Ghurahu, the tailor in village

I’m searching for any other work which could be given to Ghurahu. He may need support at least in this month, till the usual customers come back in sufficient numbers.


He may be around 45-50 years old. His children are making or trading in ornaments in villages nearby; a traditional work as per their caste. It is a bit strange that even a very small village has a saraf (सराफ – person dealing in ornaments). Very poor people also have some ornaments, may be of silver or other Inferior metal.

But Ghurahu is tailor, not a saraf. He sits in front of a shop in Mahrajganj town bazar, with his feet operated sewing machine and a chair. Must be getting reasonable work in normal days. During marriage season, he becomes very busy. It is very difficult for him to meet delivery deadlines in those days.

Ghurahu, the tailor.
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गोविंद पटेल ने लॉकडाउन में सीखा मछली पकड़ना #गांवकाचिठ्ठा

लॉकडाउन काल में, जब लोग आजीविका के व्यवधान के कारण दाल और तरकारी के मद में जबरदस्त कटौती कर रहे हैं; तब रोज चार घण्टा गंगा किनारे 2-4 किलो मछली पकड़ लेना बहुत सही स्ट्रेटेजी है लॉकडाउन की कठिनाई से पार पाने की।


कोलाहलपुर तारी और द्वारिकापुर – दोनो गांवों में गंगा घाट हैं। दोनो घाटों के बीच सवा-डेढ़ किलोमीटर की दूरी होगी। गंगा कोलाहलपुर से द्वारिकापुर की ओर बहती हैं। इन दोनो घाटों के बीच दिखते हैं मछली मारने के लिये कंटिया फंसाये साधनारत लोग।

गोविंद पटेल

मुझे गोविंद पटेल मिले। उन्हें पहले से नहीं जानता था। बातचीत में उन्होने बताया कि बाबूसराय (चार किलोमीटर दूर) के हैं वे और मुझे आसपास घूमते देखा है। उनसे जब मैं मिला तो पौने छ बजे थे। गंगा करार पर मेरी साइकिल ने चलने से इंकार कर दिया था और लगभग आधा किलोमीटर बटोही (साइकिल का नाम) को धकेलता, पसीने से तर, मैं वहां पंहुचा था। गोविंद पटेल अपनी मोटर साइकिल पर अपने साथी के साथ पांच बजे आ कर डटे थे मछली साधना में। एक लाल रंग के लम्बे झोले में कुछ मछलियां थीं, जो उन्होने पकड़ी थीं। झोले का मुंह एक पत्थर से दबाया हुआ था और सारा हिस्सा पानी में था। पकड़ी मछलियों को पानी मिल रहा था। वे कैद में थीं पर जिंदा थीं।

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मनरेगा @ लॉकडाउन #गांवकाचिठ्ठा

जब आप गरीबी देखें; उसकी परतें खोलने की कोशिश करें, तो जी घबराने लगता है। दशा इतनी ह्यूमंगस लगती है, इतनी विकराल कि आप को लगता है आप कुछ कर ही नहीं सकते।



मेरे किराने की सप्लाई करने वाले रविशंकर कहते हैं – सर जी, आप लोगों को मदद बांट नहीं पायेंगे। भीड़ लग जायेगी। गरीबी बहुत है इस इलाके में सर जी। थक जायेंगे आप।

रविशंकर ने जो कहा, वह महसूस हो रहा है।

आप साइकिल ले कर सवेरे फोटो क्लिक करते घूम आइये। गंगा किनारे जल की निर्मलता निहार लीजिये। घर आ कर लैपटॉप पर चित्र संजो लीजिये। कुछ ट्विटर पर, कुछ फेसबुक पर, कुछ वर्डप्रेस ब्लॉग पर डाल कर छुट्टी पाइये और पत्नीजी से पूछिये – आज ब्रेकफास्ट में क्या बना है? उसमें सब बढ़िया लगता है। रिटायरमेण्ट का आनंद आता है।

पर जब आप गरीबी देखें; उसकी परतें खोलने की कोशिश करें, तो जी घबराने लगता है। दशा इतनी ह्यूमंगस लगती है, इतनी विकराल कि आप को लगता है आप कुछ कर ही नहीं सकते। या जो कुछ करेंगे वह ऊंट के मुंंह में जीरा भी नहीं होगा।

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स्वैच्छिक लॉकडाउन या अपने पर ओढ़ा एकांतवास #गांवकाचिठ्ठा

पछुआ हवा है। लू बह रही है। वे भविष्यवक्ता जो कह रहे थे कि तापक्रम बढ़ते ही कोरोनावायरस अपने आप खतम हो जायेगा, अपनी खीस निपोर रहे हैं। ज्योतिषी लोग अपने अपने गोलपोस्ट बदल रहे हैं।


मई 25, 2020, विक्रमपुर, भदोही।

मेरी प्रवृत्ति के विपरीत है यह।

चलते चलते अचानक रुक जाना और सड़क के किनारे चाक चलाते कुम्हार का चित्र लेना, या अचानक साइकिल का हैण्डल पतली सी पगडण्डी से गंगा किनारे जाने की ओर मोड़ देना, कभी साइकिल सड़क पर खड़ी कर पतली सी मेड़ पर अपने को बैलेन्स करते चलना और दूर किसी धोख का विभिन्न कोणों से चित्र लेना – ये सब मेरे वे कृत्य हैं, जो मुझे मेरी नजर में “अपने को विशिष्ट” बनाते हैं। किसी भी दुकान पर आवश्यक/अनावश्यक चीज की तहकीकात करना और मन होने पर खरीद लेना, उसी औरों से अलग होने की अनुभूति को पुष्ट करना ही है। कभी कभी लगता है कि मैं शहर के अपने कम्फर्ट-जोन को तिलांजलि दे कर गांव में इसलिये हूं कि उस वैशिष्ट्य को निरंतर भोगना चाहता हूं। मैं अगर धनी होता, सम्पन्न होता तो उस वैशिष्ट्य की प्राप्ति के अलग औजार होते। अब जो हैं, सो हैं।

मेरी प्रवृत्ति के विपरीत है दिन में तेईस घण्टे स्वैच्छिक लॉकडाउन या एकांतवास में रहना। ऐसा नहीं है, कि मुझे भीड़ में होना प्रिय है। एकांतवास मैं चाहता हूं। पर वह जनअरण्य से दूर, अलग घूमने, देखने और सोचने का एकांतवास है। जब मैं कोविड19 संक्रमण के कारण, 23 घण्टे घर के चारदीवारी में बंद रहने का निर्णय करता हूं, तो उसमें (बावजूद इसके कि स्वयम को अंतर्मुखी घोषित करता हूं)  बहुत कुछ त्यागने का भाव है।

आज सवेरे 5 से 6 के काल की बहुत प्रतीक्षा थी। कल शाम को ही साइकिल की हवा चेक कर ली थी, कि कहीं सवेरे ऐन मौके पर हवा भरने के पम्प को खोजना-चलाना न पड़े। अपनी दाढ़ी का भी शाम को ही मुआयना कर लिया था कि कहीं सवेरे इतनी बढ़ी हुई न हो कि बाहर निकलने के पहले दाढ़ी बनाने की जरूरत महसूस हो, और वह बनाने में दस मिनट लग जायें।

भोर का समय, निपटान के लिये खेत जाने का समय।
औरतें निपटान के लिये जाती, या निपटान कर आती हुईं।

पांच बजे निकलना था, पर मैं चार पचास पर ही निकल लिया। अन्धेरा छंटा नहीं था, पर इतना भी नहीं था कि सड़क न दिखे। इक्का दुक्का लोग थे। आसपास के खेतों में धब्बे की तरह लोग दिखे निपटान करते। फसल नहीं थी, खेत खाली हैं, तो निपटान करते लोग दिखते हैं। स्त्रियाँ भी थीं। स्पष्ट है कि हर घर में शौचालय बन गये हैं, सरकारी खर्चे पर; पर लोग उनका प्रयोग उतना नहीं कर रहे, जितना होना चाहिये। उनके प्रयोग के लिये पर्याप्त पानी की आवश्यकता है। उनको साफ रखने के लिये कुछ न कुछ खर्चा जरूरी है। पर जब पानी हैण्डपम्प या ट्यूब वेल से 20-25 मीटर ढोया जाता है, तो शौचालय साफ करने के लिये पानी श्रम लगा कर ढोना जरूरी नहीं लगता। लिहाजा, शौचालय मॉन्यूमेण्ट हैं और लोग-लुगाई खेत या सड़क/रेल की पटरी की शरण में जाते हैं।

गांवकाचिठ्ठा में यह सब लिखना इसे एक सटायर का सा रूप देता है। सटायर लिखना ध्येय नहीं अत: विषय परिवर्तन करता हूं।

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संक्रमण के बढ़ते मामले और व्यक्तिगत लॉकडाउन की जरूरत #गांवकाचिठ्ठा

संक्रमण ग्रस्त होना या न होना – एक पतली सी लाइन से विभक्त होता है। उसमें एक ओर बचाव है, रोचकता है, प्रयोग हैं और सोचने, पढ़ने, लिखने की सम्भावनायें हैं; दूसरी ओर संक्रमण है, रोग है, अस्पताल है, अकेलापन है, परित्यक्त होने का दारुण दुख है और (शायद) मृत्यु भी है।


ट्विटर पर अतिशयोक्ति जी ने पूर्वांचल के कोविड19 मामले द्विगुणित होने के दिनों की गणना के ग्राफ प्रस्तुत किये हैं। इसके अनुसार पूर्वांचल (प्रयाग, भदोही, मिर्जापुर, जौनपुर, वाराणसी, प्रतापगढ़, सोनभद्र और आजमगढ़) में कोरोना संक्रमण के मामले लगभग 5-7 दिन में दुगने हो रहे हैं।

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प्रवासी मजदूर – मुख्यमंत्री की लताड़ से ही हरकत में आया प्रशासन

पिछले डेढ़ महीने से सड़कों पर आती भीड़ नहीं दिखी जिलाधीशों को? मानवता की “न भूतो न भविष्यति” वाली त्रासदी सड़कों पर लटपटाती डोलती रही और इन मित्रों को नजर नहीं आया?


कल सवेरे समाचारपत्र में था कि मुख्यमंत्री ने हिदायत दी है प्रदेश में आते ही प्रवासी श्रमिकों को पानी और भोजन दिया जाये। उनकी स्क्रीनिंग की जाये और उनको उनके गंतव्य तक पंहुचाने का इंतजाम किया जाये।

यह तो उन्होने परसों कहा होगा। कल इस कथन का असर नहीं था। मेरे सामने साइकिल से आये कई लोग अक्षयपात्र समूह द्वारा चलाये जा रहे भण्डारे में भोजन-विश्राम करते दिखे। दो पैदल चलते श्रमिकों को भी धीरज-राहुल ने बुलाया भोजन के लिये। कई ट्रकों में ठुंसे हुये लोग तो थे ही। कल जिला प्रशासन के अधीनस्थ अधिकारी और पुलीस की गाड़ियां आसपास से आये-गुजरे। कल तक तो मुख्यमंत्री के कथन का असर नजर नहीं आया था।

यह कल के भोजन वितरण का चित्र है –

लाइन में लगे, शिवाला पर अक्षयपात्र के कार्यकर्ताओं से भोजन ले रहे हैं प्रवासी

आज, जरूर अंतर नजर आया। सवेरे साइकिल भ्रमण के दौरान मेरे आठ किलोमीटर हाईवे पर आते जाते एक भी कोरोना-प्रवासी नजर नहीं आया – न पैदल, न साइकिल पर और न ट्रकों में। एक ट्रेलर पर कुछ लोग दिखे, पर वे शायद किसी जगह के निर्माण कर्मी थे।

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