ट्रकों की रफ्तार थामने वालों को थामा जाये

सड़कें यातायात चलाने के लिये हैं। उन्हें रोक कर वसूली के लिये नहीं। जो वसूली करनी हो, वह लोडिंग/अनलोडिंग प्वाइण्ट पर होनी चाहिये। बीच में ट्रकों की रफ्तार थामने वालों को थामा जाना चाहिये।


अपने नौकरी के दौरान मैंने अपना अधिकांश समय ट्रेन यातायात प्रबंधन के पदों पर व्यतीत किया है। ट्रेन यातायात में सवारी गाड़ियां तो टाइम टेबल के अनुसार चल जाती हैं। उनके संचालन में (अगर समय सामान्य है और बाढ़-कोहरा जैसी दशा नहीं है) बहुत मशक्कत नहीं करनी पड़ती। उनके उलट मालगाड़ी का परिचालन बहुत श्रमसाध्य काम है। उसके तनाव ने सेहत पर बहुत (दु:)प्रभाव डाला और उसकी भरपाई अब मैं साइकिल ले कर गांव की पगडण्डियों या हाईवे की सर्विस लेन पर घूम कर कर रहा हूं।

मालगाड़ी के परिचालन में जो तनाव का प्रमुख घटक होता था, वह मालगाड़ी का इंजन के साथ या इंजन काट कर किसी स्टेशन पर लूप लाइन भरते हुये खड़े हो जाना होता था। ट्रेन स्टेबल हो जाना परिचालन भाषा में अस्वास्थ्य सरीखा है। बहुत कुछ वैसे कि कोलेस्ट्रॉल बढ़े शरीर के रक्त संचार में रुकावट जो अन्तत: हृदय या ब्रेन को बीमार करती है।

जहाँ देखो, वहीं खड़े दिखते हैं ये लदे हुये ट्रक

जब मैंने रेलवे ज्वाइन की थी तो लदान की इकाई वैगन (मालगाड़ी का एक डिब्बा) हुआ करती थी। तब यार्ड में एक ही दिशा में जाने वाले वैगनों की शंटिंग कर ट्रेन बनती थी। उस समय यार्ड में पड़े सबसे पुराने डिब्बे से यार्ड की कार्यकुशलता मापी जाती थी। यार्ड मास्टर का मुख्य कार्य था कि यार्ड में आने वाली मालगाड़ियों को निर्बाध तरीके से स्वीकार करना और उनसे नयी मालगाडी शंटिंग कर जल्दी से जल्दी रवाना करना।

कालांतर में लगभग सारा लदान वैगन लोड से हट कर ट्रेन लोड का होने लगा और स्टेशनों/यार्डों में ट्रेनों की स्टेबलिंग मॉनीटर करना काम का एक मुख्य घटक होने लगा।

अब रिटायरमेण्ट के बाद मैं ट्रेनों के इर्दगिर्द कम ही जाता हूं। पर हाईवे की सर्विस लेन पर आते जाते मुझे बेशुमार ट्रक; अधिकांशत: लदे हुये ट्रक; यूं ही खड़े दिखते हैं। उन्हे देख कर मुझे अहसास होता है कि राष्ट्र का ग्रॉस डोमेस्टिक प्रॉडक्ट (जीडीपी) तीन चार प्वाइण्ट तो सड़कों पर ही सड़ रहा है।

बाबूसराय और कटका पड़ाव के बीच यह ट्रक जाने कब से खड़ा है। यह लदा हुआ ट्रक प्रतीत होता है। इसपर बेलें भी चढ़ गयी हैं।

सड़क यातायात का नियमन करने के जो भी विभाग हैं, उनका काम आपनी और राज्य सरकारों के अफसरों, नेताओं की जिंदगी “खुशहाल” बनाना है। उनकी परफार्मेंस में ट्रकों को तेज चला कर लोड/अनलोड के टर्मिनल पर पंहुचाना है ही नहीं। किसी इंस्पेक्टर, किसी हवलदार, किसी सिविल सर्वेण्ट को इस लिये जवाबदेह नहीं बनाया जाता कि सड़कों का निर्माण होते ही उनपर ट्रक स्टेबल होना क्यूं प्रारम्भ कर देते हैं?

सड़कों के निर्माण की प्रक्रिया में भी कुछ कमियां हैं। एक घटक निर्माण कर, सड़क की केपेसिटी बढ़ा कर दुरुस्त किया जाता है तो उसके आगे किसी नये स्थान पर जाम लगना शुरू हो जाता है। सौ किलोमीटर की सड़क दुरुस्त होती है तो कहीं कोई पुलिया चरमरा उठती है। बॉटलनेक्स दूर नहीं होते, वे मात्र शिफ्ट हो जाते हैं। 😦

मैं सवेरे सात-आठ किलोमीटर नेशनल हाईवे 19 के सर्विस लेन से गुजरता हूं और इस आठ किलोमीटर की यात्रा में 70 से 150 तक ट्रक इधर उधर खड़े दिख जाते हैं। उनमें से खाली ट्रक इक्का दुक्का ही होते हैं। अर्थात, कोरोना संक्रमण से चौपट अर्थव्यवस्था में और भी योगदान ये लटकते पटकते चलते रुकते ट्रक कर रहे हैं। अगर ये न रुकें तो अर्थव्यवस्था की ग्रोथ कितनी बढ़ जायेगी, उसका अनुमान ही लगाया जा सकता है। ट्रांसपोर्टेशन में एक इकाई की बढ़त अर्थव्यवस्था को 2-3 इकाई की बढ़त आसानी से दे देती है।

सो, सरकारों को चाहिये कि इस बात पर ध्यान दें। ट्रकों का चक्का रोकने वाले सभी घटकों – चाहे वे भ्रष्ट सरकारी अमला हो या सड़क की जर्जर दशा से रुकने वाले ट्रकों की जाम की अवस्था हो; सम्बद्ध कर्मचारी/अधिकारी की ऐसी तैसी की जानी चाहिये।

सड़कें यातायात चलाने के लिये हैं। उन्हें रोक कर वसूली के लिये नहीं। जो वसूली करनी हो, वह लोडिंग/अनलोडिंग प्वाइण्ट पर होनी चाहिये। बीच में ट्रकों की रफ्तार थामने वालों को थामा जाना चाहिये।


बालू ढोने वाली नाव की वार्षिक मरम्मत

ठाकुर साहब ने बताया कि नियमानुसार हर साल नाव बरसात के महीने में (जब गंगा का पानी उतार पर हो, तब) किनारे जमीन पर उतार कर उसपर अलकतरा लगाना चाहिये। उससे नाव में जंग नहीं लगता और उसकी जिंदगी बढ़ जाती है।


वह बड़ी नाव है। करीब एक लाख की होगी। ज्यादा की भी हो सकती है। साल के छ सात महीने उस पार से इस पार बालू ढोने के काम आती है। वह औंधी रखी थी। उसपर एक ओर काला पेण्ट (अलकतरा) चमक रहा था। देखते ही लगा कि मानसून के महीने में, जब बालू खनन का काम बंद है; नाव का ए.ओ.एच. (Annual Overhaul) किया जा रहा है।

गंगा किनारे औंधी की गयी नाव। इसपर पेण्ट हो रहा है

नाव पूरी तरह नहीं औंधाई गयी थी। बल्लियों और पटरों की मदद से उसे उल्टा उंठगाया भर गया था। इस दशा में रखा गया था कि उसपर आसानी से पेण्ट किया जा सके। गंगा किनारे और कोई व्यक्ति उसपर काम करने वाला नहीं था। मैंने नाव के कई कोणों से चित्र लिये। उसी नाव के पास एक और नाव थी, उसका भी वार्षिक संरक्षण कार्य हो रहा था। उसमें भी काला पेण्ट हो रहा था।

चित्र खींच कर लौटने लगा तो वहीं गंगा किनारे एक पेड़ के नीचे कुछ गांव वाले दिखे। उनके साथ एक कुत्ता भी था। बड़ा जीवंत दृष्य। एक सज्जन ने मुझे अभिवादन भी किया – पालागी पण्डितजी! निश्चय ही वे मुझे जानते होंगे। वे लोगों के इकठ्ठा होने का इंतजार कर रहे थे। करीब बीस बाइस लोग देखते देखते जमा हो गये और वे उस औंधी नाव की ओर बढ़े।

पेड़ की छाया में लोग। बनियान और तौलिया में खड़े हैं ठाकुर साहब

वे सज्जन, कोई ठाकुर साहब हैं। उन्हें मैं पहचानता हूं, यद्यपि उनका नाम नहीं मालुम। उन्होने नाव को सरकाने के लिये आज लोगों को इकठ्ठा किया था। उन सभी ने मिल कर नाव को सीधा किया और दूसरी ओर से उसे टेका दे कर उठाने की कोशिश की। बाईस लोगों का एक साथ काम करना देखना बढ़िया सीन था। टेका दे कर उठाने में वे सफल नहीं हुये, पर जिस दशा में नाव आ गयी, वह नाव के दूसरी ओर अलकतरा लगाने और रंग रोगन करने के लिये पर्याप्त था।

वे लोग नाव को सही पोजीशन नहीं दे पाये, तो मैंने सुझाव दिया – लोगों की बजाय एक दो जैक लगाये गये होते तो काम सुचारू रूप से हो गया होता। पर डीजल जेनरेटर पर रखी सुरती से मुझे लोगों के इकठ्ठा करने का अर्थशास्त्र समझ आया। ठाकुर साहब के लिये गांव के लोगों को जुटाना आसान काम था। उसके लिये दस रुपये की सुरती का ही इंतजाम करना था। लोग काम करने के बाद अपने अपने हिसाब से सुरती उठा कर इधर उधर चले गये। अगर वे हाइड्ररॉलिक जैक का इंतजाम करते तो उसका किराया और डीजल उन्हें कई सौ रुपये का पड़ता। उसकी बजाय दस रुपये की सुरती कहीं सस्ता उपाय था!

ठाकुर साहब ने बताया कि नियमानुसार हर साल नाव बरसात के महीने में (जब गंगा का पानी उतार पर हो, तब) किनारे जमीन पर उतार कर उसपर अलकतरा लगाना चाहिये। उससे नाव में जंग नहीं लगता और उसकी जिंदगी बढ़ जाती है। पर ऐसा हर साल नहीं हो पाता। इस बार भी दो साल बाद यह रंगरोगन हो रहा है।

मैं अपने को काफी खुश किस्मत समझता हूं कि यह सब गतिविधियां मुझे लगभग दैनिक आधार पर देखने को मिलती हैं। यह देखने के लिये शहरी लोग, या विदेशी सैलानी, अच्छी खासी रकम खर्च कर और समय निकाल कर ही अवसर जुटा पाते हैं। कितने लोग रोज साइकिल से गंगा किनारे जा सकते हैं? जो लोग कर भी सकते हैं – वे करते इसलिये नहीं कि उन्हें इस प्रकार की गतिविधि में रुचि नहीं होती। अपने मन माफिक जगह में रहना और निकलना-देखना; यह सब को नहीं मिलता।

… वैसे अगर यह कहूं कि मुझे वह सब मिला जो मैं चाहता था या जिसका अपने को हकदार समझता हूँ, तो वह सही नहीं होगा। मेरी अपनी हताशाएं हैं। अपने खिन्नता के कारक भी। पर जो है, उसपर संतोष भाव लाएं तो लगता है अब जो है, वही मैं चाहता था।

निदा फ़ाजली की पंक्तियाँ याद आती हैं –

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता


नदी, मछली, साधक और भगव्द्गीता

अचिरेण – very soon – में कोई टाइम-फ्रेम नहीं है। वह ज्ञान प्राप्ति एक क्षण में भी हो सकती है और उसमें जन्म जन्मांतर भी लग सकते हैं!


मछली पकड़ने वाले और साधक में बहुत कुछ साम्य है। मैं जब भी गंगा किनारे किसी को कंटिया लगा कर शांत बैठे देखता हूं, मुझे तत्वज्ञान की तलाश में साधनालीन व्यक्ति की याद हो आती है। इस प्रकार के कई लोगों से मैं मिला हूं और उनके बारे में ब्लॉग पर भी लिखा है। सामान्यत: वह लिखने में एक प्रकार का व्यंग, सटायर या हास्य होता है। आज वैसी अनुभूति नहीं थी!

वह व्यक्ति अभी बैठा ही था कंटिया लगा कर। एक डोरी – करीब तीस फुट लम्बी – कांटा और चारा (कीड़ा/केचुआ) लगा कर नदी में फैंक रखी थी। एक दूसरी डोरी, लगभग उतनी ही लम्बी, एक डण्डी से सहारे फैंक रखी थी पानी में? अर्थात मछली पकड़ने के लिये दो कांटे लगा रखे थे।

नदी किनारे बैठा कंटिया लगाये मछेरा

अगर मछली कांटे में फंसी तो डोरी में झटका लगेगा और मछेरा उसे खींचने का उपक्रम करेगा।

“डण्डी वाली दूसरी कंटिया-डोरी में अगर मछली फंसी तो कैसे पता चलेगा?”

“किनारे पर गाड़ी डण्डी जोर से हिलने लगेगी। तब मैं अपनी डोरी छोड़ कर डण्डी वाली डोरी साधने लगूंगा।”

“किनारे पर गाड़ी डण्डी जोर से हिलने लगेगी। तब मैं अपनी डोरी छोड़ कर डण्डी वाली डोरी साधने लगूंगा।”

मेरे समझ में आ गया। दो डोरी से उस मछेरे ने अपनी मछली पकड़ने की प्रॉबेबिलिटी (सम्भावना) दुगनी कर ली है।

“तब दो ही डोरी क्यूं? चार पांच डोरियां-कंटिये क्यों नहीं लगा लिये?” – मेरी अगली जिज्ञासा थी।

“जितना सम्भाल सकता हूं, उतनी ही तो लगाऊंगा। ज्यादा लगाने पर एक साथ दो-तीन में मछली फंस गयी तो उन्हें समेटना अकेले के बूते का नहीं है?”

बहुत सही! साधक अगर संतोष का भाव अपने में नहीं ला सकता तो संसार, मोह, लालच की उधेड़बुन और मकड़जाल में; वह न तीन में रहेगा, न तेरह में! … माया मिली न राम की दशा होगी। मुझे अब समझ आया; यह मछेरा पहले ही जानता है।

“कितना समय लगता है मछली मिलने में?”

“अब क्या कहा जा सकता है। अभी दस मिनट पहले ही बैठा हूं।” वह मुंह से खैनी थूंकते हुये बोला। फिर सोच कर जोड़ा – “ज्यादा समय नहीं लगेगा। नदी और उसमें मछलियां देखते हुये जल्दी ही मिल जानी चाहियें।”

ग्रेट! अगर मैं उसके कथन को “सत्य और ज्ञान की खोज” से जोड़ूं और मछली को ज्ञान प्राप्ति के स्थान पर रख कर सोचूं तो “जल्दी ही मिल जाने” की बात तो भग्वद्गीता भी करती है! अचानक मुझे स्वामी चिन्मयानंद जी के हमको पिलानी में दिये लेक्चर याद हो आये। वे चौथे अध्याय पर बोल रहे थे और “अचिरेण” (बिना देरी के) शब्द पर रुके थे। गीता श्रद्धावान और साधनारत व्यक्ति को आश्वासन देती है कि शीघ्र ही उसे भग्वत्प्राप्ति होगी –

श्रद्धावांल्लभते ज्ञानं
तत्परं: संयतेन्द्रिय: ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्ति-
मचिरेणाधिगच्छति (मा अचिरेण अधिगच्छति) ।।गीता, 4.39।।

कहते हैं, ज्ञान आपको कहां, किस हालात में मिलेगा, कहा नहीं जा सकता। आपको अपने रिसेप्टर्स (अपनी ज्ञानेंद्रियाँ) खुले रखने हैं। आज से पैंतालीस साल पहले स्वामी जी के लेक्चर मेरी विस्मृति में तह लगे रखे थे। यह मछेरा निमित्त बन गया उन्हें पुन: स्मृति में लाने और उसपर मनन करने में। यह अपने आप में अभूतपूर्व बात है।

अचिरेण – very soon – में कोई टाइम-फ्रेम नहीं है। वह ज्ञान प्राप्ति एक क्षण में भी हो सकती है और उसमें जन्म जन्मांतर भी लग सकते हैं!

मुझे एक क्षेपक कथा स्मरण हो आयी। दो साधकों को यह प्रकटन हुआ कि जिस पीपल के पेड़ के नीचे वे तपस्या कर रहे हैं, उसमें जितने पत्ते हैं, उतने वर्षों में उन्हें भग्वत्प्राति हो जायेगी। यह जान कर एक साधक तो सिर पकड़ कर बैठ गया – मैंने इतना कुछ किया है। इतनी सिद्धियाँ प्राप्त की हैं। पर अभी भी इतने साल लगेंगे। इसमें तो कई जन्म जन्मांतर गुजर जायेंगे! 😦

दूसरा साधक यह जान कर कि उसको ज्ञान प्राप्ति हो जायेगी; प्रसन्नता में नाचने लगा – मुझे इतनी जल्दी (अचिरेण) भग्वद्प्राप्ति हो जायेगी! क्या खूब!‍ कुछ ही जन्मों की तो बात है। समय तो बस गुजरते क्या देर लगती है! 😆

गंगा तट से लौटते समय मन में “प्रसन्नता से नाचने का भाव” तो नहीं था; पर यह ढाढस मन में जरूर था कि लौकिक-पारलौकिक सफलताओं की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त है। गीता नें तो वह एश्योरेंस दे ही रखा है; आज इस मछेरे ने भी वह स्मरण करा दिया!


मेरे समधी, रवींद्र कुमार पाण्डेय का कोरोना संक्रमण और उबरना

“यह तो कोरोना है, जिसकी न कोई दवा है न कोई पुख्ता इलाज। बस देख सँभल कर चलना रहना ही हो सकता है। जिस तरह के कामधाम मैं हम हैं वहां अकेले एकांत में तो रहा नहीं जा सकता। लोगों से सम्पर्क तो होगा ही। गतिविधि तो रहेगी ही। बस, बच बचा कर वह कर रहे हैं।”


वे कुछ अस्वस्थ थे। ऑक्सीमीटर 90 की रीडिंग दे रहा था। थोड़ी खांसी और थकान। उनके दोनो बेटों ने उनके गांव (फुसरो, बोकारो, झारखण्ड) में किसी तरह का जोखिम लेने की बजाय उन्हें दिल्ली ले जाने का निर्णय लिया। यद्यपि उन्हें और कोई समस्या नहीं थी। कोई बुखार नहीं आया, कोई कंपकंपी नहीं हुई। पर फिर भी, इस कोरोना काल में कोई भी जोखिम लेने की बजाय उन्हें दिल्ली ले जाना बेहतर लगा विकास और विवेक को।

विकास रवींद्र पांड़े के बड़े बेटे हैंं। विवेक, मेरे दामाद, मंझले। रवींद्र कुमार पाण्डेय इस समय भूतपूर्व सांसद हैं। पिछले पांच बार वे गिरिडीह संसदीय क्षेत्र का लोक सभा में प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। अपने क्षेत्र के भाजपा के सबसे सशक्त नेता हैं और अत्यंत सक्रिय भी!

सतरह अगस्त की शाम को मेरी बिटिया ने पाण्डेय जी की तबियत के बारे में बताया और उसके कुछ ही समय बाद उन्हें सड़क मार्ग से ले कर दिल्ली के लिये रवाना होने की खबर भी दी। यह भी बताया कि रास्ते में सवेरे पांच बजे के आसपास वे लोग हमारे गांव के समीप से गुजरेंगे।

मेरे घर पर श्री रवींद्र पाण्डेय

अठारह अगस्त की सुबह वे लोग एक डेढ़ घण्टे के लिये यहां हमारे घर आये। यद्यपि रवींद्र पाण्डेय जी की बीमारी के बारे में निश्चित तौर पर कुछ ज्ञात नहीं था, हम ने कोरोना संक्रमण की आशंका मानते हुये पूरी सावधानी बरती। वे लोग स्वयम भी सावधान थे। पाण्डेय जी थके हुये लग रहे थे, पर मरीज की तरह बिल्कुल झूल गये हों, वैसा भी नहीं था। अपनी कार से हमारे बराम्दे तक करीब पचास कदम खुद चल कर आये और कुर्सी पर बैठ कर बड़े सामान्य तरीके से बातचीत भी की – “भईया, आप तो बोकारो आये नहीं, हम ही चले आये हैं!” हर साल उनका नवरात्र में विंध्याचल आना होता है माँ विंध्यवासिनी के दर्शन के लिये। जब भी आते हैं तो हमारे यहां मिलते हुये ही वापस लौटते हैं। इस साल लॉकडाउन के कारण आना नहीं हो पाया था। अब अकस्मात आना हो गया।

मैंने देखा कि संक्रमण की पूरी आशंका के बावजूद उनकी पत्नीजी – श्रीमती लक्ष्मी पाण्डेय – उनका पूरा ध्यान रख रही थीं। स्नानघर में उनको तैयार करना, उनके कपड़े पानी से धो कर सूखने को डालना, उनके दवा-भोजन की फिक्र करना बड़ी बारीकी से उन्होने खुद किया। एक पूर्व-सांसद की पत्नी (और वह व्यक्ति, जो भविष्य में भी झारखण्ड की राजनीति में असीमित दमखम रखता हो) इतनी समर्पण भाव से सेवा करती हो – भारतीय नारी की श्रद्धा-मूर्ति लगीं लक्ष्मी पाण्डेय जी।

रवींद्र पाण्डेय और विवेक (दांये) हमारे यहां ब्रंच करते हुये।

पाण्डेय जी का काफिला (दो कारों में थे वे लोग) करीब डेढ़-दो घण्टे में नहा-धो कर और नाश्ता/भोजन कर मेरे यहां से रवाना हो गया। उनके जाने के बाद पूरी सतर्कता बरतते हुये हमने उनके इस्तेमाल किये परिसर को पर्याप्त सेनिटाइज कर लिया।

उनके जाने के बाद, मन में यह संतोष भाव तो था, कि हमने, आशंका के बावजूद अपने अतिथि धर्म को, अपनी क्षमता अनुसार निर्वहन करने का प्रयास किया। फिर भी, मन में यह भी था कि दूरी बना कर मिलने और पूरे समय मास्क लगाये रखने को वे कहीं अन्यथा न ले रहे हों।

वे लोग दिल्ली/गुड़गांव मध्य रात्रि के बाद ही पंहुचे। अगले दिन सवेरे रवींद्र कुमार पाण्डेय और उनकी पत्नीजी ने मेदांता अस्पताल में अपना कोविड-19 टेस्ट कराया। पाण्डेय जी कमजोरी और अन्य लक्षणों के कारण अस्पताल में भर्ती भी हो गये। देर रात में टेस्ट रिपोर्ट में पता चला कि रवींद्र जी कोरोना पॉजिटिव हैं पर उनकी पत्नीजी संक्रमित नहीं हैं।

रवींद्र पाण्डेय जी की फेसबुक पोस्ट

पाण्डेय जी ने अपनी फेसबुक पोस्ट के माध्यम से अपने कोरोना संक्रमित होने की बात सभी को बता भी दी। पर यह भी मुझे लगा कि रवींद्र पाण्डेय खुद कोरोना पॉजिटिव होने के बावजूद, कोरोना स्प्रेडर या सुपर स्प्रेडर नहीं थे; अन्यथा उनकी पत्नीजी, जो बराबर उनके साथ उनकी सहायता को बनी रहीं, जरूर कोरोना पॉजिटिव होतीं।

वे एक सप्ताह तक अस्पताल में रहे। सत्ताईस अगस्त को वे अस्पताल से डिस्चार्ज हुये।

अस्पताल से डिस्चार्ज होने पर श्री रवीन्द्र पाण्डेय। साथ में उनकी पत्नी श्रीमती लक्ष्मी और बेटा विकास

अस्पताल से छुट्टी पाने के बाद करीब एक पखवाड़ा वे दिल्ली में अपने फ्लैट में रहे। कुछ दिनों पहले वे अपने झारखण्ड आवास (फुसरो, बोकारो) आ गये हैं।

आज एक महीना हो रहा है अस्वस्थता के कारण दिल्ली यात्रा किये हुये। हमारे अपने करीबी में एक वही व्यक्ति हैं, जिन्हे कोरोना की आशंका के साथ मैंने पास से देखा और जो उसके बाद कोरोना पॉजिटिव पाये गये और संक्रमण से विधिवत उबर भी गये।

मैंने रवींद्र कुमार पाण्डेय जी से महीना भर गुजरने पर फोन पर बात की। उनका कहना था – “भईया, एक आदमी तीन दिन साधारण बुखार में रहता है तो एक पखवाड़ा तक कहता रहता है कि बहुत कष्ट है। यह तो कोरोना है, जिसकी न कोई दवा है न कोई पुख्ता इलाज। बस देख सँभल कर चलना रहना ही हो सकता है। जिस तरह के कामधाम मैं हम हैं वहां अकेले एकांत में तो रहा नहीं जा सकता। लोगों से सम्पर्क तो होगा ही। गतिविधि तो रहेगी ही। बस, बच बचा कर वह कर रहे हैं।”

उन्होने तो नहीं कहा, पर बातचीत से लगता था कि उनका स्वास्थ्य पूर्ववत तो नहीं है। अपने मूवमेण्ट्स में कुछ तो कमी उन्हे करनी पड़ी है। राजनैतिक सक्रियता उनकी प्रकृति में है और आसन्न विधान सभा उपचुनाव के कारण अनिवार्यता भी है। अतः वे एकांतवास तो कर ही नहीं पाएंगे।

कोरोना महामारी से निपटने का हर वर्ग का तरीका और रिस्पॉन्स कुछ कुछ अलग है। आईटी वाले घर में बैठ कर काम कर रहे हैं। दुकानदार और डिजिटल बन रहे हैं। बिल्कुल देसी गांव की दुकान वाला भी फोन पे का स्कैन कोड लगा लिया है। शिक्षा अधिकाधिक ऑन लाइन हो रही है। पर रवीन्द्र पाण्डेय जी की राजनैतिक पीढ़ी (मेरे अंदाज में) अनुकूलन की तकनीकें स्वीकारने में फिसड्डी है। उन्हें अपने जन संपर्क को ज्यादा से ज्यादा डिजिटल बनाना चाहिए। यह संक्रमण से पहले भी जरूरी था और अब तो बहुत ही जरूरी हो गया है। पाण्डेय जी के पास डिजिटल दक्ष नौजवान होने चाहिएं और उनको भाव भी मिलना चाहिए।… पर मैं जानता हूँ कि वे करेंगे अपने हिसाब से ही। परिवर्तन हर एक के लिए कठिन है और राजनेता के लिए; जिसकी ईगो को पुष्ट करने के लिए कई लोग आगे पीछे घूमते हैं; तो और भी कठिन है।

एक बात और – पोस्ट कोविड समस्यायें – विशेषकर सीनियर सिटिजन के लिये; भले ही उनकी देखभाल बड़ी अच्छी तरह होती हो; एक गम्भीर वास्तविकता हैं। इसके बारे में ज्यादा कुछ पढ़ने को नहीं मिलता। वह भी कोविड-19 जानकारी का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिये।

कोरोना संक्रमण अब दूर की खबर नहीं रही। अपने आसपास, अपने सम्बंधियों में भी सुनने को आ रहा है। इस विषाणु के साथ लगभग साल भर और गुजारना है। यह समय सकुशल गुजर जाये, इसकी तैयारी रहे और सावधानी भी – इसी की कामना की जाती है।


नहुष -स्वर्ग से पतित नायक

नहुष में स्वर्ग से पतित होने पर भी मानवीय दर्प बना है। यही दर्प आज भी सफलता से डंसे पर अन्यथा कर्मठ मानवों में दिखता है। यही शायद मानव इतिहास की सफलताओं की पृष्ठभूमि बनाता है।


नहुष महाभारत का एक महत्वपूर्ण और एक अत्यंत रोचक चरित्र है। इसलिये कि हम सब में नहुष है। हम सब, जो कालखण्ड के किसी न किसी अंश में सफल रहे हैं। सत्ता, यश, शौर्य और आत्ममुग्धता को हासिल कर चुके हैं। और उसे, “ज्यों की त्यौं धर दीनी चदरिया” जैसे त्याग नहीं पाये हैं। शिखर से हटने पर भी मन में नहुष-भाव बना ही रहता है, मैथिलीशरण गुप्त जी के शब्दों में –

फिर भी उठूंगा और बढ़ के रहूंगा मैं। नर हूं, पुरुष हूं मैं, चढ़ के रहूंगा मैं।

नहुष गुप्त जी का महत्वपूर्ण खंड काव्य है। वह महाभारत का एक उपाख्यान है। इंद्र शापित होने के बाद नहुष को इंद्र का आसन दिया जाता है और वह शची पर मुग्ध हो जाता है। सुर सरिता से सद्यः स्नात शची पर।

खण्ड काव्य का अंश देखें –

स्वर्ग से पतित होता नहुष

शची उपाय ढूँढती है नहुष से बचाव का। वह प्रस्ताव भेजती है कि नहुष को वरण करने को तैयार है अगर नहुष सप्त ऋषियों की ढोई पालकी में उसे लेने आयें। उतावली में नहुष एक ऋषि को लात मारता है और क्रोधित ऋषि उसे स्वर्ग से पतित कर देते हैं।

मैथिली शरण गुप्त जी के नायक नहुष में स्वर्ग से पतित होने पर भी मानवीय दर्प बना है। यही दर्प आज भी सफलता से डंसे पर अन्यथा कर्मठ मानवों में दिखता है। यही शायद मानव इतिहास की सफलताओं की पृष्ठभूमि बनाता है।

आप तिहत्तर पेज के नहुष खंड काव्य को इन्टरनेट आर्काइव से डाउनलोड कर सकते हैं ;पीडीएफ फार्मेट में।


मुझे गंगा किनारे लूटा बीर घाट पर यह गिरा बबूल का पेड़ दिखा। और उसे देख गंगा नदी के पवित्र तट पर पतित नहुष की याद हो आई। इसके धरती पर पड़े तने से अनेक अनेक टहनियां ऊर्ध्व उठ रही थीं। उनमे उठने और स्वर्ग की ओर जाने की अदम्य इच्छा स्पष्ट नजर आ रही थी। नहुष ही तो था वह पेड़। पतन और मृत्यु से दो चार होता वह वृक्ष हार नहीं मान रहा था।

टूटा बबूल का पेड़, गंगा तट पर। उसकी डालियाँ ऊपर उठ रही हैं. मृत्य स्वीकार नहीं कर रहीं। हार नहीं मान रही हैं। नहुष की तरह!

मुझे खंड काव्य का अंश याद हो आया। उसका स्केन किया अंश प्रस्तुत हैं –


वह बबूल का पतित पेड़, सुरसरि गंगा का किनारा और सवेरे का समय – सब मुझे नहुष की याद दिलाते रहे। वैसे भी; जीवन की दूसरी पारी में नहुष जैसे नायक चरित्र आकर्षित करते हैं। महाभारत के उप-आख्यान से पता नहीं चलता कि नहुष ने स्वर्ग से पतित होने पर क्या किया, पर कोई आधुनिक कालिदास (अभिज्ञान शाकुंतल के रचनाकार), या वी.एस. खाण्डेकर (ययाति नामक उपन्यास के लेखक) जैसा रचनाकार नहुष के साथ एक नयी कथा का ताना-बाना बुन सकता है। री सरेक्शन ऑफ अ फेल्ड बिजनेस एम्पायर के कई किस्से तो होंगे ही। हम तलाश करें तो आधुनिक काल में दूसरी पारी के सफल नहुष मिलेंगे और अनेक मिलेंंगे।

नहुष – बबूल और गंगा तट

सीएसआर और गांव में लगी बेंचें

छोटे बदलाव, उनके Nudge Effects बहुत महत्वपूर्ण हैं सामाजिक और आर्थिक बदलाव के लिए। आज छह बेंचें लगी हैं। इनकी संख्या बढ़ कर 30 – 40 हो जानी चाहिए।


गांवों में घूमते हुये आजकल सीमेण्ट-कॉक्रीट की ढाली हुयी बेंचें दिख जाती हैं।

सोलर लाइट की बंटाई का फेज खतम हुआ। नब्बे परसेण्ट सोलर लाइटें दो तीन साल में बेकार हो गयी हैं। वे सांसद/विधायक/प्रधान के माध्यम से बंटी थीं। उनपर “फलाने सांसद की ओर से” जैसा कुछ लिखा भी था। कम्पनियों ने अपनी कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) फण्ड में प्रावधान कर जन प्रतिनिधियों के माध्यम से बटवाई थीं। उनकी बैटरीज को पांच सात साल चलना था, पर उसकी आधी भी नहीं रही उनकी जिंदगी। यह भारत की सामान्य कथा है। उसपर सिनिकल हो कर क्या लिखना।

कई चीजें हुयी या बांटी गई हैं गांवों में। चापाकल (हैण्डपम्प) लगे। वे सार्वजानिक होने थे, पर आम तौर पर जिसके दरवाजे पर लगे, उसकी प्राइवेट प्रॉपर्टी जैसे हो गए। आवास मिले। उसमें भी धांधली की खबरें लोग सुना जाते हैं। पर लोगों के चमकते घर और शौचालय दिखते हैं तो अच्छा लगता है। यह अलग बात है कि लोग अब भी सड़क या रेल लाइन के किनारे बैठते हैं निपटान के लिए।

सड़कें और मनरेगा के काम की गुणवत्ता की कमियां तो नजर आती हैं। अन्न वितरण, पूरी कसावट के बावजूद, बांटने वाले विभाग और कोटे दार की गड़बड़ का पूरा स्कोप रखता है। हर गतिविधि में छीन झपट है। पर फिर भी, कुछ न कुछ सार्थक होता है। वही संतोष का विषय है।

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