स्कूल बंद हैं तो घर में ही खोला एक बच्चे के लिये स्कूल

सात साल की पद्मजा का अध्यापक बनना मुझे कठिन काम लगा। बहुत ही कठिन। एक बच्चे की मेधा और उसकी सीखने के स्तर पर उतर कर सोचना आसान काम नहीं है। केल्कुलस पढ़ाना साधारण जोड़, घटाना पढ़ाने की अपेक्षा आसान है।


सात महीने हो गये। स्कूल बंद हैं। पहली से दूसरी में बिना परीक्षा लिये पंहुच गयी है पद्मजा (मेरी पोती)। कुछ समय ह्वाट्सएप्प पर स्कूल वालों ने होमवर्क देने और नोटबुक पर किये कार्य के उसी चैट में भेजे चित्र को जांचने का यत्न किया। पर वह सब ठीक से चल नहीं पाया। गांव में माता पिता बच्चों को पढ़ाने के लिये स्कूल का पर्याय नहीं बन पाये। उनके पास समय और काबलियत दोनो की कमी रही। अत: स्कूल बंद ही माने जा सकते हैं – उचित टेक्नॉलॉजी और संसाधनों के अभाव में।

पद्मजा के स्कूल की तुलना में सरकारी स्कूल तो और भी दयनीय दशा में हैं। गांव के सरकारी स्कूलों के बच्चे, तो छुट्टा घूम ही रहे हैं। आपस में आसपड़ोस के बच्चों में हेलमेल तो हो ही रहा है। वे अभी भी कोई कोरोना अनुशासन का पालन नहीं कर रहे और स्कूल अगर खुले तो भी स्थिति वैसी ही रहेगी।

मेरी पत्नीजी और मेरी पोती पद्मजा। लगता है किसी चिड़िया या किसी गिलहरी/गिरगिट का अवलोकन हो रहा है।

मैंने पद्मजा के स्कूल के मालिक कैलाश जी से बात की। उन्होने बताया कि इस महीने के अंत तक वे पीटीए मीटिंग बुला कर अभिभावकों से सलाह करने के बाद ही स्कूल खोलने के बारे में कुछ तय कर पायेंगे। वे अपनी ओर से तो पूरा प्रबंधन कर सकते हैं। सेनीटाइजर, मास्क, हैण्डवाश आदि की सुविधा उपलब्ध करा सकते हैं। पर बच्चे तो बच्चे ही हैं। आपस में मिलेंगे ही। एक दूसरे का पानी पी जाते हैं। एक दूसरे का भोजन भी शेयर करते हैं। वह सब कैसे देखा जा सकता है?

महीने भर में; बड़ी कक्षाओं के स्कूल खुलने और अन्य गतिविधियों पर पंद्रह अक्तूबर से ढील दिये जाने के कारण संक्रमण कैसा चलता है और अभिभावक कितना आश्वस्त महसूस करते हैं; उसी आधार पर छोटे बच्चों का स्कूल खोलने का निर्णय हो पायेगा।

मुझे यह पक्के तौर पर लग रहा है की पद्मजा का इस स्कूल सत्र का मामला खटाई में पड़ गया है। अत: मैंने तय किया कि इस साल की सभी विषयों की पूरी पढ़ाई घर पर ही कराई जाये। अभी साल/सत्र के छ महीने बचे हैं। उसको इस साल का पूरा सेलेबस घर पर पढ़ाया-पूरा किया जा सकता है।

इस निर्णय के साथ मैं, एक रिटायर्ड व्यक्ति से एक बच्चे का पूर्णकालिक अध्यापक बन गया। जब मैं, चार दशक पहले, बिट्स, पिलानी में छात्र था, तो मुझे विभागाध्यक्ष महोदय ने मेरी अभिरुचि और योग्यता को ध्यान में रखते हुये मुझे लेक्चररशिप का ऑफर दिया था। तब दिमाग भी उर्वर था और कुछ ही समय में मैं परा-स्नातक और और पीएचडी कर लेता। पर उस समय पारिवारिक दबाव और खुद की चाहत से लगा कि सरकारी अफसरी कहीं बेहतर रहेगी। अगर मैं अपने विभागाध्यक्ष जी का ऑफर स्वीकार कर लेता तो मेरी व्यवसायिक दिशा कुछ और ही होती।

अब परिस्थितियाँ मुझे पहली/दूसरी कक्षा का अध्यापक बना रही हैं। 😆

सात साल की पद्मजा का अध्यापक बनना मुझे कठिन काम लगा। बहुत ही कठिन। एक बच्चे की मेधा और उसकी सीखने के स्तर पर उतर कर सोचना आसान काम नहीं है। केल्कुलस पढ़ाना साधारण जोड़, घटाना पढ़ाने की अपेक्षा आसान है। अपनी पत्नीजी को मैंने अपनी आशंकायें बतायीं, पर मेरी सुनी नहीं गयी। मैं “द कर्स ऑफ नॉलेज” से अभिशप्त था। मुझे पद्मजा के स्तर पर उतर कर सोचने और समझाने की क्षमता विकसित करनी थी।

डिज्नी-बायजू पैकेज

बाजयू की अर्ली लर्न पेकेज वाली कक्षा में पद्मजा

यह मेरा सौभाग्य था कि कुछ महीने पहले डिज्नी-बायजू का अर्ली लर्नर्स का पैकेज पद्मजा के लिये ले लिया था। अभी वह बायजू के टैब से, अपने हिसाब से जो मन आ रहा था, वह कर रही थी। बायजू का यह पैकेज लेने के बाद मुझे लग रहा था कि यह भारतीय (और मेरे संदर्भ में गंवई) परिवेश के लिये फिट नहीं बैठता था। इस कारण से मैंने उसके प्रयोग पर बहुत ध्यान नहीं दिया था।

पर अब मैंने पाया कि भाषा कीं समस्या के बावजूद पद्मजा मेरी अपेक्षा उन डिज्नी चरित्रों से बेहतर तालमेल से पढ़ाये गये विषय समझ रही थी। उसके वीडियो और गेम्स में आने वाले चरित्र – डीटी, जेन और जेक्सन उसे कहीं आसानी से गणित और अंग्रेजी सिखा रहे थे। मैंने उसी पैकेज से अपना टीचिंग प्रारम्भ करने की सोची।

बायजू की फेसिलिटेटर महोदया से बातचीत कर यह तय किया कि पद्मजा का अब तक का पढ़ा प्लान व्यवस्थित तरीके से एक बार पुन: रिवाइज कर लिया जाये और जो कुछ उसने नहीं पढ़ा; उसे पूरा कराया जाये। लगभग एक महीने में मैंने छ महीने के लर्निंग प्लान का बैकलॉग निपटा कर व्यवस्थित कर लिया। इस प्रक्रिया में पद्मजा को कुल चौबीस बैजेज में से बीस प्राप्त हो गये। उसकी विभिन्न स्किल्स में भी अति उत्तम (Excellent) कोटि प्राप्त हो गयी, जो पहले सामान्य स्तर की थी।

महीने भर बाद बायजू की पद्मजा के लिये नियत अधीक्षिका स्वाति प्रिया जी से चर्चा हुई तो उन्होने न केवल पद्मजा की प्रगति पर संतोष व्यक्त किया वरन यह भी कहा कि प्रगति अभूतपूर्व है।

डिज्नी/बायजू का यह टैबलेट सहित आने वाला अर्ली लर्निंग पैकेज अच्छा है; पर फिर भी मैं यह कहना चाहूंगा कि यह इण्डिया के लिये है, भारत के लिये नहीं। आवश्यकता है कि यह हिंदी या हिंगलिश में डब किया जाये और उसमें भारतीय परिस्थितियों के संदर्भ भी लिये जायें। और मुझे यह यकीन है कि बायजू की टीम में पर्याप्त इनहाउस टैलेण्ट होगी।

इस पढ़ाने की प्रक्रिया में बायजू/डिज्नी पैकेज के अलावा मैंने भी अपने इनपुट्स दिये। पद्मजा को यह अहसास कराया कि क्लास में किस प्रकार से अपनी बात को समझाया, बताया जाता है। किस प्रकार से अपने परिवेश को देखा जाता है। किस शब्द का कैसे उच्चारण किया जाता है। कैसे दुनिया को समझा जाता है। मैंने उसके लिये एक ग्लोब मंगाया और उसे विश्व के अनेक स्थानों और भूत काल में की गयी प्रमुख यात्राओं के बारे में भी जानकारी दी। पद्मजा को अब कोलम्बस, वास्कोडिगामा और झेंग हे (Zheng He) जैसे नाविकों के बारे में पता है। यह भी ज्ञात है कि उन्होने कहां से कहां तक यात्रायें की थीं।

मैंने उसे विज्ञान और हिंदी पढ़ाने की रूपरेखा भी बनाई।  

ज्वाइण्ट डायरी

मैंने एक ज्वाइण्ट डायरी बनाई, जिसमें मैंने अपने विचार लिखे और उसमें पद्मजा को भी लिखने, या चित्र बना कर बताने को कहा। मैंने लिखा कि किस तरह पद्मजा ने एक अच्छे सम्प्रेषक की तरह अपना प्रेजेण्टेशन दिया था। वह रात में सभी लाइट बुझा कर बोर्ड पर टॉर्च से फोकस कर एक डॉक्यूमेण्ट्री फिल्म की तरह समझा रही थी। सात साल की बच्ची के लिये यह कर पाना अभूतपूर्व था! कुल मिला कर “द कर्स ऑफ नॉलेज” से मैंने पार पाने की विधा तलाश ली थी और पद्मजा जो शुरुआत में मुझसे डरी सहमी रहती थी, अब मित्र बन चुकी थी। ज्वाइण्ट डायरी में उसने लिखा तो बहुत नहीं, पर उससे उसके व्यक्तित्व में परिवर्तन बहुत हुआ।

पद्मजा अपने ह्वाइट बोर्ड पर तरह तरह के कार्टून बनाती और मुझे उनपर व्याख्यान देती है!

घर का बना स्कूल

मैंने पद्मजा की स्टडी टेबल को नाम दिया बीडीबी (बाबा-दादी-बबिता) स्कूल। यह नाम उसके स्कूल – बीएलबी पब्लिक स्कूल की तर्ज पर रखा गया। अपने कमरे के बाहर यह नाम एक पन्ने पर प्रिण्ट कर बायजू के स्टिकर के साथ लगा दिया। स्कूल का समय भी नियत कर दिया। सवेरे साढ़े नौ बजे और दोपहर साढ़े तीन बजे।

प्रति दिन तीन से चार घंटे के बीच अध्ययन अध्यापन का कार्यक्रम रहता है। अभी तो पुराना बैकलॉग होने के कारण सप्ताह में सातों दिन चला स्कूल पर अब सप्ताह में एक दिन छुट्टी रहने का तय किया है हमने।

घर में मेरे बेडरूम में चलता पद्मजा का स्कूल

पद्मजा समय पर उठने लगी; समय पर क्लास के लिये उपस्थित होने लगी। अपने टैबलेट को विधिवत चार्ज करने लगी। किताबें और एक्सरसाइज बुक्स सम्भाल कर रखने लगी।

पिछले डेढ़ महीनों में घर में बहुत परिवर्तन हुये हैं। मेरा और मेरी पोती के समीकरण में व्यापक परिवर्तन हुआ है। पद्मजा में जो बदलाव है, वह तो अपनी जगह; मुझमें भी परिवर्तन हुये हैं। मुझे भी एक काम मिल गया है।

इस परिवर्तन में कीली की भूमिका डिज्नी/बायजू के अर्ली लर्नर प्रोग्राम ने निभाई है। उसने मुझे छोटे बच्चे को पढ़ाने/समझाने का एक नया नजरिया दिया है। स्वाति प्रिया जी ने भी बहुत सकारात्मक तरीके से मुझे सुना और अपने सुझाव/निर्देश दिये हैं।

फिलहाल मैं बच्चों की मानसिकता की बेहतर समझ के लिये डा. हईम सी गिनॉट (Haim C Ginott) की क्लासिक पुस्तक Between Parent and Child पढ़ रहा हूं। यही सब चलता रहा और स्वाति प्रिया जैसों के उत्साहवर्धक इनपुट्स मिले; तो शायद मेरे ब्लॉग का चरित्र बदल जाये। गंगा किनारे साइकिल पर भ्रमण करने वाले व्यक्ति की बजाय बच्चों पर सोच रखने वाले की पोस्टें आने लगें “मानसिक हलचल” पर। देखें, आगे क्या होता है!

अभी तो पद्मजा विषयक कुछ ही पोस्टें ब्लॉग पर हैं।

पद्मजा पाण्डेय मेज पर बैठ कर कार्टून बनाती और उसकी कथा मुझे सुनाती हुई।

मेरे समधी, रवींद्र कुमार पाण्डेय का कोरोना संक्रमण और उबरना

“यह तो कोरोना है, जिसकी न कोई दवा है न कोई पुख्ता इलाज। बस देख सँभल कर चलना रहना ही हो सकता है। जिस तरह के कामधाम मैं हम हैं वहां अकेले एकांत में तो रहा नहीं जा सकता। लोगों से सम्पर्क तो होगा ही। गतिविधि तो रहेगी ही। बस, बच बचा कर वह कर रहे हैं।”


वे कुछ अस्वस्थ थे। ऑक्सीमीटर 90 की रीडिंग दे रहा था। थोड़ी खांसी और थकान। उनके दोनो बेटों ने उनके गांव (फुसरो, बोकारो, झारखण्ड) में किसी तरह का जोखिम लेने की बजाय उन्हें दिल्ली ले जाने का निर्णय लिया। यद्यपि उन्हें और कोई समस्या नहीं थी। कोई बुखार नहीं आया, कोई कंपकंपी नहीं हुई। पर फिर भी, इस कोरोना काल में कोई भी जोखिम लेने की बजाय उन्हें दिल्ली ले जाना बेहतर लगा विकास और विवेक को।

विकास रवींद्र पांड़े के बड़े बेटे हैंं। विवेक, मेरे दामाद, मंझले। रवींद्र कुमार पाण्डेय इस समय भूतपूर्व सांसद हैं। पिछले पांच बार वे गिरिडीह संसदीय क्षेत्र का लोक सभा में प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। अपने क्षेत्र के भाजपा के सबसे सशक्त नेता हैं और अत्यंत सक्रिय भी!

सतरह अगस्त की शाम को मेरी बिटिया ने पाण्डेय जी की तबियत के बारे में बताया और उसके कुछ ही समय बाद उन्हें सड़क मार्ग से ले कर दिल्ली के लिये रवाना होने की खबर भी दी। यह भी बताया कि रास्ते में सवेरे पांच बजे के आसपास वे लोग हमारे गांव के समीप से गुजरेंगे।

मेरे घर पर श्री रवींद्र पाण्डेय

अठारह अगस्त की सुबह वे लोग एक डेढ़ घण्टे के लिये यहां हमारे घर आये। यद्यपि रवींद्र पाण्डेय जी की बीमारी के बारे में निश्चित तौर पर कुछ ज्ञात नहीं था, हम ने कोरोना संक्रमण की आशंका मानते हुये पूरी सावधानी बरती। वे लोग स्वयम भी सावधान थे। पाण्डेय जी थके हुये लग रहे थे, पर मरीज की तरह बिल्कुल झूल गये हों, वैसा भी नहीं था। अपनी कार से हमारे बराम्दे तक करीब पचास कदम खुद चल कर आये और कुर्सी पर बैठ कर बड़े सामान्य तरीके से बातचीत भी की – “भईया, आप तो बोकारो आये नहीं, हम ही चले आये हैं!” हर साल उनका नवरात्र में विंध्याचल आना होता है माँ विंध्यवासिनी के दर्शन के लिये। जब भी आते हैं तो हमारे यहां मिलते हुये ही वापस लौटते हैं। इस साल लॉकडाउन के कारण आना नहीं हो पाया था। अब अकस्मात आना हो गया।

मैंने देखा कि संक्रमण की पूरी आशंका के बावजूद उनकी पत्नीजी – श्रीमती लक्ष्मी पाण्डेय – उनका पूरा ध्यान रख रही थीं। स्नानघर में उनको तैयार करना, उनके कपड़े पानी से धो कर सूखने को डालना, उनके दवा-भोजन की फिक्र करना बड़ी बारीकी से उन्होने खुद किया। एक पूर्व-सांसद की पत्नी (और वह व्यक्ति, जो भविष्य में भी झारखण्ड की राजनीति में असीमित दमखम रखता हो) इतनी समर्पण भाव से सेवा करती हो – भारतीय नारी की श्रद्धा-मूर्ति लगीं लक्ष्मी पाण्डेय जी।

रवींद्र पाण्डेय और विवेक (दांये) हमारे यहां ब्रंच करते हुये।

पाण्डेय जी का काफिला (दो कारों में थे वे लोग) करीब डेढ़-दो घण्टे में नहा-धो कर और नाश्ता/भोजन कर मेरे यहां से रवाना हो गया। उनके जाने के बाद पूरी सतर्कता बरतते हुये हमने उनके इस्तेमाल किये परिसर को पर्याप्त सेनिटाइज कर लिया।

उनके जाने के बाद, मन में यह संतोष भाव तो था, कि हमने, आशंका के बावजूद अपने अतिथि धर्म को, अपनी क्षमता अनुसार निर्वहन करने का प्रयास किया। फिर भी, मन में यह भी था कि दूरी बना कर मिलने और पूरे समय मास्क लगाये रखने को वे कहीं अन्यथा न ले रहे हों।

वे लोग दिल्ली/गुड़गांव मध्य रात्रि के बाद ही पंहुचे। अगले दिन सवेरे रवींद्र कुमार पाण्डेय और उनकी पत्नीजी ने मेदांता अस्पताल में अपना कोविड-19 टेस्ट कराया। पाण्डेय जी कमजोरी और अन्य लक्षणों के कारण अस्पताल में भर्ती भी हो गये। देर रात में टेस्ट रिपोर्ट में पता चला कि रवींद्र जी कोरोना पॉजिटिव हैं पर उनकी पत्नीजी संक्रमित नहीं हैं।

रवींद्र पाण्डेय जी की फेसबुक पोस्ट

पाण्डेय जी ने अपनी फेसबुक पोस्ट के माध्यम से अपने कोरोना संक्रमित होने की बात सभी को बता भी दी। पर यह भी मुझे लगा कि रवींद्र पाण्डेय खुद कोरोना पॉजिटिव होने के बावजूद, कोरोना स्प्रेडर या सुपर स्प्रेडर नहीं थे; अन्यथा उनकी पत्नीजी, जो बराबर उनके साथ उनकी सहायता को बनी रहीं, जरूर कोरोना पॉजिटिव होतीं।

वे एक सप्ताह तक अस्पताल में रहे। सत्ताईस अगस्त को वे अस्पताल से डिस्चार्ज हुये।

अस्पताल से डिस्चार्ज होने पर श्री रवीन्द्र पाण्डेय। साथ में उनकी पत्नी श्रीमती लक्ष्मी और बेटा विकास

अस्पताल से छुट्टी पाने के बाद करीब एक पखवाड़ा वे दिल्ली में अपने फ्लैट में रहे। कुछ दिनों पहले वे अपने झारखण्ड आवास (फुसरो, बोकारो) आ गये हैं।

आज एक महीना हो रहा है अस्वस्थता के कारण दिल्ली यात्रा किये हुये। हमारे अपने करीबी में एक वही व्यक्ति हैं, जिन्हे कोरोना की आशंका के साथ मैंने पास से देखा और जो उसके बाद कोरोना पॉजिटिव पाये गये और संक्रमण से विधिवत उबर भी गये।

मैंने रवींद्र कुमार पाण्डेय जी से महीना भर गुजरने पर फोन पर बात की। उनका कहना था – “भईया, एक आदमी तीन दिन साधारण बुखार में रहता है तो एक पखवाड़ा तक कहता रहता है कि बहुत कष्ट है। यह तो कोरोना है, जिसकी न कोई दवा है न कोई पुख्ता इलाज। बस देख सँभल कर चलना रहना ही हो सकता है। जिस तरह के कामधाम मैं हम हैं वहां अकेले एकांत में तो रहा नहीं जा सकता। लोगों से सम्पर्क तो होगा ही। गतिविधि तो रहेगी ही। बस, बच बचा कर वह कर रहे हैं।”

उन्होने तो नहीं कहा, पर बातचीत से लगता था कि उनका स्वास्थ्य पूर्ववत तो नहीं है। अपने मूवमेण्ट्स में कुछ तो कमी उन्हे करनी पड़ी है। राजनैतिक सक्रियता उनकी प्रकृति में है और आसन्न विधान सभा उपचुनाव के कारण अनिवार्यता भी है। अतः वे एकांतवास तो कर ही नहीं पाएंगे।

कोरोना महामारी से निपटने का हर वर्ग का तरीका और रिस्पॉन्स कुछ कुछ अलग है। आईटी वाले घर में बैठ कर काम कर रहे हैं। दुकानदार और डिजिटल बन रहे हैं। बिल्कुल देसी गांव की दुकान वाला भी फोन पे का स्कैन कोड लगा लिया है। शिक्षा अधिकाधिक ऑन लाइन हो रही है। पर रवीन्द्र पाण्डेय जी की राजनैतिक पीढ़ी (मेरे अंदाज में) अनुकूलन की तकनीकें स्वीकारने में फिसड्डी है। उन्हें अपने जन संपर्क को ज्यादा से ज्यादा डिजिटल बनाना चाहिए। यह संक्रमण से पहले भी जरूरी था और अब तो बहुत ही जरूरी हो गया है। पाण्डेय जी के पास डिजिटल दक्ष नौजवान होने चाहिएं और उनको भाव भी मिलना चाहिए।… पर मैं जानता हूँ कि वे करेंगे अपने हिसाब से ही। परिवर्तन हर एक के लिए कठिन है और राजनेता के लिए; जिसकी ईगो को पुष्ट करने के लिए कई लोग आगे पीछे घूमते हैं; तो और भी कठिन है।

एक बात और – पोस्ट कोविड समस्यायें – विशेषकर सीनियर सिटिजन के लिये; भले ही उनकी देखभाल बड़ी अच्छी तरह होती हो; एक गम्भीर वास्तविकता हैं। इसके बारे में ज्यादा कुछ पढ़ने को नहीं मिलता। वह भी कोविड-19 जानकारी का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिये।

कोरोना संक्रमण अब दूर की खबर नहीं रही। अपने आसपास, अपने सम्बंधियों में भी सुनने को आ रहा है। इस विषाणु के साथ लगभग साल भर और गुजारना है। यह समय सकुशल गुजर जाये, इसकी तैयारी रहे और सावधानी भी – इसी की कामना की जाती है।


कोरोना की मानसिक थकान दूर करने के काम

कोरोना थकान दूर करने के लिये शहराती लोग योगा-शोगा कर, किताब पढ़ या रस्सी टाप कर अपनी फोटो सटा रहे हैं सोशल मीडिया पर। हमारे पास तो यही गतिविधि है। उसी के फोटो ही सही!


थक गये हैं कोरोना से। पहले पहल तो घर के बाहर के दरवाजे को रोज सेनिटाइजर लगा लगा कर दो तीन बार मला जाता था। दसमा दूध ले कर आती थी तो दूध के बर्तन को डिस्पोजेबल नेपकिन से पकड़ कर दूध उंडेला जाता था अपने भगौने में। सब्जी वाले से सब्जी खरीद कर चार पांच घण्टा बाहर रख दी जाती थी, जिससे वायरस थक हार कर उसे छोड़ चला जाये। कल्पना में हर जगह कोविड-19 के वायरस गेंद ही नजर आते थे।

कोरोना बचा, बाकी सब कुछ होल्ड पर चला गया। परिसर में जंगली घास बढ़ने लगी। बसंत धोबी को इस्त्री करने के कपड़े देने में आनाकानी होने लगी। कोई भी बाहर से आये तो उसका हाथ पहले सेनीटाइज किया जाने लगा। साबुन और हैण्डवाश दे कर उन्हे पर्याप्त कोरोनामुक्त कराने का मानसिक आश्वासन पाने लगे हम। फिर भी मन में दगदग बनी रहती थी कि कहीं चिपक तो नहीं गया कोरोना।

अब लगता है उसमें से यद्यपि बहुत कुछ जरूरी था; पर कुछ खालिस ओवर रियेक्शन था।

तय किया कि घास को साफ कर घर के पास के और भाग में खडंजा बिछाया जाये

मोनोटोनी तोड़ने के लिये तय किया कि बेतरतीब उग आयी घास और कांग्रेस घास को साफ कराया जाये। घर के सामने के भाग में खडंजा बिछाया जाये जिससे नियमित साफसफाई रखने में झंझट कम हो सके। इसी बहाने गांव के दो-चार लोगों की दिहाड़ी बन सकेगी, जो अभी लॉकडाउन के चक्कर में बिना काम घूम रहे हैं।

पत्नीजी ने कहा – कोई धर्मार्थ कार्य करने की बजाय इसी मद में खर्च कर परिवेश भी ठीक करा लिया जाये और काम की तलाश कर रहे गांव वाले जरूरतमंद बंधुओं की सहायता भी हो जाये।

सो कोरोना फेटीग (मानसिक थकान, ऊब) को मिटाने के लिये कल से यह काम कराया जा रहा है। पत्नीजी को तीन-चार काम करने वालों को नाश्ता देने, पानी-चाय-बिस्कुट का इंतजाम करने और उनपर सवेरे आते ही हाथ साबुन से धोने की गुहार लगाने का आनंद मिलने लगा है। वे उनपर अपनी कोरोना विषयक जानकारी का प्रवचन दे लेती हैं। बिना प्रवचन दिये, उनकी सेहत पर भी बुरा असर पड़ रहा था। 😆

अकेले टीवी के सामने बैठने की बजाय उन लोगों से पर्याप्त सोशल डिस्टेंस बनाते हुये भी काम कराना बेहतर अनुभव है। कल तो सफाई कराते समय एक पांच फुट का सांप भी निकल आया। बहुत डेन्जरस टाइप नहीं लग रहा था पर इधर उधर डोल जरूर रहा था। उसे अवसर दिया गया कि कहीं बाहर चला जाये। जब उसमें बहुत यत्न कर भी सफल नहीं हुये तो उसका वध करने का निर्णय लिया गया। बेचारा!

उसके निपटारे में भी एक घण्टा व्यतीत हुआ।

पांच फुट से ज्यादा लंबा सांप

पता नहीं, गांव-पड़ोस के लोगों को एम्प्लॉय कर यह काम कराना मोदी-जोगी जी की लॉकडाउन अवधारणा का कितना उल्लंघन है। पर अच्छा खूब लग रहा है। टीवी देखने से ज्यादा मन रम रहा है।

सवेरे बगल के गांव का एक दम्पति आता है सब्जी ले कर।

सवेरे बगल के गांव का एक दम्पति आता है सब्जी ले कर। कुछ उनके खेत का उगाया है और कुछ मण्डी से। ज्यादा जरूरत नहीं है सब्जी की। पर उनसे खरीद ली जाती है। उसमें भी विचार यही है कि भले ही सब्जी थोड़ी ज्यादा ही बने, उन लोगों का कुछ फायदा तो हो सके। इस लॉकडाउन के समय में बेचारे बाजार तक तो जा नहीं सकते अपनी सब्जी ले कर!

कोरोना थकान दूर करने के लिये शहराती लोग योगा-शोगा कर, किताब पढ़ या रस्सी टाप कर अपनी फोटो सटा रहे हैं सोशल मीडिया पर। हमारे पास तो यही गतिविधि है। उसी के फोटो ही सही! 😆


कोरोना के आंकड़े अब घूरने लगे हैं

अब लोग हाइड्रॉक्सी क्लोरोक्वीन या रेमडेसिविर (remdesivir) जैसे टंगट्विस्टर दवाओं के नामों का उच्चारण करने लगे हैं। अब यह नहीं कहते कि गर्मी बढ़ते ही कोरोना गायब हो जायेगा। या फिर दो-चार महीनों में इसका टीका ईजाद हो जायेगा।


लॉकडाउन के पहले की बात है, गुन्नीलाल पांड़े जी ने कहा था कि यह काशी-विंध्याचल-संगम के बीच का क्षेत्र है। कोरोना का यहां कोई असर नहीं होगा। उस दिन (अठारह मार्च) की यह रही ट्वीट –

गुन्नीलाल जी उस दिन यह कह, शायद मुझे सांत्वना दे कर, मेरा कोरोनावायरस विषयक तनाव कम कर रहे थे। पर उस दिन के बाद उनसे मुलाकात नहीं हुई। उसके बाद जनता कर्फ्यू हुआ, और फिर लॉकडाउन। कालांतर में लॉकडाउन का एक्स्टेंशन। लोगों से यदा कदा उनकी खबर मिलती रही। पाण्डेय जी अपने घर से नहीं निकले और मैं भी उनकी ओर नहीं गया।

अब, कल बात हुई गुन्नीलाल जी से फोन पर। बोले –

“यह आसानी से जाने वाला नहीं है। कोई टीका नहीं है इसका और कोई इलाज भी नहीं। बस बच कर ही रहा जाये।”

Continue reading “कोरोना के आंकड़े अब घूरने लगे हैं”

आज के चित्र – मेदिनीपुर, पठखौली और इटवा

घास छीलने वाली सवेरे सवेरे निकल पड़ी थीं। आपस में बोल बतिया भी रहे थीं। गर्मी बढ़ रही है। गाय-गोरू के लिये घास मिलनी कम हो गयी है। उसके लिये इन महिलाओं को अब ज्यादा मशक्कत करनी पड़ने लगी है।


मेदिनीपुर, पठखौली, इटवा उपरवार, हुसैनीपुर/महराजगंज, बनवारीपुर, दिघवट – ये मेरे लिये वैसे ही नाम हैं, जैसे कोई देश-परदेश वाला बोस्टन, मासेचुसेट्स, कैलीफोर्निया, फ्लोरिडा, स्टॉकहोम, शांघाई और सिंगापुर के बारे मेँ कहता होगा।

मेरे बिट्स, पिलानी के बैचमेट्स और रेलवे के वेटरन अफसरों ने मुझे ह्वाट्सएप्प ग्रुपों मेँ मुझे जोड़ रखा है। उन ग्रुपों में वे लोग इन बड़े बड़े जगहों की बात करते हैं। कोई खुद वहां हैं, किसी के बच्चे वहां हैं। और कुछ तो अभी एक्टिव हैं और अपने कामधाम के सिलसिले में इन स्थानों की यात्रा करते रहते हैं। पर मेरे जीवन में तो यही आसपास के गांव और बटोही – मेरी साइकिल की सवारी भर है। 😦

Continue reading “आज के चित्र – मेदिनीपुर, पठखौली और इटवा”

गांव देहात में रेवड़ रोगप्रतिरोधकता Herd Immunity

जब जनसंख्या का 60-70 फ़ीसदी भाग यह प्रतिरोधकता अपने में विकसित कर लेगा तो रोग का प्रसार रुक जायेगा और वह समाज से गायब हो जायेगा।


हर्ड इम्यूनिटी बहुत सुनने में आ रहा है। बहुत से लोग कह रहे हैं कि कोरोना वायरस का टीका मिलना आसान नहीं है। छ महीने में मिल सकता है, दो साल भी लग सकते हैं। या यह भी हो सकता है कि इस वायरस का कोई टीका मिले ही न! इस लिये रेवड़ रोगप्रतिरोधकता (हर्ड इम्यूनिटी) ही सही तरीका है इस रोग से लड़ने का।

प्रधानमन्त्री-इन-वेटिंग अव्वल तो पप्पू हैं। पर कल उन्होने सही कहा कि लॉकडाउन केवल पॉज़ बटन है। डिलीट बटन नहीं। समस्या बस यही थी कि उनके पास डिलीट बटन का कोई आइडिया नहीं था।

उसका एक आइडिया स्वीडन के पास है। वहां वे अपने देश में वृद्धों को बचाते हुये जवान पीढ़ी को हिलने मिलने दे रहे हैं। इस प्रकार उनकी सोच है कि लोग कोविड19 से जूझें और रेवड़ रोगप्रतिरोधकता (herd immunity) का विकास हो। जब जनसंख्या का 60-70 फ़ीसदी भाग यह प्रतिरोधकता अपने में विकसित कर लेगा तो रोग का प्रसार रुक जायेगा और वह समाज से गायब हो जायेगा। यह सोच अन्य देशों से भिन्न है और इस कारण से स्वीडन की आलोचना भी हो रही है। वहां लोग पास के अन्य नोर्डिक राष्ट्रों की तुलना में ज्यादा मर रहे हैं। पर फिर भी स्वीडन अपनी सोच पर अडिग है और रोग से बचाव के लिये यह जोखिम उठाने को तैयार है।

स्टॉकहोम – स्वीडन में लोग रेस्तरां जा रहे हैं और हिलमिल रहे हैं। Business Insider से लिया चित्र
Continue reading “गांव देहात में रेवड़ रोगप्रतिरोधकता Herd Immunity”