बाढ़ू का नाम कैसे पड़ा?

बाढ़ू ने बताया कि सन 1948 की बाढ़ में जन्म होने के कारण उनका नाम बाढ़ू पड़ गया और वही नाम चलता चला आ रहा है।


बाढ़ू मेरे मित्र हैं। सन अढ़तालीस की पैदाइश। उस हिसाब से मुझसे सात साल बड़े हुये।

मेरे घर दही ले कर आते थे, तभी से उनसे मित्रता हुई। घर में दही की जरूरत न भी होती थी, तो मैं उनसे आधा किलो या एक पाव जरूर खरीदता था। उसके साथ उनकी बातें सुनने को मिलती थीं। बीच में वे मुझे दूध भी बेचने लगे थे। पर वह सिलसिला चला नहीं।

बाढ़ू यादव।

आजकल बाढ़ू ने अपनी पाही पर भन्टा लगाया है। कुछ दिन पहले उनसे तीस रुपये का बैंगन लिया था बाटी-चोखा के भुर्ता के लिये। उस समय मेरे पास खुल्ले पैसे नहीं थे तो आज साइकिल भ्रमण के दौरान उन्हे देने के लिये उनकी पाही पर रुका। सवेरे का समय। बाढ़ू मड़ई के बाहर रखी चौकी पर नहीं थे। पास के अपने सब्जी के खेत में थे। वहां से निकल कर सडक के किनारे मुझसे मिलने और बातचीत करने आये।

प्रगल्भ हैं बाढ़ू। बताने लग गये कि सन अढ़तालीस की बाढ़ के समय उनकी पैदाइश हुई। उस साल बाढ़ आयी थी। वैसी बाढ़ फिर कभी नहीं आयी। उस बाढ़ में उनका द्वारिकापुर का घर गिर गया था और उनका जन्म अपने घर की बजाय ठाकुर साहब के ओसारे में हुआ।

बाढ़ में जन्म होने के कारण उनका नाम बाढ़ू पड़ गया और वही नाम चलता चला आ रहा है।

“जब मेरा जन्म हुआ था तो गांव में बहुत एका था। बहुत भाईचारा। माई बताती हैं कि उस समय हर घर से दो-चार रोटी बन कर माई के सऊरी में होने के कारण आती थीं। कुल मिला कर तीन चार बित्ता रोटियाँ हो जाती थीं। हर घर वाला बाढ़ की विपदा के बावजूद सहायता को तत्पर रहता था।”

“ये मास्टर (मेरे बड़े साले साहब – पण्डित डा. देवेंद्रनाथ दुबे, जो स्कूल मास्टर नहीं, प्रोफेसर थे) , मेरे साथ यहीं तुलसीपुर के प्राइमरी स्कूल में पढ़ते थे। आधी छुट्टी में अपने घर ले जाते थे। वहां खिचड़ी खाने को मिलती थी। खा पी कर फिर आते थे हम लोग स्कूल। घिऊ मजे क होत रहा खिचड़ी में (घी खूब होता था खिचड़ी में)।”

बाढ़ू अपने बचपन और अतीत के वर्णन में चले गये थे। मुझे घर लौटने की जल्दी थी। मैं उन्हे वापस लाया। चलते चलते उनका हाल पूछा। बताया कि “गोड़वा क चोट त ठीक होइ ग बा, पर घेटुना अब पकड़ई लाग बा। बुढ़ाई क असर बा (पैर की चोट तो अब ठीक हो गयी है पर घुटना अब जकड़ने लगा है। उम्र का असर हो रहा है)।”

मैंने कहा कि फुर्सत से उनके साथ बैठूंगा और उनकी जीवन गाथा सुनूंगा। सात साल बड़े होने के बावजूद बाढ़ू मुझसे ज्यादा स्वस्थ हैं और उनकी याददाश्त और बोलने की शक्ति में कोई कमी नहीं है। पिछले छ-सात दशकों में गांवदेहात कैसा बदला है और उसपर एक ग्रामीण क्या राय रखता है, वह बताने के लिये बाढ़ू एक उपयुक्त व्यक्ति हैं।

आप अपेक्षा कर सकते हैं कि बाढ़ू से बाद में मैं मिलता और गांवदेहात को गहनता से जानने – लिखने के लिये इनपुट्स लेता रहूंगा।


बालू ढोने वाली नाव की वार्षिक मरम्मत

ठाकुर साहब ने बताया कि नियमानुसार हर साल नाव बरसात के महीने में (जब गंगा का पानी उतार पर हो, तब) किनारे जमीन पर उतार कर उसपर अलकतरा लगाना चाहिये। उससे नाव में जंग नहीं लगता और उसकी जिंदगी बढ़ जाती है।


वह बड़ी नाव है। करीब एक लाख की होगी। ज्यादा की भी हो सकती है। साल के छ सात महीने उस पार से इस पार बालू ढोने के काम आती है। वह औंधी रखी थी। उसपर एक ओर काला पेण्ट (अलकतरा) चमक रहा था। देखते ही लगा कि मानसून के महीने में, जब बालू खनन का काम बंद है; नाव का ए.ओ.एच. (Annual Overhaul) किया जा रहा है।

गंगा किनारे औंधी की गयी नाव। इसपर पेण्ट हो रहा है

नाव पूरी तरह नहीं औंधाई गयी थी। बल्लियों और पटरों की मदद से उसे उल्टा उंठगाया भर गया था। इस दशा में रखा गया था कि उसपर आसानी से पेण्ट किया जा सके। गंगा किनारे और कोई व्यक्ति उसपर काम करने वाला नहीं था। मैंने नाव के कई कोणों से चित्र लिये। उसी नाव के पास एक और नाव थी, उसका भी वार्षिक संरक्षण कार्य हो रहा था। उसमें भी काला पेण्ट हो रहा था।

चित्र खींच कर लौटने लगा तो वहीं गंगा किनारे एक पेड़ के नीचे कुछ गांव वाले दिखे। उनके साथ एक कुत्ता भी था। बड़ा जीवंत दृष्य। एक सज्जन ने मुझे अभिवादन भी किया – पालागी पण्डितजी! निश्चय ही वे मुझे जानते होंगे। वे लोगों के इकठ्ठा होने का इंतजार कर रहे थे। करीब बीस बाइस लोग देखते देखते जमा हो गये और वे उस औंधी नाव की ओर बढ़े।

पेड़ की छाया में लोग। बनियान और तौलिया में खड़े हैं ठाकुर साहब

वे सज्जन, कोई ठाकुर साहब हैं। उन्हें मैं पहचानता हूं, यद्यपि उनका नाम नहीं मालुम। उन्होने नाव को सरकाने के लिये आज लोगों को इकठ्ठा किया था। उन सभी ने मिल कर नाव को सीधा किया और दूसरी ओर से उसे टेका दे कर उठाने की कोशिश की। बाईस लोगों का एक साथ काम करना देखना बढ़िया सीन था। टेका दे कर उठाने में वे सफल नहीं हुये, पर जिस दशा में नाव आ गयी, वह नाव के दूसरी ओर अलकतरा लगाने और रंग रोगन करने के लिये पर्याप्त था।

वे लोग नाव को सही पोजीशन नहीं दे पाये, तो मैंने सुझाव दिया – लोगों की बजाय एक दो जैक लगाये गये होते तो काम सुचारू रूप से हो गया होता। पर डीजल जेनरेटर पर रखी सुरती से मुझे लोगों के इकठ्ठा करने का अर्थशास्त्र समझ आया। ठाकुर साहब के लिये गांव के लोगों को जुटाना आसान काम था। उसके लिये दस रुपये की सुरती का ही इंतजाम करना था। लोग काम करने के बाद अपने अपने हिसाब से सुरती उठा कर इधर उधर चले गये। अगर वे हाइड्ररॉलिक जैक का इंतजाम करते तो उसका किराया और डीजल उन्हें कई सौ रुपये का पड़ता। उसकी बजाय दस रुपये की सुरती कहीं सस्ता उपाय था!

ठाकुर साहब ने बताया कि नियमानुसार हर साल नाव बरसात के महीने में (जब गंगा का पानी उतार पर हो, तब) किनारे जमीन पर उतार कर उसपर अलकतरा लगाना चाहिये। उससे नाव में जंग नहीं लगता और उसकी जिंदगी बढ़ जाती है। पर ऐसा हर साल नहीं हो पाता। इस बार भी दो साल बाद यह रंगरोगन हो रहा है।

मैं अपने को काफी खुश किस्मत समझता हूं कि यह सब गतिविधियां मुझे लगभग दैनिक आधार पर देखने को मिलती हैं। यह देखने के लिये शहरी लोग, या विदेशी सैलानी, अच्छी खासी रकम खर्च कर और समय निकाल कर ही अवसर जुटा पाते हैं। कितने लोग रोज साइकिल से गंगा किनारे जा सकते हैं? जो लोग कर भी सकते हैं – वे करते इसलिये नहीं कि उन्हें इस प्रकार की गतिविधि में रुचि नहीं होती। अपने मन माफिक जगह में रहना और निकलना-देखना; यह सब को नहीं मिलता।

… वैसे अगर यह कहूं कि मुझे वह सब मिला जो मैं चाहता था या जिसका अपने को हकदार समझता हूँ, तो वह सही नहीं होगा। मेरी अपनी हताशाएं हैं। अपने खिन्नता के कारक भी। पर जो है, उसपर संतोष भाव लाएं तो लगता है अब जो है, वही मैं चाहता था।

निदा फ़ाजली की पंक्तियाँ याद आती हैं –

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता


रामदेव गड़रिया

पचास के आसपास भेड़ें हैं रामदेव के पास। उन्ही को देखना, गिनना, पालना और ध्यान रखना उसका कर्म है। वही ध्यान है, वही योग है।



वैकुण्ठधाम मंदिर है गंगा किनारे द्वारिकापुर में। सवेरे साढ़े सात बजे एक खटिया बिछा कर वह अपनी भेड़ें अगोर रहा था।

मैंने साइकिल रोक चित्र लेते पूछा – क्या कर रही हैं भेड़ें?

ऊंचा सुनता था वह। दो बार दोहराने पर जवाब दिया – “करिहीं का? जुगाली करत हयीं! (करेंगी क्या? जुगाली कर रही हैं!)”

रामदेव

भादौं का महीना है। हरियाली की कमी नहीं। चराने के लिये रेवड़ ले कर घूमने की जरूरत नहीं। उसने बताया कि पानी तो हर जगह है, इस लिये पानी पिलाने के लिये रेवड़ को गंगा तट पर ले जाने की भी दरकार नहीं।

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पचीसा

“पचीसा।” उन्होने खेलते खेलते, बिना सिर उठाये जवाब दिया। बताया कि चौबीस गोटियोँ का खेल है। दो खिलाड़ी होते हैं। काली और सफेद गोटियों वाले। हर एक की बारह गोटियाँ होती हैं।



गांव की सड़क किनारे एक पेड़ की छाया में, चबूतरे पर चार लड़के कोई खेल खेल रहे थे। मैंने द्वारिकापुर गंगा किनारे जाते हुये उन्हे देखा, पर आगे बढ़ गया। आधे पौने घण्टे बाद वापस लौटा तो भी वे वहीं थे और वही खेल खेल रहे थे।

साइकिल रोक कर उनसे पूछा – क्या खेल रहे हो?

पचीसा खेलते किशोर

“पचीसा।” उन्होने खेलते खेलते, बिना सिर उठाये जवाब दिया। बताया कि चौबीस गोटियोँ का खेल है। दो खिलाड़ी होते हैं। काली और सफेद गोटियों वाले। हर एक की बारह गोटियाँ होती हैं। एक गोटी की जगह खाली रहती है। खिलाड़ी को दूसरे खिलाड़ी की गोटी लांघ कर गोटी मारनी होती है। जब एक खिलाड़ी की सभी गोटियां खतम हो जायें तो खेल पूरा हो जाता है।

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सूर्यमणि तिवारी, हर्ष मिश्र और नचिकेता

हर्ष को देख कर मुझे लगा कि कठोप्निषद मात्र काव्य कल्पना नहीं। ऐसा पात्र, ऐसा नायक, हो सकता है।


सूर्यमणि तिवारी

सूर्यमणि तिवारी मेरे शुभचिंतक हैं। अपने परिवेश से ऊपर उठ कर उन्होने मात्र धन ही अर्जन नहीं किया है, सज्जनता और लोककल्याण की प्रवृत्ति भी उनमें संतृप्त है। वे मुझसे कहते रहते हैं कि मैं तुलसीदास को पढ़ूं। शायद उन्हें लगता है कि मैं जो पढ़ता हूं, उसमें आत्मविकास का तत्व सीधा नहीं होता। वह सेकुलर पठन सरीखा होता है। “तुलसी के पढ़अ, ओहमें कुलि बा” (तुलसी को पढ़ो, उसमें सब कुछ है)।

एक दिन उन्होने मुझे कठोप्निषद पर एक संत के वीडियो संदेशों का लिंक दिया। स्वामी अभयानंद के लगभग एक घण्टे के करीब पचास वीडियो हैं कठ-उपनिषद पर।

कठ उपनिषद हमारे प्रमुख उपनिषदों में प्रमुख है। मुझे उससे परिचय स्वामी चिन्मयानद ने कराया था। स्वामी जी बिट्स पिलानी में विजटिंग फेकल्टी थे। साल में एक दो बार आते थे। मैं अपने इंजीनियरिंग विषयों के अलावा एक ह्यूमैनिटीज विषय का भी छात्र था – Cultural Heritage of India. उस विषय में उन्होने कई कक्षायें ली थीं, और उपनिषदों से परिचय कराया था। अत: मुझे गर्व है कि मैं स्वामी चिन्मयानंद जैसे महान संत का शिष्य रह चुका हूं।

सूर्यमणि तिवारी जी ने जब कठोप्निषद की बात कही, तो मुझे अपने पुराने दिन याद हो आये। इस उपनिषद का मुख्य पात्र है नचिकेता। दस-इग्यारह साल का बालक। सत्व, सरलता और जीवन के उच्चतर मूल्यों से ओतप्रोत। यम से वह जो तीन वर मांगता है, वह विलक्षण है। उससे उसकी बुद्धि की तीक्ष्णता भी स्पष्ट होती है, और सरलता भी।

हर्ष मिश्र बांये और नारायण प्रसाद सिंह दांये
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दार्शनिक, कारोबारी या बाहुबली #गांवकाचिठ्ठा

उसने उत्तर देने के पहले मुंह से पीक थूंकी। शायद मुंह में सुरती थी या पान। फिर उत्तर दिया – “सोचना क्या है। देख रहे हैं, काम करने वाले आ जाएं, नावें तैयार हो कर उस पार रवाना हो जाएं। आज काम शुरू हो जाए। बस।


वह पत्थर की बेंच पर पेड़ के नीचे बैठा था। बगल में एक पुरानी साइकिल। पेड़ के तने से उंठगा कर खड़ी कर रखी थी। गंगा किनारे नावों और उनके आसपास की गतिविधि निहार रहा था। अकेला था। पूरा दृश्य कुछ ऐसा था सवेरे साढ़े पांच बजे कि लगा कोई अपने विचारों में खोया या सवेरे की शांत छटा निहारता दार्शनिक टाइप जीव हो। मुझे लगा कि ऐसा बहुत सम्भव है। गंगा विचारों में विचरण करने वालों को आकर्षित अवश्य करती हैं।

वह बेंच पर बैठा गंगा का दृश्य निहार रहा था

मैंने उसके एक दो चित्र लिए, इससे पहले कि वह मुझे देख अपनी मुद्रा बदले। उसके बाद उन सज्जन से बात की – कैसा लगता है गंगा का यह दृश्य? क्या सोचते हैं?

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