गांवदेहात डायरी

पोर्टिको में चाय-अनुष्ठान का चरित्र अब पक्षियों की संख्या और उनकी प्रजातियों की विविधता के साथ बदल गया है।
अब कौए बढ़ गये हैं—पहले आठ-दस हुआ करते थे, अब दो दर्जन या उससे भी अधिक। मुंडेर या ऊँची जगहों पर बैठे वे पोर्टिको की गतिविधियों पर नजर रखते हैं। फीकी नमकीन का डिब्बा खुलने की आवाज और उसे फेंकने का अंदाज़ पहचानते हैं—और फिर पैराशूट की तरह उतरने लगते हैं।
चर्खियां और गिलहरियां तो दरवाजे और कुर्सियों पर ही नाचती-फुदकती इंतज़ार करती हैं। चाय की ट्रे बाहर निकलते ही ऐसे झपटती हैं मानो हाथ से छीन लेंगी। नमकीन देने में थोड़ी देर हो तो मेज पर चढ़कर हमारे लिये रखे बादाम तक आज़माने लगती हैं।
मैना पोर्टिको के बाहर उचक-उचक कर ताकती रहती है। रॉबिन और बुलबुल तुलसी की झाड़ या लटकते गमलों में बैठी प्रतीक्षा करती हैं।
कुल मिलाकर सौ से अधिक पक्षियों का एक रंगमंच सज जाता है। सब मेरे ऑर्केस्ट्रा के अनुसार व्यवहार करते हैं—सिवाय कौओं के। वे उद्दंड हैं, और अपने बड़े पेट के हिसाब से जितना हो सके हड़प लेने में विश्वास रखते हैं।
सबके इलाके बँटे हुए हैं—कौओं के लिये पोर्टिको के बाहर फेंका जाता है, चर्खियों के लिये आसपास, रॉबिन और बुलबुल के लिये दाएँ-बाएँ थोड़ी दूरी पर। वे ज्यादा पास नहीं आतीं। मैना के लिये तुलसी के पास जगह है—जहाँ उसे कौओं से थोड़ी आड़ मिलती है।
पर कौए—यदि उन्हें नियंत्रित न किया जाये—तो सबका हिस्सा जल्दी-जल्दी गटक सकते हैं। उनसे निपटने के लिये सागौन की डेढ़ मीटर लंबी एक डंडी पास रखनी पड़ती है।
यही डंडी मेरी पक्षी-सभा का राजदंड है—सेंगोल।
इसे रखने की जगह भी तय है—दरवाजे के पास गमले के स्टैंड में एक छल्ला है, वहीं टिका रहता है। चाय की ट्रे के साथ सेंगोल भी अपनी जगह पर स्थापित हो जाता है।
गिलहरियों और अन्य पक्षियों को उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। पर कौए पहचानते हैं। सेंगोल के किनारे पर हाथ जाते ही सतर्क हो जाते हैं। ज़रा-सा उठाते ही सब भरभरा कर उड़ते हैं और मुंडेर की सुरक्षित जगह पर जा बैठते हैं।
जैसे ही सेंगोल अपनी जगह लौटता है, कौए भी उतर आते हैं।
आधे घंटे के इस चाय-नमकीन अनुष्ठान में तीन-चार बार सेंगोल को हाथ लगाना पड़ता है। अंततः सब जीव अपने-अपने हिस्से का दाना पाकर संतुष्ट चले जाते हैं।
अब सेंगोल—यह राजदंड—अनिवार्य हो गया है।
बाकी, कोई तमिल सज्जन अगर इस टेढ़ी-मेढ़ी सागौन की लकड़ी को “सेंगोल” कहते सुन लें
तो बेहोश ही हो जाएँ! 😂
— ज्ञानदत्त पाण्डेय
विक्रमपुर, भदोही
22 मार्च 2026
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पोस्ट पढ़ कर नीलकंठ चिंतामणि की सोच —
राजदंड हमेशा भारी, अलंकृत और राजमहलों में रखा हुआ नहीं होता। कई बार वह सागौन की एक टेढ़ी-मेढ़ी डंडी होता है, जो बस इतना तय करता है कि कौन कितना ले और कब रुके।
शासन का असली काम दंड देना नहीं—संतुलन बनाये रखना है।
जहाँ संतुलन नहीं, वहाँ ताकतवर सब हड़प लेते हैं—और बाकी केवल देखते रह जाते हैं।
यह छोटा-सा सेंगोल किसी संविधान में दर्ज नहीं है, पर आधे घंटे के उस अनुष्ठान में व्यवस्था उसी से चलती है।और शायद हर घर, हर समाज को—अपने-अपने ऐसे सेंगोल की ज़रूरत होती है।
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