औरंगाबाद के रंजन कुमार


गांवदेहात डायरी वह आगे चलता दिखा—दो झंडे लिये। एक तिरंगा और एक धर्म को दर्शाता तिकोना। मैं पीछे से साइकिल पर था। चलते-चलते ही उसका चित्र लिया और फिर उसके पास जाकर साइकिल रोक दी। पूछा—यह क्या लिये हैं और कहां जा रहे हैं? उसने कहा—“राधे राधे।” मैंने अपना प्रश्न दो बार दोहराया। दोनों बारContinue reading “औरंगाबाद के रंजन कुमार”

साइकिल से घुमक्कडी करते कुंदन आर्य 


गांवदेहात डायरी वह नौजवान साइकिल पर आगे एक बोर्ड लगाये था और पीछे कैरियर पर एक बैग। पहली नज़र में लगा—कोई फेरीवाला होगा, जो सवेरे-सवेरे निकल पड़ा है। गांव में ऐसे फेरीवाले अक्सर दिख जाते हैं। जिज्ञासा हुई तो मैंने अपनी साइकिल आगे बढ़ाई और बोर्ड पढ़ा। तब पता चला—वे फेरीवाले नहीं, बल्कि मुजफ्फरपुर (बिहार)Continue reading “साइकिल से घुमक्कडी करते कुंदन आर्य “

श्यामलाल; और वे भी खूब पदयात्रा करते हैं


गेरुआ वस्त्र पहने थे। कुरता धोती (तहमद की तरह), सिर पर सफेद गमछा लपेटा था। पीछे लपेट कर कम्बल जैसा कुछ लिया था। बांये हाथ में एक झोला। कोई लाठी नहींं थी हाथ में। चाल तेज थी। नंगे पांव, छरहरे और फुर्तीले थे वे।

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