नई पौध के लिये नर्सरी तो जाना ही है! #गांवकाचिठ्ठा

नर्सरी जा कर कुछ मोगरे के पौधे तो लाने ही हैं। यूं, कोरोना काल में बाहर निकलने का खतरा तो है। … पर सावधानी से डर को किनारे करते चलना है।


बहुत दिनों से कुछ लिखा नहीं। विषय की कमी हो, ऐसा तो कतई नहीं है। समय की कमी का तो प्रश्न ही नहीं है। बस, तारतम्य नहीं बना। पिछली पोस्ट 14 मई को लिखी थी, आज डेढ़ महीने बाद लिख रही हूं। इस बीच मेरे पति की पोस्टें (लगभग) आती रही हैं।

कोरोना संक्रमण गांव में चारों ओर से घेरने लगा है। आरोग्य सेतु पर पांच किलोमीटर के इलाके में तो कोरोना का कोई मरीज नहीं दिखता, पर पांच से दस किलोमीटर की परिधि में 4-5 मामले नजर में आते हैं। जो समस्या अभी बड़े शहरों में थी, और हम कहते थे कि यह बड़े जगहों की बीमारी है, वह अब गांव की तरफ न केवल आ रही है बल्कि तेजी से फैल रही है। इसके साथ साथ दिनचर्या भी, पहले की ही तरह सामान्य करने की कवायद भी चल रही है। बार बार, बहुत से लोग कह रहे हैं कि हमें इसके साथ जीने की आदत डाल लेनी चाहिये।

गांव में घर
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गांवदेहात में नजदीक आता कोरोनावायरस और बढ़ता तनाव

कोरोना फैलाव से तनाव बढ़ रहा है तो वह जातिगत सम्बंधों में दिखने लगा है। जाति समीकरण भंगुर प्रतीत होते हैं। मनरेगा में भी एक जाति वाले दूसरी जातियों से सोशल डिस्टेंस बना कर काम कर रहे हैं।


कल बाबूसराय के राजू जायसवाल के किराना स्टोर पर जा कर महीने का सामान उठाना था। रविशंकर जी ने कहा कि आप आने से पहले फोन कर पता कर लीजियेगा। अभी अभी पता चला है कि पास के गांव में कोरोना का एक पॉजिटिव मामला सामने आया है। बड़ी संख्या में पुलीस और सरकारी अमला आया है।

रविशंकर की आवाज में थोड़ी हड़बड़ाहट थी। भदोही जिले का यह ग्रामीण इलाका अब तक शांत था। महामारी के प्रकोप से बचा हुआ। मुम्बई से आये एक व्यक्ति को नारायणपुर-कलूटपुर गांव में पॉजिटिव पाये जाने से सब माहौल खलबला गया है। गांव सील कर दिया है। उसके अलावा लोग हदस गये हैं।

मेरा वाहन चालक बताता है कि अनेक गांव वाले खुद ही अपने गांव की बैरीकेडिंग करने लगे हैं। किसी बाहरी को आने नहीं देना चाहते।

पास के एक गांव में कुछ लोग बम्बई से आये हैं पर उनकी तहकीकात करने जब भी पुलीस आती है, वे छुप जाते हैं। उनके परिजन निश्चय ही मदद करते होंगे छुपने में। इस बात को ले कर तनाव रहा होगा, तभी उनकी जाति और अन्य के बीच मारपीट भी हो गयी है। पुलीस केस बना है मारपीट से।

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कोरोना और किराना

कोरोना का काल हमें कोहनिया रहा है कि हम गांव वाले बनें। किराना के सामान के प्रकार और गुणवत्ता को ले कर व्यक्तित्व में जो अफ़सरी तुनक बाकी रह गयी है (रिटायरमेण्ट के चार साल बाद भी) वह खतम होनी चाहिये। चॉकलेट की बजाय गुड़ की भेली और नूडल्स की बजाय देसी सेंवई पर सन्तोष करना चाहिये।



एक महीने का राशन इकठ्ठा कर लिया था जनता कर्फ़्यू के पहले। फ़िर लॉकडाउन हुआ। अब लॉकडाउन 2.0 होने जा रहा है। गांव से बाहर निकलने की सम्भावना ही नजर नहीं आ रही। वैसे भी महीने का एक बार सामान बनारस या इलाहाबाद के बिगबाजार/स्पैन्सर्स के स्टोर से लिया करते थे। अब वहां जाना कहां हो पायेगा?

कार में बीस लीटर तेल भरवा लिया था लॉकडाउन के पहले। उसके बाद से कार खड़ी ही है। ड्राइवर भी समझ गया है कि कहीं निकलना होगा ही नहीं। सो उसने हाजिरी लगाना बन्द कर दिया है। अब महीना बीतने पर पैसा लेने के लिये ही दर्शन दिये उसने।

एक गाड़ी आने लगी थी घर पर किराने का सामान ले कर। दो तीन बार आयी, फ़िर आना बन्द हो गया। उस गाड़ी वाले को शायद घर घर सप्लाई करना पूरता नहीं था। या यहां गांव में पर्याप्त ग्राहकी नहीं बन सकी थी। … वैसे भी सामान की क्वालिटी बहुत अच्छी नहीं थी कि उसकी प्रतीक्षा हो।

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भाग, करोना भाग!

नौ बजे, पास के बस्ती के कुछ बच्चे जोर जोर से “भाग, करोना भाग!” का सामुहिक नारा भी बार बार लगा रहे थे। … कुल मिला कर पूरे देश के एक साथ होने का भाव गहरे में महसूस हो रहा था।


आज की रीता पाण्डेय की अतिथि ब्लॉग पोस्ट –


चैत्र शुक्ल पक्ष की द्वादशी (अप्रेल 5, 2020)। रात 9 बजे जब सभी बत्तियां बन्द हुईं और मिट्टी के दिये जगमगा रहे थे, तब आसमान में भी चांद की रोशनी उजाला कर रही थी और वातावरण साफ़ होने के कारण तारे टिमटिमा रहे थे। धूल का कण भी नही‍ं था।

एक आहसास गहरे में था कि पूरा हिन्दुस्तान एक साथ दिया जला कर प्रार्थना कर रहा है कि इस धरती को सुरक्षित रखना, प्रभु! गहरी आध्यात्मिक अनुभूति थी, मानो हर कोई जल-थल-नभ को दूषित करने के लिये क्षमा याचना कर रहा हो।

मन की यह भाव यात्रा का रास्ता दिखाया था प्रधानमन्त्री जी ने। शायद वे जानते हैं कि सामुहिक प्रार्थना में बहुत बल होता है। वे जमीन से जुड़े व्यक्ति हैं। भारत के जन मानस को पहचानते हैं, और सामुहिकता की ताकत को भी। दशकों बाद एक ऐसा नेता हमारे बीच है जिसके आवाहन पर पूरा देश एक साथ खड़ा हो जाता है।

जब मैं छोटी थी, तब सुना था कि प्रधानमन्त्री लालबहादुर शास्त्रीजी ने जनता से अपील की थी कि अनाज के संकट के कारण लोग एक दिन एक वख्त का भोजन ही करें जिससे युद्धग्रस्त भारत पर विदेश का दबाव कम हो सके। उनके आवाहन पर सहर्ष लोगों ने उपवास किया था। उनके आवाहन पर कई माताओं बहनो ने अपने आभूषण उतार कर देश रक्षा के लिये दान कर दिये थे।

पांच अप्रेल को ऐसे ही एक आवाहन ने मन में एकता और सन्तुष्टि का भाव जगाया।

बच्चे काफ़ी उत्साहित थे। मेरी पोती चीनी (पद्मजा पांडेय) दिया जलाने को ले कर बहुत उत्सुक थी। घण्टा भर पाह्ले से तैयारी शुरू कर दी थी और दीवार पर लगी घड़ी पर बराबर नजर लगाये हुई थी।

नौ बजे, पास के बस्ती के कुछ बच्चे जोर जोर से “भाग, करोना भाग!” का सामुहिक नारा भी बार बार लगा रहे थे। कहीं कहीं पटाके और आतिशबाजी के प्रयोग भी हो रहे थे। कुल मिला कर पूरे देश के एक साथ होने का भाव गहरे में महसूस हो रहा था।

विलक्षण अनुभव था!

दिये जलाये हमने!

पिछले सप्ताह के मेरे कोविड19 विषयक ट्वीट्स

भविष्य की ट्वीट्स इसी तरह ब्लॉग पर लम्बे समय के लिये रखने और बाद में सर्च करने की सहूलियत के लिये संजोता रहूंगा।


बाईस मार्च को मन में यह था कि कोरोना वायरस शहरी फिनॉमिना है और गांव में रहते हुए उससे बेहतर तरीके से बचा जा सकता है। यह ट्वीट थी उस दिन –

उस दिन जनता कर्फ्यू था। शाम के समय हमने ताली, थाली, घण्टी और शंख बजाया।

अगले ही दिन खबर मिली कि बम्बई से किराये पर एसयूवी ले लोग उसमें ठुंस कर आये हैं गांव वापस। और तब लगने लगा कि गांव शायद उतना सुरक्षित नहीं, जितना सोचता था। शहर का वायरस गांव में भी फैलेगा और यहां शहर जैसी स्वास्थ्य सुविधाएं सोची भी नहीं जा सकतीं।

चौबीस मार्च को शाम प्रधान मंत्री जी ने सम्बोधन किया। इक्कीस दिन के राष्ट्रीय लॉकडाउन की घोषणा की। उसके बाद तुरंत हम अपना घर अलग थलग करने और अपना काम खुद करने की योजना बनाने में लग गये।

कई तरह के विचार थे। कई तरह के पूर्वाग्रह। भारत में कोरोना का संक्रमण का असर कम होगा। काशी-विंध्याचल-प्रयाग की यह पावन(?) धरती अछूती रहेगी कोरोना से। और गर्मी में कोरोना अपने आप भस्म हो जायेगा। ये सभी ख्याली पुलाव थे।

पच्चीस मार्च को शाम घूमने निकला मैं। गंगा किनारे तक गया। अकेले और सोशल डिस्टेंस बनाये हुये। पर परिवार और बोकारो से मेरी बिटिया वाणी ने इस एडवेंचर का कड़ा विरोध किया।

कोरोना के कारण घर में बाहरी लोगों का प्रवेश बंद कर दिया। काम करने वाली महिलायें भी वर्जित। घर की साफसफाई परिवार वाले ही करने लगे। मेरी पत्नीजी का काम बढ़ गया। पर उसके साथ उन्होने रोज आधे घण्टे का समय निकाल अतिथि ब्लॉग पोस्ट लिखना प्रारम्भ किया। वे लगभग नियमित हैं इस कार्य में।

मेरे पठन के साथ नेटफ्लिक्स पर मूवी देखने का काम भी जुड़ गया। लगभग एक फिल्म रोज देखने लगा मैं। कभी-कभी देर रात तक। सामाजिक या इमोशनल फ़िल्में नहीं; सस्पेंस और एक्शन वाली! 😁

राजन भाई (मेरे पहले साइकिल भ्रमण के संगी हुआ करते थे) मेरे घर शायद किसी पारिवारिक मनमुटाव के कारण नहीं आते थे। वे सुबह-शाम की चाय के समय आने लगे। दूर बैठते हैं। सामाजिक डिस्टेंस बना कर। उनसे गांव की खोज खबर मिलती रहती है!

सरकार ने सब्जी, फल, किराना आदि घर घर सप्लाई करने के लिये ठेले और छोटी गाड़ी वालों को परमिट जारी किये। उनके पास रेट लिस्ट भी लगी रहती है। उनसे नियमित आने से बड़ी राहत मिली।

दूरदर्शन ने लोगों को घर में बांधने के लिये रामायण, महाभारत आदि सीरियल फिर प्रारम्भ किये। लोगों को बांधने में ये पर्याप्त सफल प्रतीत हो रहे हैं।

गांव में सप्लाई करने वाले किराना वालों का सामान मन माफिक ब्राण्ड का नहीं है, फिर भी यह सेवा बहुत अच्छी लग रही है। कुछ नहीं से यह सेवा लाइफ लाइन सरीखी है।

उनके फोन नम्बर भी नोट करना प्रारम्भ कर दिये मैंने। किराना, दवा, सब्जी वालों के नम्बर अब मेरे फोन की कॉन्टेक्ट लिस्ट में हैं।

कोरोना का कहर चल रहा है। लोग भयभीत हैं। गांव में भी सड़केँ वीरान हैं। आधे से ज्यादा लोग किसी न किसी तरह का मॉस्क पहने हैं। पर प्रकृति कोरोना से बेखबर है। गेंहू की फसल हमेशा की तरह पक गयी है और आम के बौर टिकोरों को जन्म दे चुके हैं।

यह कठिन समय है और जिन्दगी भर याद रहेगा। भविष्य की ट्वीट्स इसी तरह ब्लॉग पर लम्बे समय के लिये रखने और बाद में आसानी से पाने करने की सहूलियत के लिये संजोता रहूंगा।


कोविड19, दहशत, और शहर से गांव को पलायन – रीता पाण्डेय की पोस्ट

यह दहशत शहर वालों का ही रचा हुआ है! वहां है प्रदूषण, भागमभाग, अकेलापन और असुरक्षा। गंदगी शहर से गांवों की ओर बहती है। वह गंदगी चाहे वस्तुओं की हो या विचारों की। गांव में अभी भी किसी भी चीज का इस्तेमाल जर्जर होने तक किया जाता है। कचरा बनता ही कम है।


कल की पोस्ट के बाद रीता पाण्डेय ने यह लिखा –

मेरी एक परिचित ने फोन पर पूछा कि अगर (गांव में) पित्जा खाने का मन हो तो मैं क्या करती हूं? उन्होने कहा कि वे लोग तो पित्जा और कोल्डड्रिंक के बिना रह ही नहीं सकते। वो तो गांव के इन चीजों के बिना जीवन की सोच भी नहीं सकतीं। मुझे उनपर हंसी आयी।

एक दूसरे परिचित ने कहा कि क्या ग्लैमरस लाइफ है आपकी। इतना बड़ा घर और इतनी हरियाली! बड़े शहर में तो इसका ख्वाब ही देख सकते हैं।

गांव की हरियाली

इन लोगों को अपने और गांव के बारे में यह सब याद आ रहा है कोरोनावायरस के चक्कर में।

गांव में कुछ दिन पहले कुछ यादव और कुछ दलित बस्ती के लोग किराये पर टेक्सी कर मुम्बई से भाग कर आये। दिहाड़ी कमाने वाले लोग हैं वे। जब वहां सब बंद हो गया तो रहने और जीविका के लाले पड़ गये। उनके आने पर गांव वालों ने नाराजगी जताई। बताते हैं कि अभी वे अपने घर में ही हैं और चुपचाप रह रहे हैं।

कुछ सवर्ण भी, जो बाहर नौकरी करते थे, अपने वाहन से परिवार समेत गांव आये। प्रश्न उठा, मन में, कि ये सब लादफांद कर गांव क्यों आ रहे हैं? पहले, हमारे बचपन में, स्कूल कॉलेज बंद होने पर हम लोग भाग कर गांव आते थे और गर्मियों में मजे में यहां रहते थे। अब मेट्रो शहरों में लॉकडाउन है। स्कूल कॉलेज, ऑफिस, बाजार, मनोरंजन के साधन और निकलने-घूमने की जगहें, सब बंद हैं। और दहशत और है, ऊपर से। इससे, जिसके पास विकल्प है, जिसके पास गांव में ठिकाना है; वह वापस दौड़ लगा रहा है (अगर चांस लग रहा है, तब)।

यह दहशत शहर वालों का ही रचा हुआ है! वहां है प्रदूषण, भागमभाग, अकेलापन और असुरक्षा। गंदगी शहर से गांवों की ओर बहती है। वह गंदगी चाहे वस्तुओं की हो या विचारों की। गांव में अभी भी किसी भी चीज का इस्तेमाल जर्जर होने तक किया जाता है। कचरा बनता ही कम है।

गांव की अपनी समस्यायें हैं – शिक्षा की या चिकित्सा की। पर ये भी प्रशासनिक फेल्योर का नतीजा हैं। मनरेगा में पैसा झोंक कर ग्रामीणों को विधिवत अकर्मण्य बनाया गया। और अब खेती जैसे मेहनत के काम में मन न लगना उसी के कारण है।

इन सब के बावजूद; अभी भी गांव सहज है, सामान्य है और जागरूक है। दहशत टेलीवीजन फैला रहा है। वैसे यह भी है कि कोरोनावायरस के प्रति जागरूकता भी टेलीविजन से ही आयी है। दूसरे, शहर से भाग कर गांव में आने वाले गांव को कहीं ज्यादा भयभीत कर रहे हैं। वर्ना, गांव की आंतरिक रचना में किराना, दूध, सब्जी जैसी रोजमर्रा की चीजों की कोई समस्या नहीं।

गांव

हां, पित्जा और कोल्डड्रिंक नहीं मिल रहा है! पर वह इस माहौल में तो शहरियों को भी नसीब नहीं है! 😆