बैठकी – मरण चर्चा और पुनर्जन्म का सिद्धांत

पिछली चर्चा पर एक महिला जी की टिप्पणी फेसबुक पर प्राप्त हुई – अब मरने की चर्चा कीजिये।  शायद वे साठ और साठोत्तर व्यक्तियों से मरण पर सुनना चाहती हों, या शायद उन्होने इसे यूं ही लिख दिया हो; हमने टिप्पणी को पूरी गम्भीरता से लिया और यह “मरण-चर्चा” कर डाली।


कई बार पाठक या श्रोता बड़ा अजब सा विषय उछाल देते हैं, और एक ब्लॉगर (या अब पॉडकास्टक) अगर उसे अनदेखा करता है तो वह सम्प्रेषण की शृन्खला की एक महत्वपूर्ण कड़ी को कमजोर कर देता है।

धीरेंद्र कुमार दुबे जी के साथ “बैठकी” की शुरुआत “रिटायरमेण्ट @ 45” पर पॉडकास्ट के साथ हुई थी। तब उसपर मिले रिस्पॉन्स को देखते हुये हम दोनो को लगा कि उसी तरह से अन्य विषयों पर भी अपने अनुभव, अध्ययन और मनन के आधार पर सहज बातचीत की जा सकती है, जो सुनने वालों को भी शायद रुचिकर लगे। 

पिछली चर्चा पर एक महिला जी की टिप्पणी फेसबुक पर प्राप्त हुई – अब मरने की चर्चा कीजिये।  शायद वे साठ और साठोत्तर व्यक्तियों से मरण पर सुनना चाहती हों, या शायद उन्होने इसे यूं ही लिख दिया हो; हमने टिप्पणी को पूरी गम्भीरता से लिया और यह “मरण-चर्चा” कर डाली।

चर्चा निम्न है –

बैठकी – अब मरने की चर्चा कीजिये

रिकंवच के बहाने देसी मिठाइयों और व्यंजनों पर बातचीत Post #13 Gyandutt Pandey – मानसिक हलचल

रिकंवच के साथ साथ #गांवदेहात के व्यंजनों और मिठाइयों पर पॉडकास्ट. इसमें अनरसा, गुड़ की जलेबी, लेड़ुआ, लखटू, तिलवा, पिटिउरा, दलभरी आदि देसी भोज्य पदार्थों की बातचीत है, जो अब कम ही दिखते हैं. कृपया सुना जाए!
  1. रिकंवच के बहाने देसी मिठाइयों और व्यंजनों पर बातचीत Post #13
  2. ओम प्रकाश यादव, वॉचमैन Post #12
  3. अगियाबीर के पुरातात्विक अन्वेषक डा. अशोक कुमार सिंह के संस्मरण Post #11
  4. भदोही जनपद का इतिहास और पुरातत्व – डाॅ. रविशंकर से एक चर्चा Post #10
  5. रस्सी बनाने की मशीन – गांव की सर्कुलर अर्थ व्यवस्था का नायाब उदाहरण – Post #9

चूंकि हम (धीरेंद्र और मैं) दोनो मूलत: हिंदू और आस्तिक हैं; हमारी चर्चा का आधार पुनर्जन्म का सिद्धांत रहा है। पर हमने अपने सेक्युलर अनुभव को भी साझा करने का कुछ प्रयास किया है। मसलन, धीरेंद्र ने ब्रोनी वेयर (वृद्धों और मरण के करीब के लोगों को सुकून देने वाली केयर गिवर) के 2009 के ब्लॉग और उसपर आर्धारित पुस्तक का जिक्र किया है जिसमें मरने के करीब लोगों को केयर-गिवर के रूप में उन बातों का जिक्र किया है, जिनको ले कर मरण के करीब लोग पछतावा व्यक्त करते थे। आप अमेजन पर उपलब्ध ब्रोनी वेयर की पुस्तक ले सकते हैं। द गार्डियन पर इस विषय में पठन सामग्री इस लिंक पर मिल सकेगी।

वृद्धों की जिंदगी कुछ बेहतर बना पाना अपने आप में बड़ा पुण्य है।

मैं ब्रोनी वेयर के पांच पछतावा बिंदुओं को नीचे प्रस्तुत कर देता हूं –

ब्रोनी वेयर
  1.  काश, मैं वैसे अपनी जिंदगी जी पाता, जैसे मैं वस्तुत: अपने लिये चाहता था; उस तरह से नहीं, जैसा लोग मुझसे अपेक्षा करते थे।
  2. काश मैं उतनी मेहनत-मशक्कत नहीं करता; काम में उतना पिला नहीं रहता; जितना मैंने किया। लोगों ने अपनी जिंदगी काम की चक्की या ट्रेडमिल पर गुजारने की बजाय यह इच्छा जताई कि काश वे अपने परिवार या प्रिय जनों के साथ ज्यादा समय बिता पाते।
  3. काश मैं अपनी भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त करने का साहस रख पाता। बहुत से लोगों ने अपनी फीलिंग दमित की। वे बहुत औसत तरीके से जिये और उस तरीके से नहीं खुल पाये जैसा उन्हें व्यक्त होना चाहिये था। कुछ तो इस कारण बीमार भी हो गये। उनके जीवन में तिक्तता भर गयी।
  4. काश मैं अपने मित्रों के अधिक सम्पर्क में रहा होता। अपने अच्छे मित्रों के लिये समय न निकाल पाना उनका बड़ा पछतावा रहा। सभी अपने अंत समय में उन मित्रों को याद करते रहे और उन्हें मिस करते रहे।
  5. काश मैं अपने आप को ज्यादा खुश रख पाता या बना पाता। बहुत से यह जिंदगी भर जान ही न पाये कि प्रसन्नता सामान्यत: अपने से आने वाली या मिलने वाली चीज नहीं, सयास पाने वाली चीज है। उसके लिये यत्न करना होता है।

उक्त बिंदु कोई धर्मग्रंथ या किसी सम्प्रदाय से सम्बंध नहीं रखते। पर वे आपकी अंतिम अवस्था की योजना को मूर्तरूप दे सकते हैं। मुझे अच्छा लगा कि धीरेंद्र ने यह अपनी बातचीत में रखा। इस बात ने पॉडकास्ट बैठकी को विचार संतृप्त किया।

खैर, आपसे अनुरोध है कि पॉडकास्ट पर अपने मनचाहे प्लेटफार्म पर जायें, या फिर इसी ब्लॉग में ही सुनने का कष्ट करें। आपके सुझाव और टिप्पणियां भी हमें बेहतर सोचने, बेहतर बोलने और बेहतर लिखने में सहायक होंगी। उनकी प्रतीक्षा रहेगी।


नन्हकी

नन्हकी संतोषी जीव नहीं है। जो उसे मिलता है, उसे हमेशा कम बताती है। कुछ और या किसी और चीज की मांग करती है। जल्दी हिलती नहीं। हार कर उसे “कुछ और” दिया जाता है।


सवेरे घूम कर घर लौटा तो देखा वह बैठी थी। बुढ़िया है। लाठी टेकती आती है। पास के गांव पठखौली की है। उसे दिखता भी कम है और सुनाई तो लगभग पड़ता ही नहीं। इन दोनो कमियों की भरपाई वह अनवरत बोल कर करती है।

होली के बिहान से नन्हकी आयी थी

दो-तीन महीने में एक बार चली आती है। कुछ अनाज और पैसे की मांग करती है। उससे पूछना कठिन है – सुनती नहीं।

वह हर बार मेरी पत्नीजी को यह बताती है कि बचपन में उन्हें गोद में खिला रखा है। वह अपना हाथ उठा कर बताती है – “तूं हेतना बड़ क रहू, तब से खेलाये हई (तुम इतनी बड़ी थी, तब से खिलाया है)।”

“तूं हेतना बड़ क रहू, तब से खेलाये हई (तुम इतनी बड़ी थी, तब से खिलाया है)।”

पत्नीजी को उसकी कोई पुरानी स्मृति नहीं है। पर उसके कहे को वे सच मान लेती हैं। उसे कुछ न कुछ देती हैं। पर नन्हकी संतोषी जीव नहीं है। जो उसे मिलता है, उसे हमेशा कम बताती है। कुछ और या किसी और चीज की मांग करती है। जल्दी हिलती नहीं। हार कर उसे “कुछ और” दिया जाता है। कई बार फिर भी वह नहीं जाती तो उसकी उपेक्षा की जाती है। अंतत: चली जाती है। मांगने में जिस धैर्य और जिस पर्सिस्टेंस (persistence) की जरूरत होती है, वह उसमें है। नन्हकी एक कुशल मंन्गन (भीख मांगने वाली) है।

नोट खतम हो गये थे तो उसे चिल्लर में दिये। वे पैसे उसने ध्यान से गिने।

आज उसे होली की गुझिया दी। साथ में पच्चीस रुपये। घर में छोटे नोट खतम हो गये थे तो उसे चिल्लर में दिये। वे पैसे उसने ध्यान से गिने। एक रुपये और दो रुपये के सिक्के एक जैसे होते हैं। उन्हे ध्यान से देखना होता है। नन्हकी ने वह भी किया। यह स्पष्ट हुआ कि पैसे गिनना और जोड़ना उसे बखूबी आता है।

पैसे गिनने पर उसने असंतोष व्यक्त किया। अंतत: उसे दस रुपये और दिये गये। फिर उसने दाल की मांग की। उस मांग को अनसुना किया गया। बताया गया कि अभी दाल नहीं है। फिर कभी आना। यह उसने सुना नहीं। पर समझ आ गया कि आज जितना मिला है, उससे ज्यादा मिलने वाला नहीं।

नन्हकी

उसके बारे में पता किया। घर बार है उसका। वह “राधे की माई” है। बच्चे हैं। कमाते हैं, वैसे ही जैसे गांवदेहात के और दलित कमाते हैं। घर की आर्थिक दशा खराब नहीं है। कमजोर है – पर उतनी जितनी औरों की है। पेंशन आदि पाती होगी। अभी उसका प्रधानमंत्री आवास योजना में आवास स्वीकृत हुआ है और मकान बन भी रहा है।

नन्हकी दबंग है। अपनी और औरों की समस्या ले कर तहसील, बैंक आदि जगह चली जाती है। किसी अधिकारी या पुलीस वाले से बात करने में उसे कोई हिचक नहीं। “दरोगा हमार का कई ले (पुलीस मेरा क्या कर लेगी?!)।” – ऐसा कहती है (लोगों ने बताया)।


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राजकुमार (मेरे घर में काम करने वाली कुसुम का पति) बताता है कि ‘नन्हकी मावा’ को मांगने की जरूरत नहीं है। वह मांगती इसलिये है कि मांगना उसकी आदत बन गयी है।

नन्हकी जैसे चरित्र गांवदेहात में (और शहरों में भी) बहुत हैं। भारत भिक्षा प्रधान देश है। मांगने और देने वाले अभी तो प्रचुर संख्या में हैं, बावजूद इसके कि सामाजिकता की कसौटियां बड़ी तेजी से बदल रही हैं।

जो धर्म कर्म शेष है, उससे नन्हकी जैसों की जिंदगी तो कट ही जायेगी।


ट्विटर पर टिप्पणी –



Shef जी ने टिप्पणी में और जोड़ा – + heartening to know govt schemes r reaching ppl like her – kahin to tax payer money theek se use hua