रविवार की सुबह


 

बसंत लाल और रामसेवक

गांवदेहात डायरी 

सवेरे साइकिल चला कर लौटा तो रामसेवक आ चुके थे। वे हमारे माली हैं और रविवार को आधा दिन हमारे बगीचे को देते हैं। मैं गेट खोलकर अंदर घुसा तो उन्होंने आगे बढ़कर गेट बंद किया। वे न भी करते तो मुझे खराब न लगता। अब यह अपेक्षा बची नहीं है कि साहब के आने पर कोई गेट खोले या बंद करे।

उसके बाद बसंत लाल आए। वे हमारे धोबी हैं। मेरी पत्नीजी घर भर के कपड़े तो वाशिंग मशीन में धो लेती हैं, पर उनकी इस्त्री के लिए बसंत की सेवाएँ ली जाती हैं। रेट है—पाँच रुपये प्रति कपड़ा।

जब भी इस्त्री के रेट की सोचता हूँ, मुझे अपना बचपन याद आता है। गाँव में तो मैंने कपड़े प्रेस करने जैसी कोई क्रिया देखी ही न थी। छः-सात साल की उम्र तक किसी धोबी से सामना नहीं हुआ था। पर जब मेरे पिताजी हमें लेकर दिल्ली आए, कालकाजी की रिफ्यूजी कॉलोनी में एक कमरा किराये पर लिया, तब वे धोबी के यहाँ इस्त्री कराने के लिए कपड़े देते और लाते थे।

मुझे पहला अनुभव आज भी याद है। सन 1962 था—चीन की लड़ाई के पहले का समय। शाम को दफ्तर से लौटकर पिताजी लॉन्ड्री से कपड़े प्रेस कराकर लाए थे। ढेर सारे कपड़े थे। अम्मा ने पूछा तो बताया—बारह आने लगे।

चूँकि मुझे नहीं मालूम था कि वे इस्त्री कराकर लाए गए हैं, मैंने कल्पना की कि बारह आने में इतने सारे कपड़े मिलते हैं। कितना सस्ता है शहर में रहना!

सात-आठ साल के बच्चे के लिए हर जानकारी—आधी-अधूरी जानकारी—एक तिलिस्म होती है।

आज मैंने रसोई गैस पर दोनों से चर्चा की। बसंत बोले—अब दिक्कत नहीं है। बुक कराने पर मिल जा रही है। लगन-बरात वालों को भी 1800 में मिल जा रही है ब्लैक में। पहले तो कोई तय रेट ही नहीं था—ढाई से साढ़े तीन हजार तक लग रहे थे।

फिर उन्होंने जोड़ा—अब मिल जाए साहेब। बुक करे, लाइन लगावे, पर मिलि जाए। अब ओतना दिक्कत नाहीं बा।

रामसेवक तो अब रसोई गैस के झंझट में पड़ते ही नहीं। उनके यहाँ गैस खत्म है, पर उन्होंने भरवाई नहीं कराई। बुक भी नहीं की। उनके यहाँ तो चूल्हे पर ही काम होता है। गैस चर्चा में उनकी कोई रुचि नहीं थी—कौन लाइन लगाए, गैस की दुकान पर जाए! लकड़ी का चूल्हा ही सबसे सही है। आगे जब सब पहले जैसा हो जाएगा, तब देखा जाएगा। अभी तो गैस को तिलांजलि दे दी है उन्होंने।

आज रामसेवक कोचिया और जीनिया की पौध लेकर आए हैं। वह लगाना है। रात में हल्की बारिश हुई है, तो पानी देने का झंझट नहीं है। मिट्टी भी नम है और मौसम भी ठंडा। अच्छा दिन है रामसेवक के लिए।

छोटी-छोटी बातें, यादें और चर्चा—यही है रविवार की गांवदेहात डायरी।

— ज्ञानदत्त पाण्डेय
विक्रमपुर, भदोही
5 अप्रेल 2026

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सूर्यकुंड से बंजार संगम


सूर्यकुंड से बंजार संगम

नर्मदा दंड परिक्रमा 

मंडला में नर्मदा के दक्षिण तट से प्रेमसागर ने नर्मदा दंड परिक्रमा प्रारम्भ की। शुरुआत सूर्यकुंड से हुई—दक्षिणमुखी हनुमान जी को प्रणाम कर।

सवेरे लगभग दस बजे निकलना हुआ। आज उनके पास कमंडल नहीं था। आगे दो लीटर का कमंडल खरीदना है। सामान फिलहाल अंकित जी के यहाँ रखा है—वे लेकर आ जायेंगे। धीरे-धीरे लोग जुड़ते जायेंगे, ऐसा उनका विश्वास है। नर्मदा माई व्यवस्था करती रहेंगी। प्रेमसागर के जिम्मे बस दंड भरना है।

दंड यात्रा का अर्थ है—बार-बार सड़क पर लेटना, उठना, और आगे बढ़ना। एक किलोमीटर में लगभग 1670 कदम, या 560 दंडवत। बैजनाथधाम की दंड कांवड़ यात्रा का अनुभव उनके पास पहले से है। लेकिन यह यात्रा उससे कहीं बड़ी है। पूरी नर्मदा परिक्रमा दंडवत—लगभग सोलह लाख बार शरीर को धरती पर टिकाना और उठाना।

सोलह लाख—संख्या सुनने में ही भारी लगती है।

आज की दूरी मात्र दो किलोमीटर रही। शुरुआत थी, इसलिए शरीर और मन दोनों को लय पकड़नी है। धीरे-धीरे पाँच किलोमीटर प्रतिदिन का औसत बन जायेगा—ऐसा अनुमान है। कुल मिलाकर डेढ़ साल का समय इस यात्रा में लगेगा।

गर्मी से बचने के लिये सड़क-सड़क चलना है, समय चुनना है, पानी का इंतजाम रखना है। मानसून की चिंता उन्हें नहीं है—बरसात में मौसम ठंडा रहता है, तब दूरी भी ज्यादा तय हो जाती है।

मैं सोचता हूँ—अगर इस यात्रा के साथ लिखना हो, तो क्या लिखा जाये? शायद रास्ते में मिलने वाले लोगों के बारे में। जो सहयोग करते हैं, जो रास्ता दिखाते हैं, जो पानी देते हैं, जो चुपचाप देखते हैं—उनके बारे में।

लगभग पाँच सौ लोगों की कथाएँ—“नर्मदा के लोग”—शायद यही इस यात्रा का असली लेखा-जोखा होगा।

कल से उसी अनुशासन की शुरुआत करूँगा—लोगों को जानने, उनसे बात करने और लिखने का।

आज सूर्यकुंड से बंजार-नर्मदा संगम तक की यात्रा हुई। दो जगह लोगों ने प्रेमसागर को अतिथि की तरह रखा — मंडला में नर्मदा के उत्तर तट पर अंकित जी और उनकी धर्म पत्नी ने और आज सतवार गांव के देवचंद कुशवाहा ने। आज रात में ये दोनो परिवार एक साथ थे प्रेमसागर के साथ। 

अंकित दम्पति और देवचंद कुशवाहा परिवार के साथ रात में 

 
कल से यात्रा के साथ जुड़ेंगे और लोग—और उनकी कहानियाँ।

#NarmadaDandParikrama
4 अप्रेल 2026

नर्मदे हर!


नर्मदा यात्रा का प्रारम्भ


नर्मदा दंड परिक्रमा — प्रेमसागर गुजरे बलिया पेसेंजर से 

PremSagar at Katka
कटका स्टेशन से गुजरते प्रेमसागर

सवेरे फोन आया तो प्रेमसागर की ट्रेन बनारस सिटी में खड़ी थी। उन्होंने बताया कि वे प्रयाग जा रहे हैं, वहां से चित्रकूट जायेंगे। किसी चंदन की लकड़ी का आठ इंच का टुकड़ा ले कर लेकर आगे निकलेंगे—नर्मदा की दंड परिक्रमा के लिये।

मेरे हिसाब से यह शुद्ध हठयोग है। इससे साधक की आत्मिक उन्नति कितनी होती है, वही जाने; पर अगर समाज को यह जताने की भावना होती है—“देखो, कितनी कठिन साधना मैंने सम्पन्न की है”—तो वह अहंकार की ही पोषक होती है। प्रेमसागर में यह संभावना मुझे प्रबल लगती है। पर उससे मुझे क्या?
धर्म में इस तरह के प्रयोगों की परम्परा है।

प्रेमसागर की इस यात्रा के माध्यम से मैं अपनी मानसिक हलचल ही दर्ज करूंगा। उसमें मेरी एक तरह की आर्मचेयर नर्मदा यात्रा होगी—जहां मैं चल नहीं रहा, पर भीतर बहुत कुछ चल रहा है। उससे प्रेमसागर का भला हो या अनभला, उसका आकलन तो वही करेंगे। … जो होगा, देखा जायेगा; लेखन में दर्ज किया जायेगा।

अगर उनकी बलिया–रामबाग पेसेंजर समय पर चलती रहती तो पौने ग्यारह बजे वे कटका स्टेशन पर होते। मैंने पत्नीजी से उनके लिये एक कैसरोल में पूरी–तरकारी बनाकर देने का अनुरोध किया। वह तैयार हो गया, पर ट्रेन लेट होती गई।

जब ट्रेन कटका स्टेशन पर आई तो बारह बज चुके थे। बहुत सालों बाद मैं स्टेशन के प्लेटफॉर्म नम्बर 2 पर गया—जबकि स्टेशन घर से मात्र पांच सौ कदम की दूरी पर है। प्रेमसागर का डिब्बा अंतिम था, तो पूरी लम्बाई चलकर वहां पहुंचा।

दो मिनट ही रुकी होगी गाड़ी। प्रेमसागर बाहर निकल कर दौड़ते हुए मेरे पास आये और चरण स्पर्श किया। भोजन का कैसरोल मेरे ड्राइवर अशोक ने उन्हें थमाया और ट्रेन चल दी। जाती ट्रेन के दरवाजे पर खड़े प्रेमसागर का चित्र मैंने खींचा।

सफेद कपड़ा पहने प्रेमसागर में मेरे प्रति आदर भाव साफ दिख रहा था। आगे की कठिन यात्रा को लेकर कोई तनाव, कोई उहापोह—कुछ भी नहीं। लेशमात्र भी नहीं। उनके गुणसूत्र में यायावरी है। यायावरी उनका ओढ़ना-बिछौना है, उनकी सांसों में बसी हुई है यायावरी। लगता है नर्मदा की दंड परिक्रमा के लिये वे वैसे ही निकले हैं जैसे मैं साइकिल लेकर गंगा किनारे टहलने निकलता हूँ।

पर यायावरी को मैं किसी अद्भुत तपस्या से नहीं जोड़ता। मेरी राय (एक नितांत व्यक्तिगत राय) में वह कठिन जरूर है, उसमें संघर्ष है; पर अंततः वह एक साधारण मानवीय प्रवृत्ति ही है। हर आदमी कुछ न कुछ मात्रा में यायावर है—प्रेमसागर बस थोड़ा ज्यादा है।

दंड यात्रा — जिसमें आदमी खड़ा होता है, बैठ कर लेटता और आगे हाथ फैलाता है, फिर उठ कर खड़ा हो अपनी लम्बाई जितने कदम चल कर वही प्रक्रिया दोहराता है — उसे गहन शारीरिक और मानसिक अनुशासन देती होगी। वह उसे आध्यात्मिक अनुभव भी देती होगी? मैं पक्के से नहीं कह सकता। प्रेमसागर के माध्यम से वह देखने का प्रयास करूंगा।

दंड नर्मदा यात्रा का विवरण लिखने के जरिये मैं प्रेमसागर को महानता के चने के झाड़ पर नहीं चढ़ाऊंगा। वह नर्मदा को समझें तो ठीक; नर्मदा के किनारे-किनारे चलते हुए भी अगर अछूते निकल जायें, तो भी मुझे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। मेरी अपनी मानसिक यात्रा चलती रहनी चाहिये—बस।

शुभकामनाएँ प्रेमसागर को नर्मदा दंड परिक्रमा के लिये।

#NarmadaDandParikrama

— ज्ञानदत्त पाण्डेय
विक्रमपुर, भदोही
28 मार्च 2026

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अपडेट – 
उसके बाद प्रेमसागर का फोन बंद रहा। आज 4 अप्रेल को सवेरे मंडला से फोन आया। चित्रकूट से उन्होने सवा बित्ते की चंदन की लकड़ी ले ली है। आज सवेरे वे नर्मदा स्नान कर, केवल एक धोती के अधोवस्त्र में, कमर पर गमछे का फेंटा लपेटे, एक कमंडल में पीने के लिये जल के साथ दंड परिक्रमा प्रारम्भ करने जा रहे हैं।
शुभकामनायें।  


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