नजीर मियाँ की खिचड़ी – रीपोस्ट

नजीर मियां का पूरा परिवार आम की रखवाली में लगा रहता था। जब आम का सीजन नहीं होता था तब वह साड़ियां बुनता था। औरतें धागे रंगती, सुखाती और चरखी पर चढ़ाती थीं। फिर आदमी लोग उसे करघे पर चढ़ा कर ताना-बाना तैयार करते।


यह मेरी पुरानी पोस्ट है। मेरे पति ने छब्बीस जनवरी 2008 को पोस्ट की थी। तब यह ब्लॉग ब्लॉगस्पॉट पर था। वे इसे अतिथि पोस्ट के रूप में टाइप किया और पब्लिश किया करते थे। ब्लॉग पर मेरी यह पहली पोस्ट है।

तब से तेरह साल होने को आये। और यह पोस्ट तो मेरी बचपन की यादों की है। जब इसे लिखा, तब से भी चार-पांच दशक पहले की बात है नजीर मियाँ की खिचड़ी चोरी-छिपे खाई थी!


मेरे पति को खिचड़ी बहुत पसंद है। या यूं कहें तो उन्हें खिचड़ी की चर्चा करना बहुत अच्छा लगता है। ऐसी किसी चर्चा पर मुझे नजीर मियां की खिचड़ी की याद आ गयी और उससे जुड़ी बचपन की बहुत सी यादें बादलों की तरह मन में घुमड़ने लगीं।

नजीर मियां मेरे ननिहाल गंगापुर में एक जुलाहा परिवार के थे। गंगापुर बनारस से १५ किलोमीटर दूर इलाहाबाद की ओर जीटी रोड से थोड़ा हट कर है। मेरा बचपन अपनी नानी के साथ बीता है। सो मैं गंगापुर में बहुत रहती थी।

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नजीर मियां मेरे नाना के लंगड़ा आम के बाग का सीजन का ठेका लेते थे। उनका पूरा परिवार आम की रखवाली के काम में लगा रहता था। जब आम का सीजन नहीं होता था तब नजीर मियां और उनका परिवार साड़ियां बुनता था। औरतें धागे रंगती, सुखाती और चरखी पर चढ़ाती थीं। फिर आदमी लोग उसे करघे पर चढ़ा कर ताना-बाना तैयार करते। बच्चे उनकी मदद करते। चार-पांच करघों पर एक साथ साड़ियां बुनते देखना और करघों की खटर-पटर संगीतमय लगती थी।

जब आम के बौर लगते थे तो बाग का सौदा तय होता था। लगभग ४०० रुपये और दो सैंकड़ा आम पर। नजीर मियां का पूरा परिवार रात में बाग में सोता था। औरतें रात का खाना बना कर घर से ले जाती थीं। उसमें होती थीं मोटी-मोटी रोटियां, लहसुन मिर्च की चटनी और मिर्च मसालों से लाल हुई आलू की सब्जी। दिन में बाग में रहने वाले एक दो आदमी वहीं ईटों का चूल्हा बना, सूखी लकड़ियां बीन, मिट्टी की हांड़ी में खिचड़ी बना लेते थे।

खिचड़ी की सुगंध हम बच्चों को चूल्हे तक खींच लाती थी। पत्तल पर मुन्नू मामा तो अक्सर खिचड़ी खाया करता था। एक आध बार मैने भी स्वाद लिया। पर मुझे सख्त हिदायत के साथ खिचड़ी मिलती थी कि यह दारोगाजी (मेरे नाना – जो पुलीस में अफसर हो गये थे, पर दारोगा ही कहे जाते थे) को पता नहीं चलना चाहिये।

और कभी पता चलता भी नहीं दारोगा जी को; पर एक दिन मेरी और मुन्नू में लड़ाई हो गयी। मुन्नू के मैने बड़े ढ़ेले से मार दिया। घर लौटने पर मुन्नू ने मेरी नानी से शिकायत कर दी। मारने की नहीं। इस बात की कि “चाची बेबी ने नजीर मियां की हंडिया से खिचड़ी खाई है”।

बाप रे बाप! कोहराम मच गया। नानी ने मेरी चोटी पकड़ कर खींचा। दो झापड़ लगाये। और खींच कर आंगन में गड़े हैण्ड पम्प के नीचे मुझे पटक दिया। धाड़ धाड़ कर हैण्ड पम्प चलाने लगीं मुझे नहला कर शुद्ध करने के लिये। चारों तरफ से कई आवाजें आने लगीं – “ननिहाल मे रह कर लड़की बह गयी है। नाक कटवा देगी। इसको तो वापस इसके मां के हवाले कर दो। नहीं तो ससुराल जाने लायक भी नहीं रहेगी!” दूसरी तरफ एक और तूफान खड़ा हुआ। बड़ी नानी मुन्नू मामा को ड़ण्डे से पीटने लगीं – “ये करियवा ही ले कर गया होगा। कलुआ खुद तो आवारा है ही, सब को आवारा कर देगा।“ मुन्नू मामा के दहाड़ दहाड़ कर रोने से घर के बाहर से नानाजी लोग अंदर आये और बीच बचाव किया। पुरुषों के अनुसार तो यह अपराध था ही नहीं।

नजीर के पिताजी, हाजी मियां सम्मानित व्यक्ति थे। हमारे घर में उठना-बैठना था। रात का तूफान रात में ही समाप्त हो गया।

मेरे पास लूडो था और मुन्नू के पास कंचे। सो दोस्ती होने में देर नहीं लगी। अगले ही दिन शाम को हम फिर नजीर मियां के पास बाग में थे। उनकी मोटी रोटी और लहसुन की चटनी की ओर ललचाती नजरों से देखते। … क्या बतायें नजीर मियां की खिचड़ी और लहसुन की चटनी की गंध तो अब भी मन में बसी है।

नजीर मियां ने शिफ़ान की दो साड़ियां मुझे बुन कर दी थीं। उसमें से एक मेरी लड़की वाणी उड़ा ले गयी। एक मेरे पास है। नजीर मियां इस दुनियां में नहीं हैं; पर उनकी बुनी साड़ी और खिचड़ी का स्वाद मन में जरूर है।


मेरे पति (ज्ञान दत्त पाण्डेय) ने सन 2008 में पोस्ट के फुट नोट में लिखा था –

गांवों में धर्म-जातिगत दीवारें थी और हैं। पर व्यक्ति की अपनी सज्जनता सब पर भारी पड़ती है। और बच्चे तो यह भेद मानते नहीं; अगर उन्हें बारबार मार-पीट कर फण्डामेण्टलिस्ट न बनाया जाये। अच्छा था कि रीता के नाना लोगों में धर्म भेद कट्टर नहीं था। तब से अब तक और भी परिवर्तन हुआ होगा।

हां, अब मुन्नू मामा भी नहीं हैं। दो साल पहले उनका असामयिक निधन हो गया था। रीता तब बहुत दुखी थी। इस पोस्ट से पता चलता है कि कितना गहरा रहा होगा वह दुख।


मोहनलाल, सूप वाला

गजब के आदमी मिले सवेरे सवेरे मोहनलाल। आशा और आत्मविश्वास से परिपूर्ण। कर्मठता और जिन्दगी के प्रति सकारात्मक नजरिये से युक्त। इस इलाके के निठल्ले नौजवानों के लिये एक मिसाल।


शंकर जी के मन्दिर के पास जमीन पर बैठा वह व्यक्ति बड़ी दक्षता से सूप बना रहा था। पास में उसकी साइकिल पर सूप की चपटी चटाइयाँ कैरियर पर जमाई हुई थीं। उन्ही में से कुछ वह जमीन पर उतार कर मोड कर और तांत से सही जगह बाध कर सूप का आकार दे रहा था।

मैने अपनी साइकिल रोक दी। सवेरे की साइकिल-सैर में साइकिल चलाना महत्वपूर्ण है, पर उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है आस-पास का गांव-परिवेश देखना समझना। यह सूप बनाने वाला व्यक्ति मेरे लिये अनूठा था।

mohanlal soop wala
सूप बनाने वाला, मोहनलाल

नाम बताया मोहन लाल। यहीं दो किलोमीटर दूर भोगांव का रहने वाला। घूम घूम कर सूप बेचता है। कल दीपावली के बिहान में भोर में लोग पुराने सूप को फटफटा कर घूरे पर फैंकते हैँ। “दलिद्दर खेदने (दारिद्र्य भगाने) को। उसके साथ ही ग्रामीण लोगों को नये सूप की दरकार होती है। मोहनलाल उसी के लिये सूप ले कर निकले हैं।

मोहनलाल की साइकिल पर तरतीबवार जमा थी सूप की बुनी हुई दफ्तियाँ।

कैसे बनाते हो?

“सरपत की डण्डी यहां नहीं मिलती। कानपुर से आती है। उन्हे बान्धने के लिये तांत बनारस से। किनारे पर बांस की पतली छीलन लगती है – वह यहीं गांव-देहात में मिल जाता है। घर में औरतें सूप की दफ्ती बुनती हैं। घूम घूम कर बेचते समय मैं उनसे सूप बनाता जाता हूं – जैसे अब बना रहा हूं।”

आमदनी कैसी होती है?

“बारहों महीना बिकता है। लोग मुझे सूप वाले के नाम से ही जानते हैं। लड़के बच्चे तो यह काम किये नहीं। बम्बई चले गये। पर मुझे तो यही काम पसन्द है। इसी के बल पर अपना खर्चा चलाता हूं। बचत से एक बीघा जमीन भी खरीद ली है। दो बिस्सा में घर है। मेरे गांव आइये। पक्का मकान है। दरवाजे पर चांपाकल है। यही नहीं, बचत से तीन लाख की डिपाजिट मेहरारू के नाम जमा कर ली है। उतनी ही मेरे नाम भी है। लोग पैसा ठीक से कमाते नहीँ। जो कमाते हैँ वह नशा-पत्ती में उड़ा देते हैं। ठीक से चलें और मेहनत करें तो यह सूप बेचने का काम भी खराब नहीँ।”


यह पोस्ट फेसबुक नोट्स में अक्तूबर 2017 में पब्लिश की थी। अब मुझे पता चल रहा है कि अक्तूबर 2020 से फेसबुक ने नोट्स को दिखाना बंद कर दिया है। यह बहुत ही दुखद है। मुझे वहां से निकाल कर यह ब्लॉग पर सहेजनी पड़ रही है पोस्ट। 😦


गजब के आदमी मिले सवेरे सवेरे मोहनलाल। आशा और आत्मविश्वास से परिपूर्ण। कर्मठता और जिन्दगी के प्रति सकारात्मक नजरिये से युक्त। इस इलाके के निठल्ले नौजवानों के लिये एक मिसाल।

मैने कहा – जरूर आऊंगा उनके गांव उनका घर देखने। यह भी देखने कि सूप की दफ्ती कैसे बनाती हैं महिलायें।

मोहनलाल बोले – “जरूर। अभी कार्तिक पुन्नवासी को मेरे गांव में बहुत बड़ा मेला लगता है। तब आइयेगा।”

मोहनलाल ने मेरा सूप मेरी साइकिल के करीयर पर ठीक से बांध दिया तांत के धागे से।

एक सूप की कीमत पूंछी मैने। सत्तर रुपये। एक सूप उनसे खरीद लिया। ले जाने के लिये तांत से वह सूप मेरी साइकिल के कैरियर से बान्ध भी दिया मोहनलाल ने। बोले – ठीक है, सही से चला जायेगा आपके घर तक।

मोहनलाल से मिल कर आज का मेरा दिन बन गया। एक आशावादी और कर्मठ व्यक्ति से मुलाकात पर कौन न प्रसन्न होगा। आपको मोहनलाल मिलें तो आप भी होंगे!

मोहनलाल, सूपवाला।

दूसरी पारी की शुरुआत – पहला दिन

मजेदार बात यह रही कि मेरे फोन नम्बर पर दो तीन अधिकारियों-कर्मचारियों के फोन भी आये। वे मुझे माल गाड़ी की रनिंग पोजीशन बता रहे थे। मैं तो रेलवे को छोड़ रहा था, पर वे मुझे छोड़ना नहीं चाह रहे थे।


दूसरी पारी का पहला दिन यानी एक अक्तूबर 2015।

मैं 30 सितम्बर 2015 को रिटायर हुआ। उस समय मैं पूर्वोत्तर रेलवे का परिचालन प्रमुख था। रिटायरमेण्ट से एक दो साल पहले से शुभचिंतकों के सुझाव थे कि मैं अपने जूते न उतारूं। साठ साल की उम्र घर बैठने की नहीं होती। उसके बाद भी किसी न किसी हैसियत में काम करना चाहिये। पर मैं सोचता था, रोज रोज खटने का काम बहुत हुआ। मेरा शरीर और उससे ज्यादा मेरा मन दिनचर्या में व्यापक बदलाव चाहता था। शायद आराम भी।

मैं मूलत:, अपनी प्रवृत्ति के हिसाब से, एक छोटी जगह का आदमी हूं। मेरा जन्म गांव में हुआ और छोटे शहरों, कस्बों में रहना मुझे भाया। मेरे पिताजी दिल्ली, राजस्थान में जोधपुर और नसीराबाद (अजमेर के पास छावनी), पंजाब में ऊंची बस्सी (पश्चिमी-उत्तरी पंजाब की एक गांव में छावनी), और चण्डीगढ़ में रहे। जोधपुर, नसीराबाद और ऊंची बस्सी मुझे छोटी जगहों के अहसास देते रहे। फिर मेरी उच्च शिक्षा पिलानी में हुई। बिरला तकनीकी और विज्ञान संथान (BITS -बितविस) भी कोई मैट्रो में नहीं था; पिलानी गांव ही था। रेल की नौकरी में भी बड़ा समय मैंने रतलाम जैसे छोटे शहर में काटा। सत्तरह से अधिक साल वहां रहा। इसके अलावा कोटा या उदयपुर में भी रहा पर वहां भी अपने रेल परिसर में ही रहा, शहर बहुत कम देखा। रेल परिसर एक छोटा शहर या गांव ही होता है।

मुझे फुसला कर 1994 में बम्बई पोस्ट किया गया था। चर्चगेट में अच्छा दफ्तर था। महत्वपूर्ण पद और कोलाबा (बधवार पार्क) में एक फ्लैट का अलॉटमेंट। फ्लैट की चाभी मेरे जेब में थी और चर्चगेट पर दो कमरे के रेस्ट हाउस में रह रहा था। ऐसी पोस्टिंग पाने की कल्पना से ही बहुत से अधिकारियों का मन-मयूर नाच सकता है। पर मुझे बम्बई रास नहीं आयी। मैंने कोटा रेल मंडल में वरिष्ठ परिचालन प्रबंधक में पोस्टिंग जुगाड़ी और महानगर को नमस्कार कर पोस्टिंग ऑर्डर हाथ में आते ही, दो घण्टे में वह पद और वह स्थान त्याग दिया। बमुश्किल दो महीने रहा बम्बई में!

अधिकारियों ने कहा कि मुझसे बड़ा बेवकूफ़ नहीं हो सकता। पर बड़े शहर का मुझे फोबिया था। और इस तरह बड़े शहर के फोबिया ने कई बार लोगों को मुझे बेवकूफ़ कहने का अवसर प्रदान किया।

शायद यह शहरों का फोबिया ही था कि रिटायरमेण्ट के पहले मैंने गांव में बसने की तैयारी शुरू कर दी । एक साल पहले से साइकिल खरीद कर चलाने का अभ्यास किया। अपनी ससुराल के गांव में बसने का निर्णय लिया – वह जगह नेशनल हाईवे और रेलवे स्टेशन के पास थी। वहां रिटायरमेण्ट से एक साल पहले जमीन खरीदी और अपने साले साहब (भूपेंद्र कुमार दुबे) को मकान का नक्शा और आर्थिक रिसोर्स दिये। सब कुछ इस तरह से सिन्क्रोनाइज किया कि रिटायरमेण्ट के समय मकान बन कर तैयार रहे उसमें शिफ्ट होने के लिये।

तीस सितम्बर को मैं गोरखपुर से सेवा निवृत्त हुआ और अगले ही दिन चौरी चौरा एक्स्प्रेस से माधोसिंह स्टेशन पर पूरे परिवार और सामान के साथ पंहुच गया। गोरखपुर शहर से मुझे रेल के इतर लगाव नहीं था और रेल की नौकरी खत्म तो लगाव का निमित्त भी जाता रहा। गांव मुझे खींच रहा था। सो वहां एक भी दिन वहां रुका नहीं।

आत्मकथ्य, इसी पोस्ट से

पर वैसा हुआ नहीं। लगभग एक महीने की देरी हुई मकान बन कर तैयार होने में। ऐसे में मेरे वाराणसी मण्डल के मित्र प्रवीण पाण्डेय की सहायता से मुझे गांव के पास के बड़े रेलवे स्टेशन माधोसिंह स्थित रेलवे रेस्ट हाउस में रहने की अनुमति मिल गयी।

माधोसिंघ स्टेशन, सवेरे के धुंधलके में। दो अक्तूबर 2015 का चित्र।

तीस सितम्बर को मैं गोरखपुर से सेवा निवृत्त हुआ और अगले ही दिन चौरी चौरा एक्स्प्रेस से माधोसिंह स्टेशन पर पूरे परिवार और सामान के साथ पंहुच गया। गोरखपुर शहर से मुझे रेल के इतर लगाव नहीं था और रेल की नौकरी खत्म तो लगाव का निमित्त भी जाता रहा। गांव मुझे खींच रहा था। सो वहां एक भी दिन वहां रुका नहीं। ट्रेन में ही एक पार्सल वान लगा था, जिसमें मेरा घर का सारा सामान था। एक साथी अधिकारी धीरेन्द्र कुमार जी इलाहाबाद निरीक्षण पर जा रहे थे, तो उन्ही के सैलून में मुझे और मेरे परिवार (मेरी पत्नीजी और पिताजी) को जगह मिल गयी थी। खण्ड के यातायात निरीक्षक भोला राम जी ने हमारी अगवानी की। सामान उतरवाया। गाड़ी उस प्रक्रिया में आधा घण्टा खड़ी रही। पर ट्रेन समय से पहले पंहुच गयी थी माधोसिंह तो उसने यह टाइम कवर कर लिया और इलाहाबाद समय पर ही पंहुची।

मेरे साथ रेलवे के निरीक्षण यान में यात्रा कर रहे मनीश कुमार (जो मेरे लगभग पौने दो साल से सहायक और अटैच्ड निरीक्षक थे) तथा अपने चपरासी राम मिलन से ट्रेन के माधोसिंह से रवाना होते समय गले मिला तो लगा कि एक लम्बा युग समाप्त हो गया!

साफ सफाई की जा चुकी थी माधोसिंघ रेस्टटहाउस की। पहली ही नजर में वह स्थान मुझे बहुत भा गया। स्टेशन प्लेटफार्म से रेस्ट हाउस तक छोटी झाड़ियां थीं और उनके बीच पतली पगडण्डी से गुजरते समय बड़ी मधुर सुगंध आ रही थी। पौधों को ध्यान से देखा तो उनमें पाया कि वन तुलसी बहुतायत से थी। अपनी साइकिल निकाल कर माधोसिंह की रेलवे कालोनी का एक चक्कर भी लगा आया। कालोनी भी छोटी और सुंदर लगी। सड़क और पगडण्डियां साफ थीं। बरसात खत्म होने के कारण झाड़ियां – मुख्यत: वनतुलसी और उसके जैसी एक और झाड़ी जिसमें गंध नहीं थी, पर मंजरी वाले फूल थे, बहुतायत से थीं। लोगों ने अपने अपने क्वार्टर के आसपास सब्जियां उगा रखी थीं।

इन सब के बीच मुझे अगले दो तीन सप्ताह गुजारने थे।

रेस्ट हाउस के दो कमरों में हमारा सामान व्यवस्थित किया गया। भोला राम जी ने एक गैस सिलिण्डर का इंतजाम कर दिया था। सो किचन भी व्यवस्थित हो गयी। घर व्यवस्थित करने के लिये मेरा पुराना बंगलो पियुन मोनू (जो अब वाराणसी मण्डल में प्रवीण पाण्डेय के यहां पदस्थापित था) हमारी सहायता कर रहा था। रिटायरमेण्ट, रेलवे स्टेशन की सुविधा, रेस्ट हाउस और पुराना बंगलो पियून – कुल मिला कर रिटायरमेण्ट के अगले दिन बहुत अधिक डिसकण्टीन्यूटी नहीं थी। मजेदार बात यह रही कि मेरे फोन नम्बर पर दो तीन अधिकारियों-कर्मचारियों के फोन भी आये। वे मुझे (जैसा कल तक बताया करते थे) माल गाड़ी की रनिंग पोजीशन और सवारी गाड़ियों की पंक्चुअलिटी बता रहे थे। मैं तो रेलवे को छोड़ रहा था, पर वे मुझे छोड़ना नहीं चाह रहे थे। एक तरह से यह अच्छा लगा; पर इतना स्पष्ट था कि रेलवे के रूटीन और कम्फर्ट जोन से जितना जल्दी मैं अपने को मुक्त कर लूं; उतना बेहतर होगा।

सुबह शाम सुहावनी थी, पर दिन में गर्मी हो गयी। कूलर का इंतजाम था। बिजली की सप्लाई अनियमित थी तो उसके बैक अप के लिये स्टेशन मास्टर सतीश जी स्टेशन का जेनरेटर चलवा रहे थे। मेरे पिताजी को कुछ अटपटा सा लग रहा था नयी जगह पर। लेकिन वे तेजी से अपने को व्यवस्थित कर रहे थे।

दूसरी पारी का पहला दिन अच्छा ही रहा।


धूप सेवन और चोर गिलहरियों की संगत

सागौन के पेड़ के ऊपर एक गिलहरी दम्पति मोजे को ऊपर की ओर खींच रहे थे। वे हटाने पर आसपास चींचीं करते रहे, मानो उनकी सम्पत्ति हो और हम उसे जबरी हथियाने जा रहे हों। 😆


एक बोतल पानी, दो कुर्सियाँ जोड़ कर उनपर अधलेटा शरीर। मोबाइल पर चलता कोई पॉडकास्ट या गाना। घर में धूप खूब आती है और उसमें बैठने-लेटने का बहुत आनंद है। श्रीमती जी जब वहां गयीं तो पैरों मे मोजे पहने हुये थे। धूप की गर्मी में वे उतार कर पास की एक कुर्सी पर रख दिये।

धूप का आनंद लेतीं श्रीमती रीता पाण्डेय

एक दो घण्टे बाद जब मोजे देखे तो एक पैर का गायब था। कौन ले जायेगा? कौन कौन आया था घर में? पीछे अरहर के खेत में घास छीलने वाली स्त्रियां आती हैं। उनमें से कोई ले गयी? पर लेना भी होगा तो एक पैर का काहे ले जायेगी?

“फुआ, दूसरे पैर का वहीं रहने दें। जो एक पैर का ले गया है उसे कम से कम दोनो पैर का मिल जाये!” – घर में बर्तन मांजने वाली ने ठिठोली की।

“चेखुरा (गिलहरी) लई ग होये। सर्दी में ओन्हने खोथा बनवथीं। (सर्दी में वे अपना घर बनाती हैं।)” – दूसरी ने अपना कयास लगाया। खोथा बनाने की सम्भावित जगहें तलाशी गयीं पर मोजा कहीं नहीं मिला। एक पैर का मोजा घर में पड़ा रहा।

अगले दिन काम करने वाली ने चिल्ला कर कहा – होवा बा! (वहां है!)

सागौन की पत्तियों के बीच मोजा

सागौन के पेड़ के ऊपर एक गिलहरी दम्पति उसे ऊपर की ओर खींच रहे थे। वे हटाने पर आसपास चींचीं करते रहे, मानो उनकी सम्पत्ति हो और हम उसे जबरी हथियाने जा रहे हों। पेड़ के पास एक प्लास्टिक की कुर्सी पर चढ़ कर एक टहनी से पत्नी जी ने जुराब खींच कर पेड़ की पत्तियों से अलग की। उसमें छेद बना दिये थे गिलहरी ने। उसके बच्चों या उसे गर्माहट देने वाली तो होगी वह, पर हमारे किसी काम की नहीं थी। छेद छोटा नहीं था कि रफू कर काम चलाया जा सके। उसे वहीं पेड़ पर छोड़ दिया गया – गिलहरी के प्रयोग के लिये। अभी दूसरी जुराब भी वहीं ले जा कर छोड़ देने पर विचार चल रहा है! 😆

जुराब का यह हाल बना दिया था गिलहरी दम्पति ने।

पांच साल पहले जब यहां खेत में हमने घर बनाया था तो एक ही पेड़ था। उसपर चार पांच गिलहरियां रहती थीं। फिर पेड़ बढ़े। वनस्पति और लतायें बढ़ीं। गिलहरियों और चिड़ियों के लिये पानी और अन्न रखा जाने लगा। अब घर भर में तीन चार दर्जन गिलहरियां और एक दर्जन किस्म के पक्षी रहते हैं। उनके घोंसले भी दिख जाते हैं।

उस दिन माधवी लता की छंटाई करने के लिये माली जी गये तो एक छोटी मुनिया जैसी चिड़िया इतना चिल्लाई कि छंटाई का विचार त्याग दिया रामसेवक ने। देखा तो उसमें एक घोंसला पाया। ऐसे घोंसले घर में अप्रत्याशित स्थानों पर पाये जाये हैं। मुनिया, गौरय्या, बुलबुल और अब बया भी घोंसले लगा रही हैं हमारे परिसर में। चरखी और चेखुरा (गिलहरी) बहुतायत से हैं। वे यहां के मूल निवासी हैं। गिरगिट, उल्लू, कबूतर और नेवले भी आते जाते रहते हैं।

इस घोंसला वाली चिड़िया ने राम सेवक को लता की छँटाई रोकने को बाध्य कर दिया।

मेढ़क और सांप भी किसिम किसिम के हैं। एक छोटा मेढ़क तो दीवार पर चढ़ने में महारत रखता है। एक रात एक सांप तो टूटी जाली से स्नानघर में चला आया था। वह तो भला हो कि रात में लघुशंका के लिये जाने पर उसपर पहले नजर पड़ गयी। न चाहते हुये भी उसे मारना पड़ा। उसे पकड़ने की तकनीक अगर आती होती तो उसकी जान बच जाती।

इन सब जीवों में गिलहरियां और चरखियाँ सबसे ढीठ और चोर हैं। अन्न सूखने के लिये धूप में डाला जाये तो ये दोनो बहुत खा जाते हैं और खाने से ज्यादा जमीन पर गिरा कर बरबाद करते हैं। फिर चींटियां उन्हे ढ़ो कर ले जाती हैं। क्या करें; गांव में रह रहे हैं तो इनकी संगत में रहना ही है।

और अब तो इनकी संगत में रहना अच्छा भी लगता है! 😆

गिलहरियाँ और चरखी सुखाने रखे गेंहूं में अपना हिस्सा बटाते हुये।

बाढ़ू का नाम कैसे पड़ा?

बाढ़ू ने बताया कि सन 1948 की बाढ़ में जन्म होने के कारण उनका नाम बाढ़ू पड़ गया और वही नाम चलता चला आ रहा है।


बाढ़ू मेरे मित्र हैं। सन अढ़तालीस की पैदाइश। उस हिसाब से मुझसे सात साल बड़े हुये।

मेरे घर दही ले कर आते थे, तभी से उनसे मित्रता हुई। घर में दही की जरूरत न भी होती थी, तो मैं उनसे आधा किलो या एक पाव जरूर खरीदता था। उसके साथ उनकी बातें सुनने को मिलती थीं। बीच में वे मुझे दूध भी बेचने लगे थे। पर वह सिलसिला चला नहीं।

बाढ़ू यादव।

आजकल बाढ़ू ने अपनी पाही पर भन्टा लगाया है। कुछ दिन पहले उनसे तीस रुपये का बैंगन लिया था बाटी-चोखा के भुर्ता के लिये। उस समय मेरे पास खुल्ले पैसे नहीं थे तो आज साइकिल भ्रमण के दौरान उन्हे देने के लिये उनकी पाही पर रुका। सवेरे का समय। बाढ़ू मड़ई के बाहर रखी चौकी पर नहीं थे। पास के अपने सब्जी के खेत में थे। वहां से निकल कर सडक के किनारे मुझसे मिलने और बातचीत करने आये।

प्रगल्भ हैं बाढ़ू। बताने लग गये कि सन अढ़तालीस की बाढ़ के समय उनकी पैदाइश हुई। उस साल बाढ़ आयी थी। वैसी बाढ़ फिर कभी नहीं आयी। उस बाढ़ में उनका द्वारिकापुर का घर गिर गया था और उनका जन्म अपने घर की बजाय ठाकुर साहब के ओसारे में हुआ।

बाढ़ में जन्म होने के कारण उनका नाम बाढ़ू पड़ गया और वही नाम चलता चला आ रहा है।

“जब मेरा जन्म हुआ था तो गांव में बहुत एका था। बहुत भाईचारा। माई बताती हैं कि उस समय हर घर से दो-चार रोटी बन कर माई के सऊरी में होने के कारण आती थीं। कुल मिला कर तीन चार बित्ता रोटियाँ हो जाती थीं। हर घर वाला बाढ़ की विपदा के बावजूद सहायता को तत्पर रहता था।”

“ये मास्टर (मेरे बड़े साले साहब – पण्डित डा. देवेंद्रनाथ दुबे, जो स्कूल मास्टर नहीं, प्रोफेसर थे) , मेरे साथ यहीं तुलसीपुर के प्राइमरी स्कूल में पढ़ते थे। आधी छुट्टी में अपने घर ले जाते थे। वहां खिचड़ी खाने को मिलती थी। खा पी कर फिर आते थे हम लोग स्कूल। घिऊ मजे क होत रहा खिचड़ी में (घी खूब होता था खिचड़ी में)।”

बाढ़ू अपने बचपन और अतीत के वर्णन में चले गये थे। मुझे घर लौटने की जल्दी थी। मैं उन्हे वापस लाया। चलते चलते उनका हाल पूछा। बताया कि “गोड़वा क चोट त ठीक होइ ग बा, पर घेटुना अब पकड़ई लाग बा। बुढ़ाई क असर बा (पैर की चोट तो अब ठीक हो गयी है पर घुटना अब जकड़ने लगा है। उम्र का असर हो रहा है)।”

मैंने कहा कि फुर्सत से उनके साथ बैठूंगा और उनकी जीवन गाथा सुनूंगा। सात साल बड़े होने के बावजूद बाढ़ू मुझसे ज्यादा स्वस्थ हैं और उनकी याददाश्त और बोलने की शक्ति में कोई कमी नहीं है। पिछले छ-सात दशकों में गांवदेहात कैसा बदला है और उसपर एक ग्रामीण क्या राय रखता है, वह बताने के लिये बाढ़ू एक उपयुक्त व्यक्ति हैं।

आप अपेक्षा कर सकते हैं कि बाढ़ू से बाद में मैं मिलता और गांवदेहात को गहनता से जानने – लिखने के लिये इनपुट्स लेता रहूंगा।