पॉडकास्टिकी और बदलती मनस्थिति


अपना खुद का पॉडकास्ट करने के लिये अपनी आवाज सुनने की मनस्थिति बन रही है। अपने उच्चारण में खामियाँ नजर आने लगी हैं। मोबाइल से या माइक से मुंह की कितनी दूरी होनी चाहिये, उसकी तमीज बन रही है।

पॉडकास्ट गढ़ते तीन तालिये


उन लोगों के कहे में वह ही नहीं होता जो आप सोचते हैं। पर उससे कहीं बेहतर होता है, जो आप सोचते हैं। यही मजा है तीन ताल पॉडकास्ट का। मैं अनुशंसा करूंगा कि आप इस सीरीज के सभी पॉडकास्टों का श्रवण करें, करते रहें। इसका नया अंक आपको शनिवार देर रात तक उपलब्ध होता है।

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