प्रेम पाण्डेय, कांवरिया का फोन आया


आज दोपहर में उनका फोन लगा पर कोई उत्तर नहीं मिला। मैंने दो बार कोशिश की। अचानक उनका फोन आया। बताया कि वे बनारस में ही विश्वनाथ मंदिर के पास किसी गेस्ट हाउस में हैं। जब मेरा फोन आ रहा था, तो वे थक कर सो रहे थे।

कन्हैयालाल और फेरीवालों का डेरा


वे सब कानपुर के पास एक ही क्षेत्र से हैं। सामुहिक रूप से एक दूसरे के सुख दुख में साथ रहते हैं। शाम को भोजन सामुहिक बनता है। उसके बाद बोल-बतकही होती है। कुछ मनोरंजन होता है। फिर जिसको जहां जगह मिले, वहां वह सो जाता है।

पुच्चू


दुनियां में करोड़ों कमाने वाले हैं, पर किसी की सहायता के लिये दस रुपया नहीं निकालते। यहां पुच्चू अपना सब कुछ देने में एक क्षण भी पुनर्विचार नहीं करता।

कोविड19 और रोजमर्रा की जिंदगी – रीता पाण्डेय की अतिथि पोस्ट


आखिर, खाने कमाने के लिये कोई व्यक्ति अपने घर से दूर नहीं जाना चाहता। अपने परिवार के साथ रहना चाहता है। भले ही पगार थोड़ी कम मिले।

कुछ (नये) लोग


कल शनिवार 14 दिसम्बर को मैं वाराणसी में था। सवेरे स्टेशन पर अपने डिब्बे के बाहर दृष्य साफ़ था। कोई कोहरा नहीं। सूरज निकल चुके थे। स्टेशन पर गतिविधियां सामान्य थीं। कबूतर दाना बीन रहे थे। अभी उनके लिये यहां बैठने घूमने का स्पेस था। दिन में ट्रेनों की आवाजाही और यात्रियों की अधिकता केContinue reading “कुछ (नये) लोग”