कंकही का भविष्य


महान पुरातत्वविद डा. बी. बी. लाल की पुस्तकें पढ़ता हूं तो अपने समय की अनेक वस्तुएं चार–पांच हजार साल पहले से जुड़ी नजर आती हैं। मोहनजोदड़ो काल की महिला की मांग का सिंदूर, बच्चों के खिलौने, दर्पण में निहारती स्त्री, गंधार काल की सुंदरी का केश-विन्यास और कंकही — सब तब भी थे और आज भी हैं।

आज हैं, पर आगे भी रहेंगे?

कंकही आज दिखती है। हाथीदांत या लकड़ी की नहीं, प्लास्टिक की ही सही, पर है तो। पर क्या आज से तीस साल बाद भी वह घरों में दिखेगी?

बदलती तकनीक ने गांवदेहात में ही बहुत कुछ लोप कर दिया है। अब कहीं बैलों से खेती होती दिखती है तो तुरंत जेब पर हाथ जाता है — मोबाइल निकाल कर चित्र ले लिया जाये! क्या पता आगे हल-बैल केवल संग्रहालयों या कैलेंडरों में बचें।

यहां खेतों में ढेरों कुएं हैं जो कभी धान की खेती में पुरवट चलाने के काम आते थे। अब पुरवट लोगों की स्मृति में बचा है। और जिनकी स्मृति में है, वे भी एक-एक कर जा रहे हैं।

आज से तीस साल पहले गया कोई किसान यदि अचानक जीवित हो उठे तो आज की खेती को पहचान ही न पाये। जबकि तीन हजार साल पहले का किसान तीस साल पहले की खेती में अपने को शायद सहज महसूस करता। समय पहले भी बदलता था; पर अब वह दौड़ रहा है।

खैर, कंकही पर लौटा जाये।

कंकही के बहाने भविष्य की चर्चा
कंकही के बहाने भविष्य की चर्चा

मुझे लगता है कि आने वाले समय में वह घरों से धीरे-धीरे गायब हो सकती है। बालों की देखरेख के तरीके बदल रहे हैं। मेडिकेटेड शैम्पू का प्रयोग बढ़ा है। जुएं भले पूरी तरह समाप्त न हों, पर उनका प्रकोप कम होता जायेगा। और जूं से ज्यादा महत्वपूर्ण है वह सामाजिक संसार, जिसमें कंकही का उपयोग होता था।

परिवार छोटे हो रहे हैं। खाली समय कम है। जो समय बचता है, वह नेटफ्लिक्स और मोबाइल की स्क्रीन ले लेती है। महिलाओं और लड़कियों के बाल छोटे हो रहे हैं। स्कूल अधिक स्वच्छ हो रहे हैं। शैम्पू के छोटे शेशे अब गरीब से गरीब की पहुंच में हैं।

धीरे-धीरे जूं निकालना घरेलू सामाजिक क्रिया से बदल कर बाजार आधारित सेवा बन सकता है। समस्या बड़ी हुई तो शायद ब्यूटी पार्लर में “एंटी-लाइस ट्रीटमेंट पैकेज” मिलने लगे।

कंकही का लोप केवल एक उपकरण का लोप नहीं होगा। उसके साथ वह धीमा समय भी जायेगा जिसमें कोई मां, बहन, बेटी या दादी दूसरे के बालों में बैठ कर कंकही चलाती थी, बतकही करती थी, कहानी सुनती-सुनाती थी।

क्या पता शहरों में यह सब शुरू भी हो चुका हो। आखिर मेरी जानकारी समय के साथ उतनी तेजी से अपडेट तो नहीं ही हो रही।

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गांव भर का हाल


कुल बीस मिनट लगते हैं उसे मेरे जोड़ों की मालिश करने में। इस दौरान मैं सामान्यत: टैब पर कोई लेख या अख़बार का सम्पादकीय सुनता रहता हूं। आज टैब पास नहीं था और वह आ गया।

मेरे पास समय था और उसके हाथ, यद्यपि व्यस्त थे, पर बात-चीत तो वह कर ही सकता था। मैंने पूछना शुरू किया। शुरुआत रेलवे स्टेशन से की। 

स्टेशन मास्टर बदल गये हैं। कोई बिहारी नौजवान आया है। शायद ज्यादा दिन न रुके। आजकल लोग स्टेशन की कॉलोनी में रहने की बजाय शहर रह कर मोटर साइकिल से रोज़ आना-जाना बेहतर समझते हैं। सड़कों और हाईवे ने दूरी छोटी कर दी है। स्टेशन के पुराने मकानों में अब शायद आदमी कम, कीड़े-मकोड़े और सांप ज्यादा रहते होंगे।

“नया मास्साब गांव के बड़े लोगों से मिलने-जुलने जाता है?” — मैंने पूछा।

वह हल्का हंसा। “वह जमाना चला गया। तब रेलवे वाले गांव पर निर्भर रहते थे। अब गांव वाले रेलवे पर निर्भर हैं।”

सच ही तो है। प्लेटफार्म गांव का बैकयार्ड बन गया है। कोई वहां सोता है, कोई बच्चों को खेलने छोड़ देता है, कोई शाम की सैर करता है। गांव रेलवे का उपयोग भी करता है, अतिक्रमण भी। और मेरे भीतर का पुराना रेलवे अफसर अब भी कभी-कभी फुंफकार उठता है।

मैंने गांव के लोगों का हाल पूछना शुरू किया — “फलाने कैसे हैं? सुना था खटिया पकड़ लिये थे।”

गांव का हाल
गांव का हाल

“नाहीं, अब ठीक नहीं होंगे। जब से खेत बेचे हैं, तबियत गिरती गई। आदमी खेत बेच दे तो भीतर भीतर टूट जाता है। वैसा ही हुआ है उनके साथ।”

फिर वह गांव के बूढ़ों का ब्यौरा देने लगा। “जेकर देखअ, गोड़-घुटना पकड़ लिहे बा। कोई एक लाठी लेके चलता है, कोई दुनो हाथ में।” किसी की टांग सूज गई है, किसी की कमर झुक गई है। वह हाथों से सूजन का आकार भी बता देता है।

“भगत जी कथा कहते हैं अभी?”

“रोजन्ना। तीस-पैंतीस गदेला इकट्ठा हो जाते हैं।”

“सुनने?”

“नाहीं, प्रसाद खातिर। रोज लाची-दाना बंटता है। अब कह रहे हैं पेड़ा बांटिये।”

उसने आसपास के लगभग तीन दर्जन बच्चों के नाम भी गिना दिये जो कथा से ज्यादा प्रसाद के लालच में नियमित श्रोता हैं। बच्चों के अलावा उम्रदराज — जिनको जरूरत है कथा श्रवण की — वे कन्नी काटते हैं। 

अच्छा ही है। लाची-दाना या पेड़े की आशा में बच्चों को ही सही, कुछ रामायण-पुराण कान में पड़ जाता होगा।

उसका काम खत्म हो गया था। मेरे पास सप्लीमेंट्री प्रश्न अभी बहुत थे। पर अब उसे गमलों में पानी डालना था, आंधी से टूटी डालियां भी शायद छांटनी थीं। काम इंतजार नहीं कर सकता; मेरे प्रश्न कर सकते हैं।

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अगियाबीर की कंकही 


मेरे सामने कंघी के साथ कंकही पड़ी है। कंकही वह साधारण उपकरण है जो बालों से जुएं निकालने के काम आता है। मानव इतिहास में शायद ही कोई समाज रहा हो जहां जुएं न रही हों। जहां जुएं रहीं, वहां उन्हें निकालने के उपाय भी विकसित हुए। तेल लगे बालों को फैलाना और कंकही से बीनना शायद सबसे पुरानी तकनीक रही होगी।

घर की महिलाओं ने मुझे धमकाया कि मैं इस विषय पर न लिखूं और न चित्र पोस्ट करूं। जुएं अस्वच्छता का प्रतीक मानी जाती हैं। पर अगर किसी साधारण वस्तु के पीछे बहुत अलग सी कहानी हो, तो मैं ऐसी धमकी में नहीं आता।

कंकही आज की चीज नहीं है। उसका इतिहास कम से कम चार हजार साल पुराना तो जाता ही है। संभव है उससे भी पुराना हो। मिस्र की ममियों के साथ जो वस्तुएं मिली हैं उनमें कंकही भी है। सरस्वती नदी घाटी सभ्यता की खुदाइयों में भी सघन दांतों वाली कंकहियां मिली हैं।

मुलतानी मिट्टी, मेडिकेटेड साबुन और अब मेडिकर — ये सब बाद के उत्पाद हैं। पर तेल और कंकही वाली पुरानी तकनीक शायद आज भी सबसे भरोसेमंद मानी जाती है।

कंकही का समाजशास्त्र
कंकही का समाजशास्त्र

कंकही मानव के साथ सौंदर्य की आवश्यकता से नहीं, स्वच्छता की जरूरत से जुड़ी रही है। समय के साथ उसे बनाने की सामग्री बदलती रही। पहले वह हड्डी, हाथीदांत या लकड़ी से बनती थी। बीच में धातु की कंकहियों के प्रयोग भी हुए। अब जो मेरे सामने पड़ी है, वह प्लास्टिक की सस्ती और टिकाऊ कंकही है।

अगियाबीर के चाल्कोलिथिक काल की एक कंकही देखने का सौभाग्य मुझे मिला है। डॉ. अशोक सिंह वहां अपनी खुदाई पूरी कर जाने वाले थे। उन्होंने हमें द्वारिकापुर में अपनी साइट के उस कमरे में बुलाया जहां खुदाई में मिली वस्तुएं रखी थीं। अधिकांश वस्तुएं तो हम खुदाई के दौरान देख चुके थे। उनका खनन लगभग हमारे सामने ही हुआ था।

पर एक चीज डॉ. सिंह ने इस तरह निकाल कर दिखाई मानो कोई जादूगर अपने हैट से खरगोश निकाल रहा हो।

वह कंकही थी। हाथीदांत की कंकही। उसके दांत अत्यंत बारीक थे। वह लगभग पूरी थी, पर बीच में कई दांत टूट गये थे — जैसे किसी बूढ़े के कुछ दांत टूट गये हों। और रही भी तो वह तीन हजार साल से अधिक पुरानी।

जो कंकही हम देख रहे थे, वह केवल उपयोग की वस्तु भर नहीं थी। वह उस समय के शिल्प कौशल और सामाजिक प्रतिष्ठा का चिह्न भी थी। उसे देखने का रोमांच मेरी पत्नीजी और मैं अब तक नहीं भूले हैं।

हम महसूस कर रहे थे कि उस समय — हजारों साल पहले — अगियाबीर में विशेष शिल्पकार रहे होंगे, समृद्धि रही होगी, उत्तरापथ और शायद दक्षिणापथ से भी व्यापारिक संपर्क रहे होंगे, और लोगों के पास सामान्य जरूरतों से इतर अतिरिक्त संसाधन भी रहे होंगे। वह किसी मुखिया, व्यापारी या सम्पन्न शिल्पकार परिवार की वस्तु रही होगी। संभव है उपहार या दहेज में दी गई हो।

जूं बीनने का अपना समाजशास्त्र भी रहा होगा। यह महिलाओं की आपसी बतकही, फुर्सत और सानिध्य का समय भी रहा होगा। कंकही सिर्फ औजार नहीं, संस्कृति का प्रतीक भी रही होगी।

भारत के अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग तेल, अलग केश-विन्यास और अलग प्रसाधन रहे होंगे; पर जो चीज सबको जोड़ती रही होगी वह शायद कंकही ही रही। चाहे बंगाल हो, तमिळनाडु हो, राजस्थान हो या बस्तर का आदिवासी इलाका — कंकही नेशनल इंटीग्रेशन का प्रतीक रही होगी!

मेरे ख्याल से यह पढ़ कर पत्नीजी अब यह नहीं कहेंगी — “खबरदार, यह पोस्ट जानी नहीं चाहिये!” 😅🤣

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