रविवार, रामसेवक, अशोक के पौधे और गूंगी

माता-पिता ने उनका नाम रामसेवक रखा तो कुछ सोच कर ही रखा होगा। पौधों की देखभाल के जरीये ही (राम की) सेवा करते हैं वे! उनकी पत्नी को गुजरे दशकों हो गए हैं। बच्चे छोटे थे तो उनको पालने और उन्हें कर्मठता के संस्कार देने में सारा ध्यान लगाया।


रविवार (27 दिसम्बर, 2020) की सुबह; सर्दी कम थी। बाहर निकलने के पहले पत्नीजी ने टोका नहीं – “टोपी लगाओ। मोजा पहने हो या नहीं? शॉल ओढ़े ही बाहर निकल रहे हो, कुरते के नीचे इनर पहना है या नहीं।” बाहर कोहरा भी नहीं था, पर ओस जरूर गिरी थी। मौसम दिसम्बर के अंतिम सप्ताह सा नहीं, फरवरी के मध्य जैसा लग रहा था।

कल दोपहर में गूंगी दिखी थी। गूंगी यानी छोटा दुमुहाँ सांप। धमिन भी कहते हैं। अंग्रेजी नाम सैण्ड बोआ। मारा नहीं उसको, छेड़ा भी नहीं। अपनी पोती चिन्ना को भी बुला कर करीब से दिखाया – कम से कम उसका सांप से भय कुछ कम होगा।

ट्विटर पर लोग बोले – इसके दिखने से धन आता है। फॉरेस्ट सर्विस के एक बंधु बोले कि मेरी ट्वीट अनुचित है। गूंगी खतरे में है और ट्वीट से उसका खतरा बढ़ जायेगा। वह इल्लीगल भी है। मैंने वह ट्वीट निकाल दी। वैधानिकता के सवाल पर नहीं; इस बात पर कि बेचारी गूंगी पर लोभ के मारे लोगों की कुदृष्टि न पड़े। सोशल मीडिया पर किए प्रयोगों में मैंने पाया है कि स्वविवेक ज्यादा अच्छा मार्ग दर्शक है बनिस्पत कानून या परम्परा के – ‌

गूंगी। धामिन। सैण्ड बोआ।

आज सवेरे रामसेवक आये। वे हर रविवार को आते हैं। सवेरे तीन चार घण्टे हमारे घर के परिसर में पौधों की देखभाल करते हैं। बनारस में सप्ताह भर काम करते हैं लोगों के बंगलों और व्यवसायिक संस्थानों में। रविवार को छुट्टी मनाते हैं तो मेरे घर पर कुछ समय दे देते हैं। उनका भी फायदा और हमारा भी। उनके आने से घर की बगिया चमक गयी है।

अशोक के दस पौधे

आज वे दस पौधे अशोक के लाये। घर की उत्तर दिशा की चारदीवारी के साथ साथ अशोक लगाने की योजना है मेरी पत्नीजी की। उसके बगल में गुड़हल के झाड़ रहेंगे एक दूसरे से पर्याप्त दूरी बना कर। रामसेवक का कहना है कि साथ में फूलों की क्यारी की एक पट्टी भी रहेगी! अच्छी अच्छी योजनायें हैं। इसमें मेरा योगदान मात्र चित्र खींचने का है! 🙂

एक कुशल माली को पर्याप्त फ्रीडम होनी चाहिए प्रयोग करने की!

रामसेवक अशोक के पौधों के लिये जगह बना रहे हैं। दीवार के साथ कूड़ा करकट इकठ्ठा कर उन्होने जला दिया है। वह जगह वही है, जहां कल धामिन दिखी थी। रामसेवक को उसके बारे में बताया तो बोले – अब तो चली गयी होगी साहब। बहुत निरीह जीव है। कभी किसी को नुक्सान पंहुचाते नहीं देखा। दिखने पर धन ही आता है!

रामसेवक अशोक के पौधे रोपने के लिये जगह बना रहे हैं। वह स्थान वही है, जहां कल धामिन दिखी थी।

एक घण्टे बाद देखा तो रामसेवक जी वहां अशोक के पौधे रोप भी चुके थे। गुड़हल की भी पांच टहनियाँ काट कर रोप दी थीं – “दो तीन भी चल गयीं तो कई गलत जगह लगे अढ़उल (गुड़हल) हटाये जा सकेंगे। एक चम्पा की टहनी भी इसी हिसाब से लगाई है।”

रामसेवक जी ने रोप दिया है अशोक का पौधा, जहां गूंगी दिखी थी।

रामसेवक केवल बगीचे में पौधे रोप ही नहीं रहे, बगीचे को री-ऑर्गेनाइज करने की अपनी स्कीम के अनुसार काम कर रहे हैं। कंंटाई छंटाई और रोपने के बाद देखा तो वे पौधों/झाड़ों पर छिड़काव भी कर रहे थे। पौधों, विशेषत: गुड़हल में सफेद कीड़ा लगता है। उसका इलाज कर रहे थे वे।

वे बताते हैं कि माता-पिता ने उनका नाम रामसेवक रखा तो कुछ सोच कर ही रखा होगा। पौधों की देखभाल के जरीये ही (राम की) सेवा करते हैं वे! उनकी पत्नी को गुजरे दशकों हो गए हैं। बच्चे छोटे थे तो उनको पालने और उन्हें कर्मठता के संस्कार देने में सारा ध्यान लगाया। दूसरी शादी नहीं की। वैसे भी आसपास लोगों में फिजूल खर्च, पर निंदा, नशा खोरी आदि के अनेक दोष हैं; पर राम सेवक में ऐसा कोई दोष नजर नहीं आता।

अपराजिता की लता।

पता नहीं उन्होने लगाया था, या पहले से हमारे पास है – एक अपराजिता की बेल। रामसेवक उसे नीलाम्बरी कहते हैं। शंकर जी को प्रिय है यह फूल। कल डा. रविशंकर के फेसबुक पोस्ट पर देखा था कि इसके फूलों की चाय का वे सेवन करते हैं। चार फूल डाल कर जल उबालते हैं और उसमें शहद मिला कर, या वैसे ही, पीते हैं। उसमें अगर शहद मिलाते हैं तो नींबू नहीं निचोड़ते।

रविशंकर जी ने बताया कि अपराजिता की पत्तियां, फल और जड़ – सभी अयुर्वेद के अनुसार फायदेमद है। एक लेख की प्रति भी भेजी उन्होने मुझे ई-मेल से। रविशंकर जितने विलक्षण एक्सपेरिमेण्टल ऑर्कियॉलॉजिस्ट हैं, उतने ही प्रयोगधर्मी और जिज्ञासु जीवन के हर एक पक्ष में हैं। मैं चाहता हूं कि वे नियमित मेरे यहाँ आयें, पर वे कहते हैं कि काम बहुत है। पुरातत्वविद क्या बहुत बिजी रहता है?

मेरे ख्याल से, मेरे घर में लगे बहुत से पौधे किसी आयुर्वेद वाले के लिये काम के होंगे। … अश्वगंधा, स्टेविया और तेजपत्ता के पौधे ठीक से पनप रहे हैं। कुछ सालों बाद जब उम्र हम पर हावी होगी और हमारी मोबिलिटी और कम हो जायेगी, तब हम चाहेंगे कि लोग हमारे यहां आयें, और यही सब देखने के लिये आयें।

अपडेट –

गूंगी फिर दर्शन दिए आज 29 दिसंबर दोपहर तीन बजे –


आत्मकथ्य –

रविवार की सुबह गुजर गयी है। दोपहर हो गयी है। शाम होते देर नहीं लगेगी। आजकल दिन छोटा ही होता है। शाम सात बजे तक तो गांव सोने की तैयारी करने लगता है। गतिविधियां सामान्य दिनों से ज्यादा होती हैं हमारे घर में रविवार को। सो इंतजार रहता है रविवार का। … कुल मिला कर यह लग रहा है कि मैं अपने घर के परिसर से उत्तरोत्तर ज्यादा लगाव महसूस कर रहा हूं। हो सकता है उम्र के साथ साथ यह अंतर्मुखी बनने की प्रक्रिया का अंश हो। आखिर नौजवान तो बाहर घूमना चाहता है, दुनियाँ देखना चाहता है। मेरी तरह अपने घर की फूल पत्ती और जीवों में, या किताबों में सिमटना नहीं चाहता।

खैर, इण्टर्नलाइज होने की अपनी एक क्रियेटिविटी है। तुलसी ने रामचरितमानस कितनी उम्र में लिखा था? कुछ लोग कहते हैं पचास की उम्र में और कुछ कहते हैं पचहत्तर की उम्र में। पचहत्तर वाले मानते हैं कि तुलसीदास सवा सौ साल जिए। मैं पचहत्तर पर यकीन करना चाहता हूँ और सोचता हूं कि एक दो दशक अभी बचे हैं अपनी क्रिएटिव ऊर्जा का स्पार्क देखने को।

बाज की असली उड़ान बाकी है। बाज को यकीन भर बना रहे कि वह बाज है, बस!


अलाव

प्रज्वलित होती आग को निहारते समय अगर आदमी मौन हो कर सोचने की प्रक्रिया में उतरे तो जीवन, उसकी सार्थकता, मरण और मरण के आगे के कई प्रश्न तैरने लगते हैं। उन प्रश्नों और विचारों को सयास पकड़ना और भविष्य के लिये संंजोना एक अभूतपूर्व अनुभव है।


कल आसमान खुला नहीं। सवेरे सूरज समय पर दिखे पर उनकी आभा नहीं थी। आसमान में आग के गोले की तरह नहीं, माथे की टिकुली जैसे थे। एक केसरिया रंग का छोटा सा बटन। उसके बाद बादल ही छाये रहे दिन भर।

आसमान में आग के गोले की तरह नहीं, माथे की टिकुली जैसे थे सूरज

इन सर्दियों के मौसम में पहला ही दिन था, जब कऊड़ा (अलाव) की जरूरत महसूस हुई। और जब अलाव जला तो पूरे दिन जलता रहा।

पहले अलाव का कल का ट्वीट

गर्म लकड़ियों के टुकड़े चिमटे की सहायता से अलाव से निकाल कर एक पानी के तसले में ठण्डा किये गये और काफी चारकोल भी बनाया गया। यह चारकोल घर के अंदर सिगड़ी जला कर गर्मी लाने के लिये उपयोगी रहेगा। आशा है, आने वाले महीना डेढ़ महीना में कुछ दिन तो ऐसे होंगे ही जिसमें घर के अंदर गर्माहट के लिये सिगड़ी की जरूरत हो। पिछली सर्दियों में महीनों सिगड़ी जलानी पड़ी थी और लकड़ी का कोयला बहुत मंहगे दाम (लगभग दूध के भाव) खरीदना पड़ा था। इस साल हम पहले से ही सतर्क हो गये हैं। घर में जलाऊ लकड़ी पर्याप्त है। अलाव जला कर बैठने और वहां चारकोल बनाने का काम भी चलेगा।

कल अलाव में शकरकंद और आलू भूने गये। भुने कंदों का स्वाद लाजवाब था। शाम के समय और भी शकरकंद बाजार से मंगवा ली है। यह भी पढ़ा है कि मधुमेह का मरीज भी थोड़ा बहुत शकरकंद खा सकता है। सो मैंने सीमित मात्रा में भुनी कंद खाई। फेसबुक और ट्विटर पर सलाह मिली की मूंगफली और बैंगन भी अलाव में भूने जा सकते हैं। उनके साथ भी, आने वाले दिनों में प्रयोग होंगे।

अलाव का इतिहास मानव के सभ्य होने का इतिहास है। आग के किनारे गोलबंद आदमी सामाजिक बना। प्रज्वलित होती आग को निहारते समय अगर आदमी मौन हो कर सोचने की प्रक्रिया में उतरे तो जीवन, उसकी सार्थकता, मरण और मरण के आगे के कई प्रश्न तैरने लगते हैं। उन प्रश्नों और विचारों को सयास पकड़ना और भविष्य के लिये संंजोना एक अभूतपूर्व अनुभव है।

यह अनुभव कल कुछ सीमा तक मिला और आगे कई कई दिनों तक मिलता रहेगा। 🙂


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अलाव हमारे लिये तो आवश्यकता कम, सर्दियों का अनुभव ज्यादा है। पर गांव में घूमते हुये जगह जगह जलते अलाव और उसके इर्दगिर्द ठिठुरते बैठे लोगों को देख कर स्पष्ट होता है कि कऊड़ा सर्दियां काटने की अनिवार्यता है। रात किसी प्रकार लोग गुजारते हैं। आजकल धान का पुआल इफरात में उपलब्ध है। उसे जमीन या तख्ते पर बिछा कर लोग सोते हैं। भोर होते ही उठ कर कऊड़ा जलाने का उपक्रम करने लगते हैं। पिछले दिन जो भी घास-फूस, टहनियां, बटोरन जमा की होती हैं; उनको जमा कर अलाव जलता है और उसी के इर्दगिर्द सवेरे का भोजन बनाने का भी उपक्रम होता है। सवेरे पांच बजे से नौ-साढ़े नौ बजे तक अलाव की मॉर्निंग शिफ्ट चलती है। शाम पांच बजे फिर अलाव जलाने की जुगत मेंं लग जाते हैं ग्रामीण। वैसे शाम का कऊड़ा उतना नहीं प्रचलित जितना सवेरे का।

दो साल पहले सिद्धिनाथ मंदिर में बहेतू पशुओं की गौशाला चलाने वाले जोगी बाबा पर ब्लॉग पोस्ट लिखी थी – जोगी बाबा – सिद्धिनाथ मन्दिर का साधू और अनाथ गौवंश को पालनेवाला। वह विलक्षण साधू दिन भर धूनी (अलाव) जलाये रहता था। सर्दियों में उस अलाव और साथ में चाय/चिलम की उपलब्धता से अनेक श्रद्धालु जुट जाते थे। उन्हीं के माध्यम से जोगी बाबा को अपने आश्रम की गौशाला के लिये स्वयमसेवक मिल जाते थे।

धूनी के पास मेरे लिये चाय बनाते जोगी बाबा। चित्र तीन साल पहले का है।

अलाव के महत्व को मैंने जोगीबाबा के सम्पर्क में गहराई से अनुभव किया था। मैं उनसे तीन साल पहले मिला था। अभी भी उनके बारे में समाचार मिलता है कि वे उसी प्रकार निराश्रित गायों को आश्रय प्रदान कर रहे हैं। उनके इस कार्य में अलाव/धूनी की भी एक भूमिका है।

रात में अलाव बुझाने का समय हो गया है!

आज का अलाव तो उत्सव जैसा रहा। वह स्थान – पोर्टिको में एक ओर, गमलों और पौधों से कुछ दूर जिससे अलाव का धुआँ वनस्पति पर दुष्प्रभाव न डाले – एक रंगमंच सा रहा; जहां पात्र आते जाते रहे। शाम के समय तो राजन भाई भी आ गये। वे भी देर तक बैठे रहे, अलाव की गर्मी तापते। मैं जिस विचार में डूबने और भूत-भविष्य-वर्तमान पर अपनी सोच कुरेदने की बात ऊपर कर रहा था; उसका समय तो आगे आने वाले दिनों में आयेगा। तब देखें वह सब धुयें की तरह तैर कर निकल जायेगा या फिर भविष्य के जीवन में बदलाव के सूत्र भी उसमें निकलेंगे।

बहरहाल सर्दी का मौसम, कोहरा, बादल और लम्बे समय तक कऊड़ा/अलाव के समीप बैठना एक ऐसा टाइम ड्यूरेशन है, जिसकी प्रतीक्षा का समय खत्म हो गया है। अनुभूतियों का समय आ गया है।

मस्त रहो, जीडी!


धूप सेवन और चोर गिलहरियों की संगत

सागौन के पेड़ के ऊपर एक गिलहरी दम्पति मोजे को ऊपर की ओर खींच रहे थे। वे हटाने पर आसपास चींचीं करते रहे, मानो उनकी सम्पत्ति हो और हम उसे जबरी हथियाने जा रहे हों। 😆


एक बोतल पानी, दो कुर्सियाँ जोड़ कर उनपर अधलेटा शरीर। मोबाइल पर चलता कोई पॉडकास्ट या गाना। घर में धूप खूब आती है और उसमें बैठने-लेटने का बहुत आनंद है। श्रीमती जी जब वहां गयीं तो पैरों मे मोजे पहने हुये थे। धूप की गर्मी में वे उतार कर पास की एक कुर्सी पर रख दिये।

धूप का आनंद लेतीं श्रीमती रीता पाण्डेय

एक दो घण्टे बाद जब मोजे देखे तो एक पैर का गायब था। कौन ले जायेगा? कौन कौन आया था घर में? पीछे अरहर के खेत में घास छीलने वाली स्त्रियां आती हैं। उनमें से कोई ले गयी? पर लेना भी होगा तो एक पैर का काहे ले जायेगी?

“फुआ, दूसरे पैर का वहीं रहने दें। जो एक पैर का ले गया है उसे कम से कम दोनो पैर का मिल जाये!” – घर में बर्तन मांजने वाली ने ठिठोली की।

“चेखुरा (गिलहरी) लई ग होये। सर्दी में ओन्हने खोथा बनवथीं। (सर्दी में वे अपना घर बनाती हैं।)” – दूसरी ने अपना कयास लगाया। खोथा बनाने की सम्भावित जगहें तलाशी गयीं पर मोजा कहीं नहीं मिला। एक पैर का मोजा घर में पड़ा रहा।

अगले दिन काम करने वाली ने चिल्ला कर कहा – होवा बा! (वहां है!)

सागौन की पत्तियों के बीच मोजा

सागौन के पेड़ के ऊपर एक गिलहरी दम्पति उसे ऊपर की ओर खींच रहे थे। वे हटाने पर आसपास चींचीं करते रहे, मानो उनकी सम्पत्ति हो और हम उसे जबरी हथियाने जा रहे हों। पेड़ के पास एक प्लास्टिक की कुर्सी पर चढ़ कर एक टहनी से पत्नी जी ने जुराब खींच कर पेड़ की पत्तियों से अलग की। उसमें छेद बना दिये थे गिलहरी ने। उसके बच्चों या उसे गर्माहट देने वाली तो होगी वह, पर हमारे किसी काम की नहीं थी। छेद छोटा नहीं था कि रफू कर काम चलाया जा सके। उसे वहीं पेड़ पर छोड़ दिया गया – गिलहरी के प्रयोग के लिये। अभी दूसरी जुराब भी वहीं ले जा कर छोड़ देने पर विचार चल रहा है! 😆

जुराब का यह हाल बना दिया था गिलहरी दम्पति ने।

पांच साल पहले जब यहां खेत में हमने घर बनाया था तो एक ही पेड़ था। उसपर चार पांच गिलहरियां रहती थीं। फिर पेड़ बढ़े। वनस्पति और लतायें बढ़ीं। गिलहरियों और चिड़ियों के लिये पानी और अन्न रखा जाने लगा। अब घर भर में तीन चार दर्जन गिलहरियां और एक दर्जन किस्म के पक्षी रहते हैं। उनके घोंसले भी दिख जाते हैं।

उस दिन माधवी लता की छंटाई करने के लिये माली जी गये तो एक छोटी मुनिया जैसी चिड़िया इतना चिल्लाई कि छंटाई का विचार त्याग दिया रामसेवक ने। देखा तो उसमें एक घोंसला पाया। ऐसे घोंसले घर में अप्रत्याशित स्थानों पर पाये जाये हैं। मुनिया, गौरय्या, बुलबुल और अब बया भी घोंसले लगा रही हैं हमारे परिसर में। चरखी और चेखुरा (गिलहरी) बहुतायत से हैं। वे यहां के मूल निवासी हैं। गिरगिट, उल्लू, कबूतर और नेवले भी आते जाते रहते हैं।

इस घोंसला वाली चिड़िया ने राम सेवक को लता की छँटाई रोकने को बाध्य कर दिया।

मेढ़क और सांप भी किसिम किसिम के हैं। एक छोटा मेढ़क तो दीवार पर चढ़ने में महारत रखता है। एक रात एक सांप तो टूटी जाली से स्नानघर में चला आया था। वह तो भला हो कि रात में लघुशंका के लिये जाने पर उसपर पहले नजर पड़ गयी। न चाहते हुये भी उसे मारना पड़ा। उसे पकड़ने की तकनीक अगर आती होती तो उसकी जान बच जाती।

इन सब जीवों में गिलहरियां और चरखियाँ सबसे ढीठ और चोर हैं। अन्न सूखने के लिये धूप में डाला जाये तो ये दोनो बहुत खा जाते हैं और खाने से ज्यादा जमीन पर गिरा कर बरबाद करते हैं। फिर चींटियां उन्हे ढ़ो कर ले जाती हैं। क्या करें; गांव में रह रहे हैं तो इनकी संगत में रहना ही है।

और अब तो इनकी संगत में रहना अच्छा भी लगता है! 😆

गिलहरियाँ और चरखी सुखाने रखे गेंहूं में अपना हिस्सा बटाते हुये।

दुखहरन लकड़हारा

दुखहरन ने अपनी रेती दिखाई। बताया कि रोज कुल्हाड़ी तेज करनी पड़ती है। वह कुल्हाड़ी साथ रखता है और रेती भी। स्टीफन कोवी की सेवन हैबिट्स पुस्तक का अध्याय मेरे दिमाग में जीवन्त हो गया – Sharpen the Saw.


वह लकड़हारा है। उसे बुलाया था घर में पड़ी लकड़ी चीर कर छोटे छोटे टुकड़े करने को। सर्दी बढ़ गयी है। सोचा गया कि शाम के समय एक दो घण्टे अलाव जलाया जाये। उसके लिये उपले जमा कर लिये थे। एक बोरसी भी बनवा ली थी। कमी थी तो लकड़ी के छोटे टुकड़ों की। लकड़ी घर में थी, पर काफी मोटे बोटे के रूप में। कई दिनों से एक लकड़हारे की जरूरत महसूस हो रही थी। तीन दिन पहले वह मिला।

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दुखहरन लकड़हारा

उसने नाम बताया दुखहरन। पास के गांव पठखौली (पाठक ब्राह्मणों का गांव) में रहता है। उससे तीन सौ में तय हुआ लकड़ी चीरने का काम। वह बोला कि अगले दिन आयेगा चीरने के लिये।

अगले दिन नहीं आया। साइकिल से घूमते हुये मैने देखा कि वह नहर की पुलिया पर बैठा था दिन के इग्यारह बजे। धूप सेंक रहा था। मैने पूछा – आये नहीं?

बिना किसी अपॉलॉजी के, उसने कहां कि हां, नहीं आ पाया। फिर जोड़ा – कालि आउब।

मुझे लगा कि वह विश्वसनीय नहीं है। नहीं आयेगा। पर अगले दिन सवेरे नौ बजे बाजार से घर लौट कर देखा तो वह लकड़ी चीर रहा था। नीम की मोटी डाल हमने पिछले साल कटवाई थी – इस लिये कि वह आम के पेड़ को दबा रही थी और आम में बौर ही नहीं लग पाते थे। एक साल भर में वह कोने में रखी डाल पूरी तरह सूख गयी थी। उसे चीरना बहुत मेहनत का काम था। हर लकड़ी की चोट करते हुये वह हांआआआं जैसी आवाज भी कर रहा था मुंह से।

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एक साल भर में वह कोने में रखी डाल पूरी तरह सूख गयी थी। उसे चीरना बहुत मेहनत का काम था। हर लकड़ी की चोट करते हुये वह हांआआआं जैसी आवाज भी कर रहा था मुंह से।

मेरी पत्नीजी ने काम शुरू करते समय उसे गुड़-पानी दिया था। तब दो लोटा पानी पिया था उसने। एक कप चाय दी थी पानी के बाद। घण्टा भर बाद काम बीच में रोक कर सुस्ताने और पानी-गुड़ की पेशकश की मैने, पर वह रुका नहीं। अनवरत चीरता रहा। पूरा काम करने के बाद ही दम लिया। लगभग तीन घण्टे, बिना रुके अपनी तीन किलो की कुल्हाड़ी से प्रहार करता रहा।

काम पूरा करने पर उसे चाय पिलानी चाही पर बोला – नाहीं, कुछ न चाहे। हमार हिसाब दई द। चलब। भगवानपुर जाई के बा (नहीं, कुछ नहीं पीना है। मेरा हिसाब कर दें। चलूंगा। भगवानपुर – पास के गांव – जाना है)।

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अनवरत चीरता रहा। पूरा काम करने के बाद ही दम लिया। लगभग तीन घण्टे, बिना रुके अपनी तीन किलो की कुल्हाड़ी से प्रहार करता रहा।

उसका पैसा देने के पहले मैने उससे उसके बारे में बात की। चार लड़के और दो लड़कियां हुई थीं। दो लड़के नहीं रहे। लड़कियों की शादी हो चुकी है और अपने अपने घर चली गयी हैं। दोनो लड़कों की भी। लड़कों के बच्चे-परिवार हैं। वह अकेला रहता है। पत्नी बीस साल पहले गुजर गयी। अपना खाना खुद बनाता है। शाम को पांच बजे तीन चार टिक्कड़ सेंकता है। वही भण्टा-चोखा से खाता है। बस एक बार भोजन करता है दिन में। बाकी चाय-पानी पर चलता है।

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बिना लजाये खुद ही (बिना पूछे, बेझिझक) कहा – आप तो जानते ही हैं। पैसा निकल जाता है नशा-गांजा में। पर फिर भी कुछ बचाया है। बैंक में खाता है।

कमाई इतनी करता है कि काम चल जाता है। उसने बिना लजाये खुद ही (बिना पूछे, बेझिझक) कहा – आप तो जानते ही हैं। पैसा निकल जाता है नशा-गांजा में। पर फिर भी कुछ बचाया है। बैंक में खाता है।

अकेला आदमी। रूखी, खुरदरी, मेहनत मशक्कत की जिन्दगी। जिस तरह से बताया, उससे लगता है कि मुझसे कुछ ही कम होगा वह उम्र में। पर व्यवहार में कोई लाचारी नहीं। कोई रिमोर्स, कोई शिकायत नहीं। बिना लाग लपेट के बताया अपने नशा-गांजा के बारे में! … अपनी मर्जी का मालिक।

उससे तीन सौ में तय हुआ था काम; मैने चार सौ दे दिये। उसने कोई गरम कपड़ा मांगा। मेरी पत्नीजी ने मेरा मोटा स्वेटर – पुराना, पर मुझे बहुत प्रिय था मुझे -उसे दे दिया। दुखहरन से बात करते उससे इतना अटैचमेण्ट महसूस कर रहा था कि मैं पत्नीजी को मना भी न कर पाया। शायद उन्हे मेरा वह पुराना स्वेटर पहनना अच्छा नहीं लगता था – इस मौके का फायदा उठा उन्होने निकाल दिया!

उसकी तीन किलो की टंगारी (कुल्हाड़ी); तीन बार प्रहार करने में ही मेरी कमर में निश्चित ही चिलक हो जाती; तीन घण्टे अनवरत चलाता रहा था वह!

वह जाने को हुआ तो मैने आखिरी सवाल किया – टंगारी (कुल्हाड़ी) तेज भी करते हो? कैसे?

FSDec255
दुखहरन ने अपनी रेती दिखाई। बताया कि रोज कुल्हाड़ी तेज करनी पड़ती है। वह कुल्हाड़ी साथ रखता है और रेती भी। 

दुखहरन ने अपनी रेती दिखाई। बताया कि रोज कुल्हाड़ी तेज करनी पड़ती है। वह कुल्हाड़ी साथ रखता है और रेती भी।  स्टीफन कोवी की सेवन हैबिट्स पुस्तक का अध्याय मेरे दिमाग में जीवन्त हो गया – Sharpen the Saw. 

भगवानपुर में किसी मिसिर जी ने आम की लकड़ी चिरवाने के लिये बुलाया है। बोला कि जा कर कह देगा कि अब कल आयेगा उनका काम करने। आज जितनी मेहनत कर ली और जितना मिल गया; वह काफ़ी है।

इतने दार्शनिक हमें वर्तमान में जीने की सीख देते पूरी पूरी किताबें लिख देते हैं। यहां केवल वर्तमान में जीता उदाहरण सामने था – दुखहरन!