गिरीश ने कहा – संघ के सामाजिक लपेटक तलाशेंगे मेरे लिये


संघ के लोगों, प्रचारकों की जैसी बात गिरीश ने की, उससे लगा कि उस प्रकार के लोगों से नियमित सम्पर्क मेरे “दीर्घ जीवन की साधना” के प्रॉजेक्ट के कमजोर सामाजिक पक्ष का सुधार सकता है; जिसकी बात ब्ल्यू जोंस के डॉन बटनर जी वाली क्विज करती है।

कैस्टर और मस्टर्ड


मस्टर्ड (सरसों) उन छात्रों को कहा जाता था, जो हिंदी माध्यम से पढ़े, छोटे शहरों या कस्बों के होते थे। उनकी पृष्ठभूमि निम्न मध्यवर्ग की होती थी। अंग्रेजी में बोलना उन्हें नहीं आता था।…लड़कियों से बोलने बतियाने की कोई आदत नहीं थी। मैं मस्टर्ड था।

सपने में सिर काटई कोई


ऐसा नहीं कि चोरी-उचक्कई-जहरखुरानी आदि होती नहीं हैं। पर उनके प्रति मुझमें सेंसिटिविटी का अभाव जरूर था। मुझे याद है कि रेलवे में हो रही जहरखुरानी पर मीटिंगों में चर्चा के दौरान जब बाकी सभी अधिकारी तत्मयता से उसमें भाग लेते थे; मैं उबासी लिया करता था।

रेल के यार्डों में घूमते हुये


एकाकी जीवन, यार्ड में सीखने के लिये की गयी मेहनत और भोजन का कोई मुकम्मल इंतजाम न होना – यह सब खिन्नता देता था। आगरा मुझे अपनी भीड़ और गंदगी के कारण कभी पसंद नहीं आया। पर इन सब के बावजूद मैंने अपनी ट्रेनिग को बहुत गम्भीरता से लिया।

मॉर्निंग पोजीशन की याद


मॉर्निग पोजीशन ने रेल परिचालन की जिंदगी व्यवस्थित की थी। उसने आंकड़ों के पिजन-होल्स बनाये थे मस्तिष्क में। अब जिंदगी अलग प्रकार से चल रही है। पर मेण्टल पिजन होल्स बनाने/अपडेट करने की जरूरत मुझे महसूस हुई सवेरे उठते समय।

विश्व से जुड़े रहने की तलब


इस युग का यही रोचक पक्ष है कि कोने अंतरे में बैठा आदमी भी पूरी दुनियाँ की खोज खबर के लिये दुबरा रहा है। जैसा चीनी कहावत में है कि अभिशाप है रोचक समय में रहना। हम सब विश्व से जुड़े रहने की तलब की रोचकता में अभिशप्त जीव हैं।