पद्मजा के नये प्रयोग

गांव में रहने के कुछ स्वाभाविक नुकसान हैं; पर यहां सीखने को शहर के बच्चे से कम नहीं है। शायद वह जो सीख पाये; वह शहरी बच्चे कभी अनुभव न कर सकें। वह भाषा, मैंनरिज्म और आत्मविश्वास में उन्नीस न पड़े; बाकी सब तो उसके पास जो है, वह बहुत कम को मिलता होगा अनुभव के लिये!


पद्मजा का स्कूल बंद है और खुलने की सम्भावना इस स्कूल सत्र में तो है ही नहीं। उसे घर में पढ़ाने का उपक्रम किया जा रहा है। उस विषय में मैंने पिछली एक पोस्ट में लिखा था।

उसके पास समय बहुत है। समय भी है और ऊर्जा भी अपार है। स्कूल के मित्र नहीं हैं। आसपास दलित-पासवान-बिंद बस्तियां हैं। उनके बच्चे कभी कभी घर में आ कर खेलते हैं। पद्मजा की साइकिल और घर में लगा झूला उनके लिये बड़ा आकर्षण है। यदा कदा पद्मजा को उन्हें टॉफियां देने को भी कहा जाता है।

उनके साथ पद्मजा खेलती है, पर वे स्कूल के मित्रों जैसे अंतरंग नहीं हो पाये हैं। उनके साथ थोड़ी सजगता रखनी पड़ती है। कुछ बच्चे छोटे हैं, पर उनकी भाषा में अपशब्द बहुत सहज भाव से हैं – वे उनका अर्थ नहीं जानते पर सीखे उन्होने अपने परिवेश से हैं। पद्मजा को अंततोगत्वा उनका भी परिचय पाना है; पर शायद यह वह उम्र नहीं है।

पौधा उगाने का प्रयोग करने को तैयार पद्मजा

मैजिक क्रेट में पौधा उगाने का एक एपरेटस आया है। कल पद्मजा ने उसे सेट किया। ऊपर के बर्तन में क्रेट में दी गयी मिट्टी की टिकिया रखी गयी है। नीचे के बर्तन में पानी है। पानी कैपिलरी-एक्शन से एक रस्सी के सहारे मिट्टी को गीला रखेगा। मिट्टी में सरसों के बीज डाले गये हैं। उपकरण को ऐसी जगह पर रख दिया गया है जहां दिन भर पर्याप्त सूरज की रोशनी मिले।

आज उस एपरेटस का निरीक्षण किया। नीचे के बर्तन में पानी कम हो गया है। ऊपर के बर्तन में मिट्टी और गीली हो गयी है और फूल भी गयी है। पानी रस्सी से केपिलरी-एक्शन से ऊपर के बर्तन में पंहुचा है; यह स्पष्ट हुआ है पद्मजा को। एक बर्तन में तो पूरा पानी केपिलरी एक्शन से मिट्टी में चला गया। दूसरी में, जिसमें शुरुआत में मिट्टी ज्यादा गीली थी, आधा पानी ऊपर पंहुचा।

बर्तन में केपिलरी-एक्शन का प्रयोग

पद्मजा को यह भी बताया गया कि रस्सी की तरह पौधों की जड़ें भी पानी को पौधे में ऊपर की ओर ले जाती हैं।

पद्मजा की विज्ञान की किताब में सूरज की छाया के बारे में लिखा है। सवेरे और शाम को छाया बड़ी और अलग अलग दिशा में होती है। दिन में छाया छोटी होती है। यह समझाने के लिये एक धूप घड़ी बनाने का प्रयोग किया। पद्मजा को छोटी-बड़ी छाया और उससे दिन का समय जोड़ने का कॉन्सेप्ट समझ आया। यह सब उसे कमरे में चित्र बना कर भी बताया जा सकता था। उसमें समय कम लगता पर शायद वह उसके दिमाग में ज्यादा देर नहीं टिकता। अब, धूप-घड़ी शायद वह बड़ी होने पर भी याद रखे!

धूप घड़ी का प्रयोग

धूप घड़ी वाले स्थान पर उसे एक बड़ा गोजर (शप्त-पद, सेण्टीपीड) भी दिखा। उस सेण्टीपीड के माध्यम से मैंने कीडो‌ं का भी ज्ञान देने का प्रयास किया।

कुछ भी नया बताने पर बहुत से सप्लीमेण्ट्री प्रश्नों के लिये तैयार रहना होता है। और कई बार प्रश्न नितांत अलग विषय के होते हैं। बहुधा मैं कोई किताब पढ़ रहा होता हूं या आराम कर रहा होता हूं, तब भी वह चली आती है अपनी जिज्ञासा का पिटारा ले कर।

उसकी नयी साइकिल आयी है। जन्म-दिन की भेंट यद्यपि जन्मदिन के रोज नहीं, कुछ सप्ताह बाद आयी। उस साइकिल को ले कर भी भांति भांति की कल्पनायें हो रही हैं। साइकिल का नाम उसने रखा है – पंख। पक्षी पंख से उड़ते हैं, पद्मजा साइकिल से उड़ना सीख रही है। इसी साइकिल से वह भारत घूमना चाहती है।

अपने “पंख” पर सवारी करती पद्मजा

आज बता रही थी कि वह जब साइकिल से मदुराई (मदुरै – तामिलनाडु) जायेगी तो वहां लड़कियों द्वारा बनाया जाने वाला कोलम देखेगी। उसे कोलम (स्त्रियों द्वारा बनाया जाने वाला अल्पना या रंगोली) के बारे में किसने बताया? शायद टेलीविजन ने। पर मुझे खुद भी यह नहीं मालुम था कि मदुरै की लड़कियां कोलम बनाती हैं। 😆

तमिळ महिलाओं द्वारा बनाया कोलम (चित्र सोर्स – https://bit.ly/3fnX2Sb )

गांव में बहुत बड़ा परिसर है पद्मजा के लिये। घर, पेड़, फूलों के पौधे, सब्जियां, परिसर में ही खेत और तरह तरह के जीव और पक्षी। बहुत कुछ है सीखने के लिये। और जो नहीं है वह ऑनलाइन तथा इण्टरनेट पर उपलब्ध वीडियो, पुस्तकों और कुरियर द्वारा आने वाले पैकजों के माध्यम से मिल रहा है। कुल मिला कर उसे एक शहरी बच्चे से कम संतृप्त सीखने को नहीं मिल रहा होगा।

गांव में रहने के कुछ स्वाभाविक नुकसान हैं; पर यहां सीखने को शहर के बच्चे से कम नहीं है। शायद वह जो सीख पाये; वह शहरी बच्चे कभी अनुभव न कर सकें। वह भाषा, मैंनरिज्म और आत्मविश्वास में उन्नीस न पड़े; बाकी सब तो उसके पास जो है, वह बहुत कम को मिलता होगा अनुभव के लिये!


विवस्वान पांड़े की ऑनलाइन क्लासें, कोडिंग, तबला और पेण्टिंग

कला का काफी हिस्सा भी आगे जाकर एआई के जिम्मे हो सकता है। पर विवस्वान को जो सशक्तता अपनी सोच विकसित करने में मिल रही है; वह लम्बे समय तक एआई से रिप्लेस नहीं हो सकती।


बोकारो में है मेरा नाती विवस्वान पाण्डेय। अभी पिछले दिनों मेरी बिटिया हमसे मिलने आयी थी, पर वह साथ नहीं आया। अब इतना बड़ा हो गया है कि अपनी माँ के बिना कुछ दिन रह लेता है।

पूछा कि वह क्यों नहीं साथ आया तो बिटिया ने बताया कि ऑनलाइन कोचिंग क्लासेस चलती हैं। रोज तीन घण्टा। इसके अलावा टीचर्स दिन भर ह्वाट्सएप्प पर कुछ न कुछ काम करने को देते रहते हैं। परीक्षायें और टेस्ट भी कोई मॉइक्रोसॉफ्ट का विण्डोज10 पर चलने वाला एप्प है, उसके माध्यम से ऑनलाइन लेते हैं स्कूल वाले। कुल मिला कर स्कूल में वैसे जितनी पढ़ाई होती थी, उतनी हो रही है। कोई व्यवधान नहीं। इसके अलावा घर के कम्फर्ट तो हैं ही। विवस्वान को यह ऑनलाइन अध्ययन ज्यादा अच्छा लग रहा है। उसे अगर स्कूल जाने और ऑनलाइन में चुनने को कहा जाये तो शायद वह ऑनलाइन का चयन करे।

इसके अलावा, बायजू के ह्वाइटहेड जूनियर वाले कोडिंग प्रोग्राम को भी उसने एनरोल कर लिया है। कोडिंग के जरीये एक दो एप्प भी बनाये हैं। उसमें उसे बड़ा मजा आ रहा है।

विवस्वान पाण्डेय का कोडिंग प्रयोग

सप्ताह में एक दिन उसके तबला वाले सर आते हैं। तबला बजाने में वह स्टेज पर परफार्म करने लायक योग्यता हासिल कर चुका है। उसकी भी प्रेक्टिस वह करता है। उसने अपना एक यू-ट्यूब चैनल भी बनाया है। उसपर कुछ तबला वादन के वीडियो हैं। यह वीडियो उसके गुरूजी के साथ ताल कहरवा की प्रेक्टिस का है –

विवस्वान का तबला वादन

तबला के अलावा उसकी रुचि चित्र बनाने में है। उसके चित्र भी अच्छे बनते हैं। कई चित्रों को वह ट्विटर पर डाल भी चुका है।

विवस्वान पाण्डेय का एक चित्र

छठी कक्षा में पढ़ने वाला विवस्वान ऑनलाइन कक्षा, कोडिंग, तबला वादन, स्केच बनाना, पेण्टिंग करना आदि अनेक विधाओं में हाथ अजमा रहा है और उसे इण्टरनेट पर प्रस्तुत करने के गुर भी सीख रहा है, या सीख चुका है। ट्विटर पर ट्वीट करने की तहजीब यहां अधेड़ लोग नहीं जानते। यह बमुश्किल 11-12 साल का बालक वह सब जानता है।

मैं अपनी याद करता हूं। छठी कक्षा में मैं गुल्ली-डण्डा, स्कूल के डेस्क से उखाड़ी पट्टी से बनाये बैट और कागज पर साइकिल के ट्यूब से बनाये छल्ले लपेट कर बनायी गयी गेंद से खेलता था। हांकी खेलने के लिये गुलाबांस का तना काट कर स्टिक बनती थी। पेण्टिंग, तबला जैसी बातें तो सोची भी नहीं थीं।

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एलगॉरिथ्म या कम्यूटर प्रोग्रामिंग का कुछ प्रयोग इन्जीनियरिंग के दूसरे साल में Fortran IV में कुछ प्रोग्राम बना कर किया था। उसके पहले एलगॉरिथ्म नाम की चीज का पता ही नहीं था। यह हाल बोर्ड की मैरिट लिस्ट में आने वाले और उसकी वरीयता के आधार पर बिट्स पिलानी में सीधे इलेक्ट्रॉनिक्स में दाखिला पाने वाले का था। वहां एक कविता लिखने वाले प्रोग्राम बनाने से अपने आप को तीसमारखाँ समझता था मैं। उस प्रोग्राम में कुछ खास नहीं था। केवल तुकबंदी के आधार पर विभिन्न प्री-रिटन पंक्तियों को सलेक्ट कर कविता बनाना भर था, जो आईबीएम का पुराने जमाने का कम्प्यूटर चला कर प्रिण्ट-आउट देता था। आज उस दो बड़े कमरों में समाये उस कम्प्यूटर सेण्टर में जितनी गणना की क्षमता थी, उससे हजार/लाख गुना क्षमता मेरे एक मोबाइल फोन में है।

एक ही आदमी की जिंदगी में जमाना कितना बदल गया है। हर दो साल में कम्प्यूटर की गणन क्षमता दुगनी हो जा रही है। और अब आर्टीफीशियल इण्टेलिजेंस (एआई) को ले कर जितनी भविष्य की कल्पनायें हो रही हैं; उसमें से अगर अंश मात्र भी सच हुआ तो (यह मानते हुये कि मेरी जिंदगी अभी दो दशक और तो चलेगी ही) मैं शायद वह सब देख – अनुभव कर लूंगा जो किसी भी प्रकार के स्वप्न में कभी नहीं आया होगा!

पर कोडिंग का क्या भविष्य है? कोई भी कम्प्यूटिंग मशीन बिना कोड के नहीं हो सकती। जब आर्टीफीशियल इण्टेलीजेंस का युग और सशक्त होगा तो मशीनें और ताकतवर होंगी और उनकी कोडिंग और भी आसान होगी। फोरट्रान 4 की प्रोग्रामिंग और एलगॉरिथ्म मैं इंजीनियरिंग के दूसरे साल में लिख रहा था; उसके बाद इंजीनियरिंग का एबीसीडी न जानने वाले भी अपना ब्लॉग और वेबसाइट बनाने लगे। आज छठी कक्षा का विवस्वान कोडिंग कर एप्प बना ले रहा है। यह विधा और सरल बनती जायेगी। वे माता-पिता जो यह कल्पना करते हैं कि कोडिंग सीख कर उनका बच्चा बिलगेट्स या स्टीवजॉब्स की तरह धनी बन जायेगा – उन्हे शायद बहुत निराशा हो। बहुत सम्भव है आज की सामान्य (और कठिन स्तर की भी) कोडिंग अगले दशक में एआई के जिम्मे हो जाये।

आने वाला कोडिंग स्किल-सेट पिछले युग का कारपेण्टरी हुनर सरीखा है। मेरे विचार से वह आपको एक नये क्रियेशन का आनंद दे सकता है; बहुत कुछ वैसे जैसे आप रंदा, आरी और हथौड़ी का प्रयोग सीख लें और एक मेज या कुर्सी बना सकें। उसे बना लेने का थ्रिल बहुत होगा; पर वह आपको अमीर बनाने से रहा।

विवस्वान पाण्डेय

कला का काफी हिस्सा भी आगे जाकर एआई के जिम्मे हो सकता है। पर विवस्वान तबला वादन या स्केच/पेण्टिंग से जिस मानसिक परिवर्तन से गुजर रहा है; जो सशक्तता उसे अपनी सोच विकसित करने में मिल रही है; वह लम्बे समय तक – विवस्वान की पूरी पीढ़ी तक आर्टीफीशियल इण्टेलिजेंस रिप्लेस रही कर सकती।

कोडिंग शायद बहुत सामान्य सा हुनर हो भविष्य में; पर उसमें अगर दर्शन शास्त्र, इतिहास या पुरातत्व की समझ, मानव मेधा के विषय का समावेश किया जाना हो, तो मात्र कोडिंग काम नहीं आयेगी। मेरे ख्याल से आने वाले दशकों में वकील, डाक्टर, इंजीनियर और अनेक ब्ल्यू कॉलर के काम तो एआई के जिम्मे जा सकता है। आपकी कारें मशीन चला सकती है; नहीं, पूरे शहर की कारें और वाहन एक सुपर यातायात कम्प्यूटर चला सकता है और वाहन चालक निरर्थक हो सकते हैं; पर एक दार्शनिक, एक कलाकार, एक क्रियेटिव लेखक को मशीन अभी एक दो पीढ़ी तक तो रिप्लेस नहीं कर सकतीं!

विवस्वान की ओर वापस लौटूं। उसकी कोडिंग मजेदार है। पर उसका तबला वादन, उसकी जिज्ञासा, उसका ओरीजिनल स्केच, उसकी अपने को विभिन्न माध्यमों से अपने को अभिव्यक्त करने की बढ़ती क्षमता और बौद्धिक मांसपेशियों का उत्तरोत्तर सशक्त होना – वह ज्यादा आशा जगाता है। शायद वह अगर अपने पिता से अर्थ जगत के गुर सीखे और पैसे/धन के अर्जन और उसके अच्छे-बुरे प्रभावों के बारे में अपनी सोच पुख्ता करे तो वह उसे और भी तैयार करेगा भविष्य के लिये। कोडिंग तो उसे सीखनी चाहिये यह जानने के लिये कि आने वाले समय में एआई की मशीनें कितनी सशक्त होंगी और उनसे कैसे काम लिया जाये या उनके दुष्प्रभावों से कैसे निपटा जाये।

और केवल विवस्वान को ही यह नहीं सीखना। मुझ जैसा सीनियर सिटिजन जो अभी दो या तीन दशक जीने (और सार्थक तरीके से जीने) की इच्छा रखता है; उसे यह सब करना होगा।

(नोट – यह बड़ी खुरदरी सी पोस्ट है और मेरे अपने विचार भविष्य में परिवर्तित/परिवर्धित होंगे; इसकी मुझे पूरी आशा/आशंका है! 😆 )


श्री नीरज रोहिल्ला जी की फेसबुक पर की गयी टिप्पणी उधृत है, ताकि भविष्य में लिंक की जा सके –

खुरदरी पोस्ट तो कहीं से नहीं है ये। विवस्वान की पढ़ाई के अलावा अन्य रुचियाँ देखकर मन बहुत प्रसन्न हुआ, और केवल रुचि ही नहीं उन विधाओं में समय/मन लगाकर मेडिओकर से आगे बढ़ने की ललक भी दिखती है।

व्हाइट हैट जूनियर के गैर-जिम्मेदार विज्ञापन और माता पिता को इमोशनल ब्लैकमेल कर प्रोडक्ट पुश करने के मामले सामने आ रहे हैं। इस विषय पर आपकी बेटी के क्या अनुभव रहे जानना रोचक होगा। कोडिंग कक्षाओं के बाद अगर आगे रुचि हो तो बहुत से और भी अच्छे मुफ्त रिसोर्सेस हैं इंटरनेट पर। आशा है खान एकेडमी के बारे में आपको पता ही होगा, इसके फाउंडर इमरान खान की कहानी दिलचस्प है।

Khanacademy.org

एमआईटी का ओपन कोर्स वर्क्स (OCW) भी लाजवाब है और मुफ्त है, लेकिन वो स्नातक स्तर के लिये है, कभी फुरसत में YouTube पर MIT OCW लेबल वाले वीडियो देखिएगा, अच्छा लगेगा।

सबसे अच्छा लगा विवस्वान का तबला बजाना और उनके अध्यापक का गायन।


गोविंद लॉकडाउन में बम्बई से लौट तीन बीघा मेंं टमाटर उगा रहे हैं

वे लॉकडाउन के समय बंबई से अपने घर वापस लौटे थे। वहां ऑटो चलाते थे। यहां समझ नहीं आया कि क्या किया जाये। फिर यह सब्जी उगाने की सोची।


बहुत से लोग अब पुन: मेट्रो शहरों में पलायन कर गये हैं। बसें भर भर कर जा रही हैं। बहुत सी बसों का किराया महानगरों के कारखाना मालिक सीधे बस वालों को ऑनलाइन भर रहे हैं। मैं यह जानता हूं, इसलिये कि मेरे साले साहब – विकास दुबे बस मालिक हैं। उनकी बसें जो लॉकडाउन में गांव में खड़ी कर दी गयीं थीं, अब सब ठीकठाक बिजनेस कर रही हैं। विकास के बस करोबार पर तो फिर कभी लिखूंगा; अभी तो एक ऐसे व्यक्ति के बारे में बताना है जो महानगर वापस नहीं लौटा।

मैंने कमहरिया के योगेश्वरानंद आश्रम जाते समय देखा कि सड़क से जुड़े एक विस्तृत इलाके में जाली की बाड़ लगी है और उसमें एक मचान भी बना है। पहले यह जगह कुशा/कास/सरपत की घास से भरी होती थी। कोई खेती वहां नहीं होती थी। गंगा के पास यह इलाका – करीब 100-200 बीघा – यूं ही कास उगे बंजर जैसा हुआ करता था। बीच बीच में कहीं कोई बाजरा या ज्वार की फसल दिखाई देती थी। वहां इस तरह की बाड़ और मचान का मिलना मन में कौतूहल जगा गया।

अगले दिन उसी स्थान पर साइकिल पर जोन्हरी का डंठल लादे आते एक सज्जन मिले। नाम बताया शिवशंकर सिंह। वे कमहरिया गांव के ही निवासी हैं। वे बोले कि केवटाबीर की ओर का कोई यादव है, जिसने यह किराये पर जमीन ले कर टमाटर की खेती शुरू की है।

कमहरिया गांव के शिवशंकर सिंह

“यह जमीन पंद्रह साल पहले तक बहुत उपजाऊ थी। जब हल बैल से खेती होती थी तो पूरे इलाके में खेती किसानी से गुलजार रहता था। पास में जो कुंआ है, उसमें ट्यूबवेल था सिंचाई के लिये। फिर खेती करने वाले रहे नहीं। नयी पीढ़ी शहर जा कर नौकरी में लग गयी। बहुत से लोगों ने औने पौने भाव में जमीन बेच दी। अब यह बाहर से आ कर टमाटर की खेती करने लगे हैं।”

शिवशंकर सिंह जी से बात कर हटा ही था कि मोटर साइकिल पर खेती करने वाले तीन चार सज्जन आ गये। उनमें गोविंद जी से बात हुई। गोविंद ही यह टमाटर की खेती का काम कर रहे हैं।

गोविन्द, बरैनी के रहने वाले। उन्होने कमहरिया में टमाटर की खेती प्रारम्भ की है।

गोविंद मुझे एक तरफ से बाड़ हटा कर अपने खेत में ले कर गये। मैं वहां उनके मचान की फोटो लेना चाहता था। वह भी लिया। उसके साथ उनके इस व्यवसाय के बारे में भी बातचीत की। वे मुझसे बातचीत करते कुछ असहज थे – किसी भी अपरिचित से अपने नये शुरू किये उद्यम की बात करने में जो असहजता होती थी, वह थी। अपने बारे में कोई बढ़ चढ़ कर कहने की प्रवृत्ति नहीं दिखी उनकी। मेरे प्रश्नों के उत्तर भर दिये।

गोविंद के खेत के बीच में बना मचान

वे लॉकडाउन के समय बंबई से अपने घर वापस लौटे थे। वहां ऑटो चलाते थे। यहां समझ नहीं आया कि क्या किया जाये। फिर यह सब्जी उगाने की सोची। यह जमीन पूरी तरह जंगली घास से भरी थी। अपने खेत के बाहर उगी कुशा की ओर दिखा कर कहा कि सब जमीन वैसी ही थी। उसको मेहनत से खेत में बदला। टमाटर की पौध लगाई। अब तक पौध काफी बड़ी हो चुकी होती पर एक बार घणरोज (नीलगाय) का झुण्ड उन्हें चर गया।

गोविंद ने मुझे टमाटर के पौधे दिखाये जिनके तने के ऊपरी भाग की डण्डी नीलगाय द्वारा चर ली गयी थी। यह पुख्ता बाड़ शायद उस दुर्घटना के बाद लगाई हो। सिंथेटिक मोटी जाली की बाड़ मुझे मजबूत और आकर्षक लगी।

दूर किनारे पर कुआं भी दिखाया गोविंद ने। उसमें ट्यूबवेल लगा है। बिजली की सप्लाई आती है। वहां से लपेटा पाइप के जरीये खेत के बीचोंबीच बनाये एक गड्ढे में पानी भरते हैं वे और वहां से छोटे बर्तनों के द्वारा प्रत्येक पौधे को सींचा जाता है। अभी पूरे खेत पर पौधे नहीं लगे हैं। शायद आधे से कम हिस्से पर ही खेती हो पायी है। पर जुताई कर पूरी जमीन बुआई के लिये तैयार है।

गोविंद के खेत के बाहर की कुशा/सरपत वाली जमीन। नेपथ्य में जो एक अलग पेड़ दिखता है, वहां कुआं है, जिससे गोविंद के खेत में पानी की सप्लाई मिलती है।

खेत के आसपास की जमीन भी खाली है; यद्यपि उसे भी खेत के रूप में विकसित करने में मेहनत लगेगी। गोविंद ने स्पष्ट तो नहीं बताया, पर शायद वे अपनी सब्जी की खेती के लिये आसपास की जमीन भी लेने का विचार भी कर रहे हो! इस तरह की जमीन को खेत के लिये परिवर्तित करना एक भागीरथ प्रयत्न सरीखा है। मैंने गोविंद को मेहनत और उससे मिलने वाले लाभ के विषय में उनके गणित को जानने हेतु कुछ प्रश्न किये। उनका कहना था कि काम शुरू भर कर दिया है। बहुत सोच विचार की जहमत नहीं उठाई। शायद इस तरह की शुरुआत एक एडवेंचर सरीखी है – उसके बारे में पूरा रुपया-आना-पाई का हिसाब लगा कर शुरुआत करने वाले मेरी तरह के लोग होते हैं – जो आकलन ही करते रह जाते हैं; शुरुआत ही नहीं करते। गोविंद, लगता है जैसे जैसे समस्यायें आती होंगी, वैसे वैसे उससे जूझते होंगे। पर उनकी प्रकृति का अंदाज तो भविष्य में उनसे निरंतर आदान-प्रदान से ही लग सकेगा।

गोविंद के खेत में पंद्रह बीस मिनट मैंने व्यतीत किये होंगे। उनका मोबाइल नम्बर भी, भविष्य में सम्पर्क करने के लिये ले लिया। मेरे मन में उनके प्रॉजेक्ट का भविष्य और सफलता जानने की जिज्ञासा प्रबल है। लॉकडाउन के बाद महानगर वापस न लौट कर यहीं एक सार्थक व्यवसाय की जद्दोजहद करने वाले गोविंद एक ऑउटलायर तो हैं ही। लकीर से हट कर चलने वाले हर व्यक्ति के प्रति मन में जिज्ञासा भी होती है और शुभेक्षा भी।

आखिर, गांव में साइकिल ले कर निकलने – देखने – लिखने वाला मैं भी एक ऑउटलायर ही तो हूं।

मुझे अच्छा लगेगा, अगर पाठक गोविंद को उनके उद्यम के लिये शुभकामना देंगे। उन्हें सफल होना ही चाहिये।


बाढ़ू का नाम कैसे पड़ा?

बाढ़ू ने बताया कि सन 1948 की बाढ़ में जन्म होने के कारण उनका नाम बाढ़ू पड़ गया और वही नाम चलता चला आ रहा है।


बाढ़ू मेरे मित्र हैं। सन अढ़तालीस की पैदाइश। उस हिसाब से मुझसे सात साल बड़े हुये।

मेरे घर दही ले कर आते थे, तभी से उनसे मित्रता हुई। घर में दही की जरूरत न भी होती थी, तो मैं उनसे आधा किलो या एक पाव जरूर खरीदता था। उसके साथ उनकी बातें सुनने को मिलती थीं। बीच में वे मुझे दूध भी बेचने लगे थे। पर वह सिलसिला चला नहीं।

बाढ़ू यादव।

आजकल बाढ़ू ने अपनी पाही पर भन्टा लगाया है। कुछ दिन पहले उनसे तीस रुपये का बैंगन लिया था बाटी-चोखा के भुर्ता के लिये। उस समय मेरे पास खुल्ले पैसे नहीं थे तो आज साइकिल भ्रमण के दौरान उन्हे देने के लिये उनकी पाही पर रुका। सवेरे का समय। बाढ़ू मड़ई के बाहर रखी चौकी पर नहीं थे। पास के अपने सब्जी के खेत में थे। वहां से निकल कर सडक के किनारे मुझसे मिलने और बातचीत करने आये।

प्रगल्भ हैं बाढ़ू। बताने लग गये कि सन अढ़तालीस की बाढ़ के समय उनकी पैदाइश हुई। उस साल बाढ़ आयी थी। वैसी बाढ़ फिर कभी नहीं आयी। उस बाढ़ में उनका द्वारिकापुर का घर गिर गया था और उनका जन्म अपने घर की बजाय ठाकुर साहब के ओसारे में हुआ।

बाढ़ में जन्म होने के कारण उनका नाम बाढ़ू पड़ गया और वही नाम चलता चला आ रहा है।

“जब मेरा जन्म हुआ था तो गांव में बहुत एका था। बहुत भाईचारा। माई बताती हैं कि उस समय हर घर से दो-चार रोटी बन कर माई के सऊरी में होने के कारण आती थीं। कुल मिला कर तीन चार बित्ता रोटियाँ हो जाती थीं। हर घर वाला बाढ़ की विपदा के बावजूद सहायता को तत्पर रहता था।”

“ये मास्टर (मेरे बड़े साले साहब – पण्डित डा. देवेंद्रनाथ दुबे, जो स्कूल मास्टर नहीं, प्रोफेसर थे) , मेरे साथ यहीं तुलसीपुर के प्राइमरी स्कूल में पढ़ते थे। आधी छुट्टी में अपने घर ले जाते थे। वहां खिचड़ी खाने को मिलती थी। खा पी कर फिर आते थे हम लोग स्कूल। घिऊ मजे क होत रहा खिचड़ी में (घी खूब होता था खिचड़ी में)।”

बाढ़ू अपने बचपन और अतीत के वर्णन में चले गये थे। मुझे घर लौटने की जल्दी थी। मैं उन्हे वापस लाया। चलते चलते उनका हाल पूछा। बताया कि “गोड़वा क चोट त ठीक होइ ग बा, पर घेटुना अब पकड़ई लाग बा। बुढ़ाई क असर बा (पैर की चोट तो अब ठीक हो गयी है पर घुटना अब जकड़ने लगा है। उम्र का असर हो रहा है)।”

मैंने कहा कि फुर्सत से उनके साथ बैठूंगा और उनकी जीवन गाथा सुनूंगा। सात साल बड़े होने के बावजूद बाढ़ू मुझसे ज्यादा स्वस्थ हैं और उनकी याददाश्त और बोलने की शक्ति में कोई कमी नहीं है। पिछले छ-सात दशकों में गांवदेहात कैसा बदला है और उसपर एक ग्रामीण क्या राय रखता है, वह बताने के लिये बाढ़ू एक उपयुक्त व्यक्ति हैं।

आप अपेक्षा कर सकते हैं कि बाढ़ू से बाद में मैं मिलता और गांवदेहात को गहनता से जानने – लिखने के लिये इनपुट्स लेता रहूंगा।


सतर्क रेल कर्मी, बसंत चाभीवाला

आठ किलोमीटर की पेट्रोलिंग करता है बसंत रोज। उसके कंधे पर जो औजार और फ्लैग पोस्ट होता है, उसका वजन आठ-दस किलो होता है। सवेरे सवेरे, भोर की वेला में सर्दी-गर्मी-बरसात झेलता उस वजन के साथ रेल पटरी-गिट्टी पर चलता है बसंत। निगाहें पटरी की दशा और चाभियों की कसावट पर रखनी होती है। … आजकल सेना के जवानों का प्रशस्ति गायन फैशन में हैं। पर बसंत चाभीवाले की नौकरी कौन कम साधुवाद की है?!


बसंत को मैंने कटका रेलवे स्टेशन के पास अपनी पोस्ट-रिटायरमेण्ट रिहायश बनाने के बाद सन 2016 के प्रारम्भ में पहली बार देखा था। सवेरे सवेरे वह कोहरे के मौसम में मफलर पहने चला जा रहा था अपने काम पर। इधर उधर ताकता-झांकता और ढीली पैण्डरोल क्लिप्स को अपने हथौड़े से कसता वह बढ़ रहा था। बहुत ही फोटोजीनिक दृष्य था वह। मैंने साइकिल खड़ी कर उसके कई चित्र, कई कोणों से लिये थे। उसका चित्र इतना पसंद आया था कि कई साल तक बसंत मेरे फेसबुक के कवर पर बना रहा। उसके मफलर पहने चित्र को देख कर बहुत सी टिप्पणियों में उसे अरविंद केजरीवाल कहा गया। यद्यपि बाद में लिये उसके चित्रों में वह मुझे नाना पाटेकर जैसा लगा! 😆

उस समय को बीते साढ़े चार साल हो गये। बीच में कई बार अपनी बीट में काम करता दिखा बसंत। हर बार मैंने एक दो चित्र लिये उसके। कालांतर में वह दिखना बंद हो गया। मैंने सोचा कि शायद कहीं तबादला हो गया हो उसका। पर हाल ही में वह पुन: दिखा। तेईस नम्बर रेल फाटक की गुमटी पर खड़ा था। बताया कि गेटमैन टॉयलेट में है। बाहर निकले तो उसके हस्ताक्षर अपनी डायरी में ले कर आगे बढ़े।

उसकी बीट कटका स्टेशन के पूरब में एक किलोमीटर पहले से प्रारम्भ हो कर पश्चिम में माधोसिंघ की ओर चार किलोमीटर जाती है। आठ किलोमीटर की पेट्रोलिंग करता है बसंत रोज। उसके कंधे पर जो औजार और फ्लैग पोस्ट होता है, उसका वजन आठ-दस किलो होता है। सवेरे सवेरे, भोर की वेला में सर्दी-गर्मी-बरसात झेलता उस वजन के साथ रेल पटरी-गिट्टी पर चलता है बसंत। निगाहें पटरी की दशा और चाभियों की कसावट पर रखनी होती है। … आजकल सेना के जवानों का प्रशस्ति गायन फैशन में हैं। पर बसंत चाभीवाले की नौकरी कौन कम साधुवाद की है?!

बसंत गेटमैन के इंतजार में रुका था और मैं बसंत से बात करने के लिये। उससे पूछने पर पता चला कि वह यहीं रहता रहा है सालों से। मुझे बीच में नहीं दिखा तो वह मात्र संयोग था। अकेला रहता है कटका स्टेशन पर बने क्वाटर में। रहने वाला रांची का है। मैने बात करने के लिहाज से उसे बताया कि मेरी बिटिया वहीं बोकारो में रहती है। उसने कहा – “बहुत अच्छा है झारखण्ड! यह तो यहां के लोग हैं जो जानते नहीं वहां के बारे में। कहते हैं कि पिछड़ा इलाका है, जंगल है। कभी इन लोगों ने देखा नहीं है।”

दो दिन बाद सवेरे छ बजे यूंही मुझे लगा कि साइकिल सैर के दौरान बसंत से मिला जाये। यह सोचा कि अपनी ड्यूटी पर वह निकलने वाला होगा। या शायद निकल गया हो। मैंने साइकिल कटका स्टेशन पर खड़ी की। स्टेशन मास्टर साहब से पूछा तो उन्होने बताया कि अभी वह स्टेशन पर तो नहीं आया। स्टेशन का सफाईवाला साथ में मुझे उसका घर दिखाने ले गया।

बसंत की कॉलोनी का रास्ता। एक बार लगा कि लौट चला जाये। कुछ उपेक्षित सा है यह इलाका।

क्वाटर पर लखंदर (सफाईवाला) ने आवाज लगाई पर बसंत का कोई उत्तर नहीं मिला। उसने अंदर जा कर बसंत को जगाया। बसंत का रेस्ट था और वह सो रहा था। थोड़ी देर में वह उनींदा सा बाहर आया। उसे यह अंदाज नहीं था कि कोई पुराना विभागाध्यक्ष उसे ढ़ूंढता उसके क्वार्टर पर आयेगा।

बसंत -थोड़ी देर में वह उनींदा सा बाहर आया।

जब आप किसी के बारे में लिखना चाहते हैं तो अपने रुतबे या ईगो को दरकिनार कर चलते हैं। मैं वही कर रहा था। वैसे भी रिटायरमेण्ट के बाद कर्मचारी और अधिकारी पासंग में होते हैं। कोई आपको इज्जत दे या लिहाज करे तो यह आपका सौभाग्य। अन्यथा, एक ब्लॉगर को उसकी अपेक्षा नहीं करनी चाहिये।

मैंने बसंत का मोबाइल नम्बर लिया। उसपर घण्टी दी तो पता चला कि उसकी बैटरी डिस्चार्ज्ड है। एक की-मैन के लिये मोबाइल की अहमियत ऑफ ड्यूटी और रेस्ट पर होने के दौरान कुछ खास नहीं होती।

अगले दिन सवेरे उसके पेट्रोल ड्यूटी पर निकलते समय मैं कटका स्टेशन पर ही उससे मिला। वह वर्दी पहने अपने उपकरणों से लैस था। मैंने पूछा कि पटरियों की दशा कैसी है?

“ठीक ही है। पण्डराल (पैण्डरोल क्लिप – pandrol clips) कसने पड़ते हैं। वैसे पिछले दो तीन साल में दो बार मैंने टूटी पटरी देख गाड़ी रुकवाई है।” – बसंत ने जवाब दिया। उसने बताया कि वह म्यूचुअल ट्रांसफर की कोशिश कर रहा है रांची जाने के लिये। मुझसे अनुरोध किया कि मैं एडीईएन साहब को कह दूं कि उसका अप्रूवल दे दें। मैंने उसे अपने केस के कागज की प्रति ले कर घर पर अगले दिन मिलने को कहा। पर वह आया नहीं। शायद झिझक के कारण या शायद यह समझ कर कि कुछ करा पाना मेरे प्रभाव क्षेत्र में नहीं होगा। रिटायर्ड आदमी इस तरह के बहुत से “शायद” की कल्पना कर लेता है और उन्हे बुनता रहता है! 😆

वह रेल की पटरियां देखता आगे बढ़ने लगा। एक जगह तीन चार चाभियां कसीं। एक पैण्डरोल क्लिप छिटक कर गिरी हुई थी, उसे लगा कर हथौड़े से ठोंका। वहीं से मुझे बोला – यहां जर्क लगता है। पण्डराल बहुत ढीले होते हैं यहां।

एक कुशल चाभी वाला अपने ट्रेक के चप्पे चप्पे से परिचित होता है। कहां पैकिंग लूज है, कहां गिट्टी में मिट्टी ज्यादा है। कहां रेल में नुक्स है – विजुअल परीक्षण से उसे बहुत कुछ पता रहता है। बसंत वैसा ही रेल कर्मी लगा।

वह अपने पेट्रोलिंग में काम करता आगे बढ़ता गया। मैंने अपनी साइकिल संभाली गंगा किनारे जाने के लिये। यह सोचा था कि अगले दिन वह मुझसे मिलेगा तो उसके यहां अकेले रहने और झारखण्ड में उसके परिवार के बारे में पता करूंगा। पर वह आया नहीं। वैसे भी आगामी महीनों में उसका म्यूचुअल ट्रांसफर अगर हो गया तो वह चला ही जायेगा अपने देस।

इस सर्दी के मौसम में मैं रेलवे के कर्मियों से मिल कर उनके बारे में जानना/लिखना चाहता हूं। इससे मेरी पुरानी यादें भी उभर कर आयेंगी और रेल का सम्पर्क जो पिछले तीन साल से जो लगभग शून्य है; रिवाइव हो सकेगा। पर देखता हूं कि वह सब करने के लिये अपने अतीत के रुतबे के बहुत से मानसिक अवरोध साफ करने होंगे। किसी सामान्य ग्रामीण से मिलना, बोलना बतियाना और उसकी झोंपड़ी में उसकी खाट पर बैठना सरल है; रेल के किसी अमले से वैसी आत्मीयता सहज स्थापित करना कठिन है। बसंत के मामले में, बहुत प्रयास के बावजूद मैं आधा अधूरा ही सफल हो पाया।

पर यह सफलता भी बुरी नहीं! कोशिश करते रहो, जीडी!


श्री वी.के. पंजियार, मरेप्र, वाराणसी रेल मण्डल

लम्बे अर्से तक रेल से दूर रहा। पिछले तीन साल से मैंने कोई पास नहीं लिया, कोई रेल यात्रा नहीं की। पर पिछले सप्ताह वाराणसी के मण्डल रेल प्रबंधक श्री वी.के. पंजियार जी से मुलाकात हुई। मैंने उनसे अनुरोध किया कि वे अगले छ महीने के दौरान (जब मौसम बाहर निकलने, मिलने जुलने के लिये मुफीद रहता है) मुझे 20-25 रेल कर्मियों से मिलने और उनपर ब्लॉग पोस्टें लिखने के लिये सामग्री एकत्र करने की सहायता करें। डीआरएम साहब ने उपयुक्त सहायता का आश्वासन दिया। आज एडीआरएम प्रवीण कुमार जी से भी सम्पर्क हुआ। अब लगता है रेल-कर्मियों पर नियमित ब्लॉग लिखना हो सकेगा। … रेल का सम्पर्क फिर जुड़ेगा। एक अलग प्रकार से!



राजेश की गुमटी और गांव के सामाजिक-आर्थिक बदलाव

राजेश में विनम्रता भी है। वह अदब से बात करता है। वह सफल हो सकता है। और मैं चाहता हूं कि वह सफल बने। वह गांव (सवर्णों) के जुआरी-गंजेड़ी और निकम्मे नौजवानों की भीड़ से अलग अपनी जमीन और पहचान बनाये। यह आसान नहीं है। पर यह सम्भव है।


मेरे गांव के लिये जो सड़क नेशनल हाईवे 19 की सर्विस रोड से निकलती है; उसके मुहाने पर दो गुमटियाँ लग गयी हैं। उनमें से एक गुमटी किलनी की है। दूसरी राजेश की। राजेश के बारे में बताया गया कि वह बम्बई रिटर्न्ड है। वहां मिठाई की दुकान पर कुशल कारीगर था। यहां कोरोना संक्रमण के पहले ही आ गया था; इसलिये उसके बम्बई से रीवर्स पलायन की वजह कुछ और होगी।

राजेश, अपनी गुमटी में समोसे बनाता हुआ

उस रोज राजेश अपनी गुमटी में जलेबियां निकाल चुका था। समोसे का मसाला बनाने के बाद उसे मैदे के कोन में भर कर तलने ही जा रहा था कि मैं वहां से गुजरा। मैंने पूछा -कितने में मिलेंगे कच्चे समोसे?

राजेश ने बताया कि तैयार समोसे छ रुपये जोड़ा बिकते हैं। कच्चे वह पांच रुपये जोड़ा दे देगा। मैंने एक दर्जन खरीदे।

राजेश ब्राह्मण है। राजेश दुबे।

इस गांव में ब्राह्मण विपन्नता में हैं। पर वे अपनी जातिगत ऐंंठ के कारण गुमटी लगाने, समोसा चाय बेचने जैसे काम में नहीं लगे हैं। महिलायें दरिद्रता में जीवन निभा रही हैं पर घर के बाहर और खेतों पर काम करने नहीं निकल रहीं। कथित नीची जाति की महिलायें और पुरुष, जो भी काम मिल रहा है, कर रहे हैं। उनके पास जमीनें नहीं हैं, फिर भी वे अपेक्षाकृत ठीक आर्थिक दशा में हैं।

मैं राजेश को इस बात के लिये अच्छा समझता हूं कि उसने इस छद्म सवर्ण बैरियर को तोड़ कर चाय-समोसे की दुकान तो खोली है।

उसकी गुमटी वाली दुकान के सामने मैंने अपनी साइकिल रोक कर कुछ न कुछ लेना प्रारम्भ किया है। कभी कच्चे समोसे, कभी जलेबी और कभी (अपनी पसंद से बनवाये) कम चीनी वाले पेड़े। अभी तीन किलो बूंदी के लड्डू भी खरीदे। मेरी पत्नीजी भी स्वीकार करती हैं कि राजेश के काम में हुनर है। उसके पास पूंजी होती और मौके पर दुकान तो अच्छी चल सकती थी। पर गांव में हाईवे से सटी गुमटी भी एक सही जगह बन सकती है भविष्य में। अगले पांच साल में, अगर विकास की प्रक्रिया अवरुद्ध नहीं हुई तो यह गांव एक क्वासी-अर्बन सेटिंग हो जायेगा। तब राजेश की यह गुमटी एक ठीकठाक मिठाई की दुकान या रेस्तरॉ का रूप ले सकती है। अगले पांच साल का अवलोकन करना रोचक होगा…

राजेश नियमित नहीं था अपनी गुमटी खोलने में। एक दिन पूछा कि गुमटी रोज क्यों नहीं खुलती? बताया कि बच्चे को फोड़ा हो गया था, उसके साथ बुखार। सो डाक्टर के पास ले जाने के कारण दुकान बंद रही।

राजेश की बिक्री कम होने का एक कारण यह भी है कि यदा कदा उसकी गुमटी बंद रहती है। दुकान नियमित न होने से ग्राहक छिटक जाते हैं।

मैं जानता हूं कि उसका बताया यह कारण न सही है और न पर्याप्त। पर उसको “मोटीवेट” करने के लिये उसकी दुकान पर रुकने और उससे सामान लेने का जो उपक्रम मैंने किया है – उसके बाद देख रहा हूं कि दुकान नियमित खुल रही है।

उसका बेटा, आदर्श भी साथ में बैठता है दुकान पर। छठवीं क्लास में पढ़ता है। आजकल स्कूल नहीं चल रहे। वह सामान तोलता है और गल्ले से पैसे का लेन देन भी जानता है। मेरे घर सामान देने भी वही आया था। मॉपेड चला लेता है।

राजेश की गुमटी। गल्ले पर बैठा उसका लड़का आदर्श। राजेश समोसे के लिये मैदा गूंथ रहा है।

दो पीढी में बहुत बदला है गांव। राजेश के बाबा या उसके पहले के लोग (छोटी जमीन की होल्डिंग के ही सही) किसान होते रहे होंगे। उसके बाद लोग महानगरों को पलायन किये। अधिकांश ड्राइवर बने – उनके पास पूरे देश में घूमने और ट्रक चलाने की कथायें हैं। ड्राइवर बनने के साथ उन्होने देश तो देखा, पर ट्रक चालक के दुर्गुण भी गांव-समाज में वे लाये। राजेश मुम्बई में मिठाई की दुकान पर रहा तो उसके पास एक वैकल्पिक काम का हुनर है। बिजनेस करने का शऊर भी है। महानगरों के कुछ ऐब भी हैं। उसके कारण जो कमाया वह गंवा चुका है। पर अब एक नयी शुरुआत की सम्भावना बन रही है। अगर वह मेहनत से काम करे, तो अगले दशक में बदलती गांव की तस्वीर का एक प्रमुख पात्र बन सकता है।

राजेश में विनम्रता भी है। वह अदब से बात करता है। वह सफल हो सकता है। और मैं चाहता हूं कि वह सफल बने। वह गांव (सवर्णों) के जुआरी-गंजेड़ी और निकम्मे नौजवानों की भीड़ से अलग अपनी जमीन और पहचान बनाये। यह आसान नहीं है। पर यह सम्भव है। सवर्णता की वर्जनाओं का सलीब ढोते इन नौजवानों के पास कुछ खोने को नहीं है; सिवाय अपनी दकियानूसी वर्जनाओं के। उन्हें अपने खोल से निकल कर, छोटे पैमाने से ही सही, एक नयी पहल करनी चाहिये।

मेरे लिये राजेश उस आर्थिक-सामाजिक परिवर्तन का सिपाही है। देखना है कि वह अपनी और अपने परिवेश की गलत आदतों और वर्जनाओं में फंस कर रह जाता है या परिवर्तन के नये आयाम तलाशता-बनाता है। एक पहल तो उसने की है।

उसकी सफलता की कामना करता हूं मैं।