है और रास्ता लगभग अवरुद्ध है। रास्ते मेंं कीचड़ होने के कारण साइकिल ले कर निकलने का मन नहीं है। सवेरे दूध नहीं आ सकता। दूध की जरूरत वैसे भी कम हो गयी है। चाय भी बिना दूध वाली पीने लगे हैं हम। दूध न भी लिया जाये तो काम चल सकता है। सब्जी न भी आये तो काम चल सकता है। पत्नीजी के किचन गार्डन से दो लोगों के काम लायक भिण्डी, बोड़ा, नेनुआँ निकल जा रहा है। आलू, टमाटर घर में है ही।… घर से निकलने की जरूरत नहीं, पर दुनियां में क्या हो रहा है, वह जानना है।

टैब पर अखबार खंगालने का समय हो गया है। तीन चार अखबार सवेरे साढ़े चार तक आ जाते हैं मैग्ज्टर पर।

क्या फर्क पड़ता है कि नीतिश कुमार कौन दाव खेल रहे हैं? राहुल गांधी जी ने आज क्या बकलोलई की है? यूक्रेन ने कितना इलाका छुड़ा लिया है? चीन और भारत के नायक क्या बतियाने वाले हैं? स्वामिनाथन अय्यर मेधा पाटकर की क्या मजम्मत कर रहे हैं आजकल? ये सब नॉन-ईश्यू हैं गांव देहात के एकांत जीवन में। पर इण्टरनेट नहीं चलता तो छटपटाहट होने लगती है। विकल्प के रूप में टीवी ऑन करने की तलब होने लगती है।

इस युग का यही रोचक पक्ष है कि कोने अंतरे में बैठा आदमी भी पूरी दुनियाँ की खोज खबर के लिये दुबरा रहा है। जैसा चीनी कहावत में है कि अभिशाप है रोचक समय में रहना। May you live in interesting times! हम सब विश्व से जुड़े रहने की तलब की रोचकता में अभिशप्त जीव हैं।

इण्टरनेट नहीं चलता तो छटपटाहट होने लगती है। विकल्प के रूप में टीवी ऑन करने की तलब होने लगती है।
स्क्रीनशॉट वैल्यू रिसर्च ऑनलाइन की साइट के पेज – The news is not for you पर एक चित्र का है।

एक चाय और! उसके साथ मैं बार बार सोचता हूं कि इण्टरनेट प्रोवाइडर महोदय कितने बजे उठ जाते होंगे? क्या साढ़े छ बजे उन्हें फोन करना उचित होगा? इण्टरनेट न होने की तड़फड़ाहट! विश्व से जुड़े रहने की अभिशप्तता!


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