दार्शनिक, कारोबारी या बाहुबली #गांवकाचिठ्ठा

उसने उत्तर देने के पहले मुंह से पीक थूंकी। शायद मुंह में सुरती थी या पान। फिर उत्तर दिया – “सोचना क्या है। देख रहे हैं, काम करने वाले आ जाएं, नावें तैयार हो कर उस पार रवाना हो जाएं। आज काम शुरू हो जाए। बस।


वह पत्थर की बेंच पर पेड़ के नीचे बैठा था। बगल में एक पुरानी साइकिल। पेड़ के तने से उंठगा कर खड़ी कर रखी थी। गंगा किनारे नावों और उनके आसपास की गतिविधि निहार रहा था। अकेला था। पूरा दृश्य कुछ ऐसा था सवेरे साढ़े पांच बजे कि लगा कोई अपने विचारों में खोया या सवेरे की शांत छटा निहारता दार्शनिक टाइप जीव हो। मुझे लगा कि ऐसा बहुत सम्भव है। गंगा विचारों में विचरण करने वालों को आकर्षित अवश्य करती हैं।

वह बेंच पर बैठा गंगा का दृश्य निहार रहा था

मैंने उसके एक दो चित्र लिए, इससे पहले कि वह मुझे देख अपनी मुद्रा बदले। उसके बाद उन सज्जन से बात की – कैसा लगता है गंगा का यह दृश्य? क्या सोचते हैं?

Continue reading “दार्शनिक, कारोबारी या बाहुबली #गांवकाचिठ्ठा”

राजेश सरोज – जल्दी ही बम्बई लौट जाऊंगा #गांवकाचिठ्ठा

वह लॉक डाउन के पहले ही गांव आया था, उसके बाद लॉक डाउन हो गया और वापस नहीं जा सका। अब मौका लगते ही फिर वापस जाएगा। वहां का काम राजेश को पसंद है।


कुछ दिन पहले राजेश सरोज का जिक्र था ब्लॉग पोस्ट में –

कल जब मैं द्वारिकापुर घाट पर टहल रहा था, तो वह स्वत: मेरे पास आ कर खड़ा हो गया। मुझसे बात करना चाहता है, जब भी वह दिखाई पड़ता है। कभी कभी वह बम्बई से भी फोन किया करता था। अपने परिवेश से अलग व्यक्ति के साथ जुड़ना शायद उसे अच्छा लगता है।

Continue reading “राजेश सरोज – जल्दी ही बम्बई लौट जाऊंगा #गांवकाचिठ्ठा”

Ghurahu, the tailor in village

I’m searching for any other work which could be given to Ghurahu. He may need support at least in this month, till the usual customers come back in sufficient numbers.


He may be around 45-50 years old. His children are making or trading in ornaments in villages nearby; a traditional work as per their caste. It is a bit strange that even a very small village has a saraf (सराफ – person dealing in ornaments). Very poor people also have some ornaments, may be of silver or other Inferior metal.

But Ghurahu is tailor, not a saraf. He sits in front of a shop in Mahrajganj town bazar, with his feet operated sewing machine and a chair. Must be getting reasonable work in normal days. During marriage season, he becomes very busy. It is very difficult for him to meet delivery deadlines in those days.

Ghurahu, the tailor.
Continue reading “Ghurahu, the tailor in village”

कैंची सीखना #गांवकाचिठ्ठा

भारत बहुत बदला है, पर अभी भी किसी न किसी मायने में जस का तस है। भारत और इण्डिया के बीच की खाई बहुत बढ़ी है। वह कैंची सीखती साइकिल से नहीं नापी जा सकती।


बच्चों के लिये नयी नयी तरह की साइकिलें आ गयी हैं। इक्कीसवीं सदी में बचपन गुजारने वाली शहराती नयी पीढ़ी ने गैजेट्स में उपभोक्ता की महत्ता का विस्फोट देखा है। तीन साल के बच्चे को दो पहिये वाली साइकिल ले कर दी जाती है। छोटे पहिये की उस साइकिल में पीछे दोनो ओर अतिरिक्त दो छोटे पहिये जुड़े होते हैं जिससे बच्चा चलाना भी सीख सके और उसे गिरने से बचाने को टेका भी मिलता रहे।

मेरी पोती चिन्ना पांड़े ने वैसी ही साइकिल से शुरुआत की है। अब उसे कुछ बड़ी साइकिल ले कर देनी है।शायद उसके अगले जम्नदिन पर। बच्चा जब तक बड़ा होता है, तीन चार साइकिल बदल चुका होता है। यह भी हो सकता है कि वह साइकिल चलाना सीखने के पहले स्कूटर या मॉपेड/मोटर साइकिल चलाना सीख जाये।

नये जमाने की साइकिलें। मेरी पोती की अगली साइकिल कुछ ऐसी होगी।
Continue reading “कैंची सीखना #गांवकाचिठ्ठा”

Babu the knife sharpener


He is regular visitor. Comes to our home after a few months. He is Babu, from Babusarai – a village 3-4 kms away. People in villages usually get their agricultural implements sharpened from his bicycle fitted sharpener.

In our case it’s usually the kitchen knives and few odd khurpis (खुरपी).

Babu from Babusarai
Continue reading “Babu the knife sharpener”

मुसहर बस्ती के चित्र #गांवकाचिठ्ठा

करीब आठ-दस परिवार हैं। उनके प्रति हिकारत, उपेक्षा, शंका और उदासीनता का स्थायी भाव लोगों में है। उसमें कमी नहीं आयी है।


करुणा जब ज्यादा जोर मारती है तो मैं मुसहर बस्ती की ओर निकल लेता हूं। उनकी छोटी जरूरतें – कपड़ा, सर्दी में कम्बल, खाने को कुछ सामग्री – हम कुछ पूरी कर पाते हैं। वे भी लेने को तैयार रहते हैं। वहां पंहुचते ही पहले तो तोलते से दीखते हैं कि कोई उन्हें तंग करने तो नहीं चला आया। आश्वस्त होने पर आसपास आने लगते हैं।

करीब आठ-दस परिवार हैं। चेहरे मोहरे की बनावट से यह स्पष्ट लगता है कि वे पूरी तरह बनवासी नहीं रहे। आसपास की जनसंख्या ने उन्हे अवैध तरीके से ही सही, अपने गुणसूत्र दे दिये हैं। निशाचरीय सम्बंध तो बनाये होंगे, पर उनके प्रति हिकारत, उपेक्षा, शंका और उदासीनता का जो स्थायी भाव लोगों में है, उसमें कमी नहीं आयी है।

मुसहर बस्ती
Continue reading “मुसहर बस्ती के चित्र #गांवकाचिठ्ठा”