गोविंद लॉकडाउन में बम्बई से लौट तीन बीघा मेंं टमाटर उगा रहे हैं

वे लॉकडाउन के समय बंबई से अपने घर वापस लौटे थे। वहां ऑटो चलाते थे। यहां समझ नहीं आया कि क्या किया जाये। फिर यह सब्जी उगाने की सोची।


बहुत से लोग अब पुन: मेट्रो शहरों में पलायन कर गये हैं। बसें भर भर कर जा रही हैं। बहुत सी बसों का किराया महानगरों के कारखाना मालिक सीधे बस वालों को ऑनलाइन भर रहे हैं। मैं यह जानता हूं, इसलिये कि मेरे साले साहब – विकास दुबे बस मालिक हैं। उनकी बसें जो लॉकडाउन में गांव में खड़ी कर दी गयीं थीं, अब सब ठीकठाक बिजनेस कर रही हैं। विकास के बस करोबार पर तो फिर कभी लिखूंगा; अभी तो एक ऐसे व्यक्ति के बारे में बताना है जो महानगर वापस नहीं लौटा।

मैंने कमहरिया के योगेश्वरानंद आश्रम जाते समय देखा कि सड़क से जुड़े एक विस्तृत इलाके में जाली की बाड़ लगी है और उसमें एक मचान भी बना है। पहले यह जगह कुशा/कास/सरपत की घास से भरी होती थी। कोई खेती वहां नहीं होती थी। गंगा के पास यह इलाका – करीब 100-200 बीघा – यूं ही कास उगे बंजर जैसा हुआ करता था। बीच बीच में कहीं कोई बाजरा या ज्वार की फसल दिखाई देती थी। वहां इस तरह की बाड़ और मचान का मिलना मन में कौतूहल जगा गया।

अगले दिन उसी स्थान पर साइकिल पर जोन्हरी का डंठल लादे आते एक सज्जन मिले। नाम बताया शिवशंकर सिंह। वे कमहरिया गांव के ही निवासी हैं। वे बोले कि केवटाबीर की ओर का कोई यादव है, जिसने यह किराये पर जमीन ले कर टमाटर की खेती शुरू की है।

कमहरिया गांव के शिवशंकर सिंह

“यह जमीन पंद्रह साल पहले तक बहुत उपजाऊ थी। जब हल बैल से खेती होती थी तो पूरे इलाके में खेती किसानी से गुलजार रहता था। पास में जो कुंआ है, उसमें ट्यूबवेल था सिंचाई के लिये। फिर खेती करने वाले रहे नहीं। नयी पीढ़ी शहर जा कर नौकरी में लग गयी। बहुत से लोगों ने औने पौने भाव में जमीन बेच दी। अब यह बाहर से आ कर टमाटर की खेती करने लगे हैं।”

शिवशंकर सिंह जी से बात कर हटा ही था कि मोटर साइकिल पर खेती करने वाले तीन चार सज्जन आ गये। उनमें गोविंद जी से बात हुई। गोविंद ही यह टमाटर की खेती का काम कर रहे हैं।

गोविन्द, बरैनी के रहने वाले। उन्होने कमहरिया में टमाटर की खेती प्रारम्भ की है।

गोविंद मुझे एक तरफ से बाड़ हटा कर अपने खेत में ले कर गये। मैं वहां उनके मचान की फोटो लेना चाहता था। वह भी लिया। उसके साथ उनके इस व्यवसाय के बारे में भी बातचीत की। वे मुझसे बातचीत करते कुछ असहज थे – किसी भी अपरिचित से अपने नये शुरू किये उद्यम की बात करने में जो असहजता होती थी, वह थी। अपने बारे में कोई बढ़ चढ़ कर कहने की प्रवृत्ति नहीं दिखी उनकी। मेरे प्रश्नों के उत्तर भर दिये।

गोविंद के खेत के बीच में बना मचान

वे लॉकडाउन के समय बंबई से अपने घर वापस लौटे थे। वहां ऑटो चलाते थे। यहां समझ नहीं आया कि क्या किया जाये। फिर यह सब्जी उगाने की सोची। यह जमीन पूरी तरह जंगली घास से भरी थी। अपने खेत के बाहर उगी कुशा की ओर दिखा कर कहा कि सब जमीन वैसी ही थी। उसको मेहनत से खेत में बदला। टमाटर की पौध लगाई। अब तक पौध काफी बड़ी हो चुकी होती पर एक बार घणरोज (नीलगाय) का झुण्ड उन्हें चर गया।

गोविंद ने मुझे टमाटर के पौधे दिखाये जिनके तने के ऊपरी भाग की डण्डी नीलगाय द्वारा चर ली गयी थी। यह पुख्ता बाड़ शायद उस दुर्घटना के बाद लगाई हो। सिंथेटिक मोटी जाली की बाड़ मुझे मजबूत और आकर्षक लगी।

दूर किनारे पर कुआं भी दिखाया गोविंद ने। उसमें ट्यूबवेल लगा है। बिजली की सप्लाई आती है। वहां से लपेटा पाइप के जरीये खेत के बीचोंबीच बनाये एक गड्ढे में पानी भरते हैं वे और वहां से छोटे बर्तनों के द्वारा प्रत्येक पौधे को सींचा जाता है। अभी पूरे खेत पर पौधे नहीं लगे हैं। शायद आधे से कम हिस्से पर ही खेती हो पायी है। पर जुताई कर पूरी जमीन बुआई के लिये तैयार है।

गोविंद के खेत के बाहर की कुशा/सरपत वाली जमीन। नेपथ्य में जो एक अलग पेड़ दिखता है, वहां कुआं है, जिससे गोविंद के खेत में पानी की सप्लाई मिलती है।

खेत के आसपास की जमीन भी खाली है; यद्यपि उसे भी खेत के रूप में विकसित करने में मेहनत लगेगी। गोविंद ने स्पष्ट तो नहीं बताया, पर शायद वे अपनी सब्जी की खेती के लिये आसपास की जमीन भी लेने का विचार भी कर रहे हो! इस तरह की जमीन को खेत के लिये परिवर्तित करना एक भागीरथ प्रयत्न सरीखा है। मैंने गोविंद को मेहनत और उससे मिलने वाले लाभ के विषय में उनके गणित को जानने हेतु कुछ प्रश्न किये। उनका कहना था कि काम शुरू भर कर दिया है। बहुत सोच विचार की जहमत नहीं उठाई। शायद इस तरह की शुरुआत एक एडवेंचर सरीखी है – उसके बारे में पूरा रुपया-आना-पाई का हिसाब लगा कर शुरुआत करने वाले मेरी तरह के लोग होते हैं – जो आकलन ही करते रह जाते हैं; शुरुआत ही नहीं करते। गोविंद, लगता है जैसे जैसे समस्यायें आती होंगी, वैसे वैसे उससे जूझते होंगे। पर उनकी प्रकृति का अंदाज तो भविष्य में उनसे निरंतर आदान-प्रदान से ही लग सकेगा।

गोविंद के खेत में पंद्रह बीस मिनट मैंने व्यतीत किये होंगे। उनका मोबाइल नम्बर भी, भविष्य में सम्पर्क करने के लिये ले लिया। मेरे मन में उनके प्रॉजेक्ट का भविष्य और सफलता जानने की जिज्ञासा प्रबल है। लॉकडाउन के बाद महानगर वापस न लौट कर यहीं एक सार्थक व्यवसाय की जद्दोजहद करने वाले गोविंद एक ऑउटलायर तो हैं ही। लकीर से हट कर चलने वाले हर व्यक्ति के प्रति मन में जिज्ञासा भी होती है और शुभेक्षा भी।

आखिर, गांव में साइकिल ले कर निकलने – देखने – लिखने वाला मैं भी एक ऑउटलायर ही तो हूं।

मुझे अच्छा लगेगा, अगर पाठक गोविंद को उनके उद्यम के लिये शुभकामना देंगे। उन्हें सफल होना ही चाहिये।


राजेश सरोज – जल्दी ही बम्बई लौट जाऊंगा #गांवकाचिठ्ठा

वह लॉक डाउन के पहले ही गांव आया था, उसके बाद लॉक डाउन हो गया और वापस नहीं जा सका। अब मौका लगते ही फिर वापस जाएगा। वहां का काम राजेश को पसंद है।


कुछ दिन पहले राजेश सरोज का जिक्र था ब्लॉग पोस्ट में –

कल जब मैं द्वारिकापुर घाट पर टहल रहा था, तो वह स्वत: मेरे पास आ कर खड़ा हो गया। मुझसे बात करना चाहता है, जब भी वह दिखाई पड़ता है। कभी कभी वह बम्बई से भी फोन किया करता था। अपने परिवेश से अलग व्यक्ति के साथ जुड़ना शायद उसे अच्छा लगता है।

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Ghurahu, the tailor in village

I’m searching for any other work which could be given to Ghurahu. He may need support at least in this month, till the usual customers come back in sufficient numbers.


He may be around 45-50 years old. His children are making or trading in ornaments in villages nearby; a traditional work as per their caste. It is a bit strange that even a very small village has a saraf (सराफ – person dealing in ornaments). Very poor people also have some ornaments, may be of silver or other Inferior metal.

But Ghurahu is tailor, not a saraf. He sits in front of a shop in Mahrajganj town bazar, with his feet operated sewing machine and a chair. Must be getting reasonable work in normal days. During marriage season, he becomes very busy. It is very difficult for him to meet delivery deadlines in those days.

Ghurahu, the tailor.
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Babu the knife sharpener


He is regular visitor. Comes to our home after a few months. He is Babu, from Babusarai – a village 3-4 kms away. People in villages usually get their agricultural implements sharpened from his bicycle fitted sharpener.

In our case it’s usually the kitchen knives and few odd khurpis (खुरपी).

Babu from Babusarai
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लॉकडाउन काल में मुरब्बा पण्डित काशीनाथ का व्यवसाय #गांवकाचिठ्ठा

उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री जिस तरह प्रदेश में ही व्यवसाय निर्मित करने की बात करते हैं; उसके लिये काशीनाथ पाठक (मुरब्बा पण्डित) एक सशक्त आईकॉन जैसा है।


काशीनाथ पाठक बहुत दिनो बाद कल आये। उन्हें मेरी पत्नीजी ने फोन किया था कि कुछ अचार और आंवले के लड्डू चाहियें।

ऑर्डर मिलने पर अपनी सहूलियत देख वे अपने कपसेटी के पास गांव से मोटर साइकिल पर सामान ले कर आते हैं। सामान ज्यादा होता है तो पीछे उनका बच्चा भी बैठता है ठीक से पकड़ कर रखने के लिये। कल सामान ज्यादा नहीं था, सो अकेले ही आये थे। बताया कि हमारे यहां जल्दी ही घर से निकल लिये थे। सवेरे थोड़ा दही खाया था। अब घर जा कर स्नान करने के बाद एक ऑर्डर का सामान ले कर गाजीपुर की ओर निकलेंगे। किसी बाबू साहब ने 2-3 हजार रुपये का अचार और आंवले का लड्डू मंगाया है।

लॉकडाउन में आपके बिजनेस पर कोई असर पड़ा?

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प्राकृतिक संसाधनों की नोच खसोट गांव का चरित्र बनता जा रहा है #गांवकाचिठ्ठा

शहरों का जो स्वरूप है, सो है। गांवदेहात में पैसा कम है, प्रकृति प्रचुर है। तो प्रकृति को ही बेच कर पैसा बनाने की कवायद (जोरशोर से) हो रही है।



गांव में रहते हुये मेरे भ्रमण का दायरा उतना ही है, जितनी दूर मेरी साइकिल मुझे ले जाये। लगभग 30वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र। नेशनल हाईवे के उत्तर की ओर तो घनी आबादी है। दक्षिण में गंगा के आसपास की दो किलोमीटर की पट्टी में जमीन समतल नहीं है। कहीं सेवार है – जो पहले गंगा की डूब में आ जाता रहा होगा। कहीं करार। मिट्टी भी कहीं उपजाऊ है, कहीं कंकरीली। ज्यादातर लोगों को मोटा अनाज और अरहर बोते देखा है। जहां समतल है और जमीन अच्छी है, वहां धान और गेंहू भी बोते हैं।

गंगा किनारे ज्यादातर बबूल के वृक्ष हैं। वनस्पति के नाम पर झाड़ियां, सरपत और कुशा, भटकैय्या, वन तुलसी आदि हैं।

गंगा उस पार बालू है। समतल इलाका और बालू से भरा क्षेत्र – नदी से दो-तीन किलोमीटर तक फैला।

आबादी का घनत्व इस गांगेय क्षेत्र में अपेक्षाकृत कम है। आबादी का घनत्व कम है तो प्रकृति ज्यादा है।

बबूल का काटा हुआ पेड़। सैकड़ों कटे पेड़ दिखते हैं।
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