जरई और रक्षाबंधन


राखी का बाजार बचा रहा, जरई का संसार चला गया। गरिमा, मेरी बहन, की राखी समय पर आ गई है—स्पीड पोस्ट से। सालों से पोस्ट ऑफिस के माध्यम से मिलती रही है। पहले सामान्य लिफाफे में आती थी, फिर कोई समय आया कि स्पीड पोस्ट से आने लगी। शायद सामान्य डाक पर हम जैसे सामान्यContinue reading “जरई और रक्षाबंधन”

कालीन का कारीगर


गुन्नीलाल जी के यहाँ से लौट रहा था। सवेरे साढ़े आठ का समय। धूप अभी तीखी नहीं हुई थी। सामने एक आदमी साइकिल पर था — सिर पर गमछे का फेंटा बाँधे, पीठ सीधी, पीछे कैरियर में टिफिन दबाया हुआ। चाल में जल्दी थी, पर थकान भी। मैंने बिजली की साइकिल तेज़ की और बगलContinue reading “कालीन का कारीगर”

सिब्बू गुरू की बारात


आज साइकिल गुन्नीलाल जी के यहाँ मुड़ गई। ग्वाले के यहाँ से वे दूध ले कर आ चुके थे। नीम की छाँव में अपना मोबाइल स्क्रॉल कर रहे थे। मुझे देख कर उठे, स्वागत किया। नीम के नीचे ही कुर्सी और टेबल लाये — धूल साफ कर बिठाया। तब बातचीत शुरू हुई। बोले — साहेब,Continue reading “सिब्बू गुरू की बारात”

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